वडहंस की वार (महला 4), Vadhans ki vaar (Mahalla 4) Path in Hindi Gurbani online


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वडहंस की वार महला ४
ललां बहलीमा की धुनि गावणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

सलोक मः ३ ॥
सबदि रते वड हंस है सचु नामु उरि धारि ॥ सचु संग्रहहि सद सचि रहहि सचै नामि पिआरि ॥ सदा निरमल मैलु न लगई नदरि कीती करतारि ॥ नानक हउ तिन कै बलिहारणै जो अनदिनु जपहि मुरारि ॥१॥

मः ३ ॥
मै जानिआ वड हंसु है ता मै कीआ संगु ॥ जे जाणा बगु बपुड़ा त जनमि न देदी अंगु ॥२॥

मः ३ ॥
हंसा वेखि तरंदिआ बगां भि आया चाउ ॥ डुबि मुए बग बपुड़े सिरु तलि उपरि पाउ ॥३॥

पउड़ी ॥
तू आपे ही आपि आपि है आपि कारणु कीआ ॥ तू आपे आपि निरंकारु है को अवरु न बीआ ॥ तू करण कारण समरथु है तू करहि सु थीआ ॥ तू अणमंगिआ दानु देवणा सभनाहा जीआ ॥ सभि आखहु सतिगुरु वाहु वाहु जिनि दानु हरि नामु मुखि दीआ ॥१॥

सलोकु मः ३ ॥
भै विचि सभु आकारु है निरभउ हरि जीउ सोइ ॥ सतिगुरि सेविऐ हरि मनि वसै तिथै भउ कदे न होइ ॥ दुसमनु दुखु तिस नो नेड़ि न आवै पोहि न सकै कोइ ॥ गुरमुखि मनि वीचारिआ जो तिसु भावै सु होइ ॥ नानक आपे ही पति रखसी कारज सवारे सोइ ॥१॥

मः ३ ॥
इकि सजण चले इकि चलि गए रहदे भी फुनि जाहि ॥ जिनी सतिगुरु न सेविओ से आइ गए पछुताहि ॥ नानक सचि रते से न विछुड़हि सतिगुरु सेवि समाहि ॥२॥

पउड़ी ॥
तिसु मिलीऐ सतिगुर सजणै जिसु अंतरि हरि गुणकारी ॥ तिसु मिलीऐ सतिगुर प्रीतमै जिनि हंउमै विचहु मारी ॥ सो सतिगुरु पूरा धनु धंनु है जिनि हरि उपदेसु दे सभ स्रिस्टि सवारी ॥ नित जपिअहु संतहु राम नामु भउजल बिखु तारी ॥ गुरि पूरै हरि उपदेसिआ गुर विटड़िअहु हंउ सद वारी ॥२॥

सलोकु मः ३ ॥
सतिगुर की सेवा चाकरी सुखी हूं सुख सारु ॥ ऐथै मिलनि वडिआईआ दरगह मोख दुआरु ॥ सची कार कमावणी सचु पैनणु सचु नामु अधारु ॥ सची संगति सचि मिलै सचै नाइ पिआरु ॥ सचै सबदि हरखु सदा दरि सचै सचिआरु ॥ नानक सतिगुर की सेवा सो करै जिस नो नदरि करै करतारु ॥१॥

मः ३ ॥
होर विडाणी चाकरी ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वासु ॥ अम्रितु छोडि बिखु लगे बिखु खटणा बिखु रासि ॥ बिखु खाणा बिखु पैनणा बिखु के मुखि गिरास ॥ ऐथै दुखो दुखु कमावणा मुइआ नरकि निवासु ॥ मनमुख मुहि मैलै सबदु न जाणनी काम करोधि विणासु ॥ सतिगुर का भउ छोडिआ मनहठि कमु न आवै रासि ॥ जम पुरि बधे मारीअहि को न सुणे अरदासि ॥ नानक पूरबि लिखिआ कमावणा गुरमुखि नामि निवासु ॥२॥

पउड़ी ॥
सो सतिगुरु सेविहु साध जनु जिनि हरि हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥ सो सतिगुरु पूजहु दिनसु राति जिनि जगंनाथु जगदीसु जपाइआ ॥ सो सतिगुरु देखहु इक निमख निमख जिनि हरि का हरि पंथु बताइआ ॥ तिसु सतिगुर की सभ पगी पवहु जिनि मोह अंधेरु चुकाइआ ॥ सो सतगुरु कहहु सभि धंनु धंनु जिनि हरि भगति भंडार लहाइआ ॥३॥

सलोकु मः ३ ॥
सतिगुरि मिलिऐ भुख गई भेखी भुख न जाइ ॥ दुखि लगै घरि घरि फिरै अगै दूणी मिलै सजाइ ॥ अंदरि सहजु न आइओ सहजे ही लै खाइ ॥ मनहठि जिस ते मंगणा लैणा दुखु मनाइ ॥ इसु भेखै थावहु गिरहो भला जिथहु को वरसाइ ॥ सबदि रते तिना सोझी पई दूजै भरमि भुलाइ ॥ पइऐ किरति कमावणा कहणा कछू न जाइ ॥ नानक जो तिसु भावहि से भले जिन की पति पावहि थाइ ॥१॥

मः ३ ॥
सतिगुरि सेविऐ सदा सुखु जनम मरण दुखु जाइ ॥ चिंता मूलि न होवई अचिंतु वसै मनि आइ ॥ अंतरि तीरथु गिआनु है सतिगुरि दीआ बुझाइ ॥ मैलु गई मनु निरमलु होआ अम्रित सरि तीरथि नाइ ॥ सजण मिले सजणा सचै सबदि सुभाइ ॥ घर ही परचा पाइआ जोती जोति मिलाइ ॥ पाखंडि जमकालु न छोडई लै जासी पति गवाइ ॥ नानक नामि रते से उबरे सचे सिउ लिव लाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
तितु जाइ बहहु सतसंगती जिथै हरि का हरि नामु बिलोईऐ ॥ सहजे ही हरि नामु लेहु हरि ततु न खोईऐ ॥ नित जपिअहु हरि हरि दिनसु राति हरि दरगह ढोईऐ ॥ सो पाए पूरा सतगुरू जिसु धुरि मसतकि लिलाटि लिखोईऐ ॥ तिसु गुर कंउ सभि नमसकारु करहु जिनि हरि की हरि गाल गलोईऐ ॥४॥

सलोक मः ३ ॥
सजण मिले सजणा जिन सतगुर नालि पिआरु ॥ मिलि प्रीतम तिनी धिआइआ सचै प्रेमि पिआरु ॥ मन ही ते मनु मानिआ गुर कै सबदि अपारि ॥ एहि सजण मिले न विछुड़हि जि आपि मेले करतारि ॥ इकना दरसन की परतीति न आईआ सबदि न करहि वीचारु ॥ विछुड़िआ का किआ विछुड़ै जिना दूजै भाइ पिआरु ॥ मनमुख सेती दोसती थोड़ड़िआ दिन चारि ॥ इसु परीती तुटदी विलमु न होवई इतु दोसती चलनि विकार ॥ जिना अंदरि सचे का भउ नाही नामि न करहि पिआरु ॥ नानक तिन सिउ किआ कीचै दोसती जि आपि भुलाए करतारि ॥१॥

मः ३ ॥
इकि सदा इकतै रंगि रहहि तिन कै हउ सद बलिहारै जाउ ॥ तनु मनु धनु अरपी तिन कउ निवि निवि लागउ पाइ ॥ तिन मिलिआ मनु संतोखीऐ त्रिसना भुख सभ जाइ ॥ नानक नामि रते सुखीए सदा सचे सिउ लिव लाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
तिसु गुर कउ हउ वारिआ जिनि हरि की हरि कथा सुणाई ॥ तिसु गुर कउ सद बलिहारणै जिनि हरि सेवा बणत बणाई ॥ सो सतिगुरु पिआरा मेरै नालि है जिथै किथै मैनो लए छडाई ॥ तिसु गुर कउ साबासि है जिनि हरि सोझी पाई ॥ नानकु गुर विटहु वारिआ जिनि हरि नामु दीआ मेरे मन की आस पुराई ॥५॥

सलोक मः ३ ॥
त्रिसना दाधी जलि मुई जलि जलि करे पुकार ॥ सतिगुर सीतल जे मिलै फिरि जलै न दूजी वार ॥ नानक विणु नावै निरभउ को नही जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥१॥

मः ३ ॥
भेखी अगनि न बुझई चिंता है मन माहि ॥ वरमी मारी सापु ना मरै तिउ निगुरे करम कमाहि ॥ सतिगुरु दाता सेवीऐ सबदु वसै मनि आइ ॥ मनु तनु सीतलु सांति होइ त्रिसना अगनि बुझाइ ॥ सुखा सिरि सदा सुखु होइ जा विचहु आपु गवाइ ॥ गुरमुखि उदासी सो करे जि सचि रहै लिव लाइ ॥ चिंता मूलि न होवई हरि नामि रजा आघाइ ॥ नानक नाम बिना नह छूटीऐ हउमै पचहि पचाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
जिनी हरि हरि नामु धिआइआ तिनी पाइअड़े सरब सुखा ॥ सभु जनमु तिना का सफलु है जिन हरि के नाम की मनि लागी भुखा ॥ जिनी गुर कै बचनि आराधिआ तिन विसरि गए सभि दुखा ॥ ते संत भले गुरसिख है जिन नाही चिंत पराई चुखा ॥ धनु धंनु तिना का गुरू है जिसु अम्रित फल हरि लागे मुखा ॥६॥

सलोक मः ३ ॥
कलि महि जमु जंदारु है हुकमे कार कमाइ ॥ गुरि राखे से उबरे मनमुखा देइ सजाइ ॥ जमकालै वसि जगु बांधिआ तिस दा फरू न कोइ ॥ जिनि जमु कीता सो सेवीऐ गुरमुखि दुखु न होइ ॥ नानक गुरमुखि जमु सेवा करे जिन मनि सचा होइ ॥१॥

मः ३ ॥
एहा काइआ रोगि भरी बिनु सबदै दुखु हउमै रोगु न जाइ ॥ सतिगुरु मिलै ता निरमल होवै हरि नामो मंनि वसाइ ॥ नानक नामु धिआइआ सुखदाता दुखु विसरिआ सहजि सुभाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
जिनि जगजीवनु उपदेसिआ तिसु गुर कउ हउ सदा घुमाइआ ॥ तिसु गुर कउ हउ खंनीऐ जिनि मधुसूदनु हरि नामु सुणाइआ ॥ तिसु गुर कउ हउ वारणै जिनि हउमै बिखु सभु रोगु गवाइआ ॥ तिसु सतिगुर कउ वड पुंनु है जिनि अवगण कटि गुणी समझाइआ ॥ सो सतिगुरु तिन कउ भेटिआ जिन कै मुखि मसतकि भागु लिखि पाइआ ॥७॥

सलोकु मः ३ ॥
भगति करहि मरजीवड़े गुरमुखि भगति सदा होइ ॥ ओना कउ धुरि भगति खजाना बखसिआ मेटि न सकै कोइ ॥ गुण निधानु मनि पाइआ एको सचा सोइ ॥ नानक गुरमुखि मिलि रहे फिरि विछोड़ा कदे न होइ ॥१॥

मः ३ ॥
सतिगुर की सेव न कीनीआ किआ ओहु करे वीचारु ॥ सबदै सार न जाणई बिखु भूला गावारु ॥ अगिआनी अंधु बहु करम कमावै दूजै भाइ पिआरु ॥ अणहोदा आपु गणाइदे जमु मारि करे तिन खुआरु ॥ नानक किस नो आखीऐ जा आपे बखसणहारु ॥२॥

पउड़ी ॥
तू करता सभु किछु जाणदा सभि जीअ तुमारे ॥ जिसु तू भावै तिसु तू मेलि लैहि किआ जंत विचारे ॥ तू करण कारण समरथु है सचु सिरजणहारे ॥ जिसु तू मेलहि पिआरिआ सो तुधु मिलै गुरमुखि वीचारे ॥ हउ बलिहारी सतिगुर आपणे जिनि मेरा हरि अलखु लखारे ॥८॥

सलोक मः ३ ॥
रतना पारखु जो होवै सु रतना करे वीचारु ॥ रतना सार न जाणई अगिआनी अंधु अंधारु ॥ रतनु गुरू का सबदु है बूझै बूझणहारु ॥ मूरख आपु गणाइदे मरि जमहि होइ खुआरु ॥ नानक रतना सो लहै जिसु गुरमुखि लगै पिआरु ॥ सदा सदा नामु उचरै हरि नामो नित बिउहारु ॥ क्रिपा करे जे आपणी ता हरि रखा उर धारि ॥१॥

मः ३ ॥
सतिगुर की सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥ मत तुम जाणहु ओइ जीवदे ओइ आपि मारे करतारि ॥ हउमै वडा रोगु है भाइ दूजै करम कमाइ ॥ नानक मनमुखि जीवदिआ मुए हरि विसरिआ दुखु पाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
जिसु अंतरु हिरदा सुधु है तिसु जन कउ सभि नमसकारी ॥ जिसु अंदरि नामु निधानु है तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥ जिसु अंदरि बुधि बिबेकु है हरि नामु मुरारी ॥ सो सतिगुरु सभना का मितु है सभ तिसहि पिआरी ॥ सभु आतम रामु पसारिआ गुर बुधि बीचारी ॥९॥

सलोक मः ३ ॥
बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना विचि हउमै करम कमाहि ॥ बिनु सतिगुर सेवे ठउर न पावही मरि जमहि आवहि जाहि ॥ बिनु सतिगुर सेवे फिका बोलणा नामु न वसै मन माहि ॥ नानक बिनु सतिगुर सेवे जम पुरि बधे मारीअनि मुहि कालै उठि जाहि ॥१॥

महला १ ॥
जालउ ऐसी रीति जितु मै पिआरा वीसरै ॥ नानक साई भली परीति जितु साहिब सेती पति रहै ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि इको दाता सेवीऐ हरि इकु धिआईऐ ॥ हरि इको दाता मंगीऐ मन चिंदिआ पाईऐ ॥ जे दूजे पासहु मंगीऐ ता लाज मराईऐ ॥ जिनि सेविआ तिनि फलु पाइआ तिसु जन की सभ भुख गवाईऐ ॥ नानकु तिन विटहु वारिआ जिन अनदिनु हिरदै हरि नामु धिआईऐ ॥१०॥

सलोकु मः ३ ॥
भगत जना कंउ आपि तुठा मेरा पिआरा आपे लइअनु जन लाइ ॥ पातिसाही भगत जना कउ दितीअनु सिरि छतु सचा हरि बणाइ ॥ सदा सुखीए निरमले सतिगुर की कार कमाइ ॥ राजे ओइ न आखीअहि भिड़ि मरहि फिरि जूनी पाहि ॥ नानक विणु नावै नकीं वढीं फिरहि सोभा मूलि न पाहि ॥१॥

मः ३ ॥
सुणि सिखिऐ सादु न आइओ जिचरु गुरमुखि सबदि न लागै ॥ सतिगुरि सेविऐ नामु मनि वसै विचहु भ्रमु भउ भागै ॥ जेहा सतिगुर नो जाणै तेहो होवै ता सचि नामि लिव लागै ॥ नानक नामि मिलै वडिआई हरि दरि सोहनि आगै ॥२॥

पउड़ी ॥
गुरसिखां मनि हरि प्रीति है गुरु पूजण आवहि ॥ हरि नामु वणंजहि रंग सिउ लाहा हरि नामु लै जावहि ॥ गुरसिखा के मुख उजले हरि दरगह भावहि ॥ गुरु सतिगुरु बोहलु हरि नाम का वडभागी सिख गुण सांझ करावहि ॥ तिना गुरसिखा कंउ हउ वारिआ जो बहदिआ उठदिआ हरि नामु धिआवहि ॥११॥

सलोक मः ३ ॥
नानक नामु निधानु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥ मनमुख घरि होदी वथु न जाणनी अंधे भउकि मुए बिललाइ ॥१॥

मः ३ ॥
कंचन काइआ निरमली जो सचि नामि सचि लागी ॥ निरमल जोति निरंजनु पाइआ गुरमुखि भ्रमु भउ भागी ॥ नानक गुरमुखि सदा सुखु पावहि अनदिनु हरि बैरागी ॥२॥

पउड़ी ॥
से गुरसिख धनु धंनु है जिनी गुर उपदेसु सुणिआ हरि कंनी ॥ गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ तिनि हंउमै दुबिधा भंनी ॥ बिनु हरि नावै को मित्रु नाही वीचारि डिठा हरि जंनी ॥ जिना गुरसिखा कउ हरि संतुसटु है तिनी सतिगुर की गल मंनी ॥ जो गुरमुखि नामु धिआइदे तिनी चड़ी चवगणि वंनी ॥१२॥

सलोक मः ३ ॥
मनमुखु काइरु करूपु है बिनु नावै नकु नाहि ॥ अनदिनु धंधै विआपिआ सुपनै भी सुखु नाहि ॥ नानक गुरमुखि होवहि ता उबरहि नाहि त बधे दुख सहाहि ॥१॥

मः ३ ॥
गुरमुखि सदा दरि सोहणे गुर का सबदु कमाहि ॥ अंतरि सांति सदा सुखु दरि सचै सोभा पाहि ॥ नानक गुरमुखि हरि नामु पाइआ सहजे सचि समाहि ॥२॥

पउड़ी ॥
गुरमुखि प्रहिलादि जपि हरि गति पाई ॥ गुरमुखि जनकि हरि नामि लिव लाई ॥ गुरमुखि बसिसटि हरि उपदेसु सुणाई ॥ बिनु गुर हरि नामु न किनै पाइआ मेरे भाई ॥ गुरमुखि हरि भगति हरि आपि लहाई ॥१३॥

सलोकु मः ३ ॥
सतिगुर की परतीति न आईआ सबदि न लागो भाउ ॥ ओस नो सुखु न उपजै भावै सउ गेड़ा आवउ जाउ ॥ नानक गुरमुखि सहजि मिलै सचे सिउ लिव लाउ ॥१॥

मः ३ ॥
ए मन ऐसा सतिगुरु खोजि लहु जितु सेविऐ जनम मरण दुखु जाइ ॥ सहसा मूलि न होवई हउमै सबदि जलाइ ॥ कूड़ै की पालि विचहु निकलै सचु वसै मनि आइ ॥ अंतरि सांति मनि सुखु होइ सच संजमि कार कमाइ ॥ नानक पूरै करमि सतिगुरु मिलै हरि जीउ किरपा करे रजाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
जिस कै घरि दीबानु हरि होवै तिस की मुठी विचि जगतु सभु आइआ ॥ तिस कउ तलकी किसै दी नाही हरि दीबानि सभि आणि पैरी पाइआ ॥ माणसा किअहु दीबाणहु कोई नसि भजि निकलै हरि दीबाणहु कोई किथै जाइआ ॥ सो ऐसा हरि दीबानु वसिआ भगता कै हिरदै तिनि रहदे खुहदे आणि सभि भगता अगै खलवाइआ ॥ हरि नावै की वडिआई करमि परापति होवै गुरमुखि विरलै किनै धिआइआ ॥१४॥

सलोकु मः ३ ॥
बिनु सतिगुर सेवे जगतु मुआ बिरथा जनमु गवाइ ॥ दूजै भाइ अति दुखु लगा मरि जमै आवै जाइ ॥ विसटा अंदरि वासु है फिरि फिरि जूनी पाइ ॥ नानक बिनु नावै जमु मारसी अंति गइआ पछुताइ ॥१॥

मः ३ ॥
इसु जग महि पुरखु एकु है होर सगली नारि सबाई ॥ सभि घट भोगवै अलिपतु रहै अलखु न लखणा जाई ॥ पूरै गुरि वेखालिआ सबदे सोझी पाई ॥ पुरखै सेवहि से पुरख होवहि जिनी हउमै सबदि जलाई ॥ तिस का सरीकु को नही ना को कंटकु वैराई ॥ निहचल राजु है सदा तिसु केरा ना आवै ना जाई ॥ अनदिनु सेवकु सेवा करे हरि सचे के गुण गाई ॥ नानकु वेखि विगसिआ हरि सचे की वडिआई ॥२॥

पउड़ी ॥
जिन कै हरि नामु वसिआ सद हिरदै हरि नामो तिन कंउ रखणहारा ॥ हरि नामु पिता हरि नामो माता हरि नामु सखाई मित्रु हमारा ॥ हरि नावै नालि गला हरि नावै नालि मसलति हरि नामु हमारी करदा नित सारा ॥ हरि नामु हमारी संगति अति पिआरी हरि नामु कुलु हरि नामु परवारा ॥ जन नानक कंउ हरि नामु हरि गुरि दीआ हरि हलति पलति सदा करे निसतारा ॥१५॥

सलोकु मः ३ ॥
जिन कंउ सतिगुरु भेटिआ से हरि कीरति सदा कमाहि ॥ अचिंतु हरि नामु तिन कै मनि वसिआ सचै सबदि समाहि ॥ कुलु उधारहि आपणा मोख पदवी आपे पाहि ॥ पारब्रहमु तिन कंउ संतुसटु भइआ जो गुर चरनी जन पाहि ॥ जनु नानकु हरि का दासु है करि किरपा हरि लाज रखाहि ॥१॥

मः ३ ॥
हंउमै अंदरि खड़कु है खड़के खड़कि विहाइ ॥ हंउमै वडा रोगु है मरि जमै आवै जाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिना सतगुरु मिलिआ प्रभु आइ ॥ नानक गुर परसादी उबरे हउमै सबदि जलाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि नामु हमारा प्रभु अबिगतु अगोचरु अबिनासी पुरखु बिधाता ॥ हरि नामु हम स्रेवह हरि नामु हम पूजह हरि नामे ही मनु राता ॥ हरि नामै जेवडु कोई अवरु न सूझै हरि नामो अंति छडाता ॥ हरि नामु दीआ गुरि परउपकारी धनु धंनु गुरू का पिता माता ॥ हंउ सतिगुर अपुणे कंउ सदा नमसकारी जितु मिलिऐ हरि नामु मै जाता ॥१६॥

सलोकु मः ३ ॥
गुरमुखि सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥ सबदै सादु न आइओ मरि जनमै वारो वार ॥ मनमुखि अंधु न चेतई कितु आइआ सैसारि ॥ नानक जिन कउ नदरि करे से गुरमुखि लंघे पारि ॥१॥

मः ३ ॥
इको सतिगुरु जागता होरु जगु सूता मोहि पिआसि ॥ सतिगुरु सेवनि जागंनि से जो रते सचि नामि गुणतासि ॥ मनमुखि अंध न चेतनी जनमि मरि होहि बिनासि ॥ नानक गुरमुखि तिनी नामु धिआइआ जिन कंउ धुरि पूरबि लिखिआसि ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि नामु हमारा भोजनु छतीह परकार जितु खाइऐ हम कउ त्रिपति भई ॥ हरि नामु हमारा पैनणु जितु फिरि नंगे न होवह होर पैनण की हमारी सरध गई ॥ हरि नामु हमारा वणजु हरि नामु वापारु हरि नामै की हम कंउ सतिगुरि कारकुनी दीई ॥ हरि नामै का हम लेखा लिखिआ सभ जम की अगली काणि गई ॥ हरि का नामु गुरमुखि किनै विरलै धिआइआ जिन कंउ धुरि करमि परापति लिखतु पई ॥१७॥

सलोक मः ३ ॥
जगतु अगिआनी अंधु है दूजै भाइ करम कमाइ ॥ दूजै भाइ जेते करम करे दुखु लगै तनि धाइ ॥ गुर परसादी सुखु ऊपजै जा गुर का सबदु कमाइ ॥ सची बाणी करम करे अनदिनु नामु धिआइ ॥ नानक जितु आपे लाए तितु लगे कहणा किछू न जाइ ॥१॥

मः ३ ॥
हम घरि नामु खजाना सदा है भगति भरे भंडारा ॥ सतगुरु दाता जीअ का सद जीवै देवणहारा ॥ अनदिनु कीरतनु सदा करहि गुर कै सबदि अपारा ॥ सबदु गुरू का सद उचरहि जुगु जुगु वरतावणहारा ॥ इहु मनूआ सदा सुखि वसै सहजे करे वापारा ॥ अंतरि गुर गिआनु हरि रतनु है मुकति करावणहारा ॥ नानक जिस नो नदरि करे सो पाए सो होवै दरि सचिआरा ॥२॥

पउड़ी ॥
धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जो सतिगुर चरणी जाइ पइआ ॥ धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिनि हरि नामा मुखि रामु कहिआ ॥ धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिसु हरि नामि सुणिऐ मनि अनदु भइआ ॥ धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिनि सतिगुर सेवा करि हरि नामु लइआ ॥ तिसु गुरसिख कंउ हंउ सदा नमसकारी जो गुर कै भाणै गुरसिखु चलिआ ॥१८॥

सलोकु मः ३ ॥
मनहठि किनै न पाइओ सभ थके करम कमाइ ॥ मनहठि भेख करि भरमदे दुखु पाइआ दूजै भाइ ॥ रिधि सिधि सभु मोहु है नामु न वसै मनि आइ ॥ गुर सेवा ते मनु निरमलु होवै अगिआनु अंधेरा जाइ ॥ नामु रतनु घरि परगटु होआ नानक सहजि समाइ ॥१॥

मः ३ ॥
सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥ रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥ नानक किरति पइऐ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥२॥

पउड़ी ॥
धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम कउ सांति आई ॥ धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम हरि भगति पाई ॥ धनु धनु हरि भगतु सतिगुरू हमारा जिस की सेवा ते हम हरि नामि लिव लाई ॥ धनु धनु हरि गिआनी सतिगुरू हमारा जिनि वैरी मित्रु हम कउ सभ सम द्रिसटि दिखाई ॥ धनु धनु सतिगुरू मित्रु हमारा जिनि हरि नाम सिउ हमारी प्रीति बणाई ॥१९॥

सलोकु मः १ ॥
घर ही मुंधि विदेसि पिरु नित झूरे सम्हाले ॥ मिलदिआ ढिल न होवई जे नीअति रासि करे ॥१॥

मः १ ॥
नानक गाली कूड़ीआ बाझु परीति करेइ ॥ तिचरु जाणै भला करि जिचरु लेवै देइ ॥२॥

पउड़ी ॥
जिनि उपाए जीअ तिनि हरि राखिआ ॥ अम्रितु सचा नाउ भोजनु चाखिआ ॥ तिपति रहे आघाइ मिटी भभाखिआ ॥ सभ अंदरि इकु वरतै किनै विरलै लाखिआ ॥ जन नानक भए निहालु प्रभ की पाखिआ ॥२०॥

सलोकु मः ३ ॥
सतिगुर नो सभु को वेखदा जेता जगतु संसारु ॥ डिठै मुकति न होवई जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥ हउमै मैलु न चुकई नामि न लगै पिआरु ॥ इकि आपे बखसि मिलाइअनु दुबिधा तजि विकार ॥ नानक इकि दरसनु देखि मरि मिले सतिगुर हेति पिआरि ॥१॥

मः ३ ॥
सतिगुरू न सेविओ मूरख अंध गवारि ॥ दूजै भाइ बहुतु दुखु लागा जलता करे पुकार ॥ जिन कारणि गुरू विसारिआ से न उपकरे अंती वार ॥ नानक गुरमती सुखु पाइआ बखसे बखसणहार ॥२॥

पउड़ी ॥
तू आपे आपि आपि सभु करता कोई दूजा होइ सु अवरो कहीऐ ॥ हरि आपे बोलै आपि बुलावै हरि आपे जलि थलि रवि रहीऐ ॥ हरि आपे मारै हरि आपे छोडै मन हरि सरणी पड़ि रहीऐ ॥ हरि बिनु कोई मारि जीवालि न सकै मन होइ निचिंद निसलु होइ रहीऐ ॥ उठदिआ बहदिआ सुतिआ सदा सदा हरि नामु धिआईऐ जन नानक गुरमुखि हरि लहीऐ ॥२१॥१॥ सुधु


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