वार सूही की (महला 3), Vaar Suhi ki (Mahalla 3) Path in Hindi Gurbani online


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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
वार सूही की सलोका नालि महला ३ ॥

सलोकु मः ३ ॥
सूहै वेसि दोहागणी पर पिरु रावण जाइ ॥ पिरु छोडिआ घरि आपणै मोही दूजै भाइ ॥ मिठा करि कै खाइआ बहु सादहु वधिआ रोगु ॥ सुधु भतारु हरि छोडिआ फिरि लगा जाइ विजोगु ॥ गुरमुखि होवै सु पलटिआ हरि राती साजि सीगारि ॥ सहजि सचु पिरु राविआ हरि नामा उर धारि ॥ आगिआकारी सदा सोहागणि आपि मेली करतारि ॥ नानक पिरु पाइआ हरि साचा सदा सोहागणि नारि ॥१॥

मः ३ ॥
सूहवीए निमाणीए सो सहु सदा सम्हालि ॥ नानक जनमु सवारहि आपणा कुलु भी छुटी नालि ॥२॥

पउड़ी ॥
आपे तखतु रचाइओनु आकास पताला ॥ हुकमे धरती साजीअनु सची धरम साला ॥ आपि उपाइ खपाइदा सचे दीन दइआला ॥ सभना रिजकु स्मबाहिदा तेरा हुकमु निराला ॥ आपे आपि वरतदा आपे प्रतिपाला ॥१॥

सलोकु मः ३ ॥
सूहब ता सोहागणी जा मंनि लैहि सचु नाउ ॥ सतिगुरु अपणा मनाइ लै रूपु चड़ी ता अगला दूजा नाही थाउ ॥ ऐसा सीगारु बणाइ तू मैला कदे न होवई अहिनिसि लागै भाउ ॥ नानक सोहागणि का किआ चिहनु है अंदरि सचु मुखु उजला खसमै माहि समाइ ॥१॥

मः ३ ॥
लोका वे हउ सूहवी सूहा वेसु करी ॥ वेसी सहु न पाईऐ करि करि वेस रही ॥ नानक तिनी सहु पाइआ जिनी गुर की सिख सुणी ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ इन बिधि कंत मिली ॥२॥

पउड़ी ॥
हुकमी स्रिसटि साजीअनु बहु भिति संसारा ॥ तेरा हुकमु न जापी केतड़ा सचे अलख अपारा ॥ इकना नो तू मेलि लैहि गुर सबदि बीचारा ॥ सचि रते से निरमले हउमै तजि विकारा ॥ जिसु तू मेलहि सो तुधु मिलै सोई सचिआरा ॥२॥

सलोकु मः ३ ॥
सूहवीए सूहा सभु संसारु है जिन दुरमति दूजा भाउ ॥ खिन महि झूठु सभु बिनसि जाइ जिउ टिकै न बिरख की छाउ ॥ गुरमुखि लालो लालु है जिउ रंगि मजीठ सचड़ाउ ॥ उलटी सकति सिवै घरि आई मनि वसिआ हरि अम्रित नाउ ॥ नानक बलिहारी गुर आपणे जितु मिलिऐ हरि गुण गाउ ॥१॥

मः ३ ॥
सूहा रंगु विकारु है कंतु न पाइआ जाइ ॥ इसु लहदे बिलम न होवई रंड बैठी दूजै भाइ ॥ मुंध इआणी दुमणी सूहै वेसि लोभाइ ॥ सबदि सचै रंगु लालु करि भै भाइ सीगारु बणाइ ॥ नानक सदा सोहागणी जि चलनि सतिगुर भाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
आपे आपि उपाइअनु आपि कीमति पाई ॥ तिस दा अंतु न जापई गुर सबदि बुझाई ॥ माइआ मोहु गुबारु है दूजै भरमाई ॥ मनमुख ठउर न पाइन्ही फिरि आवै जाई ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ सभ चलै रजाई ॥३॥

सलोकु मः ३ ॥
सूहै वेसि कामणि कुलखणी जो प्रभ छोडि पर पुरख धरे पिआरु ॥ ओसु सीलु न संजमु सदा झूठु बोलै मनमुखि करम खुआरु ॥ जिसु पूरबि होवै लिखिआ तिसु सतिगुरु मिलै भतारु ॥ सूहा वेसु सभु उतारि धरे गलि पहिरै खिमा सीगारु ॥ पेईऐ साहुरै बहु सोभा पाए तिसु पूज करे सभु सैसारु ॥ ओह रलाई किसै दी ना रलै जिसु रावे सिरजनहारु ॥ नानक गुरमुखि सदा सुहागणी जिसु अविनासी पुरखु भरतारु ॥१॥

मः १ ॥
सूहा रंगु सुपनै निसी बिनु तागे गलि हारु ॥ सचा रंगु मजीठ का गुरमुखि ब्रहम बीचारु ॥ नानक प्रेम महा रसी सभि बुरिआईआ छारु ॥२॥

पउड़ी ॥
इहु जगु आपि उपाइओनु करि चोज विडानु ॥ पंच धातु विचि पाईअनु मोहु झूठु गुमानु ॥ आवै जाइ भवाईऐ मनमुखु अगिआनु ॥ इकना आपि बुझाइओनु गुरमुखि हरि गिआनु ॥ भगति खजाना बखसिओनु हरि नामु निधानु ॥४॥

सलोकु मः ३ ॥
सूहवीए सूहा वेसु छडि तू ता पिर लगी पिआरु ॥ सूहै वेसि पिरु किनै न पाइओ मनमुखि दझि मुई गावारि ॥ सतिगुरि मिलिऐ सूहा वेसु गइआ हउमै विचहु मारि ॥ मनु तनु रता लालु होआ रसना रती गुण सारि ॥ सदा सोहागणि सबदु मनि भै भाइ करे सीगारु ॥ नानक करमी महलु पाइआ पिरु राखिआ उर धारि ॥१॥

मः ३ ॥
मुंधे सूहा परहरहु लालु करहु सीगारु ॥ आवण जाणा वीसरै गुर सबदी वीचारु ॥ मुंध सुहावी सोहणी जिसु घरि सहजि भतारु ॥ नानक सा धन रावीऐ रावे रावणहारु ॥२॥

पउड़ी ॥
मोहु कूड़ु कुट्मबु है मनमुखु मुगधु रता ॥ हउमै मेरा करि मुए किछु साथि न लिता ॥ सिर उपरि जमकालु न सुझई दूजै भरमिता ॥ फिरि वेला हथि न आवई जमकालि वसि किता ॥ जेहा धुरि लिखि पाइओनु से करम कमिता ॥५॥

सलोकु मः ३ ॥
सतीआ एहि न आखीअनि जो मड़िआ लगि जलंन्हि ॥ नानक सतीआ जाणीअन्हि जि बिरहे चोट मरंन्हि ॥१॥

मः ३ ॥
भी सो सतीआ जाणीअनि सील संतोखि रहंन्हि ॥ सेवनि साई आपणा नित उठि सम्हालंन्हि ॥२॥

मः ३ ॥
कंता नालि महेलीआ सेती अगि जलाहि ॥ जे जाणहि पिरु आपणा ता तनि दुख सहाहि ॥ नानक कंत न जाणनी से किउ अगि जलाहि ॥ भावै जीवउ कै मरउ दूरहु ही भजि जाहि ॥३॥

पउड़ी ॥
तुधु दुखु सुखु नालि उपाइआ लेखु करतै लिखिआ ॥ नावै जेवड होर दाति नाही तिसु रूपु न रिखिआ ॥ नामु अखुटु निधानु है गुरमुखि मनि वसिआ ॥ करि किरपा नामु देवसी फिरि लेखु न लिखिआ ॥ सेवक भाइ से जन मिले जिन हरि जपु जपिआ ॥६॥

सलोकु मः २ ॥
जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार ॥ चलण सार न जाणनी काज सवारणहार ॥१॥

मः २ ॥
राति कारणि धनु संचीऐ भलके चलणु होइ ॥ नानक नालि न चलई फिरि पछुतावा होइ ॥२॥

मः २ ॥
बधा चटी जो भरे ना गुणु ना उपकारु ॥ सेती खुसी सवारीऐ नानक कारजु सारु ॥३॥

मः २ ॥
मनहठि तरफ न जिपई जे बहुता घाले ॥ तरफ जिणै सत भाउ दे जन नानक सबदु वीचारे ॥४॥

पउड़ी ॥
करतै कारणु जिनि कीआ सो जाणै सोई ॥ आपे स्रिसटि उपाईअनु आपे फुनि गोई ॥ जुग चारे सभ भवि थकी किनि कीमति होई ॥ सतिगुरि एकु विखालिआ मनि तनि सुखु होई ॥ गुरमुखि सदा सलाहीऐ करता करे सु होई ॥७॥

सलोक महला २ ॥
जिना भउ तिन्ह नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥ नानक एहु पटंतरा तितु दीबाणि गइआह ॥१॥

मः २ ॥
तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥ जीवते कउ जीवता मिलै मूए कउ मूआ ॥ नानक सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥२॥

पउड़ी ॥
सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥ हउमै मारि मनु निरमला हरि नामु उरि धारी ॥ कोठे मंडप माड़ीआ लगि पए गावारी ॥ जिन्हि कीए तिसहि न जाणनी मनमुखि गुबारी ॥ जिसु बुझाइहि सो बुझसी सचिआ किआ जंत विचारी ॥८॥

सलोक मः ३ ॥
कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥ मतु सेजै कंतु न आवई एवै बिरथा जाइ ॥ कामणि पिर मनु मानिआ तउ बणिआ सीगारु ॥ कीआ तउ परवाणु है जा सहु धरे पिआरु ॥ भउ सीगारु तबोल रसु भोजनु भाउ करेइ ॥ तनु मनु सउपे कंत कउ तउ नानक भोगु करेइ ॥१॥

मः ३ ॥
काजल फूल त्मबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥ सेजै कंतु न आइओ एवै भइआ विकारु ॥२॥

मः ३ ॥
धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥ एक जोति दुइ मूरती धन पिरु कहीऐ सोइ ॥३॥

पउड़ी ॥
भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥ सतिगुरि मिलिऐ भउ ऊपजै भै भाइ रंगु सवारि ॥ तनु मनु रता रंग सिउ हउमै त्रिसना मारि ॥ मनु तनु निरमलु अति सोहणा भेटिआ क्रिसन मुरारि ॥ भउ भाउ सभु तिस दा सो सचु वरतै संसारि ॥९॥

सलोक मः १ ॥
वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥ सागर लहरि समुंद सर वेलि वरस वराहु ॥ आपि खड़ोवहि आपि करि आपीणै आपाहु ॥ गुरमुखि सेवा थाइ पवै उनमनि ततु कमाहु ॥ मसकति लहहु मजूरीआ मंगि मंगि खसम दराहु ॥ नानक पुर दर वेपरवाह तउ दरि ऊणा नाहि को सचा वेपरवाहु ॥१॥

महला १ ॥
उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥ तिन जरु वैरी नानका जि बुढे थीइ मरंनि ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि सालाही सदा सदा तनु मनु सउपि सरीरु ॥ गुर सबदी सचु पाइआ सचा गहिर ग्मभीरु ॥ मनि तनि हिरदै रवि रहिआ हरि हीरा हीरु ॥ जनम मरण का दुखु गइआ फिरि पवै न फीरु ॥ नानक नामु सलाहि तू हरि गुणी गहीरु ॥१०॥

सलोक मः १ ॥
नानक इहु तनु जालि जिनि जलिऐ नामु विसारिआ ॥ पउदी जाइ परालि पिछै हथु न अ्मबड़ै तितु निवंधै तालि ॥१॥

मः १ ॥
नानक मन के कम फिटिआ गणत न आवही ॥ किती लहा सहम जा बखसे ता धका नही ॥२॥

पउड़ी ॥
सचा अमरु चलाइओनु करि सचु फुरमाणु ॥ सदा निहचलु रवि रहिआ सो पुरखु सुजाणु ॥ गुर परसादी सेवीऐ सचु सबदि नीसाणु ॥ पूरा थाटु बणाइआ रंगु गुरमति माणु ॥ अगम अगोचरु अलखु है गुरमुखि हरि जाणु ॥११॥

सलोक मः १ ॥
नानक बदरा माल का भीतरि धरिआ आणि ॥ खोटे खरे परखीअनि साहिब कै दीबाणि ॥१॥

मः १ ॥
नावण चले तीरथी मनि खोटै तनि चोर ॥ इकु भाउ लथी नातिआ दुइ भा चड़ीअसु होर ॥ बाहरि धोती तूमड़ी अंदरि विसु निकोर ॥ साध भले अणनातिआ चोर सि चोरा चोर ॥२॥

पउड़ी ॥
आपे हुकमु चलाइदा जगु धंधै लाइआ ॥ इकि आपे ही आपि लाइअनु गुर ते सुखु पाइआ ॥ दह दिस इहु मनु धावदा गुरि ठाकि रहाइआ ॥ नावै नो सभ लोचदी गुरमती पाइआ ॥ धुरि लिखिआ मेटि न सकीऐ जो हरि लिखि पाइआ ॥१२॥

सलोक मः १ ॥
दुइ दीवे चउदह हटनाले ॥ जेते जीअ तेते वणजारे ॥ खुल्हे हट होआ वापारु ॥ जो पहुचै सो चलणहारु ॥ धरमु दलालु पाए नीसाणु ॥ नानक नामु लाहा परवाणु ॥ घरि आए वजी वाधाई ॥ सच नाम की मिली वडिआई ॥१॥

मः १ ॥
राती होवनि कालीआ सुपेदा से वंन ॥ दिहु बगा तपै घणा कालिआ काले वंन ॥ अंधे अकली बाहरे मूरख अंध गिआनु ॥ नानक नदरी बाहरे कबहि न पावहि मानु ॥२॥

पउड़ी ॥
काइआ कोटु रचाइआ हरि सचै आपे ॥ इकि दूजै भाइ खुआइअनु हउमै विचि विआपे ॥ इहु मानस जनमु दुल्मभु सा मनमुख संतापे ॥ जिसु आपि बुझाए सो बुझसी जिसु सतिगुरु थापे ॥ सभु जगु खेलु रचाइओनु सभ वरतै आपे ॥१३॥

सलोक मः १ ॥
चोरा जारा रंडीआ कुटणीआ दीबाणु ॥ वेदीना की दोसती वेदीना का खाणु ॥ सिफती सार न जाणनी सदा वसै सैतानु ॥ गदहु चंदनि खउलीऐ भी साहू सिउ पाणु ॥ नानक कूड़ै कतिऐ कूड़ा तणीऐ ताणु ॥ कूड़ा कपड़ु कछीऐ कूड़ा पैनणु माणु ॥१॥

मः १ ॥
बांगा बुरगू सिंङीआ नाले मिली कलाण ॥ इकि दाते इकि मंगते नामु तेरा परवाणु ॥ नानक जिन्ही सुणि कै मंनिआ हउ तिना विटहु कुरबाणु ॥२॥

पउड़ी ॥
माइआ मोहु सभु कूड़ु है कूड़ो होइ गइआ ॥ हउमै झगड़ा पाइओनु झगड़ै जगु मुइआ ॥ गुरमुखि झगड़ु चुकाइओनु इको रवि रहिआ ॥ सभु आतम रामु पछाणिआ भउजलु तरि गइआ ॥ जोति समाणी जोति विचि हरि नामि समइआ ॥१४॥

सलोक मः १ ॥
सतिगुर भीखिआ देहि मै तूं सम्रथु दातारु ॥ हउमै गरबु निवारीऐ कामु क्रोधु अहंकारु ॥ लबु लोभु परजालीऐ नामु मिलै आधारु ॥ अहिनिसि नवतन निरमला मैला कबहूं न होइ ॥ नानक इह बिधि छुटीऐ नदरि तेरी सुखु होइ ॥१॥

मः १ ॥
इको कंतु सबाईआ जिती दरि खड़ीआह ॥ नानक कंतै रतीआ पुछहि बातड़ीआह ॥२॥

मः १ ॥
सभे कंतै रतीआ मै दोहागणि कितु ॥ मै तनि अवगण एतड़े खसमु न फेरे चितु ॥३॥

मः १ ॥
हउ बलिहारी तिन कउ सिफति जिना दै वाति ॥ सभि राती सोहागणी इक मै दोहागणि राति ॥४॥

पउड़ी ॥
दरि मंगतु जाचै दानु हरि दीजै क्रिपा करि ॥ गुरमुखि लेहु मिलाइ जनु पावै नामु हरि ॥ अनहद सबदु वजाइ जोती जोति धरि ॥ हिरदै हरि गुण गाइ जै जै सबदु हरि ॥ जग महि वरतै आपि हरि सेती प्रीति करि ॥१५॥

सलोक मः १ ॥
जिनी न पाइओ प्रेम रसु कंत न पाइओ साउ ॥ सुंञे घर का पाहुणा जिउ आइआ तिउ जाउ ॥१॥

मः १ ॥
सउ ओलाम्हे दिनै के राती मिलन्हि सहंस ॥ सिफति सलाहणु छडि कै करंगी लगा हंसु ॥ फिटु इवेहा जीविआ जितु खाइ वधाइआ पेटु ॥ नानक सचे नाम विणु सभो दुसमनु हेतु ॥२॥

पउड़ी ॥
ढाढी गुण गावै नित जनमु सवारिआ ॥ गुरमुखि सेवि सलाहि सचा उर धारिआ ॥ घरु दरु पावै महलु नामु पिआरिआ ॥ गुरमुखि पाइआ नामु हउ गुर कउ वारिआ ॥ तू आपि सवारहि आपि सिरजनहारिआ ॥१६॥

सलोक मः १ ॥
दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥ बेद पाठ मति पापा खाइ ॥ उगवै सूरु न जापै चंदु ॥ जह गिआन प्रगासु अगिआनु मिटंतु ॥ बेद पाठ संसार की कार ॥ पड़्हि पड़्हि पंडित करहि बीचार ॥ बिनु बूझे सभ होइ खुआर ॥ नानक गुरमुखि उतरसि पारि ॥१॥

मः १ ॥
सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥ रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥ नानक पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥२॥

पउड़ी ॥
जि प्रभु सालाहे आपणा सो सोभा पाए ॥ हउमै विचहु दूरि करि सचु मंनि वसाए ॥ सचु बाणी गुण उचरै सचा सुखु पाए ॥ मेलु भइआ चिरी विछुंनिआ गुर पुरखि मिलाए ॥ मनु मैला इव सुधु है हरि नामु धिआए ॥१७॥

सलोक मः १ ॥
काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥ एनी फुली रउ करे अवर कि चुणीअहि डाल ॥१॥

महला २ ॥
नानक तिना बसंतु है जिन्ह घरि वसिआ कंतु ॥ जिन के कंत दिसापुरी से अहिनिसि फिरहि जलंत ॥२॥

पउड़ी ॥
आपे बखसे दइआ करि गुर सतिगुर बचनी ॥ अनदिनु सेवी गुण रवा मनु सचै रचनी ॥ प्रभु मेरा बेअंतु है अंतु किनै न लखनी ॥ सतिगुर चरणी लगिआ हरि नामु नित जपनी ॥ जो इछै सो फलु पाइसी सभि घरै विचि जचनी ॥१८॥

सलोक मः १ ॥
पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥ जितु मउलिऐ सभ मउलीऐ तिसहि न मउलिहु कोइ ॥१॥

मः २ ॥
पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥ नानक सो सालाहीऐ जि सभसै दे आधारु ॥२॥

मः २ ॥
मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥ अंतर आतमै जो मिलै मिलिआ कहीऐ सोइ ॥३॥

पउड़ी ॥
हरि हरि नामु सलाहीऐ सचु कार कमावै ॥ दूजी कारै लगिआ फिरि जोनी पावै ॥ नामि रतिआ नामु पाईऐ नामे गुण गावै ॥ गुर कै सबदि सलाहीऐ हरि नामि समावै ॥ सतिगुर सेवा सफल है सेविऐ फल पावै ॥१९॥

सलोक मः २ ॥
किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥ किउ न मरीजै रोइ जा लगु चिति न आवही ॥१॥

मः २ ॥
जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी सम्हालिओइ ॥ नानकु कहै सिआणीए इउ कंत मिलावा होइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हउ किआ सालाही किरम जंतु वडी तेरी वडिआई ॥ तू अगम दइआलु अगमु है आपि लैहि मिलाई ॥ मै तुझ बिनु बेली को नही तू अंति सखाई ॥ जो तेरी सरणागती तिन लैहि छडाई ॥ नानक वेपरवाहु है तिसु तिलु न तमाई ॥२०॥१॥


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