सारंग की वार (महला 4), Sarang ki vaar (Mahalla 4) Path in Hindi Gurbani online


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सारंग की वार महला ४
राइ महमे हसने की धुनि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

सलोक महला २ ॥
गुरु कुंजी पाहू निवलु मनु कोठा तनु छति ॥ नानक गुर बिनु मन का ताकु न उघड़ै अवर न कुंजी हथि ॥१॥

महला १ ॥
न भीजै रागी नादी बेदि ॥ न भीजै सुरती गिआनी जोगि ॥ न भीजै सोगी कीतै रोजि ॥ न भीजै रूपीं मालीं रंगि ॥ न भीजै तीरथि भविऐ नंगि ॥ न भीजै दातीं कीतै पुंनि ॥ न भीजै बाहरि बैठिआ सुंनि ॥ न भीजै भेड़ि मरहि भिड़ि सूर ॥ न भीजै केते होवहि धूड़ ॥ लेखा लिखीऐ मन कै भाइ ॥ नानक भीजै साचै नाइ ॥२॥

महला १ ॥
नव छिअ खट का करे बीचारु ॥ निसि दिन उचरै भार अठार ॥ तिनि भी अंतु न पाइआ तोहि ॥ नाम बिहूण मुकति किउ होइ ॥ नाभि वसत ब्रहमै अंतु न जाणिआ ॥ गुरमुखि नानक नामु पछाणिआ ॥३॥

पउड़ी ॥
आपे आपि निरंजना जिनि आपु उपाइआ ॥ आपे खेलु रचाइओनु सभु जगतु सबाइआ ॥ त्रै गुण आपि सिरजिअनु माइआ मोहु वधाइआ ॥ गुर परसादी उबरे जिन भाणा भाइआ ॥ नानक सचु वरतदा सभ सचि समाइआ ॥१॥

सलोक महला २ ॥
आपि उपाए नानका आपे रखै वेक ॥ मंदा किस नो आखीऐ जां सभना साहिबु एकु ॥ सभना साहिबु एकु है वेखै धंधै लाइ ॥ किसै थोड़ा किसै अगला खाली कोई नाहि ॥ आवहि नंगे जाहि नंगे विचे करहि विथार ॥ नानक हुकमु न जाणीऐ अगै काई कार ॥१॥

महला १ ॥
जिनसि थापि जीआं कउ भेजै जिनसि थापि लै जावै ॥ आपे थापि उथापै आपे एते वेस करावै ॥ जेते जीअ फिरहि अउधूती आपे भिखिआ पावै ॥ लेखै बोलणु लेखै चलणु काइतु कीचहि दावे ॥ मूलु मति परवाणा एहो नानकु आखि सुणाए ॥ करणी उपरि होइ तपावसु जे को कहै कहाए ॥२॥

पउड़ी ॥
गुरमुखि चलतु रचाइओनु गुण परगटी आइआ ॥ गुरबाणी सद उचरै हरि मंनि वसाइआ ॥ सकति गई भ्रमु कटिआ सिव जोति जगाइआ ॥ जिन कै पोतै पुंनु है गुरु पुरखु मिलाइआ ॥ नानक सहजे मिलि रहे हरि नामि समाइआ ॥२॥

सलोक महला २ ॥
साह चले वणजारिआ लिखिआ देवै नालि ॥ लिखे उपरि हुकमु होइ लईऐ वसतु सम्हालि ॥ वसतु लई वणजारई वखरु बधा पाइ ॥ केई लाहा लै चले इकि चले मूलु गवाइ ॥ थोड़ा किनै न मंगिओ किसु कहीऐ साबासि ॥ नदरि तिना कउ नानका जि साबतु लाए रासि ॥१॥

महला १ ॥
जुड़ि जुड़ि विछुड़े विछुड़ि जुड़े ॥ जीवि जीवि मुए मुए जीवे ॥ केतिआ के बाप केतिआ के बेटे केते गुर चेले हूए ॥ आगै पाछै गणत न आवै किआ जाती किआ हुणि हूए ॥ सभु करणा किरतु करि लिखीऐ करि करि करता करे करे ॥ मनमुखि मरीऐ गुरमुखि तरीऐ नानक नदरी नदरि करे ॥२॥

पउड़ी ॥
मनमुखि दूजा भरमु है दूजै लोभाइआ ॥ कूड़ु कपटु कमावदे कूड़ो आलाइआ ॥ पुत्र कलत्रु मोहु हेतु है सभु दुखु सबाइआ ॥ जम दरि बधे मारीअहि भरमहि भरमाइआ ॥ मनमुखि जनमु गवाइआ नानक हरि भाइआ ॥३॥

सलोक महला २ ॥
जिन वडिआई तेरे नाम की ते रते मन माहि ॥ नानक अम्रितु एकु है दूजा अम्रितु नाहि ॥ नानक अम्रितु मनै माहि पाईऐ गुर परसादि ॥ तिन्ही पीता रंग सिउ जिन्ह कउ लिखिआ आदि ॥१॥

महला २ ॥
कीता किआ सालाहीऐ करे सोइ सालाहि ॥ नानक एकी बाहरा दूजा दाता नाहि ॥ करता सो सालाहीऐ जिनि कीता आकारु ॥ दाता सो सालाहीऐ जि सभसै दे आधारु ॥ नानक आपि सदीव है पूरा जिसु भंडारु ॥ वडा करि सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि का नामु निधानु है सेविऐ सुखु पाई ॥ नामु निरंजनु उचरां पति सिउ घरि जांई ॥ गुरमुखि बाणी नामु है नामु रिदै वसाई ॥ मति पंखेरू वसि होइ सतिगुरू धिआईं ॥ नानक आपि दइआलु होइ नामे लिव लाई ॥४॥

सलोक महला २ ॥
तिसु सिउ कैसा बोलणा जि आपे जाणै जाणु ॥ चीरी जा की ना फिरै साहिबु सो परवाणु ॥ चीरी जिस की चलणा मीर मलक सलार ॥ जो तिसु भावै नानका साई भली कार ॥ जिन्हा चीरी चलणा हथि तिन्हा किछु नाहि ॥ साहिब का फुरमाणु होइ उठी करलै पाहि ॥ जेहा चीरी लिखिआ तेहा हुकमु कमाहि ॥ घले आवहि नानका सदे उठी जाहि ॥१॥

महला २ ॥
सिफति जिना कउ बखसीऐ सेई पोतेदार ॥ कुंजी जिन कउ दितीआ तिन्हा मिले भंडार ॥ जह भंडारी हू गुण निकलहि ते कीअहि परवाणु ॥ नदरि तिन्हा कउ नानका नामु जिन्हा नीसाणु ॥२॥

पउड़ी ॥
नामु निरंजनु निरमला सुणिऐ सुखु होई ॥ सुणि सुणि मंनि वसाईऐ बूझै जनु कोई ॥ बहदिआ उठदिआ न विसरै साचा सचु सोई ॥ भगता कउ नाम अधारु है नामे सुखु होई ॥ नानक मनि तनि रवि रहिआ गुरमुखि हरि सोई ॥५॥

सलोक महला १ ॥
नानक तुलीअहि तोल जे जीउ पिछै पाईऐ ॥ इकसु न पुजहि बोल जे पूरे पूरा करि मिलै ॥ वडा आखणु भारा तोलु ॥ होर हउली मती हउले बोल ॥ धरती पाणी परबत भारु ॥ किउ कंडै तोलै सुनिआरु ॥ तोला मासा रतक पाइ ॥ नानक पुछिआ देइ पुजाइ ॥ मूरख अंधिआ अंधी धातु ॥ कहि कहि कहणु कहाइनि आपु ॥१॥

महला १ ॥
आखणि अउखा सुनणि अउखा आखि न जापी आखि ॥ इकि आखि आखहि सबदु भाखहि अरध उरध दिनु राति ॥ जे किहु होइ त किहु दिसै जापै रूपु न जाति ॥ सभि कारण करता करे घट अउघट घट थापि ॥ आखणि अउखा नानका आखि न जापै आखि ॥२॥

पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ मनु रहसीऐ नामे सांति आई ॥ नाइ सुणिऐ मनु त्रिपतीऐ सभ दुख गवाई ॥ नाइ सुणिऐ नाउ ऊपजै नामे वडिआई ॥ नामे ही सभ जाति पति नामे गति पाई ॥ गुरमुखि नामु धिआईऐ नानक लिव लाई ॥६॥

सलोक महला १ ॥
जूठि न रागीं जूठि न वेदीं ॥ जूठि न चंद सूरज की भेदी ॥ जूठि न अंनी जूठि न नाई ॥ जूठि न मीहु वर्हिऐ सभ थाई ॥ जूठि न धरती जूठि न पाणी ॥ जूठि न पउणै माहि समाणी ॥ नानक निगुरिआ गुणु नाही कोइ ॥ मुहि फेरिऐ मुहु जूठा होइ ॥१॥

महला १ ॥
नानक चुलीआ सुचीआ जे भरि जाणै कोइ ॥ सुरते चुली गिआन की जोगी का जतु होइ ॥ ब्रहमण चुली संतोख की गिरही का सतु दानु ॥ राजे चुली निआव की पड़िआ सचु धिआनु ॥ पाणी चितु न धोपई मुखि पीतै तिख जाइ ॥ पाणी पिता जगत का फिरि पाणी सभु खाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ सभ सिधि है रिधि पिछै आवै ॥ नाइ सुणिऐ नउ निधि मिलै मन चिंदिआ पावै ॥ नाइ सुणिऐ संतोखु होइ कवला चरन धिआवै ॥ नाइ सुणिऐ सहजु ऊपजै सहजे सुखु पावै ॥ गुरमती नाउ पाईऐ नानक गुण गावै ॥७॥

सलोक महला १ ॥
दुख विचि जमणु दुखि मरणु दुखि वरतणु संसारि ॥ दुखु दुखु अगै आखीऐ पड़्हि पड़्हि करहि पुकार ॥ दुख कीआ पंडा खुल्हीआ सुखु न निकलिओ कोइ ॥ दुख विचि जीउ जलाइआ दुखीआ चलिआ रोइ ॥ नानक सिफती रतिआ मनु तनु हरिआ होइ ॥ दुख कीआ अगी मारीअहि भी दुखु दारू होइ ॥१॥

महला १ ॥
नानक दुनीआ भसु रंगु भसू हू भसु खेह ॥ भसो भसु कमावणी भी भसु भरीऐ देह ॥ जा जीउ विचहु कढीऐ भसू भरिआ जाइ ॥ अगै लेखै मंगिऐ होर दसूणी पाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ सुचि संजमो जमु नेड़ि न आवै ॥ नाइ सुणिऐ घटि चानणा आन्हेरु गवावै ॥ नाइ सुणिऐ आपु बुझीऐ लाहा नाउ पावै ॥ नाइ सुणिऐ पाप कटीअहि निरमल सचु पावै ॥ नानक नाइ सुणिऐ मुख उजले नाउ गुरमुखि धिआवै ॥८॥

सलोक महला १ ॥
घरि नाराइणु सभा नालि ॥ पूज करे रखै नावालि ॥ कुंगू चंनणु फुल चड़ाए ॥ पैरी पै पै बहुतु मनाए ॥ माणूआ मंगि मंगि पैन्है खाइ ॥ अंधी कमी अंध सजाइ ॥ भुखिआ देइ न मरदिआ रखै ॥ अंधा झगड़ा अंधी सथै ॥१॥

महला १ ॥
सभे सुरती जोग सभि सभे बेद पुराण ॥ सभे करणे तप सभि सभे गीत गिआन ॥ सभे बुधी सुधि सभि सभि तीरथ सभि थान ॥ सभि पातिसाहीआ अमर सभि सभि खुसीआ सभि खान ॥ सभे माणस देव सभि सभे जोग धिआन ॥ सभे पुरीआ खंड सभि सभे जीअ जहान ॥ हुकमि चलाए आपणै करमी वहै कलाम ॥ नानक सचा सचि नाइ सचु सभा दीबानु ॥२॥

पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ सुखु ऊपजै नामे गति होई ॥ नाइ मंनिऐ पति पाईऐ हिरदै हरि सोई ॥ नाइ मंनिऐ भवजलु लंघीऐ फिरि बिघनु न होई ॥ नाइ मंनिऐ पंथु परगटा नामे सभ लोई ॥ नानक सतिगुरि मिलिऐ नाउ मंनीऐ जिन देवै सोई ॥९॥

सलोक मः १ ॥
पुरीआ खंडा सिरि करे इक पैरि धिआए ॥ पउणु मारि मनि जपु करे सिरु मुंडी तलै देइ ॥ किसु उपरि ओहु टिक टिकै किस नो जोरु करेइ ॥ किस नो कहीऐ नानका किस नो करता देइ ॥ हुकमि रहाए आपणै मूरखु आपु गणेइ ॥१॥

मः १ ॥
है है आखां कोटि कोटि कोटी हू कोटि कोटि ॥ आखूं आखां सदा सदा कहणि न आवै तोटि ॥ ना हउ थकां न ठाकीआ एवड रखहि जोति ॥ नानक चसिअहु चुख बिंद उपरि आखणु दोसु ॥२॥

पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ कुलु उधरै सभु कुट्मबु सबाइआ ॥ नाइ मंनिऐ संगति उधरै जिन रिदै वसाइआ ॥ नाइ मंनिऐ सुणि उधरे जिन रसन रसाइआ ॥ नाइ मंनिऐ दुख भुख गई जिन नामि चितु लाइआ ॥ नानक नामु तिनी सालाहिआ जिन गुरू मिलाइआ ॥१०॥

सलोक मः १ ॥
सभे राती सभि दिह सभि थिती सभि वार ॥ सभे रुती माह सभि सभि धरतीं सभि भार ॥ सभे पाणी पउण सभि सभि अगनी पाताल ॥ सभे पुरीआ खंड सभि सभि लोअ लोअ आकार ॥ हुकमु न जापी केतड़ा कहि न सकीजै कार ॥ आखहि थकहि आखि आखि करि सिफतीं वीचार ॥ त्रिणु न पाइओ बपुड़ी नानकु कहै गवार ॥१॥

मः १ ॥
अखीं परणै जे फिरां देखां सभु आकारु ॥ पुछा गिआनी पंडितां पुछा बेद बीचार ॥ पुछा देवां माणसां जोध करहि अवतार ॥ सिध समाधी सभि सुणी जाइ देखां दरबारु ॥ अगै सचा सचि नाइ निरभउ भै विणु सारु ॥ होर कची मती कचु पिचु अंधिआ अंधु बीचारु ॥ नानक करमी बंदगी नदरि लंघाए पारि ॥२॥

पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ दुरमति गई मति परगटी आइआ ॥ नाउ मंनिऐ हउमै गई सभि रोग गवाइआ ॥ नाइ मंनिऐ नामु ऊपजै सहजे सुखु पाइआ ॥ नाइ मंनिऐ सांति ऊपजै हरि मंनि वसाइआ ॥ नानक नामु रतंनु है गुरमुखि हरि धिआइआ ॥११॥

सलोक मः १ ॥
होरु सरीकु होवै कोई तेरा तिसु अगै तुधु आखां ॥ तुधु अगै तुधै सालाही मै अंधे नाउ सुजाखा ॥ जेता आखणु साही सबदी भाखिआ भाइ सुभाई ॥ नानक बहुता एहो आखणु सभ तेरी वडिआई ॥१॥

मः १ ॥
जां न सिआ किआ चाकरी जां जमे किआ कार ॥ सभि कारण करता करे देखै वारो वार ॥ जे चुपै जे मंगिऐ दाति करे दातारु ॥ इकु दाता सभि मंगते फिरि देखहि आकारु ॥ नानक एवै जाणीऐ जीवै देवणहारु ॥२॥

पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ सुरति ऊपजै नामे मति होई ॥ नाइ मंनिऐ गुण उचरै नामे सुखि सोई ॥ नाइ मंनिऐ भ्रमु कटीऐ फिरि दुखु न होई ॥ नाइ मंनिऐ सालाहीऐ पापां मति धोई ॥ नानक पूरे गुर ते नाउ मंनीऐ जिन देवै सोई ॥१२॥

सलोक मः १ ॥
सासत्र बेद पुराण पड़्हंता ॥ पूकारंता अजाणंता ॥ जां बूझै तां सूझै सोई ॥ नानकु आखै कूक न होई ॥१॥

मः १ ॥
जां हउ तेरा तां सभु किछु मेरा हउ नाही तू होवहि ॥ आपे सकता आपे सुरता सकती जगतु परोवहि ॥ आपे भेजे आपे सदे रचना रचि रचि वेखै ॥ नानक सचा सची नांई सचु पवै धुरि लेखै ॥२॥

पउड़ी ॥
नामु निरंजन अलखु है किउ लखिआ जाई ॥ नामु निरंजन नालि है किउ पाईऐ भाई ॥ नामु निरंजन वरतदा रविआ सभ ठांई ॥ गुर पूरे ते पाईऐ हिरदै देइ दिखाई ॥ नानक नदरी करमु होइ गुर मिलीऐ भाई ॥१३॥

सलोक मः १ ॥
कलि होई कुते मुही खाजु होआ मुरदारु ॥ कूड़ु बोलि बोलि भउकणा चूका धरमु बीचारु ॥ जिन जीवंदिआ पति नही मुइआ मंदी सोइ ॥ लिखिआ होवै नानका करता करे सु होइ ॥१॥

मः १ ॥
रंना होईआ बोधीआ पुरस होए सईआद ॥ सीलु संजमु सुच भंनी खाणा खाजु अहाजु ॥ सरमु गइआ घरि आपणै पति उठि चली नालि ॥ नानक सचा एकु है अउरु न सचा भालि ॥२॥

पउड़ी ॥
बाहरि भसम लेपन करे अंतरि गुबारी ॥ खिंथा झोली बहु भेख करे दुरमति अहंकारी ॥ साहिब सबदु न ऊचरै माइआ मोह पसारी ॥ अंतरि लालचु भरमु है भरमै गावारी ॥ नानक नामु न चेतई जूऐ बाजी हारी ॥१४॥

सलोक मः १ ॥
लख सिउ प्रीति होवै लख जीवणु किआ खुसीआ किआ चाउ ॥ विछुड़िआ विसु होइ विछोड़ा एक घड़ी महि जाइ ॥ जे सउ वर्हिआ मिठा खाजै भी फिरि कउड़ा खाइ ॥ मिठा खाधा चिति न आवै कउड़तणु धाइ जाइ ॥ मिठा कउड़ा दोवै रोग ॥ नानक अंति विगुते भोग ॥ झखि झखि झखणा झगड़ा झाख ॥ झखि झखि जाहि झखहि तिन्ह पासि ॥१॥

मः १ ॥
कापड़ु काठु रंगाइआ रांगि ॥ घर गच कीते बागे बाग ॥ साद सहज करि मनु खेलाइआ ॥ तै सह पासहु कहणु कहाइआ ॥ मिठा करि कै कउड़ा खाइआ ॥ तिनि कउड़ै तनि रोगु जमाइआ ॥ जे फिरि मिठा पेड़ै पाइ ॥ तउ कउड़तणु चूकसि माइ ॥ नानक गुरमुखि पावै सोइ ॥ जिस नो प्रापति लिखिआ होइ ॥२॥

पउड़ी ॥
जिन कै हिरदै मैलु कपटु है बाहरु धोवाइआ ॥ कूड़ु कपटु कमावदे कूड़ु परगटी आइआ ॥ अंदरि होइ सु निकलै नह छपै छपाइआ ॥ कूड़ै लालचि लगिआ फिरि जूनी पाइआ ॥ नानक जो बीजै सो खावणा करतै लिखि पाइआ ॥१५॥

सलोक मः २ ॥
कथा कहाणी बेदीं आणी पापु पुंनु बीचारु ॥ दे दे लैणा लै लै देणा नरकि सुरगि अवतार ॥ उतम मधिम जातीं जिनसी भरमि भवै संसारु ॥ अम्रित बाणी ततु वखाणी गिआन धिआन विचि आई ॥ गुरमुखि आखी गुरमुखि जाती सुरतीं करमि धिआई ॥ हुकमु साजि हुकमै विचि रखै हुकमै अंदरि वेखै ॥ नानक अगहु हउमै तुटै तां को लिखीऐ लेखै ॥१॥

मः १ ॥
बेदु पुकारे पुंनु पापु सुरग नरक का बीउ ॥ जो बीजै सो उगवै खांदा जाणै जीउ ॥ गिआनु सलाहे वडा करि सचो सचा नाउ ॥ सचु बीजै सचु उगवै दरगह पाईऐ थाउ ॥ बेदु वपारी गिआनु रासि करमी पलै होइ ॥ नानक रासी बाहरा लदि न चलिआ कोइ ॥२॥

पउड़ी ॥
निमु बिरखु बहु संचीऐ अम्रित रसु पाइआ ॥ बिसीअरु मंत्रि विसाहीऐ बहु दूधु पीआइआ ॥ मनमुखु अभिंनु न भिजई पथरु नावाइआ ॥ बिखु महि अम्रितु सिंचीऐ बिखु का फलु पाइआ ॥ नानक संगति मेलि हरि सभ बिखु लहि जाइआ ॥१६॥

सलोक मः १ ॥
मरणि न मूरतु पुछिआ पुछी थिति न वारु ॥ इकन्ही लदिआ इकि लदि चले इकन्ही बधे भार ॥ इकन्हा होई साखती इकन्हा होई सार ॥ लसकर सणै दमामिआ छुटे बंक दुआर ॥ नानक ढेरी छारु की भी फिरि होई छार ॥१॥

मः १ ॥
नानक ढेरी ढहि पई मिटी संदा कोटु ॥ भीतरि चोरु बहालिआ खोटु वे जीआ खोटु ॥२॥

पउड़ी ॥
जिन अंदरि निंदा दुसटु है नक वढे नक वढाइआ ॥ महा करूप दुखीए सदा काले मुह माइआ ॥ भलके उठि नित पर दरबु हिरहि हरि नामु चुराइआ ॥ हरि जीउ तिन की संगति मत करहु रखि लेहु हरि राइआ ॥ नानक पइऐ किरति कमावदे मनमुखि दुखु पाइआ ॥१७॥

सलोक मः ४ ॥
सभु कोई है खसम का खसमहु सभु को होइ ॥ हुकमु पछाणै खसम का ता सचु पावै कोइ ॥ गुरमुखि आपु पछाणीऐ बुरा न दीसै कोइ ॥ नानक गुरमुखि नामु धिआईऐ सहिला आइआ सोइ ॥१॥

मः ४ ॥
सभना दाता आपि है आपे मेलणहारु ॥ नानक सबदि मिले न विछुड़हि जिना सेविआ हरि दातारु ॥२॥

पउड़ी ॥
गुरमुखि हिरदै सांति है नाउ उगवि आइआ ॥ जप तप तीरथ संजम करे मेरे प्रभ भाइआ ॥ हिरदा सुधु हरि सेवदे सोहहि गुण गाइआ ॥ मेरे हरि जीउ एवै भावदा गुरमुखि तराइआ ॥ नानक गुरमुखि मेलिअनु हरि दरि सोहाइआ ॥१८॥

सलोक मः १ ॥
धनवंता इव ही कहै अवरी धन कउ जाउ ॥ नानकु निरधनु तितु दिनि जितु दिनि विसरै नाउ ॥१॥

मः १ ॥
सूरजु चड़ै विजोगि सभसै घटै आरजा ॥ तनु मनु रता भोगि कोई हारै को जिणै ॥ सभु को भरिआ फूकि आखणि कहणि न थम्हीऐ ॥ नानक वेखै आपि फूक कढाए ढहि पवै ॥२॥

पउड़ी ॥
सतसंगति नामु निधानु है जिथहु हरि पाइआ ॥ गुर परसादी घटि चानणा आन्हेरु गवाइआ ॥ लोहा पारसि भेटीऐ कंचनु होइ आइआ ॥ नानक सतिगुरि मिलिऐ नाउ पाईऐ मिलि नामु धिआइआ ॥ जिन्ह कै पोतै पुंनु है तिन्ही दरसनु पाइआ ॥१९॥

सलोक मः १ ॥
ध्रिगु तिना का जीविआ जि लिखि लिखि वेचहि नाउ ॥ खेती जिन की उजड़ै खलवाड़े किआ थाउ ॥ सचै सरमै बाहरे अगै लहहि न दादि ॥ अकलि एह न आखीऐ अकलि गवाईऐ बादि ॥ अकली साहिबु सेवीऐ अकली पाईऐ मानु ॥ अकली पड़्हि कै बुझीऐ अकली कीचै दानु ॥ नानकु आखै राहु एहु होरि गलां सैतानु ॥१॥

मः २ ॥
जैसा करै कहावै तैसा ऐसी बनी जरूरति ॥ होवहि लिंङ झिंङ नह होवहि ऐसी कहीऐ सूरति ॥ जो ओसु इछे सो फलु पाए तां नानक कहीऐ मूरति ॥२॥

पउड़ी ॥
सतिगुरु अम्रित बिरखु है अम्रित रसि फलिआ ॥ जिसु परापति सो लहै गुर सबदी मिलिआ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै हरि सेती रलिआ ॥ जमकालु जोहि न सकई घटि चानणु बलिआ ॥ नानक बखसि मिलाइअनु फिरि गरभि न गलिआ ॥२०॥

सलोक मः १ ॥
सचु वरतु संतोखु तीरथु गिआनु धिआनु इसनानु ॥ दइआ देवता खिमा जपमाली ते माणस परधान ॥ जुगति धोती सुरति चउका तिलकु करणी होइ ॥ भाउ भोजनु नानका विरला त कोई कोइ ॥१॥

महला ३ ॥
नउमी नेमु सचु जे करै ॥ काम क्रोधु त्रिसना उचरै ॥ दसमी दसे दुआर जे ठाकै एकादसी एकु करि जाणै ॥ दुआदसी पंच वसगति करि राखै तउ नानक मनु मानै ॥ ऐसा वरतु रहीजै पाडे होर बहुतु सिख किआ दीजै ॥२॥

पउड़ी ॥
भूपति राजे रंग राइ संचहि बिखु माइआ ॥ करि करि हेतु वधाइदे पर दरबु चुराइआ ॥ पुत्र कलत्र न विसहहि बहु प्रीति लगाइआ ॥ वेखदिआ ही माइआ धुहि गई पछुतहि पछुताइआ ॥ जम दरि बधे मारीअहि नानक हरि भाइआ ॥२१॥

सलोक मः १ ॥
गिआन विहूणा गावै गीत ॥ भुखे मुलां घरे मसीति ॥ मखटू होइ कै कंन पड़ाए ॥ फकरु करे होरु जाति गवाए ॥ गुरु पीरु सदाए मंगण जाइ ॥ ता कै मूलि न लगीऐ पाइ ॥ घालि खाइ किछु हथहु देइ ॥ नानक राहु पछाणहि सेइ ॥१॥

मः १ ॥
मनहु जि अंधे कूप कहिआ बिरदु न जाणन्ही ॥ मनि अंधै ऊंधै कवलि दिसन्हि खरे करूप ॥ इकि कहि जाणहि कहिआ बुझहि ते नर सुघड़ सरूप ॥ इकना नाद न बेद न गीअ रसु रस कस न जाणंति ॥ इकना सुधि न बुधि न अकलि सर अखर का भेउ न लहंति ॥ नानक से नर असलि खर जि बिनु गुण गरबु करंति ॥२॥

पउड़ी ॥
गुरमुखि सभ पवितु है धनु स्मपै माइआ ॥ हरि अरथि जो खरचदे देंदे सुखु पाइआ ॥ जो हरि नामु धिआइदे तिन तोटि न आइआ ॥ गुरमुखां नदरी आवदा माइआ सुटि पाइआ ॥ नानक भगतां होरु चिति न आवई हरि नामि समाइआ ॥२२॥

सलोक मः ४ ॥
सतिगुरु सेवनि से वडभागी ॥ सचै सबदि जिन्हा एक लिव लागी ॥ गिरह कुट्मब महि सहजि समाधी ॥ नानक नामि रते से सचे बैरागी ॥१॥

मः ४ ॥
गणतै सेव न होवई कीता थाइ न पाइ ॥ सबदै सादु न आइओ सचि न लगो भाउ ॥ सतिगुरु पिआरा न लगई मनहठि आवै जाइ ॥ जे इक विख अगाहा भरे तां दस विखां पिछाहा जाइ ॥ सतिगुर की सेवा चाकरी जे चलहि सतिगुर भाइ ॥ आपु गवाइ सतिगुरू नो मिलै सहजे रहै समाइ ॥ नानक तिन्हा नामु न वीसरै सचे मेलि मिलाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
खान मलूक कहाइदे को रहणु न पाई ॥ गड़्ह मंदर गच गीरीआ किछु साथि न जाई ॥ सोइन साखति पउण वेग ध्रिगु ध्रिगु चतुराई ॥ छतीह अम्रित परकार करहि बहु मैलु वधाई ॥ नानक जो देवै तिसहि न जाणन्ही मनमुखि दुखु पाई ॥२३॥

सलोक मः ३ ॥
पड़्हि पड़्हि पंडित मोनी थके देसंतर भवि थके भेखधारी ॥ दूजै भाइ नाउ कदे न पाइनि दुखु लागा अति भारी ॥ मूरख अंधे त्रै गुण सेवहि माइआ कै बिउहारी ॥ अंदरि कपटु उदरु भरण कै ताई पाठ पड़हि गावारी ॥ सतिगुरु सेवे सो सुखु पाए जिन हउमै विचहु मारी ॥ नानक पड़णा गुनणा इकु नाउ है बूझै को बीचारी ॥१॥

मः ३ ॥
नांगे आवणा नांगे जाणा हरि हुकमु पाइआ किआ कीजै ॥ जिस की वसतु सोई लै जाइगा रोसु किसै सिउ कीजै ॥ गुरमुखि होवै सु भाणा मंने सहजे हरि रसु पीजै ॥ नानक सुखदाता सदा सलाहिहु रसना रामु रवीजै ॥२॥

पउड़ी ॥
गड़्हि काइआ सीगार बहु भांति बणाई ॥ रंग परंग कतीफिआ पहिरहि धर माई ॥ लाल सुपेद दुलीचिआ बहु सभा बणाई ॥ दुखु खाणा दुखु भोगणा गरबै गरबाई ॥ नानक नामु न चेतिओ अंति लए छडाई ॥२४॥

सलोक मः ३ ॥
सहजे सुखि सुती सबदि समाइ ॥ आपे प्रभि मेलि लई गलि लाइ ॥ दुबिधा चूकी सहजि सुभाइ ॥ अंतरि नामु वसिआ मनि आइ ॥ से कंठि लाए जि भंनि घड़ाइ ॥ नानक जो धुरि मिले से हुणि आणि मिलाइ ॥१॥

मः ३ ॥
जिन्ही नामु विसारिआ किआ जपु जापहि होरि ॥ बिसटा अंदरि कीट से मुठे धंधै चोरि ॥ नानक नामु न वीसरै झूठे लालच होरि ॥२॥

पउड़ी ॥
नामु सलाहनि नामु मंनि असथिरु जगि सोई ॥ हिरदै हरि हरि चितवै दूजा नही कोई ॥ रोमि रोमि हरि उचरै खिनु खिनु हरि सोई ॥ गुरमुखि जनमु सकारथा निरमलु मलु खोई ॥ नानक जीवदा पुरखु धिआइआ अमरा पदु होई ॥२५॥

सलोकु मः ३ ॥
जिनी नामु विसारिआ बहु करम कमावहि होरि ॥ नानक जम पुरि बधे मारीअहि जिउ संन्ही उपरि चोर ॥१॥

मः ५ ॥
धरति सुहावड़ी आकासु सुहंदा जपंदिआ हरि नाउ ॥ नानक नाम विहूणिआ तिन्ह तन खावहि काउ ॥२॥

पउड़ी ॥
नामु सलाहनि भाउ करि निज महली वासा ॥ ओइ बाहुड़ि जोनि न आवनी फिरि होहि न बिनासा ॥ हरि सेती रंगि रवि रहे सभ सास गिरासा ॥ हरि का रंगु कदे न उतरै गुरमुखि परगासा ॥ ओइ किरपा करि कै मेलिअनु नानक हरि पासा ॥२६॥

सलोक मः ३ ॥
जिचरु इहु मनु लहरी विचि है हउमै बहुतु अहंकारु ॥ सबदै सादु न आवई नामि न लगै पिआरु ॥ सेवा थाइ न पवई तिस की खपि खपि होइ खुआरु ॥ नानक सेवकु सोई आखीऐ जो सिरु धरे उतारि ॥ सतिगुर का भाणा मंनि लए सबदु रखै उर धारि ॥१॥

मः ३ ॥
सो जपु तपु सेवा चाकरी जो खसमै भावै ॥ आपे बखसे मेलि लए आपतु गवावै ॥ मिलिआ कदे न वीछुड़ै जोती जोति मिलावै ॥ नानक गुर परसादी सो बुझसी जिसु आपि बुझावै ॥२॥

पउड़ी ॥
सभु को लेखे विचि है मनमुखु अहंकारी ॥ हरि नामु कदे न चेतई जमकालु सिरि मारी ॥ पाप बिकार मनूर सभि लदे बहु भारी ॥ मारगु बिखमु डरावणा किउ तरीऐ तारी ॥ नानक गुरि राखे से उबरे हरि नामि उधारी ॥२७॥

सलोक मः ३ ॥
विणु सतिगुर सेवे सुखु नही मरि जमहि वारो वार ॥ मोह ठगउली पाईअनु बहु दूजै भाइ विकार ॥ इकि गुर परसादी उबरे तिसु जन कउ करहि सभि नमसकार ॥ नानक अनदिनु नामु धिआइ तू अंतरि जितु पावहि मोख दुआर ॥१॥

मः ३ ॥
माइआ मोहि विसारिआ सचु मरणा हरि नामु ॥ धंधा करतिआ जनमु गइआ अंदरि दुखु सहामु ॥ नानक सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ जिन्ह पूरबि लिखिआ करामु ॥२॥

पउड़ी ॥
लेखा पड़ीऐ हरि नामु फिरि लेखु न होई ॥ पुछि न सकै कोइ हरि दरि सद ढोई ॥ जमकालु मिलै दे भेट सेवकु नित होई ॥ पूरे गुर ते महलु पाइआ पति परगटु लोई ॥ नानक अनहद धुनी दरि वजदे मिलिआ हरि सोई ॥२८॥

सलोक मः ३ ॥
गुर का कहिआ जे करे सुखी हू सुखु सारु ॥ गुर की करणी भउ कटीऐ नानक पावहि पारु ॥१॥

मः ३ ॥
सचु पुराणा ना थीऐ नामु न मैला होइ ॥ गुर कै भाणै जे चलै बहुड़ि न आवणु होइ ॥ नानक नामि विसारिऐ आवण जाणा दोइ ॥२॥

पउड़ी ॥
मंगत जनु जाचै दानु हरि देहु सुभाइ ॥ हरि दरसन की पिआस है दरसनि त्रिपताइ ॥ खिनु पलु घड़ी न जीवऊ बिनु देखे मरां माइ ॥ सतिगुरि नालि दिखालिआ रवि रहिआ सभ थाइ ॥ सुतिआ आपि उठालि देइ नानक लिव लाइ ॥२९॥

सलोक मः ३ ॥
मनमुख बोलि न जाणन्ही ओना अंदरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥ थाउ कुथाउ न जाणनी सदा चितवहि बिकार ॥ दरगह लेखा मंगीऐ ओथै होहि कूड़िआर ॥ आपे स्रिसटि उपाईअनु आपि करे बीचारु ॥ नानक किस नो आखीऐ सभु वरतै आपि सचिआरु ॥१॥

मः ३ ॥
हरि गुरमुखि तिन्ही अराधिआ जिन्ह करमि परापति होइ ॥ नानक हउ बलिहारी तिन्ह कउ जिन्ह हरि मनि वसिआ सोइ ॥२॥

पउड़ी ॥
आस करे सभु लोकु बहु जीवणु जाणिआ ॥ नित जीवण कउ चितु गड़्ह मंडप सवारिआ ॥ वलवंच करि उपाव माइआ हिरि आणिआ ॥ जमकालु निहाले सास आव घटै बेतालिआ ॥ नानक गुर सरणाई उबरे हरि गुर रखवालिआ ॥३०॥

सलोक मः ३ ॥
पड़ि पड़ि पंडित वादु वखाणदे माइआ मोह सुआइ ॥ दूजै भाइ नामु विसारिआ मन मूरख मिलै सजाइ ॥ जिन्हि कीते तिसै न सेवन्ही देदा रिजकु समाइ ॥ जम का फाहा गलहु न कटीऐ फिरि फिरि आवहि जाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ सतिगुरु मिलिआ तिन आइ ॥ अनदिनु नामु धिआइदे नानक सचि समाइ ॥१॥

मः ३ ॥
सचु वणजहि सचु सेवदे जि गुरमुखि पैरी पाहि ॥ नानक गुर कै भाणै जे चलहि सहजे सचि समाहि ॥२॥

पउड़ी ॥
आसा विचि अति दुखु घणा मनमुखि चितु लाइआ ॥ गुरमुखि भए निरास परम सुखु पाइआ ॥ विचे गिरह उदास अलिपत लिव लाइआ ॥ ओना सोगु विजोगु न विआपई हरि भाणा भाइआ ॥ नानक हरि सेती सदा रवि रहे धुरि लए मिलाइआ ॥३१॥

सलोक मः ३ ॥
पराई अमाण किउ रखीऐ दिती ही सुखु होइ ॥ गुर का सबदु गुर थै टिकै होर थै परगटु न होइ ॥ अंन्हे वसि माणकु पइआ घरि घरि वेचण जाइ ॥ ओना परख न आवई अढु न पलै पाइ ॥ जे आपि परख न आवई तां पारखीआ थावहु लइओ परखाइ ॥ जे ओसु नालि चितु लाए तां वथु लहै नउ निधि पलै पाइ ॥ घरि होदै धनि जगु भुखा मुआ बिनु सतिगुर सोझी न होइ ॥ सबदु सीतलु मनि तनि वसै तिथै सोगु विजोगु न कोइ ॥ वसतु पराई आपि गरबु करे मूरखु आपु गणाए ॥ नानक बिनु बूझे किनै न पाइओ फिरि फिरि आवै जाए ॥१॥

मः ३ ॥
मनि अनदु भइआ मिलिआ हरि प्रीतमु सरसे सजण संत पिआरे ॥ जो धुरि मिले न विछुड़हि कबहू जि आपि मेले करतारे ॥ अंतरि सबदु रविआ गुरु पाइआ सगले दूख निवारे ॥ हरि सुखदाता सदा सलाही अंतरि रखां उर धारे ॥ मनमुखु तिन की बखीली कि करे जि सचै सबदि सवारे ॥ ओना दी आपि पति रखसी मेरा पिआरा सरणागति पए गुर दुआरे ॥ नानक गुरमुखि से सुहेले भए मुख ऊजल दरबारे ॥२॥

पउड़ी ॥
इसतरी पुरखै बहु प्रीति मिलि मोहु वधाइआ ॥ पुत्रु कलत्रु नित वेखै विगसै मोहि माइआ ॥ देसि परदेसि धनु चोराइ आणि मुहि पाइआ ॥ अंति होवै वैर विरोधु को सकै न छडाइआ ॥ नानक विणु नावै ध्रिगु मोहु जितु लगि दुखु पाइआ ॥३२॥

सलोक मः ३ ॥
गुरमुखि अम्रितु नामु है जितु खाधै सभ भुख जाइ ॥ त्रिसना मूलि न होवई नामु वसै मनि आइ ॥ बिनु नावै जि होरु खाणा तितु रोगु लगै तनि धाइ ॥ नानक रस कस सबदु सलाहणा आपे लए मिलाइ ॥१॥

मः ३ ॥
जीआ अंदरि जीउ सबदु है जितु सह मेलावा होइ ॥ बिनु सबदै जगि आन्हेरु है सबदे परगटु होइ ॥ पंडित मोनी पड़ि पड़ि थके भेख थके तनु धोइ ॥ बिनु सबदै किनै न पाइओ दुखीए चले रोइ ॥ नानक नदरी पाईऐ करमि परापति होइ ॥२॥

पउड़ी ॥
इसत्री पुरखै अति नेहु बहि मंदु पकाइआ ॥ दिसदा सभु किछु चलसी मेरे प्रभ भाइआ ॥ किउ रहीऐ थिरु जगि को कढहु उपाइआ ॥ गुर पूरे की चाकरी थिरु कंधु सबाइआ ॥ नानक बखसि मिलाइअनु हरि नामि समाइआ ॥३३॥

सलोक मः ३ ॥
माइआ मोहि विसारिआ गुर का भउ हेतु अपारु ॥ लोभि लहरि सुधि मति गई सचि न लगै पिआरु ॥ गुरमुखि जिना सबदु मनि वसै दरगह मोख दुआरु ॥ नानक आपे मेलि लए आपे बखसणहारु ॥१॥

मः ४ ॥
नानक जिसु बिनु घड़ी न जीवणा विसरे सरै न बिंद ॥ तिसु सिउ किउ मन रूसीऐ जिसहि हमारी चिंद ॥२॥

मः ४ ॥
सावणु आइआ झिमझिमा हरि गुरमुखि नामु धिआइ ॥ दुख भुख काड़ा सभु चुकाइसी मीहु वुठा छहबर लाइ ॥ सभ धरति भई हरीआवली अंनु जमिआ बोहल लाइ ॥ हरि अचिंतु बुलावै क्रिपा करि हरि आपे पावै थाइ ॥ हरि तिसहि धिआवहु संत जनहु जु अंते लए छडाइ ॥ हरि कीरति भगति अनंदु है सदा सुखु वसै मनि आइ ॥ जिन्हा गुरमुखि नामु अराधिआ तिना दुख भुख लहि जाइ ॥ जन नानकु त्रिपतै गाइ गुण हरि दरसनु देहु सुभाइ ॥३॥

पउड़ी ॥
गुर पूरे की दाति नित देवै चड़ै सवाईआ ॥ तुसि देवै आपि दइआलु न छपै छपाईआ ॥ हिरदै कवलु प्रगासु उनमनि लिव लाईआ ॥ जे को करे उस दी रीस सिरि छाई पाईआ ॥ नानक अपड़ि कोइ न सकई पूरे सतिगुर की वडिआईआ ॥३४॥

सलोक मः ३ ॥
अमरु वेपरवाहु है तिसु नालि सिआणप न चलई न हुजति करणी जाइ ॥ आपु छोडि सरणाइ पवै मंनि लए रजाइ ॥ गुरमुखि जम डंडु न लगई हउमै विचहु जाइ ॥ नानक सेवकु सोई आखीऐ जि सचि रहै लिव लाइ ॥१॥

मः ३ ॥
दाति जोति सभ सूरति तेरी ॥ बहुतु सिआणप हउमै मेरी ॥ बहु करम कमावहि लोभि मोहि विआपे हउमै कदे न चूकै फेरी ॥ नानक आपि कराए करता जो तिसु भावै साई गल चंगेरी ॥२॥

पउड़ी मः ५ ॥
सचु खाणा सचु पैनणा सचु नामु अधारु ॥ गुरि पूरै मेलाइआ प्रभु देवणहारु ॥ भागु पूरा तिन जागिआ जपिआ निरंकारु ॥ साधू संगति लगिआ तरिआ संसारु ॥ नानक सिफति सलाह करि प्रभ का जैकारु ॥३५॥

सलोक मः ५ ॥
सभे जीअ समालि अपणी मिहर करु ॥ अंनु पाणी मुचु उपाइ दुख दालदु भंनि तरु ॥ अरदासि सुणी दातारि होई सिसटि ठरु ॥ लेवहु कंठि लगाइ अपदा सभ हरु ॥ नानक नामु धिआइ प्रभ का सफलु घरु ॥१॥

मः ५ ॥
वुठे मेघ सुहावणे हुकमु कीता करतारि ॥ रिजकु उपाइओनु अगला ठांढि पई संसारि ॥ तनु मनु हरिआ होइआ सिमरत अगम अपार ॥ करि किरपा प्रभ आपणी सचे सिरजणहार ॥ कीता लोड़हि सो करहि नानक सद बलिहार ॥२॥

पउड़ी ॥
वडा आपि अगमु है वडी वडिआई ॥ गुर सबदी वेखि विगसिआ अंतरि सांति आई ॥ सभु आपे आपि वरतदा आपे है भाई ॥ आपि नाथु सभ नथीअनु सभ हुकमि चलाई ॥ नानक हरि भावै सो करे सभ चलै रजाई ॥३६॥१॥ सुधु ॥


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