रामकली की वार (महला 5), Ramkali ki vaar (Mahalla 5) Path in Hindi Gurbani online


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रामकली की वार महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

सलोक मः ५ ॥
जैसा सतिगुरु सुणीदा तैसो ही मै डीठु ॥ विछुड़िआ मेले प्रभू हरि दरगह का बसीठु ॥ हरि नामो मंत्रु द्रिड़ाइदा कटे हउमै रोगु ॥ नानक सतिगुरु तिना मिलाइआ जिना धुरे पइआ संजोगु ॥१॥

मः ५ ॥
इकु सजणु सभि सजणा इकु वैरी सभि वादि ॥ गुरि पूरै देखालिआ विणु नावै सभ बादि ॥ साकत दुरजन भरमिआ जो लगे दूजै सादि ॥ जन नानकि हरि प्रभु बुझिआ गुर सतिगुर कै परसादि ॥२॥

पउड़ी ॥
थटणहारै थाटु आपे ही थटिआ ॥ आपे पूरा साहु आपे ही खटिआ ॥ आपे करि पासारु आपे रंग रटिआ ॥ कुदरति कीम न पाइ अलख ब्रहमटिआ ॥ अगम अथाह बेअंत परै परटिआ ॥ आपे वड पातिसाहु आपि वजीरटिआ ॥ कोइ न जाणै कीम केवडु मटिआ ॥ सचा साहिबु आपि गुरमुखि परगटिआ ॥१॥

सलोकु मः ५ ॥
सुणि सजण प्रीतम मेरिआ मै सतिगुरु देहु दिखालि ॥ हउ तिसु देवा मनु आपणा नित हिरदै रखा समालि ॥ इकसु सतिगुर बाहरा ध्रिगु जीवणु संसारि ॥ जन नानक सतिगुरु तिना मिलाइओनु जिन सद ही वरतै नालि ॥१॥

मः ५ ॥
मेरै अंतरि लोचा मिलण की किउ पावा प्रभ तोहि ॥ कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु जो मेले प्रीतमु मोहि ॥ गुरि पूरै मेलाइआ जत देखा तत सोइ ॥ जन नानक सो प्रभु सेविआ तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥२॥

पउड़ी ॥
देवणहारु दातारु कितु मुखि सालाहीऐ ॥ जिसु रखै किरपा धारि रिजकु समाहीऐ ॥ कोइ न किस ही वसि सभना इक धर ॥ पाले बालक वागि दे कै आपि कर ॥ करदा अनद बिनोद किछू न जाणीऐ ॥ सरब धार समरथ हउ तिसु कुरबाणीऐ ॥ गाईऐ राति दिनंतु गावण जोगिआ ॥ जो गुर की पैरी पाहि तिनी हरि रसु भोगिआ ॥२॥

सलोक मः ५ ॥
भीड़हु मोकलाई कीतीअनु सभ रखे कुट्मबै नालि ॥ कारज आपि सवारिअनु सो प्रभ सदा सभालि ॥ प्रभु मात पिता कंठि लाइदा लहुड़े बालक पालि ॥ दइआल होए सभ जीअ जंत्र हरि नानक नदरि निहाल ॥१॥

मः ५ ॥
विणु तुधु होरु जि मंगणा सिरि दुखा कै दुख ॥ देहि नामु संतोखीआ उतरै मन की भुख ॥ गुरि वणु तिणु हरिआ कीतिआ नानक किआ मनुख ॥२॥

पउड़ी ॥
सो ऐसा दातारु मनहु न वीसरै ॥ घड़ी न मुहतु चसा तिसु बिनु ना सरै ॥ अंतरि बाहरि संगि किआ को लुकि करै ॥ जिसु पति रखै आपि सो भवजलु तरै ॥ भगतु गिआनी तपा जिसु किरपा करै ॥ सो पूरा परधानु जिस नो बलु धरै ॥ जिसहि जराए आपि सोई अजरु जरै ॥ तिस ही मिलिआ सचु मंत्रु गुर मनि धरै ॥३॥

सलोकु मः ५ ॥
धंनु सु राग सुरंगड़े आलापत सभ तिख जाइ ॥ धंनु सु जंत सुहावड़े जो गुरमुखि जपदे नाउ ॥ जिनी इक मनि इकु अराधिआ तिन सद बलिहारै जाउ ॥ तिन की धूड़ि हम बाछदे करमी पलै पाइ ॥ जो रते रंगि गोविद कै हउ तिन बलिहारै जाउ ॥ आखा बिरथा जीअ की हरि सजणु मेलहु राइ ॥ गुरि पूरै मेलाइआ जनम मरण दुखु जाइ ॥ जन नानक पाइआ अगम रूपु अनत न काहू जाइ ॥१॥

मः ५ ॥
धंनु सु वेला घड़ी धंनु धनु मूरतु पलु सारु ॥ धंनु सु दिनसु संजोगड़ा जितु डिठा गुर दरसारु ॥ मन कीआ इछा पूरीआ हरि पाइआ अगम अपारु ॥ हउमै तुटा मोहड़ा इकु सचु नामु आधारु ॥ जनु नानकु लगा सेव हरि उधरिआ सगल संसारु ॥२॥

पउड़ी ॥
सिफति सलाहणु भगति विरले दितीअनु ॥ सउपे जिसु भंडार फिरि पुछ न लीतीअनु ॥ जिस नो लगा रंगु से रंगि रतिआ ॥ ओना इको नामु अधारु इका उन भतिआ ॥ ओना पिछै जगु भुंचै भोगई ॥ ओना पिआरा रबु ओनाहा जोगई ॥ जिसु मिलिआ गुरु आइ तिनि प्रभु जाणिआ ॥ हउ बलिहारी तिन जि खसमै भाणिआ ॥४॥

सलोक मः ५ ॥
हरि इकसै नालि मै दोसती हरि इकसै नालि मै रंगु ॥ हरि इको मेरा सजणो हरि इकसै नालि मै संगु ॥ हरि इकसै नालि मै गोसटे मुहु मैला करै न भंगु ॥ जाणै बिरथा जीअ की कदे न मोड़ै रंगु ॥ हरि इको मेरा मसलती भंनण घड़न समरथु ॥ हरि इको मेरा दातारु है सिरि दातिआ जग हथु ॥ हरि इकसै दी मै टेक है जो सिरि सभना समरथु ॥ सतिगुरि संतु मिलाइआ मसतकि धरि कै हथु ॥ वडा साहिबु गुरू मिलाइआ जिनि तारिआ सगल जगतु ॥ मन कीआ इछा पूरीआ पाइआ धुरि संजोग ॥ नानक पाइआ सचु नामु सद ही भोगे भोग ॥१॥

मः ५ ॥
मनमुखा केरी दोसती माइआ का सनबंधु ॥ वेखदिआ ही भजि जानि कदे न पाइनि बंधु ॥ जिचरु पैननि खावन्हे तिचरु रखनि गंढु ॥ जितु दिनि किछु न होवई तितु दिनि बोलनि गंधु ॥ जीअ की सार न जाणनी मनमुख अगिआनी अंधु ॥ कूड़ा गंढु न चलई चिकड़ि पथर बंधु ॥ अंधे आपु न जाणनी फकड़ु पिटनि धंधु ॥ झूठै मोहि लपटाइआ हउ हउ करत बिहंधु ॥ क्रिपा करे जिसु आपणी धुरि पूरा करमु करेइ ॥ जन नानक से जन उबरे जो सतिगुर सरणि परे ॥२॥

पउड़ी ॥
जो रते दीदार सेई सचु हाकु ॥ जिनी जाता खसमु किउ लभै तिना खाकु ॥ मनु मैला वेकारु होवै संगि पाकु ॥ दिसै सचा महलु खुलै भरम ताकु ॥ जिसहि दिखाले महलु तिसु न मिलै धाकु ॥ मनु तनु होइ निहालु बिंदक नदरि झाकु ॥ नउ निधि नामु निधानु गुर कै सबदि लागु ॥ तिसै मिलै संत खाकु मसतकि जिसै भागु ॥५॥

सलोक मः ५ ॥
हरणाखी कू सचु वैणु सुणाई जो तउ करे उधारणु ॥ सुंदर बचन तुम सुणहु छबीली पिरु तैडा मन साधारणु ॥ दुरजन सेती नेहु रचाइओ दसि विखा मै कारणु ॥ ऊणी नाही झूणी नाही नाही किसै विहूणी ॥ पिरु छैलु छबीला छडि गवाइओ दुरमति करमि विहूणी ॥ ना हउ भुली ना हउ चुकी ना मै नाही दोसा ॥ जितु हउ लाई तितु हउ लगी तू सुणि सचु संदेसा ॥ साई सोहागणि साई भागणि जै पिरि किरपा धारी ॥ पिरि अउगण तिस के सभि गवाए गल सेती लाइ सवारी ॥ करमहीण धन करै बिनंती कदि नानक आवै वारी ॥ सभि सुहागणि माणहि रलीआ इक देवहु राति मुरारी ॥१॥

मः ५ ॥
काहे मन तू डोलता हरि मनसा पूरणहारु ॥ सतिगुरु पुरखु धिआइ तू सभि दुख विसारणहारु ॥ हरि नामा आराधि मन सभि किलविख जाहि विकार ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन रंगु लगा निरंकार ॥ ओनी छडिआ माइआ सुआवड़ा धनु संचिआ नामु अपारु ॥ अठे पहर इकतै लिवै मंनेनि हुकमु अपारु ॥ जनु नानकु मंगै दानु इकु देहु दरसु मनि पिआरु ॥२॥

पउड़ी ॥
जिसु तू आवहि चिति तिस नो सदा सुख ॥ जिसु तू आवहि चिति तिसु जम नाहि दुख ॥ जिसु तू आवहि चिति तिसु कि काड़िआ ॥ जिस दा करता मित्रु सभि काज सवारिआ ॥ जिसु तू आवहि चिति सो परवाणु जनु ॥ जिसु तू आवहि चिति बहुता तिसु धनु ॥ जिसु तू आवहि चिति सो वड परवारिआ ॥ जिसु तू आवहि चिति तिनि कुल उधारिआ ॥६॥

सलोक मः ५ ॥
अंदरहु अंना बाहरहु अंना कूड़ी कूड़ी गावै ॥ देही धोवै चक्र बणाए माइआ नो बहु धावै ॥ अंदरि मैलु न उतरै हउमै फिरि फिरि आवै जावै ॥ नींद विआपिआ कामि संतापिआ मुखहु हरि हरि कहावै ॥ बैसनो नामु करम हउ जुगता तुह कुटे किआ फलु पावै ॥ हंसा विचि बैठा बगु न बणई नित बैठा मछी नो तार लावै ॥ जा हंस सभा वीचारु करि देखनि ता बगा नालि जोड़ु कदे न आवै ॥ हंसा हीरा मोती चुगणा बगु डडा भालण जावै ॥ उडरिआ वेचारा बगुला मतु होवै मंञु लखावै ॥ जितु को लाइआ तित ही लागा किसु दोसु दिचै जा हरि एवै भावै ॥ सतिगुरु सरवरु रतनी भरपूरे जिसु प्रापति सो पावै ॥ सिख हंस सरवरि इकठे होए सतिगुर कै हुकमावै ॥ रतन पदारथ माणक सरवरि भरपूरे खाइ खरचि रहे तोटि न आवै ॥ सरवर हंसु दूरि न होई करते एवै भावै ॥ जन नानक जिस दै मसतकि भागु धुरि लिखिआ सो सिखु गुरू पहि आवै ॥ आपि तरिआ कुट्मब सभि तारे सभा स्रिसटि छडावै ॥१॥

मः ५ ॥
पंडितु आखाए बहुती राही कोरड़ मोठ जिनेहा ॥ अंदरि मोहु नित भरमि विआपिआ तिसटसि नाही देहा ॥ कूड़ी आवै कूड़ी जावै माइआ की नित जोहा ॥ सचु कहै ता छोहो आवै अंतरि बहुता रोहा ॥ विआपिआ दुरमति कुबुधि कुमूड़ा मनि लागा तिसु मोहा ॥ ठगै सेती ठगु रलि आइआ साथु भि इको जेहा ॥ सतिगुरु सराफु नदरी विचदो कढै तां उघड़ि आइआ लोहा ॥ बहुतेरी थाई रलाइ रलाइ दिता उघड़िआ पड़दा अगै आइ खलोहा ॥ सतिगुर की जे सरणी आवै फिरि मनूरहु कंचनु होहा ॥ सतिगुरु निरवैरु पुत्र सत्र समाने अउगण कटे करे सुधु देहा ॥ नानक जिसु धुरि मसतकि होवै लिखिआ तिसु सतिगुर नालि सनेहा ॥ अम्रित बाणी सतिगुर पूरे की जिसु किरपालु होवै तिसु रिदै वसेहा ॥ आवण जाणा तिस का कटीऐ सदा सदा सुखु होहा ॥२॥

पउड़ी ॥
जो तुधु भाणा जंतु सो तुधु बुझई ॥ जो तुधु भाणा जंतु सु दरगह सिझई ॥ जिस नो तेरी नदरि हउमै तिसु गई ॥ जिस नो तू संतुसटु कलमल तिसु खई ॥ जिस कै सुआमी वलि निरभउ सो भई ॥ जिस नो तू किरपालु सचा सो थिअई ॥ जिस नो तेरी मइआ न पोहै अगनई ॥ तिस नो सदा दइआलु जिनि गुर ते मति लई ॥७॥

सलोक मः ५ ॥
करि किरपा किरपाल आपे बखसि लै ॥ सदा सदा जपी तेरा नामु सतिगुर पाइ पै ॥ मन तन अंतरि वसु दूखा नासु होइ ॥ हथ देइ आपि रखु विआपै भउ न कोइ ॥ गुण गावा दिनु रैणि एतै कमि लाइ ॥ संत जना कै संगि हउमै रोगु जाइ ॥ सरब निरंतरि खसमु एको रवि रहिआ ॥ गुर परसादी सचु सचो सचु लहिआ ॥ दइआ करहु दइआल अपणी सिफति देहु ॥ दरसनु देखि निहाल नानक प्रीति एह ॥१॥

मः ५ ॥
एको जपीऐ मनै माहि इकस की सरणाइ ॥ इकसु सिउ करि पिरहड़ी दूजी नाही जाइ ॥ इको दाता मंगीऐ सभु किछु पलै पाइ ॥ मनि तनि सासि गिरासि प्रभु इको इकु धिआइ ॥ अम्रितु नामु निधानु सचु गुरमुखि पाइआ जाइ ॥ वडभागी ते संत जन जिन मनि वुठा आइ ॥ जलि थलि महीअलि रवि रहिआ दूजा कोई नाहि ॥ नामु धिआई नामु उचरा नानक खसम रजाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
जिस नो तू रखवाला मारे तिसु कउणु ॥ जिस नो तू रखवाला जिता तिनै भैणु ॥ जिस नो तेरा अंगु तिसु मुखु उजला ॥ जिस नो तेरा अंगु सु निरमली हूं निरमला ॥ जिस नो तेरी नदरि न लेखा पुछीऐ ॥ जिस नो तेरी खुसी तिनि नउ निधि भुंचीऐ ॥ जिस नो तू प्रभ वलि तिसु किआ मुहछंदगी ॥ जिस नो तेरी मिहर सु तेरी बंदिगी ॥८॥

सलोक महला ५ ॥
होहु क्रिपाल सुआमी मेरे संतां संगि विहावे ॥ तुधहु भुले सि जमि जमि मरदे तिन कदे न चुकनि हावे ॥१॥

मः ५ ॥
सतिगुरु सिमरहु आपणा घटि अवघटि घट घाट ॥ हरि हरि नामु जपंतिआ कोइ न बंधै वाट ॥२॥

पउड़ी ॥
तिथै तू समरथु जिथै कोइ नाहि ॥ ओथै तेरी रख अगनी उदर माहि ॥ सुणि कै जम के दूत नाइ तेरै छडि जाहि ॥ भउजलु बिखमु असगाहु गुर सबदी पारि पाहि ॥ जिन कउ लगी पिआस अम्रितु सेइ खाहि ॥ कलि महि एहो पुंनु गुण गोविंद गाहि ॥ सभसै नो किरपालु सम्हाले साहि साहि ॥ बिरथा कोइ न जाइ जि आवै तुधु आहि ॥९॥

सलोक मः ५ ॥
दूजा तिसु न बुझाइहु पारब्रहम नामु देहु आधारु ॥ अगमु अगोचरु साहिबो समरथु सचु दातारु ॥ तू निहचलु निरवैरु सचु सचा तुधु दरबारु ॥ कीमति कहणु न जाईऐ अंतु न पारावारु ॥ प्रभु छोडि होरु जि मंगणा सभु बिखिआ रस छारु ॥ से सुखीए सचु साह से जिन सचा बिउहारु ॥ जिना लगी प्रीति प्रभ नाम सहज सुख सारु ॥ नानक इकु आराधे संतन रेणारु ॥१॥

मः ५ ॥
अनद सूख बिस्राम नित हरि का कीरतनु गाइ ॥ अवर सिआणप छाडि देहि नानक उधरसि नाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
ना तू आवहि वसि बहुतु घिणावणे ॥ ना तू आवहि वसि बेद पड़ावणे ॥ ना तू आवहि वसि तीरथि नाईऐ ॥ ना तू आवहि वसि धरती धाईऐ ॥ ना तू आवहि वसि कितै सिआणपै ॥ ना तू आवहि वसि बहुता दानु दे ॥ सभु को तेरै वसि अगम अगोचरा ॥ तू भगता कै वसि भगता ताणु तेरा ॥१०॥

सलोक मः ५ ॥
आपे वैदु आपि नाराइणु ॥ एहि वैद जीअ का दुखु लाइण ॥ गुर का सबदु अम्रित रसु खाइण ॥ नानक जिसु मनि वसै तिस के सभि दूख मिटाइण ॥१॥

मः ५ ॥
हुकमि उछलै हुकमे रहै ॥ हुकमे दुखु सुखु सम करि सहै ॥ हुकमे नामु जपै दिनु राति ॥ नानक जिस नो होवै दाति ॥ हुकमि मरै हुकमे ही जीवै ॥ हुकमे नान्हा वडा थीवै ॥ हुकमे सोग हरख आनंद ॥ हुकमे जपै निरोधर गुरमंत ॥ हुकमे आवणु जाणु रहाए ॥ नानक जा कउ भगती लाए ॥२॥

पउड़ी ॥
हउ तिसु ढाढी कुरबाणु जि तेरा सेवदारु ॥ हउ तिसु ढाढी बलिहार जि गावै गुण अपार ॥ सो ढाढी धनु धंनु जिसु लोड़े निरंकारु ॥ सो ढाढी भागठु जिसु सचा दुआर बारु ॥ ओहु ढाढी तुधु धिआइ कलाणे दिनु रैणार ॥ मंगै अम्रित नामु न आवै कदे हारि ॥ कपड़ु भोजनु सचु रहदा लिवै धार ॥ सो ढाढी गुणवंतु जिस नो प्रभ पिआरु ॥११॥

सलोक मः ५ ॥
अम्रित बाणी अमिउ रसु अम्रितु हरि का नाउ ॥ मनि तनि हिरदै सिमरि हरि आठ पहर गुण गाउ ॥ उपदेसु सुणहु तुम गुरसिखहु सचा इहै सुआउ ॥ जनमु पदारथु सफलु होइ मन महि लाइहु भाउ ॥ सूख सहज आनदु घणा प्रभ जपतिआ दुखु जाइ ॥ नानक नामु जपत सुखु ऊपजै दरगह पाईऐ थाउ ॥१॥

मः ५ ॥
नानक नामु धिआईऐ गुरु पूरा मति देइ ॥ भाणै जप तप संजमो भाणै ही कढि लेइ ॥ भाणै जोनि भवाईऐ भाणै बखस करेइ ॥ भाणै दुखु सुखु भोगीऐ भाणै करम करेइ ॥ भाणै मिटी साजि कै भाणै जोति धरेइ ॥ भाणै भोग भोगाइदा भाणै मनहि करेइ ॥ भाणै नरकि सुरगि अउतारे भाणै धरणि परेइ ॥ भाणै ही जिसु भगती लाए नानक विरले हे ॥२॥

पउड़ी ॥
वडिआई सचे नाम की हउ जीवा सुणि सुणे ॥ पसू परेत अगिआन उधारे इक खणे ॥ दिनसु रैणि तेरा नाउ सदा सद जापीऐ ॥ त्रिसना भुख विकराल नाइ तेरै ध्रापीऐ ॥ रोगु सोगु दुखु वंञै जिसु नाउ मनि वसै ॥ तिसहि परापति लालु जो गुर सबदी रसै ॥ खंड ब्रहमंड बेअंत उधारणहारिआ ॥ तेरी सोभा तुधु सचे मेरे पिआरिआ ॥१२॥

सलोक मः ५ ॥
मित्रु पिआरा नानक जी मै छडि गवाइआ रंगि कसु्मभै भुली ॥ तउ सजण की मै कीम न पउदी हउ तुधु बिनु अढु न लहदी ॥१॥

मः ५ ॥
ससु विराइणि नानक जीउ ससुरा वादी जेठो पउ पउ लूहै ॥ हभे भसु पुणेदे वतनु जा मै सजणु तूहै ॥२॥

पउड़ी ॥
जिसु तू वुठा चिति तिसु दरदु निवारणो ॥ जिसु तू वुठा चिति तिसु कदे न हारणो ॥ जिसु मिलिआ पूरा गुरू सु सरपर तारणो ॥ जिस नो लाए सचि तिसु सचु सम्हालणो ॥ जिसु आइआ हथि निधानु सु रहिआ भालणो ॥ जिस नो इको रंगु भगतु सो जानणो ॥ ओहु सभना की रेणु बिरही चारणो ॥ सभि तेरे चोज विडाण सभु तेरा कारणो ॥१३॥

सलोक मः ५ ॥
उसतति निंदा नानक जी मै हभ वञाई छोड़िआ हभु किझु तिआगी ॥ हभे साक कूड़ावे डिठे तउ पलै तैडै लागी ॥१॥

मः ५ ॥
फिरदी फिरदी नानक जीउ हउ फावी थीई बहुतु दिसावर पंधा ॥ ता हउ सुखि सुखाली सुती जा गुर मिलि सजणु मै लधा ॥२॥

पउड़ी ॥
सभे दुख संताप जां तुधहु भुलीऐ ॥ जे कीचनि लख उपाव तां कही न घुलीऐ ॥ जिस नो विसरै नाउ सु निरधनु कांढीऐ ॥ जिस नो विसरै नाउ सु जोनी हांढीऐ ॥ जिसु खसमु न आवै चिति तिसु जमु डंडु दे ॥ जिसु खसमु न आवी चिति रोगी से गणे ॥ जिसु खसमु न आवी चिति सु खरो अहंकारीआ ॥ सोई दुहेला जगि जिनि नाउ विसारीआ ॥१४॥

सलोक मः ५ ॥
तैडी बंदसि मै कोइ न डिठा तू नानक मनि भाणा ॥ घोलि घुमाई तिसु मित्र विचोले जै मिलि कंतु पछाणा ॥१॥

मः ५ ॥
पाव सुहावे जां तउ धिरि जुलदे सीसु सुहावा चरणी ॥ मुखु सुहावा जां तउ जसु गावै जीउ पइआ तउ सरणी ॥२॥

पउड़ी ॥
मिलि नारी सतसंगि मंगलु गावीआ ॥ घर का होआ बंधानु बहुड़ि न धावीआ ॥ बिनठी दुरमति दुरतु सोइ कूड़ावीआ ॥ सीलवंति परधानि रिदै सचावीआ ॥ अंतरि बाहरि इकु इक रीतावीआ ॥ मनि दरसन की पिआस चरण दासावीआ ॥ सोभा बणी सीगारु खसमि जां रावीआ ॥ मिलीआ आइ संजोगि जां तिसु भावीआ ॥१५॥

सलोक मः ५ ॥
हभि गुण तैडे नानक जीउ मै कू थीए मै निरगुण ते किआ होवै ॥ तउ जेवडु दातारु न कोई जाचकु सदा जाचोवै ॥१॥

मः ५ ॥
देह छिजंदड़ी ऊण मझूणा गुरि सजणि जीउ धराइआ ॥ हभे सुख सुहेलड़ा सुता जिता जगु सबाइआ ॥२॥

पउड़ी ॥
वडा तेरा दरबारु सचा तुधु तखतु ॥ सिरि साहा पातिसाहु निहचलु चउरु छतु ॥ जो भावै पारब्रहम सोई सचु निआउ ॥ जे भावै पारब्रहम निथावे मिलै थाउ ॥ जो कीन्ही करतारि साई भली गल ॥ जिन्ही पछाता खसमु से दरगाह मल ॥ सही तेरा फुरमानु किनै न फेरीऐ ॥ कारण करण करीम कुदरति तेरीऐ ॥१६॥

सलोक मः ५ ॥
सोइ सुणंदड़ी मेरा तनु मनु मउला नामु जपंदड़ी लाली ॥ पंधि जुलंदड़ी मेरा अंदरु ठंढा गुर दरसनु देखि निहाली ॥१॥

मः ५ ॥
हठ मंझाहू मै माणकु लधा ॥ मुलि न घिधा मै कू सतिगुरि दिता ॥ ढूंढ वञाई थीआ थिता ॥ जनमु पदारथु नानक जिता ॥२॥

पउड़ी ॥
जिस कै मसतकि करमु होइ सो सेवा लागा ॥ जिसु गुर मिलि कमलु प्रगासिआ सो अनदिनु जागा ॥ लगा रंगु चरणारबिंद सभु भ्रमु भउ भागा ॥ आतमु जिता गुरमती आगंजत पागा ॥ जिसहि धिआइआ पारब्रहमु सो कलि महि तागा ॥ साधू संगति निरमला अठसठि मजनागा ॥ जिसु प्रभु मिलिआ आपणा सो पुरखु सभागा ॥ नानक तिसु बलिहारणै जिसु एवड भागा ॥१७॥

सलोक मः ५ ॥
जां पिरु अंदरि तां धन बाहरि ॥ जां पिरु बाहरि तां धन माहरि ॥ बिनु नावै बहु फेर फिराहरि ॥ सतिगुरि संगि दिखाइआ जाहरि ॥ जन नानक सचे सचि समाहरि ॥१॥

मः ५ ॥
आहर सभि करदा फिरै आहरु इकु न होइ ॥ नानक जितु आहरि जगु उधरै विरला बूझै कोइ ॥२॥

पउड़ी ॥
वडी हू वडा अपारु तेरा मरतबा ॥ रंग परंग अनेक न जापन्हि करतबा ॥ जीआ अंदरि जीउ सभु किछु जाणला ॥ सभु किछु तेरै वसि तेरा घरु भला ॥ तेरै घरि आनंदु वधाई तुधु घरि ॥ माणु महता तेजु आपणा आपि जरि ॥ सरब कला भरपूरु दिसै जत कता ॥ नानक दासनि दासु तुधु आगै बिनवता ॥१८॥

सलोक मः ५ ॥
छतड़े बाजार सोहनि विचि वपारीए ॥ वखरु हिकु अपारु नानक खटे सो धणी ॥१॥

महला ५ ॥
कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥ जिनि इहु रचनु रचाइआ तिस ही माहि समाहि ॥२॥

पउड़ी ॥
सफलिउ बिरखु सुहावड़ा हरि सफल अम्रिता ॥ मनु लोचै उन्ह मिलण कउ किउ वंञै घिता ॥ वरना चिहना बाहरा ओहु अगमु अजिता ॥ ओहु पिआरा जीअ का जो खोल्है भिता ॥ सेवा करी तुसाड़ीआ मै दसिहु मिता ॥ कुरबाणी वंञा वारणै बले बलि किता ॥ दसनि संत पिआरिआ सुणहु लाइ चिता ॥ जिसु लिखिआ नानक दास तिसु नाउ अम्रितु सतिगुरि दिता ॥१९॥

सलोक महला ५ ॥
कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥ धरती भारि न बिआपई उन कउ लाहू लाहि ॥१॥

महला ५ ॥
कबीर चावल कारणे तुख कउ मुहली लाइ ॥ संगि कुसंगी बैसते तब पूछे धरम राइ ॥२॥

पउड़ी ॥
आपे ही वड परवारु आपि इकातीआ ॥ आपणी कीमति आपि आपे ही जातीआ ॥ सभु किछु आपे आपि आपि उपंनिआ ॥ आपणा कीता आपि आपि वरंनिआ ॥ धंनु सु तेरा थानु जिथै तू वुठा ॥ धंनु सु तेरे भगत जिन्ही सचु तूं डिठा ॥ जिस नो तेरी दइआ सलाहे सोइ तुधु ॥ जिसु गुर भेटे नानक निरमल सोई सुधु ॥२०॥

सलोक मः ५ ॥
फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बागु ॥ जो नर पीरि निवाजिआ तिन्हा अंच न लाग ॥१॥

मः ५ ॥
फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥ विरले केई पाईअन्हि जिन्हा पिआरे नेह ॥२॥

पउड़ी ॥
जपु तपु संजमु दइआ धरमु जिसु देहि सु पाए ॥ जिसु बुझाइहि अगनि आपि सो नामु धिआए ॥ अंतरजामी अगम पुरखु इक द्रिसटि दिखाए ॥ साधसंगति कै आसरै प्रभ सिउ रंगु लाए ॥ अउगण कटि मुखु उजला हरि नामि तराए ॥ जनम मरण भउ कटिओनु फिरि जोनि न पाए ॥ अंध कूप ते काढिअनु लड़ु आपि फड़ाए ॥ नानक बखसि मिलाइअनु रखे गलि लाए ॥२१॥

सलोक मः ५ ॥
मुहबति जिसु खुदाइ दी रता रंगि चलूलि ॥ नानक विरले पाईअहि तिसु जन कीम न मूलि ॥१॥

मः ५ ॥
अंदरु विधा सचि नाइ बाहरि भी सचु डिठोमि ॥ नानक रविआ हभ थाइ वणि त्रिणि त्रिभवणि रोमि ॥२॥

पउड़ी ॥
आपे कीतो रचनु आपे ही रतिआ ॥ आपे होइओ इकु आपे बहु भतिआ ॥ आपे सभना मंझि आपे बाहरा ॥ आपे जाणहि दूरि आपे ही जाहरा ॥ आपे होवहि गुपतु आपे परगटीऐ ॥ कीमति किसै न पाइ तेरी थटीऐ ॥ गहिर ग्मभीरु अथाहु अपारु अगणतु तूं ॥ नानक वरतै इकु इको इकु तूं ॥२२॥१॥२॥ सुधु ॥


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