रामकली की वार (महला 3), Ramkali ki vaar (Mahalla 3) Path in Hindi Gurbani online


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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रामकली की वार महला ३ ॥
जोधै वीरै पूरबाणी की धुनी ॥

सलोकु मः ३ ॥
सतिगुरु सहजै दा खेतु है जिस नो लाए भाउ ॥ नाउ बीजे नाउ उगवै नामे रहै समाइ ॥ हउमै एहो बीजु है सहसा गइआ विलाइ ॥ ना किछु बीजे न उगवै जो बखसे सो खाइ ॥ अ्मभै सेती अ्मभु रलिआ बहुड़ि न निकसिआ जाइ ॥ नानक गुरमुखि चलतु है वेखहु लोका आइ ॥ लोकु कि वेखै बपुड़ा जिस नो सोझी नाहि ॥ जिसु वेखाले सो वेखै जिसु वसिआ मन माहि ॥१॥

मः ३ ॥
मनमुखु दुख का खेतु है दुखु बीजे दुखु खाइ ॥ दुख विचि जमै दुखि मरै हउमै करत विहाइ ॥ आवणु जाणु न सुझई अंधा अंधु कमाइ ॥ जो देवै तिसै न जाणई दिते कउ लपटाइ ॥ नानक पूरबि लिखिआ कमावणा अवरु न करणा जाइ ॥२॥

मः ३ ॥
सतिगुरि मिलिऐ सदा सुखु जिस नो आपे मेले सोइ ॥ सुखै एहु बिबेकु है अंतरु निरमलु होइ ॥ अगिआन का भ्रमु कटीऐ गिआनु परापति होइ ॥ नानक एको नदरी आइआ जह देखा तह सोइ ॥३॥

पउड़ी ॥
सचै तखतु रचाइआ बैसण कउ जांई ॥ सभु किछु आपे आपि है गुर सबदि सुणाई ॥ आपे कुदरति साजीअनु करि महल सराई ॥ चंदु सूरजु दुइ चानणे पूरी बणत बणाई ॥ आपे वेखै सुणे आपि गुर सबदि धिआई ॥१॥ वाहु वाहु सचे पातिसाह तू सची नाई ॥१॥ रहाउ ॥

सलोकु ॥
कबीर महिदी करि कै घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥ तै सह बात न पुछीआ कबहू न लाई पाइ ॥१॥

मः ३ ॥
नानक महिदी करि कै रखिआ सो सहु नदरि करेइ ॥ आपे पीसै आपे घसै आपे ही लाइ लएइ ॥ इहु पिरम पिआला खसम का जै भावै तै देइ ॥२॥

पउड़ी ॥
वेकी स्रिसटि उपाईअनु सभ हुकमि आवै जाइ समाही ॥ आपे वेखि विगसदा दूजा को नाही ॥ जिउ भावै तिउ रखु तू गुर सबदि बुझाही ॥ सभना तेरा जोरु है जिउ भावै तिवै चलाही ॥ तुधु जेवड मै नाहि को किसु आखि सुणाई ॥२॥

सलोकु मः ३ ॥
भरमि भुलाई सभु जगु फिरी फावी होई भालि ॥ सो सहु सांति न देवई किआ चलै तिसु नालि ॥ गुर परसादी हरि धिआईऐ अंतरि रखीऐ उर धारि ॥ नानक घरि बैठिआ सहु पाइआ जा किरपा कीती करतारि ॥१॥

मः ३ ॥
धंधा धावत दिनु गइआ रैणि गवाई सोइ ॥ कूड़ु बोलि बिखु खाइआ मनमुखि चलिआ रोइ ॥ सिरै उपरि जम डंडु है दूजै भाइ पति खोइ ॥ हरि नामु कदे न चेतिओ फिरि आवण जाणा होइ ॥ गुर परसादी हरि मनि वसै जम डंडु न लागै कोइ ॥ नानक सहजे मिलि रहै करमि परापति होइ ॥२॥

पउड़ी ॥
इकि आपणी सिफती लाइअनु दे सतिगुर मती ॥ इकना नो नाउ बखसिओनु असथिरु हरि सती ॥ पउणु पाणी बैसंतरो हुकमि करहि भगती ॥ एना नो भउ अगला पूरी बणत बणती ॥ सभु इको हुकमु वरतदा मंनिऐ सुखु पाई ॥३॥

सलोकु ॥
कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥ राम कसउटी सो सहै जो मरजीवा होइ ॥१॥

मः ३ ॥
किउ करि इहु मनु मारीऐ किउ करि मिरतकु होइ ॥ कहिआ सबदु न मानई हउमै छडै न कोइ ॥ गुर परसादी हउमै छुटै जीवन मुकतु सो होइ ॥ नानक जिस नो बखसे तिसु मिलै तिसु बिघनु न लागै कोइ ॥२॥

मः ३ ॥
जीवत मरणा सभु को कहै जीवन मुकति किउ होइ ॥ भै का संजमु जे करे दारू भाउ लाएइ ॥ अनदिनु गुण गावै सुख सहजे बिखु भवजलु नामि तरेइ ॥ नानक गुरमुखि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥३॥

पउड़ी ॥
दूजा भाउ रचाइओनु त्रै गुण वरतारा ॥ ब्रहमा बिसनु महेसु उपाइअनु हुकमि कमावनि कारा ॥ पंडित पड़दे जोतकी ना बूझहि बीचारा ॥ सभु किछु तेरा खेलु है सचु सिरजणहारा ॥ जिसु भावै तिसु बखसि लैहि सचि सबदि समाई ॥४॥

सलोकु मः ३ ॥
मन का झूठा झूठु कमावै ॥ माइआ नो फिरै तपा सदावै ॥ भरमे भूला सभि तीरथ गहै ॥ ओहु तपा कैसे परम गति लहै ॥ गुर परसादी को सचु कमावै ॥ नानक सो तपा मोखंतरु पावै ॥१॥

मः ३ ॥
सो तपा जि इहु तपु घाले ॥ सतिगुर नो मिलै सबदु समाले ॥ सतिगुर की सेवा इहु तपु परवाणु ॥ नानक सो तपा दरगहि पावै माणु ॥२॥

पउड़ी ॥
राति दिनसु उपाइअनु संसार की वरतणि ॥ गुरमती घटि चानणा आनेरु बिनासणि ॥ हुकमे ही सभ साजीअनु रविआ सभ वणि त्रिणि ॥ सभु किछु आपे आपि है गुरमुखि सदा हरि भणि ॥ सबदे ही सोझी पई सचै आपि बुझाई ॥५॥

सलोक मः ३ ॥
अभिआगत एहि न आखीअनि जिन के चित महि भरमु ॥ तिस दै दितै नानका तेहो जेहा धरमु ॥ अभै निरंजनु परम पदु ता का भूखा होइ ॥ तिस का भोजनु नानका विरला पाए कोइ ॥१॥

मः ३ ॥
अभिआगत एहि न आखीअनि जि पर घरि भोजनु करेनि ॥ उदरै कारणि आपणे बहले भेख करेनि ॥ अभिआगत सेई नानका जि आतम गउणु करेनि ॥ भालि लहनि सहु आपणा निज घरि रहणु करेनि ॥२॥

पउड़ी ॥
अ्मबरु धरति विछोड़िअनु विचि सचा असराउ ॥ घरु दरु सभो सचु है जिसु विचि सचा नाउ ॥ सभु सचा हुकमु वरतदा गुरमुखि सचि समाउ ॥ सचा आपि तखतु सचा बहि सचा करे निआउ ॥ सभु सचो सचु वरतदा गुरमुखि अलखु लखाई ॥६॥

सलोकु मः ३ ॥
रैणाइर माहि अनंतु है कूड़ी आवै जाइ ॥ भाणै चलै आपणै बहुती लहै सजाइ ॥ रैणाइर महि सभु किछु है करमी पलै पाइ ॥ नानक नउ निधि पाईऐ जे चलै तिसै रजाइ ॥१॥

मः ३ ॥
सहजे सतिगुरु न सेविओ विचि हउमै जनमि बिनासु ॥ रसना हरि रसु न चखिओ कमलु न होइओ परगासु ॥ बिखु खाधी मनमुखु मुआ माइआ मोहि विणासु ॥ इकसु हरि के नाम विणु ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वासु ॥ जा आपे नदरि करे प्रभु सचा ता होवै दासनि दासु ॥ ता अनदिनु सेवा करे सतिगुरू की कबहि न छोडै पासु ॥ जिउ जल महि कमलु अलिपतो वरतै तिउ विचे गिरह उदासु ॥ जन नानक करे कराइआ सभु को जिउ भावै तिव हरि गुणतासु ॥२॥

पउड़ी ॥
छतीह जुग गुबारु सा आपे गणत कीनी ॥ आपे स्रिसटि सभ साजीअनु आपि मति दीनी ॥ सिम्रिति सासत साजिअनु पाप पुंन गणत गणीनी ॥ जिसु बुझाए सो बुझसी सचै सबदि पतीनी ॥ सभु आपे आपि वरतदा आपे बखसि मिलाई ॥७॥

सलोक मः ३ ॥
इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥ जो सहि रते आपणै तिन तनि लोभ रतु न होइ ॥ भै पइऐ तनु खीणु होइ लोभ रतु विचहु जाइ ॥ जिउ बैसंतरि धातु सुधु होइ तिउ हरि का भउ दुरमति मैलु गवाइ ॥ नानक ते जन सोहणे जो रते हरि रंगु लाइ ॥१॥

मः ३ ॥
रामकली रामु मनि वसिआ ता बनिआ सीगारु ॥ गुर कै सबदि कमलु बिगसिआ ता सउपिआ भगति भंडारु ॥ भरमु गइआ ता जागिआ चूका अगिआन अंधारु ॥ तिस नो रूपु अति अगला जिसु हरि नालि पिआरु ॥ सदा रवै पिरु आपणा सोभावंती नारि ॥ मनमुखि सीगारु न जाणनी जासनि जनमु सभु हारि ॥ बिनु हरि भगती सीगारु करहि नित जमहि होइ खुआरु ॥ सैसारै विचि सोभ न पाइनी अगै जि करे सु जाणै करतारु ॥ नानक सचा एकु है दुहु विचि है संसारु ॥ चंगै मंदै आपि लाइअनु सो करनि जि आपि कराए करतारु ॥२॥

मः ३ ॥
बिनु सतिगुर सेवे सांति न आवई दूजी नाही जाइ ॥ जे बहुतेरा लोचीऐ विणु करमा पाइआ न जाइ ॥ अंतरि लोभु विकारु है दूजै भाइ खुआइ ॥ तिन जमणु मरणु न चुकई हउमै विचि दुखु पाइ ॥ जिनी सतिगुर सिउ चितु लाइआ सो खाली कोई नाहि ॥ तिन जम की तलब न होवई ना ओइ दुख सहाहि ॥ नानक गुरमुखि उबरे सचै सबदि समाहि ॥३॥

पउड़ी ॥
आपि अलिपतु सदा रहै होरि धंधै सभि धावहि ॥ आपि निहचलु अचलु है होरि आवहि जावहि ॥ सदा सदा हरि धिआईऐ गुरमुखि सुखु पावहि ॥ निज घरि वासा पाईऐ सचि सिफति समावहि ॥ सचा गहिर ग्मभीरु है गुर सबदि बुझाई ॥८॥

सलोक मः ३ ॥
सचा नामु धिआइ तू सभो वरतै सचु ॥ नानक हुकमै जो बुझै सो फलु पाए सचु ॥ कथनी बदनी करता फिरै हुकमु न बूझै सचु ॥ नानक हरि का भाणा मंने सो भगतु होइ विणु मंने कचु निकचु ॥१॥

मः ३ ॥
मनमुख बोलि न जाणनी ओना अंदरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥ ओइ थाउ कुथाउ न जाणनी उन अंतरि लोभु विकारु ॥ ओइ आपणै सुआइ आइ बहि गला करहि ओना मारे जमु जंदारु ॥ अगै दरगह लेखै मंगिऐ मारि खुआरु कीचहि कूड़िआर ॥ एह कूड़ै की मलु किउ उतरै कोई कढहु इहु वीचारु ॥ सतिगुरु मिलै ता नामु दिड़ाए सभि किलविख कटणहारु ॥ नामु जपे नामो आराधे तिसु जन कउ करहु सभि नमसकारु ॥ मलु कूड़ी नामि उतारीअनु जपि नामु होआ सचिआरु ॥ जन नानक जिस दे एहि चलत हहि सो जीवउ देवणहारु ॥२॥

पउड़ी ॥
तुधु जेवडु दाता नाहि किसु आखि सुणाईऐ ॥ गुर परसादी पाइ जिथहु हउमै जाईऐ ॥ रस कस सादा बाहरा सची वडिआईऐ ॥ जिस नो बखसे तिसु देइ आपि लए मिलाईऐ ॥ घट अंतरि अम्रितु रखिओनु गुरमुखि किसै पिआई ॥९॥

सलोक मः ३ ॥
बाबाणीआ कहाणीआ पुत सपुत करेनि ॥ जि सतिगुर भावै सु मंनि लैनि सेई करम करेनि ॥ जाइ पुछहु सिम्रिति सासत बिआस सुक नारद बचन सभ स्रिसटि करेनि ॥ सचै लाए सचि लगे सदा सचु समालेनि ॥ नानक आए से परवाणु भए जि सगले कुल तारेनि ॥१॥

मः ३ ॥
गुरू जिना का अंधुला सिख भी अंधे करम करेनि ॥ ओइ भाणै चलनि आपणै नित झूठो झूठु बोलेनि ॥ कूड़ु कुसतु कमावदे पर निंदा सदा करेनि ॥ ओइ आपि डुबे पर निंदका सगले कुल डोबेनि ॥ नानक जितु ओइ लाए तितु लगे उइ बपुड़े किआ करेनि ॥२॥

पउड़ी ॥
सभ नदरी अंदरि रखदा जेती सिसटि सभ कीती ॥ इकि कूड़ि कुसति लाइअनु मनमुख विगूती ॥ गुरमुखि सदा धिआईऐ अंदरि हरि प्रीती ॥ जिन कउ पोतै पुंनु है तिन्ह वाति सिपीती ॥ नानक नामु धिआईऐ सचु सिफति सनाई ॥१०॥

सलोकु मः १ ॥
सती पापु करि सतु कमाहि ॥ गुर दीखिआ घरि देवण जाहि ॥ इसतरी पुरखै खटिऐ भाउ ॥ भावै आवउ भावै जाउ ॥ सासतु बेदु न मानै कोइ ॥ आपो आपै पूजा होइ ॥ काजी होइ कै बहै निआइ ॥ फेरे तसबी करे खुदाइ ॥ वढी लै कै हकु गवाए ॥ जे को पुछै ता पड़ि सुणाए ॥ तुरक मंत्रु कनि रिदै समाहि ॥ लोक मुहावहि चाड़ी खाहि ॥ चउका दे कै सुचा होइ ॥ ऐसा हिंदू वेखहु कोइ ॥ जोगी गिरही जटा बिभूत ॥ आगै पाछै रोवहि पूत ॥ जोगु न पाइआ जुगति गवाई ॥ कितु कारणि सिरि छाई पाई ॥ नानक कलि का एहु परवाणु ॥ आपे आखणु आपे जाणु ॥१॥

मः १ ॥
हिंदू कै घरि हिंदू आवै ॥ सूतु जनेऊ पड़ि गलि पावै ॥ सूतु पाइ करे बुरिआई ॥ नाता धोता थाइ न पाई ॥ मुसलमानु करे वडिआई ॥ विणु गुर पीरै को थाइ न पाई ॥ राहु दसाइ ओथै को जाइ ॥ करणी बाझहु भिसति न पाइ ॥ जोगी कै घरि जुगति दसाई ॥ तितु कारणि कनि मुंद्रा पाई ॥ मुंद्रा पाइ फिरै संसारि ॥ जिथै किथै सिरजणहारु ॥ जेते जीअ तेते वाटाऊ ॥ चीरी आई ढिल न काऊ ॥ एथै जाणै सु जाइ सिञाणै ॥ होरु फकड़ु हिंदू मुसलमाणै ॥ सभना का दरि लेखा होइ ॥ करणी बाझहु तरै न कोइ ॥ सचो सचु वखाणै कोइ ॥ नानक अगै पुछ न होइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि का मंदरु आखीऐ काइआ कोटु गड़ु ॥ अंदरि लाल जवेहरी गुरमुखि हरि नामु पड़ु ॥ हरि का मंदरु सरीरु अति सोहणा हरि हरि नामु दिड़ु ॥ मनमुख आपि खुआइअनु माइआ मोह नित कड़ु ॥ सभना साहिबु एकु है पूरै भागि पाइआ जाई ॥११॥

सलोक मः १ ॥
ना सति दुखीआ ना सति सुखीआ ना सति पाणी जंत फिरहि ॥ ना सति मूंड मुडाई केसी ना सति पड़िआ देस फिरहि ॥ ना सति रुखी बिरखी पथर आपु तछावहि दुख सहहि ॥ ना सति हसती बधे संगल ना सति गाई घाहु चरहि ॥ जिसु हथि सिधि देवै जे सोई जिस नो देइ तिसु आइ मिलै ॥ नानक ता कउ मिलै वडाई जिसु घट भीतरि सबदु रवै ॥ सभि घट मेरे हउ सभना अंदरि जिसहि खुआई तिसु कउणु कहै ॥ जिसहि दिखाला वाटड़ी तिसहि भुलावै कउणु ॥ जिसहि भुलाई पंध सिरि तिसहि दिखावै कउणु ॥१॥

मः १ ॥
सो गिरही जो निग्रहु करै ॥ जपु तपु संजमु भीखिआ करै ॥ पुंन दान का करे सरीरु ॥ सो गिरही गंगा का नीरु ॥ बोलै ईसरु सति सरूपु ॥ परम तंत महि रेख न रूपु ॥२॥

मः १ ॥
सो अउधूती जो धूपै आपु ॥ भिखिआ भोजनु करै संतापु ॥ अउहठ पटण महि भीखिआ करै ॥ सो अउधूती सिव पुरि चड़ै ॥ बोलै गोरखु सति सरूपु ॥ परम तंत महि रेख न रूपु ॥३॥

मः १ ॥
सो उदासी जि पाले उदासु ॥ अरध उरध करे निरंजन वासु ॥ चंद सूरज की पाए गंढि ॥ तिसु उदासी का पड़ै न कंधु ॥ बोलै गोपी चंदु सति सरूपु ॥ परम तंत महि रेख न रूपु ॥४॥

मः १ ॥
सो पाखंडी जि काइआ पखाले ॥ काइआ की अगनि ब्रहमु परजाले ॥ सुपनै बिंदु न देई झरणा ॥ तिसु पाखंडी जरा न मरणा ॥ बोलै चरपटु सति सरूपु ॥ परम तंत महि रेख न रूपु ॥५॥

मः १ ॥
सो बैरागी जि उलटे ब्रहमु ॥ गगन मंडल महि रोपै थमु ॥ अहिनिसि अंतरि रहै धिआनि ॥ ते बैरागी सत समानि ॥ बोलै भरथरि सति सरूपु ॥ परम तंत महि रेख न रूपु ॥६॥

मः १ ॥
किउ मरै मंदा किउ जीवै जुगति ॥ कंन पड़ाइ किआ खाजै भुगति ॥ आसति नासति एको नाउ ॥ कउणु सु अखरु जितु रहै हिआउ ॥ धूप छाव जे सम करि सहै ॥ ता नानकु आखै गुरु को कहै ॥ छिअ वरतारे वरतहि पूत ॥ ना संसारी ना अउधूत ॥ निरंकारि जो रहै समाइ ॥ काहे भीखिआ मंगणि जाइ ॥७॥

पउड़ी ॥
हरि मंदरु सोई आखीऐ जिथहु हरि जाता ॥ मानस देह गुर बचनी पाइआ सभु आतम रामु पछाता ॥ बाहरि मूलि न खोजीऐ घर माहि बिधाता ॥ मनमुख हरि मंदर की सार न जाणनी तिनी जनमु गवाता ॥ सभ महि इकु वरतदा गुर सबदी पाइआ जाई ॥१२॥

सलोक मः ३ ॥
मूरखु होवै सो सुणै मूरख का कहणा ॥ मूरख के किआ लखण है किआ मूरख का करणा ॥ मूरखु ओहु जि मुगधु है अहंकारे मरणा ॥ एतु कमाणै सदा दुखु दुख ही महि रहणा ॥ अति पिआरा पवै खूहि किहु संजमु करणा ॥ गुरमुखि होइ सु करे वीचारु ओसु अलिपतो रहणा ॥ हरि नामु जपै आपि उधरै ओसु पिछै डुबदे भी तरणा ॥ नानक जो तिसु भावै सो करे जो देइ सु सहणा ॥१॥

मः १ ॥
नानकु आखै रे मना सुणीऐ सिख सही ॥ लेखा रबु मंगेसीआ बैठा कढि वही ॥ तलबा पउसनि आकीआ बाकी जिना रही ॥ अजराईलु फरेसता होसी आइ तई ॥ आवणु जाणु न सुझई भीड़ी गली फही ॥ कूड़ निखुटे नानका ओड़कि सचि रही ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि का सभु सरीरु है हरि रवि रहिआ सभु आपै ॥ हरि की कीमति ना पवै किछु कहणु न जापै ॥ गुर परसादी सालाहीऐ हरि भगती रापै ॥ सभु मनु तनु हरिआ होइआ अहंकारु गवापै ॥ सभु किछु हरि का खेलु है गुरमुखि किसै बुझाई ॥१३॥

सलोकु मः १ ॥
सहंसर दान दे इंद्रु रोआइआ ॥ परस रामु रोवै घरि आइआ ॥ अजै सु रोवै भीखिआ खाइ ॥ ऐसी दरगह मिलै सजाइ ॥ रोवै रामु निकाला भइआ ॥ सीता लखमणु विछुड़ि गइआ ॥ रोवै दहसिरु लंक गवाइ ॥ जिनि सीता आदी डउरू वाइ ॥ रोवहि पांडव भए मजूर ॥ जिन कै सुआमी रहत हदूरि ॥ रोवै जनमेजा खुइ गइआ ॥ एकी कारणि पापी भइआ ॥ रोवहि सेख मसाइक पीर ॥ अंति कालि मतु लागै भीड़ ॥ रोवहि राजे कंन पड़ाइ ॥ घरि घरि मागहि भीखिआ जाइ ॥ रोवहि किरपन संचहि धनु जाइ ॥ पंडित रोवहि गिआनु गवाइ ॥ बाली रोवै नाहि भतारु ॥ नानक दुखीआ सभु संसारु ॥ मंने नाउ सोई जिणि जाइ ॥ अउरी करम न लेखै लाइ ॥१॥

मः २ ॥
जपु तपु सभु किछु मंनिऐ अवरि कारा सभि बादि ॥ नानक मंनिआ मंनीऐ बुझीऐ गुर परसादि ॥२॥

पउड़ी ॥
काइआ हंस धुरि मेलु करतै लिखि पाइआ ॥ सभ महि गुपतु वरतदा गुरमुखि प्रगटाइआ ॥ गुण गावै गुण उचरै गुण माहि समाइआ ॥ सची बाणी सचु है सचु मेलि मिलाइआ ॥ सभु किछु आपे आपि है आपे देइ वडिआई ॥१४॥

सलोक मः २ ॥
नानक अंधा होइ कै रतना परखण जाइ ॥ रतना सार न जाणई आवै आपु लखाइ ॥१॥

मः २ ॥
रतना केरी गुथली रतनी खोली आइ ॥ वखर तै वणजारिआ दुहा रही समाइ ॥ जिन गुणु पलै नानका माणक वणजहि सेइ ॥ रतना सार न जाणनी अंधे वतहि लोइ ॥२॥

पउड़ी ॥
नउ दरवाजे काइआ कोटु है दसवै गुपतु रखीजै ॥ बजर कपाट न खुलनी गुर सबदि खुलीजै ॥ अनहद वाजे धुनि वजदे गुर सबदि सुणीजै ॥ तितु घट अंतरि चानणा करि भगति मिलीजै ॥ सभ महि एकु वरतदा जिनि आपे रचन रचाई ॥१५॥

सलोक मः २ ॥
अंधे कै राहि दसिऐ अंधा होइ सु जाइ ॥ होइ सुजाखा नानका सो किउ उझड़ि पाइ ॥ अंधे एहि न आखीअनि जिन मुखि लोइण नाहि ॥ अंधे सेई नानका खसमहु घुथे जाहि ॥१॥

मः २ ॥
साहिबि अंधा जो कीआ करे सुजाखा होइ ॥ जेहा जाणै तेहो वरतै जे सउ आखै कोइ ॥ जिथै सु वसतु न जापई आपे वरतउ जाणि ॥ नानक गाहकु किउ लए सकै न वसतु पछाणि ॥२॥

मः २ ॥
सो किउ अंधा आखीऐ जि हुकमहु अंधा होइ ॥ नानक हुकमु न बुझई अंधा कहीऐ सोइ ॥३॥

पउड़ी ॥
काइआ अंदरि गड़ु कोटु है सभि दिसंतर देसा ॥ आपे ताड़ी लाईअनु सभ महि परवेसा ॥ आपे स्रिसटि साजीअनु आपि गुपतु रखेसा ॥ गुर सेवा ते जाणिआ सचु परगटीएसा ॥ सभु किछु सचो सचु है गुरि सोझी पाई ॥१६॥

सलोक मः १ ॥
सावणु राति अहाड़ु दिहु कामु क्रोधु दुइ खेत ॥ लबु वत्र दरोगु बीउ हाली राहकु हेत ॥ हलु बीचारु विकार मण हुकमी खटे खाइ ॥ नानक लेखै मंगिऐ अउतु जणेदा जाइ ॥१॥

मः १ ॥
भउ भुइ पवितु पाणी सतु संतोखु बलेद ॥ हलु हलेमी हाली चितु चेता वत्र वखत संजोगु ॥ नाउ बीजु बखसीस बोहल दुनीआ सगल दरोग ॥ नानक नदरी करमु होइ जावहि सगल विजोग ॥२॥

पउड़ी ॥
मनमुखि मोहु गुबारु है दूजै भाइ बोलै ॥ दूजै भाइ सदा दुखु है नित नीरु विरोलै ॥ गुरमुखि नामु धिआईऐ मथि ततु कढोलै ॥ अंतरि परगासु घटि चानणा हरि लधा टोलै ॥ आपे भरमि भुलाइदा किछु कहणु न जाई ॥१७॥

सलोक मः २ ॥
नानक चिंता मति करहु चिंता तिस ही हेइ ॥ जल महि जंत उपाइअनु तिना भि रोजी देइ ॥ ओथै हटु न चलई ना को किरस करेइ ॥ सउदा मूलि न होवई ना को लए न देइ ॥ जीआ का आहारु जीअ खाणा एहु करेइ ॥ विचि उपाए साइरा तिना भि सार करेइ ॥ नानक चिंता मत करहु चिंता तिस ही हेइ ॥१॥

मः १ ॥
नानक इहु जीउ मछुली झीवरु त्रिसना कालु ॥ मनूआ अंधु न चेतई पड़ै अचिंता जालु ॥ नानक चितु अचेतु है चिंता बधा जाइ ॥ नदरि करे जे आपणी ता आपे लए मिलाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
से जन साचे सदा सदा जिनी हरि रसु पीता ॥ गुरमुखि सचा मनि वसै सचु सउदा कीता ॥ सभु किछु घर ही माहि है वडभागी लीता ॥ अंतरि त्रिसना मरि गई हरि गुण गावीता ॥ आपे मेलि मिलाइअनु आपे देइ बुझाई ॥१८॥

सलोक मः १ ॥
वेलि पिंञाइआ कति वुणाइआ ॥ कटि कुटि करि खु्मबि चड़ाइआ ॥ लोहा वढे दरजी पाड़े सूई धागा सीवै ॥ इउ पति पाटी सिफती सीपै नानक जीवत जीवै ॥ होइ पुराणा कपड़ु पाटै सूई धागा गंढै ॥ माहु पखु किहु चलै नाही घड़ी मुहतु किछु हंढै ॥ सचु पुराणा होवै नाही सीता कदे न पाटै ॥ नानक साहिबु सचो सचा तिचरु जापी जापै ॥१॥

मः १ ॥
सच की काती सचु सभु सारु ॥ घाड़त तिस की अपर अपार ॥ सबदे साण रखाई लाइ ॥ गुण की थेकै विचि समाइ ॥ तिस दा कुठा होवै सेखु ॥ लोहू लबु निकथा वेखु ॥ होइ हलालु लगै हकि जाइ ॥ नानक दरि दीदारि समाइ ॥२॥

मः १ ॥
कमरि कटारा बंकुड़ा बंके का असवारु ॥ गरबु न कीजै नानका मतु सिरि आवै भारु ॥३॥

पउड़ी ॥
सो सतसंगति सबदि मिलै जो गुरमुखि चलै ॥ सचु धिआइनि से सचे जिन हरि खरचु धनु पलै ॥ भगत सोहनि गुण गावदे गुरमति अचलै ॥ रतन बीचारु मनि वसिआ गुर कै सबदि भलै ॥ आपे मेलि मिलाइदा आपे देइ वडिआई ॥१९॥

सलोक मः ३ ॥
आसा अंदरि सभु को कोइ निरासा होइ ॥ नानक जो मरि जीविआ सहिला आइआ सोइ ॥१॥

मः ३ ॥
ना किछु आसा हथि है केउ निरासा होइ ॥ किआ करे एह बपुड़ी जां भोलाए सोइ ॥२॥

पउड़ी ॥
ध्रिगु जीवणु संसार सचे नाम बिनु ॥ प्रभु दाता दातार निहचलु एहु धनु ॥ सासि सासि आराधे निरमलु सोइ जनु ॥ अंतरजामी अगमु रसना एकु भनु ॥ रवि रहिआ सरबति नानकु बलि जाई ॥२०॥

सलोकु मः १ ॥
सरवर हंस धुरे ही मेला खसमै एवै भाणा ॥ सरवर अंदरि हीरा मोती सो हंसा का खाणा ॥ बगुला कागु न रहई सरवरि जे होवै अति सिआणा ॥ ओना रिजकु न पइओ ओथै ओन्हा होरो खाणा ॥ सचि कमाणै सचो पाईऐ कूड़ै कूड़ा माणा ॥ नानक तिन कौ सतिगुरु मिलिआ जिना धुरे पैया परवाणा ॥१॥

मः १ ॥
साहिबु मेरा उजला जे को चिति करेइ ॥ नानक सोई सेवीऐ सदा सदा जो देइ ॥ नानक सोई सेवीऐ जितु सेविऐ दुखु जाइ ॥ अवगुण वंञनि गुण रवहि मनि सुखु वसै आइ ॥२॥

पउड़ी ॥
आपे आपि वरतदा आपि ताड़ी लाईअनु ॥ आपे ही उपदेसदा गुरमुखि पतीआईअनु ॥ इकि आपे उझड़ि पाइअनु इकि भगती लाइअनु ॥ जिसु आपि बुझाए सो बुझसी आपे नाइ लाईअनु ॥ नानक नामु धिआईऐ सची वडिआई ॥२१॥१॥ सुधु ॥


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