वार मलार की (महला 1), Vaar Malar ki (Mahalla 1) Path in Hindi Gurbani online


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वार मलार की महला १
राणे कैलास तथा मालदे की धुनि ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

सलोक महला ३ ॥
गुरि मिलिऐ मनु रहसीऐ जिउ वुठै धरणि सीगारु ॥ सभ दिसै हरीआवली सर भरे सुभर ताल ॥ अंदरु रचै सच रंगि जिउ मंजीठै लालु ॥ कमलु विगसै सचु मनि गुर कै सबदि निहालु ॥ मनमुख दूजी तरफ है वेखहु नदरि निहालि ॥ फाही फाथे मिरग जिउ सिरि दीसै जमकालु ॥ खुधिआ त्रिसना निंदा बुरी कामु क्रोधु विकरालु ॥ एनी अखी नदरि न आवई जिचरु सबदि न करे बीचारु ॥ तुधु भावै संतोखीआं चूकै आल जंजालु ॥ मूलु रहै गुरु सेविऐ गुर पउड़ी बोहिथु ॥ नानक लगी ततु लै तूं सचा मनि सचु ॥१॥

महला १ ॥
हेको पाधरु हेकु दरु गुर पउड़ी निज थानु ॥ रूड़उ ठाकुरु नानका सभि सुख साचउ नामु ॥२॥

पउड़ी ॥
आपीन्है आपु साजि आपु पछाणिआ ॥ अ्मबरु धरति विछोड़ि चंदोआ ताणिआ ॥ विणु थम्हा गगनु रहाइ सबदु नीसाणिआ ॥ सूरजु चंदु उपाइ जोति समाणिआ ॥ कीए राति दिनंतु चोज विडाणिआ ॥ तीरथ धरम वीचार नावण पुरबाणिआ ॥ तुधु सरि अवरु न कोइ कि आखि वखाणिआ ॥ सचै तखति निवासु होर आवण जाणिआ ॥१॥

सलोक मः १ ॥
नानक सावणि जे वसै चहु ओमाहा होइ ॥ नागां मिरगां मछीआं रसीआं घरि धनु होइ ॥१॥

मः १ ॥
नानक सावणि जे वसै चहु वेछोड़ा होइ ॥ गाई पुता निरधना पंथी चाकरु होइ ॥२॥

पउड़ी ॥
तू सचा सचिआरु जिनि सचु वरताइआ ॥ बैठा ताड़ी लाइ कवलु छपाइआ ॥ ब्रहमै वडा कहाइ अंतु न पाइआ ॥ ना तिसु बापु न माइ किनि तू जाइआ ॥ ना तिसु रूपु न रेख वरन सबाइआ ॥ ना तिसु भुख पिआस रजा धाइआ ॥ गुर महि आपु समोइ सबदु वरताइआ ॥ सचे ही पतीआइ सचि समाइआ ॥२॥

सलोक मः १ ॥
वैदु बुलाइआ वैदगी पकड़ि ढंढोले बांह ॥ भोला वैदु न जाणई करक कलेजे माहि ॥१॥

मः २ ॥
वैदा वैदु सुवैदु तू पहिलां रोगु पछाणु ॥ ऐसा दारू लोड़ि लहु जितु वंञै रोगा घाणि ॥ जितु दारू रोग उठिअहि तनि सुखु वसै आइ ॥ रोगु गवाइहि आपणा त नानक वैदु सदाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु देव उपाइआ ॥ ब्रहमे दिते बेद पूजा लाइआ ॥ दस अवतारी रामु राजा आइआ ॥ दैता मारे धाइ हुकमि सबाइआ ॥ ईस महेसुरु सेव तिन्ही अंतु न पाइआ ॥ सची कीमति पाइ तखतु रचाइआ ॥ दुनीआ धंधै लाइ आपु छपाइआ ॥ धरमु कराए करम धुरहु फुरमाइआ ॥३॥

सलोक मः २ ॥
सावणु आइआ हे सखी कंतै चिति करेहु ॥ नानक झूरि मरहि दोहागणी जिन्ह अवरी लागा नेहु ॥१॥

मः २ ॥
सावणु आइआ हे सखी जलहरु बरसनहारु ॥ नानक सुखि सवनु सोहागणी जिन्ह सह नालि पिआरु ॥२॥

पउड़ी ॥
आपे छिंझ पवाइ मलाखाड़ा रचिआ ॥ लथे भड़थू पाइ गुरमुखि मचिआ ॥ मनमुख मारे पछाड़ि मूरख कचिआ ॥ आपि भिड़ै मारे आपि आपि कारजु रचिआ ॥ सभना खसमु एकु है गुरमुखि जाणीऐ ॥ हुकमी लिखै सिरि लेखु विणु कलम मसवाणीऐ ॥ सतसंगति मेलापु जिथै हरि गुण सदा वखाणीऐ ॥ नानक सचा सबदु सलाहि सचु पछाणीऐ ॥४॥

सलोक मः ३ ॥
ऊंनवि ऊंनवि आइआ अवरि करेंदा वंन ॥ किआ जाणा तिसु साह सिउ केव रहसी रंगु ॥ रंगु रहिआ तिन्ह कामणी जिन्ह मनि भउ भाउ होइ ॥ नानक भै भाइ बाहरी तिन तनि सुखु न होइ ॥१॥

मः ३ ॥
ऊंनवि ऊंनवि आइआ वरसै नीरु निपंगु ॥ नानक दुखु लागा तिन्ह कामणी जिन्ह कंतै सिउ मनि भंगु ॥२॥

पउड़ी ॥
दोवै तरफा उपाइ इकु वरतिआ ॥ बेद बाणी वरताइ अंदरि वादु घतिआ ॥ परविरति निरविरति हाठा दोवै विचि धरमु फिरै रैबारिआ ॥ मनमुख कचे कूड़िआर तिन्ही निहचउ दरगह हारिआ ॥ गुरमती सबदि सूर है कामु क्रोधु जिन्ही मारिआ ॥ सचै अंदरि महलि सबदि सवारिआ ॥ से भगत तुधु भावदे सचै नाइ पिआरिआ ॥ सतिगुरु सेवनि आपणा तिन्हा विटहु हउ वारिआ ॥५॥

सलोक मः ३ ॥
ऊंनवि ऊंनवि आइआ वरसै लाइ झड़ी ॥ नानक भाणै चलै कंत कै सु माणे सदा रली ॥१॥

मः ३ ॥
किआ उठि उठि देखहु बपुड़ें इसु मेघै हथि किछु नाहि ॥ जिनि एहु मेघु पठाइआ तिसु राखहु मन मांहि ॥ तिस नो मंनि वसाइसी जा कउ नदरि करेइ ॥ नानक नदरी बाहरी सभ करण पलाह करेइ ॥२॥

पउड़ी ॥
सो हरि सदा सरेवीऐ जिसु करत न लागै वार ॥ आडाणे आकास करि खिन महि ढाहि उसारणहार ॥ आपे जगतु उपाइ कै कुदरति करे वीचार ॥ मनमुख अगै लेखा मंगीऐ बहुती होवै मार ॥ गुरमुखि पति सिउ लेखा निबड़ै बखसे सिफति भंडार ॥ ओथै हथु न अपड़ै कूक न सुणीऐ पुकार ॥ ओथै सतिगुरु बेली होवै कढि लए अंती वार ॥ एना जंता नो होर सेवा नही सतिगुरु सिरि करतार ॥६॥

सलोक मः ३ ॥
बाबीहा जिस नो तू पूकारदा तिस नो लोचै सभु कोइ ॥ अपणी किरपा करि कै वससी वणु त्रिणु हरिआ होइ ॥ गुर परसादी पाईऐ विरला बूझै कोइ ॥ बहदिआ उठदिआ नित धिआईऐ सदा सदा सुखु होइ ॥ नानक अम्रितु सद ही वरसदा गुरमुखि देवै हरि सोइ ॥१॥

मः ३ ॥
कलमलि होई मेदनी अरदासि करे लिव लाइ ॥ सचै सुणिआ कंनु दे धीरक देवै सहजि सुभाइ ॥ इंद्रै नो फुरमाइआ वुठा छहबर लाइ ॥ अनु धनु उपजै बहु घणा कीमति कहणु न जाइ ॥ नानक नामु सलाहि तू सभना जीआ देदा रिजकु स्मबाहि ॥ जितु खाधै सुखु ऊपजै फिरि दूखु न लागै आइ ॥२॥

पउड़ी ॥
हरि जीउ सचा सचु तू सचे लैहि मिलाइ ॥ दूजै दूजी तरफ है कूड़ि मिलै न मिलिआ जाइ ॥ आपे जोड़ि विछोड़िऐ आपे कुदरति देइ दिखाइ ॥ मोहु सोगु विजोगु है पूरबि लिखिआ कमाइ ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जो हरि चरणी रहै लिव लाइ ॥ जिउ जल महि कमलु अलिपतु है ऐसी बणत बणाइ ॥ से सुखीए सदा सोहणे जिन्ह विचहु आपु गवाइ ॥ तिन्ह सोगु विजोगु कदे नही जो हरि कै अंकि समाइ ॥७॥

सलोक मः ३ ॥
नानक सो सालाहीऐ जिसु वसि सभु किछु होइ ॥ तिसै सरेविहु प्राणीहो तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ गुरमुखि हरि प्रभु मनि वसै तां सदा सदा सुखु होइ ॥ सहसा मूलि न होवई सभ चिंता विचहु जाइ ॥ जो किछु होइ सु सहजे होइ कहणा किछू न जाइ ॥ सचा साहिबु मनि वसै तां मनि चिंदिआ फलु पाइ ॥ नानक तिन का आखिआ आपि सुणे जि लइअनु पंनै पाइ ॥१॥

मः ३ ॥
अम्रितु सदा वरसदा बूझनि बूझणहार ॥ गुरमुखि जिन्ही बुझिआ हरि अम्रितु रखिआ उरि धारि ॥ हरि अम्रितु पीवहि सदा रंगि राते हउमै त्रिसना मारि ॥ अम्रितु हरि का नामु है वरसै किरपा धारि ॥ नानक गुरमुखि नदरी आइआ हरि आतम रामु मुरारि ॥२॥

पउड़ी ॥
अतुलु किउ तोलीऐ विणु तोले पाइआ न जाइ ॥ गुर कै सबदि वीचारीऐ गुण महि रहै समाइ ॥ अपणा आपु आपि तोलसी आपे मिलै मिलाइ ॥ तिस की कीमति ना पवै कहणा किछू न जाइ ॥ हउ बलिहारी गुर आपणे जिनि सची बूझ दिती बुझाइ ॥ जगतु मुसै अम्रितु लुटीऐ मनमुख बूझ न पाइ ॥ विणु नावै नालि न चलसी जासी जनमु गवाइ ॥ गुरमती जागे तिन्ही घरु रखिआ दूता का किछु न वसाइ ॥८॥

सलोक मः ३ ॥
बाबीहा ना बिललाइ ना तरसाइ एहु मनु खसम का हुकमु मंनि ॥ नानक हुकमि मंनिऐ तिख उतरै चड़ै चवगलि वंनु ॥१॥

मः ३ ॥
बाबीहा जल महि तेरा वासु है जल ही माहि फिराहि ॥ जल की सार न जाणही तां तूं कूकण पाहि ॥ जल थल चहु दिसि वरसदा खाली को थाउ नाहि ॥ एतै जलि वरसदै तिख मरहि भाग तिना के नाहि ॥ नानक गुरमुखि तिन सोझी पई जिन वसिआ मन माहि ॥२॥

पउड़ी ॥
नाथ जती सिध पीर किनै अंतु न पाइआ ॥ गुरमुखि नामु धिआइ तुझै समाइआ ॥ जुग छतीह गुबारु तिस ही भाइआ ॥ जला बि्मबु असरालु तिनै वरताइआ ॥ नीलु अनीलु अगमु सरजीतु सबाइआ ॥ अगनि उपाई वादु भुख तिहाइआ ॥ दुनीआ कै सिरि कालु दूजा भाइआ ॥ रखै रखणहारु जिनि सबदु बुझाइआ ॥९॥

सलोक मः ३ ॥
इहु जलु सभ तै वरसदा वरसै भाइ सुभाइ ॥ से बिरखा हरीआवले जो गुरमुखि रहे समाइ ॥ नानक नदरी सुखु होइ एना जंता का दुखु जाइ ॥१॥

मः ३ ॥
भिंनी रैणि चमकिआ वुठा छहबर लाइ ॥ जितु वुठै अनु धनु बहुतु ऊपजै जां सहु करे रजाइ ॥ जितु खाधै मनु त्रिपतीऐ जीआं जुगति समाइ ॥ इहु धनु करते का खेलु है कदे आवै कदे जाइ ॥ गिआनीआ का धनु नामु है सद ही रहै समाइ ॥ नानक जिन कउ नदरि करे तां इहु धनु पलै पाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
आपि कराए करे आपि हउ कै सिउ करी पुकार ॥ आपे लेखा मंगसी आपि कराए कार ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ हुकमु करे गावारु ॥ आपि छडाए छुटीऐ आपे बखसणहारु ॥ आपे वेखै सुणे आपि सभसै दे आधारु ॥ सभ महि एकु वरतदा सिरि सिरि करे बीचारु ॥ गुरमुखि आपु वीचारीऐ लगै सचि पिआरु ॥ नानक किस नो आखीऐ आपे देवणहारु ॥१०॥

सलोक मः ३ ॥
बाबीहा एहु जगतु है मत को भरमि भुलाइ ॥ इहु बाबींहा पसू है इस नो बूझणु नाहि ॥ अम्रितु हरि का नामु है जितु पीतै तिख जाइ ॥ नानक गुरमुखि जिन्ह पीआ तिन्ह बहुड़ि न लागी आइ ॥१॥

मः ३ ॥
मलारु सीतल रागु है हरि धिआइऐ सांति होइ ॥ हरि जीउ अपणी क्रिपा करे तां वरतै सभ लोइ ॥ वुठै जीआ जुगति होइ धरणी नो सीगारु होइ ॥ नानक इहु जगतु सभु जलु है जल ही ते सभ कोइ ॥ गुर परसादी को विरला बूझै सो जनु मुकतु सदा होइ ॥२॥

पउड़ी ॥
सचा वेपरवाहु इको तू धणी ॥ तू सभु किछु आपे आपि दूजे किसु गणी ॥ माणस कूड़ा गरबु सची तुधु मणी ॥ आवा गउणु रचाइ उपाई मेदनी ॥ सतिगुरु सेवे आपणा आइआ तिसु गणी ॥ जे हउमै विचहु जाइ त केही गणत गणी ॥ मनमुख मोहि गुबारि जिउ भुला मंझि वणी ॥ कटे पाप असंख नावै इक कणी ॥११॥

सलोक मः ३ ॥
बाबीहा खसमै का महलु न जाणही महलु देखि अरदासि पाइ ॥ आपणै भाणै बहुता बोलहि बोलिआ थाइ न पाइ ॥ खसमु वडा दातारु है जो इछे सो फल पाइ ॥ बाबीहा किआ बपुड़ा जगतै की तिख जाइ ॥१॥

मः ३ ॥
बाबीहा भिंनी रैणि बोलिआ सहजे सचि सुभाइ ॥ इहु जलु मेरा जीउ है जल बिनु रहणु न जाइ ॥ गुर सबदी जलु पाईऐ विचहु आपु गवाइ ॥ नानक जिसु बिनु चसा न जीवदी सो सतिगुरि दीआ मिलाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
खंड पताल असंख मै गणत न होई ॥ तू करता गोविंदु तुधु सिरजी तुधै गोई ॥ लख चउरासीह मेदनी तुझ ही ते होई ॥ इकि राजे खान मलूक कहहि कहावहि कोई ॥ इकि साह सदावहि संचि धनु दूजै पति खोई ॥ इकि दाते इक मंगते सभना सिरि सोई ॥ विणु नावै बाजारीआ भीहावलि होई ॥ कूड़ निखुटे नानका सचु करे सु होई ॥१२॥

सलोक मः ३ ॥
बाबीहा गुणवंती महलु पाइआ अउगणवंती दूरि ॥ अंतरि तेरै हरि वसै गुरमुखि सदा हजूरि ॥ कूक पुकार न होवई नदरी नदरि निहाल ॥ नानक नामि रते सहजे मिले सबदि गुरू कै घाल ॥१॥

मः ३ ॥
बाबीहा बेनती करे करि किरपा देहु जीअ दान ॥ जल बिनु पिआस न ऊतरै छुटकि जांहि मेरे प्रान ॥ तू सुखदाता बेअंतु है गुणदाता नेधानु ॥ नानक गुरमुखि बखसि लए अंति बेली होइ भगवानु ॥२॥

पउड़ी ॥
आपे जगतु उपाइ कै गुण अउगण करे बीचारु ॥ त्रै गुण सरब जंजालु है नामि न धरे पिआरु ॥ गुण छोडि अउगण कमावदे दरगह होहि खुआरु ॥ जूऐ जनमु तिनी हारिआ कितु आए संसारि ॥ सचै सबदि मनु मारिआ अहिनिसि नामि पिआरि ॥ जिनी पुरखी उरि धारिआ सचा अलख अपारु ॥ तू गुणदाता निधानु हहि असी अवगणिआर ॥ जिसु बखसे सो पाइसी गुर सबदी वीचारु ॥१३॥

सलोक मः ५ ॥
राति न विहावी साकतां जिन्हा विसरै नाउ ॥ राती दिनस सुहेलीआ नानक हरि गुण गांउ ॥१॥

मः ५ ॥
रतन जवेहर माणका हभे मणी मथंनि ॥ नानक जो प्रभि भाणिआ सचै दरि सोहंनि ॥२॥

पउड़ी ॥
सचा सतिगुरु सेवि सचु सम्हालिआ ॥ अंति खलोआ आइ जि सतिगुर अगै घालिआ ॥ पोहि न सकै जमकालु सचा रखवालिआ ॥ गुर साखी जोति जगाइ दीवा बालिआ ॥ मनमुख विणु नावै कूड़िआर फिरहि बेतालिआ ॥ पसू माणस चमि पलेटे अंदरहु कालिआ ॥ सभो वरतै सचु सचै सबदि निहालिआ ॥ नानक नामु निधानु है पूरै गुरि देखालिआ ॥१४॥

सलोक मः ३ ॥
बाबीहै हुकमु पछाणिआ गुर कै सहजि सुभाइ ॥ मेघु वरसै दइआ करि गूड़ी छहबर लाइ ॥ बाबीहे कूक पुकार रहि गई सुखु वसिआ मनि आइ ॥ नानक सो सालाहीऐ जि देंदा सभनां जीआ रिजकु समाइ ॥१॥

मः ३ ॥
चात्रिक तू न जाणही किआ तुधु विचि तिखा है कितु पीतै तिख जाइ ॥ दूजै भाइ भरमिआ अम्रित जलु पलै न पाइ ॥ नदरि करे जे आपणी तां सतिगुरु मिलै सुभाइ ॥ नानक सतिगुर ते अम्रित जलु पाइआ सहजे रहिआ समाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
इकि वण खंडि बैसहि जाइ सदु न देवही ॥ इकि पाला ककरु भंनि सीतलु जलु हेंवही ॥ इकि भसम चड़्हावहि अंगि मैलु न धोवही ॥ इकि जटा बिकट बिकराल कुलु घरु खोवही ॥ इकि नगन फिरहि दिनु राति नींद न सोवही ॥ इकि अगनि जलावहि अंगु आपु विगोवही ॥ विणु नावै तनु छारु किआ कहि रोवही ॥ सोहनि खसम दुआरि जि सतिगुरु सेवही ॥१५॥

सलोक मः ३ ॥
बाबीहा अम्रित वेलै बोलिआ तां दरि सुणी पुकार ॥ मेघै नो फुरमानु होआ वरसहु किरपा धारि ॥ हउ तिन कै बलिहारणै जिनी सचु रखिआ उरि धारि ॥ नानक नामे सभ हरीआवली गुर कै सबदि वीचारि ॥१॥

मः ३ ॥
बाबीहा इव तेरी तिखा न उतरै जे सउ करहि पुकार ॥ नदरी सतिगुरु पाईऐ नदरी उपजै पिआरु ॥ नानक साहिबु मनि वसै विचहु जाहि विकार ॥२॥

पउड़ी ॥
इकि जैनी उझड़ पाइ धुरहु खुआइआ ॥ तिन मुखि नाही नामु न तीरथि न्हाइआ ॥ हथी सिर खोहाइ न भदु कराइआ ॥ कुचिल रहहि दिन राति सबदु न भाइआ ॥ तिन जाति न पति न करमु जनमु गवाइआ ॥ मनि जूठै वेजाति जूठा खाइआ ॥ बिनु सबदै आचारु न किन ही पाइआ ॥ गुरमुखि ओअंकारि सचि समाइआ ॥१६॥

सलोक मः ३ ॥
सावणि सरसी कामणी गुर सबदी वीचारि ॥ नानक सदा सुहागणी गुर कै हेति अपारि ॥१॥

मः ३ ॥
सावणि दझै गुण बाहरी जिसु दूजै भाइ पिआरु ॥ नानक पिर की सार न जाणई सभु सीगारु खुआरु ॥२॥

पउड़ी ॥
सचा अलख अभेउ हठि न पतीजई ॥ इकि गावहि राग परीआ रागि न भीजई ॥ इकि नचि नचि पूरहि ताल भगति न कीजई ॥ इकि अंनु न खाहि मूरख तिना किआ कीजई ॥ त्रिसना होई बहुतु किवै न धीजई ॥ करम वधहि कै लोअ खपि मरीजई ॥ लाहा नामु संसारि अम्रितु पीजई ॥ हरि भगती असनेहि गुरमुखि घीजई ॥१७॥

सलोक मः ३ ॥
गुरमुखि मलार रागु जो करहि तिन मनु तनु सीतलु होइ ॥ गुर सबदी एकु पछाणिआ एको सचा सोइ ॥ मनु तनु सचा सचु मनि सचे सची सोइ ॥ अंदरि सची भगति है सहजे ही पति होइ ॥ कलिजुग महि घोर अंधारु है मनमुख राहु न कोइ ॥ से वडभागी नानका जिन गुरमुखि परगटु होइ ॥१॥

मः ३ ॥
इंदु वरसै करि दइआ लोकां मनि उपजै चाउ ॥ जिस कै हुकमि इंदु वरसदा तिस कै सद बलिहारै जांउ ॥ गुरमुखि सबदु सम्हालीऐ सचे के गुण गाउ ॥ नानक नामि रते जन निरमले सहजे सचि समाउ ॥२॥

पउड़ी ॥
पूरा सतिगुरु सेवि पूरा पाइआ ॥ पूरै करमि धिआइ पूरा सबदु मंनि वसाइआ ॥ पूरै गिआनि धिआनि मैलु चुकाइआ ॥ हरि सरि तीरथि जाणि मनूआ नाइआ ॥ सबदि मरै मनु मारि धंनु जणेदी माइआ ॥ दरि सचै सचिआरु सचा आइआ ॥ पुछि न सकै कोइ जां खसमै भाइआ ॥ नानक सचु सलाहि लिखिआ पाइआ ॥१८॥

सलोक मः १ ॥
कुलहां देंदे बावले लैंदे वडे निलज ॥ चूहा खड न मावई तिकलि बंन्है छज ॥ देन्हि दुआई से मरहि जिन कउ देनि सि जाहि ॥ नानक हुकमु न जापई किथै जाइ समाहि ॥ फसलि अहाड़ी एकु नामु सावणी सचु नाउ ॥ मै महदूदु लिखाइआ खसमै कै दरि जाइ ॥ दुनीआ के दर केतड़े केते आवहि जांहि ॥ केते मंगहि मंगते केते मंगि मंगि जाहि ॥१॥

मः १ ॥
सउ मणु हसती घिउ गुड़ु खावै पंजि सै दाणा खाइ ॥ डकै फूकै खेह उडावै साहि गइऐ पछुताइ ॥ अंधी फूकि मुई देवानी ॥ खसमि मिटी फिरि भानी ॥ अधु गुल्हा चिड़ी का चुगणु गैणि चड़ी बिललाइ ॥ खसमै भावै ओहा चंगी जि करे खुदाइ खुदाइ ॥ सकता सीहु मारे सै मिरिआ सभ पिछै पै खाइ ॥ होइ सताणा घुरै न मावै साहि गइऐ पछुताइ ॥ अंधा किस नो बुकि सुणावै ॥ खसमै मूलि न भावै ॥ अक सिउ प्रीति करे अक तिडा अक डाली बहि खाइ ॥ खसमै भावै ओहो चंगा जि करे खुदाइ खुदाइ ॥ नानक दुनीआ चारि दिहाड़े सुखि कीतै दुखु होई ॥ गला वाले हैनि घणेरे छडि न सकै कोई ॥ मखीं मिठै मरणा ॥ जिन तू रखहि तिन नेड़ि न आवै तिन भउ सागरु तरणा ॥२॥

पउड़ी ॥
अगम अगोचरु तू धणी सचा अलख अपारु ॥ तू दाता सभि मंगते इको देवणहारु ॥ जिनी सेविआ तिनी सुखु पाइआ गुरमती वीचारु ॥ इकना नो तुधु एवै भावदा माइआ नालि पिआरु ॥ गुर कै सबदि सलाहीऐ अंतरि प्रेम पिआरु ॥ विणु प्रीती भगति न होवई विणु सतिगुर न लगै पिआरु ॥ तू प्रभु सभि तुधु सेवदे इक ढाढी करे पुकार ॥ देहि दानु संतोखीआ सचा नामु मिलै आधारु ॥१९॥

सलोक मः १ ॥
राती कालु घटै दिनि कालु ॥ छिजै काइआ होइ परालु ॥ वरतणि वरतिआ सरब जंजालु ॥ भुलिआ चुकि गइआ तप तालु ॥ अंधा झखि झखि पइआ झेरि ॥ पिछै रोवहि लिआवहि फेरि ॥ बिनु बूझे किछु सूझै नाही ॥ मोइआ रोंहि रोंदे मरि जांहीं ॥ नानक खसमै एवै भावै ॥ सेई मुए जिन चिति न आवै ॥१॥

मः १ ॥
मुआ पिआरु प्रीति मुई मुआ वैरु वादी ॥ वंनु गइआ रूपु विणसिआ दुखी देह रुली ॥ किथहु आइआ कह गइआ किहु न सीओ किहु सी ॥ मनि मुखि गला गोईआ कीता चाउ रली ॥ नानक सचे नाम बिनु सिर खुर पति पाटी ॥२॥

पउड़ी ॥
अम्रित नामु सदा सुखदाता अंते होइ सखाई ॥ बाझु गुरू जगतु बउराना नावै सार न पाई ॥ सतिगुरु सेवहि से परवाणु जिन्ह जोती जोति मिलाई ॥ सो साहिबु सो सेवकु तेहा जिसु भाणा मंनि वसाई ॥ आपणै भाणै कहु किनि सुखु पाइआ अंधा अंधु कमाई ॥ बिखिआ कदे ही रजै नाही मूरख भुख न जाई ॥ दूजै सभु को लगि विगुता बिनु सतिगुर बूझ न पाई ॥ सतिगुरु सेवे सो सुखु पाए जिस नो किरपा करे रजाई ॥२०॥

सलोक मः १ ॥
सरमु धरमु दुइ नानका जे धनु पलै पाइ ॥ सो धनु मित्रु न कांढीऐ जितु सिरि चोटां खाइ ॥ जिन कै पलै धनु वसै तिन का नाउ फकीर ॥ जिन्ह कै हिरदै तू वसहि ते नर गुणी गहीर ॥१॥

मः १ ॥
दुखी दुनी सहेड़ीऐ जाइ त लगहि दुख ॥ नानक सचे नाम बिनु किसै न लथी भुख ॥ रूपी भुख न उतरै जां देखां तां भुख ॥ जेते रस सरीर के तेते लगहि दुख ॥२॥

मः १ ॥
अंधी कमी अंधु मनु मनि अंधै तनु अंधु ॥ चिकड़ि लाइऐ किआ थीऐ जां तुटै पथर बंधु ॥ बंधु तुटा बेड़ी नही ना तुलहा ना हाथ ॥ नानक सचे नाम विणु केते डुबे साथ ॥३॥

मः १ ॥
लख मण सुइना लख मण रुपा लख साहा सिरि साह ॥ लख लसकर लख वाजे नेजे लखी घोड़ी पातिसाह ॥ जिथै साइरु लंघणा अगनि पाणी असगाह ॥ कंधी दिसि न आवई धाही पवै कहाह ॥ नानक ओथै जाणीअहि साह केई पातिसाह ॥४॥

पउड़ी ॥
इकन्हा गलीं जंजीर बंदि रबाणीऐ ॥ बधे छुटहि सचि सचु पछाणीऐ ॥ लिखिआ पलै पाइ सो सचु जाणीऐ ॥ हुकमी होइ निबेड़ु गइआ जाणीऐ ॥ भउजल तारणहारु सबदि पछाणीऐ ॥ चोर जार जूआर पीड़े घाणीऐ ॥ निंदक लाइतबार मिले हड़्हवाणीऐ ॥ गुरमुखि सचि समाइ सु दरगह जाणीऐ ॥२१॥

सलोक मः २ ॥
नाउ फकीरै पातिसाहु मूरख पंडितु नाउ ॥ अंधे का नाउ पारखू एवै करे गुआउ ॥ इलति का नाउ चउधरी कूड़ी पूरे थाउ ॥ नानक गुरमुखि जाणीऐ कलि का एहु निआउ ॥१॥

मः १ ॥
हरणां बाजां तै सिकदारां एन्हा पड़्हिआ नाउ ॥ फांधी लगी जाति फहाइनि अगै नाही थाउ ॥ सो पड़िआ सो पंडितु बीना जिन्ही कमाणा नाउ ॥ पहिलो दे जड़ अंदरि जमै ता उपरि होवै छांउ ॥ राजे सीह मुकदम कुते ॥ जाइ जगाइन्हि बैठे सुते ॥ चाकर नहदा पाइन्हि घाउ ॥ रतु पितु कुतिहो चटि जाहु ॥ जिथै जीआं होसी सार ॥ नकीं वढीं लाइतबार ॥२॥

पउड़ी ॥
आपि उपाए मेदनी आपे करदा सार ॥ भै बिनु भरमु न कटीऐ नामि न लगै पिआरु ॥ सतिगुर ते भउ ऊपजै पाईऐ मोख दुआर ॥ भै ते सहजु पाईऐ मिलि जोती जोति अपार ॥ भै ते भैजलु लंघीऐ गुरमती वीचारु ॥ भै ते निरभउ पाईऐ जिस दा अंतु न पारावारु ॥ मनमुख भै की सार न जाणनी त्रिसना जलते करहि पुकार ॥ नानक नावै ही ते सुखु पाइआ गुरमती उरि धार ॥२२॥

सलोक मः १ ॥
रूपै कामै दोसती भुखै सादै गंढु ॥ लबै मालै घुलि मिलि मिचलि ऊंघै सउड़ि पलंघु ॥ भंउकै कोपु खुआरु होइ फकड़ु पिटे अंधु ॥ चुपै चंगा नानका विणु नावै मुहि गंधु ॥१॥

मः १ ॥
राजु मालु रूपु जाति जोबनु पंजे ठग ॥ एनी ठगीं जगु ठगिआ किनै न रखी लज ॥ एना ठगन्हि ठग से जि गुर की पैरी पाहि ॥ नानक करमा बाहरे होरि केते मुठे जाहि ॥२॥

पउड़ी ॥
पड़िआ लेखेदारु लेखा मंगीऐ ॥ विणु नावै कूड़िआरु अउखा तंगीऐ ॥ अउघट रुधे राह गलीआं रोकीआं ॥ सचा वेपरवाहु सबदि संतोखीआं ॥ गहिर गभीर अथाहु हाथ न लभई ॥ मुहे मुहि चोटा खाहु विणु गुर कोइ न छुटसी ॥ पति सेती घरि जाहु नामु वखाणीऐ ॥ हुकमी साह गिराह देंदा जाणीऐ ॥२३॥

सलोक मः १ ॥
पउणै पाणी अगनी जीउ तिन किआ खुसीआ किआ पीड़ ॥ धरती पाताली आकासी इकि दरि रहनि वजीर ॥ इकना वडी आरजा इकि मरि होहि जहीर ॥ इकि दे खाहि निखुटै नाही इकि सदा फिरहि फकीर ॥ हुकमी साजे हुकमी ढाहे एक चसे महि लख ॥ सभु को नथै नथिआ बखसे तोड़े नथ ॥ वरना चिहना बाहरा लेखे बाझु अलखु ॥ किउ कथीऐ किउ आखीऐ जापै सचो सचु ॥ करणा कथना कार सभ नानक आपि अकथु ॥ अकथ की कथा सुणेइ ॥ रिधि बुधि सिधि गिआनु सदा सुखु होइ ॥१॥

मः १ ॥
अजरु जरै त नउ कुल बंधु ॥ पूजै प्राण होवै थिरु कंधु ॥ कहां ते आइआ कहां एहु जाणु ॥ जीवत मरत रहै परवाणु ॥ हुकमै बूझै ततु पछाणै ॥ इहु परसादु गुरू ते जाणै ॥ होंदा फड़ीअगु नानक जाणु ॥ ना हउ ना मै जूनी पाणु ॥२॥

पउड़ी ॥
पड़्हीऐ नामु सालाह होरि बुधीं मिथिआ ॥ बिनु सचे वापार जनमु बिरथिआ ॥ अंतु न पारावारु न किन ही पाइआ ॥ सभु जगु गरबि गुबारु तिन सचु न भाइआ ॥ चले नामु विसारि तावणि ततिआ ॥ बलदी अंदरि तेलु दुबिधा घतिआ ॥ आइआ उठी खेलु फिरै उवतिआ ॥ नानक सचै मेलु सचै रतिआ ॥२४॥

सलोक मः १ ॥
पहिलां मासहु निमिआ मासै अंदरि वासु ॥ जीउ पाइ मासु मुहि मिलिआ हडु चमु तनु मासु ॥ मासहु बाहरि कढिआ ममा मासु गिरासु ॥ मुहु मासै का जीभ मासै की मासै अंदरि सासु ॥ वडा होआ वीआहिआ घरि लै आइआ मासु ॥ मासहु ही मासु ऊपजै मासहु सभो साकु ॥ सतिगुरि मिलिऐ हुकमु बुझीऐ तां को आवै रासि ॥ आपि छुटे नह छूटीऐ नानक बचनि बिणासु ॥१॥

मः १ ॥
मासु मासु करि मूरखु झगड़े गिआनु धिआनु नही जाणै ॥ कउणु मासु कउणु सागु कहावै किसु महि पाप समाणे ॥ गैंडा मारि होम जग कीए देवतिआ की बाणे ॥ मासु छोडि बैसि नकु पकड़हि राती माणस खाणे ॥ फड़ु करि लोकां नो दिखलावहि गिआनु धिआनु नही सूझै ॥ नानक अंधे सिउ किआ कहीऐ कहै न कहिआ बूझै ॥ अंधा सोइ जि अंधु कमावै तिसु रिदै सि लोचन नाही ॥ मात पिता की रकतु निपंने मछी मासु न खांही ॥ इसत्री पुरखै जां निसि मेला ओथै मंधु कमाही ॥ मासहु निमे मासहु जमे हम मासै के भांडे ॥ गिआनु धिआनु कछु सूझै नाही चतुरु कहावै पांडे ॥ बाहर का मासु मंदा सुआमी घर का मासु चंगेरा ॥ जीअ जंत सभि मासहु होए जीइ लइआ वासेरा ॥ अभखु भखहि भखु तजि छोडहि अंधु गुरू जिन केरा ॥ मासहु निमे मासहु जमे हम मासै के भांडे ॥ गिआनु धिआनु कछु सूझै नाही चतुरु कहावै पांडे ॥ मासु पुराणी मासु कतेबीं चहु जुगि मासु कमाणा ॥ जजि काजि वीआहि सुहावै ओथै मासु समाणा ॥ इसत्री पुरख निपजहि मासहु पातिसाह सुलतानां ॥ जे ओइ दिसहि नरकि जांदे तां उन्ह का दानु न लैणा ॥ देंदा नरकि सुरगि लैदे देखहु एहु धिङाणा ॥ आपि न बूझै लोक बुझाए पांडे खरा सिआणा ॥ पांडे तू जाणै ही नाही किथहु मासु उपंना ॥ तोइअहु अंनु कमादु कपाहां तोइअहु त्रिभवणु गंना ॥ तोआ आखै हउ बहु बिधि हछा तोऐ बहुतु बिकारा ॥ एते रस छोडि होवै संनिआसी नानकु कहै विचारा ॥२॥

पउड़ी ॥
हउ किआ आखा इक जीभ तेरा अंतु न किन ही पाइआ ॥ सचा सबदु वीचारि से तुझ ही माहि समाइआ ॥ इकि भगवा वेसु करि भरमदे विणु सतिगुर किनै न पाइआ ॥ देस दिसंतर भवि थके तुधु अंदरि आपु लुकाइआ ॥ गुर का सबदु रतंनु है करि चानणु आपि दिखाइआ ॥ आपणा आपु पछाणिआ गुरमती सचि समाइआ ॥ आवा गउणु बजारीआ बाजारु जिनी रचाइआ ॥ इकु थिरु सचा सालाहणा जिन मनि सचा भाइआ ॥२५॥

सलोक मः १ ॥
नानक माइआ करम बिरखु फल अम्रित फल विसु ॥ सभ कारण करता करे जिसु खवाले तिसु ॥१॥

मः २ ॥
नानक दुनीआ कीआं वडिआईआं अगी सेती जालि ॥ एनी जलीईं नामु विसारिआ इक न चलीआ नालि ॥२॥

पउड़ी ॥
सिरि सिरि होइ निबेड़ु हुकमि चलाइआ ॥ तेरै हथि निबेड़ु तूहै मनि भाइआ ॥ कालु चलाए बंनि कोइ न रखसी ॥ जरु जरवाणा कंन्हि चड़िआ नचसी ॥ सतिगुरु बोहिथु बेड़ु सचा रखसी ॥ अगनि भखै भड़हाड़ु अनदिनु भखसी ॥ फाथा चुगै चोग हुकमी छुटसी ॥ करता करे सु होगु कूड़ु निखुटसी ॥२६॥

सलोक मः १ ॥
घर महि घरु देखाइ देइ सो सतिगुरु पुरखु सुजाणु ॥ पंच सबद धुनिकार धुनि तह बाजै सबदु नीसाणु ॥ दीप लोअ पाताल तह खंड मंडल हैरानु ॥ तार घोर बाजिंत्र तह साचि तखति सुलतानु ॥ सुखमन कै घरि रागु सुनि सुंनि मंडलि लिव लाइ ॥ अकथ कथा बीचारीऐ मनसा मनहि समाइ ॥ उलटि कमलु अम्रिति भरिआ इहु मनु कतहु न जाइ ॥ अजपा जापु न वीसरै आदि जुगादि समाइ ॥ सभि सखीआ पंचे मिले गुरमुखि निज घरि वासु ॥ सबदु खोजि इहु घरु लहै नानकु ता का दासु ॥१॥

मः १ ॥
चिलिमिलि बिसीआर दुनीआ फानी ॥ कालूबि अकल मन गोर न मानी ॥ मन कमीन कमतरीन तू दरीआउ खुदाइआ ॥ एकु चीजु मुझै देहि अवर जहर चीज न भाइआ ॥ पुराब खाम कूजै हिकमति खुदाइआ ॥ मन तुआना तू कुदरती आइआ ॥ सग नानक दीबान मसताना नित चड़ै सवाइआ ॥ आतस दुनीआ खुनक नामु खुदाइआ ॥२॥

पउड़ी नवी मः ५ ॥
सभो वरतै चलतु चलतु वखाणिआ ॥ पारब्रहमु परमेसरु गुरमुखि जाणिआ ॥ लथे सभि विकार सबदि नीसाणिआ ॥ साधू संगि उधारु भए निकाणिआ ॥ सिमरि सिमरि दातारु सभि रंग माणिआ ॥ परगटु भइआ संसारि मिहर छावाणिआ ॥ आपे बखसि मिलाए सद कुरबाणिआ ॥ नानक लए मिलाइ खसमै भाणिआ ॥२७॥

सलोक मः १ ॥
धंनु सु कागदु कलम धंनु धनु भांडा धनु मसु ॥ धनु लेखारी नानका जिनि नामु लिखाइआ सचु ॥१॥

मः १ ॥
आपे पटी कलम आपि उपरि लेखु भि तूं ॥ एको कहीऐ नानका दूजा काहे कू ॥२॥

पउड़ी ॥
तूं आपे आपि वरतदा आपि बणत बणाई ॥ तुधु बिनु दूजा को नही तू रहिआ समाई ॥ तेरी गति मिति तूहै जाणदा तुधु कीमति पाई ॥ तू अलख अगोचरु अगमु है गुरमति दिखाई ॥ अंतरि अगिआनु दुखु भरमु है गुर गिआनि गवाई ॥ जिसु क्रिपा करहि तिसु मेलि लैहि सो नामु धिआई ॥ तू करता पुरखु अगमु है रविआ सभ ठाई ॥ जितु तू लाइहि सचिआ तितु को लगै नानक गुण गाई ॥२८॥१॥ सुधु


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