मारू की वार डखणे (महला 5), Maaroo ki vaar dakhne (Mahalla 5) Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


मारू वार महला ५ डखणे मः ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

तू चउ सजण मैडिआ डेई सिसु उतारि ॥ नैण महिंजे तरसदे कदि पसी दीदारु ॥१॥

मः ५ ॥
नीहु महिंजा तऊ नालि बिआ नेह कूड़ावे डेखु ॥ कपड़ भोग डरावणे जिचरु पिरी न डेखु ॥२॥

मः ५ ॥
उठी झालू कंतड़े हउ पसी तउ दीदारु ॥ काजलु हारु तमोल रसु बिनु पसे हभि रस छारु ॥३॥

पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु सचु सचु सभु धारिआ ॥ गुरमुखि कीतो थाटु सिरजि संसारिआ ॥ हरि आगिआ होए बेद पापु पुंनु वीचारिआ ॥ ब्रहमा बिसनु महेसु त्रै गुण बिसथारिआ ॥ नव खंड प्रिथमी साजि हरि रंग सवारिआ ॥ वेकी जंत उपाइ अंतरि कल धारिआ ॥ तेरा अंतु न जाणै कोइ सचु सिरजणहारिआ ॥ तू जाणहि सभ बिधि आपि गुरमुखि निसतारिआ ॥१॥

डखणे मः ५ ॥
जे तू मित्रु असाडड़ा हिक भोरी ना वेछोड़ि ॥ जीउ महिंजा तउ मोहिआ कदि पसी जानी तोहि ॥१॥

मः ५ ॥
दुरजन तू जलु भाहड़ी विछोड़े मरि जाहि ॥ कंता तू सउ सेजड़ी मैडा हभो दुखु उलाहि ॥२॥

मः ५ ॥
दुरजनु दूजा भाउ है वेछोड़ा हउमै रोगु ॥ सजणु सचा पातिसाहु जिसु मिलि कीचै भोगु ॥३॥

पउड़ी ॥
तू अगम दइआलु बेअंतु तेरी कीमति कहै कउणु ॥ तुधु सिरजिआ सभु संसारु तू नाइकु सगल भउण ॥ तेरी कुदरति कोइ न जाणै मेरे ठाकुर सगल रउण ॥ तुधु अपड़ि कोइ न सकै तू अबिनासी जग उधरण ॥ तुधु थापे चारे जुग तू करता सगल धरण ॥ तुधु आवण जाणा कीआ तुधु लेपु न लगै त्रिण ॥ जिसु होवहि आपि दइआलु तिसु लावहि सतिगुर चरण ॥ तू होरतु उपाइ न लभही अबिनासी स्रिसटि करण ॥२॥

डखणे मः ५ ॥
जे तू वतहि अंङणे हभ धरति सुहावी होइ ॥ हिकसु कंतै बाहरी मैडी वात न पुछै कोइ ॥१॥

मः ५ ॥
हभे टोल सुहावणे सहु बैठा अंङणु मलि ॥ पही न वंञै बिरथड़ा जो घरि आवै चलि ॥२॥

मः ५ ॥
सेज विछाई कंत कू कीआ हभु सीगारु ॥ इती मंझि न समावई जे गलि पहिरा हारु ॥३॥

पउड़ी ॥
तू पारब्रहमु परमेसरु जोनि न आवही ॥ तू हुकमी साजहि स्रिसटि साजि समावही ॥ तेरा रूपु न जाई लखिआ किउ तुझहि धिआवही ॥ तू सभ महि वरतहि आपि कुदरति देखावही ॥ तेरी भगति भरे भंडार तोटि न आवही ॥ एहि रतन जवेहर लाल कीम न पावही ॥ जिसु होवहि आपि दइआलु तिसु सतिगुर सेवा लावही ॥ तिसु कदे न आवै तोटि जो हरि गुण गावही ॥३॥

डखणे मः ५ ॥
जा मू पसी हठ मै पिरी महिजै नालि ॥ हभे डुख उलाहिअमु नानक नदरि निहालि ॥१॥

मः ५ ॥
नानक बैठा भखे वाउ लमे सेवहि दरु खड़ा ॥ पिरीए तू जाणु महिजा साउ जोई साई मुहु खड़ा ॥२॥

मः ५ ॥
किआ गालाइओ भूछ पर वेलि न जोहे कंत तू ॥ नानक फुला संदी वाड़ि खिड़िआ हभु संसारु जिउ ॥३॥

पउड़ी ॥
सुघड़ु सुजाणु सरूपु तू सभ महि वरतंता ॥ तू आपे ठाकुरु सेवको आपे पूजंता ॥ दाना बीना आपि तू आपे सतवंता ॥ जती सती प्रभु निरमला मेरे हरि भगवंता ॥ सभु ब्रहम पसारु पसारिओ आपे खेलंता ॥ इहु आवा गवणु रचाइओ करि चोज देखंता ॥ तिसु बाहुड़ि गरभि न पावही जिसु देवहि गुर मंता ॥ जिउ आपि चलावहि तिउ चलदे किछु वसि न जंता ॥४॥

डखणे मः ५ ॥
कुरीए कुरीए वैदिआ तलि गाड़ा महरेरु ॥ वेखे छिटड़ि थीवदो जामि खिसंदो पेरु ॥१॥

मः ५ ॥
सचु जाणै कचु वैदिओ तू आघू आघे सलवे ॥ नानक आतसड़ी मंझि नैणू बिआ ढलि पबणि जिउ जुमिओ ॥२॥

मः ५ ॥
भोरे भोरे रूहड़े सेवेदे आलकु ॥ मुदति पई चिराणीआ फिरि कडू आवै रुति ॥३॥

पउड़ी ॥
तुधु रूपु न रेखिआ जाति तू वरना बाहरा ॥ ए माणस जाणहि दूरि तू वरतहि जाहरा ॥ तू सभि घट भोगहि आपि तुधु लेपु न लाहरा ॥ तू पुरखु अनंदी अनंत सभ जोति समाहरा ॥ तू सभ देवा महि देव बिधाते नरहरा ॥ किआ आराधे जिहवा इक तू अबिनासी अपरपरा ॥ जिसु मेलहि सतिगुरु आपि तिस के सभि कुल तरा ॥ सेवक सभि करदे सेव दरि नानकु जनु तेरा ॥५॥

डखणे मः ५ ॥
गहडड़ड़ा त्रिणि छाइआ गाफल जलिओहु भाहि ॥ जिना भाग मथाहड़ै तिन उसताद पनाहि ॥१॥

मः ५ ॥
नानक पीठा पका साजिआ धरिआ आणि मउजूदु ॥ बाझहु सतिगुर आपणे बैठा झाकु दरूद ॥२॥

मः ५ ॥
नानक भुसरीआ पकाईआ पाईआ थालै माहि ॥ जिनी गुरू मनाइआ रजि रजि सेई खाहि ॥३॥

पउड़ी ॥
तुधु जग महि खेलु रचाइआ विचि हउमै पाईआ ॥ एकु मंदरु पंच चोर हहि नित करहि बुरिआईआ ॥ दस नारी इकु पुरखु करि दसे सादि लोभाईआ ॥ एनि माइआ मोहणी मोहीआ नित फिरहि भरमाईआ ॥ हाठा दोवै कीतीओ सिव सकति वरताईआ ॥ सिव अगै सकती हारिआ एवै हरि भाईआ ॥ इकि विचहु ही तुधु रखिआ जो सतसंगि मिलाईआ ॥ जल विचहु बि्मबु उठालिओ जल माहि समाईआ ॥६॥

डखणे मः ५ ॥
आगाहा कू त्राघि पिछा फेरि न मुहडड़ा ॥ नानक सिझि इवेहा वार बहुड़ि न होवी जनमड़ा ॥१॥

मः ५ ॥
सजणु मैडा चाईआ हभ कही दा मितु ॥ हभे जाणनि आपणा कही न ठाहे चितु ॥२॥

मः ५ ॥
गुझड़ा लधमु लालु मथै ही परगटु थिआ ॥ सोई सुहावा थानु जिथै पिरीए नानक जी तू वुठिआ ॥३॥

पउड़ी ॥
जा तू मेरै वलि है ता किआ मुहछंदा ॥ तुधु सभु किछु मैनो सउपिआ जा तेरा बंदा ॥ लखमी तोटि न आवई खाइ खरचि रहंदा ॥ लख चउरासीह मेदनी सभ सेव करंदा ॥ एह वैरी मित्र सभि कीतिआ नह मंगहि मंदा ॥ लेखा कोइ न पुछई जा हरि बखसंदा ॥ अनंदु भइआ सुखु पाइआ मिलि गुर गोविंदा ॥ सभे काज सवारिऐ जा तुधु भावंदा ॥७॥

डखणे मः ५ ॥
डेखण कू मुसताकु मुखु किजेहा तउ धणी ॥ फिरदा कितै हालि जा डिठमु ता मनु ध्रापिआ ॥१॥

मः ५ ॥
दुखीआ दरद घणे वेदन जाणे तू धणी ॥ जाणा लख भवे पिरी डिखंदो ता जीवसा ॥२॥

मः ५ ॥
ढहदी जाइ करारि वहणि वहंदे मै डिठिआ ॥ सेई रहे अमाण जिना सतिगुरु भेटिआ ॥३॥

पउड़ी ॥
जिसु जन तेरी भुख है तिसु दुखु न विआपै ॥ जिनि जनि गुरमुखि बुझिआ सु चहु कुंडी जापै ॥ जो नरु उस की सरणी परै तिसु क्मबहि पापै ॥ जनम जनम की मलु उतरै गुर धूड़ी नापै ॥ जिनि हरि भाणा मंनिआ तिसु सोगु न संतापै ॥ हरि जीउ तू सभना का मितु है सभि जाणहि आपै ॥ ऐसी सोभा जनै की जेवडु हरि परतापै ॥ सभ अंतरि जन वरताइआ हरि जन ते जापै ॥८॥

डखणे मः ५ ॥
जिना पिछै हउ गई से मै पिछै भी रविआसु ॥ जिना की मै आसड़ी तिना महिजी आस ॥१॥

मः ५ ॥
गिली गिली रोडड़ी भउदी भवि भवि आइ ॥ जो बैठे से फाथिआ उबरे भाग मथाइ ॥२॥

मः ५ ॥
डिठा हभ मझाहि खाली कोइ न जाणीऐ ॥ तै सखी भाग मथाहि जिनी मेरा सजणु राविआ ॥३॥

पउड़ी ॥
हउ ढाढी दरि गुण गावदा जे हरि प्रभ भावै ॥ प्रभु मेरा थिर थावरी होर आवै जावै ॥ सो मंगा दानु गोसाईआ जितु भुख लहि जावै ॥ प्रभ जीउ देवहु दरसनु आपणा जितु ढाढी त्रिपतावै ॥ अरदासि सुणी दातारि प्रभि ढाढी कउ महलि बुलावै ॥ प्रभ देखदिआ दुख भुख गई ढाढी कउ मंगणु चिति न आवै ॥ सभे इछा पूरीआ लगि प्रभ कै पावै ॥ हउ निरगुणु ढाढी बखसिओनु प्रभि पुरखि वेदावै ॥९॥

डखणे मः ५ ॥
जा छुटे ता खाकु तू सुंञी कंतु न जाणही ॥ दुरजन सेती नेहु तू कै गुणि हरि रंगु माणही ॥१॥

मः ५ ॥
नानक जिसु बिनु घड़ी न जीवणा विसरे सरै न बिंद ॥ तिसु सिउ किउ मन रूसीऐ जिसहि हमारी चिंद ॥२॥

मः ५ ॥
रते रंगि पारब्रहम कै मनु तनु अति गुलालु ॥ नानक विणु नावै आलूदिआ जिती होरु खिआलु ॥३॥

पवड़ी ॥
हरि जीउ जा तू मेरा मित्रु है ता किआ मै काड़ा ॥ जिनी ठगी जगु ठगिआ से तुधु मारि निवाड़ा ॥ गुरि भउजलु पारि लंघाइआ जिता पावाड़ा ॥ गुरमती सभि रस भोगदा वडा आखाड़ा ॥ सभि इंद्रीआ वसि करि दितीओ सतवंता साड़ा ॥ जितु लाईअनि तितै लगदीआ नह खिंजोताड़ा ॥ जो इछी सो फलु पाइदा गुरि अंदरि वाड़ा ॥ गुरु नानकु तुठा भाइरहु हरि वसदा नेड़ा ॥१०॥

डखणे मः ५ ॥
जा मूं आवहि चिति तू ता हभे सुख लहाउ ॥ नानक मन ही मंझि रंगावला पिरी तहिजा नाउ ॥१॥

मः ५ ॥
कपड़ भोग विकार ए हभे ही छार ॥ खाकु लोड़ेदा तंनि खे जो रते दीदार ॥२॥

मः ५ ॥
किआ तकहि बिआ पास करि हीअड़े हिकु अधारु ॥ थीउ संतन की रेणु जितु लभी सुख दातारु ॥३॥

पउड़ी ॥
विणु करमा हरि जीउ न पाईऐ बिनु सतिगुर मनूआ न लगै ॥ धरमु धीरा कलि अंदरे इहु पापी मूलि न तगै ॥ अहि करु करे सु अहि करु पाए इक घड़ी मुहतु न लगै ॥ चारे जुग मै सोधिआ विणु संगति अहंकारु न भगै ॥ हउमै मूलि न छुटई विणु साधू सतसंगै ॥ तिचरु थाह न पावई जिचरु साहिब सिउ मन भंगै ॥ जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिसु घरि दीबाणु अभगै ॥ हरि किरपा ते सुखु पाइआ गुर सतिगुर चरणी लगै ॥११॥

डखणे मः ५ ॥
लोड़ीदो हभ जाइ सो मीरा मीरंन सिरि ॥ हठ मंझाहू सो धणी चउदो मुखि अलाइ ॥१॥

मः ५ ॥
माणिकू मोहि माउ डिंना धणी अपाहि ॥ हिआउ महिजा ठंढड़ा मुखहु सचु अलाइ ॥२॥

मः ५ ॥
मू थीआऊ सेज नैणा पिरी विछावणा ॥ जे डेखै हिक वार ता सुख कीमा हू बाहरे ॥३॥

पउड़ी ॥
मनु लोचै हरि मिलण कउ किउ दरसनु पाईआ ॥ मै लख विड़ते साहिबा जे बिंद बोलाईआ ॥ मै चारे कुंडा भालीआ तुधु जेवडु न साईआ ॥ मै दसिहु मारगु संतहो किउ प्रभू मिलाईआ ॥ मनु अरपिहु हउमै तजहु इतु पंथि जुलाईआ ॥ नित सेविहु साहिबु आपणा सतसंगि मिलाईआ ॥ सभे आसा पूरीआ गुर महलि बुलाईआ ॥ तुधु जेवडु होरु न सुझई मेरे मित्र गोसाईआ ॥१२॥

डखणे मः ५ ॥
मू थीआऊ तखतु पिरी महिंजे पातिसाह ॥ पाव मिलावे कोलि कवल जिवै बिगसावदो ॥१॥

मः ५ ॥
पिरीआ संदड़ी भुख मू लावण थी विथरा ॥ जाणु मिठाई इख बेई पीड़े ना हुटै ॥२॥

मः ५ ॥
ठगा नीहु मत्रोड़ि जाणु गंध्रबा नगरी ॥ सुख घटाऊ डूइ इसु पंधाणू घर घणे ॥३॥

पउड़ी ॥
अकल कला नह पाईऐ प्रभु अलख अलेखं ॥ खटु दरसन भ्रमते फिरहि नह मिलीऐ भेखं ॥ वरत करहि चंद्राइणा से कितै न लेखं ॥ बेद पड़हि स्मपूरना ततु सार न पेखं ॥ तिलकु कढहि इसनानु करि अंतरि कालेखं ॥ भेखी प्रभू न लभई विणु सची सिखं ॥ भूला मारगि सो पवै जिसु धुरि मसतकि लेखं ॥ तिनि जनमु सवारिआ आपणा जिनि गुरु अखी देखं ॥१३॥

डखणे मः ५ ॥
सो निवाहू गडि जो चलाऊ न थीऐ ॥ कार कूड़ावी छडि समलु सचु धणी ॥१॥

मः ५ ॥
हभ समाणी जोति जिउ जल घटाऊ चंद्रमा ॥ परगटु थीआ आपि नानक मसतकि लिखिआ ॥२॥

मः ५ ॥
मुख सुहावे नामु चउ आठ पहर गुण गाउ ॥ नानक दरगह मंनीअहि मिली निथावे थाउ ॥३॥

पउड़ी ॥
बाहर भेखि न पाईऐ प्रभु अंतरजामी ॥ इकसु हरि जीउ बाहरी सभ फिरै निकामी ॥ मनु रता कुट्मब सिउ नित गरबि फिरामी ॥ फिरहि गुमानी जग महि किआ गरबहि दामी ॥ चलदिआ नालि न चलई खिन जाइ बिलामी ॥ बिचरदे फिरहि संसार महि हरि जी हुकामी ॥ करमु खुला गुरु पाइआ हरि मिलिआ सुआमी ॥ जो जनु हरि का सेवको हरि तिस की कामी ॥१४॥

डखणे मः ५ ॥
मुखहु अलाए हभ मरणु पछाणंदो कोइ ॥ नानक तिना खाकु जिना यकीना हिक सिउ ॥१॥

मः ५ ॥
जाणु वसंदो मंझि पछाणू को हेकड़ो ॥ तै तनि पड़दा नाहि नानक जै गुरु भेटिआ ॥२॥

मः ५ ॥
मतड़ी कांढकु आह पाव धोवंदो पीवसा ॥ मू तनि प्रेमु अथाह पसण कू सचा धणी ॥३॥

पउड़ी ॥
निरभउ नामु विसारिआ नालि माइआ रचा ॥ आवै जाइ भवाईऐ बहु जोनी नचा ॥ बचनु करे तै खिसकि जाइ बोले सभु कचा ॥ अंदरहु थोथा कूड़िआरु कूड़ी सभ खचा ॥ वैरु करे निरवैर नालि झूठे लालचा ॥ मारिआ सचै पातिसाहि वेखि धुरि करमचा ॥ जमदूती है हेरिआ दुख ही महि पचा ॥ होआ तपावसु धरम का नानक दरि सचा ॥१५॥

डखणे मः ५ ॥
परभाते प्रभ नामु जपि गुर के चरण धिआइ ॥ जनम मरण मलु उतरै सचे के गुण गाइ ॥१॥

मः ५ ॥
देह अंधारी अंधु सुंञी नाम विहूणीआ ॥ नानक सफल जनमु जै घटि वुठा सचु धणी ॥२॥

मः ५ ॥
लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥ नानक से अखड़ीआ बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥३॥

पउड़ी ॥
जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि सुख पाई ॥ ओहु आपि तरिआ कुट्मब सिउ सभु जगतु तराई ॥ ओनि हरि नामा धनु संचिआ सभ तिखा बुझाई ॥ ओनि छडे लालच दुनी के अंतरि लिव लाई ॥ ओसु सदा सदा घरि अनंदु है हरि सखा सहाई ॥ ओनि वैरी मित्र सम कीतिआ सभ नालि सुभाई ॥ होआ ओही अलु जग महि गुर गिआनु जपाई ॥ पूरबि लिखिआ पाइआ हरि सिउ बणि आई ॥१६॥

डखणे मः ५ ॥
सचु सुहावा काढीऐ कूड़ै कूड़ी सोइ ॥ नानक विरले जाणीअहि जिन सचु पलै होइ ॥१॥

मः ५ ॥
सजण मुखु अनूपु अठे पहर निहालसा ॥ सुतड़ी सो सहु डिठु तै सुपने हउ खंनीऐ ॥२॥

मः ५ ॥
सजण सचु परखि मुखि अलावणु थोथरा ॥ मंन मझाहू लखि तुधहु दूरि न सु पिरी ॥३॥

पउड़ी ॥
धरति आकासु पातालु है चंदु सूरु बिनासी ॥ बादिसाह साह उमराव खान ढाहि डेरे जासी ॥ रंग तुंग गरीब मसत सभु लोकु सिधासी ॥ काजी सेख मसाइका सभे उठि जासी ॥ पीर पैकाबर अउलीए को थिरु न रहासी ॥ रोजा बाग निवाज कतेब विणु बुझे सभ जासी ॥ लख चउरासीह मेदनी सभ आवै जासी ॥ निहचलु सचु खुदाइ एकु खुदाइ बंदा अबिनासी ॥१७॥

डखणे मः ५ ॥
डिठी हभ ढंढोलि हिकसु बाझु न कोइ ॥ आउ सजण तू मुखि लगु मेरा तनु मनु ठंढा होइ ॥१॥

मः ५ ॥
आसकु आसा बाहरा मू मनि वडी आस ॥ आस निरासा हिकु तू हउ बलि बलि बलि गईआस ॥२॥

मः ५ ॥
विछोड़ा सुणे डुखु विणु डिठे मरिओदि ॥ बाझु पिआरे आपणे बिरही ना धीरोदि ॥३॥

पउड़ी ॥
तट तीरथ देव देवालिआ केदारु मथुरा कासी ॥ कोटि तेतीसा देवते सणु इंद्रै जासी ॥ सिम्रिति सासत्र बेद चारि खटु दरस समासी ॥ पोथी पंडित गीत कवित कवते भी जासी ॥ जती सती संनिआसीआ सभि कालै वासी ॥ मुनि जोगी दिग्मबरा जमै सणु जासी ॥ जो दीसै सो विणसणा सभ बिनसि बिनासी ॥ थिरु पारब्रहमु परमेसरो सेवकु थिरु होसी ॥१८॥

सलोक डखणे मः ५ ॥
सै नंगे नह नंग भुखे लख न भुखिआ ॥ डुखे कोड़ि न डुख नानक पिरी पिखंदो सुभ दिसटि ॥१॥

मः ५ ॥
सुख समूहा भोग भूमि सबाई को धणी ॥ नानक हभो रोगु मिरतक नाम विहूणिआ ॥२॥

मः ५ ॥
हिकस कूं तू आहि पछाणू भी हिकु करि ॥ नानक आसड़ी निबाहि मानुख परथाई लजीवदो ॥३॥

पउड़ी ॥
निहचलु एकु नराइणो हरि अगम अगाधा ॥ निहचलु नामु निधानु है जिसु सिमरत हरि लाधा ॥ निहचलु कीरतनु गुण गोबिंद गुरमुखि गावाधा ॥ सचु धरमु तपु निहचलो दिनु रैनि अराधा ॥ दइआ धरमु तपु निहचलो जिसु करमि लिखाधा ॥ निहचलु मसतकि लेखु लिखिआ सो टलै न टलाधा ॥ निहचल संगति साध जन बचन निहचलु गुर साधा ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सदा सदा आराधा ॥१९॥

सलोक डखणे मः ५ ॥
जो डुबंदो आपि सो तराए किन्ह खे ॥ तारेदड़ो भी तारि नानक पिर सिउ रतिआ ॥१॥

मः ५ ॥
जिथै कोइ कथंनि नाउ सुणंदो मा पिरी ॥ मूं जुलाऊं तथि नानक पिरी पसंदो हरिओ थीओसि ॥२॥

मः ५ ॥
मेरी मेरी किआ करहि पुत्र कलत्र सनेह ॥ नानक नाम विहूणीआ निमुणीआदी देह ॥३॥

पउड़ी ॥
नैनी देखउ गुर दरसनो गुर चरणी मथा ॥ पैरी मारगि गुर चलदा पखा फेरी हथा ॥ अकाल मूरति रिदै धिआइदा दिनु रैनि जपंथा ॥ मै छडिआ सगल अपाइणो भरवासै गुर समरथा ॥ गुरि बखसिआ नामु निधानु सभो दुखु लथा ॥ भोगहु भुंचहु भाईहो पलै नामु अगथा ॥ नामु दानु इसनानु दिड़ु सदा करहु गुर कथा ॥ सहजु भइआ प्रभु पाइआ जम का भउ लथा ॥२०॥

सलोक डखणे मः ५ ॥
लगड़ीआ पिरीअंनि पेखंदीआ ना तिपीआ ॥ हभ मझाहू सो धणी बिआ न डिठो कोइ ॥१॥

मः ५ ॥
कथड़ीआ संताह ते सुखाऊ पंधीआ ॥ नानक लधड़ीआ तिंनाह जिना भागु मथाहड़ै ॥२॥

मः ५ ॥
डूंगरि जला थला भूमि बना फल कंदरा ॥ पाताला आकास पूरनु हभ घटा ॥ नानक पेखि जीओ इकतु सूति परोतीआ ॥३॥

पउड़ी ॥
हरि जी माता हरि जी पिता हरि जीउ प्रतिपालक ॥ हरि जी मेरी सार करे हम हरि के बालक ॥ सहजे सहजि खिलाइदा नही करदा आलक ॥ अउगणु को न चितारदा गल सेती लाइक ॥ मुहि मंगां सोई देवदा हरि पिता सुखदाइक ॥ गिआनु रासि नामु धनु सउपिओनु इसु सउदे लाइक ॥ साझी गुर नालि बहालिआ सरब सुख पाइक ॥ मै नालहु कदे न विछुड़ै हरि पिता सभना गला लाइक ॥२१॥

सलोक डखणे मः ५ ॥
नानक कचड़िआ सिउ तोड़ि ढूढि सजण संत पकिआ ॥ ओइ जीवंदे विछुड़हि ओइ मुइआ न जाही छोड़ि ॥१॥

मः ५ ॥
नानक बिजुलीआ चमकंनि घुरन्हि घटा अति कालीआ ॥ बरसनि मेघ अपार नानक संगमि पिरी सुहंदीआ ॥२॥

मः ५ ॥
जल थल नीरि भरे सीतल पवण झुलारदे ॥ सेजड़ीआ सोइंन हीरे लाल जड़ंदीआ ॥ सुभर कपड़ भोग नानक पिरी विहूणी ततीआ ॥३॥

पउड़ी ॥
कारणु करतै जो कीआ सोई है करणा ॥ जे सउ धावहि प्राणीआ पावहि धुरि लहणा ॥ बिनु करमा किछू न लभई जे फिरहि सभ धरणा ॥ गुर मिलि भउ गोविंद का भै डरु दूरि करणा ॥ भै ते बैरागु ऊपजै हरि खोजत फिरणा ॥ खोजत खोजत सहजु उपजिआ फिरि जनमि न मरणा ॥ हिआइ कमाइ धिआइआ पाइआ साध सरणा ॥ बोहिथु नानक देउ गुरु जिसु हरि चड़ाए तिसु भउजलु तरणा ॥२२॥

सलोक मः ५ ॥
पहिला मरणु कबूलि जीवण की छडि आस ॥ होहु सभना की रेणुका तउ आउ हमारै पासि ॥१॥

मः ५ ॥
मुआ जीवंदा पेखु जीवंदे मरि जानि ॥ जिन्हा मुहबति इक सिउ ते माणस परधान ॥२॥

मः ५ ॥
जिसु मनि वसै पारब्रहमु निकटि न आवै पीर ॥ भुख तिख तिसु न विआपई जमु नही आवै नीर ॥३॥

पउड़ी ॥
कीमति कहणु न जाईऐ सचु साह अडोलै ॥ सिध साधिक गिआनी धिआनीआ कउणु तुधुनो तोलै ॥ भंनण घड़ण समरथु है ओपति सभ परलै ॥ करण कारण समरथु है घटि घटि सभ बोलै ॥ रिजकु समाहे सभसै किआ माणसु डोलै ॥ गहिर गभीरु अथाहु तू गुण गिआन अमोलै ॥ सोई कमु कमावणा कीआ धुरि मउलै ॥ तुधहु बाहरि किछु नही नानकु गुण बोलै ॥२३॥१॥२॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates