गउड़ी की वार (महला 4), Gauri ki vaar (Mahalla 4) Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


गउड़ी की वार महला ४ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

सलोक मः ४ ॥
सतिगुरु पुरखु दइआलु है जिस नो समतु सभु कोइ ॥ एक द्रिसटि करि देखदा मन भावनी ते सिधि होइ ॥ सतिगुर विचि अम्रितु है हरि उतमु हरि पदु सोइ ॥ नानक किरपा ते हरि धिआईऐ गुरमुखि पावै कोइ ॥१॥

मः ४ ॥
हउमै माइआ सभ बिखु है नित जगि तोटा संसारि ॥ लाहा हरि धनु खटिआ गुरमुखि सबदु वीचारि ॥ हउमै मैलु बिखु उतरै हरि अम्रितु हरि उर धारि ॥ सभि कारज तिन के सिधि हहि जिन गुरमुखि किरपा धारि ॥ नानक जो धुरि मिले से मिलि रहे हरि मेले सिरजणहारि ॥२॥

पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचा गोसाई ॥ तुधुनो सभ धिआइदी सभ लगै तेरी पाई ॥ तेरी सिफति सुआलिउ सरूप है जिनि कीती तिसु पारि लघाई ॥ गुरमुखा नो फलु पाइदा सचि नामि समाई ॥ वडे मेरे साहिबा वडी तेरी वडिआई ॥१॥

सलोक मः ४ ॥
विणु नावै होरु सलाहणा सभु बोलणु फिका सादु ॥ मनमुख अहंकारु सलाहदे हउमै ममता वादु ॥ जिन सालाहनि से मरहि खपि जावै सभु अपवादु ॥ जन नानक गुरमुखि उबरे जपि हरि हरि परमानादु ॥१॥

मः ४ ॥
सतिगुर हरि प्रभु दसि नामु धिआई मनि हरी ॥ नानक नामु पवितु हरि मुखि बोली सभि दुख परहरी ॥२॥

पउड़ी ॥
तू आपे आपि निरंकारु है निरंजन हरि राइआ ॥ जिनी तू इक मनि सचु धिआइआ तिन का सभु दुखु गवाइआ ॥ तेरा सरीकु को नाही जिस नो लवै लाइ सुणाइआ ॥ तुधु जेवडु दाता तूहै निरंजना तूहै सचु मेरै मनि भाइआ ॥ सचे मेरे साहिबा सचे सचु नाइआ ॥२॥

सलोक मः ४ ॥
मन अंतरि हउमै रोगु है भ्रमि भूले मनमुख दुरजना ॥ नानक रोगु गवाइ मिलि सतिगुर साधू सजना ॥१॥

मः ४ ॥
मनु तनु रता रंग सिउ गुरमुखि हरि गुणतासु ॥ जन नानक हरि सरणागती हरि मेले गुर साबासि ॥२॥

पउड़ी ॥
तू करता पुरखु अगमु है किसु नालि तू वड़ीऐ ॥ तुधु जेवडु होइ सु आखीऐ तुधु जेहा तूहै पड़ीऐ ॥ तू घटि घटि इकु वरतदा गुरमुखि परगड़ीऐ ॥ तू सचा सभस दा खसमु है सभ दू तू चड़ीऐ ॥ तू करहि सु सचे होइसी ता काइतु कड़ीऐ ॥३॥

सलोक मः ४ ॥
मै मनि तनि प्रेमु पिरम का अठे पहर लगंनि ॥ जन नानक किरपा धारि प्रभ सतिगुर सुखि वसंनि ॥१॥

मः ४ ॥
जिन अंदरि प्रीति पिरम की जिउ बोलनि तिवै सोहंनि ॥ नानक हरि आपे जाणदा जिनि लाई प्रीति पिरंनि ॥२॥

पउड़ी ॥
तू करता आपि अभुलु है भुलण विचि नाही ॥ तू करहि सु सचे भला है गुर सबदि बुझाही ॥ तू करण कारण समरथु है दूजा को नाही ॥ तू साहिबु अगमु दइआलु है सभि तुधु धिआही ॥ सभि जीअ तेरे तू सभस दा तू सभ छडाही ॥४॥

सलोक मः ४ ॥
सुणि साजन प्रेम संदेसरा अखी तार लगंनि ॥ गुरि तुठै सजणु मेलिआ जन नानक सुखि सवंनि ॥१॥

मः ४ ॥
सतिगुरु दाता दइआलु है जिस नो दइआ सदा होइ ॥ सतिगुरु अंदरहु निरवैरु है सभु देखै ब्रहमु इकु सोइ ॥ निरवैरा नालि जि वैरु चलाइदे तिन विचहु तिसटिआ न कोइ ॥ सतिगुरु सभना दा भला मनाइदा तिस दा बुरा किउ होइ ॥ सतिगुर नो जेहा को इछदा तेहा फलु पाए कोइ ॥ नानक करता सभु किछु जाणदा जिदू किछु गुझा न होइ ॥२॥

पउड़ी ॥
जिस नो साहिबु वडा करे सोई वड जाणी ॥ जिसु साहिब भावै तिसु बखसि लए सो साहिब मनि भाणी ॥ जे को ओस दी रीस करे सो मूड़ अजाणी ॥ जिस नो सतिगुरु मेले सु गुण रवै गुण आखि वखाणी ॥ नानक सचा सचु है बुझि सचि समाणी ॥५॥

सलोक मः ४ ॥
हरि सति निरंजन अमरु है निरभउ निरवैरु निरंकारु ॥ जिन जपिआ इक मनि इक चिति तिन लथा हउमै भारु ॥ जिन गुरमुखि हरि आराधिआ तिन संत जना जैकारु ॥ कोई निंदा करे पूरे सतिगुरू की तिस नो फिटु फिटु कहै सभु संसारु ॥ सतिगुर विचि आपि वरतदा हरि आपे रखणहारु ॥ धनु धंनु गुरू गुण गावदा तिस नो सदा सदा नमसकारु ॥ जन नानक तिन कउ वारिआ जिन जपिआ सिरजणहारु ॥१॥

मः ४ ॥
आपे धरती साजीअनु आपे आकासु ॥ विचि आपे जंत उपाइअनु मुखि आपे देइ गिरासु ॥ सभु आपे आपि वरतदा आपे ही गुणतासु ॥ जन नानक नामु धिआइ तू सभि किलविख कटे तासु ॥२॥

पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु सचु है सचु सचे भावै ॥ जो तुधु सचु सलाहदे तिन जम कंकरु नेड़ि न आवै ॥ तिन के मुख दरि उजले जिन हरि हिरदै सचा भावै ॥ कूड़िआर पिछाहा सटीअनि कूड़ु हिरदै कपटु महा दुखु पावै ॥ मुह काले कूड़िआरीआ कूड़िआर कूड़ो होइ जावै ॥६॥

सलोक मः ४ ॥
सतिगुरु धरती धरम है तिसु विचि जेहा को बीजे तेहा फलु पाए ॥ गुरसिखी अम्रितु बीजिआ तिन अम्रित फलु हरि पाए ॥ ओना हलति पलति मुख उजले ओइ हरि दरगह सची पैनाए ॥ इकन्हा अंदरि खोटु नित खोटु कमावहि ओहु जेहा बीजे तेहा फलु खाए ॥ जा सतिगुरु सराफु नदरि करि देखै सुआवगीर सभि उघड़ि आए ॥ ओइ जेहा चितवहि नित तेहा पाइनि ओइ तेहो जेहे दयि वजाए ॥ नानक दुही सिरी खसमु आपे वरतै नित करि करि देखै चलत सबाए ॥१॥

मः ४ ॥
इकु मनु इकु वरतदा जितु लगै सो थाइ पाइ ॥ कोई गला करे घनेरीआ जि घरि वथु होवै साई खाइ ॥ बिनु सतिगुर सोझी ना पवै अहंकारु न विचहु जाइ ॥ अहंकारीआ नो दुख भुख है हथु तडहि घरि घरि मंगाइ ॥ कूड़ु ठगी गुझी ना रहै मुलमा पाजु लहि जाइ ॥ जिसु होवै पूरबि लिखिआ तिसु सतिगुरु मिलै प्रभु आइ ॥ जिउ लोहा पारसि भेटीऐ मिलि संगति सुवरनु होइ जाइ ॥ जन नानक के प्रभ तू धणी जिउ भावै तिवै चलाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
जिन हरि हिरदै सेविआ तिन हरि आपि मिलाए ॥ गुण की साझि तिन सिउ करी सभि अवगण सबदि जलाए ॥ अउगण विकणि पलरी जिसु देहि सु सचे पाए ॥ बलिहारी गुर आपणे जिनि अउगण मेटि गुण परगटीआए ॥ वडी वडिआई वडे की गुरमुखि आलाए ॥७॥

सलोक मः ४ ॥
सतिगुर विचि वडी वडिआई जो अनदिनु हरि हरि नामु धिआवै ॥ हरि हरि नामु रमत सुच संजमु हरि नामे ही त्रिपतावै ॥ हरि नामु ताणु हरि नामु दीबाणु हरि नामो रख करावै ॥ जो चितु लाइ पूजे गुर मूरति सो मन इछे फल पावै ॥ जो निंदा करे सतिगुर पूरे की तिसु करता मार दिवावै ॥ फेरि ओह वेला ओसु हथि न आवै ओहु आपणा बीजिआ आपे खावै ॥ नरकि घोरि मुहि कालै खड़िआ जिउ तसकरु पाइ गलावै ॥ फिरि सतिगुर की सरणी पवै ता उबरै जा हरि हरि नामु धिआवै ॥ हरि बाता आखि सुणाए नानकु हरि करते एवै भावै ॥१॥

मः ४ ॥
पूरे गुर का हुकमु न मंनै ओहु मनमुखु अगिआनु मुठा बिखु माइआ ॥ ओसु अंदरि कूड़ु कूड़ो करि बुझै अणहोदे झगड़े दयि ओस दै गलि पाइआ ॥ ओहु गल फरोसी करे बहुतेरी ओस दा बोलिआ किसै न भाइआ ॥ ओहु घरि घरि हंढै जिउ रंन दोहागणि ओसु नालि मुहु जोड़े ओसु भी लछणु लाइआ ॥ गुरमुखि होइ सु अलिपतो वरतै ओस दा पासु छडि गुर पासि बहि जाइआ ॥ जो गुरु गोपे आपणा सु भला नाही पंचहु ओनि लाहा मूलु सभु गवाइआ ॥ पहिला आगमु निगमु नानकु आखि सुणाए पूरे गुर का बचनु उपरि आइआ ॥ गुरसिखा वडिआई भावै गुर पूरे की मनमुखा ओह वेला हथि न आइआ ॥२॥

पउड़ी ॥
सचु सचा सभ दू वडा है सो लए जिसु सतिगुरु टिके ॥ सो सतिगुरु जि सचु धिआइदा सचु सचा सतिगुरु इके ॥ सोई सतिगुरु पुरखु है जिनि पंजे दूत कीते वसि छिके ॥ जि बिनु सतिगुर सेवे आपु गणाइदे तिन अंदरि कूड़ु फिटु फिटु मुह फिके ॥ ओइ बोले किसै न भावनी मुह काले सतिगुर ते चुके ॥८॥

सलोक मः ४ ॥
हरि प्रभ का सभु खेतु है हरि आपि किरसाणी लाइआ ॥ गुरमुखि बखसि जमाईअनु मनमुखी मूलु गवाइआ ॥ सभु को बीजे आपणे भले नो हरि भावै सो खेतु जमाइआ ॥ गुरसिखी हरि अम्रितु बीजिआ हरि अम्रित नामु फलु अम्रितु पाइआ ॥ जमु चूहा किरस नित कुरकदा हरि करतै मारि कढाइआ ॥ किरसाणी जमी भाउ करि हरि बोहल बखस जमाइआ ॥ तिन का काड़ा अंदेसा सभु लाहिओनु जिनी सतिगुरु पुरखु धिआइआ ॥ जन नानक नामु अराधिआ आपि तरिआ सभु जगतु तराइआ ॥१॥

मः ४ ॥
सारा दिनु लालचि अटिआ मनमुखि होरे गला ॥ राती ऊघै दबिआ नवे सोत सभि ढिला ॥ मनमुखा दै सिरि जोरा अमरु है नित देवहि भला ॥ जोरा दा आखिआ पुरख कमावदे से अपवित अमेध खला ॥ कामि विआपे कुसुध नर से जोरा पुछि चला ॥ सतिगुर कै आखिऐ जो चलै सो सति पुरखु भल भला ॥ जोरा पुरख सभि आपि उपाइअनु हरि खेल सभि खिला ॥ सभ तेरी बणत बणावणी नानक भल भला ॥२॥

पउड़ी ॥
तू वेपरवाहु अथाहु है अतुलु किउ तुलीऐ ॥ से वडभागी जि तुधु धिआइदे जिन सतिगुरु मिलीऐ ॥ सतिगुर की बाणी सति सरूपु है गुरबाणी बणीऐ ॥ सतिगुर की रीसै होरि कचु पिचु बोलदे से कूड़िआर कूड़े झड़ि पड़ीऐ ॥ ओन्हा अंदरि होरु मुखि होरु है बिखु माइआ नो झखि मरदे कड़ीऐ ॥९॥

सलोक मः ४ ॥
सतिगुर की सेवा निरमली निरमल जनु होइ सु सेवा घाले ॥ जिन अंदरि कपटु विकारु झूठु ओइ आपे सचै वखि कढे जजमाले ॥ सचिआर सिख बहि सतिगुर पासि घालनि कूड़िआर न लभनी कितै थाइ भाले ॥ जिना सतिगुर का आखिआ सुखावै नाही तिना मुह भलेरे फिरहि दयि गाले ॥ जिन अंदरि प्रीति नही हरि केरी से किचरकु वेराईअनि मनमुख बेताले ॥ सतिगुर नो मिलै सु आपणा मनु थाइ रखै ओहु आपि वरतै आपणी वथु नाले ॥ जन नानक इकना गुरु मेलि सुखु देवै इकि आपे वखि कढै ठगवाले ॥१॥

मः ४ ॥
जिना अंदरि नामु निधानु हरि तिन के काज दयि आदे रासि ॥ तिन चूकी मुहताजी लोकन की हरि प्रभु अंगु करि बैठा पासि ॥ जां करता वलि ता सभु को वलि सभि दरसनु देखि करहि साबासि ॥ साहु पातिसाहु सभु हरि का कीआ सभि जन कउ आइ करहि रहरासि ॥ गुर पूरे की वडी वडिआई हरि वडा सेवि अतुलु सुखु पाइआ ॥ गुरि पूरै दानु दीआ हरि निहचलु नित बखसे चड़ै सवाइआ ॥ कोई निंदकु वडिआई देखि न सकै सो करतै आपि पचाइआ ॥ जनु नानकु गुण बोलै करते के भगता नो सदा रखदा आइआ ॥२॥

पउड़ी ॥
तू साहिबु अगम दइआलु है वड दाता दाणा ॥ तुधु जेवडु मै होरु को दिसि न आवई तूहैं सुघड़ु मेरै मनि भाणा ॥ मोहु कुट्मबु दिसि आवदा सभु चलणहारा आवण जाणा ॥ जो बिनु सचे होरतु चितु लाइदे से कूड़िआर कूड़ा तिन माणा ॥ नानक सचु धिआइ तू बिनु सचे पचि पचि मुए अजाणा ॥१०॥

सलोक मः ४ ॥
अगो दे सत भाउ न दिचै पिछो दे आखिआ कमि न आवै ॥ अध विचि फिरै मनमुखु वेचारा गली किउ सुखु पावै ॥ जिसु अंदरि प्रीति नही सतिगुर की सु कूड़ी आवै कूड़ी जावै ॥ जे क्रिपा करे मेरा हरि प्रभु करता तां सतिगुरु पारब्रहमु नदरी आवै ॥ ता अपिउ पीवै सबदु गुर केरा सभु काड़ा अंदेसा भरमु चुकावै ॥ सदा अनंदि रहै दिनु राती जन नानक अनदिनु हरि गुण गावै ॥१॥

मः ४ ॥
गुर सतिगुर का जो सिखु अखाए सु भलके उठि हरि नामु धिआवै ॥ उदमु करे भलके परभाती इसनानु करे अम्रित सरि नावै ॥ उपदेसि गुरू हरि हरि जपु जापै सभि किलविख पाप दोख लहि जावै ॥ फिरि चड़ै दिवसु गुरबाणी गावै बहदिआ उठदिआ हरि नामु धिआवै ॥ जो सासि गिरासि धिआए मेरा हरि हरि सो गुरसिखु गुरू मनि भावै ॥ जिस नो दइआलु होवै मेरा सुआमी तिसु गुरसिख गुरू उपदेसु सुणावै ॥ जनु नानकु धूड़ि मंगै तिसु गुरसिख की जो आपि जपै अवरह नामु जपावै ॥२॥

पउड़ी ॥
जो तुधु सचु धिआइदे से विरले थोड़े ॥ जो मनि चिति इकु अराधदे तिन की बरकति खाहि असंख करोड़े ॥ तुधुनो सभ धिआइदी से थाइ पए जो साहिब लोड़े ॥ जो बिनु सतिगुर सेवे खादे पैनदे से मुए मरि जमे कोड़्हे ॥ ओइ हाजरु मिठा बोलदे बाहरि विसु कढहि मुखि घोले ॥ मनि खोटे दयि विछोड़े ॥११॥

सलोक मः ४ ॥
मलु जूई भरिआ नीला काला खिधोलड़ा तिनि वेमुखि वेमुखै नो पाइआ ॥ पासि न देई कोई बहणि जगत महि गूह पड़ि सगवी मलु लाइ मनमुखु आइआ ॥ पराई जो निंदा चुगली नो वेमुखु करि कै भेजिआ ओथै भी मुहु काला दुहा वेमुखा दा कराइआ ॥ तड़ सुणिआ सभतु जगत विचि भाई वेमुखु सणै नफरै पउली पउदी फावा होइ कै उठि घरि आइआ ॥ अगै संगती कुड़मी वेमुखु रलणा न मिलै ता वहुटी भतीजीं फिरि आणि घरि पाइआ ॥ हलतु पलतु दोवै गए नित भुखा कूके तिहाइआ ॥ धनु धनु सुआमी करता पुरखु है जिनि निआउ सचु बहि आपि कराइआ ॥ जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सो साचै मारि पचाइआ ॥ एहु अखरु तिनि आखिआ जिनि जगतु सभु उपाइआ ॥१॥

मः ४ ॥
साहिबु जिस का नंगा भुखा होवै तिस दा नफरु किथहु रजि खाए ॥ जि साहिब कै घरि वथु होवै सु नफरै हथि आवै अणहोदी किथहु पाए ॥ जिस दी सेवा कीती फिरि लेखा मंगीऐ सा सेवा अउखी होई ॥ नानक सेवा करहु हरि गुर सफल दरसन की फिरि लेखा मंगै न कोई ॥२॥

पउड़ी ॥
नानक वीचारहि संत जन चारि वेद कहंदे ॥ भगत मुखै ते बोलदे से वचन होवंदे ॥ प्रगट पहारा जापदा सभि लोक सुणंदे ॥ सुखु न पाइनि मुगध नर संत नालि खहंदे ॥ ओइ लोचनि ओना गुणै नो ओइ अहंकारि सड़ंदे ॥ ओइ विचारे किआ करहि जा भाग धुरि मंदे ॥ जो मारे तिनि पारब्रहमि से किसै न संदे ॥ वैरु करहि निरवैर नालि धरम निआइ पचंदे ॥ जो जो संति सरापिआ से फिरहि भवंदे ॥ पेडु मुंढाहूं कटिआ तिसु डाल सुकंदे ॥१२॥

सलोक मः ४ ॥
अंतरि हरि गुरू धिआइदा वडी वडिआई ॥ तुसि दिती पूरै सतिगुरू घटै नाही इकु तिलु किसै दी घटाई ॥ सचु साहिबु सतिगुरू कै वलि है तां झखि झखि मरै सभ लोकाई ॥ निंदका के मुह काले करे हरि करतै आपि वधाई ॥ जिउ जिउ निंदक निंद करहि तिउ तिउ नित नित चड़ै सवाई ॥ जन नानक हरि आराधिआ तिनि पैरी आणि सभ पाई ॥१॥

मः ४ ॥
सतिगुर सेती गणत जि रखै हलतु पलतु सभु तिस का गइआ ॥ नित झहीआ पाए झगू सुटे झखदा झखदा झड़ि पइआ ॥ नित उपाव करै माइआ धन कारणि अगला धनु भी उडि गइआ ॥ किआ ओहु खटे किआ ओहु खावै जिसु अंदरि सहसा दुखु पइआ ॥ निरवैरै नालि जि वैरु रचाए सभु पापु जगतै का तिनि सिरि लइआ ॥ ओसु अगै पिछै ढोई नाही जिसु अंदरि निंदा मुहि अंबु पइआ ॥ जे सुइने नो ओहु हथु पाए ता खेहू सेती रलि गइआ ॥ जे गुर की सरणी फिरि ओहु आवै ता पिछले अउगण बखसि लइआ ॥ जन नानक अनदिनु नामु धिआइआ हरि सिमरत किलविख पाप गइआ ॥२॥

पउड़ी ॥
तूहै सचा सचु तू सभ दू उपरि तू दीबाणु ॥ जो तुधु सचु धिआइदे सचु सेवनि सचे तेरा माणु ॥ ओना अंदरि सचु मुख उजले सचु बोलनि सचे तेरा ताणु ॥ से भगत जिनी गुरमुखि सालाहिआ सचु सबदु नीसाणु ॥ सचु जि सचे सेवदे तिन वारी सद कुरबाणु ॥१३॥

सलोक मः ४ ॥
धुरि मारे पूरै सतिगुरू सेई हुणि सतिगुरि मारे ॥ जे मेलण नो बहुतेरा लोचीऐ न देई मिलण करतारे ॥ सतसंगति ढोई ना लहनि विचि संगति गुरि वीचारे ॥ कोई जाइ मिलै हुणि ओना नो तिसु मारे जमु जंदारे ॥ गुरि बाबै फिटके से फिटे गुरि अंगदि कीते कूड़िआरे ॥ गुरि तीजी पीड़ी वीचारिआ किआ हथि एना वेचारे ॥ गुरु चउथी पीड़ी टिकिआ तिनि निंदक दुसट सभि तारे ॥ कोई पुतु सिखु सेवा करे सतिगुरू की तिसु कारज सभि सवारे ॥ जो इछै सो फलु पाइसी पुतु धनु लखमी खड़ि मेले हरि निसतारे ॥ सभि निधान सतिगुरू विचि जिसु अंदरि हरि उर धारे ॥ सो पाए पूरा सतिगुरू जिसु लिखिआ लिखतु लिलारे ॥ जनु नानकु मागै धूड़ि तिन जो गुरसिख मित पिआरे ॥१॥

मः ४ ॥
जिन कउ आपि देइ वडिआई जगतु भी आपे आणि तिन कउ पैरी पाए ॥ डरीऐ तां जे किछु आप दू कीचै सभु करता आपणी कला वधाए ॥ देखहु भाई एहु अखाड़ा हरि प्रीतम सचे का जिनि आपणै जोरि सभि आणि निवाए ॥ आपणिआ भगता की रख करे हरि सुआमी निंदका दुसटा के मुह काले कराए ॥ सतिगुर की वडिआई नित चड़ै सवाई हरि कीरति भगति नित आपि कराए ॥ अनदिनु नामु जपहु गुरसिखहु हरि करता सतिगुरु घरी वसाए ॥ सतिगुर की बाणी सति सति करि जाणहु गुरसिखहु हरि करता आपि मुहहु कढाए ॥ गुरसिखा के मुह उजले करे हरि पिआरा गुर का जैकारु संसारि सभतु कराए ॥ जनु नानकु हरि का दासु है हरि दासन की हरि पैज रखाए ॥२॥

पउड़ी ॥
तू सचा साहिबु आपि है सचु साह हमारे ॥ सचु पूजी नामु द्रिड़ाइ प्रभ वणजारे थारे ॥ सचु सेवहि सचु वणंजि लैहि गुण कथह निरारे ॥ सेवक भाइ से जन मिले गुर सबदि सवारे ॥ तू सचा साहिबु अलखु है गुर सबदि लखारे ॥१४॥

सलोक मः ४ ॥
जिसु अंदरि ताति पराई होवै तिस दा कदे न होवी भला ॥ ओस दै आखिऐ कोई न लगै नित ओजाड़ी पूकारे खला ॥ जिसु अंदरि चुगली चुगलो वजै कीता करतिआ ओस दा सभु गइआ ॥ नित चुगली करे अणहोदी पराई मुहु कढि न सकै ओस दा काला भइआ ॥ करम धरती सरीरु कलिजुग विचि जेहा को बीजे तेहा को खाए ॥ गला उपरि तपावसु न होई विसु खाधी ततकाल मरि जाए ॥ भाई वेखहु निआउ सचु करते का जेहा कोई करे तेहा कोई पाए ॥ जन नानक कउ सभ सोझी पाई हरि दर कीआ बाता आखि सुणाए ॥१॥

मः ४ ॥
होदै परतखि गुरू जो विछुड़े तिन कउ दरि ढोई नाही ॥ कोई जाइ मिलै तिन निंदका मुह फिके थुक थुक मुहि पाही ॥ जो सतिगुरि फिटके से सभ जगति फिटके नित भ्मभल भूसे खाही ॥ जिन गुरु गोपिआ आपणा से लैदे ढहा फिराही ॥ तिन की भुख कदे न उतरै नित भुखा भुख कूकाही ॥ ओना दा आखिआ को ना सुणै नित हउले हउलि मराही ॥ सतिगुर की वडिआई वेखि न सकनी ओना अगै पिछै थाउ नाही ॥ जो सतिगुरि मारे तिन जाइ मिलहि रहदी खुहदी सभ पति गवाही ॥ ओइ अगै कुसटी गुर के फिटके जि ओसु मिलै तिसु कुसटु उठाही ॥ हरि तिन का दरसनु ना करहु जो दूजै भाइ चितु लाही ॥ धुरि करतै आपि लिखि पाइआ तिसु नालि किहु चारा नाही ॥ जन नानक नामु अराधि तू तिसु अपड़ि को न सकाही ॥ नावै की वडिआई वडी है नित सवाई चड़ै चड़ाही ॥२॥

मः ४ ॥
जि होंदै गुरू बहि टिकिआ तिसु जन की वडिआई वडी होई ॥ तिसु कउ जगतु निविआ सभु पैरी पइआ जसु वरतिआ लोई ॥ तिस कउ खंड ब्रहमंड नमसकारु करहि जिस कै मसतकि हथु धरिआ गुरि पूरै सो पूरा होई ॥ गुर की वडिआई नित चड़ै सवाई अपड़ि को न सकोई ॥ जनु नानकु हरि करतै आपि बहि टिकिआ आपे पैज रखै प्रभु सोई ॥३॥

पउड़ी ॥
काइआ कोटु अपारु है अंदरि हटनाले ॥ गुरमुखि सउदा जो करे हरि वसतु समाले ॥ नामु निधानु हरि वणजीऐ हीरे परवाले ॥ विणु काइआ जि होर थै धनु खोजदे से मूड़ बेताले ॥ से उझड़ि भरमि भवाईअहि जिउ झाड़ मिरगु भाले ॥१५॥

सलोक मः ४ ॥
जो निंदा करे सतिगुर पूरे की सु अउखा जग महि होइआ ॥ नरक घोरु दुख खूहु है ओथै पकड़ि ओहु ढोइआ ॥ कूक पुकार को न सुणे ओहु अउखा होइ होइ रोइआ ॥ ओनि हलतु पलतु सभु गवाइआ लाहा मूलु सभु खोइआ ॥ ओहु तेली संदा बलदु करि नित भलके उठि प्रभि जोइआ ॥ हरि वेखै सुणै नित सभु किछु तिदू किछु गुझा न होइआ ॥ जैसा बीजे सो लुणै जेहा पुरबि किनै बोइआ ॥ जिसु क्रिपा करे प्रभु आपणी तिसु सतिगुर के चरण धोइआ ॥ गुर सतिगुर पिछै तरि गइआ जिउ लोहा काठ संगोइआ ॥ जन नानक नामु धिआइ तू जपि हरि हरि नामि सुखु होइआ ॥१॥

मः ४ ॥
वडभागीआ सोहागणी जिना गुरमुखि मिलिआ हरि राइ ॥ अंतर जोति प्रगासीआ नानक नामि समाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
इहु सरीरु सभु धरमु है जिसु अंदरि सचे की विचि जोति ॥ गुहज रतन विचि लुकि रहे कोई गुरमुखि सेवकु कढै खोति ॥ सभु आतम रामु पछाणिआ तां इकु रविआ इको ओति पोति ॥ इकु देखिआ इकु मंनिआ इको सुणिआ स्रवण सरोति ॥ जन नानक नामु सलाहि तू सचु सचे सेवा तेरी होति ॥१६॥

सलोक मः ४ ॥
सभि रस तिन कै रिदै हहि जिन हरि वसिआ मन माहि ॥ हरि दरगहि ते मुख उजले तिन कउ सभि देखण जाहि ॥ जिन निरभउ नामु धिआइआ तिन कउ भउ कोई नाहि ॥ हरि उतमु तिनी सरेविआ जिन कउ धुरि लिखिआ आहि ॥ ते हरि दरगहि पैनाईअहि जिन हरि वुठा मन माहि ॥ ओइ आपि तरे सभ कुट्मब सिउ तिन पिछै सभु जगतु छडाहि ॥ जन नानक कउ हरि मेलि जन तिन वेखि वेखि हम जीवाहि ॥१॥

मः ४ ॥
सा धरती भई हरीआवली जिथै मेरा सतिगुरु बैठा आइ ॥ से जंत भए हरीआवले जिनी मेरा सतिगुरु देखिआ जाइ ॥ धनु धंनु पिता धनु धंनु कुलु धनु धनु सु जननी जिनि गुरू जणिआ माइ ॥ धनु धंनु गुरू जिनि नामु अराधिआ आपि तरिआ जिनी डिठा तिना लए छडाइ ॥ हरि सतिगुरु मेलहु दइआ करि जनु नानकु धोवै पाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
सचु सचा सतिगुरु अमरु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥ सचु सचा सतिगुरु पुरखु है जिनि कामु क्रोधु बिखु मारिआ ॥ जा डिठा पूरा सतिगुरू तां अंदरहु मनु साधारिआ ॥ बलिहारी गुर आपणे सदा सदा घुमि वारिआ ॥ गुरमुखि जिता मनमुखि हारिआ ॥१७॥

सलोक मः ४ ॥
करि किरपा सतिगुरु मेलिओनु मुखि गुरमुखि नामु धिआइसी ॥ सो करे जि सतिगुर भावसी गुरु पूरा घरी वसाइसी ॥ जिन अंदरि नामु निधानु है तिन का भउ सभु गवाइसी ॥ जिन रखण कउ हरि आपि होइ होर केती झखि झखि जाइसी ॥ जन नानक नामु धिआइ तू हरि हलति पलति छोडाइसी ॥१॥

मः ४ ॥
गुरसिखा कै मनि भावदी गुर सतिगुर की वडिआई ॥ हरि राखहु पैज सतिगुरू की नित चड़ै सवाई ॥ गुर सतिगुर कै मनि पारब्रहमु है पारब्रहमु छडाई ॥ गुर सतिगुर ताणु दीबाणु हरि तिनि सभ आणि निवाई ॥ जिनी डिठा मेरा सतिगुरु भाउ करि तिन के सभि पाप गवाई ॥ हरि दरगह ते मुख उजले बहु सोभा पाई ॥ जनु नानकु मंगै धूड़ि तिन जो गुर के सिख मेरे भाई ॥२॥

पउड़ी ॥
हउ आखि सलाही सिफति सचु सचु सचे की वडिआई ॥ सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाई ॥ सचु सचा रसु जिनी चखिआ से त्रिपति रहे आघाई ॥ इहु हरि रसु सेई जाणदे जिउ गूंगै मिठिआई खाई ॥ गुरि पूरै हरि प्रभु सेविआ मनि वजी वाधाई ॥१८॥

सलोक मः ४ ॥
जिना अंदरि उमरथल सेई जाणनि सूलीआ ॥ हरि जाणहि सेई बिरहु हउ तिन विटहु सद घुमि घोलीआ ॥ हरि मेलहु सजणु पुरखु मेरा सिरु तिन विटहु तल रोलीआ ॥ जो सिख गुर कार कमावहि हउ गुलमु तिना का गोलीआ ॥ हरि रंगि चलूलै जो रते तिन भिनी हरि रंगि चोलीआ ॥ करि किरपा नानक मेलि गुर पहि सिरु वेचिआ मोलीआ ॥१॥

मः ४ ॥
अउगणी भरिआ सरीरु है किउ संतहु निरमलु होइ ॥ गुरमुखि गुण वेहाझीअहि मलु हउमै कढै धोइ ॥ सचु वणंजहि रंग सिउ सचु सउदा होइ ॥ तोटा मूलि न आवई लाहा हरि भावै सोइ ॥ नानक तिन सचु वणंजिआ जिना धुरि लिखिआ परापति होइ ॥२॥

पउड़ी ॥
सालाही सचु सालाहणा सचु सचा पुरखु निराले ॥ सचु सेवी सचु मनि वसै सचु सचा हरि रखवाले ॥ सचु सचा जिनी अराधिआ से जाइ रले सच नाले ॥ सचु सचा जिनी न सेविआ से मनमुख मूड़ बेताले ॥ ओह आलु पतालु मुहहु बोलदे जिउ पीतै मदि मतवाले ॥१९॥

सलोक महला ३ ॥
गउड़ी रागि सुलखणी जे खसमै चिति करेइ ॥ भाणै चलै सतिगुरू कै ऐसा सीगारु करेइ ॥ सचा सबदु भतारु है सदा सदा रावेइ ॥ जिउ उबली मजीठै रंगु गहगहा तिउ सचे नो जीउ देइ ॥ रंगि चलूलै अति रती सचे सिउ लगा नेहु ॥ कूड़ु ठगी गुझी ना रहै कूड़ु मुलमा पलेटि धरेहु ॥ कूड़ी करनि वडाईआ कूड़े सिउ लगा नेहु ॥ नानक सचा आपि है आपे नदरि करेइ ॥१॥

मः ४ ॥
सतसंगति महि हरि उसतति है संगि साधू मिले पिआरिआ ॥ ओइ पुरख प्राणी धंनि जन हहि उपदेसु करहि परउपकारिआ ॥ हरि नामु द्रिड़ावहि हरि नामु सुणावहि हरि नामे जगु निसतारिआ ॥ गुर वेखण कउ सभु कोई लोचै नव खंड जगति नमसकारिआ ॥ तुधु आपे आपु रखिआ सतिगुर विचि गुरु आपे तुधु सवारिआ ॥ तू आपे पूजहि पूज करावहि सतिगुर कउ सिरजणहारिआ ॥ कोई विछुड़ि जाइ सतिगुरू पासहु तिसु काला मुहु जमि मारिआ ॥ तिसु अगै पिछै ढोई नाही गुरसिखी मनि वीचारिआ ॥ सतिगुरू नो मिले सेई जन उबरे जिन हिरदै नामु समारिआ ॥ जन नानक के गुरसिख पुतहहु हरि जपिअहु हरि निसतारिआ ॥२॥

महला ३ ॥
हउमै जगतु भुलाइआ दुरमति बिखिआ बिकार ॥ सतिगुरु मिलै त नदरि होइ मनमुख अंध अंधिआर ॥ नानक आपे मेलि लए जिस नो सबदि लाए पिआरु ॥३॥

पउड़ी ॥
सचु सचे की सिफति सलाह है सो करे जिसु अंदरु भिजै ॥ जिनी इक मनि इकु अराधिआ तिन का कंधु न कबहू छिजै ॥ धनु धनु पुरख साबासि है जिन सचु रसना अम्रितु पिजै ॥ सचु सचा जिन मनि भावदा से मनि सची दरगह लिजै ॥ धनु धंनु जनमु सचिआरीआ मुख उजल सचु करिजै ॥२०॥

सलोक मः ४ ॥
साकत जाइ निवहि गुर आगै मनि खोटे कूड़ि कूड़िआरे ॥ जा गुरु कहै उठहु मेरे भाई बहि जाहि घुसरि बगुलारे ॥ गुरसिखा अंदरि सतिगुरु वरतै चुणि कढे लधोवारे ॥ ओइ अगै पिछै बहि मुहु छपाइनि न रलनी खोटेआरे ॥ ओना दा भखु सु ओथै नाही जाइ कूड़ु लहनि भेडारे ॥ जे साकतु नरु खावाईऐ लोचीऐ बिखु कढै मुखि उगलारे ॥ हरि साकत सेती संगु न करीअहु ओइ मारे सिरजणहारे ॥ जिस का इहु खेलु सोई करि वेखै जन नानक नामु समारे ॥१॥

मः ४ ॥
सतिगुरु पुरखु अगमु है जिसु अंदरि हरि उरि धारिआ ॥ सतिगुरू नो अपड़ि कोइ न सकई जिसु वलि सिरजणहारिआ ॥ सतिगुरू का खड़गु संजोउ हरि भगति है जितु कालु कंटकु मारि विडारिआ ॥ सतिगुरू का रखणहारा हरि आपि है सतिगुरू कै पिछै हरि सभि उबारिआ ॥ जो मंदा चितवै पूरे सतिगुरू का सो आपि उपावणहारै मारिआ ॥ एह गल होवै हरि दरगह सचे की जन नानक अगमु वीचारिआ ॥२॥

पउड़ी ॥
सचु सुतिआ जिनी अराधिआ जा उठे ता सचु चवे ॥ से विरले जुग महि जाणीअहि जो गुरमुखि सचु रवे ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जि अनदिनु सचु लवे ॥ जिन मनि तनि सचा भावदा से सची दरगह गवे ॥ जनु नानकु बोलै सचु नामु सचु सचा सदा नवे ॥२१॥

सलोकु मः ४ ॥
किआ सवणा किआ जागणा गुरमुखि ते परवाणु ॥ जिना सासि गिरासि न विसरै से पूरे पुरख परधान ॥ करमी सतिगुरु पाईऐ अनदिनु लगै धिआनु ॥ तिन की संगति मिलि रहा दरगह पाई मानु ॥ सउदे वाहु वाहु उचरहि उठदे भी वाहु करेनि ॥ नानक ते मुख उजले जि नित उठि समालेनि ॥१॥

मः ४ ॥
सतिगुरु सेवीऐ आपणा पाईऐ नामु अपारु ॥ भउजलि डुबदिआ कढि लए हरि दाति करे दातारु ॥ धंनु धंनु से साह है जि नामि करहि वापारु ॥ वणजारे सिख आवदे सबदि लघावणहारु ॥ जन नानक जिन कउ क्रिपा भई तिन सेविआ सिरजणहारु ॥२॥

पउड़ी ॥
सचु सचे के जन भगत हहि सचु सचा जिनी अराधिआ ॥ जिन गुरमुखि खोजि ढंढोलिआ तिन अंदरहु ही सचु लाधिआ ॥ सचु साहिबु सचु जिनी सेविआ कालु कंटकु मारि तिनी साधिआ ॥ सचु सचा सभ दू वडा है सचु सेवनि से सचि रलाधिआ ॥ सचु सचे नो साबासि है सचु सचा सेवि फलाधिआ ॥२२॥

सलोक मः ४ ॥
मनमुखु प्राणी मुगधु है नामहीण भरमाइ ॥ बिनु गुर मनूआ ना टिकै फिरि फिरि जूनी पाइ ॥ हरि प्रभु आपि दइआल होहि तां सतिगुरु मिलिआ आइ ॥ जन नानक नामु सलाहि तू जनम मरण दुखु जाइ ॥१॥

मः ४ ॥
गुरु सालाही आपणा बहु बिधि रंगि सुभाइ ॥ सतिगुर सेती मनु रता रखिआ बणत बणाइ ॥ जिहवा सालाहि न रजई हरि प्रीतम चितु लाइ ॥ नानक नावै की मनि भुख है मनु त्रिपतै हरि रसु खाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
सचु सचा कुदरति जाणीऐ दिनु राती जिनि बणाईआ ॥ सो सचु सलाही सदा सदा सचु सचे कीआ वडिआईआ ॥ सालाही सचु सलाह सचु सचु कीमति किनै न पाईआ ॥ जा मिलिआ पूरा सतिगुरू ता हाजरु नदरी आईआ ॥ सचु गुरमुखि जिनी सलाहिआ तिना भुखा सभि गवाईआ ॥२३॥

सलोक मः ४ ॥
मै मनु तनु खोजि खोजेदिआ सो प्रभु लधा लोड़ि ॥ विसटु गुरू मै पाइआ जिनि हरि प्रभु दिता जोड़ि ॥१॥

मः ३ ॥
माइआधारी अति अंना बोला ॥ सबदु न सुणई बहु रोल घचोला ॥ गुरमुखि जापै सबदि लिव लाइ ॥ हरि नामु सुणि मंने हरि नामि समाइ ॥ जो तिसु भावै सु करे कराइआ ॥ नानक वजदा जंतु वजाइआ ॥२॥

पउड़ी ॥
तू करता सभु किछु जाणदा जो जीआ अंदरि वरतै ॥ तू करता आपि अगणतु है सभु जगु विचि गणतै ॥ सभु कीता तेरा वरतदा सभ तेरी बणतै ॥ तू घटि घटि इकु वरतदा सचु साहिब चलतै ॥ सतिगुर नो मिले सु हरि मिले नाही किसै परतै ॥२४॥

सलोकु मः ४ ॥
इहु मनूआ द्रिड़ु करि रखीऐ गुरमुखि लाईऐ चितु ॥ किउ सासि गिरासि विसारीऐ बहदिआ उठदिआ नित ॥ मरण जीवण की चिंता गई इहु जीअड़ा हरि प्रभ वसि ॥ जिउ भावै तिउ रखु तू जन नानक नामु बखसि ॥१॥

मः ३ ॥
मनमुखु अहंकारी महलु न जाणै खिनु आगै खिनु पीछै ॥ सदा बुलाईऐ महलि न आवै किउ करि दरगह सीझै ॥ सतिगुर का महलु विरला जाणै सदा रहै कर जोड़ि ॥ आपणी क्रिपा करे हरि मेरा नानक लए बहोड़ि ॥२॥

पउड़ी ॥
सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु मंने ॥ जा सतिगुर का मनु मंनिआ ता पाप कसमल भंने ॥ उपदेसु जि दिता सतिगुरू सो सुणिआ सिखी कंने ॥ जिन सतिगुर का भाणा मंनिआ तिन चड़ी चवगणि वंने ॥ इह चाल निराली गुरमुखी गुर दीखिआ सुणि मनु भिंने ॥२५॥

सलोकु मः ३ ॥
जिनि गुरु गोपिआ आपणा तिसु ठउर न ठाउ ॥ हलतु पलतु दोवै गए दरगह नाही थाउ ॥ ओह वेला हथि न आवई फिरि सतिगुर लगहि पाइ ॥ सतिगुर की गणतै घुसीऐ दुखे दुखि विहाइ ॥ सतिगुरु पुरखु निरवैरु है आपे लए जिसु लाइ ॥ नानक दरसनु जिना वेखालिओनु तिना दरगह लए छडाइ ॥१॥

मः ३ ॥
मनमुखु अगिआनु दुरमति अहंकारी ॥ अंतरि क्रोधु जूऐ मति हारी ॥ कूड़ु कुसतु ओहु पाप कमावै ॥ किआ ओहु सुणै किआ आखि सुणावै ॥ अंना बोला खुइ उझड़ि पाइ ॥ मनमुखु अंधा आवै जाइ ॥ बिनु सतिगुर भेटे थाइ न पाइ ॥ नानक पूरबि लिखिआ कमाइ ॥२॥

पउड़ी ॥
जिन के चित कठोर हहि से बहहि न सतिगुर पासि ॥ ओथै सचु वरतदा कूड़िआरा चित उदासि ॥ ओइ वलु छलु करि झति कढदे फिरि जाइ बहहि कूड़िआरा पासि ॥ विचि सचे कूड़ु न गडई मनि वेखहु को निरजासि ॥ कूड़िआर कूड़िआरी जाइ रले सचिआर सिख बैठे सतिगुर पासि ॥२६॥

सलोक मः ५ ॥
रहदे खुहदे निंदक मारिअनु करि आपे आहरु ॥ संत सहाई नानका वरतै सभ जाहरु ॥१॥

मः ५ ॥
मुंढहु भुले मुंढ ते किथै पाइनि हथु ॥ तिंनै मारे नानका जि करण कारण समरथु ॥२॥

पउड़ी ५ ॥
लै फाहे राती तुरहि प्रभु जाणै प्राणी ॥ तकहि नारि पराईआ लुकि अंदरि ठाणी ॥ संन्ही देन्हि विखम थाइ मिठा मदु माणी ॥ करमी आपो आपणी आपे पछुताणी ॥ अजराईलु फरेसता तिल पीड़े घाणी ॥२७॥

सलोक मः ५ ॥
सेवक सचे साह के सेई परवाणु ॥ दूजा सेवनि नानका से पचि पचि मुए अजाण ॥१॥

मः ५ ॥
जो धुरि लिखिआ लेखु प्रभ मेटणा न जाइ ॥ राम नामु धनु वखरो नानक सदा धिआइ ॥२॥

पउड़ी ५ ॥
नाराइणि लइआ नाठूंगड़ा पैर किथै रखै ॥ करदा पाप अमितिआ नित विसो चखै ॥ निंदा करदा पचि मुआ विचि देही भखै ॥ सचै साहिब मारिआ कउणु तिस नो रखै ॥ नानक तिसु सरणागती जो पुरखु अलखै ॥२८॥

सलोक मः ५ ॥
नरक घोर बहु दुख घणे अकिरतघणा का थानु ॥ तिनि प्रभि मारे नानका होइ होइ मुए हरामु ॥१॥

मः ५ ॥
अवखध सभे कीतिअनु निंदक का दारू नाहि ॥ आपि भुलाए नानका पचि पचि जोनी पाहि ॥२॥

पउड़ी ५ ॥
तुसि दिता पूरै सतिगुरू हरि धनु सचु अखुटु ॥ सभि अंदेसे मिटि गए जम का भउ छुटु ॥ काम क्रोध बुरिआईआं संगि साधू तुटु ॥ विणु सचे दूजा सेवदे हुइ मरसनि बुटु ॥ नानक कउ गुरि बखसिआ नामै संगि जुटु ॥२९॥

सलोक मः ४ ॥
तपा न होवै अंद्रहु लोभी नित माइआ नो फिरै जजमालिआ ॥ अगो दे सदिआ सतै दी भिखिआ लए नाही पिछो दे पछुताइ कै आणि तपै पुतु विचि बहालिआ ॥ पंच लोग सभि हसण लगे तपा लोभि लहरि है गालिआ ॥ जिथै थोड़ा धनु वेखै तिथै तपा भिटै नाही धनि बहुतै डिठै तपै धरमु हारिआ ॥ भाई एहु तपा न होवी बगुला है बहि साध जना वीचारिआ ॥ सत पुरख की तपा निंदा करै संसारै की उसतती विचि होवै एतु दोखै तपा दयि मारिआ ॥ महा पुरखां की निंदा का वेखु जि तपे नो फलु लगा सभु गइआ तपे का घालिआ ॥ बाहरि बहै पंचा विचि तपा सदाए ॥ अंदरि बहै तपा पाप कमाए ॥ हरि अंदरला पापु पंचा नो उघा करि वेखालिआ ॥ धरम राइ जमकंकरा नो आखि छडिआ एसु तपे नो तिथै खड़ि पाइहु जिथै महा महां हतिआरिआ ॥ फिरि एसु तपे दै मुहि कोई लगहु नाही एहु सतिगुरि है फिटकारिआ ॥ हरि कै दरि वरतिआ सु नानकि आखि सुणाइआ ॥ सो बूझै जु दयि सवारिआ ॥१॥

मः ४ ॥
हरि भगतां हरि आराधिआ हरि की वडिआई ॥ हरि कीरतनु भगत नित गांवदे हरि नामु सुखदाई ॥ हरि भगतां नो नित नावै दी वडिआई बखसीअनु नित चड़ै सवाई ॥ हरि भगतां नो थिरु घरी बहालिअनु अपणी पैज रखाई ॥ निंदकां पासहु हरि लेखा मंगसी बहु देइ सजाई ॥ जेहा निंदक अपणै जीइ कमावदे तेहो फलु पाई ॥ अंदरि कमाणा सरपर उघड़ै भावै कोई बहि धरती विचि कमाई ॥ जन नानकु देखि विगसिआ हरि की वडिआई ॥२॥

पउड़ी मः ५ ॥
भगत जनां का राखा हरि आपि है किआ पापी करीऐ ॥ गुमानु करहि मूड़ गुमानीआ विसु खाधी मरीऐ ॥ आइ लगे नी दिह थोड़ड़े जिउ पका खेतु लुणीऐ ॥ जेहे करम कमावदे तेवेहो भणीऐ ॥ जन नानक का खसमु वडा है सभना दा धणीऐ ॥३०॥

सलोक मः ४ ॥
मनमुख मूलहु भुलिआ विचि लबु लोभु अहंकारु ॥ झगड़ा करदिआ अनदिनु गुदरै सबदि न करहि वीचारु ॥ सुधि मति करतै सभ हिरि लई बोलनि सभु विकारु ॥ दितै कितै न संतोखीअहि अंतरि तिसना बहु अगिआनु अंध्यारु ॥ नानक मनमुखा नालो तुटी भली जिन माइआ मोह पिआरु ॥१॥

मः ४ ॥
जिना अंदरि दूजा भाउ है तिन्हा गुरमुखि प्रीति न होइ ॥ ओहु आवै जाइ भवाईऐ सुपनै सुखु न कोइ ॥ कूड़ु कमावै कूड़ु उचरै कूड़ि लगिआ कूड़ु होइ ॥ माइआ मोहु सभु दुखु है दुखि बिनसै दुखु रोइ ॥ नानक धातु लिवै जोड़ु न आवई जे लोचै सभु कोइ ॥ जिन कउ पोतै पुंनु पइआ तिना गुर सबदी सुखु होइ ॥२॥

पउड़ी मः ५ ॥
नानक वीचारहि संत मुनि जनां चारि वेद कहंदे ॥ भगत मुखै ते बोलदे से वचन होवंदे ॥ परगट पाहारै जापदे सभि लोक सुणंदे ॥ सुखु न पाइनि मुगध नर संत नालि खहंदे ॥ ओइ लोचनि ओना गुणा नो ओइ अहंकारि सड़ंदे ॥ ओइ वेचारे किआ करहि जां भाग धुरि मंदे ॥ जो मारे तिनि पारब्रहमि से किसै न संदे ॥ वैरु करनि निरवैर नालि धरमि निआइ पचंदे ॥ जो जो संति सरापिआ से फिरहि भवंदे ॥ पेडु मुंढाहू कटिआ तिसु डाल सुकंदे ॥३१॥

सलोक मः ५ ॥
गुर नानक हरि नामु द्रिड़ाइआ भंनण घड़ण समरथु ॥ प्रभु सदा समालहि मित्र तू दुखु सबाइआ लथु ॥१॥

मः ५ ॥
खुधिआवंतु न जाणई लाज कुलाज कुबोलु ॥ नानकु मांगै नामु हरि करि किरपा संजोगु ॥२॥

पउड़ी ॥
जेवेहे करम कमावदा तेवेहे फलते ॥ चबे तता लोह सारु विचि संघै पलते ॥ घति गलावां चालिआ तिनि दूति अमल ते ॥ काई आस न पुंनीआ नित पर मलु हिरते ॥ कीआ न जाणै अकिरतघण विचि जोनी फिरते ॥ सभे धिरां निखुटीअसु हिरि लईअसु धर ते ॥ विझण कलह न देवदा तां लइआ करते ॥ जो जो करते अहमेउ झड़ि धरती पड़ते ॥३२॥

सलोक मः ३ ॥
गुरमुखि गिआनु बिबेक बुधि होइ ॥ हरि गुण गावै हिरदै हारु परोइ ॥ पवितु पावनु परम बीचारी ॥ जि ओसु मिलै तिसु पारि उतारी ॥ अंतरि हरि नामु बासना समाणी ॥ हरि दरि सोभा महा उतम बाणी ॥ जि पुरखु सुणै सु होइ निहालु ॥ नानक सतिगुर मिलिऐ पाइआ नामु धनु मालु ॥१॥

मः ४ ॥
सतिगुर के जीअ की सार न जापै कि पूरै सतिगुर भावै ॥ गुरसिखां अंदरि सतिगुरू वरतै जो सिखां नो लोचै सो गुर खुसी आवै ॥ सतिगुरु आखै सु कार कमावनि सु जपु कमावहि गुरसिखां की घाल सचा थाइ पावै ॥ विणु सतिगुर के हुकमै जि गुरसिखां पासहु कमु कराइआ लोड़े तिसु गुरसिखु फिरि नेड़ि न आवै ॥ गुर सतिगुर अगै को जीउ लाइ घालै तिसु अगै गुरसिखु कार कमावै ॥ जि ठगी आवै ठगी उठि जाइ तिसु नेड़ै गुरसिखु मूलि न आवै ॥ ब्रहमु बीचारु नानकु आखि सुणावै ॥ जि विणु सतिगुर के मनु मंने कमु कराए सो जंतु महा दुखु पावै ॥२॥

पउड़ी ॥
तूं सचा साहिबु अति वडा तुहि जेवडु तूं वड वडे ॥ जिसु तूं मेलहि सो तुधु मिलै तूं आपे बखसि लैहि लेखा छडे ॥ जिस नो तूं आपि मिलाइदा सो सतिगुरु सेवे मनु गड गडे ॥ तूं सचा साहिबु सचु तू सभु जीउ पिंडु चमु तेरा हडे ॥ जिउ भावै तिउ रखु तूं सचिआ नानक मनि आस तेरी वड वडे ॥३३॥१॥ सुधु ॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates