वार 7 (कबीर जी), Vaar 7 (Kabir ji) Path in Hindi Gurbani online


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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु गउड़ी वार कबीर जीउ के ७ ॥

बार बार हरि के गुन गावउ ॥ गुर गमि भेदु सु हरि का पावउ ॥१॥ रहाउ ॥

आदित करै भगति आर्मभ ॥ काइआ मंदर मनसा थ्मभ ॥ अहिनिसि अखंड सुरही जाइ ॥ तउ अनहद बेणु सहज महि बाइ ॥१॥

सोमवारि ससि अम्रितु झरै ॥ चाखत बेगि सगल बिख हरै ॥ बाणी रोकिआ रहै दुआर ॥ तउ मनु मतवारो पीवनहार ॥२॥

मंगलवारे ले माहीति ॥ पंच चोर की जाणै रीति ॥ घर छोडें बाहरि जिनि जाइ ॥ नातरु खरा रिसै है राइ ॥३॥

बुधवारि बुधि करै प्रगास ॥ हिरदै कमल महि हरि का बास ॥ गुर मिलि दोऊ एक सम धरै ॥ उरध पंक लै सूधा करै ॥४॥

ब्रिहसपति बिखिआ देइ बहाइ ॥ तीनि देव एक संगि लाइ ॥ तीनि नदी तह त्रिकुटी माहि ॥ अहिनिसि कसमल धोवहि नाहि ॥५॥

सुक्रितु सहारै सु इह ब्रति चड़ै ॥ अनदिन आपि आप सिउ लड़ै ॥ सुरखी पांचउ राखै सबै ॥ तउ दूजी द्रिसटि न पैसै कबै ॥६॥

थावर थिरु करि राखै सोइ ॥ जोति दी वटी घट महि जोइ ॥ बाहरि भीतरि भइआ प्रगासु ॥ तब हूआ सगल करम का नासु ॥७॥

जब लगु घट महि दूजी आन ॥ तउ लउ महलि न लाभै जान ॥ रमत राम सिउ लागो रंगु ॥ कहि कबीर तब निरमल अंग ॥८॥१॥


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