सलोक सहसक्रिती, Slok Sahaskriti (Mahalla 1 5) Path in Hindi Gurbani online


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ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
सलोक सहसक्रिती महला १ ॥

पड़्हि पुस्तक संधिआ बादं ॥ सिल पूजसि बगुल समाधं ॥ मुखि झूठु बिभूखन सारं ॥ त्रैपाल तिहाल बिचारं ॥ गलि माला तिलक लिलाटं ॥ दुइ धोती बसत्र कपाटं ॥ जो जानसि ब्रहमं करमं ॥ सभ फोकट निसचै करमं ॥ कहु नानक निसचौ िध्यावै ॥ बिनु सतिगुर बाट न पावै ॥१॥

निहफलं तस्य जनमस्य जावद ब्रहम न बिंदते ॥ सागरं संसारस्य गुर परसादी तरहि के ॥ करण कारण समरथु है कहु नानक बीचारि ॥ कारणु करते वसि है जिनि कल रखी धारि ॥२॥

जोग सबदं गिआन सबदं बेद सबदं त ब्राहमणह ॥ ख्यत्री सबदं सूर सबदं सूद्र सबदं परा क्रितह ॥ सरब सबदं त एक सबदं जे को जानसि भेउ ॥ नानक ता को दासु है सोई निरंजन देउ ॥३॥

एक क्रिस्नं त सरब देवा देव देवा त आतमह ॥ आतमं स्री बास्वदेवस्य जे कोई जानसि भेव ॥ नानक ता को दासु है सोई निरंजन देव ॥४॥

सलोक सहसक्रिती महला ५
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥

कतंच माता कतंच पिता कतंच बनिता बिनोद सुतह ॥ कतंच भ्रात मीत हित बंधव कतंच मोह कुट्मब्यते ॥ कतंच चपल मोहनी रूपं पेखंते तिआगं करोति ॥ रहंत संग भगवान सिमरण नानक लबध्यं अचुत तनह ॥१॥

ध्रिगंत मात पिता सनेहं ध्रिग सनेहं भ्रात बांधवह ॥ ध्रिग स्नेहं बनिता बिलास सुतह ॥ ध्रिग स्नेहं ग्रिहारथ कह ॥ साधसंग स्नेह सत्यिं सुखयं बसंति नानकह ॥२॥

मिथ्यंत देहं खीणंत बलनं ॥ बरधंति जरूआ हित्यंत माइआ ॥ अत्यंत आसा आथित्य भवनं ॥ गनंत स्वासा भैयान धरमं ॥ पतंति मोह कूप दुरलभ्य देहं तत आस्रयं नानक ॥ गोबिंद गोबिंद गोबिंद गोपाल क्रिपा ॥३॥

काच कोटं रचंति तोयं लेपनं रकत चरमणह ॥ नवंत दुआरं भीत रहितं बाइ रूपं असथ्मभनह ॥ गोबिंद नामं नह सिमरंति अगिआनी जानंति असथिरं ॥ दुरलभ देह उधरंत साध सरण नानक ॥ हरि हरि हरि हरि हरि हरे जपंति ॥४॥

सुभंत तुयं अचुत गुणग्यं पूरनं बहुलो क्रिपाला ॥ ग्मभीरं ऊचै सरबगि अपारा ॥ भ्रितिआ प्रिअं बिस्राम चरणं ॥ अनाथ नाथे नानक सरणं ॥५॥

म्रिगी पेखंत बधिक प्रहारेण लख्य आवधह ॥ अहो जस्य रखेण गोपालह नानक रोम न छेद्यते ॥६॥

बहु जतन करता बलवंत कारी सेवंत सूरा चतुर दिसह ॥ बिखम थान बसंत ऊचह नह सिमरंत मरणं कदांचह ॥ होवंति आगिआ भगवान पुरखह नानक कीटी सास अकरखते ॥७॥

सबदं रतं हितं मइआ कीरतं कली करम क्रितुआ ॥ मिटंति तत्रागत भरम मोहं ॥ भगवान रमणं सरबत्र थान्यिं ॥ द्रिसट तुयं अमोघ दरसनं बसंत साध रसना ॥ हरि हरि हरि हरे नानक प्रिअं जापु जपना ॥८॥

घटंत रूपं घटंत दीपं घटंत रवि ससीअर नख्यत्र गगनं ॥ घटंत बसुधा गिरि तर सिखंडं ॥ घटंत ललना सुत भ्रात हीतं ॥ घटंत कनिक मानिक माइआ स्वरूपं ॥ नह घटंत केवल गोपाल अचुत ॥ असथिरं नानक साध जन ॥९॥

नह बिल्मब धरमं बिल्मब पापं ॥ द्रिड़ंत नामं तजंत लोभं ॥ सरणि संतं किलबिख नासं प्रापतं धरम लख्यिण ॥ नानक जिह सुप्रसंन माधवह ॥१०॥

मिरत मोहं अलप बुध्यं रचंति बनिता बिनोद साहं ॥ जौबन बहिक्रम कनिक कुंडलह ॥ बचित्र मंदिर सोभंति बसत्रा इत्यंत माइआ ब्यापितं ॥ हे अचुत सरणि संत नानक भो भगवानए नमह ॥११॥

जनमं त मरणं हरखं त सोगं भोगं त रोगं ॥ ऊचं त नीचं नान्हा सु मूचं ॥ राजं त मानं अभिमानं त हीनं ॥ प्रविरति मारगं वरतंति बिनासनं ॥ गोबिंद भजन साध संगेण असथिरं नानक भगवंत भजनासनं ॥१२॥

किरपंत हरीअं मति ततु गिआनं ॥ बिगसीध्यि बुधा कुसल थानं ॥ बस्यिंत रिखिअं तिआगि मानं ॥ सीतलंत रिदयं द्रिड़ु संत गिआनं ॥ रहंत जनमं हरि दरस लीणा ॥ बाजंत नानक सबद बीणां ॥१३॥

कहंत बेदा गुणंत गुनीआ सुणंत बाला बहु बिधि प्रकारा ॥ द्रिड़ंत सुबिदिआ हरि हरि क्रिपाला ॥ नाम दानु जाचंत नानक दैनहार गुर गोपाला ॥१४॥

नह चिंता मात पित भ्रातह नह चिंता कछु लोक कह ॥ नह चिंता बनिता सुत मीतह प्रविरति माइआ सनबंधनह ॥ दइआल एक भगवान पुरखह नानक सरब जीअ प्रतिपालकह ॥१५॥

अनित्य वितं अनित्य चितं अनित्य आसा बहु बिधि प्रकारं ॥ अनित्य हेतं अहं बंधं भरम माइआ मलनं बिकारं ॥ फिरंत जोनि अनेक जठरागनि नह सिमरंत मलीण बुध्यं ॥ हे गोबिंद करत मइआ नानक पतित उधारण साध संगमह ॥१६॥

गिरंत गिरि पतित पातालं जलंत देदीप्य बैस्वांतरह ॥ बहंति अगाह तोयं तरंगं दुखंत ग्रह चिंता जनमं त मरणह ॥ अनिक साधनं न सिध्यते नानक असथ्मभं असथ्मभं असथ्मभं सबद साध स्वजनह ॥१७॥

घोर दुख्यं अनिक हत्यं जनम दारिद्रं महा बिख्यादं ॥ मिटंत सगल सिमरंत हरि नाम नानक जैसे पावक कासट भसमं करोति ॥१८॥

अंधकार सिमरत प्रकासं गुण रमंत अघ खंडनह ॥ रिद बसंति भै भीत दूतह करम करत महा निरमलह ॥ जनम मरण रहंत स्रोता सुख समूह अमोघ दरसनह ॥ सरणि जोगं संत प्रिअ नानक सो भगवान खेमं करोति ॥१९॥

पाछं करोति अग्रणीवह निरासं आस पूरनह ॥ निरधन भयं धनवंतह रोगीअं रोग खंडनह ॥ भगत्यं भगति दानं राम नाम गुण कीरतनह ॥ पारब्रहम पुरख दातारह नानक गुर सेवा किं न लभ्यते ॥२०॥

अधरं धरं धारणह निरधनं धन नाम नरहरह ॥ अनाथ नाथ गोबिंदह बलहीण बल केसवह ॥ सरब भूत दयाल अचुत दीन बांधव दामोदरह ॥ सरबग्य पूरन पुरख भगवानह भगति वछल करुणा मयह ॥ घटि घटि बसंत बासुदेवह पारब्रहम परमेसुरह ॥ जाचंति नानक क्रिपाल प्रसादं नह बिसरंति नह बिसरंति नाराइणह ॥२१॥

नह समरथं नह सेवकं नह प्रीति परम पुरखोतमं ॥ तव प्रसादि सिमरते नामं नानक क्रिपाल हरि हरि गुरं ॥२२॥

भरण पोखण करंत जीआ बिस्राम छादन देवंत दानं ॥ स्रिजंत रतन जनम चतुर चेतनह ॥ वरतंति सुख आनंद प्रसादह ॥ सिमरंत नानक हरि हरि हरे ॥ अनित्य रचना निरमोह ते ॥२३॥

दानं परा पूरबेण भुंचंते महीपते ॥ बिपरीत बुध्यं मारत लोकह नानक चिरंकाल दुख भोगते ॥२४॥

ब्रिथा अनुग्रहं गोबिंदह जस्य सिमरण रिदंतरह ॥ आरोग्यं महा रोग्यं बिसिम्रिते करुणा मयह ॥२५॥

रमणं केवलं कीरतनं सुधरमं देह धारणह ॥ अम्रित नामु नाराइण नानक पीवतं संत न त्रिप्यते ॥२६॥

सहण सील संतं सम मित्रस्य दुरजनह ॥ नानक भोजन अनिक प्रकारेण निंदक आवध होइ उपतिसटते ॥२७॥

तिरसकार नह भवंति नह भवंति मान भंगनह ॥ सोभा हीन नह भवंति नह पोहंति संसार दुखनह ॥ गोबिंद नाम जपंति मिलि साध संगह नानक से प्राणी सुख बासनह ॥२८॥

सैना साध समूह सूर अजितं संनाहं तनि निम्रताह ॥ आवधह गुण गोबिंद रमणं ओट गुर सबद कर चरमणह ॥ आरूड़ते अस्व रथ नागह बुझंते प्रभ मारगह ॥ बिचरते निरभयं सत्रु सैना धायंते गोपाल कीरतनह ॥ जितते बिस्व संसारह नानक वस्यं करोति पंच तसकरह ॥२९॥

म्रिग त्रिसना गंधरब नगरं द्रुम छाया रचि दुरमतिह ॥ ततह कुट्मब मोह मिथ्या सिमरंति नानक राम राम नामह ॥३०॥

नच बिदिआ निधान निगमं नच गुणग्य नाम कीरतनह ॥ नच राग रतन कंठं नह चंचल चतुर चातुरह ॥ भाग उदिम लबध्यं माइआ नानक साधसंगि खल पंडितह ॥३१॥

कंठ रमणीय राम राम माला हसत ऊच प्रेम धारणी ॥ जीह भणि जो उतम सलोक उधरणं नैन नंदनी ॥३२॥

गुर मंत्र हीणस्य जो प्राणी ध्रिगंत जनम भ्रसटणह ॥ कूकरह सूकरह गरधभह काकह सरपनह तुलि खलह ॥३३॥

चरणारबिंद भजनं रिदयं नाम धारणह ॥ कीरतनं साधसंगेण नानक नह द्रिसटंति जमदूतनह ॥३४॥

नच दुरलभं धनं रूपं नच दुरलभं स्वरग राजनह ॥ नच दुरलभं भोजनं बिंजनं नच दुरलभं स्वछ अ्मबरह ॥ नच दुरलभं सुत मित्र भ्रात बांधव नच दुरलभं बनिता बिलासह ॥ नच दुरलभं बिदिआ प्रबीणं नच दुरलभं चतुर चंचलह ॥ दुरलभं एक भगवान नामह नानक लबध्यिं साधसंगि क्रिपा प्रभं ॥३५॥

जत कतह ततह द्रिसटं स्वरग मरत पयाल लोकह ॥ सरबत्र रमणं गोबिंदह नानक लेप छेप न लिप्यते ॥३६॥

बिखया भयंति अम्रितं द्रुसटां सखा स्वजनह ॥ दुखं भयंति सुख्यं भै भीतं त निरभयह ॥ थान बिहून बिस्राम नामं नानक क्रिपाल हरि हरि गुरह ॥३७॥

सरब सील ममं सीलं सरब पावन मम पावनह ॥ सरब करतब ममं करता नानक लेप छेप न लिप्यते ॥३८॥

नह सीतलं चंद्र देवह नह सीतलं बावन चंदनह ॥ नह सीतलं सीत रुतेण नानक सीतलं साध स्वजनह ॥३९॥

मंत्रं राम राम नामं ध्यानं सरबत्र पूरनह ॥ ग्यानं सम दुख सुखं जुगति निरमल निरवैरणह ॥ दयालं सरबत्र जीआ पंच दोख बिवरजितह ॥ भोजनं गोपाल कीरतनं अलप माया जल कमल रहतह ॥ उपदेसं सम मित्र सत्रह भगवंत भगति भावनी ॥ पर निंदा नह स्रोति स्रवणं आपु त्यिागि सगल रेणुकह ॥ खट लख्यण पूरनं पुरखह नानक नाम साध स्वजनह ॥४०॥

अजा भोगंत कंद मूलं बसंते समीपि केहरह ॥ तत्र गते संसारह नानक सोग हरखं बिआपते ॥४१॥

छलं छिद्रं कोटि बिघनं अपराधं किलबिख मलं ॥ भरम मोहं मान अपमानं मदं माया बिआपितं ॥ म्रित्यु जनम भ्रमंति नरकह अनिक उपावं न सिध्यते ॥ निरमलं साध संगह जपंति नानक गोपाल नामं ॥ रमंति गुण गोबिंद नित प्रतह ॥४२॥

तरण सरण सुआमी रमण सील परमेसुरह ॥ करण कारण समरथह दानु देत प्रभु पूरनह ॥ निरास आस करणं सगल अरथ आलयह ॥ गुण निधान सिमरंति नानक सगल जाचंत जाचिकह ॥४३॥

दुरगम सथान सुगमं महा दूख सरब सूखणह ॥ दुरबचन भेद भरमं साकत पिसनं त सुरजनह ॥ असथितं सोग हरखं भै खीणं त निरभवह ॥ भै अटवीअं महा नगर बासं धरम लख्यण प्रभ मइआ ॥ साध संगम राम राम रमणं सरणि नानक हरि हरि दयाल चरणं ॥४४॥

हे अजित सूर संग्रामं अति बलना बहु मरदनह ॥ गण गंधरब देव मानुख्यं पसु पंखी बिमोहनह ॥ हरि करणहारं नमसकारं सरणि नानक जगदीस्वरह ॥४५॥

हे कामं नरक बिस्रामं बहु जोनी भ्रमावणह ॥ चित हरणं त्रै लोक गम्यं जप तप सील बिदारणह ॥ अलप सुख अवित चंचल ऊच नीच समावणह ॥ तव भै बिमुंचित साध संगम ओट नानक नाराइणह ॥४६॥

हे कलि मूल क्रोधं कदंच करुणा न उपरजते ॥ बिखयंत जीवं वस्यं करोति निरत्यं करोति जथा मरकटह ॥ अनिक सासन ताड़ंति जमदूतह तव संगे अधमं नरह ॥ दीन दुख भंजन दयाल प्रभु नानक सरब जीअ रख्या करोति ॥४७॥

हे लोभा ल्मपट संग सिरमोरह अनिक लहरी कलोलते ॥ धावंत जीआ बहु प्रकारं अनिक भांति बहु डोलते ॥ नच मित्रं नच इसटं नच बाधव नच मात पिता तव लजया ॥ अकरणं करोति अखाद्यि खाद्यं असाज्यं साजि समजया ॥ त्राहि त्राहि सरणि सुआमी बिग्याप्ति नानक हरि नरहरह ॥४८॥

हे जनम मरण मूलं अहंकारं पापातमा ॥ मित्रं तजंति सत्रं द्रिड़ंति अनिक माया बिस्तीरनह ॥ आवंत जावंत थकंत जीआ दुख सुख बहु भोगणह ॥ भ्रम भयान उदिआन रमणं महा बिकट असाध रोगणह ॥ बैद्यं पारब्रहम परमेस्वर आराधि नानक हरि हरि हरे ॥४९॥

हे प्राण नाथ गोबिंदह क्रिपा निधान जगद गुरो ॥ हे संसार ताप हरणह करुणा मै सभ दुख हरो ॥ हे सरणि जोग दयालह दीना नाथ मया करो ॥ सरीर स्वसथ खीण समए सिमरंति नानक राम दामोदर माधवह ॥५०॥

चरण कमल सरणं रमणं गोपाल कीरतनह ॥ साध संगेण तरणं नानक महा सागर भै दुतरह ॥५१॥

सिर मस्तक रख्या पारब्रहमं हस्त काया रख्या परमेस्वरह ॥ आतम रख्या गोपाल सुआमी धन चरण रख्या जगदीस्वरह ॥ सरब रख्या गुर दयालह भै दूख बिनासनह ॥ भगति वछल अनाथ नाथे सरणि नानक पुरख अचुतह ॥५२॥

जेन कला धारिओ आकासं बैसंतरं कासट बेसटं ॥ जेन कला ससि सूर नख्यत्र जोत्यिं सासं सरीर धारणं ॥ जेन कला मात गरभ प्रतिपालं नह छेदंत जठर रोगणह ॥ तेन कला असथ्मभं सरोवरं नानक नह छिजंति तरंग तोयणह ॥५३॥

गुसांई गरिस्ट रूपेण सिमरणं सरबत्र जीवणह ॥ लबध्यं संत संगेण नानक स्वछ मारग हरि भगतणह ॥५४॥

मसकं भगनंत सैलं करदमं तरंत पपीलकह ॥ सागरं लंघंति पिंगं तम परगास अंधकह ॥ साध संगेणि सिमरंति गोबिंद सरणि नानक हरि हरि हरे ॥५५॥

तिलक हीणं जथा बिप्रा अमर हीणं जथा राजनह ॥ आवध हीणं जथा सूरा नानक धरम हीणं तथा बैस्नवह ॥५६॥

न संखं न चक्रं न गदा न सिआमं ॥ अस्चरज रूपं रहंत जनमं ॥ नेत नेत कथंति बेदा ॥ ऊच मूच अपार गोबिंदह ॥ बसंति साध रिदयं अचुत बुझंति नानक बडभागीअह ॥५७॥

उदिआन बसनं संसारं सनबंधी स्वान सिआल खरह ॥ बिखम सथान मन मोह मदिरं महां असाध पंच तसकरह ॥ हीत मोह भै भरम भ्रमणं अहं फांस तीख्यण कठिनह ॥ पावक तोअ असाध घोरं अगम तीर नह लंघनह ॥ भजु साधसंगि गोपाल नानक हरि चरण सरण उधरण क्रिपा ॥५८॥

क्रिपा करंत गोबिंद गोपालह सगल्यं रोग खंडणह ॥ साध संगेणि गुण रमत नानक सरणि पूरन परमेसुरह ॥५९॥

सिआमलं मधुर मानुख्यं रिदयं भूमि वैरणह ॥ निवंति होवंति मिथिआ चेतनं संत स्वजनह ॥६०॥

अचेत मूड़ा न जाणंत घटंत सासा नित प्रते ॥ छिजंत महा सुंदरी कांइआ काल कंनिआ ग्रासते ॥ रचंति पुरखह कुट्मब लीला अनित आसा बिखिआ बिनोद ॥ भ्रमंति भ्रमंति बहु जनम हारिओ सरणि नानक करुणा मयह ॥६१॥

हे जिहबे हे रसगे मधुर प्रिअ तुयं ॥ सत हतं परम बादं अवरत एथह सुध अछरणह ॥ गोबिंद दामोदर माधवे ॥६२॥

गरबंति नारी मदोन मतं ॥ बलवंत बलात कारणह ॥ चरन कमल नह भजंत त्रिण समानि ध्रिगु जनमनह ॥ हे पपीलका ग्रसटे गोबिंद सिमरण तुयं धने ॥ नानक अनिक बार नमो नमह ॥६३॥

त्रिणं त मेरं सहकं त हरीअं ॥ बूडं त तरीअं ऊणं त भरीअं ॥ अंधकार कोटि सूर उजारं ॥ बिनवंति नानक हरि गुर दयारं ॥६४॥

ब्रहमणह संगि उधरणं ब्रहम करम जि पूरणह ॥ आतम रतं संसार गहं ते नर नानक निहफलह ॥६५॥

पर दरब हिरणं बहु विघन करणं उचरणं सरब जीअ कह ॥ लउ लई त्रिसना अतिपति मन माए करम करत सि सूकरह ॥६६॥

मते समेव चरणं उधरणं भै दुतरह ॥ अनेक पातिक हरणं नानक साध संगम न संसयह ॥६७॥४॥


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