सलोक (भगत कबीर जी के), Slok (Bhagat Kabir ji ke) Path in Hindi Gurbani online


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सलोक भगत कबीर जीउ के
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

कबीर मेरी सिमरनी रसना ऊपरि रामु ॥ आदि जुगादी सगल भगत ता को सुखु बिस्रामु ॥१॥

कबीर मेरी जाति कउ सभु को हसनेहारु ॥ बलिहारी इस जाति कउ जिह जपिओ सिरजनहारु ॥२॥

कबीर डगमग किआ करहि कहा डुलावहि जीउ ॥ सरब सूख को नाइको राम नाम रसु पीउ ॥३॥

कबीर कंचन के कुंडल बने ऊपरि लाल जड़ाउ ॥ दीसहि दाधे कान जिउ जिन्ह मनि नाही नाउ ॥४॥

कबीर ऐसा एकु आधु जो जीवत मिरतकु होइ ॥ निरभै होइ कै गुन रवै जत पेखउ तत सोइ ॥५॥

कबीर जा दिन हउ मूआ पाछै भइआ अनंदु ॥ मोहि मिलिओ प्रभु आपना संगी भजहि गोबिंदु ॥६॥

कबीर सभ ते हम बुरे हम तजि भलो सभु कोइ ॥ जिनि ऐसा करि बूझिआ मीतु हमारा सोइ ॥७॥

कबीर आई मुझहि पहि अनिक करे करि भेस ॥ हम राखे गुर आपने उनि कीनो आदेसु ॥८॥

कबीर सोई मारीऐ जिह मूऐ सुखु होइ ॥ भलो भलो सभु को कहै बुरो न मानै कोइ ॥९॥

कबीर राती होवहि कारीआ कारे ऊभे जंत ॥ लै फाहे उठि धावते सि जानि मारे भगवंत ॥१०॥

कबीर चंदन का बिरवा भला बेड़्हिओ ढाक पलास ॥ ओइ भी चंदनु होइ रहे बसे जु चंदन पासि ॥११॥

कबीर बांसु बडाई बूडिआ इउ मत डूबहु कोइ ॥ चंदन कै निकटे बसै बांसु सुगंधु न होइ ॥१२॥

कबीर दीनु गवाइआ दुनी सिउ दुनी न चाली साथि ॥ पाइ कुहाड़ा मारिआ गाफलि अपुनै हाथि ॥१३॥

कबीर जह जह हउ फिरिओ कउतक ठाओ ठाइ ॥ इक राम सनेही बाहरा ऊजरु मेरै भांइ ॥१४॥

कबीर संतन की झुंगीआ भली भठि कुसती गाउ ॥ आगि लगउ तिह धउलहर जिह नाही हरि को नाउ ॥१५॥

कबीर संत मूए किआ रोईऐ जो अपुने ग्रिहि जाइ ॥ रोवहु साकत बापुरे जु हाटै हाट बिकाइ ॥१६॥

कबीर साकतु ऐसा है जैसी लसन की खानि ॥ कोने बैठे खाईऐ परगट होइ निदानि ॥१७॥

कबीर माइआ डोलनी पवनु झकोलनहारु ॥ संतहु माखनु खाइआ छाछि पीऐ संसारु ॥१८॥

कबीर माइआ डोलनी पवनु वहै हिव धार ॥ जिनि बिलोइआ तिनि खाइआ अवर बिलोवनहार ॥१९॥

कबीर माइआ चोरटी मुसि मुसि लावै हाटि ॥ एकु कबीरा ना मुसै जिनि कीनी बारह बाट ॥२०॥

कबीर सूखु न एंह जुगि करहि जु बहुतै मीत ॥ जो चितु राखहि एक सिउ ते सुखु पावहि नीत ॥२१॥

कबीर जिसु मरने ते जगु डरै मेरे मनि आनंदु ॥ मरने ही ते पाईऐ पूरनु परमानंदु ॥२२॥

राम पदारथु पाइ कै कबीरा गांठि न खोल्ह ॥ नही पटणु नही पारखू नही गाहकु नही मोलु ॥२३॥

कबीर ता सिउ प्रीति करि जा को ठाकुरु रामु ॥ पंडित राजे भूपती आवहि कउने काम ॥२४॥

कबीर प्रीति इक सिउ कीए आन दुबिधा जाइ ॥ भावै लांबे केस करु भावै घररि मुडाइ ॥२५॥

कबीर जगु काजल की कोठरी अंध परे तिस माहि ॥ हउ बलिहारी तिन कउ पैसि जु नीकसि जाहि ॥२६॥

कबीर इहु तनु जाइगा सकहु त लेहु बहोरि ॥ नांगे पावहु ते गए जिन के लाख करोरि ॥२७॥

कबीर इहु तनु जाइगा कवनै मारगि लाइ ॥ कै संगति करि साध की कै हरि के गुन गाइ ॥२८॥

कबीर मरता मरता जगु मूआ मरि भी न जानिआ कोइ ॥ ऐसे मरने जो मरै बहुरि न मरना होइ ॥२९॥

कबीर मानस जनमु दुल्मभु है होइ न बारै बार ॥ जिउ बन फल पाके भुइ गिरहि बहुरि न लागहि डार ॥३०॥

कबीरा तुही कबीरु तू तेरो नाउ कबीरु ॥ राम रतनु तब पाईऐ जउ पहिले तजहि सरीरु ॥३१॥

कबीर झंखु न झंखीऐ तुमरो कहिओ न होइ ॥ करम करीम जु करि रहे मेटि न साकै कोइ ॥३२॥

कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥ राम कसउटी सो सहै जो मरि जीवा होइ ॥३३॥

कबीर ऊजल पहिरहि कापरे पान सुपारी खाहि ॥ एकस हरि के नाम बिनु बाधे जम पुरि जांहि ॥३४॥

कबीर बेड़ा जरजरा फूटे छेंक हजार ॥ हरूए हरूए तिरि गए डूबे जिन सिर भार ॥३५॥

कबीर हाड जरे जिउ लाकरी केस जरे जिउ घासु ॥ इहु जगु जरता देखि कै भइओ कबीरु उदासु ॥३६॥

कबीर गरबु न कीजीऐ चाम लपेटे हाड ॥ हैवर ऊपरि छत्र तर ते फुनि धरनी गाड ॥३७॥

कबीर गरबु न कीजीऐ ऊचा देखि अवासु ॥ आजु काल्हि भुइ लेटणा ऊपरि जामै घासु ॥३८॥

कबीर गरबु न कीजीऐ रंकु न हसीऐ कोइ ॥ अजहु सु नाउ समुंद्र महि किआ जानउ किआ होइ ॥३९॥

कबीर गरबु न कीजीऐ देही देखि सुरंग ॥ आजु काल्हि तजि जाहुगे जिउ कांचुरी भुयंग ॥४०॥

कबीर लूटना है त लूटि लै राम नाम है लूटि ॥ फिरि पाछै पछुताहुगे प्रान जाहिंगे छूटि ॥४१॥

कबीर ऐसा कोई न जनमिओ अपनै घरि लावै आगि ॥ पांचउ लरिका जारि कै रहै राम लिव लागि ॥४२॥

को है लरिका बेचई लरिकी बेचै कोइ ॥ साझा करै कबीर सिउ हरि संगि बनजु करेइ ॥४३॥

कबीर इह चेतावनी मत सहसा रहि जाइ ॥ पाछै भोग जु भोगवे तिन को गुड़ु लै खाहि ॥४४॥

कबीर मै जानिओ पड़िबो भलो पड़िबे सिउ भल जोगु ॥ भगति न छाडउ राम की भावै निंदउ लोगु ॥४५॥

कबीर लोगु कि निंदै बपुड़ा जिह मनि नाही गिआनु ॥ राम कबीरा रवि रहे अवर तजे सभ काम ॥४६॥

कबीर परदेसी कै घाघरै चहु दिसि लागी आगि ॥ खिंथा जलि कोइला भई तागे आंच न लाग ॥४७॥

कबीर खिंथा जलि कोइला भई खापरु फूट मफूट ॥ जोगी बपुड़ा खेलिओ आसनि रही बिभूति ॥४८॥

कबीर थोरै जलि माछुली झीवरि मेलिओ जालु ॥ इह टोघनै न छूटसहि फिरि करि समुंदु सम्हालि ॥४९॥

कबीर समुंदु न छोडीऐ जउ अति खारो होइ ॥ पोखरि पोखरि ढूढते भलो न कहिहै कोइ ॥५०॥

कबीर निगुसांएं बहि गए थांघी नाही कोइ ॥ दीन गरीबी आपुनी करते होइ सु होइ ॥५१॥

कबीर बैसनउ की कूकरि भली साकत की बुरी माइ ॥ ओह नित सुनै हरि नाम जसु उह पाप बिसाहन जाइ ॥५२॥

कबीर हरना दूबला इहु हरीआरा तालु ॥ लाख अहेरी एकु जीउ केता बंचउ कालु ॥५३॥

कबीर गंगा तीर जु घरु करहि पीवहि निरमल नीरु ॥ बिनु हरि भगति न मुकति होइ इउ कहि रमे कबीर ॥५४॥

कबीर मनु निरमलु भइआ जैसा गंगा नीरु ॥ पाछै लागो हरि फिरै कहत कबीर कबीर ॥५५॥

कबीर हरदी पीअरी चूंनां ऊजल भाइ ॥ राम सनेही तउ मिलै दोनउ बरन गवाइ ॥५६॥

कबीर हरदी पीरतनु हरै चून चिहनु न रहाइ ॥ बलिहारी इह प्रीति कउ जिह जाति बरनु कुलु जाइ ॥५७॥

कबीर मुकति दुआरा संकुरा राई दसएं भाइ ॥ मनु तउ मैगलु होइ रहिओ निकसो किउ कै जाइ ॥५८॥

कबीर ऐसा सतिगुरु जे मिलै तुठा करे पसाउ ॥ मुकति दुआरा मोकला सहजे आवउ जाउ ॥५९॥

कबीर ना मोहि छानि न छापरी ना मोहि घरु नही गाउ ॥ मत हरि पूछै कउनु है मेरे जाति न नाउ ॥६०॥

कबीर मुहि मरने का चाउ है मरउ त हरि कै दुआर ॥ मत हरि पूछै कउनु है परा हमारै बार ॥६१॥

कबीर ना हम कीआ न करहिगे ना करि सकै सरीरु ॥ किआ जानउ किछु हरि कीआ भइओ कबीरु कबीरु ॥६२॥

कबीर सुपनै हू बरड़ाइ कै जिह मुखि निकसै रामु ॥ ता के पग की पानही मेरे तन को चामु ॥६३॥

कबीर माटी के हम पूतरे मानसु राखिओ नाउ ॥ चारि दिवस के पाहुने बड बड रूंधहि ठाउ ॥६४॥

कबीर महिदी करि घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥ तै सह बात न पूछीऐ कबहु न लाई पाइ ॥६५॥

कबीर जिह दरि आवत जातिअहु हटकै नाही कोइ ॥ सो दरु कैसे छोडीऐ जो दरु ऐसा होइ ॥६६॥

कबीर डूबा था पै उबरिओ गुन की लहरि झबकि ॥ जब देखिओ बेड़ा जरजरा तब उतरि परिओ हउ फरकि ॥६७॥

कबीर पापी भगति न भावई हरि पूजा न सुहाइ ॥ माखी चंदनु परहरै जह बिगंध तह जाइ ॥६८॥

कबीर बैदु मूआ रोगी मूआ मूआ सभु संसारु ॥ एकु कबीरा ना मूआ जिह नाही रोवनहारु ॥६९॥

कबीर रामु न धिआइओ मोटी लागी खोरि ॥ काइआ हांडी काठ की ना ओह चर्है बहोरि ॥७०॥

कबीर ऐसी होइ परी मन को भावतु कीनु ॥ मरने ते किआ डरपना जब हाथि सिधउरा लीन ॥७१॥

कबीर रस को गांडो चूसीऐ गुन कउ मरीऐ रोइ ॥ अवगुनीआरे मानसै भलो न कहिहै कोइ ॥७२॥

कबीर गागरि जल भरी आजु काल्हि जैहै फूटि ॥ गुरु जु न चेतहि आपनो अध माझि लीजहिगे लूटि ॥७३॥

कबीर कूकरु राम को मुतीआ मेरो नाउ ॥ गले हमारे जेवरी जह खिंचै तह जाउ ॥७४॥

कबीर जपनी काठ की किआ दिखलावहि लोइ ॥ हिरदै रामु न चेतही इह जपनी किआ होइ ॥७५॥

कबीर बिरहु भुयंगमु मनि बसै मंतु न मानै कोइ ॥ राम बिओगी ना जीऐ जीऐ त बउरा होइ ॥७६॥

कबीर पारस चंदनै तिन्ह है एक सुगंध ॥ तिह मिलि तेऊ ऊतम भए लोह काठ निरगंध ॥७७॥

कबीर जम का ठेंगा बुरा है ओहु नही सहिआ जाइ ॥ एकु जु साधू मोहि मिलिओ तिन्हि लीआ अंचलि लाइ ॥७८॥

कबीर बैदु कहै हउ ही भला दारू मेरै वसि ॥ इह तउ बसतु गुपाल की जब भावै लेइ खसि ॥७९॥

कबीर नउबति आपनी दिन दस लेहु बजाइ ॥ नदी नाव संजोग जिउ बहुरि न मिलहै आइ ॥८०॥

कबीर सात समुंदहि मसु करउ कलम करउ बनराइ ॥ बसुधा कागदु जउ करउ हरि जसु लिखनु न जाइ ॥८१॥

कबीर जाति जुलाहा किआ करै हिरदै बसे गुपाल ॥ कबीर रमईआ कंठि मिलु चूकहि सरब जंजाल ॥८२॥

कबीर ऐसा को नही मंदरु देइ जराइ ॥ पांचउ लरिके मारि कै रहै राम लिउ लाइ ॥८३॥

कबीर ऐसा को नही इहु तनु देवै फूकि ॥ अंधा लोगु न जानई रहिओ कबीरा कूकि ॥८४॥

कबीर सती पुकारै चिह चड़ी सुनु हो बीर मसान ॥ लोगु सबाइआ चलि गइओ हम तुम कामु निदान ॥८५॥

कबीर मनु पंखी भइओ उडि उडि दह दिस जाइ ॥ जो जैसी संगति मिलै सो तैसो फलु खाइ ॥८६॥

कबीर जा कउ खोजते पाइओ सोई ठउरु ॥ सोई फिरि कै तू भइआ जा कउ कहता अउरु ॥८७॥

कबीर मारी मरउ कुसंग की केले निकटि जु बेरि ॥ उह झूलै उह चीरीऐ साकत संगु न हेरि ॥८८॥

कबीर भार पराई सिरि चरै चलिओ चाहै बाट ॥ अपने भारहि ना डरै आगै अउघट घाट ॥८९॥

कबीर बन की दाधी लाकरी ठाढी करै पुकार ॥ मति बसि परउ लुहार के जारै दूजी बार ॥९०॥

कबीर एक मरंते दुइ मूए दोइ मरंतह चारि ॥ चारि मरंतह छह मूए चारि पुरख दुइ नारि ॥९१॥

कबीर देखि देखि जगु ढूंढिआ कहूं न पाइआ ठउरु ॥ जिनि हरि का नामु न चेतिओ कहा भुलाने अउर ॥९२॥

कबीर संगति करीऐ साध की अंति करै निरबाहु ॥ साकत संगु न कीजीऐ जा ते होइ बिनाहु ॥९३॥

कबीर जग महि चेतिओ जानि कै जग महि रहिओ समाइ ॥ जिन हरि का नामु न चेतिओ बादहि जनमें आइ ॥९४॥

कबीर आसा करीऐ राम की अवरै आस निरास ॥ नरकि परहि ते मानई जो हरि नाम उदास ॥९५॥

कबीर सिख साखा बहुते कीए केसो कीओ न मीतु ॥ चाले थे हरि मिलन कउ बीचै अटकिओ चीतु ॥९६॥

कबीर कारनु बपुरा किआ करै जउ रामु न करै सहाइ ॥ जिह जिह डाली पगु धरउ सोई मुरि मुरि जाइ ॥९७॥

कबीर अवरह कउ उपदेसते मुख मै परि है रेतु ॥ रासि बिरानी राखते खाया घर का खेतु ॥९८॥

कबीर साधू की संगति रहउ जउ की भूसी खाउ ॥ होनहारु सो होइहै साकत संगि न जाउ ॥९९॥

कबीर संगति साध की दिन दिन दूना हेतु ॥ साकत कारी कांबरी धोए होइ न सेतु ॥१००॥

कबीर मनु मूंडिआ नही केस मुंडाए कांइ ॥ जो किछु कीआ सो मन कीआ मूंडा मूंडु अजांइ ॥१०१॥

कबीर रामु न छोडीऐ तनु धनु जाइ त जाउ ॥ चरन कमल चितु बेधिआ रामहि नामि समाउ ॥१०२॥

कबीर जो हम जंतु बजावते टूटि गईं सभ तार ॥ जंतु बिचारा किआ करै चले बजावनहार ॥१०३॥

कबीर माइ मूंडउ तिह गुरू की जा ते भरमु न जाइ ॥ आप डुबे चहु बेद महि चेले दीए बहाइ ॥१०४॥

कबीर जेते पाप कीए राखे तलै दुराइ ॥ परगट भए निदान सभ जब पूछे धरम राइ ॥१०५॥

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै पालिओ बहुतु कुट्मबु ॥ धंधा करता रहि गइआ भाई रहिआ न बंधु ॥१०६॥

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै राति जगावन जाइ ॥ सरपनि होइ कै अउतरै जाए अपुने खाइ ॥१०७॥

कबीर हरि का सिमरनु छाडि कै अहोई राखै नारि ॥ गदही होइ कै अउतरै भारु सहै मन चारि ॥१०८॥

कबीर चतुराई अति घनी हरि जपि हिरदै माहि ॥ सूरी ऊपरि खेलना गिरै त ठाहर नाहि ॥१०९॥

कबीर सोई मुखु धंनि है जा मुखि कहीऐ रामु ॥ देही किस की बापुरी पवित्रु होइगो ग्रामु ॥११०॥

कबीर सोई कुल भली जा कुल हरि को दासु ॥ जिह कुल दासु न ऊपजै सो कुल ढाकु पलासु ॥१११॥

कबीर है गइ बाहन सघन घन लाख धजा फहराहि ॥ इआ सुख ते भिख्या भली जउ हरि सिमरत दिन जाहि ॥११२॥

कबीर सभु जगु हउ फिरिओ मांदलु कंध चढाइ ॥ कोई काहू को नही सभ देखी ठोकि बजाइ ॥११३॥

मारगि मोती बीथरे अंधा निकसिओ आइ ॥ जोति बिना जगदीस की जगतु उलंघे जाइ ॥११४॥

बूडा बंसु कबीर का उपजिओ पूतु कमालु ॥ हरि का सिमरनु छाडि कै घरि ले आया मालु ॥११५॥

कबीर साधू कउ मिलने जाईऐ साथि न लीजै कोइ ॥ पाछै पाउ न दीजीऐ आगै होइ सु होइ ॥११६॥

कबीर जगु बाधिओ जिह जेवरी तिह मत बंधहु कबीर ॥ जैहहि आटा लोन जिउ सोन समानि सरीरु ॥११७॥

कबीर हंसु उडिओ तनु गाडिओ सोझाई सैनाह ॥ अजहू जीउ न छोडई रंकाई नैनाह ॥११८॥

कबीर नैन निहारउ तुझ कउ स्रवन सुनउ तुअ नाउ ॥ बैन उचरउ तुअ नाम जी चरन कमल रिद ठाउ ॥११९॥

कबीर सुरग नरक ते मै रहिओ सतिगुर के परसादि ॥ चरन कमल की मउज महि रहउ अंति अरु आदि ॥१२०॥

कबीर चरन कमल की मउज को कहि कैसे उनमान ॥ कहिबे कउ सोभा नही देखा ही परवानु ॥१२१॥

कबीर देखि कै किह कहउ कहे न को पतीआइ ॥ हरि जैसा तैसा उही रहउ हरखि गुन गाइ ॥१२२॥

कबीर चुगै चितारै भी चुगै चुगि चुगि चितारे ॥ जैसे बचरहि कूंज मन माइआ ममता रे ॥१२३॥

कबीर अ्मबर घनहरु छाइआ बरखि भरे सर ताल ॥ चात्रिक जिउ तरसत रहै तिन को कउनु हवालु ॥१२४॥

कबीर चकई जउ निसि बीछुरै आइ मिलै परभाति ॥ जो नर बिछुरे राम सिउ ना दिन मिले न राति ॥१२५॥

कबीर रैनाइर बिछोरिआ रहु रे संख मझूरि ॥ देवल देवल धाहड़ी देसहि उगवत सूर ॥१२६॥

कबीर सूता किआ करहि जागु रोइ भै दुख ॥ जा का बासा गोर महि सो किउ सोवै सुख ॥१२७॥

कबीर सूता किआ करहि उठि कि न जपहि मुरारि ॥ इक दिन सोवनु होइगो लांबे गोड पसारि ॥१२८॥

कबीर सूता किआ करहि बैठा रहु अरु जागु ॥ जा के संग ते बीछुरा ता ही के संगि लागु ॥१२९॥

कबीर संत की गैल न छोडीऐ मारगि लागा जाउ ॥ पेखत ही पुंनीत होइ भेटत जपीऐ नाउ ॥१३०॥

कबीर साकत संगु न कीजीऐ दूरहि जाईऐ भागि ॥ बासनु कारो परसीऐ तउ कछु लागै दागु ॥१३१॥

कबीरा रामु न चेतिओ जरा पहूंचिओ आइ ॥ लागी मंदिर दुआर ते अब किआ काढिआ जाइ ॥१३२॥

कबीर कारनु सो भइओ जो कीनो करतारि ॥ तिसु बिनु दूसरु को नही एकै सिरजनहारु ॥१३३॥

कबीर फल लागे फलनि पाकनि लागे आंब ॥ जाइ पहूचहि खसम कउ जउ बीचि न खाही कांब ॥१३४॥

कबीर ठाकुरु पूजहि मोलि ले मनहठि तीरथ जाहि ॥ देखा देखी स्वांगु धरि भूले भटका खाहि ॥१३५॥

कबीर पाहनु परमेसुरु कीआ पूजै सभु संसारु ॥ इस भरवासे जो रहे बूडे काली धार ॥१३६॥

कबीर कागद की ओबरी मसु के करम कपाट ॥ पाहन बोरी पिरथमी पंडित पाड़ी बाट ॥१३७॥

कबीर कालि करंता अबहि करु अब करता सुइ ताल ॥ पाछै कछू न होइगा जउ सिर परि आवै कालु ॥१३८॥

कबीर ऐसा जंतु इकु देखिआ जैसी धोई लाख ॥ दीसै चंचलु बहु गुना मति हीना नापाक ॥१३९॥

कबीर मेरी बुधि कउ जमु न करै तिसकार ॥ जिनि इहु जमूआ सिरजिआ सु जपिआ परविदगार ॥१४०॥

कबीरु कसतूरी भइआ भवर भए सभ दास ॥ जिउ जिउ भगति कबीर की तिउ तिउ राम निवास ॥१४१॥

कबीर गहगचि परिओ कुट्मब कै कांठै रहि गइओ रामु ॥ आइ परे धरम राइ के बीचहि धूमा धाम ॥१४२॥

कबीर साकत ते सूकर भला राखै आछा गाउ ॥ उहु साकतु बपुरा मरि गइआ कोइ न लैहै नाउ ॥१४३॥

कबीर कउडी कउडी जोरि कै जोरे लाख करोरि ॥ चलती बार न कछु मिलिओ लई लंगोटी तोरि ॥१४४॥

कबीर बैसनो हूआ त किआ भइआ माला मेलीं चारि ॥ बाहरि कंचनु बारहा भीतरि भरी भंगार ॥१४५॥

कबीर रोड़ा होइ रहु बाट का तजि मन का अभिमानु ॥ ऐसा कोई दासु होइ ताहि मिलै भगवानु ॥१४६॥

कबीर रोड़ा हूआ त किआ भइआ पंथी कउ दुखु देइ ॥ ऐसा तेरा दासु है जिउ धरनी महि खेह ॥१४७॥

कबीर खेह हूई तउ किआ भइआ जउ उडि लागै अंग ॥ हरि जनु ऐसा चाहीऐ जिउ पानी सरबंग ॥१४८॥

कबीर पानी हूआ त किआ भइआ सीरा ताता होइ ॥ हरि जनु ऐसा चाहीऐ जैसा हरि ही होइ ॥१४९॥

ऊच भवन कनकामनी सिखरि धजा फहराइ ॥ ता ते भली मधूकरी संतसंगि गुन गाइ ॥१५०॥

कबीर पाटन ते ऊजरु भला राम भगत जिह ठाइ ॥ राम सनेही बाहरा जम पुरु मेरे भांइ ॥१५१॥

कबीर गंग जमुन के अंतरे सहज सुंन के घाट ॥ तहा कबीरै मटु कीआ खोजत मुनि जन बाट ॥१५२॥

कबीर जैसी उपजी पेड ते जउ तैसी निबहै ओड़ि ॥ हीरा किस का बापुरा पुजहि न रतन करोड़ि ॥१५३॥

कबीरा एकु अच्मभउ देखिओ हीरा हाट बिकाइ ॥ बनजनहारे बाहरा कउडी बदलै जाइ ॥१५४॥

कबीरा जहा गिआनु तह धरमु है जहा झूठु तह पापु ॥ जहा लोभु तह कालु है जहा खिमा तह आपि ॥१५५॥

कबीर माइआ तजी त किआ भइआ जउ मानु तजिआ नही जाइ ॥ मान मुनी मुनिवर गले मानु सभै कउ खाइ ॥१५६॥

कबीर साचा सतिगुरु मै मिलिआ सबदु जु बाहिआ एकु ॥ लागत ही भुइ मिलि गइआ परिआ कलेजे छेकु ॥१५७॥

कबीर साचा सतिगुरु किआ करै जउ सिखा महि चूक ॥ अंधे एक न लागई जिउ बांसु बजाईऐ फूक ॥१५८॥

कबीर है गै बाहन सघन घन छत्रपती की नारि ॥ तासु पटंतर ना पुजै हरि जन की पनिहारि ॥१५९॥

कबीर न्रिप नारी किउ निंदीऐ किउ हरि चेरी कउ मानु ॥ ओह मांग सवारै बिखै कउ ओह सिमरै हरि नामु ॥१६०॥

कबीर थूनी पाई थिति भई सतिगुर बंधी धीर ॥ कबीर हीरा बनजिआ मान सरोवर तीर ॥१६१॥

कबीर हरि हीरा जन जउहरी ले कै मांडै हाट ॥ जब ही पाईअहि पारखू तब हीरन की साट ॥१६२॥

कबीर काम परे हरि सिमरीऐ ऐसा सिमरहु नित ॥ अमरा पुर बासा करहु हरि गइआ बहोरै बित ॥१६३॥

कबीर सेवा कउ दुइ भले एकु संतु इकु रामु ॥ रामु जु दाता मुकति को संतु जपावै नामु ॥१६४॥

कबीर जिह मारगि पंडित गए पाछै परी बहीर ॥ इक अवघट घाटी राम की तिह चड़ि रहिओ कबीर ॥१६५॥

कबीर दुनीआ के दोखे मूआ चालत कुल की कानि ॥ तब कुलु किस का लाजसी जब ले धरहि मसानि ॥१६६॥

कबीर डूबहिगो रे बापुरे बहु लोगन की कानि ॥ पारोसी के जो हूआ तू अपने भी जानु ॥१६७॥

कबीर भली मधूकरी नाना बिधि को नाजु ॥ दावा काहू को नही बडा देसु बड राजु ॥१६८॥

कबीर दावै दाझनु होतु है निरदावै रहै निसंक ॥ जो जनु निरदावै रहै सो गनै इंद्र सो रंक ॥१६९॥

कबीर पालि समुहा सरवरु भरा पी न सकै कोई नीरु ॥ भाग बडे तै पाइओ तूं भरि भरि पीउ कबीर ॥१७०॥

कबीर परभाते तारे खिसहि तिउ इहु खिसै सरीरु ॥ ए दुइ अखर ना खिसहि सो गहि रहिओ कबीरु ॥१७१॥

कबीर कोठी काठ की दह दिसि लागी आगि ॥ पंडित पंडित जलि मूए मूरख उबरे भागि ॥१७२॥

कबीर संसा दूरि करु कागद देह बिहाइ ॥ बावन अखर सोधि कै हरि चरनी चितु लाइ ॥१७३॥

कबीर संतु न छाडै संतई जउ कोटिक मिलहि असंत ॥ मलिआगरु भुयंगम बेढिओ त सीतलता न तजंत ॥१७४॥

कबीर मनु सीतलु भइआ पाइआ ब्रहम गिआनु ॥ जिनि जुआला जगु जारिआ सु जन के उदक समानि ॥१७५॥

कबीर सारी सिरजनहार की जानै नाही कोइ ॥ कै जानै आपन धनी कै दासु दीवानी होइ ॥१७६॥

कबीर भली भई जो भउ परिआ दिसा गईं सभ भूलि ॥ ओरा गरि पानी भइआ जाइ मिलिओ ढलि कूलि ॥१७७॥

कबीरा धूरि सकेलि कै पुरीआ बांधी देह ॥ दिवस चारि को पेखना अंति खेह की खेह ॥१७८॥

कबीर सूरज चांद कै उदै भई सभ देह ॥ गुर गोबिंद के बिनु मिले पलटि भई सभ खेह ॥१७९॥

जह अनभउ तह भै नही जह भउ तह हरि नाहि ॥ कहिओ कबीर बिचारि कै संत सुनहु मन माहि ॥१८०॥

कबीर जिनहु किछू जानिआ नही तिन सुख नीद बिहाइ ॥ हमहु जु बूझा बूझना पूरी परी बलाइ ॥१८१॥

कबीर मारे बहुतु पुकारिआ पीर पुकारै अउर ॥ लागी चोट मरम की रहिओ कबीरा ठउर ॥१८२॥

कबीर चोट सुहेली सेल की लागत लेइ उसास ॥ चोट सहारै सबद की तासु गुरू मै दास ॥१८३॥

कबीर मुलां मुनारे किआ चढहि सांई न बहरा होइ ॥ जा कारनि तूं बांग देहि दिल ही भीतरि जोइ ॥१८४॥

सेख सबूरी बाहरा किआ हज काबे जाइ ॥ कबीर जा की दिल साबति नही ता कउ कहां खुदाइ ॥१८५॥

कबीर अलह की करि बंदगी जिह सिमरत दुखु जाइ ॥ दिल महि सांई परगटै बुझै बलंती नांइ ॥१८६॥

कबीर जोरी कीए जुलमु है कहता नाउ हलालु ॥ दफतरि लेखा मांगीऐ तब होइगो कउनु हवालु ॥१८७॥

कबीर खूबु खाना खीचरी जा महि अम्रितु लोनु ॥ हेरा रोटी कारने गला कटावै कउनु ॥१८८॥

कबीर गुरु लागा तब जानीऐ मिटै मोहु तन ताप ॥ हरख सोग दाझै नही तब हरि आपहि आपि ॥१८९॥

कबीर राम कहन महि भेदु है ता महि एकु बिचारु ॥ सोई रामु सभै कहहि सोई कउतकहार ॥१९०॥

कबीर रामै राम कहु कहिबे माहि बिबेक ॥ एकु अनेकहि मिलि गइआ एक समाना एक ॥१९१॥

कबीर जा घर साध न सेवीअहि हरि की सेवा नाहि ॥ ते घर मरहट सारखे भूत बसहि तिन माहि ॥१९२॥

कबीर गूंगा हूआ बावरा बहरा हूआ कान ॥ पावहु ते पिंगुल भइआ मारिआ सतिगुर बान ॥१९३॥

कबीर सतिगुर सूरमे बाहिआ बानु जु एकु ॥ लागत ही भुइ गिरि परिआ परा करेजे छेकु ॥१९४॥

कबीर निरमल बूंद अकास की परि गई भूमि बिकार ॥ बिनु संगति इउ मांनई होइ गई भठ छार ॥१९५॥

कबीर निरमल बूंद अकास की लीनी भूमि मिलाइ ॥ अनिक सिआने पचि गए ना निरवारी जाइ ॥१९६॥

कबीर हज काबे हउ जाइ था आगै मिलिआ खुदाइ ॥ सांई मुझ सिउ लरि परिआ तुझै किन्हि फुरमाई गाइ ॥१९७॥

कबीर हज काबै होइ होइ गइआ केती बार कबीर ॥ सांई मुझ महि किआ खता मुखहु न बोलै पीर ॥१९८॥

कबीर जीअ जु मारहि जोरु करि कहते हहि जु हलालु ॥ दफतरु दई जब काढि है होइगा कउनु हवालु ॥१९९॥

कबीर जोरु कीआ सो जुलमु है लेइ जबाबु खुदाइ ॥ दफतरि लेखा नीकसै मार मुहै मुहि खाइ ॥२००॥

कबीर लेखा देना सुहेला जउ दिल सूची होइ ॥ उसु साचे दीबान महि पला न पकरै कोइ ॥२०१॥

कबीर धरती अरु आकास महि दुइ तूं बरी अबध ॥ खट दरसन संसे परे अरु चउरासीह सिध ॥२०२॥

कबीर मेरा मुझ महि किछु नही जो किछु है सो तेरा ॥ तेरा तुझ कउ सउपते किआ लागै मेरा ॥२०३॥

कबीर तूं तूं करता तू हूआ मुझ महि रहा न हूं ॥ जब आपा पर का मिटि गइआ जत देखउ तत तू ॥२०४॥

कबीर बिकारह चितवते झूठे करते आस ॥ मनोरथु कोइ न पूरिओ चाले ऊठि निरास ॥२०५॥

कबीर हरि का सिमरनु जो करै सो सुखीआ संसारि ॥ इत उत कतहि न डोलई जिस राखै सिरजनहार ॥२०६॥

कबीर घाणी पीड़ते सतिगुर लीए छडाइ ॥ परा पूरबली भावनी परगटु होई आइ ॥२०७॥

कबीर टालै टोलै दिनु गइआ बिआजु बढंतउ जाइ ॥ ना हरि भजिओ न खतु फटिओ कालु पहूंचो आइ ॥२०८॥

महला ५ ॥
कबीर कूकरु भउकना करंग पिछै उठि धाइ ॥ करमी सतिगुरु पाइआ जिनि हउ लीआ छडाइ ॥२०९॥

महला ५ ॥
कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥ धरती भारि न बिआपई उन कउ लाहू लाहि ॥२१०॥

महला ५ ॥
कबीर चावल कारने तुख कउ मुहली लाइ ॥ संगि कुसंगी बैसते तब पूछै धरम राइ ॥२११॥

नामा माइआ मोहिआ कहै तिलोचनु मीत ॥ काहे छीपहु छाइलै राम न लावहु चीतु ॥२१२॥

नामा कहै तिलोचना मुख ते रामु सम्हालि ॥ हाथ पाउ करि कामु सभु चीतु निरंजन नालि ॥२१३॥

महला ५ ॥
कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥ जिनि इहु रचनु रचाइआ तिस ही माहि समाहि ॥२१४॥

कबीर कीचड़ि आटा गिरि परिआ किछू न आइओ हाथ ॥ पीसत पीसत चाबिआ सोई निबहिआ साथ ॥२१५॥

कबीर मनु जानै सभ बात जानत ही अउगनु करै ॥ काहे की कुसलात हाथि दीपु कूए परै ॥२१६॥

कबीर लागी प्रीति सुजान सिउ बरजै लोगु अजानु ॥ ता सिउ टूटी किउ बनै जा के जीअ परान ॥२१७॥

कबीर कोठे मंडप हेतु करि काहे मरहु सवारि ॥ कारजु साढे तीनि हथ घनी त पउने चारि ॥२१८॥

कबीर जो मै चितवउ ना करै किआ मेरे चितवे होइ ॥ अपना चितविआ हरि करै जो मेरे चिति न होइ ॥२१९॥

मः ३ ॥
चिंता भि आपि कराइसी अचिंतु भि आपे देइ ॥ नानक सो सालाहीऐ जि सभना सार करेइ ॥२२०॥

मः ५ ॥
कबीर रामु न चेतिओ फिरिआ लालच माहि ॥ पाप करंता मरि गइआ अउध पुनी खिन माहि ॥२२१॥

कबीर काइआ काची कारवी केवल काची धातु ॥ साबतु रखहि त राम भजु नाहि त बिनठी बात ॥२२२॥

कबीर केसो केसो कूकीऐ न सोईऐ असार ॥ राति दिवस के कूकने कबहू के सुनै पुकार ॥२२३॥

कबीर काइआ कजली बनु भइआ मनु कुंचरु मय मंतु ॥ अंकसु ग्यानु रतनु है खेवटु बिरला संतु ॥२२४॥

कबीर राम रतनु मुखु कोथरी पारख आगै खोलि ॥ कोई आइ मिलैगो गाहकी लेगो महगे मोलि ॥२२५॥

कबीर राम नामु जानिओ नही पालिओ कटकु कुट्मबु ॥ धंधे ही महि मरि गइओ बाहरि भई न ब्मब ॥२२६॥

कबीर आखी केरे माटुके पलु पलु गई बिहाइ ॥ मनु जंजालु न छोडई जम दीआ दमामा आइ ॥२२७॥

कबीर तरवर रूपी रामु है फल रूपी बैरागु ॥ छाइआ रूपी साधु है जिनि तजिआ बादु बिबादु ॥२२८॥

कबीर ऐसा बीजु बोइ बारह मास फलंत ॥ सीतल छाइआ गहिर फल पंखी केल करंत ॥२२९॥

कबीर दाता तरवरु दया फलु उपकारी जीवंत ॥ पंखी चले दिसावरी बिरखा सुफल फलंत ॥२३०॥

कबीर साधू संगु परापती लिखिआ होइ लिलाट ॥ मुकति पदारथु पाईऐ ठाक न अवघट घाट ॥२३१॥

कबीर एक घड़ी आधी घरी आधी हूं ते आध ॥ भगतन सेती गोसटे जो कीने सो लाभ ॥२३२॥

कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥ तीरथ बरत नेम कीए ते सभै रसातलि जांहि ॥२३३॥

नीचे लोइन करि रहउ ले साजन घट माहि ॥ सभ रस खेलउ पीअ सउ किसी लखावउ नाहि ॥२३४॥

आठ जाम चउसठि घरी तुअ निरखत रहै जीउ ॥ नीचे लोइन किउ करउ सभ घट देखउ पीउ ॥२३५॥

सुनु सखी पीअ महि जीउ बसै जीअ महि बसै कि पीउ ॥ जीउ पीउ बूझउ नही घट महि जीउ कि पीउ ॥२३६॥

कबीर बामनु गुरू है जगत का भगतन का गुरु नाहि ॥ अरझि उरझि कै पचि मूआ चारउ बेदहु माहि ॥२३७॥

हरि है खांडु रेतु महि बिखरी हाथी चुनी न जाइ ॥ कहि कबीर गुरि भली बुझाई कीटी होइ कै खाइ ॥२३८॥

कबीर जउ तुहि साध पिरम की सीसु काटि करि गोइ ॥ खेलत खेलत हाल करि जो किछु होइ त होइ ॥२३९॥

कबीर जउ तुहि साध पिरम की पाके सेती खेलु ॥ काची सरसउं पेलि कै ना खलि भई न तेलु ॥२४०॥

ढूंढत डोलहि अंध गति अरु चीनत नाही संत ॥ कहि नामा किउ पाईऐ बिनु भगतहु भगवंतु ॥२४१॥

हरि सो हीरा छाडि कै करहि आन की आस ॥ ते नर दोजक जाहिगे सति भाखै रविदास ॥२४२॥

कबीर जउ ग्रिहु करहि त धरमु करु नाही त करु बैरागु ॥ बैरागी बंधनु करै ता को बडो अभागु ॥२४३॥


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