(भट्टा के) सवईए महले चउथे के, (Bhatt) Savaiye Mahalle 4 Ke Path in Hindi Gurbani online


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सवईए महले चउथे के ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

इक मनि पुरखु निरंजनु धिआवउ ॥ गुर प्रसादि हरि गुण सद गावउ ॥ गुन गावत मनि होइ बिगासा ॥ सतिगुर पूरि जनह की आसा ॥ सतिगुरु सेवि परम पदु पायउ ॥ अबिनासी अबिगतु धिआयउ ॥ तिसु भेटे दारिद्रु न च्मपै ॥ कल्य सहारु तासु गुण ज्मपै ॥ ज्मपउ गुण बिमल सुजन जन केरे अमिअ नामु जा कउ फुरिआ ॥ इनि सतगुरु सेवि सबद रसु पाया नामु निरंजन उरि धरिआ ॥ हरि नाम रसिकु गोबिंद गुण गाहकु चाहकु तत समत सरे ॥ कवि कल्य ठकुर हरदास तने गुर रामदास सर अभर भरे ॥१॥

छुटत परवाह अमिअ अमरा पद अम्रित सरोवर सद भरिआ ॥ ते पीवहि संत करहि मनि मजनु पुब जिनहु सेवा करीआ ॥ तिन भउ निवारि अनभै पदु दीना सबद मात्र ते उधर धरे ॥ कवि कल्य ठकुर हरदास तने गुर रामदास सर अभर भरे ॥२॥

सतगुर मति गूड़्ह बिमल सतसंगति आतमु रंगि चलूलु भया ॥ जाग्या मनु कवलु सहजि परकास्या अभै निरंजनु घरहि लहा ॥ सतगुरि दयालि हरि नामु द्रिड़्हाया तिसु प्रसादि वसि पंच करे ॥ कवि कल्य ठकुर हरदास तने गुर रामदास सर अभर भरे ॥३॥

अनभउ उनमानि अकल लिव लागी पारसु भेटिआ सहज घरे ॥ सतगुर परसादि परम पदु पाया भगति भाइ भंडार भरे ॥ मेटिआ जनमांतु मरण भउ भागा चितु लागा संतोख सरे ॥ कवि कल्य ठकुर हरदास तने गुर रामदास सर अभर भरे ॥४॥

अभर भरे पायउ अपारु रिद अंतरि धारिओ ॥ दुख भंजनु आतम प्रबोधु मनि ततु बीचारिओ ॥ सदा चाइ हरि भाइ प्रेम रसु आपे जाणइ ॥ सतगुर कै परसादि सहज सेती रंगु माणइ ॥ नानक प्रसादि अंगद सुमति गुरि अमरि अमरु वरताइओ ॥ गुर रामदास कल्युचरै तैं अटल अमर पदु पाइओ ॥५॥

संतोख सरोवरि बसै अमिअ रसु रसन प्रकासै ॥ मिलत सांति उपजै दुरतु दूरंतरि नासै ॥ सुख सागरु पाइअउ दिंतु हरि मगि न हुटै ॥ संजमु सतु संतोखु सील संनाहु मफुटै ॥ सतिगुरु प्रमाणु बिध नै सिरिउ जगि जस तूरु बजाइअउ ॥ गुर रामदास कल्युचरै तै अभै अमर पदु पाइअउ ॥६॥

जगु जितउ सतिगुर प्रमाणि मनि एकु धिआयउ ॥ धनि धनि सतिगुर अमरदासु जिनि नामु द्रिड़ायउ ॥ नव निधि नामु निधानु रिधि सिधि ता की दासी ॥ सहज सरोवरु मिलिओ पुरखु भेटिओ अबिनासी ॥ आदि ले भगत जितु लगि तरे सो गुरि नामु द्रिड़ाइअउ ॥ गुर रामदास कल्युचरै तै हरि प्रेम पदारथु पाइअउ ॥७॥

प्रेम भगति परवाह प्रीति पुबली न हुटइ ॥ सतिगुर सबदु अथाहु अमिअ धारा रसु गुटइ ॥ मति माता संतोखु पिता सरि सहज समायउ ॥ आजोनी स्मभविअउ जगतु गुर बचनि तरायउ ॥ अबिगत अगोचरु अपरपरु मनि गुर सबदु वसाइअउ ॥ गुर रामदास कल्युचरै तै जगत उधारणु पाइअउ ॥८॥

जगत उधारणु नव निधानु भगतह भव तारणु ॥ अम्रित बूंद हरि नामु बिसु की बिखै निवारणु ॥ सहज तरोवर फलिओ गिआन अम्रित फल लागे ॥ गुर प्रसादि पाईअहि धंनि ते जन बडभागे ॥ ते मुकते भए सतिगुर सबदि मनि गुर परचा पाइअउ ॥ गुर रामदास कल्युचरै तै सबद नीसानु बजाइअउ ॥९॥

सेज सधा सहजु छावाणु संतोखु सराइचउ सदा सील संनाहु सोहै ॥ गुर सबदि समाचरिओ नामु टेक संगादि बोहै ॥ अजोनीउ भल्यु अमलु सतिगुर संगि निवासु ॥ गुर रामदास कल्युचरै तुअ सहज सरोवरि बासु ॥१०॥

गुरु जिन्ह कउ सुप्रसंनु नामु हरि रिदै निवासै ॥ जिन्ह कउ गुरु सुप्रसंनु दुरतु दूरंतरि नासै ॥ गुरु जिन्ह कउ सुप्रसंनु मानु अभिमानु निवारै ॥ जिन्ह कउ गुरु सुप्रसंनु सबदि लगि भवजलु तारै ॥ परचउ प्रमाणु गुर पाइअउ तिन सकयथउ जनमु जगि ॥ स्री गुरू सरणि भजु कल्य कबि भुगति मुकति सभ गुरू लगि ॥११॥

सतिगुरि खेमा ताणिआ जुग जूथ समाणे ॥ अनभउ नेजा नामु टेक जितु भगत अघाणे ॥ गुरु नानकु अंगदु अमरु भगत हरि संगि समाणे ॥ इहु राज जोग गुर रामदास तुम्ह हू रसु जाणे ॥१२॥

जनकु सोइ जिनि जाणिआ उनमनि रथु धरिआ ॥ सतु संतोखु समाचरे अभरा सरु भरिआ ॥ अकथ कथा अमरा पुरी जिसु देइ सु पावै ॥ इहु जनक राजु गुर रामदास तुझ ही बणि आवै ॥१३॥

सतिगुर नामु एक लिव मनि जपै द्रिड़्हु तिन्ह जन दुख पापु कहु कत होवै जीउ ॥ तारण तरण खिन मात्र जा कउ द्रिस्टि धारै सबदु रिद बीचारै कामु क्रोधु खोवै जीउ ॥ जीअन सभन दाता अगम ग्यान बिख्याता अहिनिसि ध्यान धावै पलक न सोवै जीउ ॥ जा कउ देखत दरिद्रु जावै नामु सो निधानु पावै गुरमुखि ग्यानि दुरमति मैलु धोवै जीउ ॥ सतिगुर नामु एक लिव मनि जपै द्रिड़ु तिन जन दुख पाप कहु कत होवै जीउ ॥१॥

धरम करम पूरै सतिगुरु पाई है ॥ जा की सेवा सिध साध मुनि जन सुरि नर जाचहि सबद सारु एक लिव लाई है ॥ फुनि जानै को तेरा अपारु निरभउ निरंकारु अकथ कथनहारु तुझहि बुझाई है ॥ भरम भूले संसार छुटहु जूनी संघार जम को न डंड काल गुरमति ध्याई है ॥ मन प्राणी मुगध बीचारु अहिनिसि जपु धरम करम पूरै सतिगुरु पाई है ॥२॥

हउ बलि बलि जाउ सतिगुर साचे नाम पर ॥ कवन उपमा देउ कवन सेवा सरेउ एक मुख रसना रसहु जुग जोरि कर ॥ फुनि मन बच क्रम जानु अनत दूजा न मानु नामु सो अपारु सारु दीनो गुरि रिद धर ॥ नल्य कवि पारस परस कच कंचना हुइ चंदना सुबासु जासु सिमरत अन तर ॥ जा के देखत दुआरे काम क्रोध ही निवारे जी हउ बलि बलि जाउ सतिगुर साचे नाम पर ॥३॥

राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥ प्रथमे नानक चंदु जगत भयो आनंदु तारनि मनुख्य जन कीअउ प्रगास ॥ गुर अंगद दीअउ निधानु अकथ कथा गिआनु पंच भूत बसि कीने जमत न त्रास ॥ गुर अमरु गुरू स्री सति कलिजुगि राखी पति अघन देखत गतु चरन कवल जास ॥ सभ बिधि मान्यिउ मनु तब ही भयउ प्रसंनु राजु जोगु तखतु दीअनु गुर रामदास ॥४॥

रड ॥
जिसहि धारि्यउ धरति अरु विउमु अरु पवणु ते नीर सर अवर अनल अनादि कीअउ ॥ ससि रिखि निसि सूर दिनि सैल तरूअ फल फुल दीअउ ॥ सुरि नर सपत समुद्र किअ धारिओ त्रिभवण जासु ॥ सोई एकु नामु हरि नामु सति पाइओ गुर अमर प्रगासु ॥१॥५॥

कचहु कंचनु भइअउ सबदु गुर स्रवणहि सुणिओ ॥ बिखु ते अम्रितु हुयउ नामु सतिगुर मुखि भणिअउ ॥ लोहउ होयउ लालु नदरि सतिगुरु जदि धारै ॥ पाहण माणक करै गिआनु गुर कहिअउ बीचारै ॥ काठहु स्रीखंड सतिगुरि कीअउ दुख दरिद्र तिन के गइअ ॥ सतिगुरू चरन जिन्ह परसिआ से पसु परेत सुरि नर भइअ ॥२॥६॥

जामि गुरू होइ वलि धनहि किआ गारवु दिजइ ॥ जामि गुरू होइ वलि लख बाहे किआ किजइ ॥ जामि गुरू होइ वलि गिआन अरु धिआन अनन परि ॥ जामि गुरू होइ वलि सबदु साखी सु सचह घरि ॥ जो गुरू गुरू अहिनिसि जपै दासु भटु बेनति कहै ॥ जो गुरू नामु रिद महि धरै सो जनम मरण दुह थे रहै ॥३॥७॥

गुर बिनु घोरु अंधारु गुरू बिनु समझ न आवै ॥ गुर बिनु सुरति न सिधि गुरू बिनु मुकति न पावै ॥ गुरु करु सचु बीचारु गुरू करु रे मन मेरे ॥ गुरु करु सबद सपुंन अघन कटहि सभ तेरे ॥ गुरु नयणि बयणि गुरु गुरु करहु गुरू सति कवि नल्य कहि ॥ जिनि गुरू न देखिअउ नहु कीअउ ते अकयथ संसार महि ॥४॥८॥

गुरू गुरू गुरु करु मन मेरे ॥ तारण तरण सम्रथु कलिजुगि सुनत समाधि सबद जिसु केरे ॥ फुनि दुखनि नासु सुखदायकु सूरउ जो धरत धिआनु बसत तिह नेरे ॥ पूरउ पुरखु रिदै हरि सिमरत मुखु देखत अघ जाहि परेरे ॥ जउ हरि बुधि रिधि सिधि चाहत गुरू गुरू गुरु करु मन मेरे ॥५॥९॥

गुरू मुखु देखि गरू सुखु पायउ ॥ हुती जु पिआस पिऊस पिवंन की बंछत सिधि कउ बिधि मिलायउ ॥ पूरन भो मन ठउर बसो रस बासन सिउ जु दहं दिसि धायउ ॥ गोबिंद वालु गोबिंद पुरी सम जल्यन तीरि बिपास बनायउ ॥ गयउ दुखु दूरि बरखन को सु गुरू मुखु देखि गरू सुखु पायउ ॥६॥१०॥

समरथ गुरू सिरि हथु धर्यउ ॥ गुरि कीनी क्रिपा हरि नामु दीअउ जिसु देखि चरंन अघंन हर्यउ ॥ निसि बासुर एक समान धिआन सु नाम सुने सुतु भान डर्यउ ॥ भनि दास सु आस जगत्र गुरू की पारसु भेटि परसु कर्यउ ॥ रामदासु गुरू हरि सति कीयउ समरथ गुरू सिरि हथु धर्यउ ॥७॥११॥

अब राखहु दास भाट की लाज ॥ जैसी राखी लाज भगत प्रहिलाद की हरनाखस फारे कर आज ॥ फुनि द्रोपती लाज रखी हरि प्रभ जी छीनत बसत्र दीन बहु साज ॥ सोदामा अपदा ते राखिआ गनिका पड़्हत पूरे तिह काज ॥ स्री सतिगुर सुप्रसंन कलजुग होइ राखहु दास भाट की लाज ॥८॥१२॥

झोलना ॥
गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु प्रानीअहु ॥ सबदु हरि हरि जपै नामु नव निधि अपै रसनि अहिनिसि रसै सति करि जानीअहु ॥ फुनि प्रेम रंग पाईऐ गुरमुखहि धिआईऐ अंन मारग तजहु भजहु हरि ग्यानीअहु ॥ बचन गुर रिदि धरहु पंच भू बसि करहु जनमु कुल उधरहु द्वारि हरि मानीअहु ॥ जउ त सभ सुख इत उत तुम बंछवहु गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु प्रानीअहु ॥१॥१३॥

गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपि सति करि ॥ अगम गुन जानु निधानु हरि मनि धरहु ध्यानु अहिनिसि करहु बचन गुर रिदै धरि ॥ फुनि गुरू जल बिमल अथाह मजनु करहु संत गुरसिख तरहु नाम सच रंग सरि ॥ सदा निरवैरु निरंकारु निरभउ जपै प्रेम गुर सबद रसि करत द्रिड़ु भगति हरि ॥ मुगध मन भ्रमु तजहु नामु गुरमुखि भजहु गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु सति करि ॥२॥१४॥

गुरू गुरु गुरु करहु गुरू हरि पाईऐ ॥ उदधि गुरु गहिर ग्मभीर बेअंतु हरि नाम नग हीर मणि मिलत लिव लाईऐ ॥ फुनि गुरू परमल सरस करत कंचनु परस मैलु दुरमति हिरत सबदि गुरु ध्याईऐ ॥ अम्रित परवाह छुटकंत सद द्वारि जिसु ग्यान गुर बिमल सर संत सिख नाईऐ ॥ नामु निरबाणु निधानु हरि उरि धरहु गुरू गुरु गुरु करहु गुरू हरि पाईऐ ॥३॥१५॥

गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु मंन रे ॥ जा की सेव सिव सिध साधिक सुर असुर गण तरहि तेतीस गुर बचन सुणि कंन रे ॥ फुनि तरहि ते संत हित भगत गुरु गुरु करहि तरिओ प्रहलादु गुर मिलत मुनि जंन रे ॥ तरहि नारदादि सनकादि हरि गुरमुखहि तरहि इक नाम लगि तजहु रस अंन रे ॥ दासु बेनति कहै नामु गुरमुखि लहै गुरू गुरु गुरू गुरु गुरू जपु मंन रे ॥४॥१६॥२९॥

सिरी गुरू साहिबु सभ ऊपरि ॥ करी क्रिपा सतजुगि जिनि ध्रू परि ॥ स्री प्रहलाद भगत उधरीअं ॥ हस्त कमल माथे पर धरीअं ॥ अलख रूप जीअ लख्या न जाई ॥ साधिक सिध सगल सरणाई ॥ गुर के बचन सति जीअ धारहु ॥ माणस जनमु देह निस्तारहु ॥ गुरु जहाजु खेवटु गुरू गुर बिनु तरिआ न कोइ ॥ गुर प्रसादि प्रभु पाईऐ गुर बिनु मुकति न होइ ॥ गुरु नानकु निकटि बसै बनवारी ॥ तिनि लहणा थापि जोति जगि धारी ॥ लहणै पंथु धरम का कीआ ॥ अमरदास भले कउ दीआ ॥ तिनि स्री रामदासु सोढी थिरु थप्यउ ॥ हरि का नामु अखै निधि अप्यउ ॥ अप्यउ हरि नामु अखै निधि चहु जुगि गुर सेवा करि फलु लहीअं ॥ बंदहि जो चरण सरणि सुखु पावहि परमानंद गुरमुखि कहीअं ॥ परतखि देह पारब्रहमु सुआमी आदि रूपि पोखण भरणं ॥ सतिगुरु गुरु सेवि अलख गति जा की स्री रामदासु तारण तरणं ॥१॥

जिह अम्रित बचन बाणी साधू जन जपहि करि बिचिति चाओ ॥ आनंदु नित मंगलु गुर दरसनु सफलु संसारि ॥ संसारि सफलु गंगा गुर दरसनु परसन परम पवित्र गते ॥ जीतहि जम लोकु पतित जे प्राणी हरि जन सिव गुर ग्यानि रते ॥ रघुबंसि तिलकु सुंदरु दसरथ घरि मुनि बंछहि जा की सरणं ॥ सतिगुरु गुरु सेवि अलख गति जा की स्री रामदासु तारण तरणं ॥२॥

संसारु अगम सागरु तुलहा हरि नामु गुरू मुखि पाया ॥ जगि जनम मरणु भगा इह आई हीऐ परतीति ॥ परतीति हीऐ आई जिन जन कै तिन्ह कउ पदवी उच भई ॥ तजि माइआ मोहु लोभु अरु लालचु काम क्रोध की ब्रिथा गई ॥ अवलोक्या ब्रहमु भरमु सभु छुटक्या दिब्य द्रिस्टि कारण करणं ॥ सतिगुरु गुरु सेवि अलख गति जा की स्री रामदासु तारण तरणं ॥३॥

परतापु सदा गुर का घटि घटि परगासु भया जसु जन कै ॥ इकि पड़हि सुणहि गावहि परभातिहि करहि इस्नानु ॥ इस्नानु करहि परभाति सुध मनि गुर पूजा बिधि सहित करं ॥ कंचनु तनु होइ परसि पारस कउ जोति सरूपी ध्यानु धरं ॥ जगजीवनु जगंनाथु जल थल महि रहिआ पूरि बहु बिधि बरनं ॥ सतिगुरु गुरु सेवि अलख गति जा की स्री रामदासु तारण तरणं ॥४॥

जिनहु बात निस्चल ध्रूअ जानी तेई जीव काल ते बचा ॥ तिन्ह तरिओ समुद्रु रुद्रु खिन इक महि जलहर बि्मब जुगति जगु रचा ॥ कुंडलनी सुरझी सतसंगति परमानंद गुरू मुखि मचा ॥ सिरी गुरू साहिबु सभ ऊपरि मन बच क्रम सेवीऐ सचा ॥५॥

वाहिगुरू वाहिगुरू वाहिगुरू वाहि जीउ ॥ कवल नैन मधुर बैन कोटि सैन संग सोभ कहत मा जसोद जिसहि दही भातु खाहि जीउ ॥ देखि रूपु अति अनूपु मोह महा मग भई किंकनी सबद झनतकार खेलु पाहि जीउ ॥ काल कलम हुकमु हाथि कहहु कउनु मेटि सकै ईसु बम्यु ग्यानु ध्यानु धरत हीऐ चाहि जीउ ॥ सति साचु स्री निवासु आदि पुरखु सदा तुही वाहिगुरू वाहिगुरू वाहिगुरू वाहि जीउ ॥१॥६॥

राम नाम परम धाम सुध बुध निरीकार बेसुमार सरबर कउ काहि जीउ ॥ सुथर चित भगत हित भेखु धरिओ हरनाखसु हरिओ नख बिदारि जीउ ॥ संख चक्र गदा पदम आपि आपु कीओ छदम अपर्मपर पारब्रहम लखै कउनु ताहि जीउ ॥ सति साचु स्री निवासु आदि पुरखु सदा तुही वाहिगुरू वाहिगुरू वाहिगुरू वाहि जीउ ॥२॥७॥

पीत बसन कुंद दसन प्रिआ सहित कंठ माल मुकटु सीसि मोर पंख चाहि जीउ ॥ बेवजीर बडे धीर धरम अंग अलख अगम खेलु कीआ आपणै उछाहि जीउ ॥ अकथ कथा कथी न जाइ तीनि लोक रहिआ समाइ सुतह सिध रूपु धरिओ साहन कै साहि जीउ ॥ सति साचु स्री निवासु आदि पुरखु सदा तुही वाहिगुरू वाहिगुरू वाहिगुरू वाहि जीउ ॥३॥८॥

सतिगुरू सतिगुरू सतिगुरु गुबिंद जीउ ॥ बलिहि छलन सबल मलन भग्ति फलन कान्ह कुअर निहकलंक बजी डंक चड़्हू दल रविंद जीउ ॥ राम रवण दुरत दवण सकल भवण कुसल करण सरब भूत आपि ही देवाधि देव सहस मुख फनिंद जीउ ॥ जरम करम मछ कछ हुअ बराह जमुना कै कूलि खेलु खेलिओ जिनि गिंद जीउ ॥ नामु सारु हीए धारु तजु बिकारु मन गयंद सतिगुरू सतिगुरू सतिगुर गुबिंद जीउ ॥४॥९॥

सिरी गुरू सिरी गुरू सिरी गुरू सति जीउ ॥ गुर कहिआ मानु निज निधानु सचु जानु मंत्रु इहै निसि बासुर होइ कल्यानु लहहि परम गति जीउ ॥ कामु क्रोधु लोभु मोहु जण जण सिउ छाडु धोहु हउमै का फंधु काटु साधसंगि रति जीउ ॥ देह गेहु त्रिअ सनेहु चित बिलासु जगत एहु चरन कमल सदा सेउ द्रिड़ता करु मति जीउ ॥ नामु सारु हीए धारु तजु बिकारु मन गयंद सिरी गुरू सिरी गुरू सिरी गुरू सति जीउ ॥५॥१०॥

सेवक कै भरपूर जुगु जुगु वाहगुरू तेरा सभु सदका ॥ निरंकारु प्रभु सदा सलामति कहि न सकै कोऊ तू कद का ॥ ब्रहमा बिसनु सिरे तै अगनत तिन कउ मोहु भया मन मद का ॥ चवरासीह लख जोनि उपाई रिजकु दीआ सभ हू कउ तद का ॥ सेवक कै भरपूर जुगु जुगु वाहगुरू तेरा सभु सदका ॥१॥११॥

वाहु वाहु का बडा तमासा ॥ आपे हसै आपि ही चितवै आपे चंदु सूरु परगासा ॥ आपे जलु आपे थलु थम्हनु आपे कीआ घटि घटि बासा ॥ आपे नरु आपे फुनि नारी आपे सारि आप ही पासा ॥ गुरमुखि संगति सभै बिचारहु वाहु वाहु का बडा तमासा ॥२॥१२॥ कीआ खेलु बड मेलु तमासा वाहिगुरू तेरी सभ रचना ॥ तू जलि थलि गगनि पयालि पूरि रह्या अम्रित ते मीठे जा के बचना ॥ मानहि ब्रहमादिक रुद्रादिक काल का कालु निरंजन जचना ॥ गुर प्रसादि पाईऐ परमारथु सतसंगति सेती मनु खचना ॥ कीआ खेलु बड मेलु तमासा वाहगुरू तेरी सभ रचना ॥३॥१३॥४२॥

अगमु अनंतु अनादि आदि जिसु कोइ न जाणै ॥ सिव बिरंचि धरि ध्यानु नितहि जिसु बेदु बखाणै ॥ निरंकारु निरवैरु अवरु नही दूसर कोई ॥ भंजन गड़्हण समथु तरण तारण प्रभु सोई ॥ नाना प्रकार जिनि जगु कीओ जनु मथुरा रसना रसै ॥ स्री सति नामु करता पुरखु गुर रामदास चितह बसै ॥१॥

गुरू समरथु गहि करीआ ध्रुव बुधि सुमति सम्हारन कउ ॥ फुनि ध्रम धुजा फहरंति सदा अघ पुंज तरंग निवारन कउ ॥ मथुरा जन जानि कही जीअ साचु सु अउर कछू न बिचारन कउ ॥ हरि नामु बोहिथु बडौ कलि मै भव सागर पारि उतारन कउ ॥२॥

संतत ही सतसंगति संग सुरंग रते जसु गावत है ॥ ध्रम पंथु धरिओ धरनीधर आपि रहे लिव धारि न धावत है ॥ मथुरा भनि भाग भले उन्ह के मन इछत ही फल पावत है ॥ रवि के सुत को तिन्ह त्रासु कहा जु चरंन गुरू चितु लावत है ॥३॥

निरमल नामु सुधा परपूरन सबद तरंग प्रगटित दिन आगरु ॥ गहिर ग्मभीरु अथाह अति बड सुभरु सदा सभ बिधि रतनागरु ॥ संत मराल करहि कंतूहल तिन जम त्रास मिटिओ दुख कागरु ॥ कलजुग दुरत दूरि करबे कउ दरसनु गुरू सगल सुख सागरु ॥४॥

जा कउ मुनि ध्यानु धरै फिरत सगल जुग कबहु क कोऊ पावै आतम प्रगास कउ ॥ बेद बाणी सहित बिरंचि जसु गावै जा को सिव मुनि गहि न तजात कबिलास कंउ ॥ जा कौ जोगी जती सिध साधिक अनेक तप जटा जूट भेख कीए फिरत उदास कउ ॥ सु तिनि सतिगुरि सुख भाइ क्रिपा धारी जीअ नाम की बडाई दई गुर रामदास कउ ॥५॥

नामु निधानु धिआन अंतरगति तेज पुंज तिहु लोग प्रगासे ॥ देखत दरसु भटकि भ्रमु भजत दुख परहरि सुख सहज बिगासे ॥ सेवक सिख सदा अति लुभित अलि समूह जिउ कुसम सुबासे ॥ बिद्यमान गुरि आपि थप्यउ थिरु साचउ तखतु गुरू रामदासै ॥६॥

तार्यउ संसारु माया मद मोहित अम्रित नामु दीअउ समरथु ॥ फुनि कीरतिवंत सदा सुख स्मपति रिधि अरु सिधि न छोडइ सथु ॥ दानि बडौ अतिवंतु महाबलि सेवकि दासि कहिओ इहु तथु ॥ ताहि कहा परवाह काहू की जा कै बसीसि धरिओ गुरि हथु ॥७॥४९॥

तीनि भवन भरपूरि रहिओ सोई ॥ अपन सरसु कीअउ न जगत कोई ॥ आपुन आपु आप ही उपायउ ॥ सुरि नर असुर अंतु नही पायउ ॥ पायउ नही अंतु सुरे असुरह नर गण गंध्रब खोजंत फिरे ॥ अबिनासी अचलु अजोनी स्मभउ पुरखोतमु अपार परे ॥ करण कारण समरथु सदा सोई सरब जीअ मनि ध्याइयउ ॥ स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥१॥

सतिगुरि नानकि भगति करी इक मनि तनु मनु धनु गोबिंद दीअउ ॥ अंगदि अनंत मूरति निज धारी अगम ग्यानि रसि रस्यउ हीअउ ॥ गुरि अमरदासि करतारु कीअउ वसि वाहु वाहु करि ध्याइयउ ॥ स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥२॥

नारदु ध्रू प्रहलादु सुदामा पुब भगत हरि के जु गणं ॥ अ्मबरीकु जयदेव त्रिलोचनु नामा अवरु कबीरु भणं ॥ तिन कौ अवतारु भयउ कलि भिंतरि जसु जगत्र परि छाइयउ ॥ स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥३॥

मनसा करि सिमरंत तुझै नर कामु क्रोधु मिटिअउ जु तिणं ॥ बाचा करि सिमरंत तुझै तिन्ह दुखु दरिद्रु मिटयउ जु खिणं ॥ करम करि तुअ दरस परस पारस सर बल्य भट जसु गाइयउ ॥ स्री गुर रामदास जयो जय जग महि तै हरि परम पदु पाइयउ ॥४॥

जिह सतिगुर सिमरंत नयन के तिमर मिटहि खिनु ॥ जिह सतिगुर सिमरंथि रिदै हरि नामु दिनो दिनु ॥ जिह सतिगुर सिमरंथि जीअ की तपति मिटावै ॥ जिह सतिगुर सिमरंथि रिधि सिधि नव निधि पावै ॥ सोई रामदासु गुरु बल्य भणि मिलि संगति धंनि धंनि करहु ॥ जिह सतिगुर लगि प्रभु पाईऐ सो सतिगुरु सिमरहु नरहु ॥५॥५४॥

जिनि सबदु कमाइ परम पदु पाइओ सेवा करत न छोडिओ पासु ॥ ता ते गउहरु ग्यान प्रगटु उजीआरउ दुख दरिद्र अंध्यार को नासु ॥ कवि कीरत जो संत चरन मुड़ि लागहि तिन्ह काम क्रोध जम को नही त्रासु ॥ जिव अंगदु अंगि संगि नानक गुर तिव गुर अमरदास कै गुरु रामदासु ॥१॥

जिनि सतिगुरु सेवि पदारथु पायउ निसि बासुर हरि चरन निवासु ॥ ता ते संगति सघन भाइ भउ मानहि तुम मलीआगर प्रगट सुबासु ॥ ध्रू प्रहलाद कबीर तिलोचन नामु लैत उपज्यो जु प्रगासु ॥ जिह पिखत अति होइ रहसु मनि सोई संत सहारु गुरू रामदासु ॥२॥

नानकि नामु निरंजन जान्यउ कीनी भगति प्रेम लिव लाई ॥ ता ते अंगदु अंग संगि भयो साइरु तिनि सबद सुरति की नीव रखाई ॥ गुर अमरदास की अकथ कथा है इक जीह कछु कही न जाई ॥ सोढी स्रिस्टि सकल तारण कउ अब गुर रामदास कउ मिली बडाई ॥३॥

हम अवगुणि भरे एकु गुणु नाही अम्रितु छाडि बिखै बिखु खाई ॥ माया मोह भरम पै भूले सुत दारा सिउ प्रीति लगाई ॥ इकु उतम पंथु सुनिओ गुर संगति तिह मिलंत जम त्रास मिटाई ॥ इक अरदासि भाट कीरति की गुर रामदास राखहु सरणाई ॥४॥५८॥

मोहु मलि बिवसि कीअउ कामु गहि केस पछाड़्यउ ॥ क्रोधु खंडि परचंडि लोभु अपमान सिउ झाड़्यउ ॥ जनमु कालु कर जोड़ि हुकमु जो होइ सु मंनै ॥ भव सागरु बंधिअउ सिख तारे सुप्रसंनै ॥ सिरि आतपतु सचौ तखतु जोग भोग संजुतु बलि ॥ गुर रामदास सचु सल्य भणि तू अटलु राजि अभगु दलि ॥१॥

तू सतिगुरु चहु जुगी आपि आपे परमेसरु ॥ सुरि नर साधिक सिध सिख सेवंत धुरह धुरु ॥ आदि जुगादि अनादि कला धारी त्रिहु लोअह ॥ अगम निगम उधरण जरा जमिहि आरोअह ॥ गुर अमरदासि थिरु थपिअउ परगामी तारण तरण ॥ अघ अंतक बदै न सल्य कवि गुर रामदास तेरी सरण ॥२॥६०॥


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