(भट्टा के) सवईए महले तीजे के, (Bhatt) Savaiye Mahalle 3 Ke Path in Hindi Gurbani online


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सवईए महले तीजे के ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

सोई पुरखु सिवरि साचा जा का इकु नामु अछलु संसारे ॥ जिनि भगत भवजल तारे सिमरहु सोई नामु परधानु ॥ तितु नामि रसिकु नानकु लहणा थपिओ जेन स्रब सिधी ॥ कवि जन कल्य सबुधी कीरति जन अमरदास बिस्तरीया ॥ कीरति रवि किरणि प्रगटि संसारह साख तरोवर मवलसरा ॥ उतरि दखिणहि पुबि अरु पस्चमि जै जै कारु जपंथि नरा ॥ हरि नामु रसनि गुरमुखि बरदायउ उलटि गंग पस्चमि धरीआ ॥ सोई नामु अछलु भगतह भव तारणु अमरदास गुर कउ फुरिआ ॥१॥

सिमरहि सोई नामु जख्य अरु किंनर साधिक सिध समाधि हरा ॥ सिमरहि नख्यत्र अवर ध्रू मंडल नारदादि प्रहलादि वरा ॥ ससीअरु अरु सूरु नामु उलासहि सैल लोअ जिनि उधरिआ ॥ सोई नामु अछलु भगतह भव तारणु अमरदास गुर कउ फुरिआ ॥२॥

सोई नामु सिवरि नव नाथ निरंजनु सिव सनकादि समुधरिआ ॥ चवरासीह सिध बुध जितु राते अ्मबरीक भवजलु तरिआ ॥ उधउ अक्रूरु तिलोचनु नामा कलि कबीर किलविख हरिआ ॥ सोई नामु अछलु भगतह भव तारणु अमरदास गुर कउ फुरिआ ॥३॥

तितु नामि लागि तेतीस धिआवहि जती तपीसुर मनि वसिआ ॥ सोई नामु सिमरि गंगेव पितामह चरण चित अम्रित रसिआ ॥ तितु नामि गुरू ग्मभीर गरूअ मति सत करि संगति उधरीआ ॥ सोई नामु अछलु भगतह भव तारणु अमरदास गुर कउ फुरिआ ॥४॥

नाम किति संसारि किरणि रवि सुरतर साखह ॥ उतरि दखिणि पुबि देसि पस्चमि जसु भाखह ॥ जनमु त इहु सकयथु जितु नामु हरि रिदै निवासै ॥ सुरि नर गण गंधरब छिअ दरसन आसासै ॥ भलउ प्रसिधु तेजो तनौ कल्य जोड़ि कर ध्याइअओ ॥ सोई नामु भगत भवजल हरणु गुर अमरदास तै पाइओ ॥५॥

नामु धिआवहि देव तेतीस अरु साधिक सिध नर नामि खंड ब्रहमंड धारे ॥ जह नामु समाधिओ हरखु सोगु सम करि सहारे ॥ नामु सिरोमणि सरब मै भगत रहे लिव धारि ॥ सोई नामु पदारथु अमर गुर तुसि दीओ करतारि ॥६॥

सति सूरउ सीलि बलवंतु सत भाइ संगति सघन गरूअ मति निरवैरि लीणा ॥ जिसु धीरजु धुरि धवलु धुजा सेति बैकुंठ बीणा ॥ परसहि संत पिआरु जिह करतारह संजोगु ॥ सतिगुरू सेवि सुखु पाइओ अमरि गुरि कीतउ जोगु ॥७॥

नामु नावणु नामु रस खाणु अरु भोजनु नाम रसु सदा चाय मुखि मिस्ट बाणी ॥ धनि सतिगुरु सेविओ जिसु पसाइ गति अगम जाणी ॥ कुल स्मबूह समुधरे पायउ नाम निवासु ॥ सकयथु जनमु कल्युचरै गुरु परस्यिउ अमर प्रगासु ॥८॥

बारिजु करि दाहिणै सिधि सनमुख मुखु जोवै ॥ रिधि बसै बांवांगि जु तीनि लोकांतर मोहै ॥ रिदै बसै अकहीउ सोइ रसु तिन ही जातउ ॥ मुखहु भगति उचरै अमरु गुरु इतु रंगि रातउ ॥ मसतकि नीसाणु सचउ करमु कल्य जोड़ि कर ध्याइअउ ॥ परसिअउ गुरू सतिगुर तिलकु सरब इछ तिनि पाइअउ ॥९॥

चरण त पर सकयथ चरण गुर अमर पवलि रय ॥ हथ त पर सकयथ हथ लगहि गुर अमर पय ॥ जीह त पर सकयथ जीह गुर अमरु भणिजै ॥ नैण त पर सकयथ नयणि गुरु अमरु पिखिजै ॥ स्रवण त पर सकयथ स्रवणि गुरु अमरु सुणिजै ॥ सकयथु सु हीउ जितु हीअ बसै गुर अमरदासु निज जगत पित ॥ सकयथु सु सिरु जालपु भणै जु सिरु निवै गुर अमर नित ॥१॥१०॥

ति नर दुख नह भुख ति नर निधन नहु कहीअहि ॥ ति नर सोकु नहु हूऐ ति नर से अंतु न लहीअहि ॥ ति नर सेव नहु करहि ति नर सय सहस समपहि ॥ ति नर दुलीचै बहहि ति नर उथपि बिथपहि ॥ सुख लहहि ति नर संसार महि अभै पटु रिप मधि तिह ॥ सकयथ ति नर जालपु भणै गुर अमरदासु सुप्रसंनु जिह ॥२॥११॥

तै पढिअउ इकु मनि धरिअउ इकु करि इकु पछाणिओ ॥ नयणि बयणि मुहि इकु इकु दुहु ठांइ न जाणिओ ॥ सुपनि इकु परतखि इकु इकस महि लीणउ ॥ तीस इकु अरु पंजि सिधु पैतीस न खीणउ ॥ इकहु जि लाखु लखहु अलखु है इकु इकु करि वरनिअउ ॥ गुर अमरदास जालपु भणै तू इकु लोड़हि इकु मंनिअउ ॥३॥१२॥

जि मति गही जैदेवि जि मति नामै समाणी ॥ जि मति त्रिलोचन चिति भगत क्मबीरहि जाणी ॥ रुकमांगद करतूति रामु ज्मपहु नित भाई ॥ अमरीकि प्रहलादि सरणि गोबिंद गति पाई ॥ तै लोभु क्रोधु त्रिसना तजी सु मति जल्य जाणी जुगति ॥ गुरु अमरदासु निज भगतु है देखि दरसु पावउ मुकति ॥४॥१३॥

गुरु अमरदासु परसीऐ पुहमि पातिक बिनासहि ॥ गुरु अमरदासु परसीऐ सिध साधिक आसासहि ॥ गुरु अमरदासु परसीऐ धिआनु लहीऐ पउ मुकिहि ॥ गुरु अमरदासु परसीऐ अभउ लभै गउ चुकिहि ॥ इकु बिंनि दुगण जु तउ रहै जा सुमंत्रि मानवहि लहि ॥ जालपा पदारथ इतड़े गुर अमरदासि डिठै मिलहि ॥५॥१४॥

सचु नामु करतारु सु द्रिड़ु नानकि संग्रहिअउ ॥ ता ते अंगदु लहणा प्रगटि तासु चरणह लिव रहिअउ ॥ तितु कुलि गुर अमरदासु आसा निवासु तासु गुण कवण वखाणउ ॥ जो गुण अलख अगम तिनह गुण अंतु न जाणउ ॥ बोहिथउ बिधातै निरमयौ सभ संगति कुल उधरण ॥ गुर अमरदास कीरतु कहै त्राहि त्राहि तुअ पा सरण ॥१॥१५॥

आपि नराइणु कला धारि जग महि परवरियउ ॥ निरंकारि आकारु जोति जग मंडलि करियउ ॥ जह कह तह भरपूरु सबदु दीपकि दीपायउ ॥ जिह सिखह संग्रहिओ ततु हरि चरण मिलायउ ॥ नानक कुलि निमलु अवतरि्यउ अंगद लहणे संगि हुअ ॥ गुर अमरदास तारण तरण जनम जनम पा सरणि तुअ ॥२॥१६॥

जपु तपु सतु संतोखु पिखि दरसनु गुर सिखह ॥ सरणि परहि ते उबरहि छोडि जम पुर की लिखह ॥ भगति भाइ भरपूरु रिदै उचरै करतारै ॥ गुरु गउहरु दरीआउ पलक डुबंत्यह तारै ॥ नानक कुलि निमलु अवतरि्यउ गुण करतारै उचरै ॥ गुरु अमरदासु जिन्ह सेविअउ तिन्ह दुखु दरिद्रु परहरि परै ॥३॥१७॥

चिति चितवउ अरदासि कहउ परु कहि भि न सकउ ॥ सरब चिंत तुझु पासि साधसंगति हउ तकउ ॥ तेरै हुकमि पवै नीसाणु तउ करउ साहिब की सेवा ॥ जब गुरु देखै सुभ दिसटि नामु करता मुखि मेवा ॥ अगम अलख कारण पुरख जो फुरमावहि सो कहउ ॥ गुर अमरदास कारण करण जिव तू रखहि तिव रहउ ॥४॥१८॥

भिखे के ॥
गुरु गिआनु अरु धिआनु तत सिउ ततु मिलावै ॥ सचि सचु जाणीऐ इक चितहि लिव लावै ॥ काम क्रोध वसि करै पवणु उडंत न धावै ॥ निरंकार कै वसै देसि हुकमु बुझि बीचारु पावै ॥ कलि माहि रूपु करता पुरखु सो जाणै जिनि किछु कीअउ ॥ गुरु मिल्यिउ सोइ भिखा कहै सहज रंगि दरसनु दीअउ ॥१॥१९॥

रहिओ संत हउ टोलि साध बहुतेरे डिठे ॥ संनिआसी तपसीअह मुखहु ए पंडित मिठे ॥ बरसु एकु हउ फिरिओ किनै नहु परचउ लायउ ॥ कहतिअह कहती सुणी रहत को खुसी न आयउ ॥ हरि नामु छोडि दूजै लगे तिन्ह के गुण हउ किआ कहउ ॥ गुरु दयि मिलायउ भिखिआ जिव तू रखहि तिव रहउ ॥२॥२०॥

पहिरि समाधि सनाहु गिआनि है आसणि चड़िअउ ॥ ध्रम धनखु कर गहिओ भगत सीलह सरि लड़िअउ ॥ भै निरभउ हरि अटलु मनि सबदि गुर नेजा गडिओ ॥ काम क्रोध लोभ मोह अपतु पंच दूत बिखंडिओ ॥ भलउ भूहालु तेजो तना न्रिपति नाथु नानक बरि ॥ गुर अमरदास सचु सल्य भणि तै दलु जितउ इव जुधु करि ॥१॥२१॥

घनहर बूंद बसुअ रोमावलि कुसम बसंत गनंत न आवै ॥ रवि ससि किरणि उदरु सागर को गंग तरंग अंतु को पावै ॥ रुद्र धिआन गिआन सतिगुर के कबि जन भल्य उनह जो गावै ॥ भले अमरदास गुण तेरे तेरी उपमा तोहि बनि आवै ॥१॥२२॥


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