(भट्टा के) सवईए महले दूजे के, (Bhatt) Savaiye Mahalle 2 Ke Path in Hindi Gurbani online


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सवईए महले दूजे के २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

सोई पुरखु धंनु करता कारण करतारु करण समरथो ॥ सतिगुरू धंनु नानकु मसतकि तुम धरिओ जिनि हथो ॥ त धरिओ मसतकि हथु सहजि अमिउ वुठउ छजि सुरि नर गण मुनि बोहिय अगाजि ॥ मारिओ कंटकु कालु गरजि धावतु लीओ बरजि पंच भूत एक घरि राखि ले समजि ॥ जगु जीतउ गुर दुआरि खेलहि समत सारि रथु उनमनि लिव राखि निरंकारि ॥ कहु कीरति कल सहार सपत दीप मझार लहणा जगत्र गुरु परसि मुरारि ॥१॥

जा की द्रिसटि अम्रित धार कालुख खनि उतार तिमर अग्यान जाहि दरस दुआर ॥ ओइ जु सेवहि सबदु सारु गाखड़ी बिखम कार ते नर भव उतारि कीए निरभार ॥ सतसंगति सहज सारि जागीले गुर बीचारि निमरी भूत सदीव परम पिआरि ॥ कहु कीरति कल सहार सपत दीप मझार लहणा जगत्र गुरु परसि मुरारि ॥२॥

तै तउ द्रिड़िओ नामु अपारु बिमल जासु बिथारु साधिक सिध सुजन जीआ को अधारु ॥ तू ता जनिक राजा अउतारु सबदु संसारि सारु रहहि जगत्र जल पदम बीचार ॥ कलिप तरु रोग बिदारु संसार ताप निवारु आतमा त्रिबिधि तेरै एक लिव तार ॥ कहु कीरति कल सहार सपत दीप मझार लहणा जगत्र गुरु परसि मुरारि ॥३॥

तै ता हदरथि पाइओ मानु सेविआ गुरु परवानु साधि अजगरु जिनि कीआ उनमानु ॥ हरि हरि दरस समान आतमा वंतगिआन जाणीअ अकल गति गुर परवान ॥ जा की द्रिसटि अचल ठाण बिमल बुधि सुथान पहिरि सील सनाहु सकति बिदारि ॥ कहु कीरति कल सहार सपत दीप मझार लहणा जगत्र गुरु परसि मुरारि ॥४॥

द्रिसटि धरत तम हरन दहन अघ पाप प्रनासन ॥ सबद सूर बलवंत काम अरु क्रोध बिनासन ॥ लोभ मोह वसि करण सरण जाचिक प्रतिपालण ॥ आतम रत संग्रहण कहण अम्रित कल ढालण ॥ सतिगुरू कल सतिगुर तिलकु सति लागै सो पै तरै ॥ गुरु जगत फिरणसीह अंगरउ राजु जोगु लहणा करै ॥५॥

सदा अकल लिव रहै करन सिउ इछा चारह ॥ द्रुम सपूर जिउ निवै खवै कसु बिमल बीचारह ॥ इहै ततु जाणिओ सरब गति अलखु बिडाणी ॥ सहज भाइ संचिओ किरणि अम्रित कल बाणी ॥ गुर गमि प्रमाणु तै पाइओ सतु संतोखु ग्राहजि लयौ ॥ हरि परसिओ कलु समुलवै जन दरसनु लहणे भयौ ॥६॥

मनि बिसासु पाइओ गहरि गहु हदरथि दीओ ॥ गरल नासु तनि नठयो अमिउ अंतरगति पीओ ॥ रिदि बिगासु जागिओ अलखि कल धरी जुगंतरि ॥ सतिगुरु सहज समाधि रविओ सामानि निरंतरि ॥ उदारउ चित दारिद हरन पिखंतिह कलमल त्रसन ॥ सद रंगि सहजि कलु उचरै जसु ज्मपउ लहणे रसन ॥७॥

नामु अवखधु नामु आधारु अरु नामु समाधि सुखु सदा नाम नीसाणु सोहै ॥ रंगि रतौ नाम सिउ कल नामु सुरि नरह बोहै ॥ नाम परसु जिनि पाइओ सतु प्रगटिओ रवि लोइ ॥ दरसनि परसिऐ गुरू कै अठसठि मजनु होइ ॥८॥

सचु तीरथु सचु इसनानु अरु भोजनु भाउ सचु सदा सचु भाखंतु सोहै ॥ सचु पाइओ गुर सबदि सचु नामु संगती बोहै ॥ जिसु सचु संजमु वरतु सचु कबि जन कल वखाणु ॥ दरसनि परसिऐ गुरू कै सचु जनमु परवाणु ॥९॥

अमिअ द्रिसटि सुभ करै हरै अघ पाप सकल मल ॥ काम क्रोध अरु लोभ मोह वसि करै सभै बल ॥ सदा सुखु मनि वसै दुखु संसारह खोवै ॥ गुरु नव निधि दरीआउ जनम हम कालख धोवै ॥ सु कहु टल गुरु सेवीऐ अहिनिसि सहजि सुभाइ ॥ दरसनि परसिऐ गुरू कै जनम मरण दुखु जाइ ॥१०॥


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