राग वडहंसु - बाणी शब्द, Raag Vadhans - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू नानक देव जी -- SGGS 557) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु वडहंसु महला १ घरु १ ॥
अमली अमलु न अ्मबड़ै मछी नीरु न होइ ॥ जो रते सहि आपणै तिन भावै सभु कोइ ॥१॥

हउ वारी वंञा खंनीऐ वंञा तउ साहिब के नावै ॥१॥ रहाउ ॥

साहिबु सफलिओ रुखड़ा अम्रितु जा का नाउ ॥ जिन पीआ ते त्रिपत भए हउ तिन बलिहारै जाउ ॥२॥

मै की नदरि न आवही वसहि हभीआं नालि ॥ तिखा तिहाइआ किउ लहै जा सर भीतरि पालि ॥३॥

नानकु तेरा बाणीआ तू साहिबु मै रासि ॥ मन ते धोखा ता लहै जा सिफति करी अरदासि ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 557) वडहंसु महला १ ॥
गुणवंती सहु राविआ निरगुणि कूके काइ ॥ जे गुणवंती थी रहै ता भी सहु रावण जाइ ॥१॥

मेरा कंतु रीसालू की धन अवरा रावे जी ॥१॥ रहाउ ॥

करणी कामण जे थीऐ जे मनु धागा होइ ॥ माणकु मुलि न पाईऐ लीजै चिति परोइ ॥२॥

राहु दसाई न जुलां आखां अमड़ीआसु ॥ तै सह नालि अकूअणा किउ थीवै घर वासु ॥३॥

नानक एकी बाहरा दूजा नाही कोइ ॥ तै सह लगी जे रहै भी सहु रावै सोइ ॥४॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 557) वडहंसु महला १ घरु २ ॥
मोरी रुण झुण लाइआ भैणे सावणु आइआ ॥ तेरे मुंध कटारे जेवडा तिनि लोभी लोभ लुभाइआ ॥ तेरे दरसन विटहु खंनीऐ वंञा तेरे नाम विटहु कुरबाणो ॥ जा तू ता मै माणु कीआ है तुधु बिनु केहा मेरा माणो ॥ चूड़ा भंनु पलंघ सिउ मुंधे सणु बाही सणु बाहा ॥ एते वेस करेदीए मुंधे सहु रातो अवराहा ॥ ना मनीआरु न चूड़ीआ ना से वंगुड़ीआहा ॥ जो सह कंठि न लगीआ जलनु सि बाहड़ीआहा ॥ सभि सहीआ सहु रावणि गईआ हउ दाधी कै दरि जावा ॥ अमाली हउ खरी सुचजी तै सह एकि न भावा ॥ माठि गुंदाईं पटीआ भरीऐ माग संधूरे ॥ अगै गई न मंनीआ मरउ विसूरि विसूरे ॥ मै रोवंदी सभु जगु रुना रुंनड़े वणहु पंखेरू ॥ इकु न रुना मेरे तन का बिरहा जिनि हउ पिरहु विछोड़ी ॥ सुपनै आइआ भी गइआ मै जलु भरिआ रोइ ॥ आइ न सका तुझ कनि पिआरे भेजि न सका कोइ ॥ आउ सभागी नीदड़ीए मतु सहु देखा सोइ ॥ तै साहिब की बात जि आखै कहु नानक किआ दीजै ॥ सीसु वढे करि बैसणु दीजै विणु सिर सेव करीजै ॥ किउ न मरीजै जीअड़ा न दीजै जा सहु भइआ विडाणा ॥१॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 558) वडहंसु महला ३ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मनि मैलै सभु किछु मैला तनि धोतै मनु हछा न होइ ॥ इह जगतु भरमि भुलाइआ विरला बूझै कोइ ॥१॥

जपि मन मेरे तू एको नामु ॥ सतगुरि दीआ मो कउ एहु निधानु ॥१॥ रहाउ ॥

सिधा के आसण जे सिखै इंद्री वसि करि कमाइ ॥ मन की मैलु न उतरै हउमै मैलु न जाइ ॥२॥

इसु मन कउ होरु संजमु को नाही विणु सतिगुर की सरणाइ ॥ सतगुरि मिलिऐ उलटी भई कहणा किछू न जाइ ॥३॥

भणति नानकु सतिगुर कउ मिलदो मरै गुर कै सबदि फिरि जीवै कोइ ॥ ममता की मलु उतरै इहु मनु हछा होइ ॥४॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 558) वडहंसु महला ३ ॥
नदरी सतगुरु सेवीऐ नदरी सेवा होइ ॥ नदरी इहु मनु वसि आवै नदरी मनु निरमलु होइ ॥१॥

मेरे मन चेति सचा सोइ ॥ एको चेतहि ता सुखु पावहि फिरि दूखु न मूले होइ ॥१॥ रहाउ ॥

नदरी मरि कै जीवीऐ नदरी सबदु वसै मनि आइ ॥ नदरी हुकमु बुझीऐ हुकमे रहै समाइ ॥२॥

जिनि जिहवा हरि रसु न चखिओ सा जिहवा जलि जाउ ॥ अन रस सादे लगि रही दुखु पाइआ दूजै भाइ ॥३॥

सभना नदरि एक है आपे फरकु करेइ ॥ नानक सतगुरि मिलिऐ फलु पाइआ नामु वडाई देइ ॥४॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 559) वडहंसु महला ३ ॥
माइआ मोहु गुबारु है गुर बिनु गिआनु न होई ॥ सबदि लगे तिन बुझिआ दूजै परज विगोई ॥१॥

मन मेरे गुरमति करणी सारु ॥ सदा सदा हरि प्रभु रवहि ता पावहि मोख दुआरु ॥१॥ रहाउ ॥

गुणा का निधानु एकु है आपे देइ ता को पाए ॥ बिनु नावै सभ विछुड़ी गुर कै सबदि मिलाए ॥२॥

मेरी मेरी करदे घटि गए तिना हथि किहु न आइआ ॥ सतगुरि मिलिऐ सचि मिले सचि नामि समाइआ ॥३॥

आसा मनसा एहु सरीरु है अंतरि जोति जगाए ॥ नानक मनमुखि बंधु है गुरमुखि मुकति कराए ॥४॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 559) वडहंसु महला ३ ॥
सोहागणी सदा मुखु उजला गुर कै सहजि सुभाइ ॥ सदा पिरु रावहि आपणा विचहु आपु गवाइ ॥१॥

मेरे मन तू हरि हरि नामु धिआइ ॥ सतगुरि मो कउ हरि दीआ बुझाइ ॥१॥ रहाउ ॥

दोहागणी खरीआ बिललादीआ तिना महलु न पाइ ॥ दूजै भाइ करूपी दूखु पावहि आगै जाइ ॥२॥

गुणवंती नित गुण रवै हिरदै नामु वसाइ ॥ अउगणवंती कामणी दुखु लागै बिललाइ ॥३॥

सभना का भतारु एकु है सुआमी कहणा किछू न जाइ ॥ नानक आपे वेक कीतिअनु नामे लइअनु लाइ ॥४॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 559) वडहंसु महला ३ ॥
अम्रित नामु सद मीठा लागा गुर सबदी सादु आइआ ॥ सची बाणी सहजि समाणी हरि जीउ मनि वसाइआ ॥१॥

हरि करि किरपा सतगुरू मिलाइआ ॥ पूरै सतगुरि हरि नामु धिआइआ ॥१॥ रहाउ ॥

ब्रहमै बेद बाणी परगासी माइआ मोह पसारा ॥ महादेउ गिआनी वरतै घरि आपणै तामसु बहुतु अहंकारा ॥२॥

किसनु सदा अवतारी रूधा कितु लगि तरै संसारा ॥ गुरमुखि गिआनि रते जुग अंतरि चूकै मोह गुबारा ॥३॥

सतगुर सेवा ते निसतारा गुरमुखि तरै संसारा ॥ साचै नाइ रते बैरागी पाइनि मोख दुआरा ॥४॥

एको सचु वरतै सभ अंतरि सभना करे प्रतिपाला ॥ नानक इकसु बिनु मै अवरु न जाणा सभना दीवानु दइआला ॥५॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 559) वडहंसु महला ३ ॥
गुरमुखि सचु संजमु ततु गिआनु ॥ गुरमुखि साचे लगै धिआनु ॥१॥

गुरमुखि मन मेरे नामु समालि ॥ सदा निबहै चलै तेरै नालि ॥ रहाउ ॥

गुरमुखि जाति पति सचु सोइ ॥ गुरमुखि अंतरि सखाई प्रभु होइ ॥२॥

गुरमुखि जिस नो आपि करे सो होइ ॥ गुरमुखि आपि वडाई देवै सोइ ॥३॥

गुरमुखि सबदु सचु करणी सारु ॥ गुरमुखि नानक परवारै साधारु ॥४॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 560) वडहंसु महला ३ ॥
रसना हरि सादि लगी सहजि सुभाइ ॥ मनु त्रिपतिआ हरि नामु धिआइ ॥१॥

सदा सुखु साचै सबदि वीचारी ॥ आपणे सतगुर विटहु सदा बलिहारी ॥१॥ रहाउ ॥

अखी संतोखीआ एक लिव लाइ ॥ मनु संतोखिआ दूजा भाउ गवाइ ॥२॥

देह सरीरि सुखु होवै सबदि हरि नाइ ॥ नामु परमलु हिरदै रहिआ समाइ ॥३॥

नानक मसतकि जिसु वडभागु ॥ गुर की बाणी सहज बैरागु ॥४॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 560) वडहंसु महला ३ ॥
पूरे गुर ते नामु पाइआ जाइ ॥ सचै सबदि सचि समाइ ॥१॥

ए मन नामु निधानु तू पाइ ॥ आपणे गुर की मंनि लै रजाइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर कै सबदि विचहु मैलु गवाइ ॥ निरमलु नामु वसै मनि आइ ॥२॥

भरमे भूला फिरै संसारु ॥ मरि जनमै जमु करे खुआरु ॥३॥

नानक से वडभागी जिन हरि नामु धिआइआ ॥ गुर परसादी मंनि वसाइआ ॥४॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 560) वडहंसु महला ३ ॥
हउमै नावै नालि विरोधु है दुइ न वसहि इक ठाइ ॥ हउमै विचि सेवा न होवई ता मनु बिरथा जाइ ॥१॥

हरि चेति मन मेरे तू गुर का सबदु कमाइ ॥ हुकमु मंनहि ता हरि मिलै ता विचहु हउमै जाइ ॥ रहाउ ॥

हउमै सभु सरीरु है हउमै ओपति होइ ॥ हउमै वडा गुबारु है हउमै विचि बुझि न सकै कोइ ॥२॥

हउमै विचि भगति न होवई हुकमु न बुझिआ जाइ ॥ हउमै विचि जीउ बंधु है नामु न वसै मनि आइ ॥३॥

नानक सतगुरि मिलिऐ हउमै गई ता सचु वसिआ मनि आइ ॥ सचु कमावै सचि रहै सचे सेवि समाइ ॥४॥९॥१२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 560) वडहंसु महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेज एक एको प्रभु ठाकुरु ॥ गुरमुखि हरि रावे सुख सागरु ॥१॥

मै प्रभ मिलण प्रेम मनि आसा ॥ गुरु पूरा मेलावै मेरा प्रीतमु हउ वारि वारि आपणे गुरू कउ जासा ॥१॥ रहाउ ॥

मै अवगण भरपूरि सरीरे ॥ हउ किउ करि मिला अपणे प्रीतम पूरे ॥२॥

जिनि गुणवंती मेरा प्रीतमु पाइआ ॥ से मै गुण नाही हउ किउ मिला मेरी माइआ ॥३॥

हउ करि करि थाका उपाव बहुतेरे ॥ नानक गरीब राखहु हरि मेरे ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 561) वडहंसु महला ४ ॥
मेरा हरि प्रभु सुंदरु मै सार न जाणी ॥ हउ हरि प्रभ छोडि दूजै लोभाणी ॥१॥

हउ किउ करि पिर कउ मिलउ इआणी ॥ जो पिर भावै सा सोहागणि साई पिर कउ मिलै सिआणी ॥१॥ रहाउ ॥

मै विचि दोस हउ किउ करि पिरु पावा ॥ तेरे अनेक पिआरे हउ पिर चिति न आवा ॥२॥

जिनि पिरु राविआ सा भली सुहागणि ॥ से मै गुण नाही हउ किआ करी दुहागणि ॥३॥

नित सुहागणि सदा पिरु रावै ॥ मै करमहीण कब ही गलि लावै ॥४॥

तू पिरु गुणवंता हउ अउगुणिआरा ॥ मै निरगुण बखसि नानकु वेचारा ॥५॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 561) वडहंसु महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै मनि वडी आस हरे किउ करि हरि दरसनु पावा ॥ हउ जाइ पुछा अपने सतगुरै गुर पुछि मनु मुगधु समझावा ॥ भूला मनु समझै गुर सबदी हरि हरि सदा धिआए ॥ नानक जिसु नदरि करे मेरा पिआरा सो हरि चरणी चितु लाए ॥१॥

हउ सभि वेस करी पिर कारणि जे हरि प्रभ साचे भावा ॥ सो पिरु पिआरा मै नदरि न देखै हउ किउ करि धीरजु पावा ॥ जिसु कारणि हउ सीगारु सीगारी सो पिरु रता मेरा अवरा ॥ नानक धनु धंनु धंनु सोहागणि जिनि पिरु राविअड़ा सचु सवरा ॥२॥

हउ जाइ पुछा सोहाग सुहागणि तुसी किउ पिरु पाइअड़ा प्रभु मेरा ॥ मै ऊपरि नदरि करी पिरि साचै मै छोडिअड़ा मेरा तेरा ॥ सभु मनु तनु जीउ करहु हरि प्रभ का इतु मारगि भैणे मिलीऐ ॥ आपनड़ा प्रभु नदरि करि देखै नानक जोति जोती रलीऐ ॥३॥

जो हरि प्रभ का मै देइ सनेहा तिसु मनु तनु अपणा देवा ॥ नित पखा फेरी सेव कमावा तिसु आगै पाणी ढोवां ॥ नित नित सेव करी हरि जन की जो हरि हरि कथा सुणाए ॥ धनु धंनु गुरू गुर सतिगुरु पूरा नानक मनि आस पुजाए ॥४॥

गुरु सजणु मेरा मेलि हरे जितु मिलि हरि नामु धिआवा ॥ गुर सतिगुर पासहु हरि गोसटि पूछां करि सांझी हरि गुण गावां ॥ गुण गावा नित नित सद हरि के मनु जीवै नामु सुणि तेरा ॥ नानक जितु वेला विसरै मेरा सुआमी तितु वेलै मरि जाइ जीउ मेरा ॥५॥

हरि वेखण कउ सभु कोई लोचै सो वेखै जिसु आपि विखाले ॥ जिस नो नदरि करे मेरा पिआरा सो हरि हरि सदा समाले ॥ सो हरि हरि नामु सदा सदा समाले जिसु सतगुरु पूरा मेरा मिलिआ ॥ नानक हरि जन हरि इके होए हरि जपि हरि सेती रलिआ ॥६॥१॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 562) वडहंसु महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अति ऊचा ता का दरबारा ॥ अंतु नाही किछु पारावारा ॥ कोटि कोटि कोटि लख धावै ॥ इकु तिलु ता का महलु न पावै ॥१॥

सुहावी कउणु सु वेला जितु प्रभ मेला ॥१॥ रहाउ ॥

लाख भगत जा कउ आराधहि ॥ लाख तपीसर तपु ही साधहि ॥ लाख जोगीसर करते जोगा ॥ लाख भोगीसर भोगहि भोगा ॥२॥

घटि घटि वसहि जाणहि थोरा ॥ है कोई साजणु परदा तोरा ॥ करउ जतन जे होइ मिहरवाना ॥ ता कउ देई जीउ कुरबाना ॥३॥

फिरत फिरत संतन पहि आइआ ॥ दूख भ्रमु हमारा सगल मिटाइआ ॥ महलि बुलाइआ प्रभ अम्रितु भूंचा ॥ कहु नानक प्रभु मेरा ऊचा ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 562) वडहंसु महला ५ ॥
धनु सु वेला जितु दरसनु करणा ॥ हउ बलिहारी सतिगुर चरणा ॥१॥

जीअ के दाते प्रीतम प्रभ मेरे ॥ मनु जीवै प्रभ नामु चितेरे ॥१॥ रहाउ ॥

सचु मंत्रु तुमारा अम्रित बाणी ॥ सीतल पुरख द्रिसटि सुजाणी ॥२॥

सचु हुकमु तुमारा तखति निवासी ॥ आइ न जावै मेरा प्रभु अबिनासी ॥३॥

तुम मिहरवान दास हम दीना ॥ नानक साहिबु भरपुरि लीणा ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 562) वडहंसु महला ५ ॥
तू बेअंतु को विरला जाणै ॥ गुर प्रसादि को सबदि पछाणै ॥१॥

सेवक की अरदासि पिआरे ॥ जपि जीवा प्रभ चरण तुमारे ॥१॥ रहाउ ॥

दइआल पुरख मेरे प्रभ दाते ॥ जिसहि जनावहु तिनहि तुम जाते ॥२॥

सदा सदा जाई बलिहारी ॥ इत उत देखउ ओट तुमारी ॥३॥

मोहि निरगुण गुणु किछू न जाता ॥ नानक साधू देखि मनु राता ॥४॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 563) वडहंसु मः ५ ॥
अंतरजामी सो प्रभु पूरा ॥ दानु देइ साधू की धूरा ॥१॥

करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥ तेरी ओट पूरन गोपाला ॥१॥ रहाउ ॥

जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरे ॥ निकटि वसै नाही प्रभु दूरे ॥२॥

जिस नो नदरि करे सो धिआए ॥ आठ पहर हरि के गुण गाए ॥३॥

जीअ जंत सगले प्रतिपारे ॥ सरनि परिओ नानक हरि दुआरे ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 563) वडहंसु महला ५ ॥
तू वड दाता अंतरजामी ॥ सभ महि रविआ पूरन प्रभ सुआमी ॥१॥

मेरे प्रभ प्रीतम नामु अधारा ॥ हउ सुणि सुणि जीवा नामु तुमारा ॥१॥ रहाउ ॥

तेरी सरणि सतिगुर मेरे पूरे ॥ मनु निरमलु होइ संता धूरे ॥२॥

चरन कमल हिरदै उरि धारे ॥ तेरे दरसन कउ जाई बलिहारे ॥३॥

करि किरपा तेरे गुण गावा ॥ नानक नामु जपत सुखु पावा ॥४॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 563) वडहंसु महला ५ ॥
साधसंगि हरि अम्रितु पीजै ॥ ना जीउ मरै न कबहू छीजै ॥१॥

वडभागी गुरु पूरा पाईऐ ॥ गुर किरपा ते प्रभू धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

रतन जवाहर हरि माणक लाला ॥ सिमरि सिमरि प्रभ भए निहाला ॥२॥

जत कत पेखउ साधू सरणा ॥ हरि गुण गाइ निरमल मनु करणा ॥३॥

घट घट अंतरि मेरा सुआमी वूठा ॥ नानक नामु पाइआ प्रभु तूठा ॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 563) वडहंसु महला ५ ॥
विसरु नाही प्रभ दीन दइआला ॥ तेरी सरणि पूरन किरपाला ॥१॥ रहाउ ॥

जह चिति आवहि सो थानु सुहावा ॥ जितु वेला विसरहि ता लागै हावा ॥१॥

तेरे जीअ तू सद ही साथी ॥ संसार सागर ते कढु दे हाथी ॥२॥

आवणु जाणा तुम ही कीआ ॥ जिसु तू राखहि तिसु दूखु न थीआ ॥३॥

तू एको साहिबु अवरु न होरि ॥ बिनउ करै नानकु कर जोरि ॥४॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 563) वडहंसु मः ५ ॥
तू जाणाइहि ता कोई जाणै ॥ तेरा दीआ नामु वखाणै ॥१॥

तू अचरजु कुदरति तेरी बिसमा ॥१॥ रहाउ ॥

तुधु आपे कारणु आपे करणा ॥ हुकमे जमणु हुकमे मरणा ॥२॥

नामु तेरा मन तन आधारी ॥ नानक दासु बखसीस तुमारी ॥३॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 564) वडहंसु महला ५ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरै अंतरि लोचा मिलण की पिआरे हउ किउ पाई गुर पूरे ॥ जे सउ खेल खेलाईऐ बालकु रहि न सकै बिनु खीरे ॥ मेरै अंतरि भुख न उतरै अमाली जे सउ भोजन मै नीरे ॥ मेरै मनि तनि प्रेमु पिरम का बिनु दरसन किउ मनु धीरे ॥१॥

सुणि सजण मेरे प्रीतम भाई मै मेलिहु मित्रु सुखदाता ॥ ओहु जीअ की मेरी सभ बेदन जाणै नित सुणावै हरि कीआ बाता ॥ हउ इकु खिनु तिसु बिनु रहि न सका जिउ चात्रिकु जल कउ बिललाता ॥ हउ किआ गुण तेरे सारि समाली मै निरगुण कउ रखि लेता ॥२॥

हउ भई उडीणी कंत कउ अमाली सो पिरु कदि नैणी देखा ॥ सभि रस भोगण विसरे बिनु पिर कितै न लेखा ॥ इहु कापड़ु तनि न सुखावई करि न सकउ हउ वेसा ॥ जिनी सखी लालु राविआ पिआरा तिन आगै हम आदेसा ॥३॥

मै सभि सीगार बणाइआ अमाली बिनु पिर कामि न आए ॥ जा सहि बात न पुछीआ अमाली ता बिरथा जोबनु सभु जाए ॥ धनु धनु ते सोहागणी अमाली जिन सहु रहिआ समाए ॥ हउ वारिआ तिन सोहागणी अमाली तिन के धोवा सद पाए ॥४॥

जिचरु दूजा भरमु सा अमाली तिचरु मै जाणिआ प्रभु दूरे ॥ जा मिलिआ पूरा सतिगुरू अमाली ता आसा मनसा सभ पूरे ॥ मै सरब सुखा सुख पाइआ अमाली पिरु सरब रहिआ भरपूरे ॥ जन नानक हरि रंगु माणिआ अमाली गुर सतिगुर कै लगि पैरे ॥५॥१॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 564) वडहंसु महला ३ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सची बाणी सचु धुनि सचु सबदु वीचारा ॥ अनदिनु सचु सलाहणा धनु धनु वडभाग हमारा ॥१॥

मन मेरे साचे नाम विटहु बलि जाउ ॥ दासनि दासा होइ रहहि ता पावहि सचा नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

जिहवा सची सचि रती तनु मनु सचा होइ ॥ बिनु साचे होरु सालाहणा जासहि जनमु सभु खोइ ॥२॥

सचु खेती सचु बीजणा साचा वापारा ॥ अनदिनु लाहा सचु नामु धनु भगति भरे भंडारा ॥३॥

सचु खाणा सचु पैनणा सचु टेक हरि नाउ ॥ जिस नो बखसे तिसु मिलै महली पाए थाउ ॥४॥

आवहि सचे जावहि सचे फिरि जूनी मूलि न पाहि ॥ गुरमुखि दरि साचै सचिआर हहि साचे माहि समाहि ॥५॥

अंतरु सचा मनु सचा सची सिफति सनाइ ॥ सचै थानि सचु सालाहणा सतिगुर बलिहारै जाउ ॥६॥

सचु वेला मूरतु सचु जितु सचे नालि पिआरु ॥ सचु वेखणा सचु बोलणा सचा सभु आकारु ॥७॥

नानक सचै मेले ता मिले आपे लए मिलाइ ॥ जिउ भावै तिउ रखसी आपे करे रजाइ ॥८॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 565) वडहंसु महला ३ ॥
मनूआ दह दिस धावदा ओहु कैसे हरि गुण गावै ॥ इंद्री विआपि रही अधिकाई कामु क्रोधु नित संतावै ॥१॥

वाहु वाहु सहजे गुण रवीजै ॥ राम नामु इसु जुग महि दुलभु है गुरमति हरि रसु पीजै ॥१॥ रहाउ ॥

सबदु चीनि मनु निरमलु होवै ता हरि के गुण गावै ॥ गुरमती आपै आपु पछाणै ता निज घरि वासा पावै ॥२॥

ए मन मेरे सदा रंगि राते सदा हरि के गुण गाउ ॥ हरि निरमलु सदा सुखदाता मनि चिंदिआ फलु पाउ ॥३॥

हम नीच से ऊतम भए हरि की सरणाई ॥ पाथरु डुबदा काढि लीआ साची वडिआई ॥४॥

बिखु से अम्रित भए गुरमति बुधि पाई ॥ अकहु परमल भए अंतरि वासना वसाई ॥५॥

माणस जनमु दुल्मभु है जग महि खटिआ आइ ॥ पूरै भागि सतिगुरु मिलै हरि नामु धिआइ ॥६॥

मनमुख भूले बिखु लगे अहिला जनमु गवाइआ ॥ हरि का नामु सदा सुख सागरु साचा सबदु न भाइआ ॥७॥

मुखहु हरि हरि सभु को करै विरलै हिरदै वसाइआ ॥ नानक जिन कै हिरदै वसिआ मोख मुकति तिन्ह पाइआ ॥८॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 565) वडहंसु महला १ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काइआ कूड़ि विगाड़ि काहे नाईऐ ॥ नाता सो परवाणु सचु कमाईऐ ॥ जब साच अंदरि होइ साचा तामि साचा पाईऐ ॥ लिखे बाझहु सुरति नाही बोलि बोलि गवाईऐ ॥ जिथै जाइ बहीऐ भला कहीऐ सुरति सबदु लिखाईऐ ॥ काइआ कूड़ि विगाड़ि काहे नाईऐ ॥१॥

ता मै कहिआ कहणु जा तुझै कहाइआ ॥ अम्रितु हरि का नामु मेरै मनि भाइआ ॥ नामु मीठा मनहि लागा दूखि डेरा ढाहिआ ॥ सूखु मन महि आइ वसिआ जामि तै फुरमाइआ ॥ नदरि तुधु अरदासि मेरी जिंनि आपु उपाइआ ॥ ता मै कहिआ कहणु जा तुझै कहाइआ ॥२॥

वारी खसमु कढाए किरतु कमावणा ॥ मंदा किसै न आखि झगड़ा पावणा ॥ नह पाइ झगड़ा सुआमि सेती आपि आपु वञावणा ॥ जिसु नालि संगति करि सरीकी जाइ किआ रूआवणा ॥ जो देइ सहणा मनहि कहणा आखि नाही वावणा ॥ वारी खसमु कढाए किरतु कमावणा ॥३॥

सभ उपाईअनु आपि आपे नदरि करे ॥ कउड़ा कोइ न मागै मीठा सभ मागै ॥ सभु कोइ मीठा मंगि देखै खसम भावै सो करे ॥ किछु पुंन दान अनेक करणी नाम तुलि न समसरे ॥ नानका जिन नामु मिलिआ करमु होआ धुरि कदे ॥ सभ उपाईअनु आपि आपे नदरि करे ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 566) वडहंसु महला १ ॥
करहु दइआ तेरा नामु वखाणा ॥ सभ उपाईऐ आपि आपे सरब समाणा ॥ सरबे समाणा आपि तूहै उपाइ धंधै लाईआ ॥ इकि तुझ ही कीए राजे इकना भिख भवाईआ ॥ लोभु मोहु तुझु कीआ मीठा एतु भरमि भुलाणा ॥ सदा दइआ करहु अपणी तामि नामु वखाणा ॥१॥

नामु तेरा है साचा सदा मै मनि भाणा ॥ दूखु गइआ सुखु आइ समाणा ॥ गावनि सुरि नर सुघड़ सुजाणा ॥ सुरि नर सुघड़ सुजाण गावहि जो तेरै मनि भावहे ॥ माइआ मोहे चेतहि नाही अहिला जनमु गवावहे ॥ इकि मूड़ मुगध न चेतहि मूले जो आइआ तिसु जाणा ॥ नामु तेरा सदा साचा सोइ मै मनि भाणा ॥२॥

तेरा वखतु सुहावा अम्रितु तेरी बाणी ॥ सेवक सेवहि भाउ करि लागा साउ पराणी ॥ साउ प्राणी तिना लागा जिनी अम्रितु पाइआ ॥ नामि तेरै जोइ राते नित चड़हि सवाइआ ॥ इकु करमु धरमु न होइ संजमु जामि न एकु पछाणी ॥ वखतु सुहावा सदा तेरा अम्रित तेरी बाणी ॥३॥

हउ बलिहारी साचे नावै ॥ राजु तेरा कबहु न जावै ॥ राजो त तेरा सदा निहचलु एहु कबहु न जावए ॥ चाकरु त तेरा सोइ होवै जोइ सहजि समावए ॥ दुसमनु त दूखु न लगै मूले पापु नेड़ि न आवए ॥ हउ बलिहारी सदा होवा एक तेरे नावए ॥४॥

जुगह जुगंतरि भगत तुमारे ॥ कीरति करहि सुआमी तेरै दुआरे ॥ जपहि त साचा एकु मुरारे ॥ साचा मुरारे तामि जापहि जामि मंनि वसावहे ॥ भरमो भुलावा तुझहि कीआ जामि एहु चुकावहे ॥ गुर परसादी करहु किरपा लेहु जमहु उबारे ॥ जुगह जुगंतरि भगत तुमारे ॥५॥

वडे मेरे साहिबा अलख अपारा ॥ किउ करि करउ बेनंती हउ आखि न जाणा ॥ नदरि करहि ता साचु पछाणा ॥ साचो पछाणा तामि तेरा जामि आपि बुझावहे ॥ दूख भूख संसारि कीए सहसा एहु चुकावहे ॥ बिनवंति नानकु जाइ सहसा बुझै गुर बीचारा ॥ वडा साहिबु है आपि अलख अपारा ॥६॥

तेरे बंके लोइण दंत रीसाला ॥ सोहणे नक जिन लमड़े वाला ॥ कंचन काइआ सुइने की ढाला ॥ सोवंन ढाला क्रिसन माला जपहु तुसी सहेलीहो ॥ जम दुआरि न होहु खड़ीआ सिख सुणहु महेलीहो ॥ हंस हंसा बग बगा लहै मन की जाला ॥ बंके लोइण दंत रीसाला ॥७॥

तेरी चाल सुहावी मधुराड़ी बाणी ॥ कुहकनि कोकिला तरल जुआणी ॥ तरला जुआणी आपि भाणी इछ मन की पूरीए ॥ सारंग जिउ पगु धरै ठिमि ठिमि आपि आपु संधूरए ॥ स्रीरंग राती फिरै माती उदकु गंगा वाणी ॥ बिनवंति नानकु दासु हरि का तेरी चाल सुहावी मधुराड़ी बाणी ॥८॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 567) वडहंसु महला ३ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आपणे पिर कै रंगि रती मुईए सोभावंती नारे ॥ सचै सबदि मिलि रही मुईए पिरु रावे भाइ पिआरे ॥ सचै भाइ पिआरी कंति सवारी हरि हरि सिउ नेहु रचाइआ ॥ आपु गवाइआ ता पिरु पाइआ गुर कै सबदि समाइआ ॥ सा धन सबदि सुहाई प्रेम कसाई अंतरि प्रीति पिआरी ॥ नानक सा धन मेलि लई पिरि आपे साचै साहि सवारी ॥१॥

निरगुणवंतड़ीए पिरु देखि हदूरे राम ॥ गुरमुखि जिनी राविआ मुईए पिरु रवि रहिआ भरपूरे राम ॥ पिरु रवि रहिआ भरपूरे वेखु हजूरे जुगि जुगि एको जाता ॥ धन बाली भोली पिरु सहजि रावै मिलिआ करम बिधाता ॥ जिनि हरि रसु चाखिआ सबदि सुभाखिआ हरि सरि रही भरपूरे ॥ नानक कामणि सा पिर भावै सबदे रहै हदूरे ॥२॥

सोहागणी जाइ पूछहु मुईए जिनी विचहु आपु गवाइआ ॥ पिर का हुकमु न पाइओ मुईए जिनी विचहु आपु न गवाइआ ॥ जिनी आपु गवाइआ तिनी पिरु पाइआ रंग सिउ रलीआ माणै ॥ सदा रंगि राती सहजे माती अनदिनु नामु वखाणै ॥ कामणि वडभागी अंतरि लिव लागी हरि का प्रेमु सुभाइआ ॥ नानक कामणि सहजे राती जिनि सचु सीगारु बणाइआ ॥३॥

हउमै मारि मुईए तू चलु गुर कै भाए ॥ हरि वरु रावहि सदा मुईए निज घरि वासा पाए ॥ निज घरि वासा पाए सबदु वजाए सदा सुहागणि नारी ॥ पिरु रलीआला जोबनु बाला अनदिनु कंति सवारी ॥ हरि वरु सोहागो मसतकि भागो सचै सबदि सुहाए ॥ नानक कामणि हरि रंगि राती जा चलै सतिगुर भाए ॥४॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 568) वडहंसु महला ३ ॥
गुरमुखि सभु वापारु भला जे सहजे कीजै राम ॥ अनदिनु नामु वखाणीऐ लाहा हरि रसु पीजै राम ॥ लाहा हरि रसु लीजै हरि रावीजै अनदिनु नामु वखाणै ॥ गुण संग्रहि अवगण विकणहि आपै आपु पछाणै ॥ गुरमति पाई वडी वडिआई सचै सबदि रसु पीजै ॥ नानक हरि की भगति निराली गुरमुखि विरलै कीजै ॥१॥

गुरमुखि खेती हरि अंतरि बीजीऐ हरि लीजै सरीरि जमाए राम ॥ आपणे घर अंदरि रसु भुंचु तू लाहा लै परथाए राम ॥ लाहा परथाए हरि मंनि वसाए धनु खेती वापारा ॥ हरि नामु धिआए मंनि वसाए बूझै गुर बीचारा ॥ मनमुख खेती वणजु करि थाके त्रिसना भुख न जाए ॥ नानक नामु बीजि मन अंदरि सचै सबदि सुभाए ॥२॥

हरि वापारि से जन लागे जिना मसतकि मणी वडभागो राम ॥ गुरमती मनु निज घरि वसिआ सचै सबदि बैरागो राम ॥ मुखि मसतकि भागो सचि बैरागो साचि रते वीचारी ॥ नाम बिना सभु जगु बउराना सबदे हउमै मारी ॥ साचै सबदि लागि मति उपजै गुरमुखि नामु सोहागो ॥ नानक सबदि मिलै भउ भंजनु हरि रावै मसतकि भागो ॥३॥

खेती वणजु सभु हुकमु है हुकमे मंनि वडिआई राम ॥ गुरमती हुकमु बूझीऐ हुकमे मेलि मिलाई राम ॥ हुकमि मिलाई सहजि समाई गुर का सबदु अपारा ॥ सची वडिआई गुर ते पाई सचु सवारणहारा ॥ भउ भंजनु पाइआ आपु गवाइआ गुरमुखि मेलि मिलाई ॥ कहु नानक नामु निरंजनु अगमु अगोचरु हुकमे रहिआ समाई ॥४॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 569) वडहंसु महला ३ ॥
मन मेरिआ तू सदा सचु समालि जीउ ॥ आपणै घरि तू सुखि वसहि पोहि न सकै जमकालु जीउ ॥ कालु जालु जमु जोहि न साकै साचै सबदि लिव लाए ॥ सदा सचि रता मनु निरमलु आवणु जाणु रहाए ॥ दूजै भाइ भरमि विगुती मनमुखि मोही जमकालि ॥ कहै नानकु सुणि मन मेरे तू सदा सचु समालि ॥१॥

मन मेरिआ अंतरि तेरै निधानु है बाहरि वसतु न भालि ॥ जो भावै सो भुंचि तू गुरमुखि नदरि निहालि ॥ गुरमुखि नदरि निहालि मन मेरे अंतरि हरि नामु सखाई ॥ मनमुख अंधुले गिआन विहूणे दूजै भाइ खुआई ॥ बिनु नावै को छूटै नाही सभ बाधी जमकालि ॥ नानक अंतरि तेरै निधानु है तू बाहरि वसतु न भालि ॥२॥

मन मेरिआ जनमु पदारथु पाइ कै इकि सचि लगे वापारा ॥ सतिगुरु सेवनि आपणा अंतरि सबदु अपारा ॥ अंतरि सबदु अपारा हरि नामु पिआरा नामे नउ निधि पाई ॥ मनमुख माइआ मोह विआपे दूखि संतापे दूजै पति गवाई ॥ हउमै मारि सचि सबदि समाणे सचि रते अधिकाई ॥ नानक माणस जनमु दुल्मभु है सतिगुरि बूझ बुझाई ॥३॥

मन मेरे सतिगुरु सेवनि आपणा से जन वडभागी राम ॥ जो मनु मारहि आपणा से पुरख बैरागी राम ॥ से जन बैरागी सचि लिव लागी आपणा आपु पछाणिआ ॥ मति निहचल अति गूड़ी गुरमुखि सहजे नामु वखाणिआ ॥ इक कामणि हितकारी माइआ मोहि पिआरी मनमुख सोइ रहे अभागे ॥ नानक सहजे सेवहि गुरु अपणा से पूरे वडभागे ॥४॥३॥


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