Pt 3 - राग सूही - बाणी शब्द, Part 3 - Raag Suhi - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अमरदास जी -- SGGS 753) रागु सूही महला ३ घरु १ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नामै ही ते सभु किछु होआ बिनु सतिगुर नामु न जापै ॥ गुर का सबदु महा रसु मीठा बिनु चाखे सादु न जापै ॥ कउडी बदलै जनमु गवाइआ चीनसि नाही आपै ॥ गुरमुखि होवै ता एको जाणै हउमै दुखु न संतापै ॥१॥

बलिहारी गुर अपणे विटहु जिनि साचे सिउ लिव लाई ॥ सबदु चीन्हि आतमु परगासिआ सहजे रहिआ समाई ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि गावै गुरमुखि बूझै गुरमुखि सबदु बीचारे ॥ जीउ पिंडु सभु गुर ते उपजै गुरमुखि कारज सवारे ॥ मनमुखि अंधा अंधु कमावै बिखु खटे संसारे ॥ माइआ मोहि सदा दुखु पाए बिनु गुर अति पिआरे ॥२॥

सोई सेवकु जे सतिगुर सेवे चालै सतिगुर भाए ॥ साचा सबदु सिफति है साची साचा मंनि वसाए ॥ सची बाणी गुरमुखि आखै हउमै विचहु जाए ॥ आपे दाता करमु है साचा साचा सबदु सुणाए ॥३॥

गुरमुखि घाले गुरमुखि खटे गुरमुखि नामु जपाए ॥ सदा अलिपतु साचै रंगि राता गुर कै सहजि सुभाए ॥ मनमुखु सद ही कूड़ो बोलै बिखु बीजै बिखु खाए ॥ जमकालि बाधा त्रिसना दाधा बिनु गुर कवणु छडाए ॥४॥

सचा तीरथु जितु सत सरि नावणु गुरमुखि आपि बुझाए ॥ अठसठि तीरथ गुर सबदि दिखाए तितु नातै मलु जाए ॥ सचा सबदु सचा है निरमलु ना मलु लगै न लाए ॥ सची सिफति सची सालाह पूरे गुर ते पाए ॥५॥

तनु मनु सभु किछु हरि तिसु केरा दुरमति कहणु न जाए ॥ हुकमु होवै ता निरमलु होवै हउमै विचहु जाए ॥ गुर की साखी सहजे चाखी त्रिसना अगनि बुझाए ॥ गुर कै सबदि राता सहजे माता सहजे रहिआ समाए ॥६॥

हरि का नामु सति करि जाणै गुर कै भाइ पिआरे ॥ सची वडिआई गुर ते पाई सचै नाइ पिआरे ॥ एको सचा सभ महि वरतै विरला को वीचारे ॥ आपे मेलि लए ता बखसे सची भगति सवारे ॥७॥

सभो सचु सचु सचु वरतै गुरमुखि कोई जाणै ॥ जमण मरणा हुकमो वरतै गुरमुखि आपु पछाणै ॥ नामु धिआए ता सतिगुरु भाए जो इछै सो फलु पाए ॥ नानक तिस दा सभु किछु होवै जि विचहु आपु गवाए ॥८॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 754) सूही महला ३ ॥
काइआ कामणि अति सुआल्हिउ पिरु वसै जिसु नाले ॥ पिर सचे ते सदा सुहागणि गुर का सबदु सम्हाले ॥ हरि की भगति सदा रंगि राता हउमै विचहु जाले ॥१॥

वाहु वाहु पूरे गुर की बाणी ॥ पूरे गुर ते उपजी साचि समाणी ॥१॥ रहाउ ॥

काइआ अंदरि सभु किछु वसै खंड मंडल पाताला ॥ काइआ अंदरि जगजीवन दाता वसै सभना करे प्रतिपाला ॥ काइआ कामणि सदा सुहेली गुरमुखि नामु सम्हाला ॥२॥

काइआ अंदरि आपे वसै अलखु न लखिआ जाई ॥ मनमुखु मुगधु बूझै नाही बाहरि भालणि जाई ॥ सतिगुरु सेवे सदा सुखु पाए सतिगुरि अलखु दिता लखाई ॥३॥

काइआ अंदरि रतन पदारथ भगति भरे भंडारा ॥ इसु काइआ अंदरि नउ खंड प्रिथमी हाट पटण बाजारा ॥ इसु काइआ अंदरि नामु नउ निधि पाईऐ गुर कै सबदि वीचारा ॥४॥

काइआ अंदरि तोलि तुलावै आपे तोलणहारा ॥ इहु मनु रतनु जवाहर माणकु तिस का मोलु अफारा ॥ मोलि कित ही नामु पाईऐ नाही नामु पाईऐ गुर बीचारा ॥५॥

गुरमुखि होवै सु काइआ खोजै होर सभ भरमि भुलाई ॥ जिस नो देइ सोई जनु पावै होर किआ को करे चतुराई ॥ काइआ अंदरि भउ भाउ वसै गुर परसादी पाई ॥६॥

काइआ अंदरि ब्रहमा बिसनु महेसा सभ ओपति जितु संसारा ॥ सचै आपणा खेलु रचाइआ आवा गउणु पासारा ॥ पूरै सतिगुरि आपि दिखाइआ सचि नामि निसतारा ॥७॥

सा काइआ जो सतिगुरु सेवै सचै आपि सवारी ॥ विणु नावै दरि ढोई नाही ता जमु करे खुआरी ॥ नानक सचु वडिआई पाए जिस नो हरि किरपा धारी ॥८॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 755) रागु सूही महला ३ घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुनीआ न सालाहि जो मरि वंञसी ॥ लोका न सालाहि जो मरि खाकु थीई ॥१॥

वाहु मेरे साहिबा वाहु ॥ गुरमुखि सदा सलाहीऐ सचा वेपरवाहु ॥१॥ रहाउ ॥

दुनीआ केरी दोसती मनमुख दझि मरंनि ॥ जम पुरि बधे मारीअहि वेला न लाहंनि ॥२॥

गुरमुखि जनमु सकारथा सचै सबदि लगंनि ॥ आतम रामु प्रगासिआ सहजे सुखि रहंनि ॥३॥

गुर का सबदु विसारिआ दूजै भाइ रचंनि ॥ तिसना भुख न उतरै अनदिनु जलत फिरंनि ॥४॥

दुसटा नालि दोसती नालि संता वैरु करंनि ॥ आपि डुबे कुट्मब सिउ सगले कुल डोबंनि ॥५॥

निंदा भली किसै की नाही मनमुख मुगध करंनि ॥ मुह काले तिन निंदका नरके घोरि पवंनि ॥६॥

ए मन जैसा सेवहि तैसा होवहि तेहे करम कमाइ ॥ आपि बीजि आपे ही खावणा कहणा किछू न जाइ ॥७॥

महा पुरखा का बोलणा होवै कितै परथाइ ॥ ओइ अम्रित भरे भरपूर हहि ओना तिलु न तमाइ ॥८॥

गुणकारी गुण संघरै अवरा उपदेसेनि ॥ से वडभागी जि ओना मिलि रहे अनदिनु नामु लएनि ॥९॥

देसी रिजकु स्मबाहि जिनि उपाई मेदनी ॥ एको है दातारु सचा आपि धणी ॥१०॥

सो सचु तेरै नालि है गुरमुखि नदरि निहालि ॥ आपे बखसे मेलि लए सो प्रभु सदा समालि ॥११॥

मनु मैला सचु निरमला किउ करि मिलिआ जाइ ॥ प्रभु मेले ता मिलि रहै हउमै सबदि जलाइ ॥१२॥

सो सहु सचा वीसरै ध्रिगु जीवणु संसारि ॥ नदरि करे ना वीसरै गुरमती वीचारि ॥१३॥

सतिगुरु मेले ता मिलि रहा साचु रखा उर धारि ॥ मिलिआ होइ न वीछुड़ै गुर कै हेति पिआरि ॥१४॥

पिरु सालाही आपणा गुर कै सबदि वीचारि ॥ मिलि प्रीतम सुखु पाइआ सोभावंती नारि ॥१५॥

मनमुख मनु न भिजई अति मैले चिति कठोर ॥ सपै दुधु पीआईऐ अंदरि विसु निकोर ॥१६॥

आपि करे किसु आखीऐ आपे बखसणहारु ॥ गुर सबदी मैलु उतरै ता सचु बणिआ सीगारु ॥१७॥

सचा साहु सचे वणजारे ओथै कूड़े ना टिकंनि ॥ ओना सचु न भावई दुख ही माहि पचंनि ॥१८॥

हउमै मैला जगु फिरै मरि जमै वारो वार ॥ पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहार ॥१९॥

संता संगति मिलि रहै ता सचि लगै पिआरु ॥ सचु सलाही सचु मनि दरि सचै सचिआरु ॥२०॥

गुर पूरे पूरी मति है अहिनिसि नामु धिआइ ॥ हउमै मेरा वड रोगु है विचहु ठाकि रहाइ ॥२१॥

गुरु सालाही आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥ तनु मनु सउपी आगै धरी विचहु आपु गवाइ ॥२२॥

खिंचोताणि विगुचीऐ एकसु सिउ लिव लाइ ॥ हउमै मेरा छडि तू ता सचि रहै समाइ ॥२३॥

सतिगुर नो मिले सि भाइरा सचै सबदि लगंनि ॥ सचि मिले से न विछुड़हि दरि सचै दिसंनि ॥२४॥

से भाई से सजणा जो सचा सेवंनि ॥ अवगण विकणि पल्हरनि गुण की साझ करंन्हि ॥२५॥

गुण की साझ सुखु ऊपजै सची भगति करेनि ॥ सचु वणंजहि गुर सबद सिउ लाहा नामु लएनि ॥२६॥

सुइना रुपा पाप करि करि संचीऐ चलै न चलदिआ नालि ॥ विणु नावै नालि न चलसी सभ मुठी जमकालि ॥२७॥

मन का तोसा हरि नामु है हिरदै रखहु सम्हालि ॥ एहु खरचु अखुटु है गुरमुखि निबहै नालि ॥२८॥

ए मन मूलहु भुलिआ जासहि पति गवाइ ॥ इहु जगतु मोहि दूजै विआपिआ गुरमती सचु धिआइ ॥२९॥

हरि की कीमति ना पवै हरि जसु लिखणु न जाइ ॥ गुर कै सबदि मनु तनु रपै हरि सिउ रहै समाइ ॥३०॥

सो सहु मेरा रंगुला रंगे सहजि सुभाइ ॥ कामणि रंगु ता चड़ै जा पिर कै अंकि समाइ ॥३१॥

चिरी विछुंने भी मिलनि जो सतिगुरु सेवंनि ॥ अंतरि नव निधि नामु है खानि खरचनि न निखुटई हरि गुण सहजि रवंनि ॥३२॥

ना ओइ जनमहि ना मरहि ना ओइ दुख सहंनि ॥ गुरि राखे से उबरे हरि सिउ केल करंनि ॥३३॥

सजण मिले न विछुड़हि जि अनदिनु मिले रहंनि ॥ इसु जग महि विरले जाणीअहि नानक सचु लहंनि ॥३४॥१॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 756) सूही महला ३ ॥
हरि जी सूखमु अगमु है कितु बिधि मिलिआ जाइ ॥ गुर कै सबदि भ्रमु कटीऐ अचिंतु वसै मनि आइ ॥१॥

गुरमुखि हरि हरि नामु जपंनि ॥ हउ तिन कै बलिहारणै मनि हरि गुण सदा रवंनि ॥१॥ रहाउ ॥

गुरु सरवरु मान सरोवरु है वडभागी पुरख लहंन्हि ॥ सेवक गुरमुखि खोजिआ से हंसुले नामु लहंनि ॥२॥

नामु धिआइन्हि रंग सिउ गुरमुखि नामि लगंन्हि ॥ धुरि पूरबि होवै लिखिआ गुर भाणा मंनि लएन्हि ॥३॥

वडभागी घरु खोजिआ पाइआ नामु निधानु ॥ गुरि पूरै वेखालिआ प्रभु आतम रामु पछानु ॥४॥

सभना का प्रभु एकु है दूजा अवरु न कोइ ॥ गुर परसादी मनि वसै तितु घटि परगटु होइ ॥५॥

सभु अंतरजामी ब्रहमु है ब्रहमु वसै सभ थाइ ॥ मंदा किस नो आखीऐ सबदि वेखहु लिव लाइ ॥६॥

बुरा भला तिचरु आखदा जिचरु है दुहु माहि ॥ गुरमुखि एको बुझिआ एकसु माहि समाइ ॥७॥

सेवा सा प्रभ भावसी जो प्रभु पाए थाइ ॥ जन नानक हरि आराधिआ गुर चरणी चितु लाइ ॥८॥२॥४॥९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 757) रागु सूही असटपदीआ महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोई आणि मिलावै मेरा प्रीतमु पिआरा हउ तिसु पहि आपु वेचाई ॥१॥

दरसनु हरि देखण कै ताई ॥ क्रिपा करहि ता सतिगुरु मेलहि हरि हरि नामु धिआई ॥१॥ रहाउ ॥

जे सुखु देहि त तुझहि अराधी दुखि भी तुझै धिआई ॥२॥

जे भुख देहि त इत ही राजा दुख विचि सूख मनाई ॥३॥

तनु मनु काटि काटि सभु अरपी विचि अगनी आपु जलाई ॥४॥

पखा फेरी पाणी ढोवा जो देवहि सो खाई ॥५॥

नानकु गरीबु ढहि पइआ दुआरै हरि मेलि लैहु वडिआई ॥६॥

अखी काढि धरी चरणा तलि सभ धरती फिरि मत पाई ॥७॥

जे पासि बहालहि ता तुझहि अराधी जे मारि कढहि भी धिआई ॥८॥

जे लोकु सलाहे ता तेरी उपमा जे निंदै त छोडि न जाई ॥९॥

जे तुधु वलि रहै ता कोई किहु आखउ तुधु विसरिऐ मरि जाई ॥१०॥

वारि वारि जाई गुर ऊपरि पै पैरी संत मनाई ॥११॥

नानकु विचारा भइआ दिवाना हरि तउ दरसन कै ताई ॥१२॥

झखड़ु झागी मीहु वरसै भी गुरु देखण जाई ॥१३॥

समुंदु सागरु होवै बहु खारा गुरसिखु लंघि गुर पहि जाई ॥१४॥

जिउ प्राणी जल बिनु है मरता तिउ सिखु गुर बिनु मरि जाई ॥१५॥

जिउ धरती सोभ करे जलु बरसै तिउ सिखु गुर मिलि बिगसाई ॥१६॥

सेवक का होइ सेवकु वरता करि करि बिनउ बुलाई ॥१७॥

नानक की बेनंती हरि पहि गुर मिलि गुर सुखु पाई ॥१८॥

तू आपे गुरु चेला है आपे गुर विचु दे तुझहि धिआई ॥१९॥

जो तुधु सेवहि सो तूहै होवहि तुधु सेवक पैज रखाई ॥२०॥

भंडार भरे भगती हरि तेरे जिसु भावै तिसु देवाई ॥२१॥

जिसु तूं देहि सोई जनु पाए होर निहफल सभ चतुराई ॥२२॥

सिमरि सिमरि सिमरि गुरु अपुना सोइआ मनु जागाई ॥२३॥

इकु दानु मंगै नानकु वेचारा हरि दासनि दासु कराई ॥२४॥

जे गुरु झिड़के त मीठा लागै जे बखसे त गुर वडिआई ॥२५॥

गुरमुखि बोलहि सो थाइ पाए मनमुखि किछु थाइ न पाई ॥२६॥

पाला ककरु वरफ वरसै गुरसिखु गुर देखण जाई ॥२७॥

सभु दिनसु रैणि देखउ गुरु अपुना विचि अखी गुर पैर धराई ॥२८॥

अनेक उपाव करी गुर कारणि गुर भावै सो थाइ पाई ॥२९॥

रैणि दिनसु गुर चरण अराधी दइआ करहु मेरे साई ॥३०॥

नानक का जीउ पिंडु गुरू है गुर मिलि त्रिपति अघाई ॥३१॥

नानक का प्रभु पूरि रहिओ है जत कत तत गोसाई ॥३२॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 758) रागु सूही महला ४ असटपदीआ घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंदरि सचा नेहु लाइआ प्रीतम आपणै ॥ तनु मनु होइ निहालु जा गुरु देखा साम्हणे ॥१॥

मै हरि हरि नामु विसाहु ॥ गुर पूरे ते पाइआ अम्रितु अगम अथाहु ॥१॥ रहाउ ॥

हउ सतिगुरु वेखि विगसीआ हरि नामे लगा पिआरु ॥ किरपा करि कै मेलिअनु पाइआ मोख दुआरु ॥२॥

सतिगुरु बिरही नाम का जे मिलै त तनु मनु देउ ॥ जे पूरबि होवै लिखिआ ता अम्रितु सहजि पीएउ ॥३॥

सुतिआ गुरु सालाहीऐ उठदिआ भी गुरु आलाउ ॥ कोई ऐसा गुरमुखि जे मिलै हउ ता के धोवा पाउ ॥४॥

कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु मै प्रीतमु देइ मिलाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ हरि पाइआ मिलिआ सहजि सुभाइ ॥५॥

सतिगुरु सागरु गुण नाम का मै तिसु देखण का चाउ ॥ हउ तिसु बिनु घड़ी न जीवऊ बिनु देखे मरि जाउ ॥६॥

जिउ मछुली विणु पाणीऐ रहै न कितै उपाइ ॥ तिउ हरि बिनु संतु न जीवई बिनु हरि नामै मरि जाइ ॥७॥

मै सतिगुर सेती पिरहड़ी किउ गुर बिनु जीवा माउ ॥ मै गुरबाणी आधारु है गुरबाणी लागि रहाउ ॥८॥

हरि हरि नामु रतंनु है गुरु तुठा देवै माइ ॥ मै धर सचे नाम की हरि नामि रहा लिव लाइ ॥९॥

गुर गिआनु पदारथु नामु है हरि नामो देइ द्रिड़ाइ ॥ जिसु परापति सो लहै गुर चरणी लागै आइ ॥१०॥

अकथ कहाणी प्रेम की को प्रीतमु आखै आइ ॥ तिसु देवा मनु आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥११॥

सजणु मेरा एकु तूं करता पुरखु सुजाणु ॥ सतिगुरि मीति मिलाइआ मै सदा सदा तेरा ताणु ॥१२॥

सतिगुरु मेरा सदा सदा ना आवै ना जाइ ॥ ओहु अबिनासी पुरखु है सभ महि रहिआ समाइ ॥१३॥

राम नाम धनु संचिआ साबतु पूंजी रासि ॥ नानक दरगह मंनिआ गुर पूरे साबासि ॥१४॥१॥२॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 759) रागु सूही असटपदीआ महला ५ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उरझि रहिओ बिखिआ कै संगा ॥ मनहि बिआपत अनिक तरंगा ॥१॥

मेरे मन अगम अगोचर ॥ कत पाईऐ पूरन परमेसर ॥१॥ रहाउ ॥

मोह मगन महि रहिआ बिआपे ॥ अति त्रिसना कबहू नही ध्रापे ॥२॥

बसइ करोधु सरीरि चंडारा ॥ अगिआनि न सूझै महा गुबारा ॥३॥

भ्रमत बिआपत जरे किवारा ॥ जाणु न पाईऐ प्रभ दरबारा ॥४॥

आसा अंदेसा बंधि पराना ॥ महलु न पावै फिरत बिगाना ॥५॥

सगल बिआधि कै वसि करि दीना ॥ फिरत पिआस जिउ जल बिनु मीना ॥६॥

कछू सिआनप उकति न मोरी ॥ एक आस ठाकुर प्रभ तोरी ॥७॥

करउ बेनती संतन पासे ॥ मेलि लैहु नानक अरदासे ॥८॥

भइओ क्रिपालु साधसंगु पाइआ ॥ नानक त्रिपते पूरा पाइआ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 760) रागु सूही महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिथन मोह अगनि सोक सागर ॥ करि किरपा उधरु हरि नागर ॥१॥

चरण कमल सरणाइ नराइण ॥ दीना नाथ भगत पराइण ॥१॥ रहाउ ॥

अनाथा नाथ भगत भै मेटन ॥ साधसंगि जमदूत न भेटन ॥२॥

जीवन रूप अनूप दइआला ॥ रवण गुणा कटीऐ जम जाला ॥३॥

अम्रित नामु रसन नित जापै ॥ रोग रूप माइआ न बिआपै ॥४॥

जपि गोबिंद संगी सभि तारे ॥ पोहत नाही पंच बटवारे ॥५॥

मन बच क्रम प्रभु एकु धिआए ॥ सरब फला सोई जनु पाए ॥६॥

धारि अनुग्रहु अपना प्रभि कीना ॥ केवल नामु भगति रसु दीना ॥७॥

आदि मधि अंति प्रभु सोई ॥ नानक तिसु बिनु अवरु न कोई ॥८॥१॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 760) रागु सूही महला ५ असटपदीआ घरु ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिन डिठिआ मनु रहसीऐ किउ पाईऐ तिन्ह संगु जीउ ॥ संत सजन मन मित्र से लाइनि प्रभ सिउ रंगु जीउ ॥ तिन्ह सिउ प्रीति न तुटई कबहु न होवै भंगु जीउ ॥१॥

पारब्रहम प्रभ करि दइआ गुण गावा तेरे नित जीउ ॥ आइ मिलहु संत सजणा नामु जपह मन मित जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

देखै सुणे न जाणई माइआ मोहिआ अंधु जीउ ॥ काची देहा विणसणी कूड़ु कमावै धंधु जीउ ॥ नामु धिआवहि से जिणि चले गुर पूरे सनबंधु जीउ ॥२॥

हुकमे जुग महि आइआ चलणु हुकमि संजोगि जीउ ॥ हुकमे परपंचु पसरिआ हुकमि करे रस भोग जीउ ॥ जिस नो करता विसरै तिसहि विछोड़ा सोगु जीउ ॥३॥

आपनड़े प्रभ भाणिआ दरगह पैधा जाइ जीउ ॥ ऐथै सुखु मुखु उजला इको नामु धिआइ जीउ ॥ आदरु दिता पारब्रहमि गुरु सेविआ सत भाइ जीउ ॥४॥

थान थनंतरि रवि रहिआ सरब जीआ प्रतिपाल जीउ ॥ सचु खजाना संचिआ एकु नामु धनु माल जीउ ॥ मन ते कबहु न वीसरै जा आपे होइ दइआल जीउ ॥५॥

आवणु जाणा रहि गए मनि वुठा निरंकारु जीउ ॥ ता का अंतु न पाईऐ ऊचा अगम अपारु जीउ ॥ जिसु प्रभु अपणा विसरै सो मरि जमै लख वार जीउ ॥६॥

साचु नेहु तिन प्रीतमा जिन मनि वुठा आपि जीउ ॥ गुण साझी तिन संगि बसे आठ पहर प्रभ जापि जीउ ॥ रंगि रते परमेसरै बिनसे सगल संताप जीउ ॥७॥

तूं करता तूं करणहारु तूहै एकु अनेक जीउ ॥ तू समरथु तू सरब मै तूहै बुधि बिबेक जीउ ॥ नानक नामु सदा जपी भगत जना की टेक जीउ ॥८॥१॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 761) सूही महला ५ ॥
सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥ नाम बिना सभि कूड़ु गाल्ही होछीआ ॥१॥

नामु निधानु अपारु भगता मनि वसै ॥ जनम मरण मोहु दुखु साधू संगि नसै ॥१॥ रहाउ ॥

मोहि बादि अहंकारि सरपर रुंनिआ ॥ सुखु न पाइन्हि मूलि नाम विछुंनिआ ॥२॥

मेरी मेरी धारि बंधनि बंधिआ ॥ नरकि सुरगि अवतार माइआ धंधिआ ॥३॥

सोधत सोधत सोधि ततु बीचारिआ ॥ नाम बिना सुखु नाहि सरपर हारिआ ॥४॥

आवहि जाहि अनेक मरि मरि जनमते ॥ बिनु बूझे सभु वादि जोनी भरमते ॥५॥

जिन्ह कउ भए दइआल तिन्ह साधू संगु भइआ ॥ अम्रितु हरि का नामु तिन्ही जनी जपि लइआ ॥६॥

खोजहि कोटि असंख बहुतु अनंत के ॥ जिसु बुझाए आपि नेड़ा तिसु हे ॥७॥

विसरु नाही दातार आपणा नामु देहु ॥ गुण गावा दिनु राति नानक चाउ एहु ॥८॥२॥५॥१६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 762) रागु सूही महला १ कुचजी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मंञु कुचजी अमावणि डोसड़े हउ किउ सहु रावणि जाउ जीउ ॥ इक दू इकि चड़ंदीआ कउणु जाणै मेरा नाउ जीउ ॥ जिन्ही सखी सहु राविआ से अ्मबी छावड़ीएहि जीउ ॥ से गुण मंञु न आवनी हउ कै जी दोस धरेउ जीउ ॥ किआ गुण तेरे विथरा हउ किआ किआ घिना तेरा नाउ जीउ ॥ इकतु टोलि न अ्मबड़ा हउ सद कुरबाणै तेरै जाउ जीउ ॥ सुइना रुपा रंगुला मोती तै माणिकु जीउ ॥ से वसतू सहि दितीआ मै तिन्ह सिउ लाइआ चितु जीउ ॥ मंदर मिटी संदड़े पथर कीते रासि जीउ ॥ हउ एनी टोली भुलीअसु तिसु कंत न बैठी पासि जीउ ॥ अ्मबरि कूंजा कुरलीआ बग बहिठे आइ जीउ ॥ सा धन चली साहुरै किआ मुहु देसी अगै जाइ जीउ ॥ सुती सुती झालु थीआ भुली वाटड़ीआसु जीउ ॥ तै सह नालहु मुतीअसु दुखा कूं धरीआसु जीउ ॥ तुधु गुण मै सभि अवगणा इक नानक की अरदासि जीउ ॥ सभि राती सोहागणी मै डोहागणि काई राति जीउ ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 762) सूही महला १ सुचजी ॥
जा तू ता मै सभु को तू साहिबु मेरी रासि जीउ ॥ तुधु अंतरि हउ सुखि वसा तूं अंतरि साबासि जीउ ॥ भाणै तखति वडाईआ भाणै भीख उदासि जीउ ॥ भाणै थल सिरि सरु वहै कमलु फुलै आकासि जीउ ॥ भाणै भवजलु लंघीऐ भाणै मंझि भरीआसि जीउ ॥ भाणै सो सहु रंगुला सिफति रता गुणतासि जीउ ॥ भाणै सहु भीहावला हउ आवणि जाणि मुईआसि जीउ ॥ तू सहु अगमु अतोलवा हउ कहि कहि ढहि पईआसि जीउ ॥ किआ मागउ किआ कहि सुणी मै दरसन भूख पिआसि जीउ ॥ गुर सबदी सहु पाइआ सचु नानक की अरदासि जीउ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 763) सूही महला ५ गुणवंती ॥
जो दीसै गुरसिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥ आखा बिरथा जीअ की गुरु सजणु देहि मिलाइ जीउ ॥ सोई दसि उपदेसड़ा मेरा मनु अनत न काहू जाइ जीउ ॥ इहु मनु तै कूं डेवसा मै मारगु देहु बताइ जीउ ॥ हउ आइआ दूरहु चलि कै मै तकी तउ सरणाइ जीउ ॥ मै आसा रखी चिति महि मेरा सभो दुखु गवाइ जीउ ॥ इतु मारगि चले भाईअड़े गुरु कहै सु कार कमाइ जीउ ॥ तिआगें मन की मतड़ी विसारें दूजा भाउ जीउ ॥ इउ पावहि हरि दरसावड़ा नह लगै तती वाउ जीउ ॥ हउ आपहु बोलि न जाणदा मै कहिआ सभु हुकमाउ जीउ ॥ हरि भगति खजाना बखसिआ गुरि नानकि कीआ पसाउ जीउ ॥ मै बहुड़ि न त्रिसना भुखड़ी हउ रजा त्रिपति अघाइ जीउ ॥ जो गुर दीसै सिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 763) रागु सूही छंत महला १ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भरि जोबनि मै मत पेईअड़ै घरि पाहुणी बलि राम जीउ ॥ मैली अवगणि चिति बिनु गुर गुण न समावनी बलि राम जीउ ॥ गुण सार न जाणी भरमि भुलाणी जोबनु बादि गवाइआ ॥ वरु घरु दरु दरसनु नही जाता पिर का सहजु न भाइआ ॥ सतिगुर पूछि न मारगि चाली सूती रैणि विहाणी ॥ नानक बालतणि राडेपा बिनु पिर धन कुमलाणी ॥१॥

बाबा मै वरु देहि मै हरि वरु भावै तिस की बलि राम जीउ ॥ रवि रहिआ जुग चारि त्रिभवण बाणी जिस की बलि राम जीउ ॥ त्रिभवण कंतु रवै सोहागणि अवगणवंती दूरे ॥ जैसी आसा तैसी मनसा पूरि रहिआ भरपूरे ॥ हरि की नारि सु सरब सुहागणि रांड न मैलै वेसे ॥ नानक मै वरु साचा भावै जुगि जुगि प्रीतम तैसे ॥२॥

बाबा लगनु गणाइ हं भी वंञा साहुरै बलि राम जीउ ॥ साहा हुकमु रजाइ सो न टलै जो प्रभु करै बलि राम जीउ ॥ किरतु पइआ करतै करि पाइआ मेटि न सकै कोई ॥ जाञी नाउ नरह निहकेवलु रवि रहिआ तिहु लोई ॥ माइ निरासी रोइ विछुंनी बाली बालै हेते ॥ नानक साच सबदि सुख महली गुर चरणी प्रभु चेते ॥३॥

बाबुलि दितड़ी दूरि ना आवै घरि पेईऐ बलि राम जीउ ॥ रहसी वेखि हदूरि पिरि रावी घरि सोहीऐ बलि राम जीउ ॥ साचे पिर लोड़ी प्रीतम जोड़ी मति पूरी परधाने ॥ संजोगी मेला थानि सुहेला गुणवंती गुर गिआने ॥ सतु संतोखु सदा सचु पलै सचु बोलै पिर भाए ॥ नानक विछुड़ि ना दुखु पाए गुरमति अंकि समाए ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 764) रागु सूही महला १ छंतु घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हम घरि साजन आए ॥ साचै मेलि मिलाए ॥ सहजि मिलाए हरि मनि भाए पंच मिले सुखु पाइआ ॥ साई वसतु परापति होई जिसु सेती मनु लाइआ ॥ अनदिनु मेलु भइआ मनु मानिआ घर मंदर सोहाए ॥ पंच सबद धुनि अनहद वाजे हम घरि साजन आए ॥१॥

आवहु मीत पिआरे ॥ मंगल गावहु नारे ॥ सचु मंगलु गावहु ता प्रभ भावहु सोहिलड़ा जुग चारे ॥ अपनै घरि आइआ थानि सुहाइआ कारज सबदि सवारे ॥ गिआन महा रसु नेत्री अंजनु त्रिभवण रूपु दिखाइआ ॥ सखी मिलहु रसि मंगलु गावहु हम घरि साजनु आइआ ॥२॥

मनु तनु अम्रिति भिंना ॥ अंतरि प्रेमु रतंना ॥ अंतरि रतनु पदारथु मेरै परम ततु वीचारो ॥ जंत भेख तू सफलिओ दाता सिरि सिरि देवणहारो ॥ तू जानु गिआनी अंतरजामी आपे कारणु कीना ॥ सुनहु सखी मनु मोहनि मोहिआ तनु मनु अम्रिति भीना ॥३॥

आतम रामु संसारा ॥ साचा खेलु तुम्हारा ॥ सचु खेलु तुम्हारा अगम अपारा तुधु बिनु कउणु बुझाए ॥ सिध साधिक सिआणे केते तुझ बिनु कवणु कहाए ॥ कालु बिकालु भए देवाने मनु राखिआ गुरि ठाए ॥ नानक अवगण सबदि जलाए गुण संगमि प्रभु पाए ॥४॥१॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 764) रागु सूही महला १ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आवहु सजणा हउ देखा दरसनु तेरा राम ॥ घरि आपनड़ै खड़ी तका मै मनि चाउ घनेरा राम ॥ मनि चाउ घनेरा सुणि प्रभ मेरा मै तेरा भरवासा ॥ दरसनु देखि भई निहकेवल जनम मरण दुखु नासा ॥ सगली जोति जाता तू सोई मिलिआ भाइ सुभाए ॥ नानक साजन कउ बलि जाईऐ साचि मिले घरि आए ॥१॥

घरि आइअड़े साजना ता धन खरी सरसी राम ॥ हरि मोहिअड़ी साच सबदि ठाकुर देखि रहंसी राम ॥ गुण संगि रहंसी खरी सरसी जा रावी रंगि रातै ॥ अवगण मारि गुणी घरु छाइआ पूरै पुरखि बिधातै ॥ तसकर मारि वसी पंचाइणि अदलु करे वीचारे ॥ नानक राम नामि निसतारा गुरमति मिलहि पिआरे ॥२॥

वरु पाइअड़ा बालड़ीए आसा मनसा पूरी राम ॥ पिरि राविअड़ी सबदि रली रवि रहिआ नह दूरी राम ॥ प्रभु दूरि न होई घटि घटि सोई तिस की नारि सबाई ॥ आपे रसीआ आपे रावे जिउ तिस दी वडिआई ॥ अमर अडोलु अमोलु अपारा गुरि पूरै सचु पाईऐ ॥ नानक आपे जोग सजोगी नदरि करे लिव लाईऐ ॥३॥

पिरु उचड़ीऐ माड़ड़ीऐ तिहु लोआ सिरताजा राम ॥ हउ बिसम भई देखि गुणा अनहद सबद अगाजा राम ॥ सबदु वीचारी करणी सारी राम नामु नीसाणो ॥ नाम बिना खोटे नही ठाहर नामु रतनु परवाणो ॥ पति मति पूरी पूरा परवाना ना आवै ना जासी ॥ नानक गुरमुखि आपु पछाणै प्रभ जैसे अविनासी ॥४॥१॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 765) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु सूही छंत महला १ घरु ४ ॥
जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥ दानि तेरै घटि चानणा तनि चंदु दीपाइआ ॥ चंदो दीपाइआ दानि हरि कै दुखु अंधेरा उठि गइआ ॥ गुण जंञ लाड़े नालि सोहै परखि मोहणीऐ लइआ ॥ वीवाहु होआ सोभ सेती पंच सबदी आइआ ॥ जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥१॥

हउ बलिहारी साजना मीता अवरीता ॥ इहु तनु जिन सिउ गाडिआ मनु लीअड़ा दीता ॥ लीआ त दीआ मानु जिन्ह सिउ से सजन किउ वीसरहि ॥ जिन्ह दिसि आइआ होहि रलीआ जीअ सेती गहि रहहि ॥ सगल गुण अवगणु न कोई होहि नीता नीता ॥ हउ बलिहारी साजना मीता अवरीता ॥२॥

गुणा का होवै वासुला कढि वासु लईजै ॥ जे गुण होवन्हि साजना मिलि साझ करीजै ॥ साझ करीजै गुणह केरी छोडि अवगण चलीऐ ॥ पहिरे पट्मबर करि अड्मबर आपणा पिड़ु मलीऐ ॥ जिथै जाइ बहीऐ भला कहीऐ झोलि अम्रितु पीजै ॥ गुणा का होवै वासुला कढि वासु लईजै ॥३॥

आपि करे किसु आखीऐ होरु करे न कोई ॥ आखण ता कउ जाईऐ जे भूलड़ा होई ॥ जे होइ भूला जाइ कहीऐ आपि करता किउ भुलै ॥ सुणे देखे बाझु कहिऐ दानु अणमंगिआ दिवै ॥ दानु देइ दाता जगि बिधाता नानका सचु सोई ॥ आपि करे किसु आखीऐ होरु करे न कोई ॥४॥१॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 766) सूही महला १ ॥
मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥ गुर की पउड़ी साच की साचा सुखु होई ॥ सुखि सहजि आवै साच भावै साच की मति किउ टलै ॥ इसनानु दानु सुगिआनु मजनु आपि अछलिओ किउ छलै ॥ परपंच मोह बिकार थाके कूड़ु कपटु न दोई ॥ मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥१॥

साहिबु सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥ मैलु लागी मनि मैलिऐ किनै अम्रितु पीआ ॥ मथि अम्रितु पीआ इहु मनु दीआ गुर पहि मोलु कराइआ ॥ आपनड़ा प्रभु सहजि पछाता जा मनु साचै लाइआ ॥ तिसु नालि गुण गावा जे तिसु भावा किउ मिलै होइ पराइआ ॥ साहिबु सो सालाहीऐ जिनि जगतु उपाइआ ॥२॥

आइ गइआ की न आइओ किउ आवै जाता ॥ प्रीतम सिउ मनु मानिआ हरि सेती राता ॥ साहिब रंगि राता सच की बाता जिनि बि्मब का कोटु उसारिआ ॥ पंच भू नाइको आपि सिरंदा जिनि सच का पिंडु सवारिआ ॥ हम अवगणिआरे तू सुणि पिआरे तुधु भावै सचु सोई ॥ आवण जाणा ना थीऐ साची मति होई ॥३॥

अंजनु तैसा अंजीऐ जैसा पिर भावै ॥ समझै सूझै जाणीऐ जे आपि जाणावै ॥ आपि जाणावै मारगि पावै आपे मनूआ लेवए ॥ करम सुकरम कराए आपे कीमति कउण अभेवए ॥ तंतु मंतु पाखंडु न जाणा रामु रिदै मनु मानिआ ॥ अंजनु नामु तिसै ते सूझै गुर सबदी सचु जानिआ ॥४॥

साजन होवनि आपणे किउ पर घर जाही ॥ साजन राते सच के संगे मन माही ॥ मन माहि साजन करहि रलीआ करम धरम सबाइआ ॥ अठसठि तीरथ पुंन पूजा नामु साचा भाइआ ॥ आपि साजे थापि वेखै तिसै भाणा भाइआ ॥ साजन रांगि रंगीलड़े रंगु लालु बणाइआ ॥५॥

अंधा आगू जे थीऐ किउ पाधरु जाणै ॥ आपि मुसै मति होछीऐ किउ राहु पछाणै ॥ किउ राहि जावै महलु पावै अंध की मति अंधली ॥ विणु नाम हरि के कछु न सूझै अंधु बूडौ धंधली ॥ दिनु राति चानणु चाउ उपजै सबदु गुर का मनि वसै ॥ कर जोड़ि गुर पहि करि बिनंती राहु पाधरु गुरु दसै ॥६॥

मनु परदेसी जे थीऐ सभु देसु पराइआ ॥ किसु पहि खोल्हउ गंठड़ी दूखी भरि आइआ ॥ दूखी भरि आइआ जगतु सबाइआ कउणु जाणै बिधि मेरीआ ॥ आवणे जावणे खरे डरावणे तोटि न आवै फेरीआ ॥ नाम विहूणे ऊणे झूणे ना गुरि सबदु सुणाइआ ॥ मनु परदेसी जे थीऐ सभु देसु पराइआ ॥७॥

गुर महली घरि आपणै सो भरपुरि लीणा ॥ सेवकु सेवा तां करे सच सबदि पतीणा ॥ सबदे पतीजै अंकु भीजै सु महलु महला अंतरे ॥ आपि करता करे सोई प्रभु आपि अंति निरंतरे ॥ गुर सबदि मेला तां सुहेला बाजंत अनहद बीणा ॥ गुर महली घरि आपणै सो भरिपुरि लीणा ॥८॥

कीता किआ सालाहीऐ करि वेखै सोई ॥ ता की कीमति ना पवै जे लोचै कोई ॥ कीमति सो पावै आपि जाणावै आपि अभुलु न भुलए ॥ जै जै कारु करहि तुधु भावहि गुर कै सबदि अमुलए ॥ हीणउ नीचु करउ बेनंती साचु न छोडउ भाई ॥ नानक जिनि करि देखिआ देवै मति साई ॥९॥२॥५॥


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