Pt 2 - राग सूही - बाणी शब्द, Part 2 - Raag Suhi - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
सिमरि सिमरि ता कउ हउ जीवा ॥ चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा ॥१॥

सो हरि मेरा अंतरजामी ॥ भगत जना कै संगि सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥

सुणि सुणि अम्रित नामु धिआवा ॥ आठ पहर तेरे गुण गावा ॥२॥

पेखि पेखि लीला मनि आनंदा ॥ गुण अपार प्रभ परमानंदा ॥३॥

जा कै सिमरनि कछु भउ न बिआपै ॥ सदा सदा नानक हरि जापै ॥४॥११॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
गुर कै बचनि रिदै धिआनु धारी ॥ रसना जापु जपउ बनवारी ॥१॥

सफल मूरति दरसन बलिहारी ॥ चरण कमल मन प्राण अधारी ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि जनम मरण निवारी ॥ अम्रित कथा सुणि करन अधारी ॥२॥

काम क्रोध लोभ मोह तजारी ॥ द्रिड़ु नाम दानु इसनानु सुचारी ॥३॥

कहु नानक इहु ततु बीचारी ॥ राम नाम जपि पारि उतारी ॥४॥१२॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 740) सूही महला ५ ॥
लोभि मोहि मगन अपराधी ॥ करणहार की सेव न साधी ॥१॥

पतित पावन प्रभ नाम तुमारे ॥ राखि लेहु मोहि निरगुनीआरे ॥१॥ रहाउ ॥

तूं दाता प्रभ अंतरजामी ॥ काची देह मानुख अभिमानी ॥२॥

सुआद बाद ईरख मद माइआ ॥ इन संगि लागि रतन जनमु गवाइआ ॥३॥

दुख भंजन जगजीवन हरि राइआ ॥ सगल तिआगि नानकु सरणाइआ ॥४॥१३॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 741) सूही महला ५ ॥
पेखत चाखत कहीअत अंधा सुनीअत सुनीऐ नाही ॥ निकटि वसतु कउ जाणै दूरे पापी पाप कमाही ॥१॥

सो किछु करि जितु छुटहि परानी ॥ हरि हरि नामु जपि अम्रित बानी ॥१॥ रहाउ ॥

घोर महल सदा रंगि राता ॥ संगि तुम्हारै कछू न जाता ॥२॥

रखहि पोचारि माटी का भांडा ॥ अति कुचील मिलै जम डांडा ॥३॥

काम क्रोधि लोभि मोहि बाधा ॥ महा गरत महि निघरत जाता ॥४॥

नानक की अरदासि सुणीजै ॥ डूबत पाहन प्रभ मेरे लीजै ॥५॥१४॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 741) सूही महला ५ ॥
जीवत मरै बुझै प्रभु सोइ ॥ तिसु जन करमि परापति होइ ॥१॥

सुणि साजन इउ दुतरु तरीऐ ॥ मिलि साधू हरि नामु उचरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

एक बिना दूजा नही जानै ॥ घट घट अंतरि पारब्रहमु पछानै ॥२॥

जो किछु करै सोई भल मानै ॥ आदि अंत की कीमति जानै ॥३॥

कहु नानक तिसु जन बलिहारी ॥ जा कै हिरदै वसहि मुरारी ॥४॥१५॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 741) सूही महला ५ ॥
गुरु परमेसरु करणैहारु ॥ सगल स्रिसटि कउ दे आधारु ॥१॥

गुर के चरण कमल मन धिआइ ॥ दूखु दरदु इसु तन ते जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

भवजलि डूबत सतिगुरु काढै ॥ जनम जनम का टूटा गाढै ॥२॥

गुर की सेवा करहु दिनु राति ॥ सूख सहज मनि आवै सांति ॥३॥

सतिगुर की रेणु वडभागी पावै ॥ नानक गुर कउ सद बलि जावै ॥४॥१६॥२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 741) सूही महला ५ ॥
गुर अपुने ऊपरि बलि जाईऐ ॥ आठ पहर हरि हरि जसु गाईऐ ॥१॥

सिमरउ सो प्रभु अपना सुआमी ॥ सगल घटा का अंतरजामी ॥१॥ रहाउ ॥

चरण कमल सिउ लागी प्रीति ॥ साची पूरन निरमल रीति ॥२॥

संत प्रसादि वसै मन माही ॥ जनम जनम के किलविख जाही ॥३॥

करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥ नानकु मागै संत रवाला ॥४॥१७॥२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 742) सूही महला ५ ॥
दरसनु देखि जीवा गुर तेरा ॥ पूरन करमु होइ प्रभ मेरा ॥१॥

इह बेनंती सुणि प्रभ मेरे ॥ देहि नामु करि अपणे चेरे ॥१॥ रहाउ ॥

अपणी सरणि राखु प्रभ दाते ॥ गुर प्रसादि किनै विरलै जाते ॥२॥

सुनहु बिनउ प्रभ मेरे मीता ॥ चरण कमल वसहि मेरै चीता ॥३॥

नानकु एक करै अरदासि ॥ विसरु नाही पूरन गुणतासि ॥४॥१८॥२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 742) सूही महला ५ ॥
मीतु साजनु सुत बंधप भाई ॥ जत कत पेखउ हरि संगि सहाई ॥१॥

जति मेरी पति मेरी धनु हरि नामु ॥ सूख सहज आनंद बिसराम ॥१॥ रहाउ ॥

पारब्रहमु जपि पहिरि सनाह ॥ कोटि आवध तिसु बेधत नाहि ॥२॥

हरि चरन सरण गड़ कोट हमारै ॥ कालु कंटकु जमु तिसु न बिदारै ॥३॥

नानक दास सदा बलिहारी ॥ सेवक संत राजा राम मुरारी ॥४॥१९॥२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 742) सूही महला ५ ॥
गुण गोपाल प्रभ के नित गाहा ॥ अनद बिनोद मंगल सुख ताहा ॥१॥

चलु सखीए प्रभु रावण जाहा ॥ साध जना की चरणी पाहा ॥१॥ रहाउ ॥

करि बेनती जन धूरि बाछाहा ॥ जनम जनम के किलविख लाहां ॥२॥

मनु तनु प्राण जीउ अरपाहा ॥ हरि सिमरि सिमरि मानु मोहु कटाहां ॥३॥

दीन दइआल करहु उतसाहा ॥ नानक दास हरि सरणि समाहा ॥४॥२०॥२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 742) सूही महला ५ ॥
बैकुंठ नगरु जहा संत वासा ॥ प्रभ चरण कमल रिद माहि निवासा ॥१॥

सुणि मन तन तुझु सुखु दिखलावउ ॥ हरि अनिक बिंजन तुझु भोग भुंचावउ ॥१॥ रहाउ ॥

अम्रित नामु भुंचु मन माही ॥ अचरज साद ता के बरने न जाही ॥२॥

लोभु मूआ त्रिसना बुझि थाकी ॥ पारब्रहम की सरणि जन ताकी ॥३॥

जनम जनम के भै मोह निवारे ॥ नानक दास प्रभ किरपा धारे ॥४॥२१॥२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 742) सूही महला ५ ॥
अनिक बींग दास के परहरिआ ॥ करि किरपा प्रभि अपना करिआ ॥१॥

तुमहि छडाइ लीओ जनु अपना ॥ उरझि परिओ जालु जगु सुपना ॥१॥ रहाउ ॥

परबत दोख महा बिकराला ॥ खिन महि दूरि कीए दइआला ॥२॥

सोग रोग बिपति अति भारी ॥ दूरि भई जपि नामु मुरारी ॥३॥

द्रिसटि धारि लीनो लड़ि लाइ ॥ हरि चरण गहे नानक सरणाइ ॥४॥२२॥२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 743) सूही महला ५ ॥
दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥ दुही सराई खुनामी कहाए ॥१॥

जो तिसु भावै सो परवाणु ॥ आपणी कुदरति आपे जाणु ॥१॥ रहाउ ॥

सचा धरमु पुंनु भला कराए ॥ दीन कै तोसै दुनी न जाए ॥२॥

सरब निरंतरि एको जागै ॥ जितु जितु लाइआ तितु तितु को लागै ॥३॥

अगम अगोचरु सचु साहिबु मेरा ॥ नानकु बोलै बोलाइआ तेरा ॥४॥२३॥२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 743) सूही महला ५ ॥
प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥ ईत ऊत की ओट सवारी ॥१॥

सदा सदा जपीऐ हरि नाम ॥ पूरन होवहि मन के काम ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभु अबिनासी रैणि दिनु गाउ ॥ जीवत मरत निहचलु पावहि थाउ ॥२॥

सो साहु सेवि जितु तोटि न आवै ॥ खात खरचत सुखि अनदि विहावै ॥३॥

जगजीवन पुरखु साधसंगि पाइआ ॥ गुर प्रसादि नानक नामु धिआइआ ॥४॥२४॥३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 743) सूही महला ५ ॥
गुर पूरे जब भए दइआल ॥ दुख बिनसे पूरन भई घाल ॥१॥

पेखि पेखि जीवा दरसु तुम्हारा ॥ चरण कमल जाई बलिहारा ॥ तुझ बिनु ठाकुर कवनु हमारा ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगति सिउ प्रीति बणि आई ॥ पूरब करमि लिखत धुरि पाई ॥२॥

जपि हरि हरि नामु अचरजु परताप ॥ जालि न साकहि तीने ताप ॥३॥

निमख न बिसरहि हरि चरण तुम्हारे ॥ नानकु मागै दानु पिआरे ॥४॥२५॥३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 743) सूही महला ५ ॥
से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥ जितु रसना हरि नामु उचारे ॥१॥

सुणि बेनती प्रभ दीन दइआला ॥ साध गावहि गुण सदा रसाला ॥१॥ रहाउ ॥

जीवन रूपु सिमरणु प्रभ तेरा ॥ जिसु क्रिपा करहि बसहि तिसु नेरा ॥२॥

जन की भूख तेरा नामु अहारु ॥ तूं दाता प्रभ देवणहारु ॥३॥

राम रमत संतन सुखु माना ॥ नानक देवनहार सुजाना ॥४॥२६॥३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 743) सूही महला ५ ॥
बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥ मिथिआ मोह बंधहि नित पारच ॥१॥

माधवे भजु दिन नित रैणी ॥ जनमु पदारथु जीति हरि सरणी ॥१॥ रहाउ ॥

करत बिकार दोऊ कर झारत ॥ राम रतनु रिद तिलु नही धारत ॥२॥

भरण पोखण संगि अउध बिहाणी ॥ जै जगदीस की गति नही जाणी ॥३॥

सरणि समरथ अगोचर सुआमी ॥ उधरु नानक प्रभ अंतरजामी ॥४॥२७॥३३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 744) सूही महला ५ ॥
साधसंगि तरै भै सागरु ॥ हरि हरि नामु सिमरि रतनागरु ॥१॥

सिमरि सिमरि जीवा नाराइण ॥ दूख रोग सोग सभि बिनसे गुर पूरे मिलि पाप तजाइण ॥१॥ रहाउ ॥

जीवन पदवी हरि का नाउ ॥ मनु तनु निरमलु साचु सुआउ ॥२॥

आठ पहर पारब्रहमु धिआईऐ ॥ पूरबि लिखतु होइ ता पाईऐ ॥३॥

सरणि पए जपि दीन दइआला ॥ नानकु जाचै संत रवाला ॥४॥२८॥३४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 744) सूही महला ५ ॥
घर का काजु न जाणी रूड़ा ॥ झूठै धंधै रचिओ मूड़ा ॥१॥

जितु तूं लावहि तितु तितु लगना ॥ जा तूं देहि तेरा नाउ जपना ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के दास हरि सेती राते ॥ राम रसाइणि अनदिनु माते ॥२॥

बाह पकरि प्रभि आपे काढे ॥ जनम जनम के टूटे गाढे ॥३॥

उधरु सुआमी प्रभ किरपा धारे ॥ नानक दास हरि सरणि दुआरे ॥४॥२९॥३५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 744) सूही महला ५ ॥
संत प्रसादि निहचलु घरु पाइआ ॥ सरब सूख फिरि नही डोलाइआ ॥१॥

गुरू धिआइ हरि चरन मनि चीन्हे ॥ ता ते करतै असथिरु कीन्हे ॥१॥ रहाउ ॥

गुण गावत अचुत अबिनासी ॥ ता ते काटी जम की फासी ॥२॥

करि किरपा लीने लड़ि लाए ॥ सदा अनदु नानक गुण गाए ॥३॥३०॥३६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 744) सूही महला ५ ॥
अम्रित बचन साध की बाणी ॥ जो जो जपै तिस की गति होवै हरि हरि नामु नित रसन बखानी ॥१॥ रहाउ ॥

कली काल के मिटे कलेसा ॥ एको नामु मन महि परवेसा ॥१॥

साधू धूरि मुखि मसतकि लाई ॥ नानक उधरे हरि गुर सरणाई ॥२॥३१॥३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 744) सूही महला ५ घरु ३ ॥
गोबिंदा गुण गाउ दइआला ॥ दरसनु देहु पूरन किरपाला ॥ रहाउ ॥

करि किरपा तुम ही प्रतिपाला ॥ जीउ पिंडु सभु तुमरा माला ॥१॥

अम्रित नामु चलै जपि नाला ॥ नानकु जाचै संत रवाला ॥२॥३२॥३८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 744) सूही महला ५ ॥
तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥ आपे थमै सचा सोई ॥१॥

हरि हरि नामु मेरा आधारु ॥ करण कारण समरथु अपारु ॥१॥ रहाउ ॥

सभ रोग मिटावे नवा निरोआ ॥ नानक रखा आपे होआ ॥२॥३३॥३९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 745) सूही महला ५ ॥
दरसन कउ लोचै सभु कोई ॥ पूरै भागि परापति होई ॥ रहाउ ॥

सिआम सुंदर तजि नीद किउ आई ॥ महा मोहनी दूता लाई ॥१॥

प्रेम बिछोहा करत कसाई ॥ निरदै जंतु तिसु दइआ न पाई ॥२॥

अनिक जनम बीतीअन भरमाई ॥ घरि वासु न देवै दुतर माई ॥३॥

दिनु रैनि अपना कीआ पाई ॥ किसु दोसु न दीजै किरतु भवाई ॥४॥

सुणि साजन संत जन भाई ॥ चरण सरण नानक गति पाई ॥५॥३४॥४०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 745) रागु सूही महला ५ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भली सुहावी छापरी जा महि गुन गाए ॥ कित ही कामि न धउलहर जितु हरि बिसराए ॥१॥ रहाउ ॥

अनदु गरीबी साधसंगि जितु प्रभ चिति आए ॥ जलि जाउ एहु बडपना माइआ लपटाए ॥१॥

पीसनु पीसि ओढि कामरी सुखु मनु संतोखाए ॥ ऐसो राजु न कितै काजि जितु नह त्रिपताए ॥२॥

नगन फिरत रंगि एक कै ओहु सोभा पाए ॥ पाट पट्मबर बिरथिआ जिह रचि लोभाए ॥३॥

सभु किछु तुम्हरै हाथि प्रभ आपि करे कराए ॥ सासि सासि सिमरत रहा नानक दानु पाए ॥४॥१॥४१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 745) सूही महला ५ ॥
हरि का संतु परान धन तिस का पनिहारा ॥ भाई मीत सुत सगल ते जीअ हूं ते पिआरा ॥१॥ रहाउ ॥

केसा का करि बीजना संत चउरु ढुलावउ ॥ सीसु निहारउ चरण तलि धूरि मुखि लावउ ॥१॥

मिसट बचन बेनती करउ दीन की निआई ॥ तजि अभिमानु सरणी परउ हरि गुण निधि पाई ॥२॥

अवलोकन पुनह पुनह करउ जन का दरसारु ॥ अम्रित बचन मन महि सिंचउ बंदउ बार बार ॥३॥

चितवउ मनि आसा करउ जन का संगु मागउ ॥ नानक कउ प्रभ दइआ करि दास चरणी लागउ ॥४॥२॥४२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 745) सूही महला ५ ॥
जिनि मोहे ब्रहमंड खंड ताहू महि पाउ ॥ राखि लेहु इहु बिखई जीउ देहु अपुना नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

जा ते नाही को सुखी ता कै पाछै जाउ ॥ छोडि जाहि जो सगल कउ फिरि फिरि लपटाउ ॥१॥

करहु क्रिपा करुणापते तेरे हरि गुण गाउ ॥ नानक की प्रभ बेनती साधसंगि समाउ ॥२॥३॥४३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 746) रागु सूही महला ५ घरु ५ पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥ जपि मन गोबिंद एकै अवरु नही को लेखै संत लागु मनहि छाडु दुबिधा की कुरीआ ॥१॥ रहाउ ॥

निरगुन हरीआ सरगुन धरीआ अनिक कोठरीआ भिंन भिंन भिंन भिन करीआ ॥ विचि मन कोटवरीआ ॥ निज मंदरि पिरीआ ॥ तहा आनद करीआ ॥ नह मरीआ नह जरीआ ॥१॥

किरतनि जुरीआ बहु बिधि फिरीआ पर कउ हिरीआ ॥ बिखना घिरीआ ॥ अब साधू संगि परीआ ॥ हरि दुआरै खरीआ ॥ दरसनु करीआ ॥ नानक गुर मिरीआ ॥ बहुरि न फिरीआ ॥२॥१॥४४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 746) सूही महला ५ ॥
रासि मंडलु कीनो आखारा ॥ सगलो साजि रखिओ पासारा ॥१॥ रहाउ ॥

बहु बिधि रूप रंग आपारा ॥ पेखै खुसी भोग नही हारा ॥ सभि रस लैत बसत निरारा ॥१॥

बरनु चिहनु नाही मुखु न मासारा ॥ कहनु न जाई खेलु तुहारा ॥ नानक रेण संत चरनारा ॥२॥२॥४५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 746) सूही महला ५ ॥
तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥ भरोसै आइआ किरपा आइआ ॥ जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी मारगु गुरहि पठाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

महा दुतरु माइआ ॥ जैसे पवनु झुलाइआ ॥१॥

सुनि सुनि ही डराइआ ॥ कररो ध्रमराइआ ॥२॥

ग्रिह अंध कूपाइआ ॥ पावकु सगराइआ ॥३॥

गही ओट साधाइआ ॥ नानक हरि धिआइआ ॥ अब मै पूरा पाइआ ॥४॥३॥४६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 746) रागु सूही महला ५ घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥ तुठा सचा पातिसाहु तापु गइआ संसारा ॥१॥

भगता की टेक तूं संता की ओट तूं सचा सिरजनहारा ॥१॥ रहाउ ॥

सचु तेरी सामगरी सचु तेरा दरबारा ॥ सचु तेरे खाजीनिआ सचु तेरा पासारा ॥२॥

तेरा रूपु अगमु है अनूपु तेरा दरसारा ॥ हउ कुरबाणी तेरिआ सेवका जिन्ह हरि नामु पिआरा ॥३॥

सभे इछा पूरीआ जा पाइआ अगम अपारा ॥ गुरु नानकु मिलिआ पारब्रहमु तेरिआ चरणा कउ बलिहारा ॥४॥१॥४७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 747) रागु सूही महला ५ घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरा भाणा तूहै मनाइहि जिस नो होहि दइआला ॥ साई भगति जो तुधु भावै तूं सरब जीआ प्रतिपाला ॥१॥

मेरे राम राइ संता टेक तुम्हारी ॥ जो तुधु भावै सो परवाणु मनि तनि तूहै अधारी ॥१॥ रहाउ ॥

तूं दइआलु क्रिपालु क्रिपा निधि मनसा पूरणहारा ॥ भगत तेरे सभि प्राणपति प्रीतम तूं भगतन का पिआरा ॥२॥

तू अथाहु अपारु अति ऊचा कोई अवरु न तेरी भाते ॥ इह अरदासि हमारी सुआमी विसरु नाही सुखदाते ॥३॥

दिनु रैणि सासि सासि गुण गावा जे सुआमी तुधु भावा ॥ नामु तेरा सुखु नानकु मागै साहिब तुठै पावा ॥४॥१॥४८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 747) सूही महला ५ ॥
विसरहि नाही जितु तू कबहू सो थानु तेरा केहा ॥ आठ पहर जितु तुधु धिआई निरमल होवै देहा ॥१॥

मेरे राम हउ सो थानु भालण आइआ ॥ खोजत खोजत भइआ साधसंगु तिन्ह सरणाई पाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

बेद पड़े पड़ि ब्रहमे हारे इकु तिलु नही कीमति पाई ॥ साधिक सिध फिरहि बिललाते ते भी मोहे माई ॥२॥

दस अउतार राजे होइ वरते महादेव अउधूता ॥ तिन्ह भी अंतु न पाइओ तेरा लाइ थके बिभूता ॥३॥

सहज सूख आनंद नाम रस हरि संती मंगलु गाइआ ॥ सफल दरसनु भेटिओ गुर नानक ता मनि तनि हरि हरि धिआइआ ॥४॥२॥४९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 747) सूही महला ५ ॥
करम धरम पाखंड जो दीसहि तिन जमु जागाती लूटै ॥ निरबाण कीरतनु गावहु करते का निमख सिमरत जितु छूटै ॥१॥

संतहु सागरु पारि उतरीऐ ॥ जे को बचनु कमावै संतन का सो गुर परसादी तरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि तीरथ मजन इसनाना इसु कलि महि मैलु भरीजै ॥ साधसंगि जो हरि गुण गावै सो निरमलु करि लीजै ॥२॥

बेद कतेब सिम्रिति सभि सासत इन्ह पड़िआ मुकति न होई ॥ एकु अखरु जो गुरमुखि जापै तिस की निरमल सोई ॥३॥

खत्री ब्राहमण सूद वैस उपदेसु चहु वरना कउ साझा ॥ गुरमुखि नामु जपै उधरै सो कलि महि घटि घटि नानक माझा ॥४॥३॥५०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 748) सूही महला ५ ॥
जो किछु करै सोई प्रभ मानहि ओइ राम नाम रंगि राते ॥ तिन्ह की सोभा सभनी थाई जिन्ह प्रभ के चरण पराते ॥१॥

मेरे राम हरि संता जेवडु न कोई ॥ भगता बणि आई प्रभ अपने सिउ जलि थलि महीअलि सोई ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि अप्राधी संतसंगि उधरै जमु ता कै नेड़ि न आवै ॥ जनम जनम का बिछुड़िआ होवै तिन्ह हरि सिउ आणि मिलावै ॥२॥

माइआ मोह भरमु भउ काटै संत सरणि जो आवै ॥ जेहा मनोरथु करि आराधे सो संतन ते पावै ॥३॥

जन की महिमा केतक बरनउ जो प्रभ अपने भाणे ॥ कहु नानक जिन सतिगुरु भेटिआ से सभ ते भए निकाणे ॥४॥४॥५१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 748) सूही महला ५ ॥
महा अगनि ते तुधु हाथ दे राखे पए तेरी सरणाई ॥ तेरा माणु ताणु रिद अंतरि होर दूजी आस चुकाई ॥१॥

मेरे राम राइ तुधु चिति आइऐ उबरे ॥ तेरी टेक भरवासा तुम्हरा जपि नामु तुम्हारा उधरे ॥१॥ रहाउ ॥

अंध कूप ते काढि लीए तुम्ह आपि भए किरपाला ॥ सारि सम्हालि सरब सुख दीए आपि करे प्रतिपाला ॥२॥

आपणी नदरि करे परमेसरु बंधन काटि छडाए ॥ आपणी भगति प्रभि आपि कराई आपे सेवा लाए ॥३॥

भरमु गइआ भै मोह बिनासे मिटिआ सगल विसूरा ॥ नानक दइआ करी सुखदातै भेटिआ सतिगुरु पूरा ॥४॥५॥५२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 748) सूही महला ५ ॥
जब कछु न सीओ तब किआ करता कवन करम करि आइआ ॥ अपना खेलु आपि करि देखै ठाकुरि रचनु रचाइआ ॥१॥

मेरे राम राइ मुझ ते कछू न होई ॥ आपे करता आपि कराए सरब निरंतरि सोई ॥१॥ रहाउ ॥

गणती गणी न छूटै कतहू काची देह इआणी ॥ क्रिपा करहु प्रभ करणैहारे तेरी बखस निराली ॥२॥

जीअ जंत सभ तेरे कीते घटि घटि तुही धिआईऐ ॥ तेरी गति मिति तूहै जाणहि कुदरति कीम न पाईऐ ॥३॥

निरगुणु मुगधु अजाणु अगिआनी करम धरम नही जाणा ॥ दइआ करहु नानकु गुण गावै मिठा लगै तेरा भाणा ॥४॥६॥५३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 748) सूही महला ५ ॥
भागठड़े हरि संत तुम्हारे जिन्ह घरि धनु हरि नामा ॥ परवाणु गणी सेई इह आए सफल तिना के कामा ॥१॥

मेरे राम हरि जन कै हउ बलि जाई ॥ केसा का करि चवरु ढुलावा चरण धूड़ि मुखि लाई ॥१॥ रहाउ ॥

जनम मरण दुहहू महि नाही जन परउपकारी आए ॥ जीअ दानु दे भगती लाइनि हरि सिउ लैनि मिलाए ॥२॥

सचा अमरु सची पातिसाही सचे सेती राते ॥ सचा सुखु सची वडिआई जिस के से तिनि जाते ॥३॥

पखा फेरी पाणी ढोवा हरि जन कै पीसणु पीसि कमावा ॥ नानक की प्रभ पासि बेनंती तेरे जन देखणु पावा ॥४॥७॥५४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 749) सूही महला ५ ॥
पारब्रहम परमेसर सतिगुर आपे करणैहारा ॥ चरण धूड़ि तेरी सेवकु मागै तेरे दरसन कउ बलिहारा ॥१॥

मेरे राम राइ जिउ राखहि तिउ रहीऐ ॥ तुधु भावै ता नामु जपावहि सुखु तेरा दिता लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

मुकति भुगति जुगति तेरी सेवा जिसु तूं आपि कराइहि ॥ तहा बैकुंठु जह कीरतनु तेरा तूं आपे सरधा लाइहि ॥२॥

सिमरि सिमरि सिमरि नामु जीवा तनु मनु होइ निहाला ॥ चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा मेरे सतिगुर दीन दइआला ॥३॥

कुरबाणु जाई उसु वेला सुहावी जितु तुमरै दुआरै आइआ ॥ नानक कउ प्रभ भए क्रिपाला सतिगुरु पूरा पाइआ ॥४॥८॥५५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 749) सूही महला ५ ॥
तुधु चिति आए महा अनंदा जिसु विसरहि सो मरि जाए ॥ दइआलु होवहि जिसु ऊपरि करते सो तुधु सदा धिआए ॥१॥

मेरे साहिब तूं मै माणु निमाणी ॥ अरदासि करी प्रभ अपने आगै सुणि सुणि जीवा तेरी बाणी ॥१॥ रहाउ ॥

चरण धूड़ि तेरे जन की होवा तेरे दरसन कउ बलि जाई ॥ अम्रित बचन रिदै उरि धारी तउ किरपा ते संगु पाई ॥२॥

अंतर की गति तुधु पहि सारी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥ जिस नो लाइ लैहि सो लागै भगतु तुहारा सोई ॥३॥

दुइ कर जोड़ि मागउ इकु दाना साहिबि तुठै पावा ॥ सासि सासि नानकु आराधे आठ पहर गुण गावा ॥४॥९॥५६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 749) सूही महला ५ ॥
जिस के सिर ऊपरि तूं सुआमी सो दुखु कैसा पावै ॥ बोलि न जाणै माइआ मदि माता मरणा चीति न आवै ॥१॥

मेरे राम राइ तूं संता का संत तेरे ॥ तेरे सेवक कउ भउ किछु नाही जमु नही आवै नेरे ॥१॥ रहाउ ॥

जो तेरै रंगि राते सुआमी तिन्ह का जनम मरण दुखु नासा ॥ तेरी बखस न मेटै कोई सतिगुर का दिलासा ॥२॥

नामु धिआइनि सुख फल पाइनि आठ पहर आराधहि ॥ तेरी सरणि तेरै भरवासै पंच दुसट लै साधहि ॥३॥

गिआनु धिआनु किछु करमु न जाणा सार न जाणा तेरी ॥ सभ ते वडा सतिगुरु नानकु जिनि कल राखी मेरी ॥४॥१०॥५७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 750) सूही महला ५ ॥
सगल तिआगि गुर सरणी आइआ राखहु राखनहारे ॥ जितु तू लावहि तितु हम लागह किआ एहि जंत विचारे ॥१॥

मेरे राम जी तूं प्रभ अंतरजामी ॥ करि किरपा गुरदेव दइआला गुण गावा नित सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥

आठ पहर प्रभु अपना धिआईऐ गुर प्रसादि भउ तरीऐ ॥ आपु तिआगि होईऐ सभ रेणा जीवतिआ इउ मरीऐ ॥२॥

सफल जनमु तिस का जग भीतरि साधसंगि नाउ जापे ॥ सगल मनोरथ तिस के पूरन जिसु दइआ करे प्रभु आपे ॥३॥

दीन दइआल क्रिपाल प्रभ सुआमी तेरी सरणि दइआला ॥ करि किरपा अपना नामु दीजै नानक साध रवाला ॥४॥११॥५८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 750) रागु सूही असटपदीआ महला १ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभि अवगण मै गुणु नही कोई ॥ किउ करि कंत मिलावा होई ॥१॥

ना मै रूपु न बंके नैणा ॥ ना कुल ढंगु न मीठे बैणा ॥१॥ रहाउ ॥

सहजि सीगार कामणि करि आवै ॥ ता सोहागणि जा कंतै भावै ॥२॥

ना तिसु रूपु न रेखिआ काई ॥ अंति न साहिबु सिमरिआ जाई ॥३॥

सुरति मति नाही चतुराई ॥ करि किरपा प्रभ लावहु पाई ॥४॥

खरी सिआणी कंत न भाणी ॥ माइआ लागी भरमि भुलाणी ॥५॥

हउमै जाई ता कंत समाई ॥ तउ कामणि पिआरे नव निधि पाई ॥६॥

अनिक जनम बिछुरत दुखु पाइआ ॥ करु गहि लेहु प्रीतम प्रभ राइआ ॥७॥

भणति नानकु सहु है भी होसी ॥ जै भावै पिआरा तै रावेसी ॥८॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 751) सूही महला १ घरु ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कचा रंगु कसु्मभ का थोड़ड़िआ दिन चारि जीउ ॥ विणु नावै भ्रमि भुलीआ ठगि मुठी कूड़िआरि जीउ ॥ सचे सेती रतिआ जनमु न दूजी वार जीउ ॥१॥

रंगे का किआ रंगीऐ जो रते रंगु लाइ जीउ ॥ रंगण वाला सेवीऐ सचे सिउ चितु लाइ जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

चारे कुंडा जे भवहि बिनु भागा धनु नाहि जीउ ॥ अवगणि मुठी जे फिरहि बधिक थाइ न पाहि जीउ ॥ गुरि राखे से उबरे सबदि रते मन माहि जीउ ॥२॥

चिटे जिन के कपड़े मैले चित कठोर जीउ ॥ तिन मुखि नामु न ऊपजै दूजै विआपे चोर जीउ ॥ मूलु न बूझहि आपणा से पसूआ से ढोर जीउ ॥३॥

नित नित खुसीआ मनु करे नित नित मंगै सुख जीउ ॥ करता चिति न आवई फिरि फिरि लगहि दुख जीउ ॥ सुख दुख दाता मनि वसै तितु तनि कैसी भुख जीउ ॥४॥

बाकी वाला तलबीऐ सिरि मारे जंदारु जीउ ॥ लेखा मंगै देवणा पुछै करि बीचारु जीउ ॥ सचे की लिव उबरै बखसे बखसणहारु जीउ ॥५॥

अन को कीजै मितड़ा खाकु रलै मरि जाइ जीउ ॥ बहु रंग देखि भुलाइआ भुलि भुलि आवै जाइ जीउ ॥ नदरि प्रभू ते छुटीऐ नदरी मेलि मिलाइ जीउ ॥६॥

गाफल गिआन विहूणिआ गुर बिनु गिआनु न भालि जीउ ॥ खिंचोताणि विगुचीऐ बुरा भला दुइ नालि जीउ ॥ बिनु सबदै भै रतिआ सभ जोही जमकालि जीउ ॥७॥

जिनि करि कारणु धारिआ सभसै देइ आधारु जीउ ॥ सो किउ मनहु विसारीऐ सदा सदा दातारु जीउ ॥ नानक नामु न वीसरै निधारा आधारु जीउ ॥८॥१॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 752) सूही महला १ ॥
जिउ आरणि लोहा पाइ भंनि घड़ाईऐ ॥ तिउ साकतु जोनी पाइ भवै भवाईऐ ॥१॥

बिनु बूझे सभु दुखु दुखु कमावणा ॥ हउमै आवै जाइ भरमि भुलावणा ॥१॥ रहाउ ॥

तूं गुरमुखि रखणहारु हरि नामु धिआईऐ ॥ मेलहि तुझहि रजाइ सबदु कमाईऐ ॥२॥

तूं करि करि वेखहि आपि देहि सु पाईऐ ॥ तू देखहि थापि उथापि दरि बीनाईऐ ॥३॥

देही होवगि खाकु पवणु उडाईऐ ॥ इहु किथै घरु अउताकु महलु न पाईऐ ॥४॥

दिहु दीवी अंध घोरु घबु मुहाईऐ ॥ गरबि मुसै घरु चोरु किसु रूआईऐ ॥५॥

गुरमुखि चोरु न लागि हरि नामि जगाईऐ ॥ सबदि निवारी आगि जोति दीपाईऐ ॥६॥

लालु रतनु हरि नामु गुरि सुरति बुझाईऐ ॥ सदा रहै निहकामु जे गुरमति पाईऐ ॥७॥

राति दिहै हरि नाउ मंनि वसाईऐ ॥ नानक मेलि मिलाइ जे तुधु भाईऐ ॥८॥२॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 752) सूही महला १ ॥
मनहु न नामु विसारि अहिनिसि धिआईऐ ॥ जिउ राखहि किरपा धारि तिवै सुखु पाईऐ ॥१॥

मै अंधुले हरि नामु लकुटी टोहणी ॥ रहउ साहिब की टेक न मोहै मोहणी ॥१॥ रहाउ ॥

जह देखउ तह नालि गुरि देखालिआ ॥ अंतरि बाहरि भालि सबदि निहालिआ ॥२॥

सेवी सतिगुर भाइ नामु निरंजना ॥ तुधु भावै तिवै रजाइ भरमु भउ भंजना ॥३॥

जनमत ही दुखु लागै मरणा आइ कै ॥ जनमु मरणु परवाणु हरि गुण गाइ कै ॥४॥

हउ नाही तू होवहि तुध ही साजिआ ॥ आपे थापि उथापि सबदि निवाजिआ ॥५॥

देही भसम रुलाइ न जापी कह गइआ ॥ आपे रहिआ समाइ सो विसमादु भइआ ॥६॥

तूं नाही प्रभ दूरि जाणहि सभ तू है ॥ गुरमुखि वेखि हदूरि अंतरि भी तू है ॥७॥

मै दीजै नाम निवासु अंतरि सांति होइ ॥ गुण गावै नानक दासु सतिगुरु मति देइ ॥८॥३॥५॥


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