Pt 3 - राग सिरीरागु - बाणी शब्द, Part 3 - Raag Sri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अमरदास जी -- SGGS 38) सिरीरागु महला ३ ॥
हरि जी सचा सचु तू सभु किछु तेरै चीरै ॥ लख चउरासीह तरसदे फिरे बिनु गुर भेटे पीरै ॥ हरि जीउ बखसे बखसि लए सूख सदा सरीरै ॥ गुर परसादी सेव करी सचु गहिर ग्मभीरै ॥१॥

मन मेरे नामि रते सुखु होइ ॥ गुरमती नामु सलाहीऐ दूजा अवरु न कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

धरम राइ नो हुकमु है बहि सचा धरमु बीचारि ॥ दूजै भाइ दुसटु आतमा ओहु तेरी सरकार ॥ अधिआतमी हरि गुण तासु मनि जपहि एकु मुरारि ॥ तिन की सेवा धरम राइ करै धंनु सवारणहारु ॥२॥

मन के बिकार मनहि तजै मनि चूकै मोहु अभिमानु ॥ आतम रामु पछाणिआ सहजे नामि समानु ॥ बिनु सतिगुर मुकति न पाईऐ मनमुखि फिरै दिवानु ॥ सबदु न चीनै कथनी बदनी करे बिखिआ माहि समानु ॥३॥

सभु किछु आपे आपि है दूजा अवरु न कोइ ॥ जिउ बोलाए तिउ बोलीऐ जा आपि बुलाए सोइ ॥ गुरमुखि बाणी ब्रहमु है सबदि मिलावा होइ ॥ नानक नामु समालि तू जितु सेविऐ सुखु होइ ॥४॥३०॥६३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 39) सिरीरागु महला ३ ॥
जगि हउमै मैलु दुखु पाइआ मलु लागी दूजै भाइ ॥ मलु हउमै धोती किवै न उतरै जे सउ तीरथ नाइ ॥ बहु बिधि करम कमावदे दूणी मलु लागी आइ ॥ पड़िऐ मैलु न उतरै पूछहु गिआनीआ जाइ ॥१॥

मन मेरे गुर सरणि आवै ता निरमलु होइ ॥ मनमुख हरि हरि करि थके मैलु न सकी धोइ ॥१॥ रहाउ ॥

मनि मैलै भगति न होवई नामु न पाइआ जाइ ॥ मनमुख मैले मैले मुए जासनि पति गवाइ ॥ गुर परसादी मनि वसै मलु हउमै जाइ समाइ ॥ जिउ अंधेरै दीपकु बालीऐ तिउ गुर गिआनि अगिआनु तजाइ ॥२॥

हम कीआ हम करहगे हम मूरख गावार ॥ करणै वाला विसरिआ दूजै भाइ पिआरु ॥ माइआ जेवडु दुखु नही सभि भवि थके संसारु ॥ गुरमती सुखु पाईऐ सचु नामु उर धारि ॥३॥

जिस नो मेले सो मिलै हउ तिसु बलिहारै जाउ ॥ ए मन भगती रतिआ सचु बाणी निज थाउ ॥ मनि रते जिहवा रती हरि गुण सचे गाउ ॥ नानक नामु न वीसरै सचे माहि समाउ ॥४॥३१॥६४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 39) सिरीरागु महला ४ घरु १ ॥
मै मनि तनि बिरहु अति अगला किउ प्रीतमु मिलै घरि आइ ॥ जा देखा प्रभु आपणा प्रभि देखिऐ दुखु जाइ ॥ जाइ पुछा तिन सजणा प्रभु कितु बिधि मिलै मिलाइ ॥१॥

मेरे सतिगुरा मै तुझ बिनु अवरु न कोइ ॥ हम मूरख मुगध सरणागती करि किरपा मेले हरि सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु दाता हरि नाम का प्रभु आपि मिलावै सोइ ॥ सतिगुरि हरि प्रभु बुझिआ गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥ हउ गुर सरणाई ढहि पवा करि दइआ मेले प्रभु सोइ ॥२॥

मनहठि किनै न पाइआ करि उपाव थके सभु कोइ ॥ सहस सिआणप करि रहे मनि कोरै रंगु न होइ ॥ कूड़ि कपटि किनै न पाइओ जो बीजै खावै सोइ ॥३॥

सभना तेरी आस प्रभु सभ जीअ तेरे तूं रासि ॥ प्रभ तुधहु खाली को नही दरि गुरमुखा नो साबासि ॥ बिखु भउजल डुबदे कढि लै जन नानक की अरदासि ॥४॥१॥६५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 40) सिरीरागु महला ४ ॥
नामु मिलै मनु त्रिपतीऐ बिनु नामै ध्रिगु जीवासु ॥ कोई गुरमुखि सजणु जे मिलै मै दसे प्रभु गुणतासु ॥ हउ तिसु विटहु चउ खंनीऐ मै नाम करे परगासु ॥१॥

मेरे प्रीतमा हउ जीवा नामु धिआइ ॥ बिनु नावै जीवणु ना थीऐ मेरे सतिगुर नामु द्रिड़ाइ ॥१॥ रहाउ ॥

नामु अमोलकु रतनु है पूरे सतिगुर पासि ॥ सतिगुर सेवै लगिआ कढि रतनु देवै परगासि ॥ धंनु वडभागी वड भागीआ जो आइ मिले गुर पासि ॥२॥

जिना सतिगुरु पुरखु न भेटिओ से भागहीण वसि काल ॥ ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि विचि विसटा करि विकराल ॥ ओना पासि दुआसि न भिटीऐ जिन अंतरि क्रोधु चंडाल ॥३॥

सतिगुरु पुरखु अम्रित सरु वडभागी नावहि आइ ॥ उन जनम जनम की मैलु उतरै निरमल नामु द्रिड़ाइ ॥ जन नानक उतम पदु पाइआ सतिगुर की लिव लाइ ॥४॥२॥६६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 40) सिरीरागु महला ४ ॥
गुण गावा गुण विथरा गुण बोली मेरी माइ ॥ गुरमुखि सजणु गुणकारीआ मिलि सजण हरि गुण गाइ ॥ हीरै हीरु मिलि बेधिआ रंगि चलूलै नाइ ॥१॥

मेरे गोविंदा गुण गावा त्रिपति मनि होइ ॥ अंतरि पिआस हरि नाम की गुरु तुसि मिलावै सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

मनु रंगहु वडभागीहो गुरु तुठा करे पसाउ ॥ गुरु नामु द्रिड़ाए रंग सिउ हउ सतिगुर कै बलि जाउ ॥ बिनु सतिगुर हरि नामु न लभई लख कोटी करम कमाउ ॥२॥

बिनु भागा सतिगुरु ना मिलै घरि बैठिआ निकटि नित पासि ॥ अंतरि अगिआन दुखु भरमु है विचि पड़दा दूरि पईआसि ॥ बिनु सतिगुर भेटे कंचनु ना थीऐ मनमुखु लोहु बूडा बेड़ी पासि ॥३॥

सतिगुरु बोहिथु हरि नाव है कितु बिधि चड़िआ जाइ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै विचि बोहिथ बैठा आइ ॥ धंनु धंनु वडभागी नानका जिना सतिगुरु लए मिलाइ ॥४॥३॥६७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 41) सिरीरागु महला ४ ॥
हउ पंथु दसाई नित खड़ी कोई प्रभु दसे तिनि जाउ ॥ जिनी मेरा पिआरा राविआ तिन पीछै लागि फिराउ ॥ करि मिंनति करि जोदड़ी मै प्रभु मिलणै का चाउ ॥१॥

मेरे भाई जना कोई मो कउ हरि प्रभु मेलि मिलाइ ॥ हउ सतिगुर विटहु वारिआ जिनि हरि प्रभु दीआ दिखाइ ॥१॥ रहाउ ॥

होइ निमाणी ढहि पवा पूरे सतिगुर पासि ॥ निमाणिआ गुरु माणु है गुरु सतिगुरु करे साबासि ॥ हउ गुरु सालाहि न रजऊ मै मेले हरि प्रभु पासि ॥२॥

सतिगुर नो सभ को लोचदा जेता जगतु सभु कोइ ॥ बिनु भागा दरसनु ना थीऐ भागहीण बहि रोइ ॥ जो हरि प्रभ भाणा सो थीआ धुरि लिखिआ न मेटै कोइ ॥३॥

आपे सतिगुरु आपि हरि आपे मेलि मिलाइ ॥ आपि दइआ करि मेलसी गुर सतिगुर पीछै पाइ ॥ सभु जगजीवनु जगि आपि है नानक जलु जलहि समाइ ॥४॥४॥६८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 41) सिरीरागु महला ४ ॥
रसु अम्रितु नामु रसु अति भला कितु बिधि मिलै रसु खाइ ॥ जाइ पुछहु सोहागणी तुसा किउ करि मिलिआ प्रभु आइ ॥ ओइ वेपरवाह न बोलनी हउ मलि मलि धोवा तिन पाइ ॥१॥

भाई रे मिलि सजण हरि गुण सारि ॥ सजणु सतिगुरु पुरखु है दुखु कढै हउमै मारि ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखीआ सोहागणी तिन दइआ पई मनि आइ ॥ सतिगुर वचनु रतंनु है जो मंने सु हरि रसु खाइ ॥ से वडभागी वड जाणीअहि जिन हरि रसु खाधा गुर भाइ ॥२॥

इहु हरि रसु वणि तिणि सभतु है भागहीण नही खाइ ॥ बिनु सतिगुर पलै ना पवै मनमुख रहे बिललाइ ॥ ओइ सतिगुर आगै ना निवहि ओना अंतरि क्रोधु बलाइ ॥३॥

हरि हरि हरि रसु आपि है आपे हरि रसु होइ ॥ आपि दइआ करि देवसी गुरमुखि अम्रितु चोइ ॥ सभु तनु मनु हरिआ होइआ नानक हरि वसिआ मनि सोइ ॥४॥५॥६९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 41) सिरीरागु महला ४ ॥
दिनसु चड़ै फिरि आथवै रैणि सबाई जाइ ॥ आव घटै नरु ना बुझै निति मूसा लाजु टुकाइ ॥ गुड़ु मिठा माइआ पसरिआ मनमुखु लगि माखी पचै पचाइ ॥१॥

भाई रे मै मीतु सखा प्रभु सोइ ॥ पुतु कलतु मोहु बिखु है अंति बेली कोइ न होइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमति हरि लिव उबरे अलिपतु रहे सरणाइ ॥ ओनी चलणु सदा निहालिआ हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥ गुरमुखि दरगह मंनीअहि हरि आपि लए गलि लाइ ॥२॥

गुरमुखा नो पंथु परगटा दरि ठाक न कोई पाइ ॥ हरि नामु सलाहनि नामु मनि नामि रहनि लिव लाइ ॥ अनहद धुनी दरि वजदे दरि सचै सोभा पाइ ॥३॥

जिनी गुरमुखि नामु सलाहिआ तिना सभ को कहै साबासि ॥ तिन की संगति देहि प्रभ मै जाचिक की अरदासि ॥ नानक भाग वडे तिना गुरमुखा जिन अंतरि नामु परगासि ॥४॥३३॥३१॥६॥७०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 42) सिरीरागु महला ५ घरु १ ॥
किआ तू रता देखि कै पुत्र कलत्र सीगार ॥ रस भोगहि खुसीआ करहि माणहि रंग अपार ॥ बहुतु करहि फुरमाइसी वरतहि होइ अफार ॥ करता चिति न आवई मनमुख अंध गवार ॥१॥

मेरे मन सुखदाता हरि सोइ ॥ गुर परसादी पाईऐ करमि परापति होइ ॥१॥ रहाउ ॥

कपड़ि भोगि लपटाइआ सुइना रुपा खाकु ॥ हैवर गैवर बहु रंगे कीए रथ अथाक ॥ किस ही चिति न पावही बिसरिआ सभ साक ॥ सिरजणहारि भुलाइआ विणु नावै नापाक ॥२॥

लैदा बद दुआइ तूं माइआ करहि इकत ॥ जिस नो तूं पतीआइदा सो सणु तुझै अनित ॥ अहंकारु करहि अहंकारीआ विआपिआ मन की मति ॥ तिनि प्रभि आपि भुलाइआ ना तिसु जाति न पति ॥३॥

सतिगुरि पुरखि मिलाइआ इको सजणु सोइ ॥ हरि जन का राखा एकु है किआ माणस हउमै रोइ ॥ जो हरि जन भावै सो करे दरि फेरु न पावै कोइ ॥ नानक रता रंगि हरि सभ जग महि चानणु होइ ॥४॥१॥७१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 42) सिरीरागु महला ५ ॥
मनि बिलासु बहु रंगु घणा द्रिसटि भूलि खुसीआ ॥ छत्रधार बादिसाहीआ विचि सहसे परीआ ॥१॥

भाई रे सुखु साधसंगि पाइआ ॥ लिखिआ लेखु तिनि पुरखि बिधातै दुखु सहसा मिटि गइआ ॥१॥ रहाउ ॥

जेते थान थनंतरा तेते भवि आइआ ॥ धन पाती वड भूमीआ मेरी मेरी करि परिआ ॥२॥

हुकमु चलाए निसंग होइ वरतै अफरिआ ॥ सभु को वसगति करि लइओनु बिनु नावै खाकु रलिआ ॥३॥

कोटि तेतीस सेवका सिध साधिक दरि खरिआ ॥ गिर्मबारी वड साहबी सभु नानक सुपनु थीआ ॥४॥२॥७२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 43) सिरीरागु महला ५ ॥
भलके उठि पपोलीऐ विणु बुझे मुगध अजाणि ॥ सो प्रभु चिति न आइओ छुटैगी बेबाणि ॥ सतिगुर सेती चितु लाइ सदा सदा रंगु माणि ॥१॥

प्राणी तूं आइआ लाहा लैणि ॥ लगा कितु कुफकड़े सभ मुकदी चली रैणि ॥१॥ रहाउ ॥

कुदम करे पसु पंखीआ दिसै नाही कालु ॥ ओतै साथि मनुखु है फाथा माइआ जालि ॥ मुकते सेई भालीअहि जि सचा नामु समालि ॥२॥

जो घरु छडि गवावणा सो लगा मन माहि ॥ जिथै जाइ तुधु वरतणा तिस की चिंता नाहि ॥ फाथे सेई निकले जि गुर की पैरी पाहि ॥३॥

कोई रखि न सकई दूजा को न दिखाइ ॥ चारे कुंडा भालि कै आइ पइआ सरणाइ ॥ नानक सचै पातिसाहि डुबदा लइआ कढाइ ॥४॥३॥७३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 43) सिरीरागु महला ५ ॥
घड़ी मुहत का पाहुणा काज सवारणहारु ॥ माइआ कामि विआपिआ समझै नाही गावारु ॥ उठि चलिआ पछुताइआ परिआ वसि जंदार ॥१॥

अंधे तूं बैठा कंधी पाहि ॥ जे होवी पूरबि लिखिआ ता गुर का बचनु कमाहि ॥१॥ रहाउ ॥

हरी नाही नह डडुरी पकी वढणहार ॥ लै लै दात पहुतिआ लावे करि तईआरु ॥ जा होआ हुकमु किरसाण दा ता लुणि मिणिआ खेतारु ॥२॥

पहिला पहरु धंधै गइआ दूजै भरि सोइआ ॥ तीजै झाख झखाइआ चउथै भोरु भइआ ॥ कद ही चिति न आइओ जिनि जीउ पिंडु दीआ ॥३॥

साधसंगति कउ वारिआ जीउ कीआ कुरबाणु ॥ जिस ते सोझी मनि पई मिलिआ पुरखु सुजाणु ॥ नानक डिठा सदा नालि हरि अंतरजामी जाणु ॥४॥४॥७४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 43) सिरीरागु महला ५ ॥
सभे गला विसरनु इको विसरि न जाउ ॥ धंधा सभु जलाइ कै गुरि नामु दीआ सचु सुआउ ॥ आसा सभे लाहि कै इका आस कमाउ ॥ जिनी सतिगुरु सेविआ तिन अगै मिलिआ थाउ ॥१॥

मन मेरे करते नो सालाहि ॥ सभे छडि सिआणपा गुर की पैरी पाहि ॥१॥ रहाउ ॥

दुख भुख नह विआपई जे सुखदाता मनि होइ ॥ कित ही कमि न छिजीऐ जा हिरदै सचा सोइ ॥ जिसु तूं रखहि हथ दे तिसु मारि न सकै कोइ ॥ सुखदाता गुरु सेवीऐ सभि अवगण कढै धोइ ॥२॥

सेवा मंगै सेवको लाईआं अपुनी सेव ॥ साधू संगु मसकते तूठै पावा देव ॥ सभु किछु वसगति साहिबै आपे करण करेव ॥ सतिगुर कै बलिहारणै मनसा सभ पूरेव ॥३॥

इको दिसै सजणो इको भाई मीतु ॥ इकसै दी सामगरी इकसै दी है रीति ॥ इकस सिउ मनु मानिआ ता होआ निहचलु चीतु ॥ सचु खाणा सचु पैनणा टेक नानक सचु कीतु ॥४॥५॥७५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 44) सिरीरागु महला ५ ॥
सभे थोक परापते जे आवै इकु हथि ॥ जनमु पदारथु सफलु है जे सचा सबदु कथि ॥ गुर ते महलु परापते जिसु लिखिआ होवै मथि ॥१॥

मेरे मन एकस सिउ चितु लाइ ॥ एकस बिनु सभ धंधु है सभ मिथिआ मोहु माइ ॥१॥ रहाउ ॥

लख खुसीआ पातिसाहीआ जे सतिगुरु नदरि करेइ ॥ निमख एक हरि नामु देइ मेरा मनु तनु सीतलु होइ ॥ जिस कउ पूरबि लिखिआ तिनि सतिगुर चरन गहे ॥२॥

सफल मूरतु सफला घड़ी जितु सचे नालि पिआरु ॥ दूखु संतापु न लगई जिसु हरि का नामु अधारु ॥ बाह पकड़ि गुरि काढिआ सोई उतरिआ पारि ॥३॥

थानु सुहावा पवितु है जिथै संत सभा ॥ ढोई तिस ही नो मिलै जिनि पूरा गुरू लभा ॥ नानक बधा घरु तहां जिथै मिरतु न जनमु जरा ॥४॥६॥७६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 44) स्रीरागु महला ५ ॥
सोई धिआईऐ जीअड़े सिरि साहां पातिसाहु ॥ तिस ही की करि आस मन जिस का सभसु वेसाहु ॥ सभि सिआणपा छडि कै गुर की चरणी पाहु ॥१॥

मन मेरे सुख सहज सेती जपि नाउ ॥ आठ पहर प्रभु धिआइ तूं गुण गोइंद नित गाउ ॥१॥ रहाउ ॥

तिस की सरनी परु मना जिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥ जिसु सिमरत सुखु होइ घणा दुखु दरदु न मूले होइ ॥ सदा सदा करि चाकरी प्रभु साहिबु सचा सोइ ॥२॥

साधसंगति होइ निरमला कटीऐ जम की फास ॥ सुखदाता भै भंजनो तिसु आगै करि अरदासि ॥ मिहर करे जिसु मिहरवानु तां कारजु आवै रासि ॥३॥

बहुतो बहुतु वखाणीऐ ऊचो ऊचा थाउ ॥ वरना चिहना बाहरा कीमति कहि न सकाउ ॥ नानक कउ प्रभ मइआ करि सचु देवहु अपुणा नाउ ॥४॥७॥७७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 44) स्रीरागु महला ५ ॥
नामु धिआए सो सुखी तिसु मुखु ऊजलु होइ ॥ पूरे गुर ते पाईऐ परगटु सभनी लोइ ॥ साधसंगति कै घरि वसै एको सचा सोइ ॥१॥

मेरे मन हरि हरि नामु धिआइ ॥ नामु सहाई सदा संगि आगै लए छडाइ ॥१॥ रहाउ ॥

दुनीआ कीआ वडिआईआ कवनै आवहि कामि ॥ माइआ का रंगु सभु फिका जातो बिनसि निदानि ॥ जा कै हिरदै हरि वसै सो पूरा परधानु ॥२॥

साधू की होहु रेणुका अपणा आपु तिआगि ॥ उपाव सिआणप सगल छडि गुर की चरणी लागु ॥ तिसहि परापति रतनु होइ जिसु मसतकि होवै भागु ॥३॥

तिसै परापति भाईहो जिसु देवै प्रभु आपि ॥ सतिगुर की सेवा सो करे जिसु बिनसै हउमै तापु ॥ नानक कउ गुरु भेटिआ बिनसे सगल संताप ॥४॥८॥७८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 45) सिरीरागु महला ५ ॥
इकु पछाणू जीअ का इको रखणहारु ॥ इकस का मनि आसरा इको प्राण अधारु ॥ तिसु सरणाई सदा सुखु पारब्रहमु करतारु ॥१॥

मन मेरे सगल उपाव तिआगु ॥ गुरु पूरा आराधि नित इकसु की लिव लागु ॥१॥ रहाउ ॥

इको भाई मितु इकु इको मात पिता ॥ इकस की मनि टेक है जिनि जीउ पिंडु दिता ॥ सो प्रभु मनहु न विसरै जिनि सभु किछु वसि कीता ॥२॥

घरि इको बाहरि इको थान थनंतरि आपि ॥ जीअ जंत सभि जिनि कीए आठ पहर तिसु जापि ॥ इकसु सेती रतिआ न होवी सोग संतापु ॥३॥

पारब्रहमु प्रभु एकु है दूजा नाही कोइ ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का जो तिसु भावै सु होइ ॥ गुरि पूरै पूरा भइआ जपि नानक सचा सोइ ॥४॥९॥७९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 45) सिरीरागु महला ५ ॥
जिना सतिगुर सिउ चितु लाइआ से पूरे परधान ॥ जिन कउ आपि दइआलु होइ तिन उपजै मनि गिआनु ॥ जिन कउ मसतकि लिखिआ तिन पाइआ हरि नामु ॥१॥

मन मेरे एको नामु धिआइ ॥ सरब सुखा सुख ऊपजहि दरगह पैधा जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जनम मरण का भउ गइआ भाउ भगति गोपाल ॥ साधू संगति निरमला आपि करे प्रतिपाल ॥ जनम मरण की मलु कटीऐ गुर दरसनु देखि निहाल ॥२॥

थान थनंतरि रवि रहिआ पारब्रहमु प्रभु सोइ ॥ सभना दाता एकु है दूजा नाही कोइ ॥ तिसु सरणाई छुटीऐ कीता लोड़े सु होइ ॥३॥

जिन मनि वसिआ पारब्रहमु से पूरे परधान ॥ तिन की सोभा निरमली परगटु भई जहान ॥ जिनी मेरा प्रभु धिआइआ नानक तिन कुरबान ॥४॥१०॥८०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 46) सिरीरागु महला ५ ॥
मिलि सतिगुर सभु दुखु गइआ हरि सुखु वसिआ मनि आइ ॥ अंतरि जोति प्रगासीआ एकसु सिउ लिव लाइ ॥ मिलि साधू मुखु ऊजला पूरबि लिखिआ पाइ ॥ गुण गोविंद नित गावणे निरमल साचै नाइ ॥१॥

मेरे मन गुर सबदी सुखु होइ ॥ गुर पूरे की चाकरी बिरथा जाइ न कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

मन कीआ इछां पूरीआ पाइआ नामु निधानु ॥ अंतरजामी सदा संगि करणैहारु पछानु ॥ गुर परसादी मुखु ऊजला जपि नामु दानु इसनानु ॥ कामु क्रोधु लोभु बिनसिआ तजिआ सभु अभिमानु ॥२॥

पाइआ लाहा लाभु नामु पूरन होए काम ॥ करि किरपा प्रभि मेलिआ दीआ अपणा नामु ॥ आवण जाणा रहि गइआ आपि होआ मिहरवानु ॥ सचु महलु घरु पाइआ गुर का सबदु पछानु ॥३॥

भगत जना कउ राखदा आपणी किरपा धारि ॥ हलति पलति मुख ऊजले साचे के गुण सारि ॥ आठ पहर गुण सारदे रते रंगि अपार ॥ पारब्रहमु सुख सागरो नानक सद बलिहार ॥४॥११॥८१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 46) सिरीरागु महला ५ ॥
पूरा सतिगुरु जे मिलै पाईऐ सबदु निधानु ॥ करि किरपा प्रभ आपणी जपीऐ अम्रित नामु ॥ जनम मरण दुखु काटीऐ लागै सहजि धिआनु ॥१॥

मेरे मन प्रभ सरणाई पाइ ॥ हरि बिनु दूजा को नही एको नामु धिआइ ॥१॥ रहाउ ॥

कीमति कहणु न जाईऐ सागरु गुणी अथाहु ॥ वडभागी मिलु संगती सचा सबदु विसाहु ॥ करि सेवा सुख सागरै सिरि साहा पातिसाहु ॥२॥

चरण कमल का आसरा दूजा नाही ठाउ ॥ मै धर तेरी पारब्रहम तेरै ताणि रहाउ ॥ निमाणिआ प्रभु माणु तूं तेरै संगि समाउ ॥३॥

हरि जपीऐ आराधीऐ आठ पहर गोविंदु ॥ जीअ प्राण तनु धनु रखे करि किरपा राखी जिंदु ॥ नानक सगले दोख उतारिअनु प्रभु पारब्रहम बखसिंदु ॥४॥१२॥८२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 46) सिरीरागु महला ५ ॥
प्रीति लगी तिसु सच सिउ मरै न आवै जाइ ॥ ना वेछोड़िआ विछुड़ै सभ महि रहिआ समाइ ॥ दीन दरद दुख भंजना सेवक कै सत भाइ ॥ अचरज रूपु निरंजनो गुरि मेलाइआ माइ ॥१॥

भाई रे मीतु करहु प्रभु सोइ ॥ माइआ मोह परीति ध्रिगु सुखी न दीसै कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

दाना दाता सीलवंतु निरमलु रूपु अपारु ॥ सखा सहाई अति वडा ऊचा वडा अपारु ॥ बालकु बिरधि न जाणीऐ निहचलु तिसु दरवारु ॥ जो मंगीऐ सोई पाईऐ निधारा आधारु ॥२॥

जिसु पेखत किलविख हिरहि मनि तनि होवै सांति ॥ इक मनि एकु धिआईऐ मन की लाहि भरांति ॥ गुण निधानु नवतनु सदा पूरन जा की दाति ॥ सदा सदा आराधीऐ दिनु विसरहु नही राति ॥३॥

जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन का सखा गोविंदु ॥ तनु मनु धनु अरपी सभो सगल वारीऐ इह जिंदु ॥ देखै सुणै हदूरि सद घटि घटि ब्रहमु रविंदु ॥ अकिरतघणा नो पालदा प्रभ नानक सद बखसिंदु ॥४॥१३॥८३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 47) सिरीरागु महला ५ ॥
मनु तनु धनु जिनि प्रभि दीआ रखिआ सहजि सवारि ॥ सरब कला करि थापिआ अंतरि जोति अपार ॥ सदा सदा प्रभु सिमरीऐ अंतरि रखु उर धारि ॥१॥

मेरे मन हरि बिनु अवरु न कोइ ॥ प्रभ सरणाई सदा रहु दूखु न विआपै कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

रतन पदारथ माणका सुइना रुपा खाकु ॥ मात पिता सुत बंधपा कूड़े सभे साक ॥ जिनि कीता तिसहि न जाणई मनमुख पसु नापाक ॥२॥

अंतरि बाहरि रवि रहिआ तिस नो जाणै दूरि ॥ त्रिसना लागी रचि रहिआ अंतरि हउमै कूरि ॥ भगती नाम विहूणिआ आवहि वंञहि पूर ॥३॥

राखि लेहु प्रभु करणहार जीअ जंत करि दइआ ॥ बिनु प्रभ कोइ न रखनहारु महा बिकट जम भइआ ॥ नानक नामु न वीसरउ करि अपुनी हरि मइआ ॥४॥१४॥८४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 47) सिरीरागु महला ५ ॥
मेरा तनु अरु धनु मेरा राज रूप मै देसु ॥ सुत दारा बनिता अनेक बहुतु रंग अरु वेस ॥ हरि नामु रिदै न वसई कारजि कितै न लेखि ॥१॥

मेरे मन हरि हरि नामु धिआइ ॥ करि संगति नित साध की गुर चरणी चितु लाइ ॥१॥ रहाउ ॥

नामु निधानु धिआईऐ मसतकि होवै भागु ॥ कारज सभि सवारीअहि गुर की चरणी लागु ॥ हउमै रोगु भ्रमु कटीऐ ना आवै ना जागु ॥२॥

करि संगति तू साध की अठसठि तीरथ नाउ ॥ जीउ प्राण मनु तनु हरे साचा एहु सुआउ ॥ ऐथै मिलहि वडाईआ दरगहि पावहि थाउ ॥३॥

करे कराए आपि प्रभु सभु किछु तिस ही हाथि ॥ मारि आपे जीवालदा अंतरि बाहरि साथि ॥ नानक प्रभ सरणागती सरब घटा के नाथ ॥४॥१५॥८५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 48) सिरीरागु महला ५ ॥
सरणि पए प्रभ आपणे गुरु होआ किरपालु ॥ सतगुर कै उपदेसिऐ बिनसे सरब जंजाल ॥ अंदरु लगा राम नामि अम्रित नदरि निहालु ॥१॥

मन मेरे सतिगुर सेवा सारु ॥ करे दइआ प्रभु आपणी इक निमख न मनहु विसारु ॥ रहाउ ॥

गुण गोविंद नित गावीअहि अवगुण कटणहार ॥ बिनु हरि नाम न सुखु होइ करि डिठे बिसथार ॥ सहजे सिफती रतिआ भवजलु उतरे पारि ॥२॥

तीरथ वरत लख संजमा पाईऐ साधू धूरि ॥ लूकि कमावै किस ते जा वेखै सदा हदूरि ॥ थान थनंतरि रवि रहिआ प्रभु मेरा भरपूरि ॥३॥

सचु पातिसाही अमरु सचु सचे सचा थानु ॥ सची कुदरति धारीअनु सचि सिरजिओनु जहानु ॥ नानक जपीऐ सचु नामु हउ सदा सदा कुरबानु ॥४॥१६॥८६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 48) सिरीरागु महला ५ ॥
उदमु करि हरि जापणा वडभागी धनु खाटि ॥ संतसंगि हरि सिमरणा मलु जनम जनम की काटि ॥१॥

मन मेरे राम नामु जपि जापु ॥ मन इछे फल भुंचि तू सभु चूकै सोगु संतापु ॥ रहाउ ॥

जिसु कारणि तनु धारिआ सो प्रभु डिठा नालि ॥ जलि थलि महीअलि पूरिआ प्रभु आपणी नदरि निहालि ॥२॥

मनु तनु निरमलु होइआ लागी साचु परीति ॥ चरण भजे पारब्रहम के सभि जप तप तिन ही कीति ॥३॥

रतन जवेहर माणिका अम्रितु हरि का नाउ ॥ सूख सहज आनंद रस जन नानक हरि गुण गाउ ॥४॥१७॥८७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 48) सिरीरागु महला ५ ॥
सोई सासतु सउणु सोइ जितु जपीऐ हरि नाउ ॥ चरण कमल गुरि धनु दीआ मिलिआ निथावे थाउ ॥ साची पूंजी सचु संजमो आठ पहर गुण गाउ ॥ करि किरपा प्रभु भेटिआ मरणु न आवणु जाउ ॥१॥

मेरे मन हरि भजु सदा इक रंगि ॥ घट घट अंतरि रवि रहिआ सदा सहाई संगि ॥१॥ रहाउ ॥

सुखा की मिति किआ गणी जा सिमरी गोविंदु ॥ जिन चाखिआ से त्रिपतासिआ उह रसु जाणै जिंदु ॥ संता संगति मनि वसै प्रभु प्रीतमु बखसिंदु ॥ जिनि सेविआ प्रभु आपणा सोई राज नरिंदु ॥२॥

अउसरि हरि जसु गुण रमण जितु कोटि मजन इसनानु ॥ रसना उचरै गुणवती कोइ न पुजै दानु ॥ द्रिसटि धारि मनि तनि वसै दइआल पुरखु मिहरवानु ॥ जीउ पिंडु धनु तिस दा हउ सदा सदा कुरबानु ॥३॥

मिलिआ कदे न विछुड़ै जो मेलिआ करतारि ॥ दासा के बंधन कटिआ साचै सिरजणहारि ॥ भूला मारगि पाइओनु गुण अवगुण न बीचारि ॥ नानक तिसु सरणागती जि सगल घटा आधारु ॥४॥१८॥८८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 49) सिरीरागु महला ५ ॥
रसना सचा सिमरीऐ मनु तनु निरमलु होइ ॥ मात पिता साक अगले तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ मिहर करे जे आपणी चसा न विसरै सोइ ॥१॥

मन मेरे साचा सेवि जिचरु सासु ॥ बिनु सचे सभ कूड़ु है अंते होइ बिनासु ॥१॥ रहाउ ॥

साहिबु मेरा निरमला तिसु बिनु रहणु न जाइ ॥ मेरै मनि तनि भुख अति अगली कोई आणि मिलावै माइ ॥ चारे कुंडा भालीआ सह बिनु अवरु न जाइ ॥२॥

तिसु आगै अरदासि करि जो मेले करतारु ॥ सतिगुरु दाता नाम का पूरा जिसु भंडारु ॥ सदा सदा सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥३॥

परवदगारु सालाहीऐ जिस दे चलत अनेक ॥ सदा सदा आराधीऐ एहा मति विसेख ॥ मनि तनि मिठा तिसु लगै जिसु मसतकि नानक लेख ॥४॥१९॥८९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 49) सिरीरागु महला ५ ॥
संत जनहु मिलि भाईहो सचा नामु समालि ॥ तोसा बंधहु जीअ का ऐथै ओथै नालि ॥ गुर पूरे ते पाईऐ अपणी नदरि निहालि ॥ करमि परापति तिसु होवै जिस नो होइ दइआलु ॥१॥

मेरे मन गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥ दूजा थाउ न को सुझै गुर मेले सचु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

सगल पदारथ तिसु मिले जिनि गुरु डिठा जाइ ॥ गुर चरणी जिन मनु लगा से वडभागी माइ ॥ गुरु दाता समरथु गुरु गुरु सभ महि रहिआ समाइ ॥ गुरु परमेसरु पारब्रहमु गुरु डुबदा लए तराइ ॥२॥

कितु मुखि गुरु सालाहीऐ करण कारण समरथु ॥ से मथे निहचल रहे जिन गुरि धारिआ हथु ॥ गुरि अम्रित नामु पीआलिआ जनम मरन का पथु ॥ गुरु परमेसरु सेविआ भै भंजनु दुख लथु ॥३॥

सतिगुरु गहिर गभीरु है सुख सागरु अघखंडु ॥ जिनि गुरु सेविआ आपणा जमदूत न लागै डंडु ॥ गुर नालि तुलि न लगई खोजि डिठा ब्रहमंडु ॥ नामु निधानु सतिगुरि दीआ सुखु नानक मन महि मंडु ॥४॥२०॥९०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 50) सिरीरागु महला ५ ॥
मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥ भाई मीत सुरिद कीए बिखिआ रचिआ बादु ॥ जांदे बिलम न होवई विणु नावै बिसमादु ॥१॥

मेरे मन सतगुर की सेवा लागु ॥ जो दीसै सो विणसणा मन की मति तिआगु ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ कूकरु हरकाइआ धावै दह दिस जाइ ॥ लोभी जंतु न जाणई भखु अभखु सभ खाइ ॥ काम क्रोध मदि बिआपिआ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥२॥

माइआ जालु पसारिआ भीतरि चोग बणाइ ॥ त्रिसना पंखी फासिआ निकसु न पाए माइ ॥ जिनि कीता तिसहि न जाणई फिरि फिरि आवै जाइ ॥३॥

अनिक प्रकारी मोहिआ बहु बिधि इहु संसारु ॥ जिस नो रखै सो रहै सम्रिथु पुरखु अपारु ॥ हरि जन हरि लिव उधरे नानक सद बलिहारु ॥४॥२१॥९१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 50) सिरीरागु महला ५ घरु २ ॥
गोइलि आइआ गोइली किआ तिसु ड्मफु पसारु ॥ मुहलति पुंनी चलणा तूं समलु घर बारु ॥१॥

हरि गुण गाउ मना सतिगुरु सेवि पिआरि ॥ किआ थोड़ड़ी बात गुमानु ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे रैणि पराहुणे उठि चलसहि परभाति ॥ किआ तूं रता गिरसत सिउ सभ फुला की बागाति ॥२॥

मेरी मेरी किआ करहि जिनि दीआ सो प्रभु लोड़ि ॥ सरपर उठी चलणा छडि जासी लख करोड़ि ॥३॥

लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ॥ नानक नामु समालि तूं सो दिनु नेड़ा आइओइ ॥४॥२२॥९२॥


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