राग सोरठि - बाणी शब्द, Raag Sorath - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू नानक देव जी -- SGGS 595) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
सोरठि महला १ घरु १ चउपदे ॥
सभना मरणा आइआ वेछोड़ा सभनाह ॥ पुछहु जाइ सिआणिआ आगै मिलणु किनाह ॥ जिन मेरा साहिबु वीसरै वडड़ी वेदन तिनाह ॥१॥

भी सालाहिहु साचा सोइ ॥ जा की नदरि सदा सुखु होइ ॥ रहाउ ॥

वडा करि सालाहणा है भी होसी सोइ ॥ सभना दाता एकु तू माणस दाति न होइ ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ रंन कि रुंनै होइ ॥२॥

धरती उपरि कोट गड़ केती गई वजाइ ॥ जो असमानि न मावनी तिन नकि नथा पाइ ॥ जे मन जाणहि सूलीआ काहे मिठा खाहि ॥३॥

नानक अउगुण जेतड़े तेते गली जंजीर ॥ जे गुण होनि त कटीअनि से भाई से वीर ॥ अगै गए न मंनीअनि मारि कढहु वेपीर ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 595) सोरठि महला १ घरु १ ॥
मनु हाली किरसाणी करणी सरमु पाणी तनु खेतु ॥ नामु बीजु संतोखु सुहागा रखु गरीबी वेसु ॥ भाउ करम करि जमसी से घर भागठ देखु ॥१॥

बाबा माइआ साथि न होइ ॥ इनि माइआ जगु मोहिआ विरला बूझै कोइ ॥ रहाउ ॥

हाणु हटु करि आरजा सचु नामु करि वथु ॥ सुरति सोच करि भांडसाल तिसु विचि तिस नो रखु ॥ वणजारिआ सिउ वणजु करि लै लाहा मन हसु ॥२॥

सुणि सासत सउदागरी सतु घोड़े लै चलु ॥ खरचु बंनु चंगिआईआ मतु मन जाणहि कलु ॥ निरंकार कै देसि जाहि ता सुखि लहहि महलु ॥३॥

लाइ चितु करि चाकरी मंनि नामु करि कमु ॥ बंनु बदीआ करि धावणी ता को आखै धंनु ॥ नानक वेखै नदरि करि चड़ै चवगण वंनु ॥४॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 596) सोरठि मः १ चउतुके ॥
माइ बाप को बेटा नीका ससुरै चतुरु जवाई ॥ बाल कंनिआ कौ बापु पिआरा भाई कौ अति भाई ॥ हुकमु भइआ बाहरु घरु छोडिआ खिन महि भई पराई ॥ नामु दानु इसनानु न मनमुखि तितु तनि धूड़ि धुमाई ॥१॥

मनु मानिआ नामु सखाई ॥ पाइ परउ गुर कै बलिहारै जिनि साची बूझ बुझाई ॥ रहाउ ॥

जग सिउ झूठ प्रीति मनु बेधिआ जन सिउ वादु रचाई ॥ माइआ मगनु अहिनिसि मगु जोहै नामु न लेवै मरै बिखु खाई ॥ गंधण वैणि रता हितकारी सबदै सुरति न आई ॥ रंगि न राता रसि नही बेधिआ मनमुखि पति गवाई ॥२॥

साध सभा महि सहजु न चाखिआ जिहबा रसु नही राई ॥ मनु तनु धनु अपुना करि जानिआ दर की खबरि न पाई ॥ अखी मीटि चलिआ अंधिआरा घरु दरु दिसै न भाई ॥ जम दरि बाधा ठउर न पावै अपुना कीआ कमाई ॥३॥

नदरि करे ता अखी वेखा कहणा कथनु न जाई ॥ कंनी सुणि सुणि सबदि सलाही अम्रितु रिदै वसाई ॥ निरभउ निरंकारु निरवैरु पूरन जोति समाई ॥ नानक गुर विणु भरमु न भागै सचि नामि वडिआई ॥४॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 596) सोरठि महला १ दुतुके ॥
पुड़ु धरती पुड़ु पाणी आसणु चारि कुंट चउबारा ॥ सगल भवण की मूरति एका मुखि तेरै टकसाला ॥१॥

मेरे साहिबा तेरे चोज विडाणा ॥ जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा आपे सरब समाणा ॥ रहाउ ॥

जह जह देखा तह जोति तुमारी तेरा रूपु किनेहा ॥ इकतु रूपि फिरहि परछंना कोइ न किस ही जेहा ॥२॥

अंडज जेरज उतभुज सेतज तेरे कीते जंता ॥ एकु पुरबु मै तेरा देखिआ तू सभना माहि रवंता ॥३॥

तेरे गुण बहुते मै एकु न जाणिआ मै मूरख किछु दीजै ॥ प्रणवति नानक सुणि मेरे साहिबा डुबदा पथरु लीजै ॥४॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 596) सोरठि महला १ ॥
हउ पापी पतितु परम पाखंडी तू निरमलु निरंकारी ॥ अम्रितु चाखि परम रसि राते ठाकुर सरणि तुमारी ॥१॥

करता तू मै माणु निमाणे ॥ माणु महतु नामु धनु पलै साचै सबदि समाणे ॥ रहाउ ॥

तू पूरा हम ऊरे होछे तू गउरा हम हउरे ॥ तुझ ही मन राते अहिनिसि परभाते हरि रसना जपि मन रे ॥२॥

तुम साचे हम तुम ही राचे सबदि भेदि फुनि साचे ॥ अहिनिसि नामि रते से सूचे मरि जनमे से काचे ॥३॥

अवरु न दीसै किसु सालाही तिसहि सरीकु न कोई ॥ प्रणवति नानकु दासनि दासा गुरमति जानिआ सोई ॥४॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 597) सोरठि महला १ ॥
अलख अपार अगम अगोचर ना तिसु कालु न करमा ॥ जाति अजाति अजोनी स्मभउ ना तिसु भाउ न भरमा ॥१॥

साचे सचिआर विटहु कुरबाणु ॥ ना तिसु रूप वरनु नही रेखिआ साचै सबदि नीसाणु ॥ रहाउ ॥

ना तिसु मात पिता सुत बंधप ना तिसु कामु न नारी ॥ अकुल निरंजन अपर पर्मपरु सगली जोति तुमारी ॥२॥

घट घट अंतरि ब्रहमु लुकाइआ घटि घटि जोति सबाई ॥ बजर कपाट मुकते गुरमती निरभै ताड़ी लाई ॥३॥

जंत उपाइ कालु सिरि जंता वसगति जुगति सबाई ॥ सतिगुरु सेवि पदारथु पावहि छूटहि सबदु कमाई ॥४॥

सूचै भाडै साचु समावै विरले सूचाचारी ॥ तंतै कउ परम तंतु मिलाइआ नानक सरणि तुमारी ॥५॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 597) सोरठि महला १ ॥
जिउ मीना बिनु पाणीऐ तिउ साकतु मरै पिआस ॥ तिउ हरि बिनु मरीऐ रे मना जो बिरथा जावै सासु ॥१॥

मन रे राम नाम जसु लेइ ॥ बिनु गुर इहु रसु किउ लहउ गुरु मेलै हरि देइ ॥ रहाउ ॥

संत जना मिलु संगती गुरमुखि तीरथु होइ ॥ अठसठि तीरथ मजना गुर दरसु परापति होइ ॥२॥

जिउ जोगी जत बाहरा तपु नाही सतु संतोखु ॥ तिउ नामै बिनु देहुरी जमु मारै अंतरि दोखु ॥३॥

साकत प्रेमु न पाईऐ हरि पाईऐ सतिगुर भाइ ॥ सुख दुख दाता गुरु मिलै कहु नानक सिफति समाइ ॥४॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 597) सोरठि महला १ ॥
तू प्रभ दाता दानि मति पूरा हम थारे भेखारी जीउ ॥ मै किआ मागउ किछु थिरु न रहाई हरि दीजै नामु पिआरी जीउ ॥१॥

घटि घटि रवि रहिआ बनवारी ॥ जलि थलि महीअलि गुपतो वरतै गुर सबदी देखि निहारी जीउ ॥ रहाउ ॥

मरत पइआल अकासु दिखाइओ गुरि सतिगुरि किरपा धारी जीउ ॥ सो ब्रहमु अजोनी है भी होनी घट भीतरि देखु मुरारी जीउ ॥२॥

जनम मरन कउ इहु जगु बपुड़ो इनि दूजै भगति विसारी जीउ ॥ सतिगुरु मिलै त गुरमति पाईऐ साकत बाजी हारी जीउ ॥३॥

सतिगुर बंधन तोड़ि निरारे बहुड़ि न गरभ मझारी जीउ ॥ नानक गिआन रतनु परगासिआ हरि मनि वसिआ निरंकारी जीउ ॥४॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 598) सोरठि महला १ ॥
जिसु जल निधि कारणि तुम जगि आए सो अम्रितु गुर पाही जीउ ॥ छोडहु वेसु भेख चतुराई दुबिधा इहु फलु नाही जीउ ॥१॥

मन रे थिरु रहु मतु कत जाही जीउ ॥ बाहरि ढूढत बहुतु दुखु पावहि घरि अम्रितु घट माही जीउ ॥ रहाउ ॥

अवगुण छोडि गुणा कउ धावहु करि अवगुण पछुताही जीउ ॥ सर अपसर की सार न जाणहि फिरि फिरि कीच बुडाही जीउ ॥२॥

अंतरि मैलु लोभ बहु झूठे बाहरि नावहु काही जीउ ॥ निरमल नामु जपहु सद गुरमुखि अंतर की गति ताही जीउ ॥३॥

परहरि लोभु निंदा कूड़ु तिआगहु सचु गुर बचनी फलु पाही जीउ ॥ जिउ भावै तिउ राखहु हरि जीउ जन नानक सबदि सलाही जीउ ॥४॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 598) सोरठि महला १ पंचपदे ॥
अपना घरु मूसत राखि न साकहि की पर घरु जोहन लागा ॥ घरु दरु राखहि जे रसु चाखहि जो गुरमुखि सेवकु लागा ॥१॥

मन रे समझु कवन मति लागा ॥ नामु विसारि अन रस लोभाने फिरि पछुताहि अभागा ॥ रहाउ ॥

आवत कउ हरख जात कउ रोवहि इहु दुखु सुखु नाले लागा ॥ आपे दुख सुख भोगि भोगावै गुरमुखि सो अनरागा ॥२॥

हरि रस ऊपरि अवरु किआ कहीऐ जिनि पीआ सो त्रिपतागा ॥ माइआ मोहित जिनि इहु रसु खोइआ जा साकत दुरमति लागा ॥३॥

मन का जीउ पवनपति देही देही महि देउ समागा ॥ जे तू देहि त हरि रसु गाई मनु त्रिपतै हरि लिव लागा ॥४॥

साधसंगति महि हरि रसु पाईऐ गुरि मिलिऐ जम भउ भागा ॥ नानक राम नामु जपि गुरमुखि हरि पाए मसतकि भागा ॥५॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 598) सोरठि महला १ ॥
सरब जीआ सिरि लेखु धुराहू बिनु लेखै नही कोई जीउ ॥ आपि अलेखु कुदरति करि देखै हुकमि चलाए सोई जीउ ॥१॥

मन रे राम जपहु सुखु होई ॥ अहिनिसि गुर के चरन सरेवहु हरि दाता भुगता सोई ॥ रहाउ ॥

जो अंतरि सो बाहरि देखहु अवरु न दूजा कोई जीउ ॥ गुरमुखि एक द्रिसटि करि देखहु घटि घटि जोति समोई जीउ ॥२॥

चलतौ ठाकि रखहु घरि अपनै गुर मिलिऐ इह मति होई जीउ ॥ देखि अद्रिसटु रहउ बिसमादी दुखु बिसरै सुखु होई जीउ ॥३॥

पीवहु अपिउ परम सुखु पाईऐ निज घरि वासा होई जीउ ॥ जनम मरण भव भंजनु गाईऐ पुनरपि जनमु न होई जीउ ॥४॥

ततु निरंजनु जोति सबाई सोहं भेदु न कोई जीउ ॥ अपर्मपर पारब्रहमु परमेसरु नानक गुरु मिलिआ सोई जीउ ॥५॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 599) सोरठि महला १ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जा तिसु भावा तद ही गावा ॥ ता गावे का फलु पावा ॥ गावे का फलु होई ॥ जा आपे देवै सोई ॥१॥

मन मेरे गुर बचनी निधि पाई ॥ ता ते सच महि रहिआ समाई ॥ रहाउ ॥

गुर साखी अंतरि जागी ॥ ता चंचल मति तिआगी ॥ गुर साखी का उजीआरा ॥ ता मिटिआ सगल अंध्यारा ॥२॥

गुर चरनी मनु लागा ॥ ता जम का मारगु भागा ॥ भै विचि निरभउ पाइआ ॥ ता सहजै कै घरि आइआ ॥३॥

भणति नानकु बूझै को बीचारी ॥ इसु जग महि करणी सारी ॥ करणी कीरति होई ॥ जा आपे मिलिआ सोई ॥४॥१॥१२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 599) सोरठि महला ३ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेवक सेव करहि सभि तेरी जिन सबदै सादु आइआ ॥ गुर किरपा ते निरमलु होआ जिनि विचहु आपु गवाइआ ॥ अनदिनु गुण गावहि नित साचे गुर कै सबदि सुहाइआ ॥१॥

मेरे ठाकुर हम बारिक सरणि तुमारी ॥ एको सचा सचु तू केवलु आपि मुरारी ॥ रहाउ ॥

जागत रहे तिनी प्रभु पाइआ सबदे हउमै मारी ॥ गिरही महि सदा हरि जन उदासी गिआन तत बीचारी ॥ सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ हरि राखिआ उर धारी ॥२॥

इहु मनूआ दह दिसि धावदा दूजै भाइ खुआइआ ॥ मनमुख मुगधु हरि नामु न चेतै बिरथा जनमु गवाइआ ॥ सतिगुरु भेटे ता नाउ पाए हउमै मोहु चुकाइआ ॥३॥

हरि जन साचे साचु कमावहि गुर कै सबदि वीचारी ॥ आपे मेलि लए प्रभि साचै साचु रखिआ उर धारी ॥ नानक नावहु गति मति पाई एहा रासि हमारी ॥४॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 600) सोरठि महला ३ ॥
भगति खजाना भगतन कउ दीआ नाउ हरि धनु सचु सोइ ॥ अखुटु नाम धनु कदे निखुटै नाही किनै न कीमति होइ ॥ नाम धनि मुख उजले होए हरि पाइआ सचु सोइ ॥१॥

मन मेरे गुर सबदी हरि पाइआ जाइ ॥ बिनु सबदै जगु भुलदा फिरदा दरगह मिलै सजाइ ॥ रहाउ ॥

इसु देही अंदरि पंच चोर वसहि कामु क्रोधु लोभु मोहु अहंकारा ॥ अम्रितु लूटहि मनमुख नही बूझहि कोइ न सुणै पूकारा ॥ अंधा जगतु अंधु वरतारा बाझु गुरू गुबारा ॥२॥

हउमै मेरा करि करि विगुते किहु चलै न चलदिआ नालि ॥ गुरमुखि होवै सु नामु धिआवै सदा हरि नामु समालि ॥ सची बाणी हरि गुण गावै नदरी नदरि निहालि ॥३॥

सतिगुर गिआनु सदा घटि चानणु अमरु सिरि बादिसाहा ॥ अनदिनु भगति करहि दिनु राती राम नामु सचु लाहा ॥ नानक राम नामि निसतारा सबदि रते हरि पाहा ॥४॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 600) सोरठि मः ३ ॥
दासनि दासु होवै ता हरि पाए विचहु आपु गवाई ॥ भगता का कारजु हरि अनंदु है अनदिनु हरि गुण गाई ॥ सबदि रते सदा इक रंगी हरि सिउ रहे समाई ॥१॥

हरि जीउ साची नदरि तुमारी ॥ आपणिआ दासा नो क्रिपा करि पिआरे राखहु पैज हमारी ॥ रहाउ ॥

सबदि सलाही सदा हउ जीवा गुरमती भउ भागा ॥ मेरा प्रभु साचा अति सुआलिउ गुरु सेविआ चितु लागा ॥ साचा सबदु सची सचु बाणी सो जनु अनदिनु जागा ॥२॥

महा ग्मभीरु सदा सुखदाता तिस का अंतु न पाइआ ॥ पूरे गुर की सेवा कीनी अचिंतु हरि मंनि वसाइआ ॥ मनु तनु निरमलु सदा सुखु अंतरि विचहु भरमु चुकाइआ ॥३॥

हरि का मारगु सदा पंथु विखड़ा को पाए गुर वीचारा ॥ हरि कै रंगि राता सबदे माता हउमै तजे विकारा ॥ नानक नामि रता इक रंगी सबदि सवारणहारा ॥४॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 601) सोरठि महला ३ ॥
हरि जीउ तुधु नो सदा सालाही पिआरे जिचरु घट अंतरि है सासा ॥ इकु पलु खिनु विसरहि तू सुआमी जाणउ बरस पचासा ॥ हम मूड़ मुगध सदा से भाई गुर कै सबदि प्रगासा ॥१॥

हरि जीउ तुम आपे देहु बुझाई ॥ हरि जीउ तुधु विटहु वारिआ सद ही तेरे नाम विटहु बलि जाई ॥ रहाउ ॥

हम सबदि मुए सबदि मारि जीवाले भाई सबदे ही मुकति पाई ॥ सबदे मनु तनु निरमलु होआ हरि वसिआ मनि आई ॥ सबदु गुर दाता जितु मनु राता हरि सिउ रहिआ समाई ॥२॥

सबदु न जाणहि से अंने बोले से कितु आए संसारा ॥ हरि रसु न पाइआ बिरथा जनमु गवाइआ जमहि वारो वारा ॥ बिसटा के कीड़े बिसटा माहि समाणे मनमुख मुगध गुबारा ॥३॥

आपे करि वेखै मारगि लाए भाई तिसु बिनु अवरु न कोई ॥ जो धुरि लिखिआ सु कोइ न मेटै भाई करता करे सु होई ॥ नानक नामु वसिआ मन अंतरि भाई अवरु न दूजा कोई ॥४॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 601) सोरठि महला ३ ॥
गुरमुखि भगति करहि प्रभ भावहि अनदिनु नामु वखाणे ॥ भगता की सार करहि आपि राखहि जो तेरै मनि भाणे ॥ तू गुणदाता सबदि पछाता गुण कहि गुणी समाणे ॥१॥

मन मेरे हरि जीउ सदा समालि ॥ अंत कालि तेरा बेली होवै सदा निबहै तेरै नालि ॥ रहाउ ॥

दुसट चउकड़ी सदा कूड़ु कमावहि ना बूझहि वीचारे ॥ निंदा दुसटी ते किनि फलु पाइआ हरणाखस नखहि बिदारे ॥ प्रहिलादु जनु सद हरि गुण गावै हरि जीउ लए उबारे ॥२॥

आपस कउ बहु भला करि जाणहि मनमुखि मति न काई ॥ साधू जन की निंदा विआपे जासनि जनमु गवाई ॥ राम नामु कदे चेतहि नाही अंति गए पछुताई ॥३॥

सफलु जनमु भगता का कीता गुर सेवा आपि लाए ॥ सबदे राते सहजे माते अनदिनु हरि गुण गाए ॥ नानक दासु कहै बेनंती हउ लागा तिन कै पाए ॥४॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 601) सोरठि महला ३ ॥
सो सिखु सखा बंधपु है भाई जि गुर के भाणे विचि आवै ॥ आपणै भाणै जो चलै भाई विछुड़ि चोटा खावै ॥ बिनु सतिगुर सुखु कदे न पावै भाई फिरि फिरि पछोतावै ॥१॥

हरि के दास सुहेले भाई ॥ जनम जनम के किलबिख दुख काटे आपे मेलि मिलाई ॥ रहाउ ॥

इहु कुट्मबु सभु जीअ के बंधन भाई भरमि भुला सैंसारा ॥ बिनु गुर बंधन टूटहि नाही गुरमुखि मोख दुआरा ॥ करम करहि गुर सबदु न पछाणहि मरि जनमहि वारो वारा ॥२॥

हउ मेरा जगु पलचि रहिआ भाई कोइ न किस ही केरा ॥ गुरमुखि महलु पाइनि गुण गावनि निज घरि होइ बसेरा ॥ ऐथै बूझै सु आपु पछाणै हरि प्रभु है तिसु केरा ॥३॥

सतिगुरू सदा दइआलु है भाई विणु भागा किआ पाईऐ ॥ एक नदरि करि वेखै सभ ऊपरि जेहा भाउ तेहा फलु पाईऐ ॥ नानक नामु वसै मन अंतरि विचहु आपु गवाईऐ ॥४॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 602) सोरठि महला ३ चौतुके ॥
सची भगति सतिगुर ते होवै सची हिरदै बाणी ॥ सतिगुरु सेवे सदा सुखु पाए हउमै सबदि समाणी ॥ बिनु गुर साचे भगति न होवी होर भूली फिरै इआणी ॥ मनमुखि फिरहि सदा दुखु पावहि डूबि मुए विणु पाणी ॥१॥

भाई रे सदा रहहु सरणाई ॥ आपणी नदरि करे पति राखै हरि नामो दे वडिआई ॥ रहाउ ॥

पूरे गुर ते आपु पछाता सबदि सचै वीचारा ॥ हिरदै जगजीवनु सद वसिआ तजि कामु क्रोधु अहंकारा ॥ सदा हजूरि रविआ सभ ठाई हिरदै नामु अपारा ॥ जुगि जुगि बाणी सबदि पछाणी नाउ मीठा मनहि पिआरा ॥२॥

सतिगुरु सेवि जिनि नामु पछाता सफल जनमु जगि आइआ ॥ हरि रसु चाखि सदा मनु त्रिपतिआ गुण गावै गुणी अघाइआ ॥ कमलु प्रगासि सदा रंगि राता अनहद सबदु वजाइआ ॥ तनु मनु निरमलु निरमल बाणी सचे सचि समाइआ ॥३॥

राम नाम की गति कोइ न बूझै गुरमति रिदै समाई ॥ गुरमुखि होवै सु मगु पछाणै हरि रसि रसन रसाई ॥ जपु तपु संजमु सभु गुर ते होवै हिरदै नामु वसाई ॥ नानक नामु समालहि से जन सोहनि दरि साचै पति पाई ॥४॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 602) सोरठि मः ३ दुतुके ॥
सतिगुर मिलिऐ उलटी भई भाई जीवत मरै ता बूझ पाइ ॥ सो गुरू सो सिखु है भाई जिसु जोती जोति मिलाइ ॥१॥

मन रे हरि हरि सेती लिव लाइ ॥ मन हरि जपि मीठा लागै भाई गुरमुखि पाए हरि थाइ ॥ रहाउ ॥

बिनु गुर प्रीति न ऊपजै भाई मनमुखि दूजै भाइ ॥ तुह कुटहि मनमुख करम करहि भाई पलै किछू न पाइ ॥२॥

गुर मिलिऐ नामु मनि रविआ भाई साची प्रीति पिआरि ॥ सदा हरि के गुण रवै भाई गुर कै हेति अपारि ॥३॥

आइआ सो परवाणु है भाई जि गुर सेवा चितु लाइ ॥ नानक नामु हरि पाईऐ भाई गुर सबदी मेलाइ ॥४॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 603) सोरठि महला ३ घरु १ ॥
तिही गुणी त्रिभवणु विआपिआ भाई गुरमुखि बूझ बुझाइ ॥ राम नामि लगि छूटीऐ भाई पूछहु गिआनीआ जाइ ॥१॥

मन रे त्रै गुण छोडि चउथै चितु लाइ ॥ हरि जीउ तेरै मनि वसै भाई सदा हरि के गुण गाइ ॥ रहाउ ॥

नामै ते सभि ऊपजे भाई नाइ विसरिऐ मरि जाइ ॥ अगिआनी जगतु अंधु है भाई सूते गए मुहाइ ॥२॥

गुरमुखि जागे से उबरे भाई भवजलु पारि उतारि ॥ जग महि लाहा हरि नामु है भाई हिरदै रखिआ उर धारि ॥३॥

गुर सरणाई उबरे भाई राम नामि लिव लाइ ॥ नानक नाउ बेड़ा नाउ तुलहड़ा भाई जितु लगि पारि जन पाइ ॥४॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 603) सोरठि महला ३ घरु १ ॥
सतिगुरु सुख सागरु जग अंतरि होर थै सुखु नाही ॥ हउमै जगतु दुखि रोगि विआपिआ मरि जनमै रोवै धाही ॥१॥

प्राणी सतिगुरु सेवि सुखु पाइ ॥ सतिगुरु सेवहि ता सुखु पावहि नाहि त जाहिगा जनमु गवाइ ॥ रहाउ ॥

त्रै गुण धातु बहु करम कमावहि हरि रस सादु न आइआ ॥ संधिआ तरपणु करहि गाइत्री बिनु बूझे दुखु पाइआ ॥२॥

सतिगुरु सेवे सो वडभागी जिस नो आपि मिलाए ॥ हरि रसु पी जन सदा त्रिपतासे विचहु आपु गवाए ॥३॥

इहु जगु अंधा सभु अंधु कमावै बिनु गुर मगु न पाए ॥ नानक सतिगुरु मिलै त अखी वेखै घरै अंदरि सचु पाए ॥४॥१०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 603) सोरठि महला ३ ॥
बिनु सतिगुर सेवे बहुता दुखु लागा जुग चारे भरमाई ॥ हम दीन तुम जुगु जुगु दाते सबदे देहि बुझाई ॥१॥

हरि जीउ क्रिपा करहु तुम पिआरे ॥ सतिगुरु दाता मेलि मिलावहु हरि नामु देवहु आधारे ॥ रहाउ ॥

मनसा मारि दुबिधा सहजि समाणी पाइआ नामु अपारा ॥ हरि रसु चाखि मनु निरमलु होआ किलबिख काटणहारा ॥२॥

सबदि मरहु फिरि जीवहु सद ही ता फिरि मरणु न होई ॥ अम्रितु नामु सदा मनि मीठा सबदे पावै कोई ॥३॥

दातै दाति रखी हथि अपणै जिसु भावै तिसु देई ॥ नानक नामि रते सुखु पाइआ दरगह जापहि सेई ॥४॥११॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 604) सोरठि महला ३ ॥
सतिगुर सेवे ता सहज धुनि उपजै गति मति तद ही पाए ॥ हरि का नामु सचा मनि वसिआ नामे नामि समाए ॥१॥

बिनु सतिगुर सभु जगु बउराना ॥ मनमुखि अंधा सबदु न जाणै झूठै भरमि भुलाना ॥ रहाउ ॥

त्रै गुण माइआ भरमि भुलाइआ हउमै बंधन कमाए ॥ जमणु मरणु सिर ऊपरि ऊभउ गरभ जोनि दुखु पाए ॥२॥

त्रै गुण वरतहि सगल संसारा हउमै विचि पति खोई ॥ गुरमुखि होवै चउथा पदु चीनै राम नामि सुखु होई ॥३॥

त्रै गुण सभि तेरे तू आपे करता जो तू करहि सु होई ॥ नानक राम नामि निसतारा सबदे हउमै खोई ॥४॥१२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 604) सोरठि महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आपे आपि वरतदा पिआरा आपे आपि अपाहु ॥ वणजारा जगु आपि है पिआरा आपे साचा साहु ॥ आपे वणजु वापारीआ पिआरा आपे सचु वेसाहु ॥१॥

जपि मन हरि हरि नामु सलाह ॥ गुर किरपा ते पाईऐ पिआरा अम्रितु अगम अथाह ॥ रहाउ ॥

आपे सुणि सभ वेखदा पिआरा मुखि बोले आपि मुहाहु ॥ आपे उझड़ि पाइदा पिआरा आपि विखाले राहु ॥ आपे ही सभु आपि है पिआरा आपे वेपरवाहु ॥२॥

आपे आपि उपाइदा पिआरा सिरि आपे धंधड़ै लाहु ॥ आपि कराए साखती पिआरा आपि मारे मरि जाहु ॥ आपे पतणु पातणी पिआरा आपे पारि लंघाहु ॥३॥

आपे सागरु बोहिथा पिआरा गुरु खेवटु आपि चलाहु ॥ आपे ही चड़ि लंघदा पिआरा करि चोज वेखै पातिसाहु ॥ आपे आपि दइआलु है पिआरा जन नानक बखसि मिलाहु ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 604) सोरठि महला ४ चउथा ॥
आपे अंडज जेरज सेतज उतभुज आपे खंड आपे सभ लोइ ॥ आपे सूतु आपे बहु मणीआ करि सकती जगतु परोइ ॥ आपे ही सूतधारु है पिआरा सूतु खिंचे ढहि ढेरी होइ ॥१॥

मेरे मन मै हरि बिनु अवरु न कोइ ॥ सतिगुर विचि नामु निधानु है पिआरा करि दइआ अम्रितु मुखि चोइ ॥ रहाउ ॥

आपे जल थलि सभतु है पिआरा प्रभु आपे करे सु होइ ॥ सभना रिजकु समाहदा पिआरा दूजा अवरु न कोइ ॥ आपे खेल खेलाइदा पिआरा आपे करे सु होइ ॥२॥

आपे ही आपि निरमला पिआरा आपे निरमल सोइ ॥ आपे कीमति पाइदा पिआरा आपे करे सु होइ ॥ आपे अलखु न लखीऐ पिआरा आपि लखावै सोइ ॥३॥

आपे गहिर ग्मभीरु है पिआरा तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥ सभि घट आपे भोगवै पिआरा विचि नारी पुरख सभु सोइ ॥ नानक गुपतु वरतदा पिआरा गुरमुखि परगटु होइ ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 605) सोरठि महला ४ ॥
आपे ही सभु आपि है पिआरा आपे थापि उथापै ॥ आपे वेखि विगसदा पिआरा करि चोज वेखै प्रभु आपै ॥ आपे वणि तिणि सभतु है पिआरा आपे गुरमुखि जापै ॥१॥

जपि मन हरि हरि नाम रसि ध्रापै ॥ अम्रित नामु महा रसु मीठा गुर सबदी चखि जापै ॥ रहाउ ॥

आपे तीरथु तुलहड़ा पिआरा आपि तरै प्रभु आपै ॥ आपे जालु वताइदा पिआरा सभु जगु मछुली हरि आपै ॥ आपि अभुलु न भुलई पिआरा अवरु न दूजा जापै ॥२॥

आपे सिंङी नादु है पिआरा धुनि आपि वजाए आपै ॥ आपे जोगी पुरखु है पिआरा आपे ही तपु तापै ॥ आपे सतिगुरु आपि है चेला उपदेसु करै प्रभु आपै ॥३॥

आपे नाउ जपाइदा पिआरा आपे ही जपु जापै ॥ आपे अम्रितु आपि है पिआरा आपे ही रसु आपै ॥ आपे आपि सलाहदा पिआरा जन नानक हरि रसि ध्रापै ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 605) सोरठि महला ४ ॥
आपे कंडा आपि तराजी प्रभि आपे तोलि तोलाइआ ॥ आपे साहु आपे वणजारा आपे वणजु कराइआ ॥ आपे धरती साजीअनु पिआरै पिछै टंकु चड़ाइआ ॥१॥

मेरे मन हरि हरि धिआइ सुखु पाइआ ॥ हरि हरि नामु निधानु है पिआरा गुरि पूरै मीठा लाइआ ॥ रहाउ ॥

आपे धरती आपि जलु पिआरा आपे करे कराइआ ॥ आपे हुकमि वरतदा पिआरा जलु माटी बंधि रखाइआ ॥ आपे ही भउ पाइदा पिआरा बंनि बकरी सीहु हढाइआ ॥२॥

आपे कासट आपि हरि पिआरा विचि कासट अगनि रखाइआ ॥ आपे ही आपि वरतदा पिआरा भै अगनि न सकै जलाइआ ॥ आपे मारि जीवाइदा पिआरा साह लैदे सभि लवाइआ ॥३॥

आपे ताणु दीबाणु है पिआरा आपे कारै लाइआ ॥ जिउ आपि चलाए तिउ चलीऐ पिआरे जिउ हरि प्रभ मेरे भाइआ ॥ आपे जंती जंतु है पिआरा जन नानक वजहि वजाइआ ॥४॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 606) सोरठि महला ४ ॥
आपे स्रिसटि उपाइदा पिआरा करि सूरजु चंदु चानाणु ॥ आपि निताणिआ ताणु है पिआरा आपि निमाणिआ माणु ॥ आपि दइआ करि रखदा पिआरा आपे सुघड़ु सुजाणु ॥१॥

मेरे मन जपि राम नामु नीसाणु ॥ सतसंगति मिलि धिआइ तू हरि हरि बहुड़ि न आवण जाणु ॥ रहाउ ॥

आपे ही गुण वरतदा पिआरा आपे ही परवाणु ॥ आपे बखस कराइदा पिआरा आपे सचु नीसाणु ॥ आपे हुकमि वरतदा पिआरा आपे ही फुरमाणु ॥२॥

आपे भगति भंडार है पिआरा आपे देवै दाणु ॥ आपे सेव कराइदा पिआरा आपि दिवावै माणु ॥ आपे ताड़ी लाइदा पिआरा आपे गुणी निधानु ॥३॥

आपे वडा आपि है पिआरा आपे ही परधाणु ॥ आपे कीमति पाइदा पिआरा आपे तुलु परवाणु ॥ आपे अतुलु तुलाइदा पिआरा जन नानक सद कुरबाणु ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 606) सोरठि महला ४ ॥
आपे सेवा लाइदा पिआरा आपे भगति उमाहा ॥ आपे गुण गावाइदा पिआरा आपे सबदि समाहा ॥ आपे लेखणि आपि लिखारी आपे लेखु लिखाहा ॥१॥

मेरे मन जपि राम नामु ओमाहा ॥ अनदिनु अनदु होवै वडभागी लै गुरि पूरै हरि लाहा ॥ रहाउ ॥

आपे गोपी कानु है पिआरा बनि आपे गऊ चराहा ॥ आपे सावल सुंदरा पिआरा आपे वंसु वजाहा ॥ कुवलीआ पीड़ु आपि मराइदा पिआरा करि बालक रूपि पचाहा ॥२॥

आपि अखाड़ा पाइदा पिआरा करि वेखै आपि चोजाहा ॥ करि बालक रूप उपाइदा पिआरा चंडूरु कंसु केसु माराहा ॥ आपे ही बलु आपि है पिआरा बलु भंनै मूरख मुगधाहा ॥३॥

सभु आपे जगतु उपाइदा पिआरा वसि आपे जुगति हथाहा ॥ गलि जेवड़ी आपे पाइदा पिआरा जिउ प्रभु खिंचै तिउ जाहा ॥ जो गरबै सो पचसी पिआरे जपि नानक भगति समाहा ॥४॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 607) सोरठि मः ४ दुतुके ॥
अनिक जनम विछुड़े दुखु पाइआ मनमुखि करम करै अहंकारी ॥ साधू परसत ही प्रभु पाइआ गोबिद सरणि तुमारी ॥१॥

गोबिद प्रीति लगी अति पिआरी ॥ जब सतसंग भए साधू जन हिरदै मिलिआ सांति मुरारी ॥ रहाउ ॥

तू हिरदै गुपतु वसहि दिनु राती तेरा भाउ न बुझहि गवारी ॥ सतिगुरु पुरखु मिलिआ प्रभु प्रगटिआ गुण गावै गुण वीचारी ॥२॥

गुरमुखि प्रगासु भइआ साति आई दुरमति बुधि निवारी ॥ आतम ब्रहमु चीनि सुखु पाइआ सतसंगति पुरख तुमारी ॥३॥

पुरखै पुरखु मिलिआ गुरु पाइआ जिन कउ किरपा भई तुमारी ॥ नानक अतुलु सहज सुखु पाइआ अनदिनु जागतु रहै बनवारी ॥४॥७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 607) सोरठि महला ४ ॥
हरि सिउ प्रीति अंतरु मनु बेधिआ हरि बिनु रहणु न जाई ॥ जिउ मछुली बिनु नीरै बिनसै तिउ नामै बिनु मरि जाई ॥१॥

मेरे प्रभ किरपा जलु देवहु हरि नाई ॥ हउ अंतरि नामु मंगा दिनु राती नामे ही सांति पाई ॥ रहाउ ॥

जिउ चात्रिकु जल बिनु बिललावै बिनु जल पिआस न जाई ॥ गुरमुखि जलु पावै सुख सहजे हरिआ भाइ सुभाई ॥२॥

मनमुख भूखे दह दिस डोलहि बिनु नावै दुखु पाई ॥ जनमि मरै फिरि जोनी आवै दरगहि मिलै सजाई ॥३॥

क्रिपा करहि ता हरि गुण गावह हरि रसु अंतरि पाई ॥ नानक दीन दइआल भए है त्रिसना सबदि बुझाई ॥४॥८॥


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