Pt 4 - राग सारंग - बाणी शब्द, Part 4 - Raag Sarang - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1233) सारग महला ३ असटपदीआ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन मेरे हरि कै नामि वडाई ॥ हरि बिनु अवरु न जाणा कोई हरि कै नामि मुकति गति पाई ॥१॥ रहाउ ॥

सबदि भउ भंजनु जमकाल निखंजनु हरि सेती लिव लाई ॥ हरि सुखदाता गुरमुखि जाता सहजे रहिआ समाई ॥१॥

भगतां का भोजनु हरि नाम निरंजनु पैन्हणु भगति बडाई ॥ निज घरि वासा सदा हरि सेवनि हरि दरि सोभा पाई ॥२॥

मनमुख बुधि काची मनूआ डोलै अकथु न कथै कहानी ॥ गुरमति निहचलु हरि मनि वसिआ अम्रित साची बानी ॥३॥

मन के तरंग सबदि निवारे रसना सहजि सुभाई ॥ सतिगुर मिलि रहीऐ सद अपुने जिनि हरि सेती लिव लाई ॥४॥

मनु सबदि मरै ता मुकतो होवै हरि चरणी चितु लाई ॥ हरि सरु सागरु सदा जलु निरमलु नावै सहजि सुभाई ॥५॥

सबदु वीचारि सदा रंगि राते हउमै त्रिसना मारी ॥ अंतरि निहकेवलु हरि रविआ सभु आतम रामु मुरारी ॥६॥

सेवक सेवि रहे सचि राते जो तेरै मनि भाणे ॥ दुबिधा महलु न पावै जगि झूठी गुण अवगण न पछाणे ॥७॥

आपे मेलि लए अकथु कथीऐ सचु सबदु सचु बाणी ॥ नानक साचे सचि समाणे हरि का नामु वखाणी ॥८॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1233) सारग महला ३ ॥
मन मेरे हरि का नामु अति मीठा ॥ जनम जनम के किलविख भउ भंजन गुरमुखि एको डीठा ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि कोटंतर के पाप बिनासन हरि साचा मनि भाइआ ॥ हरि बिनु अवरु न सूझै दूजा सतिगुरि एकु बुझाइआ ॥१॥

प्रेम पदारथु जिन घटि वसिआ सहजे रहे समाई ॥ सबदि रते से रंगि चलूले राते सहजि सुभाई ॥२॥

रसना सबदु वीचारि रसि राती लाल भई रंगु लाई ॥ राम नामु निहकेवलु जाणिआ मनु त्रिपतिआ सांति आई ॥३॥

पंडित पड़्हि पड़्हि मोनी सभि थाके भ्रमि भेख थके भेखधारी ॥ गुर परसादि निरंजनु पाइआ साचै सबदि वीचारी ॥४॥

आवा गउणु निवारि सचि राते साच सबदु मनि भाइआ ॥ सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाईऐ जिनि विचहु आपु गवाइआ ॥५॥

साचै सबदि सहज धुनि उपजै मनि साचै लिव लाई ॥ अगम अगोचरु नामु निरंजनु गुरमुखि मंनि वसाई ॥६॥

एकस महि सभु जगतो वरतै विरला एकु पछाणै ॥ सबदि मरै ता सभु किछु सूझै अनदिनु एको जाणै ॥७॥

जिस नो नदरि करे सोई जनु बूझै होरु कहणा कथनु न जाई ॥ नानक नामि रते सदा बैरागी एक सबदि लिव लाई ॥८॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1234) सारग महला ३ ॥
मन मेरे हरि की अकथ कहाणी ॥ हरि नदरि करे सोई जनु पाए गुरमुखि विरलै जाणी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि गहिर ग्मभीरु गुणी गहीरु गुर कै सबदि पछानिआ ॥ बहु बिधि करम करहि भाइ दूजै बिनु सबदै बउरानिआ ॥१॥

हरि नामि नावै सोई जनु निरमलु फिरि मैला मूलि न होई ॥ नाम बिना सभु जगु है मैला दूजै भरमि पति खोई ॥२॥

किआ द्रिड़ां किआ संग्रहि तिआगी मै ता बूझ न पाई ॥ होहि दइआलु क्रिपा करि हरि जीउ नामो होइ सखाई ॥३॥

सचा सचु दाता करम बिधाता जिसु भावै तिसु नाइ लाए ॥ गुरू दुआरै सोई बूझै जिस नो आपि बुझाए ॥४॥

देखि बिसमादु इहु मनु नही चेते आवा गउणु संसारा ॥ सतिगुरु सेवे सोई बूझै पाए मोख दुआरा ॥५॥

जिन्ह दरु सूझै से कदे न विगाड़हि सतिगुरि बूझ बुझाई ॥ सचु संजमु करणी किरति कमावहि आवण जाणु रहाई ॥६॥

से दरि साचै साचु कमावहि जिन गुरमुखि साचु अधारा ॥ मनमुख दूजै भरमि भुलाए ना बूझहि वीचारा ॥७॥

आपे गुरमुखि आपे देवै आपे करि करि वेखै ॥ नानक से जन थाइ पए है जिन की पति पावै लेखै ॥८॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1235) सारग महला ५ असटपदीआ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुसाईं परतापु तुहारो डीठा ॥ करन करावन उपाइ समावन सगल छत्रपति बीठा ॥१॥ रहाउ ॥

राणा राउ राज भए रंका उनि झूठे कहणु कहाइओ ॥ हमरा राजनु सदा सलामति ता को सगल घटा जसु गाइओ ॥१॥

उपमा सुनहु राजन की संतहु कहत जेत पाहूचा ॥ बेसुमार वड साह दातारा ऊचे ही ते ऊचा ॥२॥

पवनि परोइओ सगल अकारा पावक कासट संगे ॥ नीरु धरणि करि राखे एकत कोइ न किस ही संगे ॥३॥

घटि घटि कथा राजन की चालै घरि घरि तुझहि उमाहा ॥ जीअ जंत सभि पाछै करिआ प्रथमे रिजकु समाहा ॥४॥

जो किछु करणा सु आपे करणा मसलति काहू दीन्ही ॥ अनिक जतन करि करह दिखाए साची साखी चीन्ही ॥५॥

हरि भगता करि राखे अपने दीनी नामु वडाई ॥ जिनि जिनि करी अवगिआ जन की ते तैं दीए रुड़्हाई ॥६॥

मुकति भए साधसंगति करि तिन के अवगन सभि परहरिआ ॥ तिन कउ देखि भए किरपाला तिन भव सागरु तरिआ ॥७॥

हम नान्हे नीच तुम्हे बड साहिब कुदरति कउण बीचारा ॥ मनु तनु सीतलु गुर दरस देखे नानक नामु अधारा ॥८॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1235) सारग महला ५ असटपदी घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अगम अगाधि सुनहु जन कथा ॥ पारब्रहम की अचरज सभा ॥१॥ रहाउ ॥

सदा सदा सतिगुर नमसकार ॥ गुर किरपा ते गुन गाइ अपार ॥ मन भीतरि होवै परगासु ॥ गिआन अंजनु अगिआन बिनासु ॥१॥

मिति नाही जा का बिसथारु ॥ सोभा ता की अपर अपार ॥ अनिक रंग जा के गने न जाहि ॥ सोग हरख दुहहू महि नाहि ॥२॥

अनिक ब्रहमे जा के बेद धुनि करहि ॥ अनिक महेस बैसि धिआनु धरहि ॥ अनिक पुरख अंसा अवतार ॥ अनिक इंद्र ऊभे दरबार ॥३॥

अनिक पवन पावक अरु नीर ॥ अनिक रतन सागर दधि खीर ॥ अनिक सूर ससीअर नखिआति ॥ अनिक देवी देवा बहु भांति ॥४॥

अनिक बसुधा अनिक कामधेन ॥ अनिक पारजात अनिक मुखि बेन ॥ अनिक अकास अनिक पाताल ॥ अनिक मुखी जपीऐ गोपाल ॥५॥

अनिक सासत्र सिम्रिति पुरान ॥ अनिक जुगति होवत बखिआन ॥ अनिक सरोते सुनहि निधान ॥ सरब जीअ पूरन भगवान ॥६॥

अनिक धरम अनिक कुमेर ॥ अनिक बरन अनिक कनिक सुमेर ॥ अनिक सेख नवतन नामु लेहि ॥ पारब्रहम का अंतु न तेहि ॥७॥

अनिक पुरीआ अनिक तह खंड ॥ अनिक रूप रंग ब्रहमंड ॥ अनिक बना अनिक फल मूल ॥ आपहि सूखम आपहि असथूल ॥८॥

अनिक जुगादि दिनस अरु राति ॥ अनिक परलउ अनिक उतपाति ॥ अनिक जीअ जा के ग्रिह माहि ॥ रमत राम पूरन स्रब ठांइ ॥९॥

अनिक माइआ जा की लखी न जाइ ॥ अनिक कला खेलै हरि राइ ॥ अनिक धुनित ललित संगीत ॥ अनिक गुपत प्रगटे तह चीत ॥१०॥

सभ ते ऊच भगत जा कै संगि ॥ आठ पहर गुन गावहि रंगि ॥ अनिक अनाहद आनंद झुनकार ॥ उआ रस का कछु अंतु न पार ॥११॥

सति पुरखु सति असथानु ॥ ऊच ते ऊच निरमल निरबानु ॥ अपुना कीआ जानहि आपि ॥ आपे घटि घटि रहिओ बिआपि ॥ क्रिपा निधान नानक दइआल ॥ जिनि जपिआ नानक ते भए निहाल ॥१२॥१॥२॥२॥३॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1236) सारग छंत महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभ देखीऐ अनभै का दाता ॥ घटि घटि पूरन है अलिपाता ॥ घटि घटि पूरनु करि बिसथीरनु जल तरंग जिउ रचनु कीआ ॥ हभि रस माणे भोग घटाणे आन न बीआ को थीआ ॥ हरि रंगी इक रंगी ठाकुरु संतसंगि प्रभु जाता ॥ नानक दरसि लीना जिउ जल मीना सभ देखीऐ अनभै का दाता ॥१॥

कउन उपमा देउ कवन बडाई ॥ पूरन पूरि रहिओ स्रब ठाई ॥ पूरन मनमोहन घट घट सोहन जब खिंचै तब छाई ॥ किउ न अराधहु मिलि करि साधहु घरी मुहतक बेला आई ॥ अरथु दरबु सभु जो किछु दीसै संगि न कछहू जाई ॥ कहु नानक हरि हरि आराधहु कवन उपमा देउ कवन बडाई ॥२॥

पूछउ संत मेरो ठाकुरु कैसा ॥ हींउ अरापउं देहु सदेसा ॥ देहु सदेसा प्रभ जीउ कैसा कह मोहन परवेसा ॥ अंग अंग सुखदाई पूरन ब्रहमाई थान थानंतर देसा ॥ बंधन ते मुकता घटि घटि जुगता कहि न सकउ हरि जैसा ॥ देखि चरित नानक मनु मोहिओ पूछै दीनु मेरो ठाकुरु कैसा ॥३॥

करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥ धंनि सु रिदा जिह चरन बसाइआ ॥ चरन बसाइआ संत संगाइआ अगिआन अंधेरु गवाइआ ॥ भइआ प्रगासु रिदै उलासु प्रभु लोड़ीदा पाइआ ॥ दुखु नाठा सुखु घर महि वूठा महा अनंद सहजाइआ ॥ कहु नानक मै पूरा पाइआ करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1237) सारंग की वार महला ४ राइ महमे हसने की धुनि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 1237) सलोक महला २ ॥
गुरु कुंजी पाहू निवलु मनु कोठा तनु छति ॥ नानक गुर बिनु मन का ताकु न उघड़ै अवर न कुंजी हथि ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1237) महला १ ॥
न भीजै रागी नादी बेदि ॥ न भीजै सुरती गिआनी जोगि ॥ न भीजै सोगी कीतै रोजि ॥ न भीजै रूपीं मालीं रंगि ॥ न भीजै तीरथि भविऐ नंगि ॥ न भीजै दातीं कीतै पुंनि ॥ न भीजै बाहरि बैठिआ सुंनि ॥ न भीजै भेड़ि मरहि भिड़ि सूर ॥ न भीजै केते होवहि धूड़ ॥ लेखा लिखीऐ मन कै भाइ ॥ नानक भीजै साचै नाइ ॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1237) महला १ ॥
नव छिअ खट का करे बीचारु ॥ निसि दिन उचरै भार अठार ॥ तिनि भी अंतु न पाइआ तोहि ॥ नाम बिहूण मुकति किउ होइ ॥ नाभि वसत ब्रहमै अंतु न जाणिआ ॥ गुरमुखि नानक नामु पछाणिआ ॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1237) पउड़ी ॥
आपे आपि निरंजना जिनि आपु उपाइआ ॥ आपे खेलु रचाइओनु सभु जगतु सबाइआ ॥ त्रै गुण आपि सिरजिअनु माइआ मोहु वधाइआ ॥ गुर परसादी उबरे जिन भाणा भाइआ ॥ नानक सचु वरतदा सभ सचि समाइआ ॥१॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 1238) सलोक महला २ ॥
आपि उपाए नानका आपे रखै वेक ॥ मंदा किस नो आखीऐ जां सभना साहिबु एकु ॥ सभना साहिबु एकु है वेखै धंधै लाइ ॥ किसै थोड़ा किसै अगला खाली कोई नाहि ॥ आवहि नंगे जाहि नंगे विचे करहि विथार ॥ नानक हुकमु न जाणीऐ अगै काई कार ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1238) महला १ ॥
जिनसि थापि जीआं कउ भेजै जिनसि थापि लै जावै ॥ आपे थापि उथापै आपे एते वेस करावै ॥ जेते जीअ फिरहि अउधूती आपे भिखिआ पावै ॥ लेखै बोलणु लेखै चलणु काइतु कीचहि दावे ॥ मूलु मति परवाणा एहो नानकु आखि सुणाए ॥ करणी उपरि होइ तपावसु जे को कहै कहाए ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1238) पउड़ी ॥
गुरमुखि चलतु रचाइओनु गुण परगटी आइआ ॥ गुरबाणी सद उचरै हरि मंनि वसाइआ ॥ सकति गई भ्रमु कटिआ सिव जोति जगाइआ ॥ जिन कै पोतै पुंनु है गुरु पुरखु मिलाइआ ॥ नानक सहजे मिलि रहे हरि नामि समाइआ ॥२॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 1238) सलोक महला २ ॥
साह चले वणजारिआ लिखिआ देवै नालि ॥ लिखे उपरि हुकमु होइ लईऐ वसतु सम्हालि ॥ वसतु लई वणजारई वखरु बधा पाइ ॥ केई लाहा लै चले इकि चले मूलु गवाइ ॥ थोड़ा किनै न मंगिओ किसु कहीऐ साबासि ॥ नदरि तिना कउ नानका जि साबतु लाए रासि ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1238) महला १ ॥
जुड़ि जुड़ि विछुड़े विछुड़ि जुड़े ॥ जीवि जीवि मुए मुए जीवे ॥ केतिआ के बाप केतिआ के बेटे केते गुर चेले हूए ॥ आगै पाछै गणत न आवै किआ जाती किआ हुणि हूए ॥ सभु करणा किरतु करि लिखीऐ करि करि करता करे करे ॥ मनमुखि मरीऐ गुरमुखि तरीऐ नानक नदरी नदरि करे ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1238) पउड़ी ॥
मनमुखि दूजा भरमु है दूजै लोभाइआ ॥ कूड़ु कपटु कमावदे कूड़ो आलाइआ ॥ पुत्र कलत्रु मोहु हेतु है सभु दुखु सबाइआ ॥ जम दरि बधे मारीअहि भरमहि भरमाइआ ॥ मनमुखि जनमु गवाइआ नानक हरि भाइआ ॥३॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 1238) सलोक महला २ ॥
जिन वडिआई तेरे नाम की ते रते मन माहि ॥ नानक अम्रितु एकु है दूजा अम्रितु नाहि ॥ नानक अम्रितु मनै माहि पाईऐ गुर परसादि ॥ तिन्ही पीता रंग सिउ जिन्ह कउ लिखिआ आदि ॥१॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 1239) महला २ ॥
कीता किआ सालाहीऐ करे सोइ सालाहि ॥ नानक एकी बाहरा दूजा दाता नाहि ॥ करता सो सालाहीऐ जिनि कीता आकारु ॥ दाता सो सालाहीऐ जि सभसै दे आधारु ॥ नानक आपि सदीव है पूरा जिसु भंडारु ॥ वडा करि सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1239) पउड़ी ॥
हरि का नामु निधानु है सेविऐ सुखु पाई ॥ नामु निरंजनु उचरां पति सिउ घरि जांई ॥ गुरमुखि बाणी नामु है नामु रिदै वसाई ॥ मति पंखेरू वसि होइ सतिगुरू धिआईं ॥ नानक आपि दइआलु होइ नामे लिव लाई ॥४॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 1239) सलोक महला २ ॥
तिसु सिउ कैसा बोलणा जि आपे जाणै जाणु ॥ चीरी जा की ना फिरै साहिबु सो परवाणु ॥ चीरी जिस की चलणा मीर मलक सलार ॥ जो तिसु भावै नानका साई भली कार ॥ जिन्हा चीरी चलणा हथि तिन्हा किछु नाहि ॥ साहिब का फुरमाणु होइ उठी करलै पाहि ॥ जेहा चीरी लिखिआ तेहा हुकमु कमाहि ॥ घले आवहि नानका सदे उठी जाहि ॥१॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 1239) महला २ ॥
सिफति जिना कउ बखसीऐ सेई पोतेदार ॥ कुंजी जिन कउ दितीआ तिन्हा मिले भंडार ॥ जह भंडारी हू गुण निकलहि ते कीअहि परवाणु ॥ नदरि तिन्हा कउ नानका नामु जिन्हा नीसाणु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1239) पउड़ी ॥
नामु निरंजनु निरमला सुणिऐ सुखु होई ॥ सुणि सुणि मंनि वसाईऐ बूझै जनु कोई ॥ बहदिआ उठदिआ न विसरै साचा सचु सोई ॥ भगता कउ नाम अधारु है नामे सुखु होई ॥ नानक मनि तनि रवि रहिआ गुरमुखि हरि सोई ॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1239) सलोक महला १ ॥
नानक तुलीअहि तोल जे जीउ पिछै पाईऐ ॥ इकसु न पुजहि बोल जे पूरे पूरा करि मिलै ॥ वडा आखणु भारा तोलु ॥ होर हउली मती हउले बोल ॥ धरती पाणी परबत भारु ॥ किउ कंडै तोलै सुनिआरु ॥ तोला मासा रतक पाइ ॥ नानक पुछिआ देइ पुजाइ ॥ मूरख अंधिआ अंधी धातु ॥ कहि कहि कहणु कहाइनि आपु ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1239) महला १ ॥
आखणि अउखा सुनणि अउखा आखि न जापी आखि ॥ इकि आखि आखहि सबदु भाखहि अरध उरध दिनु राति ॥ जे किहु होइ त किहु दिसै जापै रूपु न जाति ॥ सभि कारण करता करे घट अउघट घट थापि ॥ आखणि अउखा नानका आखि न जापै आखि ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1240) पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ मनु रहसीऐ नामे सांति आई ॥ नाइ सुणिऐ मनु त्रिपतीऐ सभ दुख गवाई ॥ नाइ सुणिऐ नाउ ऊपजै नामे वडिआई ॥ नामे ही सभ जाति पति नामे गति पाई ॥ गुरमुखि नामु धिआईऐ नानक लिव लाई ॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1240) सलोक महला १ ॥
जूठि न रागीं जूठि न वेदीं ॥ जूठि न चंद सूरज की भेदी ॥ जूठि न अंनी जूठि न नाई ॥ जूठि न मीहु वर्हिऐ सभ थाई ॥ जूठि न धरती जूठि न पाणी ॥ जूठि न पउणै माहि समाणी ॥ नानक निगुरिआ गुणु नाही कोइ ॥ मुहि फेरिऐ मुहु जूठा होइ ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1240) महला १ ॥
नानक चुलीआ सुचीआ जे भरि जाणै कोइ ॥ सुरते चुली गिआन की जोगी का जतु होइ ॥ ब्रहमण चुली संतोख की गिरही का सतु दानु ॥ राजे चुली निआव की पड़िआ सचु धिआनु ॥ पाणी चितु न धोपई मुखि पीतै तिख जाइ ॥ पाणी पिता जगत का फिरि पाणी सभु खाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1240) पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ सभ सिधि है रिधि पिछै आवै ॥ नाइ सुणिऐ नउ निधि मिलै मन चिंदिआ पावै ॥ नाइ सुणिऐ संतोखु होइ कवला चरन धिआवै ॥ नाइ सुणिऐ सहजु ऊपजै सहजे सुखु पावै ॥ गुरमती नाउ पाईऐ नानक गुण गावै ॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1240) सलोक महला १ ॥
दुख विचि जमणु दुखि मरणु दुखि वरतणु संसारि ॥ दुखु दुखु अगै आखीऐ पड़्हि पड़्हि करहि पुकार ॥ दुख कीआ पंडा खुल्हीआ सुखु न निकलिओ कोइ ॥ दुख विचि जीउ जलाइआ दुखीआ चलिआ रोइ ॥ नानक सिफती रतिआ मनु तनु हरिआ होइ ॥ दुख कीआ अगी मारीअहि भी दुखु दारू होइ ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1240) महला १ ॥
नानक दुनीआ भसु रंगु भसू हू भसु खेह ॥ भसो भसु कमावणी भी भसु भरीऐ देह ॥ जा जीउ विचहु कढीऐ भसू भरिआ जाइ ॥ अगै लेखै मंगिऐ होर दसूणी पाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1240) पउड़ी ॥
नाइ सुणिऐ सुचि संजमो जमु नेड़ि न आवै ॥ नाइ सुणिऐ घटि चानणा आन्हेरु गवावै ॥ नाइ सुणिऐ आपु बुझीऐ लाहा नाउ पावै ॥ नाइ सुणिऐ पाप कटीअहि निरमल सचु पावै ॥ नानक नाइ सुणिऐ मुख उजले नाउ गुरमुखि धिआवै ॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1240) सलोक महला १ ॥
घरि नाराइणु सभा नालि ॥ पूज करे रखै नावालि ॥ कुंगू चंनणु फुल चड़ाए ॥ पैरी पै पै बहुतु मनाए ॥ माणूआ मंगि मंगि पैन्है खाइ ॥ अंधी कमी अंध सजाइ ॥ भुखिआ देइ न मरदिआ रखै ॥ अंधा झगड़ा अंधी सथै ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1241) महला १ ॥
सभे सुरती जोग सभि सभे बेद पुराण ॥ सभे करणे तप सभि सभे गीत गिआन ॥ सभे बुधी सुधि सभि सभि तीरथ सभि थान ॥ सभि पातिसाहीआ अमर सभि सभि खुसीआ सभि खान ॥ सभे माणस देव सभि सभे जोग धिआन ॥ सभे पुरीआ खंड सभि सभे जीअ जहान ॥ हुकमि चलाए आपणै करमी वहै कलाम ॥ नानक सचा सचि नाइ सचु सभा दीबानु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1241) पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ सुखु ऊपजै नामे गति होई ॥ नाइ मंनिऐ पति पाईऐ हिरदै हरि सोई ॥ नाइ मंनिऐ भवजलु लंघीऐ फिरि बिघनु न होई ॥ नाइ मंनिऐ पंथु परगटा नामे सभ लोई ॥ नानक सतिगुरि मिलिऐ नाउ मंनीऐ जिन देवै सोई ॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1241) सलोक मः १ ॥
पुरीआ खंडा सिरि करे इक पैरि धिआए ॥ पउणु मारि मनि जपु करे सिरु मुंडी तलै देइ ॥ किसु उपरि ओहु टिक टिकै किस नो जोरु करेइ ॥ किस नो कहीऐ नानका किस नो करता देइ ॥ हुकमि रहाए आपणै मूरखु आपु गणेइ ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1241) मः १ ॥
है है आखां कोटि कोटि कोटी हू कोटि कोटि ॥ आखूं आखां सदा सदा कहणि न आवै तोटि ॥ ना हउ थकां न ठाकीआ एवड रखहि जोति ॥ नानक चसिअहु चुख बिंद उपरि आखणु दोसु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1241) पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ कुलु उधरै सभु कुट्मबु सबाइआ ॥ नाइ मंनिऐ संगति उधरै जिन रिदै वसाइआ ॥ नाइ मंनिऐ सुणि उधरे जिन रसन रसाइआ ॥ नाइ मंनिऐ दुख भुख गई जिन नामि चितु लाइआ ॥ नानक नामु तिनी सालाहिआ जिन गुरू मिलाइआ ॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1241) सलोक मः १ ॥
सभे राती सभि दिह सभि थिती सभि वार ॥ सभे रुती माह सभि सभि धरतीं सभि भार ॥ सभे पाणी पउण सभि सभि अगनी पाताल ॥ सभे पुरीआ खंड सभि सभि लोअ लोअ आकार ॥ हुकमु न जापी केतड़ा कहि न सकीजै कार ॥ आखहि थकहि आखि आखि करि सिफतीं वीचार ॥ त्रिणु न पाइओ बपुड़ी नानकु कहै गवार ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1241) मः १ ॥
अखीं परणै जे फिरां देखां सभु आकारु ॥ पुछा गिआनी पंडितां पुछा बेद बीचार ॥ पुछा देवां माणसां जोध करहि अवतार ॥ सिध समाधी सभि सुणी जाइ देखां दरबारु ॥ अगै सचा सचि नाइ निरभउ भै विणु सारु ॥ होर कची मती कचु पिचु अंधिआ अंधु बीचारु ॥ नानक करमी बंदगी नदरि लंघाए पारि ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1242) पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ दुरमति गई मति परगटी आइआ ॥ नाउ मंनिऐ हउमै गई सभि रोग गवाइआ ॥ नाइ मंनिऐ नामु ऊपजै सहजे सुखु पाइआ ॥ नाइ मंनिऐ सांति ऊपजै हरि मंनि वसाइआ ॥ नानक नामु रतंनु है गुरमुखि हरि धिआइआ ॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1242) सलोक मः १ ॥
होरु सरीकु होवै कोई तेरा तिसु अगै तुधु आखां ॥ तुधु अगै तुधै सालाही मै अंधे नाउ सुजाखा ॥ जेता आखणु साही सबदी भाखिआ भाइ सुभाई ॥ नानक बहुता एहो आखणु सभ तेरी वडिआई ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1242) मः १ ॥
जां न सिआ किआ चाकरी जां जमे किआ कार ॥ सभि कारण करता करे देखै वारो वार ॥ जे चुपै जे मंगिऐ दाति करे दातारु ॥ इकु दाता सभि मंगते फिरि देखहि आकारु ॥ नानक एवै जाणीऐ जीवै देवणहारु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1242) पउड़ी ॥
नाइ मंनिऐ सुरति ऊपजै नामे मति होई ॥ नाइ मंनिऐ गुण उचरै नामे सुखि सोई ॥ नाइ मंनिऐ भ्रमु कटीऐ फिरि दुखु न होई ॥ नाइ मंनिऐ सालाहीऐ पापां मति धोई ॥ नानक पूरे गुर ते नाउ मंनीऐ जिन देवै सोई ॥१२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1242) सलोक मः १ ॥
सासत्र बेद पुराण पड़्हंता ॥ पूकारंता अजाणंता ॥ जां बूझै तां सूझै सोई ॥ नानकु आखै कूक न होई ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1242) मः १ ॥
जां हउ तेरा तां सभु किछु मेरा हउ नाही तू होवहि ॥ आपे सकता आपे सुरता सकती जगतु परोवहि ॥ आपे भेजे आपे सदे रचना रचि रचि वेखै ॥ नानक सचा सची नांई सचु पवै धुरि लेखै ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1242) पउड़ी ॥
नामु निरंजन अलखु है किउ लखिआ जाई ॥ नामु निरंजन नालि है किउ पाईऐ भाई ॥ नामु निरंजन वरतदा रविआ सभ ठांई ॥ गुर पूरे ते पाईऐ हिरदै देइ दिखाई ॥ नानक नदरी करमु होइ गुर मिलीऐ भाई ॥१३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1242) सलोक मः १ ॥
कलि होई कुते मुही खाजु होआ मुरदारु ॥ कूड़ु बोलि बोलि भउकणा चूका धरमु बीचारु ॥ जिन जीवंदिआ पति नही मुइआ मंदी सोइ ॥ लिखिआ होवै नानका करता करे सु होइ ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1243) मः १ ॥
रंना होईआ बोधीआ पुरस होए सईआद ॥ सीलु संजमु सुच भंनी खाणा खाजु अहाजु ॥ सरमु गइआ घरि आपणै पति उठि चली नालि ॥ नानक सचा एकु है अउरु न सचा भालि ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1243) पउड़ी ॥
बाहरि भसम लेपन करे अंतरि गुबारी ॥ खिंथा झोली बहु भेख करे दुरमति अहंकारी ॥ साहिब सबदु न ऊचरै माइआ मोह पसारी ॥ अंतरि लालचु भरमु है भरमै गावारी ॥ नानक नामु न चेतई जूऐ बाजी हारी ॥१४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1243) सलोक मः १ ॥
लख सिउ प्रीति होवै लख जीवणु किआ खुसीआ किआ चाउ ॥ विछुड़िआ विसु होइ विछोड़ा एक घड़ी महि जाइ ॥ जे सउ वर्हिआ मिठा खाजै भी फिरि कउड़ा खाइ ॥ मिठा खाधा चिति न आवै कउड़तणु धाइ जाइ ॥ मिठा कउड़ा दोवै रोग ॥ नानक अंति विगुते भोग ॥ झखि झखि झखणा झगड़ा झाख ॥ झखि झखि जाहि झखहि तिन्ह पासि ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1243) मः १ ॥
कापड़ु काठु रंगाइआ रांगि ॥ घर गच कीते बागे बाग ॥ साद सहज करि मनु खेलाइआ ॥ तै सह पासहु कहणु कहाइआ ॥ मिठा करि कै कउड़ा खाइआ ॥ तिनि कउड़ै तनि रोगु जमाइआ ॥ जे फिरि मिठा पेड़ै पाइ ॥ तउ कउड़तणु चूकसि माइ ॥ नानक गुरमुखि पावै सोइ ॥ जिस नो प्रापति लिखिआ होइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1243) पउड़ी ॥
जिन कै हिरदै मैलु कपटु है बाहरु धोवाइआ ॥ कूड़ु कपटु कमावदे कूड़ु परगटी आइआ ॥ अंदरि होइ सु निकलै नह छपै छपाइआ ॥ कूड़ै लालचि लगिआ फिरि जूनी पाइआ ॥ नानक जो बीजै सो खावणा करतै लिखि पाइआ ॥१५॥

(गुरू अंगद देव जी -- SGGS 1243) सलोक मः २ ॥
कथा कहाणी बेदीं आणी पापु पुंनु बीचारु ॥ दे दे लैणा लै लै देणा नरकि सुरगि अवतार ॥ उतम मधिम जातीं जिनसी भरमि भवै संसारु ॥ अम्रित बाणी ततु वखाणी गिआन धिआन विचि आई ॥ गुरमुखि आखी गुरमुखि जाती सुरतीं करमि धिआई ॥ हुकमु साजि हुकमै विचि रखै हुकमै अंदरि वेखै ॥ नानक अगहु हउमै तुटै तां को लिखीऐ लेखै ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1243) मः १ ॥
बेदु पुकारे पुंनु पापु सुरग नरक का बीउ ॥ जो बीजै सो उगवै खांदा जाणै जीउ ॥ गिआनु सलाहे वडा करि सचो सचा नाउ ॥ सचु बीजै सचु उगवै दरगह पाईऐ थाउ ॥ बेदु वपारी गिआनु रासि करमी पलै होइ ॥ नानक रासी बाहरा लदि न चलिआ कोइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1244) पउड़ी ॥
निमु बिरखु बहु संचीऐ अम्रित रसु पाइआ ॥ बिसीअरु मंत्रि विसाहीऐ बहु दूधु पीआइआ ॥ मनमुखु अभिंनु न भिजई पथरु नावाइआ ॥ बिखु महि अम्रितु सिंचीऐ बिखु का फलु पाइआ ॥ नानक संगति मेलि हरि सभ बिखु लहि जाइआ ॥१६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1244) सलोक मः १ ॥
मरणि न मूरतु पुछिआ पुछी थिति न वारु ॥ इकन्ही लदिआ इकि लदि चले इकन्ही बधे भार ॥ इकन्हा होई साखती इकन्हा होई सार ॥ लसकर सणै दमामिआ छुटे बंक दुआर ॥ नानक ढेरी छारु की भी फिरि होई छार ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1244) मः १ ॥
नानक ढेरी ढहि पई मिटी संदा कोटु ॥ भीतरि चोरु बहालिआ खोटु वे जीआ खोटु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1244) पउड़ी ॥
जिन अंदरि निंदा दुसटु है नक वढे नक वढाइआ ॥ महा करूप दुखीए सदा काले मुह माइआ ॥ भलके उठि नित पर दरबु हिरहि हरि नामु चुराइआ ॥ हरि जीउ तिन की संगति मत करहु रखि लेहु हरि राइआ ॥ नानक पइऐ किरति कमावदे मनमुखि दुखु पाइआ ॥१७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1244) सलोक मः ४ ॥
सभु कोई है खसम का खसमहु सभु को होइ ॥ हुकमु पछाणै खसम का ता सचु पावै कोइ ॥ गुरमुखि आपु पछाणीऐ बुरा न दीसै कोइ ॥ नानक गुरमुखि नामु धिआईऐ सहिला आइआ सोइ ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1244) मः ४ ॥
सभना दाता आपि है आपे मेलणहारु ॥ नानक सबदि मिले न विछुड़हि जिना सेविआ हरि दातारु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1244) पउड़ी ॥
गुरमुखि हिरदै सांति है नाउ उगवि आइआ ॥ जप तप तीरथ संजम करे मेरे प्रभ भाइआ ॥ हिरदा सुधु हरि सेवदे सोहहि गुण गाइआ ॥ मेरे हरि जीउ एवै भावदा गुरमुखि तराइआ ॥ नानक गुरमुखि मेलिअनु हरि दरि सोहाइआ ॥१८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1244) सलोक मः १ ॥
धनवंता इव ही कहै अवरी धन कउ जाउ ॥ नानकु निरधनु तितु दिनि जितु दिनि विसरै नाउ ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1244) मः १ ॥
सूरजु चड़ै विजोगि सभसै घटै आरजा ॥ तनु मनु रता भोगि कोई हारै को जिणै ॥ सभु को भरिआ फूकि आखणि कहणि न थम्हीऐ ॥ नानक वेखै आपि फूक कढाए ढहि पवै ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1244) पउड़ी ॥
सतसंगति नामु निधानु है जिथहु हरि पाइआ ॥ गुर परसादी घटि चानणा आन्हेरु गवाइआ ॥ लोहा पारसि भेटीऐ कंचनु होइ आइआ ॥ नानक सतिगुरि मिलिऐ नाउ पाईऐ मिलि नामु धिआइआ ॥ जिन्ह कै पोतै पुंनु है तिन्ही दरसनु पाइआ ॥१९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1245) सलोक मः १ ॥
ध्रिगु तिना का जीविआ जि लिखि लिखि वेचहि नाउ ॥ खेती जिन की उजड़ै खलवाड़े किआ थाउ ॥ सचै सरमै बाहरे अगै लहहि न दादि ॥ अकलि एह न आखीऐ अकलि गवाईऐ बादि ॥ अकली साहिबु सेवीऐ अकली पाईऐ मानु ॥ अकली पड़्हि कै बुझीऐ अकली कीचै दानु ॥ नानकु आखै राहु एहु होरि गलां सैतानु ॥१॥


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