Pt 8 - राग रामकली - बाणी शब्द, Part 8 - Raag Ramkali - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राइ बलवंडि / सतै डूमि -- SGGS 968) धंनु धंनु रामदास गुरु जिनि सिरिआ तिनै सवारिआ ॥ पूरी होई करामाति आपि सिरजणहारै धारिआ ॥ सिखी अतै संगती पारब्रहमु करि नमसकारिआ ॥ अटलु अथाहु अतोलु तू तेरा अंतु न पारावारिआ ॥ जिन्ही तूं सेविआ भाउ करि से तुधु पारि उतारिआ ॥ लबु लोभु कामु क्रोधु मोहु मारि कढे तुधु सपरवारिआ ॥ धंनु सु तेरा थानु है सचु तेरा पैसकारिआ ॥ नानकु तू लहणा तूहै गुरु अमरु तू वीचारिआ ॥ गुरु डिठा तां मनु साधारिआ ॥७॥

(राइ बलवंडि / सतै डूमि -- SGGS 968) चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ॥ आपीन्है आपु साजिओनु आपे ही थम्हि खलोआ ॥ आपे पटी कलम आपि आपि लिखणहारा होआ ॥ सभ उमति आवण जावणी आपे ही नवा निरोआ ॥ तखति बैठा अरजन गुरू सतिगुर का खिवै चंदोआ ॥ उगवणहु तै आथवणहु चहु चकी कीअनु लोआ ॥ जिन्ही गुरू न सेविओ मनमुखा पइआ मोआ ॥ दूणी चउणी करामाति सचे का सचा ढोआ ॥ चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ॥८॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 968) रामकली बाणी भगता की ॥ कबीर जीउ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काइआ कलालनि लाहनि मेलउ गुर का सबदु गुड़ु कीनु रे ॥ त्रिसना कामु क्रोधु मद मतसर काटि काटि कसु दीनु रे ॥१॥

कोई है रे संतु सहज सुख अंतरि जा कउ जपु तपु देउ दलाली रे ॥ एक बूंद भरि तनु मनु देवउ जो मदु देइ कलाली रे ॥१॥ रहाउ ॥

भवन चतुर दस भाठी कीन्ही ब्रहम अगनि तनि जारी रे ॥ मुद्रा मदक सहज धुनि लागी सुखमन पोचनहारी रे ॥२॥

तीरथ बरत नेम सुचि संजम रवि ससि गहनै देउ रे ॥ सुरति पिआल सुधा रसु अम्रितु एहु महा रसु पेउ रे ॥३॥

निझर धार चुऐ अति निरमल इह रस मनूआ रातो रे ॥ कहि कबीर सगले मद छूछे इहै महा रसु साचो रे ॥४॥१॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 969) गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि महूआ भउ भाठी मन धारा ॥ सुखमन नारी सहज समानी पीवै पीवनहारा ॥१॥

अउधू मेरा मनु मतवारा ॥ उनमद चढा मदन रसु चाखिआ त्रिभवन भइआ उजिआरा ॥१॥ रहाउ ॥

दुइ पुर जोरि रसाई भाठी पीउ महा रसु भारी ॥ कामु क्रोधु दुइ कीए जलेता छूटि गई संसारी ॥२॥

प्रगट प्रगास गिआन गुर गमित सतिगुर ते सुधि पाई ॥ दासु कबीरु तासु मद माता उचकि न कबहू जाई ॥३॥२॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 969) तूं मेरो मेरु परबतु सुआमी ओट गही मै तेरी ॥ ना तुम डोलहु ना हम गिरते रखि लीनी हरि मेरी ॥१॥

अब तब जब कब तुही तुही ॥ हम तुअ परसादि सुखी सद ही ॥१॥ रहाउ ॥

तोरे भरोसे मगहर बसिओ मेरे तन की तपति बुझाई ॥ पहिले दरसनु मगहर पाइओ फुनि कासी बसे आई ॥२॥

जैसा मगहरु तैसी कासी हम एकै करि जानी ॥ हम निरधन जिउ इहु धनु पाइआ मरते फूटि गुमानी ॥३॥

करै गुमानु चुभहि तिसु सूला को काढन कउ नाही ॥ अजै सु चोभ कउ बिलल बिलाते नरके घोर पचाही ॥४॥

कवनु नरकु किआ सुरगु बिचारा संतन दोऊ रादे ॥ हम काहू की काणि न कढते अपने गुर परसादे ॥५॥

अब तउ जाइ चढे सिंघासनि मिले है सारिंगपानी ॥ राम कबीरा एक भए है कोइ न सकै पछानी ॥६॥३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 969) संता मानउ दूता डानउ इह कुटवारी मेरी ॥ दिवस रैनि तेरे पाउ पलोसउ केस चवर करि फेरी ॥१॥

हम कूकर तेरे दरबारि ॥ भउकहि आगै बदनु पसारि ॥१॥ रहाउ ॥

पूरब जनम हम तुम्हरे सेवक अब तउ मिटिआ न जाई ॥ तेरे दुआरै धुनि सहज की माथै मेरे दगाई ॥२॥

दागे होहि सु रन महि जूझहि बिनु दागे भगि जाई ॥ साधू होइ सु भगति पछानै हरि लए खजानै पाई ॥३॥

कोठरे महि कोठरी परम कोठी बीचारि ॥ गुरि दीनी बसतु कबीर कउ लेवहु बसतु सम्हारि ॥४॥

कबीरि दीई संसार कउ लीनी जिसु मसतकि भागु ॥ अम्रित रसु जिनि पाइआ थिरु ता का सोहागु ॥५॥४॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 970) जिह मुख बेदु गाइत्री निकसै सो किउ ब्रहमनु बिसरु करै ॥ जा कै पाइ जगतु सभु लागै सो किउ पंडितु हरि न कहै ॥१॥

काहे मेरे बाम्हन हरि न कहहि ॥ रामु न बोलहि पाडे दोजकु भरहि ॥१॥ रहाउ ॥

आपन ऊच नीच घरि भोजनु हठे करम करि उदरु भरहि ॥ चउदस अमावस रचि रचि मांगहि कर दीपकु लै कूपि परहि ॥२॥

तूं ब्रहमनु मै कासीक जुलहा मुहि तोहि बराबरी कैसे कै बनहि ॥ हमरे राम नाम कहि उबरे बेद भरोसे पांडे डूबि मरहि ॥३॥५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 970) तरवरु एकु अनंत डार साखा पुहप पत्र रस भरीआ ॥ इह अम्रित की बाड़ी है रे तिनि हरि पूरै करीआ ॥१॥

जानी जानी रे राजा राम की कहानी ॥ अंतरि जोति राम परगासा गुरमुखि बिरलै जानी ॥१॥ रहाउ ॥

भवरु एकु पुहप रस बीधा बारह ले उर धरिआ ॥ सोरह मधे पवनु झकोरिआ आकासे फरु फरिआ ॥२॥

सहज सुंनि इकु बिरवा उपजिआ धरती जलहरु सोखिआ ॥ कहि कबीर हउ ता का सेवकु जिनि इहु बिरवा देखिआ ॥३॥६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 970) मुंद्रा मोनि दइआ करि झोली पत्र का करहु बीचारु रे ॥ खिंथा इहु तनु सीअउ अपना नामु करउ आधारु रे ॥१॥

ऐसा जोगु कमावहु जोगी ॥ जप तप संजमु गुरमुखि भोगी ॥१॥ रहाउ ॥

बुधि बिभूति चढावउ अपुनी सिंगी सुरति मिलाई ॥ करि बैरागु फिरउ तनि नगरी मन की किंगुरी बजाई ॥२॥

पंच ततु लै हिरदै राखहु रहै निरालम ताड़ी ॥ कहतु कबीरु सुनहु रे संतहु धरमु दइआ करि बाड़ी ॥३॥७॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 970) कवन काज सिरजे जग भीतरि जनमि कवन फलु पाइआ ॥ भव निधि तरन तारन चिंतामनि इक निमख न इहु मनु लाइआ ॥१॥

गोबिंद हम ऐसे अपराधी ॥ जिनि प्रभि जीउ पिंडु था दीआ तिस की भाउ भगति नही साधी ॥१॥ रहाउ ॥

पर धन पर तन पर ती निंदा पर अपबादु न छूटै ॥ आवा गवनु होतु है फुनि फुनि इहु परसंगु न तूटै ॥२॥

जिह घरि कथा होत हरि संतन इक निमख न कीन्हो मै फेरा ॥ ल्मपट चोर दूत मतवारे तिन संगि सदा बसेरा ॥३॥

काम क्रोध माइआ मद मतसर ए स्मपै मो माही ॥ दइआ धरमु अरु गुर की सेवा ए सुपनंतरि नाही ॥४॥

दीन दइआल क्रिपाल दमोदर भगति बछल भै हारी ॥ कहत कबीर भीर जन राखहु हरि सेवा करउ तुम्हारी ॥५॥८॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 971) जिह सिमरनि होइ मुकति दुआरु ॥ जाहि बैकुंठि नही संसारि ॥ निरभउ कै घरि बजावहि तूर ॥ अनहद बजहि सदा भरपूर ॥१॥

ऐसा सिमरनु करि मन माहि ॥ बिनु सिमरन मुकति कत नाहि ॥१॥ रहाउ ॥

जिह सिमरनि नाही ननकारु ॥ मुकति करै उतरै बहु भारु ॥ नमसकारु करि हिरदै माहि ॥ फिरि फिरि तेरा आवनु नाहि ॥२॥

जिह सिमरनि करहि तू केल ॥ दीपकु बांधि धरिओ बिनु तेल ॥ सो दीपकु अमरकु संसारि ॥ काम क्रोध बिखु काढीले मारि ॥३॥

जिह सिमरनि तेरी गति होइ ॥ सो सिमरनु रखु कंठि परोइ ॥ सो सिमरनु करि नही राखु उतारि ॥ गुर परसादी उतरहि पारि ॥४॥

जिह सिमरनि नाही तुहि कानि ॥ मंदरि सोवहि पट्मबर तानि ॥ सेज सुखाली बिगसै जीउ ॥ सो सिमरनु तू अनदिनु पीउ ॥५॥

जिह सिमरनि तेरी जाइ बलाइ ॥ जिह सिमरनि तुझु पोहै न माइ ॥ सिमरि सिमरि हरि हरि मनि गाईऐ ॥ इहु सिमरनु सतिगुर ते पाईऐ ॥६॥

सदा सदा सिमरि दिनु राति ॥ ऊठत बैठत सासि गिरासि ॥ जागु सोइ सिमरन रस भोग ॥ हरि सिमरनु पाईऐ संजोग ॥७॥

जिह सिमरनि नाही तुझु भार ॥ सो सिमरनु राम नाम अधारु ॥ कहि कबीर जा का नही अंतु ॥ तिस के आगे तंतु न मंतु ॥८॥९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 971) रामकली घरु २ बाणी कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बंधचि बंधनु पाइआ ॥ मुकतै गुरि अनलु बुझाइआ ॥ जब नख सिख इहु मनु चीन्हा ॥ तब अंतरि मजनु कीन्हा ॥१॥

पवनपति उनमनि रहनु खरा ॥ नही मिरतु न जनमु जरा ॥१॥ रहाउ ॥

उलटी ले सकति सहारं ॥ पैसीले गगन मझारं ॥ बेधीअले चक्र भुअंगा ॥ भेटीअले राइ निसंगा ॥२॥

चूकीअले मोह मइआसा ॥ ससि कीनो सूर गिरासा ॥ जब कु्मभकु भरिपुरि लीणा ॥ तह बाजे अनहद बीणा ॥३॥

बकतै बकि सबदु सुनाइआ ॥ सुनतै सुनि मंनि बसाइआ ॥ करि करता उतरसि पारं ॥ कहै कबीरा सारं ॥४॥१॥१०॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 972) चंदु सूरजु दुइ जोति सरूपु ॥ जोती अंतरि ब्रहमु अनूपु ॥१॥

करु रे गिआनी ब्रहम बीचारु ॥ जोती अंतरि धरिआ पसारु ॥१॥ रहाउ ॥

हीरा देखि हीरे करउ आदेसु ॥ कहै कबीरु निरंजन अलेखु ॥२॥२॥११॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 972) दुनीआ हुसीआर बेदार जागत मुसीअत हउ रे भाई ॥ निगम हुसीआर पहरूआ देखत जमु ले जाई ॥१॥ रहाउ ॥

नींबु भइओ आंबु आंबु भइओ नींबा केला पाका झारि ॥ नालीएर फलु सेबरि पाका मूरख मुगध गवार ॥१॥

हरि भइओ खांडु रेतु महि बिखरिओ हसतीं चुनिओ न जाई ॥ कहि कमीर कुल जाति पांति तजि चीटी होइ चुनि खाई ॥२॥३॥१२॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 972) बाणी नामदेउ जीउ की रामकली घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आनीले कागदु काटीले गूडी आकास मधे भरमीअले ॥ पंच जना सिउ बात बतऊआ चीतु सु डोरी राखीअले ॥१॥

मनु राम नामा बेधीअले ॥ जैसे कनिक कला चितु मांडीअले ॥१॥ रहाउ ॥

आनीले कु्मभु भराईले ऊदक राज कुआरि पुरंदरीए ॥ हसत बिनोद बीचार करती है चीतु सु गागरि राखीअले ॥२॥

मंदरु एकु दुआर दस जा के गऊ चरावन छाडीअले ॥ पांच कोस पर गऊ चरावत चीतु सु बछरा राखीअले ॥३॥

कहत नामदेउ सुनहु तिलोचन बालकु पालन पउढीअले ॥ अंतरि बाहरि काज बिरूधी चीतु सु बारिक राखीअले ॥४॥१॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 972) बेद पुरान सासत्र आनंता गीत कबित न गावउगो ॥ अखंड मंडल निरंकार महि अनहद बेनु बजावउगो ॥१॥

बैरागी रामहि गावउगो ॥ सबदि अतीत अनाहदि राता आकुल कै घरि जाउगो ॥१॥ रहाउ ॥

इड़ा पिंगुला अउरु सुखमना पउनै बंधि रहाउगो ॥ चंदु सूरजु दुइ सम करि राखउ ब्रहम जोति मिलि जाउगो ॥२॥

तीरथ देखि न जल महि पैसउ जीअ जंत न सतावउगो ॥ अठसठि तीरथ गुरू दिखाए घट ही भीतरि न्हाउगो ॥३॥

पंच सहाई जन की सोभा भलो भलो न कहावउगो ॥ नामा कहै चितु हरि सिउ राता सुंन समाधि समाउगो ॥४॥२॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 973) माइ न होती बापु न होता करमु न होती काइआ ॥ हम नही होते तुम नही होते कवनु कहां ते आइआ ॥१॥

राम कोइ न किस ही केरा ॥ जैसे तरवरि पंखि बसेरा ॥१॥ रहाउ ॥

चंदु न होता सूरु न होता पानी पवनु मिलाइआ ॥ सासतु न होता बेदु न होता करमु कहां ते आइआ ॥२॥

खेचर भूचर तुलसी माला गुर परसादी पाइआ ॥ नामा प्रणवै परम ततु है सतिगुर होइ लखाइआ ॥३॥३॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 973) रामकली घरु २ ॥
बानारसी तपु करै उलटि तीरथ मरै अगनि दहै काइआ कलपु कीजै ॥ असुमेध जगु कीजै सोना गरभ दानु दीजै राम नाम सरि तऊ न पूजै ॥१॥

छोडि छोडि रे पाखंडी मन कपटु न कीजै ॥ हरि का नामु नित नितहि लीजै ॥१॥ रहाउ ॥

गंगा जउ गोदावरि जाईऐ कु्मभि जउ केदार न्हाईऐ गोमती सहस गऊ दानु कीजै ॥ कोटि जउ तीरथ करै तनु जउ हिवाले गारै राम नाम सरि तऊ न पूजै ॥२॥

असु दान गज दान सिहजा नारी भूमि दान ऐसो दानु नित नितहि कीजै ॥ आतम जउ निरमाइलु कीजै आप बराबरि कंचनु दीजै राम नाम सरि तऊ न पूजै ॥३॥

मनहि न कीजै रोसु जमहि न दीजै दोसु निरमल निरबाण पदु चीन्हि लीजै ॥ जसरथ राइ नंदु राजा मेरा राम चंदु प्रणवै नामा ततु रसु अम्रितु पीजै ॥४॥४॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 973) रामकली बाणी रविदास जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पड़ीऐ गुनीऐ नामु सभु सुनीऐ अनभउ भाउ न दरसै ॥ लोहा कंचनु हिरन होइ कैसे जउ पारसहि न परसै ॥१॥

देव संसै गांठि न छूटै ॥ काम क्रोध माइआ मद मतसर इन पंचहु मिलि लूटे ॥१॥ रहाउ ॥

हम बड कबि कुलीन हम पंडित हम जोगी संनिआसी ॥ गिआनी गुनी सूर हम दाते इह बुधि कबहि न नासी ॥२॥

कहु रविदास सभै नही समझसि भूलि परे जैसे बउरे ॥ मोहि अधारु नामु नाराइन जीवन प्रान धन मोरे ॥३॥१॥

(भक्त बेणी जी -- SGGS 974) रामकली बाणी बेणी जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इड़ा पिंगुला अउर सुखमना तीनि बसहि इक ठाई ॥ बेणी संगमु तह पिरागु मनु मजनु करे तिथाई ॥१॥

संतहु तहा निरंजन रामु है ॥ गुर गमि चीनै बिरला कोइ ॥ तहां निरंजनु रमईआ होइ ॥१॥ रहाउ ॥

देव सथानै किआ नीसाणी ॥ तह बाजे सबद अनाहद बाणी ॥ तह चंदु न सूरजु पउणु न पाणी ॥ साखी जागी गुरमुखि जाणी ॥२॥

उपजै गिआनु दुरमति छीजै ॥ अम्रित रसि गगनंतरि भीजै ॥ एसु कला जो जाणै भेउ ॥ भेटै तासु परम गुरदेउ ॥३॥

दसम दुआरा अगम अपारा परम पुरख की घाटी ॥ ऊपरि हाटु हाट परि आला आले भीतरि थाती ॥४॥

जागतु रहै सु कबहु न सोवै ॥ तीनि तिलोक समाधि पलोवै ॥ बीज मंत्रु लै हिरदै रहै ॥ मनूआ उलटि सुंन महि गहै ॥५॥

जागतु रहै न अलीआ भाखै ॥ पाचउ इंद्री बसि करि राखै ॥ गुर की साखी राखै चीति ॥ मनु तनु अरपै क्रिसन परीति ॥६॥

कर पलव साखा बीचारे ॥ अपना जनमु न जूऐ हारे ॥ असुर नदी का बंधै मूलु ॥ पछिम फेरि चड़ावै सूरु ॥ अजरु जरै सु निझरु झरै ॥ जगंनाथ सिउ गोसटि करै ॥७॥

चउमुख दीवा जोति दुआर ॥ पलू अनत मूलु बिचकारि ॥ सरब कला ले आपे रहै ॥ मनु माणकु रतना महि गुहै ॥८॥

मसतकि पदमु दुआलै मणी ॥ माहि निरंजनु त्रिभवण धणी ॥ पंच सबद निरमाइल बाजे ॥ ढुलके चवर संख घन गाजे ॥ दलि मलि दैतहु गुरमुखि गिआनु ॥ बेणी जाचै तेरा नामु ॥९॥१॥


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