Pt 2 - राग रामकली - बाणी शब्द, Part 2 - Raag Ramkali - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 888) रामकली महला ५ ॥
पंच सबद तह पूरन नाद ॥ अनहद बाजे अचरज बिसमाद ॥ केल करहि संत हरि लोग ॥ पारब्रहम पूरन निरजोग ॥१॥

सूख सहज आनंद भवन ॥ साधसंगि बैसि गुण गावहि तह रोग सोग नही जनम मरन ॥१॥ रहाउ ॥

ऊहा सिमरहि केवल नामु ॥ बिरले पावहि ओहु बिस्रामु ॥ भोजनु भाउ कीरतन आधारु ॥ निहचल आसनु बेसुमारु ॥२॥

डिगि न डोलै कतहू न धावै ॥ गुर प्रसादि को इहु महलु पावै ॥ भ्रम भै मोह न माइआ जाल ॥ सुंन समाधि प्रभू किरपाल ॥३॥

ता का अंतु न पारावारु ॥ आपे गुपतु आपे पासारु ॥ जा कै अंतरि हरि हरि सुआदु ॥ कहनु न जाई नानक बिसमादु ॥४॥९॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 889) रामकली महला ५ ॥
भेटत संगि पारब्रहमु चिति आइआ ॥ संगति करत संतोखु मनि पाइआ ॥ संतह चरन माथा मेरो पउत ॥ अनिक बार संतह डंडउत ॥१॥

इहु मनु संतन कै बलिहारी ॥ जा की ओट गही सुखु पाइआ राखे किरपा धारी ॥१॥ रहाउ ॥

संतह चरण धोइ धोइ पीवा ॥ संतह दरसु पेखि पेखि जीवा ॥ संतह की मेरै मनि आस ॥ संत हमारी निरमल रासि ॥२॥

संत हमारा राखिआ पड़दा ॥ संत प्रसादि मोहि कबहू न कड़दा ॥ संतह संगु दीआ किरपाल ॥ संत सहाई भए दइआल ॥३॥

सुरति मति बुधि परगासु ॥ गहिर ग्मभीर अपार गुणतासु ॥ जीअ जंत सगले प्रतिपाल ॥ नानक संतह देखि निहाल ॥४॥१०॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 889) रामकली महला ५ ॥
तेरै काजि न ग्रिहु राजु मालु ॥ तेरै काजि न बिखै जंजालु ॥ इसट मीत जाणु सभ छलै ॥ हरि हरि नामु संगि तेरै चलै ॥१॥

राम नाम गुण गाइ ले मीता हरि सिमरत तेरी लाज रहै ॥ हरि सिमरत जमु कछु न कहै ॥१॥ रहाउ ॥

बिनु हरि सगल निरारथ काम ॥ सुइना रुपा माटी दाम ॥ गुर का सबदु जापि मन सुखा ॥ ईहा ऊहा तेरो ऊजल मुखा ॥२॥

करि करि थाके वडे वडेरे ॥ किन ही न कीए काज माइआ पूरे ॥ हरि हरि नामु जपै जनु कोइ ॥ ता की आसा पूरन होइ ॥३॥

हरि भगतन को नामु अधारु ॥ संती जीता जनमु अपारु ॥ हरि संतु करे सोई परवाणु ॥ नानक दासु ता कै कुरबाणु ॥४॥११॥२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 889) रामकली महला ५ ॥
सिंचहि दरबु देहि दुखु लोग ॥ तेरै काजि न अवरा जोग ॥ करि अहंकारु होइ वरतहि अंध ॥ जम की जेवड़ी तू आगै बंध ॥१॥

छाडि विडाणी ताति मूड़े ॥ ईहा बसना राति मूड़े ॥ माइआ के माते तै उठि चलना ॥ राचि रहिओ तू संगि सुपना ॥१॥ रहाउ ॥

बाल बिवसथा बारिकु अंध ॥ भरि जोबनि लागा दुरगंध ॥ त्रितीअ बिवसथा सिंचे माइ ॥ बिरधि भइआ छोडि चलिओ पछुताइ ॥२॥

चिरंकाल पाई द्रुलभ देह ॥ नाम बिहूणी होई खेह ॥ पसू परेत मुगध ते बुरी ॥ तिसहि न बूझै जिनि एह सिरी ॥३॥

सुणि करतार गोविंद गोपाल ॥ दीन दइआल सदा किरपाल ॥ तुमहि छडावहु छुटकहि बंध ॥ बखसि मिलावहु नानक जग अंध ॥४॥१२॥२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 890) रामकली महला ५ ॥
करि संजोगु बनाई काछि ॥ तिसु संगि रहिओ इआना राचि ॥ प्रतिपारै नित सारि समारै ॥ अंत की बार ऊठि सिधारै ॥१॥

नाम बिना सभु झूठु परानी ॥ गोविद भजन बिनु अवर संगि राते ते सभि माइआ मूठु परानी ॥१॥ रहाउ ॥

तीरथ नाइ न उतरसि मैलु ॥ करम धरम सभि हउमै फैलु ॥ लोक पचारै गति नही होइ ॥ नाम बिहूणे चलसहि रोइ ॥२॥

बिनु हरि नाम न टूटसि पटल ॥ सोधे सासत्र सिम्रिति सगल ॥ सो नामु जपै जिसु आपि जपाए ॥ सगल फला से सूखि समाए ॥३॥

राखनहारे राखहु आपि ॥ सगल सुखा प्रभ तुमरै हाथि ॥ जितु लावहि तितु लागह सुआमी ॥ नानक साहिबु अंतरजामी ॥४॥१३॥२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 890) रामकली महला ५ ॥
जो किछु करै सोई सुखु जाना ॥ मनु असमझु साधसंगि पतीआना ॥ डोलन ते चूका ठहराइआ ॥ सति माहि ले सति समाइआ ॥१॥

दूखु गइआ सभु रोगु गइआ ॥ प्रभ की आगिआ मन महि मानी महा पुरख का संगु भइआ ॥१॥ रहाउ ॥

सगल पवित्र सरब निरमला ॥ जो वरताए सोई भला ॥ जह राखै सोई मुकति थानु ॥ जो जपाए सोई नामु ॥२॥

अठसठि तीरथ जह साध पग धरहि ॥ तह बैकुंठु जह नामु उचरहि ॥ सरब अनंद जब दरसनु पाईऐ ॥ राम गुणा नित नित हरि गाईऐ ॥३॥

आपे घटि घटि रहिआ बिआपि ॥ दइआल पुरख परगट परताप ॥ कपट खुलाने भ्रम नाठे दूरे ॥ नानक कउ गुर भेटे पूरे ॥४॥१४॥२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 890) रामकली महला ५ ॥
कोटि जाप ताप बिस्राम ॥ रिधि बुधि सिधि सुर गिआन ॥ अनिक रूप रंग भोग रसै ॥ गुरमुखि नामु निमख रिदै वसै ॥१॥

हरि के नाम की वडिआई ॥ कीमति कहणु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

सूरबीर धीरज मति पूरा ॥ सहज समाधि धुनि गहिर ग्मभीरा ॥ सदा मुकतु ता के पूरे काम ॥ जा कै रिदै वसै हरि नाम ॥२॥

सगल सूख आनंद अरोग ॥ समदरसी पूरन निरजोग ॥ आइ न जाइ डोलै कत नाही ॥ जा कै नामु बसै मन माही ॥३॥

दीन दइआल गोपाल गोविंद ॥ गुरमुखि जपीऐ उतरै चिंद ॥ नानक कउ गुरि दीआ नामु ॥ संतन की टहल संत का कामु ॥४॥१५॥२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 891) रामकली महला ५ ॥
बीज मंत्रु हरि कीरतनु गाउ ॥ आगै मिली निथावे थाउ ॥ गुर पूरे की चरणी लागु ॥ जनम जनम का सोइआ जागु ॥१॥

हरि हरि जापु जपला ॥ गुर किरपा ते हिरदै वासै भउजलु पारि परला ॥१॥ रहाउ ॥

नामु निधानु धिआइ मन अटल ॥ ता छूटहि माइआ के पटल ॥ गुर का सबदु अम्रित रसु पीउ ॥ ता तेरा होइ निरमल जीउ ॥२॥

सोधत सोधत सोधि बीचारा ॥ बिनु हरि भगति नही छुटकारा ॥ सो हरि भजनु साध कै संगि ॥ मनु तनु रापै हरि कै रंगि ॥३॥

छोडि सिआणप बहु चतुराई ॥ मन बिनु हरि नावै जाइ न काई ॥ दइआ धारी गोविद गोसाई ॥ हरि हरि नानक टेक टिकाई ॥४॥१६॥२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 891) रामकली महला ५ ॥
संत कै संगि राम रंग केल ॥ आगै जम सिउ होइ न मेल ॥ अह्मबुधि का भइआ बिनास ॥ दुरमति होई सगली नास ॥१॥

राम नाम गुण गाइ पंडित ॥ करम कांड अहंकारु न काजै कुसल सेती घरि जाहि पंडित ॥१॥ रहाउ ॥

हरि का जसु निधि लीआ लाभ ॥ पूरन भए मनोरथ साभ ॥ दुखु नाठा सुखु घर महि आइआ ॥ संत प्रसादि कमलु बिगसाइआ ॥२॥

नाम रतनु जिनि पाइआ दानु ॥ तिसु जन होए सगल निधान ॥ संतोखु आइआ मनि पूरा पाइ ॥ फिरि फिरि मागन काहे जाइ ॥३॥

हरि की कथा सुनत पवित ॥ जिहवा बकत पाई गति मति ॥ सो परवाणु जिसु रिदै वसाई ॥ नानक ते जन ऊतम भाई ॥४॥१७॥२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 891) रामकली महला ५ ॥
गहु करि पकरी न आई हाथि ॥ प्रीति करी चाली नही साथि ॥ कहु नानक जउ तिआगि दई ॥ तब ओह चरणी आइ पई ॥१॥

सुणि संतहु निरमल बीचार ॥ राम नाम बिनु गति नही काई गुरु पूरा भेटत उधार ॥१॥ रहाउ ॥

जब उस कउ कोई देवै मानु ॥ तब आपस ऊपरि रखै गुमानु ॥ जब उस कउ कोई मनि परहरै ॥ तब ओह सेवकि सेवा करै ॥२॥

मुखि बेरावै अंति ठगावै ॥ इकतु ठउर ओह कही न समावै ॥ उनि मोहे बहुते ब्रहमंड ॥ राम जनी कीनी खंड खंड ॥३॥

जो मागै सो भूखा रहै ॥ इसु संगि राचै सु कछू न लहै ॥ इसहि तिआगि सतसंगति करै ॥ वडभागी नानक ओहु तरै ॥४॥१८॥२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 892) रामकली महला ५ ॥
आतम रामु सरब महि पेखु ॥ पूरन पूरि रहिआ प्रभ एकु ॥ रतनु अमोलु रिदे महि जानु ॥ अपनी वसतु तू आपि पछानु ॥१॥

पी अम्रितु संतन परसादि ॥ वडे भाग होवहि तउ पाईऐ बिनु जिहवा किआ जाणै सुआदु ॥१॥ रहाउ ॥

अठ दस बेद सुने कह डोरा ॥ कोटि प्रगास न दिसै अंधेरा ॥ पसू परीति घास संगि रचै ॥ जिसु नही बुझावै सो कितु बिधि बुझै ॥२॥

जानणहारु रहिआ प्रभु जानि ॥ ओति पोति भगतन संगानि ॥ बिगसि बिगसि अपुना प्रभु गावहि ॥ नानक तिन जम नेड़ि न आवहि ॥३॥१९॥३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 892) रामकली महला ५ ॥
दीनो नामु कीओ पवितु ॥ हरि धनु रासि निरास इह बितु ॥ काटी बंधि हरि सेवा लाए ॥ हरि हरि भगति राम गुण गाए ॥१॥

बाजे अनहद बाजा ॥ रसकि रसकि गुण गावहि हरि जन अपनै गुरदेवि निवाजा ॥१॥ रहाउ ॥

आइ बनिओ पूरबला भागु ॥ जनम जनम का सोइआ जागु ॥ गई गिलानि साध कै संगि ॥ मनु तनु रातो हरि कै रंगि ॥२॥

राखे राखनहार दइआल ॥ ना किछु सेवा ना किछु घाल ॥ करि किरपा प्रभि कीनी दइआ ॥ बूडत दुख महि काढि लइआ ॥३॥

सुणि सुणि उपजिओ मन महि चाउ ॥ आठ पहर हरि के गुण गाउ ॥ गावत गावत परम गति पाई ॥ गुर प्रसादि नानक लिव लाई ॥४॥२०॥३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 892) रामकली महला ५ ॥
कउडी बदलै तिआगै रतनु ॥ छोडि जाइ ताहू का जतनु ॥ सो संचै जो होछी बात ॥ माइआ मोहिआ टेढउ जात ॥१॥

अभागे तै लाज नाही ॥ सुख सागर पूरन परमेसरु हरि न चेतिओ मन माही ॥१॥ रहाउ ॥

अम्रितु कउरा बिखिआ मीठी ॥ साकत की बिधि नैनहु डीठी ॥ कूड़ि कपटि अहंकारि रीझाना ॥ नामु सुनत जनु बिछूअ डसाना ॥२॥

माइआ कारणि सद ही झूरै ॥ मनि मुखि कबहि न उसतति करै ॥ निरभउ निरंकार दातारु ॥ तिसु सिउ प्रीति न करै गवारु ॥३॥

सभ साहा सिरि साचा साहु ॥ वेमुहताजु पूरा पातिसाहु ॥ मोह मगन लपटिओ भ्रम गिरह ॥ नानक तरीऐ तेरी मिहर ॥४॥२१॥३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 893) रामकली महला ५ ॥
रैणि दिनसु जपउ हरि नाउ ॥ आगै दरगह पावउ थाउ ॥ सदा अनंदु न होवी सोगु ॥ कबहू न बिआपै हउमै रोगु ॥१॥

खोजहु संतहु हरि ब्रहम गिआनी ॥ बिसमन बिसम भए बिसमादा परम गति पावहि हरि सिमरि परानी ॥१॥ रहाउ ॥

गनि मिनि देखहु सगल बीचारि ॥ नाम बिना को सकै न तारि ॥ सगल उपाव न चालहि संगि ॥ भवजलु तरीऐ प्रभ कै रंगि ॥२॥

देही धोइ न उतरै मैलु ॥ हउमै बिआपै दुबिधा फैलु ॥ हरि हरि अउखधु जो जनु खाइ ॥ ता का रोगु सगल मिटि जाइ ॥३॥

करि किरपा पारब्रहम दइआल ॥ मन ते कबहु न बिसरु गोपाल ॥ तेरे दास की होवा धूरि ॥ नानक की प्रभ सरधा पूरि ॥४॥२२॥३३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 893) रामकली महला ५ ॥
तेरी सरणि पूरे गुरदेव ॥ तुधु बिनु दूजा नाही कोइ ॥ तू समरथु पूरन पारब्रहमु ॥ सो धिआए पूरा जिसु करमु ॥१॥

तरण तारण प्रभ तेरो नाउ ॥ एका सरणि गही मन मेरै तुधु बिनु दूजा नाही ठाउ ॥१॥ रहाउ ॥

जपि जपि जीवा तेरा नाउ ॥ आगै दरगह पावउ ठाउ ॥ दूखु अंधेरा मन ते जाइ ॥ दुरमति बिनसै राचै हरि नाइ ॥२॥

चरन कमल सिउ लागी प्रीति ॥ गुर पूरे की निरमल रीति ॥ भउ भागा निरभउ मनि बसै ॥ अम्रित नामु रसना नित जपै ॥३॥

कोटि जनम के काटे फाहे ॥ पाइआ लाभु सचा धनु लाहे ॥ तोटि न आवै अखुट भंडार ॥ नानक भगत सोहहि हरि दुआर ॥४॥२३॥३४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 893) रामकली महला ५ ॥
रतन जवेहर नाम ॥ सतु संतोखु गिआन ॥ सूख सहज दइआ का पोता ॥ हरि भगता हवालै होता ॥१॥

मेरे राम को भंडारु ॥ खात खरचि कछु तोटि न आवै अंतु नही हरि पारावारु ॥१॥ रहाउ ॥

कीरतनु निरमोलक हीरा ॥ आनंद गुणी गहीरा ॥ अनहद बाणी पूंजी ॥ संतन हथि राखी कूंजी ॥२॥

सुंन समाधि गुफा तह आसनु ॥ केवल ब्रहम पूरन तह बासनु ॥ भगत संगि प्रभु गोसटि करत ॥ तह हरख न सोग न जनम न मरत ॥३॥

करि किरपा जिसु आपि दिवाइआ ॥ साधसंगि तिनि हरि धनु पाइआ ॥ दइआल पुरख नानक अरदासि ॥ हरि मेरी वरतणि हरि मेरी रासि ॥४॥२४॥३५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 894) रामकली महला ५ ॥
महिमा न जानहि बेद ॥ ब्रहमे नही जानहि भेद ॥ अवतार न जानहि अंतु ॥ परमेसरु पारब्रहम बेअंतु ॥१॥

अपनी गति आपि जानै ॥ सुणि सुणि अवर वखानै ॥१॥ रहाउ ॥

संकरा नही जानहि भेव ॥ खोजत हारे देव ॥ देवीआ नही जानै मरम ॥ सभ ऊपरि अलख पारब्रहम ॥२॥

अपनै रंगि करता केल ॥ आपि बिछोरै आपे मेल ॥ इकि भरमे इकि भगती लाए ॥ अपणा कीआ आपि जणाए ॥३॥

संतन की सुणि साची साखी ॥ सो बोलहि जो पेखहि आखी ॥ नही लेपु तिसु पुंनि न पापि ॥ नानक का प्रभु आपे आपि ॥४॥२५॥३६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 894) रामकली महला ५ ॥
किछहू काजु न कीओ जानि ॥ सुरति मति नाही किछु गिआनि ॥ जाप ताप सील नही धरम ॥ किछू न जानउ कैसा करम ॥१॥

ठाकुर प्रीतम प्रभ मेरे ॥ तुझ बिनु दूजा अवरु न कोई भूलह चूकह प्रभ तेरे ॥१॥ रहाउ ॥

रिधि न बुधि न सिधि प्रगासु ॥ बिखै बिआधि के गाव महि बासु ॥ करणहार मेरे प्रभ एक ॥ नाम तेरे की मन महि टेक ॥२॥

सुणि सुणि जीवउ मनि इहु बिस्रामु ॥ पाप खंडन प्रभ तेरो नामु ॥ तू अगनतु जीअ का दाता ॥ जिसहि जणावहि तिनि तू जाता ॥३॥

जो उपाइओ तिसु तेरी आस ॥ सगल अराधहि प्रभ गुणतास ॥ नानक दास तेरै कुरबाणु ॥ बेअंत साहिबु मेरा मिहरवाणु ॥४॥२६॥३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 894) रामकली महला ५ ॥
राखनहार दइआल ॥ कोटि भव खंडे निमख खिआल ॥ सगल अराधहि जंत ॥ मिलीऐ प्रभ गुर मिलि मंत ॥१॥

जीअन को दाता मेरा प्रभु ॥ पूरन परमेसुर सुआमी घटि घटि राता मेरा प्रभु ॥१॥ रहाउ ॥

ता की गही मन ओट ॥ बंधन ते होई छोट ॥ हिरदै जपि परमानंद ॥ मन माहि भए अनंद ॥२॥

तारण तरण हरि सरण ॥ जीवन रूप हरि चरण ॥ संतन के प्राण अधार ॥ ऊचे ते ऊच अपार ॥३॥

सु मति सारु जितु हरि सिमरीजै ॥ करि किरपा जिसु आपे दीजै ॥ सूख सहज आनंद हरि नाउ ॥ नानक जपिआ गुर मिलि नाउ ॥४॥२७॥३८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 895) रामकली महला ५ ॥
सगल सिआनप छाडि ॥ करि सेवा सेवक साजि ॥ अपना आपु सगल मिटाइ ॥ मन चिंदे सेई फल पाइ ॥१॥

होहु सावधान अपुने गुर सिउ ॥ आसा मनसा पूरन होवै पावहि सगल निधान गुर सिउ ॥१॥ रहाउ ॥

दूजा नही जानै कोइ ॥ सतगुरु निरंजनु सोइ ॥ मानुख का करि रूपु न जानु ॥ मिली निमाने मानु ॥२॥

गुर की हरि टेक टिकाइ ॥ अवर आसा सभ लाहि ॥ हरि का नामु मागु निधानु ॥ ता दरगह पावहि मानु ॥३॥

गुर का बचनु जपि मंतु ॥ एहा भगति सार ततु ॥ सतिगुर भए दइआल ॥ नानक दास निहाल ॥४॥२८॥३९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 895) रामकली महला ५ ॥
होवै सोई भल मानु ॥ आपना तजि अभिमानु ॥ दिनु रैनि सदा गुन गाउ ॥ पूरन एही सुआउ ॥१॥

आनंद करि संत हरि जपि ॥ छाडि सिआनप बहु चतुराई गुर का जपि मंतु निरमल ॥१॥ रहाउ ॥

एक की करि आस भीतरि ॥ निरमल जपि नामु हरि हरि ॥ गुर के चरन नमसकारि ॥ भवजलु उतरहि पारि ॥२॥

देवनहार दातार ॥ अंतु न पारावार ॥ जा कै घरि सरब निधान ॥ राखनहार निदान ॥३॥

नानक पाइआ एहु निधान ॥ हरे हरि निरमल नाम ॥ जो जपै तिस की गति होइ ॥ नानक करमि परापति होइ ॥४॥२९॥४०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 895) रामकली महला ५ ॥
दुलभ देह सवारि ॥ जाहि न दरगह हारि ॥ हलति पलति तुधु होइ वडिआई ॥ अंत की बेला लए छडाई ॥१॥

राम के गुन गाउ ॥ हलतु पलतु होहि दोवै सुहेले अचरज पुरखु धिआउ ॥१॥ रहाउ ॥

ऊठत बैठत हरि जापु ॥ बिनसै सगल संतापु ॥ बैरी सभि होवहि मीत ॥ निरमलु तेरा होवै चीत ॥२॥

सभ ते ऊतम इहु करमु ॥ सगल धरम महि स्रेसट धरमु ॥ हरि सिमरनि तेरा होइ उधारु ॥ जनम जनम का उतरै भारु ॥३॥

पूरन तेरी होवै आस ॥ जम की कटीऐ तेरी फास ॥ गुर का उपदेसु सुनीजै ॥ नानक सुखि सहजि समीजै ॥४॥३०॥४१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 896) रामकली महला ५ ॥
जिस की तिस की करि मानु ॥ आपन लाहि गुमानु ॥ जिस का तू तिस का सभु कोइ ॥ तिसहि अराधि सदा सुखु होइ ॥१॥

काहे भ्रमि भ्रमहि बिगाने ॥ नाम बिना किछु कामि न आवै मेरा मेरा करि बहुतु पछुताने ॥१॥ रहाउ ॥

जो जो करै सोई मानि लेहु ॥ बिनु माने रलि होवहि खेह ॥ तिस का भाणा लागै मीठा ॥ गुर प्रसादि विरले मनि वूठा ॥२॥

वेपरवाहु अगोचरु आपि ॥ आठ पहर मन ता कउ जापि ॥ जिसु चिति आए बिनसहि दुखा ॥ हलति पलति तेरा ऊजल मुखा ॥३॥

कउन कउन उधरे गुन गाइ ॥ गनणु न जाई कीम न पाइ ॥ बूडत लोह साधसंगि तरै ॥ नानक जिसहि परापति करै ॥४॥३१॥४२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 896) रामकली महला ५ ॥
मन माहि जापि भगवंतु ॥ गुरि पूरै इहु दीनो मंतु ॥ मिटे सगल भै त्रास ॥ पूरन होई आस ॥१॥

सफल सेवा गुरदेवा ॥ कीमति किछु कहणु न जाई साचे सचु अलख अभेवा ॥१॥ रहाउ ॥

करन करावन आपि ॥ तिस कउ सदा मन जापि ॥ तिस की सेवा करि नीत ॥ सचु सहजु सुखु पावहि मीत ॥२॥

साहिबु मेरा अति भारा ॥ खिन महि थापि उथापनहारा ॥ तिसु बिनु अवरु न कोई ॥ जन का राखा सोई ॥३॥

करि किरपा अरदासि सुणीजै ॥ अपणे सेवक कउ दरसनु दीजै ॥ नानक जापी जपु जापु ॥ सभ ते ऊच जा का परतापु ॥४॥३२॥४३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 896) रामकली महला ५ ॥
बिरथा भरवासा लोक ॥ ठाकुर प्रभ तेरी टेक ॥ अवर छूटी सभ आस ॥ अचिंत ठाकुर भेटे गुणतास ॥१॥

एको नामु धिआइ मन मेरे ॥ कारजु तेरा होवै पूरा हरि हरि हरि गुण गाइ मन मेरे ॥१॥ रहाउ ॥

तुम ही कारन करन ॥ चरन कमल हरि सरन ॥ मनि तनि हरि ओही धिआइआ ॥ आनंद हरि रूप दिखाइआ ॥२॥

तिस ही की ओट सदीव ॥ जा के कीने है जीव ॥ सिमरत हरि करत निधान ॥ राखनहार निदान ॥३॥

सरब की रेण होवीजै ॥ आपु मिटाइ मिलीजै ॥ अनदिनु धिआईऐ नामु ॥ सफल नानक इहु कामु ॥४॥३३॥४४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 896) रामकली महला ५ ॥
कारन करन करीम ॥ सरब प्रतिपाल रहीम ॥ अलह अलख अपार ॥ खुदि खुदाइ वड बेसुमार ॥१॥

ओं नमो भगवंत गुसाई ॥ खालकु रवि रहिआ सरब ठाई ॥१॥ रहाउ ॥

जगंनाथ जगजीवन माधो ॥ भउ भंजन रिद माहि अराधो ॥ रिखीकेस गोपाल गोविंद ॥ पूरन सरबत्र मुकंद ॥२॥

मिहरवान मउला तूही एक ॥ पीर पैकांबर सेख ॥ दिला का मालकु करे हाकु ॥ कुरान कतेब ते पाकु ॥३॥

नाराइण नरहर दइआल ॥ रमत राम घट घट आधार ॥ बासुदेव बसत सभ ठाइ ॥ लीला किछु लखी न जाइ ॥४॥

मिहर दइआ करि करनैहार ॥ भगति बंदगी देहि सिरजणहार ॥ कहु नानक गुरि खोए भरम ॥ एको अलहु पारब्रहम ॥५॥३४॥४५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 897) रामकली महला ५ ॥
कोटि जनम के बिनसे पाप ॥ हरि हरि जपत नाही संताप ॥ गुर के चरन कमल मनि वसे ॥ महा बिकार तन ते सभि नसे ॥१॥

गोपाल को जसु गाउ प्राणी ॥ अकथ कथा साची प्रभ पूरन जोती जोति समाणी ॥१॥ रहाउ ॥

त्रिसना भूख सभ नासी ॥ संत प्रसादि जपिआ अबिनासी ॥ रैनि दिनसु प्रभ सेव कमानी ॥ हरि मिलणै की एह नीसानी ॥२॥

मिटे जंजाल होए प्रभ दइआल ॥ गुर का दरसनु देखि निहाल ॥ परा पूरबला करमु बणि आइआ ॥ हरि के गुण नित रसना गाइआ ॥३॥

हरि के संत सदा परवाणु ॥ संत जना मसतकि नीसाणु ॥ दास की रेणु पाए जे कोइ ॥ नानक तिस की परम गति होइ ॥४॥३५॥४६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 897) रामकली महला ५ ॥
दरसन कउ जाईऐ कुरबानु ॥ चरन कमल हिरदै धरि धिआनु ॥ धूरि संतन की मसतकि लाइ ॥ जनम जनम की दुरमति मलु जाइ ॥१॥

जिसु भेटत मिटै अभिमानु ॥ पारब्रहमु सभु नदरी आवै करि किरपा पूरन भगवान ॥१॥ रहाउ ॥

गुर की कीरति जपीऐ हरि नाउ ॥ गुर की भगति सदा गुण गाउ ॥ गुर की सुरति निकटि करि जानु ॥ गुर का सबदु सति करि मानु ॥२॥

गुर बचनी समसरि सुख दूख ॥ कदे न बिआपै त्रिसना भूख ॥ मनि संतोखु सबदि गुर राजे ॥ जपि गोबिंदु पड़दे सभि काजे ॥३॥

गुरु परमेसरु गुरु गोविंदु ॥ गुरु दाता दइआल बखसिंदु ॥ गुर चरनी जा का मनु लागा ॥ नानक दास तिसु पूरन भागा ॥४॥३६॥४७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 898) रामकली महला ५ ॥
किसु भरवासै बिचरहि भवन ॥ मूड़ मुगध तेरा संगी कवन ॥ रामु संगी तिसु गति नही जानहि ॥ पंच बटवारे से मीत करि मानहि ॥१॥

सो घरु सेवि जितु उधरहि मीत ॥ गुण गोविंद रवीअहि दिनु राती साधसंगि करि मन की प्रीति ॥१॥ रहाउ ॥

जनमु बिहानो अहंकारि अरु वादि ॥ त्रिपति न आवै बिखिआ सादि ॥ भरमत भरमत महा दुखु पाइआ ॥ तरी न जाई दुतर माइआ ॥२॥

कामि न आवै सु कार कमावै ॥ आपि बीजि आपे ही खावै ॥ राखन कउ दूसर नही कोइ ॥ तउ निसतरै जउ किरपा होइ ॥३॥

पतित पुनीत प्रभ तेरो नामु ॥ अपने दास कउ कीजै दानु ॥ करि किरपा प्रभ गति करि मेरी ॥ सरणि गही नानक प्रभ तेरी ॥४॥३७॥४८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 898) रामकली महला ५ ॥
इह लोके सुखु पाइआ ॥ नही भेटत धरम राइआ ॥ हरि दरगह सोभावंत ॥ फुनि गरभि नाही बसंत ॥१॥

जानी संत की मित्राई ॥ करि किरपा दीनो हरि नामा पूरबि संजोगि मिलाई ॥१॥ रहाउ ॥

गुर कै चरणि चितु लागा ॥ धंनि धंनि संजोगु सभागा ॥ संत की धूरि लागी मेरै माथे ॥ किलविख दुख सगले मेरे लाथे ॥२॥

साध की सचु टहल कमानी ॥ तब होए मन सुध परानी ॥ जन का सफल दरसु डीठा ॥ नामु प्रभू का घटि घटि वूठा ॥३॥

मिटाने सभि कलि कलेस ॥ जिस ते उपजे तिसु महि परवेस ॥ प्रगटे आनूप गोविंद ॥ प्रभ पूरे नानक बखसिंद ॥४॥३८॥४९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 898) रामकली महला ५ ॥
गऊ कउ चारे सारदूलु ॥ कउडी का लख हूआ मूलु ॥ बकरी कउ हसती प्रतिपाले ॥ अपना प्रभु नदरि निहाले ॥१॥

क्रिपा निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥ बरनि न साकउ बहु गुन तेरे ॥१॥ रहाउ ॥

दीसत मासु न खाइ बिलाई ॥ महा कसाबि छुरी सटि पाई ॥ करणहार प्रभु हिरदै वूठा ॥ फाथी मछुली का जाला तूटा ॥२॥

सूके कासट हरे चलूल ॥ ऊचै थलि फूले कमल अनूप ॥ अगनि निवारी सतिगुर देव ॥ सेवकु अपनी लाइओ सेव ॥३॥

अकिरतघणा का करे उधारु ॥ प्रभु मेरा है सदा दइआरु ॥ संत जना का सदा सहाई ॥ चरन कमल नानक सरणाई ॥४॥३९॥५०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 898) रामकली महला ५ ॥
पंच सिंघ राखे प्रभि मारि ॥ दस बिघिआड़ी लई निवारि ॥ तीनि आवरत की चूकी घेर ॥ साधसंगि चूके भै फेर ॥१॥

सिमरि सिमरि जीवा गोविंद ॥ करि किरपा राखिओ दासु अपना सदा सदा साचा बखसिंद ॥१॥ रहाउ ॥

दाझि गए त्रिण पाप सुमेर ॥ जपि जपि नामु पूजे प्रभ पैर ॥ अनद रूप प्रगटिओ सभ थानि ॥ प्रेम भगति जोरी सुख मानि ॥२॥

सागरु तरिओ बाछर खोज ॥ खेदु न पाइओ नह फुनि रोज ॥ सिंधु समाइओ घटुके माहि ॥ करणहार कउ किछु अचरजु नाहि ॥३॥

जउ छूटउ तउ जाइ पइआल ॥ जउ काढिओ तउ नदरि निहाल ॥ पाप पुंन हमरै वसि नाहि ॥ रसकि रसकि नानक गुण गाहि ॥४॥४०॥५१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 899) रामकली महला ५ ॥
ना तनु तेरा ना मनु तोहि ॥ माइआ मोहि बिआपिआ धोहि ॥ कुदम करै गाडर जिउ छेल ॥ अचिंतु जालु कालु चक्रु पेल ॥१॥

हरि चरन कमल सरनाइ मना ॥ राम नामु जपि संगि सहाई गुरमुखि पावहि साचु धना ॥१॥ रहाउ ॥

ऊने काज न होवत पूरे ॥ कामि क्रोधि मदि सद ही झूरे ॥ करै बिकार जीअरे कै ताई ॥ गाफल संगि न तसूआ जाई ॥२॥

धरत धोह अनिक छल जानै ॥ कउडी कउडी कउ खाकु सिरि छानै ॥ जिनि दीआ तिसै न चेतै मूलि ॥ मिथिआ लोभु न उतरै सूलु ॥३॥

पारब्रहम जब भए दइआल ॥ इहु मनु होआ साध रवाल ॥ हसत कमल लड़ि लीनो लाइ ॥ नानक साचै साचि समाइ ॥४॥४१॥५२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 899) रामकली महला ५ ॥
राजा राम की सरणाइ ॥ निरभउ भए गोबिंद गुन गावत साधसंगि दुखु जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै रामु बसै मन माही ॥ सो जनु दुतरु पेखत नाही ॥ सगले काज सवारे अपने ॥ हरि हरि नामु रसन नित जपने ॥१॥

जिस कै मसतकि हाथु गुरु धरै ॥ सो दासु अदेसा काहे करै ॥ जनम मरण की चूकी काणि ॥ पूरे गुर ऊपरि कुरबाण ॥२॥

गुरु परमेसरु भेटि निहाल ॥ सो दरसनु पाए जिसु होइ दइआलु ॥ पारब्रहमु जिसु किरपा करै ॥ साधसंगि सो भवजलु तरै ॥३॥

अम्रितु पीवहु साध पिआरे ॥ मुख ऊजल साचै दरबारे ॥ अनद करहु तजि सगल बिकार ॥ नानक हरि जपि उतरहु पारि ॥४॥४२॥५३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 900) रामकली महला ५ ॥
ईंधन ते बैसंतरु भागै ॥ माटी कउ जलु दह दिस तिआगै ॥ ऊपरि चरन तलै आकासु ॥ घट महि सिंधु कीओ परगासु ॥१॥

ऐसा सम्रथु हरि जीउ आपि ॥ निमख न बिसरै जीअ भगतन कै आठ पहर मन ता कउ जापि ॥१॥ रहाउ ॥

प्रथमे माखनु पाछै दूधु ॥ मैलू कीनो साबुनु सूधु ॥ भै ते निरभउ डरता फिरै ॥ होंदी कउ अणहोंदी हिरै ॥२॥

देही गुपत बिदेही दीसै ॥ सगले साजि करत जगदीसै ॥ ठगणहार अणठगदा ठागै ॥ बिनु वखर फिरि फिरि उठि लागै ॥३॥

संत सभा मिलि करहु बखिआण ॥ सिम्रिति सासत बेद पुराण ॥ ब्रहम बीचारु बीचारे कोइ ॥ नानक ता की परम गति होइ ॥४॥४३॥५४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 900) रामकली महला ५ ॥
जो तिसु भावै सो थीआ ॥ सदा सदा हरि की सरणाई प्रभ बिनु नाही आन बीआ ॥१॥ रहाउ ॥

पुतु कलत्रु लखिमी दीसै इन महि किछू न संगि लीआ ॥ बिखै ठगउरी खाइ भुलाना माइआ मंदरु तिआगि गइआ ॥१॥

निंदा करि करि बहुतु विगूता गरभ जोनि महि किरति पइआ ॥ पुरब कमाणे छोडहि नाही जमदूति ग्रासिओ महा भइआ ॥२॥

बोलै झूठु कमावै अवरा त्रिसन न बूझै बहुतु हइआ ॥ असाध रोगु उपजिआ संत दूखनि देह बिनासी महा खइआ ॥३॥

जिनहि निवाजे तिन ही साजे आपे कीने संत जइआ ॥ नानक दास कंठि लाइ राखे करि किरपा पारब्रहम मइआ ॥४॥४४॥५५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 900) रामकली महला ५ ॥
ऐसा पूरा गुरदेउ सहाई ॥ जा का सिमरनु बिरथा न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

दरसनु पेखत होइ निहालु ॥ जा की धूरि काटै जम जालु ॥ चरन कमल बसे मेरे मन के ॥ कारज सवारे सगले तन के ॥१॥

जा कै मसतकि राखै हाथु ॥ प्रभु मेरो अनाथ को नाथु ॥ पतित उधारणु क्रिपा निधानु ॥ सदा सदा जाईऐ कुरबानु ॥२॥

निरमल मंतु देइ जिसु दानु ॥ तजहि बिकार बिनसै अभिमानु ॥ एकु धिआईऐ साध कै संगि ॥ पाप बिनासे नाम कै रंगि ॥३॥

गुर परमेसुर सगल निवास ॥ घटि घटि रवि रहिआ गुणतास ॥ दरसु देहि धारउ प्रभ आस ॥ नित नानकु चितवै सचु अरदासि ॥४॥४५॥५६॥


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