राग प्रभाती - बाणी शब्द, Raag Parbhati - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1327) प्रभाती महला १ ॥
तेरा नामु रतनु करमु चानणु सुरति तिथै लोइ ॥ अंधेरु अंधी वापरै सगल लीजै खोइ ॥१॥

इहु संसारु सगल बिकारु ॥ तेरा नामु दारू अवरु नासति करणहारु अपारु ॥१॥ रहाउ ॥

पाताल पुरीआ एक भार होवहि लाख करोड़ि ॥ तेरे लाल कीमति ता पवै जां सिरै होवहि होरि ॥२॥

दूखा ते सुख ऊपजहि सूखी होवहि दूख ॥ जितु मुखि तू सालाहीअहि तितु मुखि कैसी भूख ॥३॥

नानक मूरखु एकु तू अवरु भला सैसारु ॥ जितु तनि नामु न ऊपजै से तन होहि खुआर ॥४॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1328) प्रभाती महला १ ॥
जै कारणि बेद ब्रहमै उचरे संकरि छोडी माइआ ॥ जै कारणि सिध भए उदासी देवी मरमु न पाइआ ॥१॥

बाबा मनि साचा मुखि साचा कहीऐ तरीऐ साचा होई ॥ दुसमनु दूखु न आवै नेड़ै हरि मति पावै कोई ॥१॥ रहाउ ॥

अगनि बि्मब पवणै की बाणी तीनि नाम के दासा ॥ ते तसकर जो नामु न लेवहि वासहि कोट पंचासा ॥२॥

जे को एक करै चंगिआई मनि चिति बहुतु बफावै ॥ एते गुण एतीआ चंगिआईआ देइ न पछोतावै ॥३॥

तुधु सालाहनि तिन धनु पलै नानक का धनु सोई ॥ जे को जीउ कहै ओना कउ जम की तलब न होई ॥४॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1328) प्रभाती महला १ ॥
जा कै रूपु नाही जाति नाही नाही मुखु मासा ॥ सतिगुरि मिले निरंजनु पाइआ तेरै नामि है निवासा ॥१॥

अउधू सहजे ततु बीचारि ॥ जा ते फिरि न आवहु सैसारि ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै करमु नाही धरमु नाही नाही सुचि माला ॥ सिव जोति कंनहु बुधि पाई सतिगुरू रखवाला ॥२॥

जा कै बरतु नाही नेमु नाही नाही बकबाई ॥ गति अवगति की चिंत नाही सतिगुरू फुरमाई ॥३॥

जा कै आस नाही निरास नाही चिति सुरति समझाई ॥ तंत कउ परम तंतु मिलिआ नानका बुधि पाई ॥४॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1328) प्रभाती महला १ ॥
ता का कहिआ दरि परवाणु ॥ बिखु अम्रितु दुइ सम करि जाणु ॥१॥

किआ कहीऐ सरबे रहिआ समाइ ॥ जो किछु वरतै सभ तेरी रजाइ ॥१॥ रहाउ ॥

प्रगटी जोति चूका अभिमानु ॥ सतिगुरि दीआ अम्रित नामु ॥२॥

कलि महि आइआ सो जनु जाणु ॥ साची दरगह पावै माणु ॥३॥

कहणा सुनणा अकथ घरि जाइ ॥ कथनी बदनी नानक जलि जाइ ॥४॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1328) प्रभाती महला १ ॥
अम्रितु नीरु गिआनि मन मजनु अठसठि तीरथ संगि गहे ॥ गुर उपदेसि जवाहर माणक सेवे सिखु सो खोजि लहै ॥१॥

गुर समानि तीरथु नही कोइ ॥ सरु संतोखु तासु गुरु होइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुरु दरीआउ सदा जलु निरमलु मिलिआ दुरमति मैलु हरै ॥ सतिगुरि पाइऐ पूरा नावणु पसू परेतहु देव करै ॥२॥

रता सचि नामि तल हीअलु सो गुरु परमलु कहीऐ ॥ जा की वासु बनासपति सउरै तासु चरण लिव रहीऐ ॥३॥

गुरमुखि जीअ प्रान उपजहि गुरमुखि सिव घरि जाईऐ ॥ गुरमुखि नानक सचि समाईऐ गुरमुखि निज पदु पाईऐ ॥४॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1329) प्रभाती महला १ ॥
गुर परसादी विदिआ वीचारै पड़ि पड़ि पावै मानु ॥ आपा मधे आपु परगासिआ पाइआ अम्रितु नामु ॥१॥

करता तू मेरा जजमानु ॥ इक दखिणा हउ तै पहि मागउ देहि आपणा नामु ॥१॥ रहाउ ॥

पंच तसकर धावत राखे चूका मनि अभिमानु ॥ दिसटि बिकारी दुरमति भागी ऐसा ब्रहम गिआनु ॥२॥

जतु सतु चावल दइआ कणक करि प्रापति पाती धानु ॥ दूधु करमु संतोखु घीउ करि ऐसा मांगउ दानु ॥३॥

खिमा धीरजु करि गऊ लवेरी सहजे बछरा खीरु पीऐ ॥ सिफति सरम का कपड़ा मांगउ हरि गुण नानक रवतु रहै ॥४॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1329) प्रभाती महला १ ॥
आवतु किनै न राखिआ जावतु किउ राखिआ जाइ ॥ जिस ते होआ सोई परु जाणै जां उस ही माहि समाइ ॥१॥

तूहै है वाहु तेरी रजाइ ॥ जो किछु करहि सोई परु होइबा अवरु न करणा जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे हरहट की माला टिंड लगत है इक सखनी होर फेर भरीअत है ॥ तैसो ही इहु खेलु खसम का जिउ उस की वडिआई ॥२॥

सुरती कै मारगि चलि कै उलटी नदरि प्रगासी ॥ मनि वीचारि देखु ब्रहम गिआनी कउनु गिरही कउनु उदासी ॥३॥

जिस की आसा तिस ही सउपि कै एहु रहिआ निरबाणु ॥ जिस ते होआ सोई करि मानिआ नानक गिरही उदासी सो परवाणु ॥४॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1329) प्रभाती महला १ ॥
दिसटि बिकारी बंधनि बांधै हउ तिस कै बलि जाई ॥ पाप पुंन की सार न जाणै भूला फिरै अजाई ॥१॥

बोलहु सचु नामु करतार ॥ फुनि बहुड़ि न आवण वार ॥१॥ रहाउ ॥

ऊचा ते फुनि नीचु करतु है नीच करै सुलतानु ॥ जिनी जाणु सुजाणिआ जगि ते पूरे परवाणु ॥२॥

ता कउ समझावण जाईऐ जे को भूला होई ॥ आपे खेल करे सभ करता ऐसा बूझै कोई ॥३॥

नाउ प्रभातै सबदि धिआईऐ छोडहु दुनी परीता ॥ प्रणवति नानक दासनि दासा जगि हारिआ तिनि जीता ॥४॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1330) प्रभाती महला १ ॥
मनु माइआ मनु धाइआ मनु पंखी आकासि ॥ तसकर सबदि निवारिआ नगरु वुठा साबासि ॥ जा तू राखहि राखि लैहि साबतु होवै रासि ॥१॥

ऐसा नामु रतनु निधि मेरै ॥ गुरमति देहि लगउ पगि तेरै ॥१॥ रहाउ ॥

मनु जोगी मनु भोगीआ मनु मूरखु गावारु ॥ मनु दाता मनु मंगता मन सिरि गुरु करतारु ॥ पंच मारि सुखु पाइआ ऐसा ब्रहमु वीचारु ॥२॥

घटि घटि एकु वखाणीऐ कहउ न देखिआ जाइ ॥ खोटो पूठो रालीऐ बिनु नावै पति जाइ ॥ जा तू मेलहि ता मिलि रहां जां तेरी होइ रजाइ ॥३॥

जाति जनमु नह पूछीऐ सच घरु लेहु बताइ ॥ सा जाति सा पति है जेहे करम कमाइ ॥ जनम मरन दुखु काटीऐ नानक छूटसि नाइ ॥४॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1330) प्रभाती महला १ ॥
जागतु बिगसै मूठो अंधा ॥ गलि फाही सिरि मारे धंधा ॥ आसा आवै मनसा जाइ ॥ उरझी ताणी किछु न बसाइ ॥१॥

जागसि जीवण जागणहारा ॥ सुख सागर अम्रित भंडारा ॥१॥ रहाउ ॥

कहिओ न बूझै अंधु न सूझै भोंडी कार कमाई ॥ आपे प्रीति प्रेम परमेसुरु करमी मिलै वडाई ॥२॥

दिनु दिनु आवै तिलु तिलु छीजै माइआ मोहु घटाई ॥ बिनु गुर बूडो ठउर न पावै जब लग दूजी राई ॥३॥

अहिनिसि जीआ देखि सम्हालै सुखु दुखु पुरबि कमाई ॥ करमहीणु सचु भीखिआ मांगै नानक मिलै वडाई ॥४॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1330) प्रभाती महला १ ॥
मसटि करउ मूरखु जगि कहीआ ॥ अधिक बकउ तेरी लिव रहीआ ॥ भूल चूक तेरै दरबारि ॥ नाम बिना कैसे आचार ॥१॥

ऐसे झूठि मुठे संसारा ॥ निंदकु निंदै मुझै पिआरा ॥१॥ रहाउ ॥

जिसु निंदहि सोई बिधि जाणै ॥ गुर कै सबदे दरि नीसाणै ॥ कारण नामु अंतरगति जाणै ॥ जिस नो नदरि करे सोई बिधि जाणै ॥२॥

मै मैलौ ऊजलु सचु सोइ ॥ ऊतमु आखि न ऊचा होइ ॥ मनमुखु खूल्हि महा बिखु खाइ ॥ गुरमुखि होइ सु राचै नाइ ॥३॥

अंधौ बोलौ मुगधु गवारु ॥ हीणौ नीचु बुरौ बुरिआरु ॥ नीधन कौ धनु नामु पिआरु ॥ इहु धनु सारु होरु बिखिआ छारु ॥४॥

उसतति निंदा सबदु वीचारु ॥ जो देवै तिस कउ जैकारु ॥ तू बखसहि जाति पति होइ ॥ नानकु कहै कहावै सोइ ॥५॥१२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1331) प्रभाती महला १ ॥
खाइआ मैलु वधाइआ पैधै घर की हाणि ॥ बकि बकि वादु चलाइआ बिनु नावै बिखु जाणि ॥१॥

बाबा ऐसा बिखम जालि मनु वासिआ ॥ बिबलु झागि सहजि परगासिआ ॥१॥ रहाउ ॥

बिखु खाणा बिखु बोलणा बिखु की कार कमाइ ॥ जम दरि बाधे मारीअहि छूटसि साचै नाइ ॥२॥

जिव आइआ तिव जाइसी कीआ लिखि लै जाइ ॥ मनमुखि मूलु गवाइआ दरगह मिलै सजाइ ॥३॥

जगु खोटौ सचु निरमलौ गुर सबदीं वीचारि ॥ ते नर विरले जाणीअहि जिन अंतरि गिआनु मुरारि ॥४॥

अजरु जरै नीझरु झरै अमर अनंद सरूप ॥ नानकु जल कौ मीनु सै थे भावै राखहु प्रीति ॥५॥१३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1331) प्रभाती महला १ ॥
गीत नाद हरख चतुराई ॥ रहस रंग फुरमाइसि काई ॥ पैन्हणु खाणा चीति न पाई ॥ साचु सहजु सुखु नामि वसाई ॥१॥

किआ जानां किआ करै करावै ॥ नाम बिना तनि किछु न सुखावै ॥१॥ रहाउ ॥

जोग बिनोद स्वाद आनंदा ॥ मति सत भाइ भगति गोबिंदा ॥ कीरति करम कार निज संदा ॥ अंतरि रवतौ राज रविंदा ॥२॥

प्रिउ प्रिउ प्रीति प्रेमि उर धारी ॥ दीना नाथु पीउ बनवारी ॥ अनदिनु नामु दानु ब्रतकारी ॥ त्रिपति तरंग ततु बीचारी ॥३॥

अकथौ कथउ किआ मै जोरु ॥ भगति करी कराइहि मोर ॥ अंतरि वसै चूकै मै मोर ॥ किसु सेवी दूजा नही होरु ॥४॥

गुर का सबदु महा रसु मीठा ॥ ऐसा अम्रितु अंतरि डीठा ॥ जिनि चाखिआ पूरा पदु होइ ॥ नानक ध्रापिओ तनि सुखु होइ ॥५॥१४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1331) प्रभाती महला १ ॥
अंतरि देखि सबदि मनु मानिआ अवरु न रांगनहारा ॥ अहिनिसि जीआ देखि समाले तिस ही की सरकारा ॥१॥

मेरा प्रभु रांगि घणौ अति रूड़ौ ॥ दीन दइआलु प्रीतम मनमोहनु अति रस लाल सगूड़ौ ॥१॥ रहाउ ॥

ऊपरि कूपु गगन पनिहारी अम्रितु पीवणहारा ॥ जिस की रचना सो बिधि जाणै गुरमुखि गिआनु वीचारा ॥२॥

पसरी किरणि रसि कमल बिगासे ससि घरि सूरु समाइआ ॥ कालु बिधुंसि मनसा मनि मारी गुर प्रसादि प्रभु पाइआ ॥३॥

अति रसि रंगि चलूलै राती दूजा रंगु न कोई ॥ नानक रसनि रसाए राते रवि रहिआ प्रभु सोई ॥४॥१५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1332) प्रभाती महला १ ॥
बारह महि रावल खपि जावहि चहु छिअ महि संनिआसी ॥ जोगी कापड़ीआ सिरखूथे बिनु सबदै गलि फासी ॥१॥

सबदि रते पूरे बैरागी ॥ अउहठि हसत महि भीखिआ जाची एक भाइ लिव लागी ॥१॥ रहाउ ॥

ब्रहमण वादु पड़हि करि किरिआ करणी करम कराए ॥ बिनु बूझे किछु सूझै नाही मनमुखु विछुड़ि दुखु पाए ॥२॥

सबदि मिले से सूचाचारी साची दरगह माने ॥ अनदिनु नामि रतनि लिव लागे जुगि जुगि साचि समाने ॥३॥

सगले करम धरम सुचि संजम जप तप तीरथ सबदि वसे ॥ नानक सतिगुर मिलै मिलाइआ दूख पराछत काल नसे ॥४॥१६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 1332) प्रभाती महला १ ॥
संता की रेणु साध जन संगति हरि कीरति तरु तारी ॥ कहा करै बपुरा जमु डरपै गुरमुखि रिदै मुरारी ॥१॥

जलि जाउ जीवनु नाम बिना ॥ हरि जपि जापु जपउ जपमाली गुरमुखि आवै सादु मना ॥१॥ रहाउ ॥

गुर उपदेस साचु सुखु जा कउ किआ तिसु उपमा कहीऐ ॥ लाल जवेहर रतन पदारथ खोजत गुरमुखि लहीऐ ॥२॥

चीनै गिआनु धिआनु धनु साचौ एक सबदि लिव लावै ॥ निराल्मबु निरहारु निहकेवलु निरभउ ताड़ी लावै ॥३॥

साइर सपत भरे जल निरमलि उलटी नाव तरावै ॥ बाहरि जातौ ठाकि रहावै गुरमुखि सहजि समावै ॥४॥

सो गिरही सो दासु उदासी जिनि गुरमुखि आपु पछानिआ ॥ नानकु कहै अवरु नही दूजा साच सबदि मनु मानिआ ॥५॥१७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1332) रागु प्रभाती महला ३ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमुखि विरला कोई बूझै सबदे रहिआ समाई ॥ नामि रते सदा सुखु पावै साचि रहै लिव लाई ॥१॥

हरि हरि नामु जपहु जन भाई ॥ गुर प्रसादि मनु असथिरु होवै अनदिनु हरि रसि रहिआ अघाई ॥१॥ रहाउ ॥

अनदिनु भगति करहु दिनु राती इसु जुग का लाहा भाई ॥ सदा जन निरमल मैलु न लागै सचि नामि चितु लाई ॥२॥

सुखु सीगारु सतिगुरू दिखाइआ नामि वडी वडिआई ॥ अखुट भंडार भरे कदे तोटि न आवै सदा हरि सेवहु भाई ॥३॥

आपे करता जिस नो देवै तिसु वसै मनि आई ॥ नानक नामु धिआइ सदा तू सतिगुरि दीआ दिखाई ॥४॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1333) प्रभाती महला ३ ॥
निरगुणीआरे कउ बखसि लै सुआमी आपे लैहु मिलाई ॥ तू बिअंतु तेरा अंतु न पाइआ सबदे देहु बुझाई ॥१॥

हरि जीउ तुधु विटहु बलि जाई ॥ तनु मनु अरपी तुधु आगै राखउ सदा रहां सरणाई ॥१॥ रहाउ ॥

आपणे भाणे विचि सदा रखु सुआमी हरि नामो देहि वडिआई ॥ पूरे गुर ते भाणा जापै अनदिनु सहजि समाई ॥२॥

तेरै भाणै भगति जे तुधु भावै आपे बखसि मिलाई ॥ तेरै भाणै सदा सुखु पाइआ गुरि त्रिसना अगनि बुझाई ॥३॥

जो तू करहि सु होवै करते अवरु न करणा जाई ॥ नानक नावै जेवडु अवरु न दाता पूरे गुर ते पाई ॥४॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1333) प्रभाती महला ३ ॥
गुरमुखि हरि सालाहिआ जिंना तिन सलाहि हरि जाता ॥ विचहु भरमु गइआ है दूजा गुर कै सबदि पछाता ॥१॥

हरि जीउ तू मेरा इकु सोई ॥ तुधु जपी तुधै सालाही गति मति तुझ ते होई ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि सालाहनि से सादु पाइनि मीठा अम्रितु सारु ॥ सदा मीठा कदे न फीका गुर सबदी वीचारु ॥२॥

जिनि मीठा लाइआ सोई जाणै तिसु विटहु बलि जाई ॥ सबदि सलाही सदा सुखदाता विचहु आपु गवाई ॥३॥

सतिगुरु मेरा सदा है दाता जो इछै सो फलु पाए ॥ नानक नामु मिलै वडिआई गुर सबदी सचु पाए ॥४॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1333) प्रभाती महला ३ ॥
जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन तू राखन जोगु ॥ तुधु जेवडु मै अवरु न सूझै ना को होआ न होगु ॥१॥

हरि जीउ सदा तेरी सरणाई ॥ जिउ भावै तिउ राखहु मेरे सुआमी एह तेरी वडिआई ॥१॥ रहाउ ॥

जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिन की करहि प्रतिपाल ॥ आपि क्रिपा करि राखहु हरि जीउ पोहि न सकै जमकालु ॥२॥

तेरी सरणाई सची हरि जीउ ना ओह घटै न जाइ ॥ जो हरि छोडि दूजै भाइ लागै ओहु जमै तै मरि जाइ ॥३॥

जो तेरी सरणाई हरि जीउ तिना दूख भूख किछु नाहि ॥ नानक नामु सलाहि सदा तू सचै सबदि समाहि ॥४॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1334) प्रभाती महला ३ ॥
गुरमुखि हरि जीउ सदा धिआवहु जब लगु जीअ परान ॥ गुर सबदी मनु निरमलु होआ चूका मनि अभिमानु ॥ सफलु जनमु तिसु प्रानी केरा हरि कै नामि समान ॥१॥

मेरे मन गुर की सिख सुणीजै ॥ हरि का नामु सदा सुखदाता सहजे हरि रसु पीजै ॥१॥ रहाउ ॥

मूलु पछाणनि तिन निज घरि वासा सहजे ही सुखु होई ॥ गुर कै सबदि कमलु परगासिआ हउमै दुरमति खोई ॥ सभना महि एको सचु वरतै विरला बूझै कोई ॥२॥

गुरमती मनु निरमलु होआ अम्रितु ततु वखानै ॥ हरि का नामु सदा मनि वसिआ विचि मन ही मनु मानै ॥ सद बलिहारी गुर अपुने विटहु जितु आतम रामु पछानै ॥३॥

मानस जनमि सतिगुरू न सेविआ बिरथा जनमु गवाइआ ॥ नदरि करे तां सतिगुरु मेले सहजे सहजि समाइआ ॥ नानक नामु मिलै वडिआई पूरै भागि धिआइआ ॥४॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1334) प्रभाती महला ३ ॥
आपे भांति बणाए बहु रंगी सिसटि उपाइ प्रभि खेलु कीआ ॥ करि करि वेखै करे कराए सरब जीआ नो रिजकु दीआ ॥१॥

कली काल महि रविआ रामु ॥ घटि घटि पूरि रहिआ प्रभु एको गुरमुखि परगटु हरि हरि नामु ॥१॥ रहाउ ॥

गुपता नामु वरतै विचि कलजुगि घटि घटि हरि भरपूरि रहिआ ॥ नामु रतनु तिना हिरदै प्रगटिआ जो गुर सरणाई भजि पइआ ॥२॥

इंद्री पंच पंचे वसि आणै खिमा संतोखु गुरमति पावै ॥ सो धनु धनु हरि जनु वड पूरा जो भै बैरागि हरि गुण गावै ॥३॥

गुर ते मुहु फेरे जे कोई गुर का कहिआ न चिति धरै ॥ करि आचार बहु स्मपउ संचै जो किछु करै सु नरकि परै ॥४॥

एको सबदु एको प्रभु वरतै सभ एकसु ते उतपति चलै ॥ नानक गुरमुखि मेलि मिलाए गुरमुखि हरि हरि जाइ रलै ॥५॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 1334) प्रभाती महला ३ ॥
मेरे मन गुरु अपणा सालाहि ॥ पूरा भागु होवै मुखि मसतकि सदा हरि के गुण गाहि ॥१॥ रहाउ ॥

अम्रित नामु भोजनु हरि देइ ॥ कोटि मधे कोई विरला लेइ ॥ जिस नो अपणी नदरि करेइ ॥१॥

गुर के चरण मन माहि वसाइ ॥ दुखु अन्हेरा अंदरहु जाइ ॥ आपे साचा लए मिलाइ ॥२॥

गुर की बाणी सिउ लाइ पिआरु ॥ ऐथै ओथै एहु अधारु ॥ आपे देवै सिरजनहारु ॥३॥

सचा मनाए अपणा भाणा ॥ सोई भगतु सुघड़ु सोजाणा ॥ नानकु तिस कै सद कुरबाणा ॥४॥७॥१७॥७॥२४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1335) प्रभाती महला ४ ॥
उगवै सूरु गुरमुखि हरि बोलहि सभ रैनि सम्हालहि हरि गाल ॥ हमरै प्रभि हम लोच लगाई हम करह प्रभू हरि भाल ॥१॥

मेरा मनु साधू धूरि रवाल ॥ हरि हरि नामु द्रिड़ाइओ गुरि मीठा गुर पग झारह हम बाल ॥१॥ रहाउ ॥

साकत कउ दिनु रैनि अंधारी मोहि फाथे माइआ जाल ॥ खिनु पलु हरि प्रभु रिदै न वसिओ रिनि बाधे बहु बिधि बाल ॥२॥

सतसंगति मिलि मति बुधि पाई हउ छूटे ममता जाल ॥ हरि नामा हरि मीठ लगाना गुरि कीए सबदि निहाल ॥३॥

हम बारिक गुर अगम गुसाई गुर करि किरपा प्रतिपाल ॥ बिखु भउजल डुबदे काढि लेहु प्रभ गुर नानक बाल गुपाल ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1335) प्रभाती महला ४ ॥
इकु खिनु हरि प्रभि किरपा धारी गुन गाए रसक रसीक ॥ गावत सुनत दोऊ भए मुकते जिना गुरमुखि खिनु हरि पीक ॥१॥

मेरै मनि हरि हरि राम नामु रसु टीक ॥ गुरमुखि नामु सीतल जलु पाइआ हरि हरि नामु पीआ रसु झीक ॥१॥ रहाउ ॥

जिन हरि हिरदै प्रीति लगानी तिना मसतकि ऊजल टीक ॥ हरि जन सोभा सभ जग ऊपरि जिउ विचि उडवा ससि कीक ॥२॥

जिन हरि हिरदै नामु न वसिओ तिन सभि कारज फीक ॥ जैसे सीगारु करै देह मानुख नाम बिना नकटे नक कीक ॥३॥

घटि घटि रमईआ रमत राम राइ सभ वरतै सभ महि ईक ॥ जन नानक कउ हरि किरपा धारी गुर बचन धिआइओ घरी मीक ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1336) प्रभाती महला ४ ॥
अगम दइआल क्रिपा प्रभि धारी मुखि हरि हरि नामु हम कहे ॥ पतित पावन हरि नामु धिआइओ सभि किलबिख पाप लहे ॥१॥

जपि मन राम नामु रवि रहे ॥ दीन दइआलु दुख भंजनु गाइओ गुरमति नामु पदारथु लहे ॥१॥ रहाउ ॥

काइआ नगरि नगरि हरि बसिओ मति गुरमति हरि हरि सहे ॥ सरीरि सरोवरि नामु हरि प्रगटिओ घरि मंदरि हरि प्रभु लहे ॥२॥

जो नर भरमि भरमि उदिआने ते साकत मूड़ मुहे ॥ जिउ म्रिग नाभि बसै बासु बसना भ्रमि भ्रमिओ झार गहे ॥३॥

तुम वड अगम अगाधि बोधि प्रभ मति देवहु हरि प्रभ लहे ॥ जन नानक कउ गुरि हाथु सिरि धरिओ हरि राम नामि रवि रहे ॥४॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1336) प्रभाती महला ४ ॥
मनि लागी प्रीति राम नाम हरि हरि जपिओ हरि प्रभु वडफा ॥ सतिगुर बचन सुखाने हीअरै हरि धारी हरि प्रभ क्रिपफा ॥१॥

मेरे मन भजु राम नाम हरि निमखफा ॥ हरि हरि दानु दीओ गुरि पूरै हरि नामा मनि तनि बसफा ॥१॥ रहाउ ॥

काइआ नगरि वसिओ घरि मंदरि जपि सोभा गुरमुखि करपफा ॥ हलति पलति जन भए सुहेले मुख ऊजल गुरमुखि तरफा ॥२॥

अनभउ हरि हरि हरि लिव लागी हरि उर धारिओ गुरि निमखफा ॥ कोटि कोटि के दोख सभ जन के हरि दूरि कीए इक पलफा ॥३॥

तुमरे जन तुम ही ते जाने प्रभ जानिओ जन ते मुखफा ॥ हरि हरि आपु धरिओ हरि जन महि जन नानकु हरि प्रभु इकफा ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 1337) प्रभाती महला ४ ॥
गुर सतिगुरि नामु द्रिड़ाइओ हरि हरि हम मुए जीवे हरि जपिभा ॥ धनु धंनु गुरू गुरु सतिगुरु पूरा बिखु डुबदे बाह देइ कढिभा ॥१॥

जपि मन राम नामु अरधांभा ॥ उपज्मपि उपाइ न पाईऐ कतहू गुरि पूरै हरि प्रभु लाभा ॥१॥ रहाउ ॥

राम नामु रसु राम रसाइणु रसु पीआ गुरमति रसभा ॥ लोह मनूर कंचनु मिलि संगति हरि उर धारिओ गुरि हरिभा ॥२॥

हउमै बिखिआ नित लोभि लुभाने पुत कलत मोहि लुभिभा ॥ तिन पग संत न सेवे कबहू ते मनमुख भू्मभर भरभा ॥३॥

तुमरे गुन तुम ही प्रभ जानहु हम परे हारि तुम सरनभा ॥ जिउ जानहु तिउ राखहु सुआमी जन नानकु दासु तुमनभा ॥४॥६॥ छका १ ॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1338) प्रभाती महला ५ ॥
प्रभ की सेवा जन की सोभा ॥ काम क्रोध मिटे तिसु लोभा ॥ नामु तेरा जन कै भंडारि ॥ गुन गावहि प्रभ दरस पिआरि ॥१॥

तुमरी भगति प्रभ तुमहि जनाई ॥ काटि जेवरी जन लीए छडाई ॥१॥ रहाउ ॥

जो जनु राता प्रभ कै रंगि ॥ तिनि सुखु पाइआ प्रभ कै संगि ॥ जिसु रसु आइआ सोई जानै ॥ पेखि पेखि मन महि हैरानै ॥२॥

सो सुखीआ सभ ते ऊतमु सोइ ॥ जा कै ह्रिदै वसिआ प्रभु सोइ ॥ सोई निहचलु आवै न जाइ ॥ अनदिनु प्रभ के हरि गुण गाइ ॥३॥

ता कउ करहु सगल नमसकारु ॥ जा कै मनि पूरनु निरंकारु ॥ करि किरपा मोहि ठाकुर देवा ॥ नानकु उधरै जन की सेवा ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1338) प्रभाती महला ५ ॥
गुन गावत मनि होइ अनंद ॥ आठ पहर सिमरउ भगवंत ॥ जा कै सिमरनि कलमल जाहि ॥ तिसु गुर की हम चरनी पाहि ॥१॥

सुमति देवहु संत पिआरे ॥ सिमरउ नामु मोहि निसतारे ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि गुरि कहिआ मारगु सीधा ॥ सगल तिआगि नामि हरि गीधा ॥ तिसु गुर कै सदा बलि जाईऐ ॥ हरि सिमरनु जिसु गुर ते पाईऐ ॥२॥

बूडत प्रानी जिनि गुरहि तराइआ ॥ जिसु प्रसादि मोहै नही माइआ ॥ हलतु पलतु जिनि गुरहि सवारिआ ॥ तिसु गुर ऊपरि सदा हउ वारिआ ॥३॥

महा मुगध ते कीआ गिआनी ॥ गुर पूरे की अकथ कहानी ॥ पारब्रहम नानक गुरदेव ॥ वडै भागि पाईऐ हरि सेव ॥४॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1338) प्रभाती महला ५ ॥
सगले दूख मिटे सुख दीए अपना नामु जपाइआ ॥ करि किरपा अपनी सेवा लाए सगला दुरतु मिटाइआ ॥१॥

हम बारिक सरनि प्रभ दइआल ॥ अवगण काटि कीए प्रभि अपुने राखि लीए मेरै गुर गोपालि ॥१॥ रहाउ ॥

ताप पाप बिनसे खिन भीतरि भए क्रिपाल गुसाई ॥ सासि सासि पारब्रहमु अराधी अपुने सतिगुर कै बलि जाई ॥२॥

अगम अगोचरु बिअंतु सुआमी ता का अंतु न पाईऐ ॥ लाहा खाटि होईऐ धनवंता अपुना प्रभू धिआईऐ ॥३॥

आठ पहर पारब्रहमु धिआई सदा सदा गुन गाइआ ॥ कहु नानक मेरे पूरे मनोरथ पारब्रहमु गुरु पाइआ ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1339) प्रभाती महला ५ ॥
सिमरत नामु किलबिख सभि नासे ॥ सचु नामु गुरि दीनी रासे ॥ प्रभ की दरगह सोभावंते ॥ सेवक सेवि सदा सोहंते ॥१॥

हरि हरि नामु जपहु मेरे भाई ॥ सगले रोग दोख सभि बिनसहि अगिआनु अंधेरा मन ते जाई ॥१॥ रहाउ ॥

जनम मरन गुरि राखे मीत ॥ हरि के नाम सिउ लागी प्रीति ॥ कोटि जनम के गए कलेस ॥ जो तिसु भावै सो भल होस ॥२॥

तिसु गुर कउ हउ सद बलि जाई ॥ जिसु प्रसादि हरि नामु धिआई ॥ ऐसा गुरु पाईऐ वडभागी ॥ जिसु मिलते राम लिव लागी ॥३॥

करि किरपा पारब्रहम सुआमी ॥ सगल घटा के अंतरजामी ॥ आठ पहर अपुनी लिव लाइ ॥ जनु नानकु प्रभ की सरनाइ ॥४॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1339) प्रभाती महला ५ ॥
करि किरपा अपुने प्रभि कीए ॥ हरि का नामु जपन कउ दीए ॥ आठ पहर गुन गाइ गुबिंद ॥ भै बिनसे उतरी सभ चिंद ॥१॥

उबरे सतिगुर चरनी लागि ॥ जो गुरु कहै सोई भल मीठा मन की मति तिआगि ॥१॥ रहाउ ॥

मनि तनि वसिआ हरि प्रभु सोई ॥ कलि कलेस किछु बिघनु न होई ॥ सदा सदा प्रभु जीअ कै संगि ॥ उतरी मैलु नाम कै रंगि ॥२॥

चरन कमल सिउ लागो पिआरु ॥ बिनसे काम क्रोध अहंकार ॥ प्रभ मिलन का मारगु जानां ॥ भाइ भगति हरि सिउ मनु मानां ॥३॥

सुणि सजण संत मीत सुहेले ॥ नामु रतनु हरि अगह अतोले ॥ सदा सदा प्रभु गुण निधि गाईऐ ॥ कहु नानक वडभागी पाईऐ ॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1339) प्रभाती महला ५ ॥
से धनवंत सेई सचु साहा ॥ हरि की दरगह नामु विसाहा ॥१॥

हरि हरि नामु जपहु मन मीत ॥ गुरु पूरा पाईऐ वडभागी निरमल पूरन रीति ॥१॥ रहाउ ॥

पाइआ लाभु वजी वाधाई ॥ संत प्रसादि हरि के गुन गाई ॥२॥

सफल जनमु जीवन परवाणु ॥ गुर परसादी हरि रंगु माणु ॥३॥

बिनसे काम क्रोध अहंकार ॥ नानक गुरमुखि उतरहि पारि ॥४॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1339) प्रभाती महला ५ ॥
गुरु पूरा पूरी ता की कला ॥ गुर का सबदु सदा सद अटला ॥ गुर की बाणी जिसु मनि वसै ॥ दूखु दरदु सभु ता का नसै ॥१॥

हरि रंगि राता मनु राम गुन गावै ॥ मुकतो साधू धूरी नावै ॥१॥ रहाउ ॥

गुर परसादी उतरे पारि ॥ भउ भरमु बिनसे बिकार ॥ मन तन अंतरि बसे गुर चरना ॥ निरभै साध परे हरि सरना ॥२॥

अनद सहज रस सूख घनेरे ॥ दुसमनु दूखु न आवै नेरे ॥ गुरि पूरै अपुने करि राखे ॥ हरि नामु जपत किलबिख सभि लाथे ॥३॥

संत साजन सिख भए सुहेले ॥ गुरि पूरै प्रभ सिउ लै मेले ॥ जनम मरन दुख फाहा काटिआ ॥ कहु नानक गुरि पड़दा ढाकिआ ॥४॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1340) प्रभाती महला ५ ॥
सतिगुरि पूरै नामु दीआ ॥ अनद मंगल कलिआण सदा सुखु कारजु सगला रासि थीआ ॥१॥ रहाउ ॥

चरन कमल गुर के मनि वूठे ॥ दूख दरद भ्रम बिनसे झूठे ॥१॥

नित उठि गावहु प्रभ की बाणी ॥ आठ पहर हरि सिमरहु प्राणी ॥२॥

घरि बाहरि प्रभु सभनी थाई ॥ संगि सहाई जह हउ जाई ॥३॥

दुइ कर जोड़ि करी अरदासि ॥ सदा जपे नानकु गुणतासु ॥४॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1340) प्रभाती महला ५ ॥
पारब्रहमु प्रभु सुघड़ सुजाणु ॥ गुरु पूरा पाईऐ वडभागी दरसन कउ जाईऐ कुरबाणु ॥१॥ रहाउ ॥

किलबिख मेटे सबदि संतोखु ॥ नामु अराधन होआ जोगु ॥ साधसंगि होआ परगासु ॥ चरन कमल मन माहि निवासु ॥१॥

जिनि कीआ तिनि लीआ राखि ॥ प्रभु पूरा अनाथ का नाथु ॥ जिसहि निवाजे किरपा धारि ॥ पूरन करम ता के आचार ॥२॥

गुण गावै नित नित नित नवे ॥ लख चउरासीह जोनि न भवे ॥ ईहां ऊहां चरण पूजारे ॥ मुखु ऊजलु साचे दरबारे ॥३॥

जिसु मसतकि गुरि धरिआ हाथु ॥ कोटि मधे को विरला दासु ॥ जलि थलि महीअलि पेखै भरपूरि ॥ नानक उधरसि तिसु जन की धूरि ॥४॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 1340) प्रभाती महला ५ ॥
कुरबाणु जाई गुर पूरे अपने ॥ जिसु प्रसादि हरि हरि जपु जपने ॥१॥ रहाउ ॥

अम्रित बाणी सुणत निहाल ॥ बिनसि गए बिखिआ जंजाल ॥१॥

साच सबद सिउ लागी प्रीति ॥ हरि प्रभु अपुना आइआ चीति ॥२॥

नामु जपत होआ परगासु ॥ गुर सबदे कीना रिदै निवासु ॥३॥

गुर समरथ सदा दइआल ॥ हरि जपि जपि नानक भए निहाल ॥४॥११॥


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