राग जैतसरी - बाणी शब्द, Raag Jaitsiri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू रामदास जी -- SGGS 696) जैतसरी महला ४ घरु १ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरै हीअरै रतनु नामु हरि बसिआ गुरि हाथु धरिओ मेरै माथा ॥ जनम जनम के किलबिख दुख उतरे गुरि नामु दीओ रिनु लाथा ॥१॥

मेरे मन भजु राम नामु सभि अरथा ॥ गुरि पूरै हरि नामु द्रिड़ाइआ बिनु नावै जीवनु बिरथा ॥ रहाउ ॥

बिनु गुर मूड़ भए है मनमुख ते मोह माइआ नित फाथा ॥ तिन साधू चरण न सेवे कबहू तिन सभु जनमु अकाथा ॥२॥

जिन साधू चरण साध पग सेवे तिन सफलिओ जनमु सनाथा ॥ मो कउ कीजै दासु दास दासन को हरि दइआ धारि जगंनाथा ॥३॥

हम अंधुले गिआनहीन अगिआनी किउ चालह मारगि पंथा ॥ हम अंधुले कउ गुर अंचलु दीजै जन नानक चलह मिलंथा ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 696) जैतसरी महला ४ ॥
हीरा लालु अमोलकु है भारी बिनु गाहक मीका काखा ॥ रतन गाहकु गुरु साधू देखिओ तब रतनु बिकानो लाखा ॥१॥

मेरै मनि गुपत हीरु हरि राखा ॥ दीन दइआलि मिलाइओ गुरु साधू गुरि मिलिऐ हीरु पराखा ॥ रहाउ ॥

मनमुख कोठी अगिआनु अंधेरा तिन घरि रतनु न लाखा ॥ ते ऊझड़ि भरमि मुए गावारी माइआ भुअंग बिखु चाखा ॥२॥

हरि हरि साध मेलहु जन नीके हरि साधू सरणि हम राखा ॥ हरि अंगीकारु करहु प्रभ सुआमी हम परे भागि तुम पाखा ॥३॥

जिहवा किआ गुण आखि वखाणह तुम वड अगम वड पुरखा ॥ जन नानक हरि किरपा धारी पाखाणु डुबत हरि राखा ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 697) जैतसरी मः ४ ॥
हम बारिक कछूअ न जानह गति मिति तेरे मूरख मुगध इआना ॥ हरि किरपा धारि दीजै मति ऊतम करि लीजै मुगधु सिआना ॥१॥

मेरा मनु आलसीआ उघलाना ॥ हरि हरि आनि मिलाइओ गुरु साधू मिलि साधू कपट खुलाना ॥ रहाउ ॥

गुर खिनु खिनु प्रीति लगावहु मेरै हीअरै मेरे प्रीतम नामु पराना ॥ बिनु नावै मरि जाईऐ मेरे ठाकुर जिउ अमली अमलि लुभाना ॥२॥

जिन मनि प्रीति लगी हरि केरी तिन धुरि भाग पुराना ॥ तिन हम चरण सरेवह खिनु खिनु जिन हरि मीठ लगाना ॥३॥

हरि हरि क्रिपा धारी मेरै ठाकुरि जनु बिछुरिआ चिरी मिलाना ॥ धनु धनु सतिगुरु जिनि नामु द्रिड़ाइआ जनु नानकु तिसु कुरबाना ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 697) जैतसरी महला ४ ॥
सतिगुरु साजनु पुरखु वड पाइआ हरि रसकि रसकि फल लागिबा ॥ माइआ भुइअंग ग्रसिओ है प्राणी गुर बचनी बिसु हरि काढिबा ॥१॥

मेरा मनु राम नाम रसि लागिबा ॥ हरि कीए पतित पवित्र मिलि साध गुर हरि नामै हरि रसु चाखिबा ॥ रहाउ ॥

धनु धनु वडभाग मिलिओ गुरु साधू मिलि साधू लिव उनमनि लागिबा ॥ त्रिसना अगनि बुझी सांति पाई हरि निरमल निरमल गुन गाइबा ॥२॥

तिन के भाग खीन धुरि पाए जिन सतिगुर दरसु न पाइबा ॥ ते दूजै भाइ पवहि ग्रभ जोनी सभु बिरथा जनमु तिन जाइबा ॥३॥

हरि देहु बिमल मति गुर साध पग सेवह हम हरि मीठ लगाइबा ॥ जनु नानकु रेण साध पग मागै हरि होइ दइआलु दिवाइबा ॥४॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 697) जैतसरी महला ४ ॥
जिन हरि हिरदै नामु न बसिओ तिन मात कीजै हरि बांझा ॥ तिन सुंञी देह फिरहि बिनु नावै ओइ खपि खपि मुए करांझा ॥१॥

मेरे मन जपि राम नामु हरि माझा ॥ हरि हरि क्रिपालि क्रिपा प्रभि धारी गुरि गिआनु दीओ मनु समझा ॥ रहाउ ॥

हरि कीरति कलजुगि पदु ऊतमु हरि पाईऐ सतिगुर माझा ॥ हउ बलिहारी सतिगुर अपुने जिनि गुपतु नामु परगाझा ॥२॥

दरसनु साध मिलिओ वडभागी सभि किलबिख गए गवाझा ॥ सतिगुरु साहु पाइआ वड दाणा हरि कीए बहु गुण साझा ॥३॥

जिन कउ क्रिपा करी जगजीवनि हरि उरि धारिओ मन माझा ॥ धरम राइ दरि कागद फारे जन नानक लेखा समझा ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 698) जैतसरी महला ४ ॥
सतसंगति साध पाई वडभागी मनु चलतौ भइओ अरूड़ा ॥ अनहत धुनि वाजहि नित वाजे हरि अम्रित धार रसि लीड़ा ॥१॥

मेरे मन जपि राम नामु हरि रूड़ा ॥ मेरै मनि तनि प्रीति लगाई सतिगुरि हरि मिलिओ लाइ झपीड़ा ॥ रहाउ ॥

साकत बंध भए है माइआ बिखु संचहि लाइ जकीड़ा ॥ हरि कै अरथि खरचि नह साकहि जमकालु सहहि सिरि पीड़ा ॥२॥

जिन हरि अरथि सरीरु लगाइआ गुर साधू बहु सरधा लाइ मुखि धूड़ा ॥ हलति पलति हरि सोभा पावहि हरि रंगु लगा मनि गूड़ा ॥३॥

हरि हरि मेलि मेलि जन साधू हम साध जना का कीड़ा ॥ जन नानक प्रीति लगी पग साध गुर मिलि साधू पाखाणु हरिओ मनु मूड़ा ॥४॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 698) जैतसरी महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि सिमरहु अगम अपारा ॥ जिसु सिमरत दुखु मिटै हमारा ॥ हरि हरि सतिगुरु पुरखु मिलावहु गुरि मिलिऐ सुखु होई राम ॥१॥

हरि गुण गावहु मीत हमारे ॥ हरि हरि नामु रखहु उर धारे ॥ हरि हरि अम्रित बचन सुणावहु गुर मिलिऐ परगटु होई राम ॥२॥

मधुसूदन हरि माधो प्राना ॥ मेरै मनि तनि अम्रित मीठ लगाना ॥ हरि हरि दइआ करहु गुरु मेलहु पुरखु निरंजनु सोई राम ॥३॥

हरि हरि नामु सदा सुखदाता ॥ हरि कै रंगि मेरा मनु राता ॥ हरि हरि महा पुरखु गुरु मेलहु गुर नानक नामि सुखु होई राम ॥४॥१॥७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 698) जैतसरी मः ४ ॥
हरि हरि हरि हरि नामु जपाहा ॥ गुरमुखि नामु सदा लै लाहा ॥ हरि हरि हरि हरि भगति द्रिड़ावहु हरि हरि नामु ओमाहा राम ॥१॥

हरि हरि नामु दइआलु धिआहा ॥ हरि कै रंगि सदा गुण गाहा ॥ हरि हरि हरि जसु घूमरि पावहु मिलि सतसंगि ओमाहा राम ॥२॥

आउ सखी हरि मेलि मिलाहा ॥ सुणि हरि कथा नामु लै लाहा ॥ हरि हरि क्रिपा धारि गुर मेलहु गुरि मिलिऐ हरि ओमाहा राम ॥३॥

करि कीरति जसु अगम अथाहा ॥ खिनु खिनु राम नामु गावाहा ॥ मो कउ धारि क्रिपा मिलीऐ गुर दाते हरि नानक भगति ओमाहा राम ॥४॥२॥८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 699) जैतसरी मः ४ ॥
रसि रसि रामु रसालु सलाहा ॥ मनु राम नामि भीना लै लाहा ॥ खिनु खिनु भगति करह दिनु राती गुरमति भगति ओमाहा राम ॥१॥

हरि हरि गुण गोविंद जपाहा ॥ मनु तनु जीति सबदु लै लाहा ॥ गुरमति पंच दूत वसि आवहि मनि तनि हरि ओमाहा राम ॥२॥

नामु रतनु हरि नामु जपाहा ॥ हरि गुण गाइ सदा लै लाहा ॥ दीन दइआल क्रिपा करि माधो हरि हरि नामु ओमाहा राम ॥३॥

जपि जगदीसु जपउ मन माहा ॥ हरि हरि जगंनाथु जगि लाहा ॥ धनु धनु वडे ठाकुर प्रभ मेरे जपि नानक भगति ओमाहा राम ॥४॥३॥९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 699) जैतसरी महला ४ ॥
आपे जोगी जुगति जुगाहा ॥ आपे निरभउ ताड़ी लाहा ॥ आपे ही आपि आपि वरतै आपे नामि ओमाहा राम ॥१॥

आपे दीप लोअ दीपाहा ॥ आपे सतिगुरु समुंदु मथाहा ॥ आपे मथि मथि ततु कढाए जपि नामु रतनु ओमाहा राम ॥२॥

सखी मिलहु मिलि गुण गावाहा ॥ गुरमुखि नामु जपहु हरि लाहा ॥ हरि हरि भगति द्रिड़ी मनि भाई हरि हरि नामु ओमाहा राम ॥३॥

आपे वड दाणा वड साहा ॥ गुरमुखि पूंजी नामु विसाहा ॥ हरि हरि दाति करहु प्रभ भावै गुण नानक नामु ओमाहा राम ॥४॥४॥१०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 699) जैतसरी महला ४ ॥
मिलि सतसंगति संगि गुराहा ॥ पूंजी नामु गुरमुखि वेसाहा ॥ हरि हरि क्रिपा धारि मधुसूदन मिलि सतसंगि ओमाहा राम ॥१॥

हरि गुण बाणी स्रवणि सुणाहा ॥ करि किरपा सतिगुरू मिलाहा ॥ गुण गावह गुण बोलह बाणी हरि गुण जपि ओमाहा राम ॥२॥

सभि तीरथ वरत जग पुंन तोलाहा ॥ हरि हरि नाम न पुजहि पुजाहा ॥ हरि हरि अतुलु तोलु अति भारी गुरमति जपि ओमाहा राम ॥३॥

सभि करम धरम हरि नामु जपाहा ॥ किलविख मैलु पाप धोवाहा ॥ दीन दइआल होहु जन ऊपरि देहु नानक नामु ओमाहा राम ॥४॥५॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 700) जैतसरी महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोई जानै कवनु ईहा जगि मीतु ॥ जिसु होइ क्रिपालु सोई बिधि बूझै ता की निरमल रीति ॥१॥ रहाउ ॥

मात पिता बनिता सुत बंधप इसट मीत अरु भाई ॥ पूरब जनम के मिले संजोगी अंतहि को न सहाई ॥१॥

मुकति माल कनिक लाल हीरा मन रंजन की माइआ ॥ हा हा करत बिहानी अवधहि ता महि संतोखु न पाइआ ॥२॥

हसति रथ अस्व पवन तेज धणी भूमन चतुरांगा ॥ संगि न चालिओ इन महि कछूऐ ऊठि सिधाइओ नांगा ॥३॥

हरि के संत प्रिअ प्रीतम प्रभ के ता कै हरि हरि गाईऐ ॥ नानक ईहा सुखु आगै मुख ऊजल संगि संतन कै पाईऐ ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 700) जैतसरी महला ५ घरु ३ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देहु संदेसरो कहीअउ प्रिअ कहीअउ ॥ बिसमु भई मै बहु बिधि सुनते कहहु सुहागनि सहीअउ ॥१॥ रहाउ ॥

को कहतो सभ बाहरि बाहरि को कहतो सभ महीअउ ॥ बरनु न दीसै चिहनु न लखीऐ सुहागनि साति बुझहीअउ ॥१॥

सरब निवासी घटि घटि वासी लेपु नही अलपहीअउ ॥ नानकु कहत सुनहु रे लोगा संत रसन को बसहीअउ ॥२॥१॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 700) जैतसरी मः ५ ॥
धीरउ सुनि धीरउ प्रभ कउ ॥१॥ रहाउ ॥

जीअ प्रान मनु तनु सभु अरपउ नीरउ पेखि प्रभ कउ नीरउ ॥१॥

बेसुमार बेअंतु बड दाता मनहि गहीरउ पेखि प्रभ कउ ॥२॥

जो चाहउ सोई सोई पावउ आसा मनसा पूरउ जपि प्रभ कउ ॥३॥

गुर प्रसादि नानक मनि वसिआ दूखि न कबहू झूरउ बुझि प्रभ कउ ॥४॥२॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 700) जैतसरी महला ५ ॥
लोड़ीदड़ा साजनु मेरा ॥ घरि घरि मंगल गावहु नीके घटि घटि तिसहि बसेरा ॥१॥ रहाउ ॥

सूखि अराधनु दूखि अराधनु बिसरै न काहू बेरा ॥ नामु जपत कोटि सूर उजारा बिनसै भरमु अंधेरा ॥१॥

थानि थनंतरि सभनी जाई जो दीसै सो तेरा ॥ संतसंगि पावै जो नानक तिसु बहुरि न होई है फेरा ॥२॥३॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 701) जैतसरी महला ५ घरु ४ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अब मै सुखु पाइओ गुर आग्यि ॥ तजी सिआनप चिंत विसारी अहं छोडिओ है तिआग्यि ॥१॥ रहाउ ॥

जउ देखउ तउ सगल मोहि मोहीअउ तउ सरनि परिओ गुर भागि ॥ करि किरपा टहल हरि लाइओ तउ जमि छोडी मोरी लागि ॥१॥

तरिओ सागरु पावक को जउ संत भेटे वड भागि ॥ जन नानक सरब सुख पाए मोरो हरि चरनी चितु लागि ॥२॥१॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 701) जैतसरी महला ५ ॥
मन महि सतिगुर धिआनु धरा ॥ द्रिड़्हिओ गिआनु मंत्रु हरि नामा प्रभ जीउ मइआ करा ॥१॥ रहाउ ॥

काल जाल अरु महा जंजाला छुटके जमहि डरा ॥ आइओ दुख हरण सरण करुणापति गहिओ चरण आसरा ॥१॥

नाव रूप भइओ साधसंगु भव निधि पारि परा ॥ अपिउ पीओ गतु थीओ भरमा कहु नानक अजरु जरा ॥२॥२॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 701) जैतसरी महला ५ ॥
जा कउ भए गोविंद सहाई ॥ सूख सहज आनंद सगल सिउ वा कउ बिआधि न काई ॥१॥ रहाउ ॥

दीसहि सभ संगि रहहि अलेपा नह विआपै उन माई ॥ एकै रंगि तत के बेते सतिगुर ते बुधि पाई ॥१॥

दइआ मइआ किरपा ठाकुर की सेई संत सुभाई ॥ तिन कै संगि नानक निसतरीऐ जिन रसि रसि हरि गुन गाई ॥२॥३॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 701) जैतसरी महला ५ ॥
गोबिंद जीवन प्रान धन रूप ॥ अगिआन मोह मगन महा प्रानी अंधिआरे महि दीप ॥१॥ रहाउ ॥

सफल दरसनु तुमरा प्रभ प्रीतम चरन कमल आनूप ॥ अनिक बार करउ तिह बंदन मनहि चर्हावउ धूप ॥१॥

हारि परिओ तुम्हरै प्रभ दुआरै द्रिड़्हु करि गही तुम्हारी लूक ॥ काढि लेहु नानक अपुने कउ संसार पावक के कूप ॥२॥४॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 701) जैतसरी महला ५ ॥
कोई जनु हरि सिउ देवै जोरि ॥ चरन गहउ बकउ सुभ रसना दीजहि प्रान अकोरि ॥१॥ रहाउ ॥

मनु तनु निरमल करत किआरो हरि सिंचै सुधा संजोरि ॥ इआ रस महि मगनु होत किरपा ते महा बिखिआ ते तोरि ॥१॥

आइओ सरणि दीन दुख भंजन चितवउ तुम्हरी ओरि ॥ अभै पदु दानु सिमरनु सुआमी को प्रभ नानक बंधन छोरि ॥२॥५॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 702) जैतसरी महला ५ ॥
चात्रिक चितवत बरसत मेंह ॥ क्रिपा सिंधु करुणा प्रभ धारहु हरि प्रेम भगति को नेंह ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक सूख चकवी नही चाहत अनद पूरन पेखि देंह ॥ आन उपाव न जीवत मीना बिनु जल मरना तेंह ॥१॥

हम अनाथ नाथ हरि सरणी अपुनी क्रिपा करेंह ॥ चरण कमल नानकु आराधै तिसु बिनु आन न केंह ॥२॥६॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 702) जैतसरी महला ५ ॥
मनि तनि बसि रहे मेरे प्रान ॥ करि किरपा साधू संगि भेटे पूरन पुरख सुजान ॥१॥ रहाउ ॥

प्रेम ठगउरी जिन कउ पाई तिन रसु पीअउ भारी ॥ ता की कीमति कहणु न जाई कुदरति कवन हम्हारी ॥१॥

लाइ लए लड़ि दास जन अपुने उधरे उधरनहारे ॥ प्रभु सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइओ नानक सरणि दुआरे ॥२॥७॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 702) जैतसरी महला ५ ॥
आए अनिक जनम भ्रमि सरणी ॥ उधरु देह अंध कूप ते लावहु अपुनी चरणी ॥१॥ रहाउ ॥

गिआनु धिआनु किछु करमु न जाना नाहिन निरमल करणी ॥ साधसंगति कै अंचलि लावहु बिखम नदी जाइ तरणी ॥१॥

सुख स्मपति माइआ रस मीठे इह नही मन महि धरणी ॥ हरि दरसन त्रिपति नानक दास पावत हरि नाम रंग आभरणी ॥२॥८॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 702) जैतसरी महला ५ ॥
हरि जन सिमरहु हिरदै राम ॥ हरि जन कउ अपदा निकटि न आवै पूरन दास के काम ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि बिघन बिनसहि हरि सेवा निहचलु गोविद धाम ॥ भगवंत भगत कउ भउ किछु नाही आदरु देवत जाम ॥१॥

तजि गोपाल आन जो करणी सोई सोई बिनसत खाम ॥ चरन कमल हिरदै गहु नानक सुख समूह बिसराम ॥२॥९॥१३॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 702) जैतसरी महला ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भूलिओ मनु माइआ उरझाइओ ॥ जो जो करम कीओ लालच लगि तिह तिह आपु बंधाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

समझ न परी बिखै रस रचिओ जसु हरि को बिसराइओ ॥ संगि सुआमी सो जानिओ नाहिन बनु खोजन कउ धाइओ ॥१॥

रतनु रामु घट ही के भीतरि ता को गिआनु न पाइओ ॥ जन नानक भगवंत भजन बिनु बिरथा जनमु गवाइओ ॥२॥१॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 703) जैतसरी महला ९ ॥
हरि जू राखि लेहु पति मेरी ॥ जम को त्रास भइओ उर अंतरि सरनि गही किरपा निधि तेरी ॥१॥ रहाउ ॥

महा पतित मुगध लोभी फुनि करत पाप अब हारा ॥ भै मरबे को बिसरत नाहिन तिह चिंता तनु जारा ॥१॥

कीए उपाव मुकति के कारनि दह दिसि कउ उठि धाइआ ॥ घट ही भीतरि बसै निरंजनु ता को मरमु न पाइआ ॥२॥

नाहिन गुनु नाहिन कछु जपु तपु कउनु करमु अब कीजै ॥ नानक हारि परिओ सरनागति अभै दानु प्रभ दीजै ॥३॥२॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 703) जैतसरी महला ९ ॥
मन रे साचा गहो बिचारा ॥ राम नाम बिनु मिथिआ मानो सगरो इहु संसारा ॥१॥ रहाउ ॥

जा कउ जोगी खोजत हारे पाइओ नाहि तिह पारा ॥ सो सुआमी तुम निकटि पछानो रूप रेख ते निआरा ॥१॥

पावन नामु जगत मै हरि को कबहू नाहि स्मभारा ॥ नानक सरनि परिओ जग बंदन राखहु बिरदु तुहारा ॥२॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 703) जैतसरी महला ५ छंत घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक ॥
दरसन पिआसी दिनसु राति चितवउ अनदिनु नीत ॥ खोल्हि कपट गुरि मेलीआ नानक हरि संगि मीत ॥१॥

छंत ॥
सुणि यार हमारे सजण इक करउ बेनंतीआ ॥ तिसु मोहन लाल पिआरे हउ फिरउ खोजंतीआ ॥ तिसु दसि पिआरे सिरु धरी उतारे इक भोरी दरसनु दीजै ॥ नैन हमारे प्रिअ रंग रंगारे इकु तिलु भी ना धीरीजै ॥ प्रभ सिउ मनु लीना जिउ जल मीना चात्रिक जिवै तिसंतीआ ॥ जन नानक गुरु पूरा पाइआ सगली तिखा बुझंतीआ ॥१॥

यार वे प्रिअ हभे सखीआ मू कही न जेहीआ ॥ यार वे हिक डूं हिकि चाड़ै हउ किसु चितेहीआ ॥ हिक दूं हिकि चाड़े अनिक पिआरे नित करदे भोग बिलासा ॥ तिना देखि मनि चाउ उठंदा हउ कदि पाई गुणतासा ॥ जिनी मैडा लालु रीझाइआ हउ तिसु आगै मनु डेंहीआ ॥ नानकु कहै सुणि बिनउ सुहागणि मू दसि डिखा पिरु केहीआ ॥२॥

यार वे पिरु आपण भाणा किछु नीसी छंदा ॥ यार वे तै राविआ लालनु मू दसि दसंदा ॥ लालनु तै पाइआ आपु गवाइआ जै धन भाग मथाणे ॥ बांह पकड़ि ठाकुरि हउ घिधी गुण अवगण न पछाणे ॥ गुण हारु तै पाइआ रंगु लालु बणाइआ तिसु हभो किछु सुहंदा ॥ जन नानक धंनि सुहागणि साई जिसु संगि भतारु वसंदा ॥३॥

यार वे नित सुख सुखेदी सा मै पाई ॥ वरु लोड़ीदा आइआ वजी वाधाई ॥ महा मंगलु रहसु थीआ पिरु दइआलु सद नव रंगीआ ॥ वड भागि पाइआ गुरि मिलाइआ साध कै सतसंगीआ ॥ आसा मनसा सगल पूरी प्रिअ अंकि अंकु मिलाई ॥ बिनवंति नानकु सुख सुखेदी सा मै गुर मिलि पाई ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 704) जैतसरी महला ५ घरु २ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु ॥
ऊचा अगम अपार प्रभु कथनु न जाइ अकथु ॥ नानक प्रभ सरणागती राखन कउ समरथु ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 704) छंतु ॥
जिउ जानहु तिउ राखु हरि प्रभ तेरिआ ॥ केते गनउ असंख अवगण मेरिआ ॥ असंख अवगण खते फेरे नितप्रति सद भूलीऐ ॥ मोह मगन बिकराल माइआ तउ प्रसादी घूलीऐ ॥ लूक करत बिकार बिखड़े प्रभ नेर हू ते नेरिआ ॥ बिनवंति नानक दइआ धारहु काढि भवजल फेरिआ ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 704) सलोकु ॥
निरति न पवै असंख गुण ऊचा प्रभ का नाउ ॥ नानक की बेनंतीआ मिलै निथावे थाउ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 704) छंतु ॥
दूसर नाही ठाउ का पहि जाईऐ ॥ आठ पहर कर जोड़ि सो प्रभु धिआईऐ ॥ धिआइ सो प्रभु सदा अपुना मनहि चिंदिआ पाईऐ ॥ तजि मान मोहु विकारु दूजा एक सिउ लिव लाईऐ ॥ अरपि मनु तनु प्रभू आगै आपु सगल मिटाईऐ ॥ बिनवंति नानकु धारि किरपा साचि नामि समाईऐ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 704) सलोकु ॥
रे मन ता कउ धिआईऐ सभ बिधि जा कै हाथि ॥ राम नाम धनु संचीऐ नानक निबहै साथि ॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 704) छंतु ॥
साथीअड़ा प्रभु एकु दूसर नाहि कोइ ॥ थान थनंतरि आपि जलि थलि पूर सोइ ॥ जलि थलि महीअलि पूरि रहिआ सरब दाता प्रभु धनी ॥ गोपाल गोबिंद अंतु नाही बेअंत गुण ता के किआ गनी ॥ भजु सरणि सुआमी सुखह गामी तिसु बिना अन नाहि कोइ ॥ बिनवंति नानक दइआ धारहु तिसु परापति नामु होइ ॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 705) सलोकु ॥
चिति जि चितविआ सो मै पाइआ ॥ नानक नामु धिआइ सुख सबाइआ ॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 705) छंतु ॥
अब मनु छूटि गइआ साधू संगि मिले ॥ गुरमुखि नामु लइआ जोती जोति रले ॥ हरि नामु सिमरत मिटे किलबिख बुझी तपति अघानिआ ॥ गहि भुजा लीने दइआ कीने आपने करि मानिआ ॥ लै अंकि लाए हरि मिलाए जनम मरणा दुख जले ॥ बिनवंति नानक दइआ धारी मेलि लीने इक पले ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 705) जैतसरी छंत मः ५ ॥
पाधाणू संसारु गारबि अटिआ ॥ करते पाप अनेक माइआ रंग रटिआ ॥ लोभि मोहि अभिमानि बूडे मरणु चीति न आवए ॥ पुत्र मित्र बिउहार बनिता एह करत बिहावए ॥ पुजि दिवस आए लिखे माए दुखु धरम दूतह डिठिआ ॥ किरत करम न मिटै नानक हरि नाम धनु नही खटिआ ॥१॥

उदम करहि अनेक हरि नामु न गावही ॥ भरमहि जोनि असंख मरि जनमहि आवही ॥ पसू पंखी सैल तरवर गणत कछू न आवए ॥ बीजु बोवसि भोग भोगहि कीआ अपणा पावए ॥ रतन जनमु हारंत जूऐ प्रभू आपि न भावही ॥ बिनवंति नानक भरमहि भ्रमाए खिनु एकु टिकणु न पावही ॥२॥

जोबनु गइआ बितीति जरु मलि बैठीआ ॥ कर क्मपहि सिरु डोल नैण न डीठिआ ॥ नह नैण दीसै बिनु भजन ईसै छोडि माइआ चालिआ ॥ कहिआ न मानहि सिरि खाकु छानहि जिन संगि मनु तनु जालिआ ॥ स्रीराम रंग अपार पूरन नह निमख मन महि वूठिआ ॥ बिनवंति नानक कोटि कागर बिनस बार न झूठिआ ॥३॥

चरन कमल सरणाइ नानकु आइआ ॥ दुतरु भै संसारु प्रभि आपि तराइआ ॥ मिलि साधसंगे भजे स्रीधर करि अंगु प्रभ जी तारिआ ॥ हरि मानि लीए नाम दीए अवरु कछु न बीचारिआ ॥ गुण निधान अपार ठाकुर मनि लोड़ीदा पाइआ ॥ बिनवंति नानकु सदा त्रिपते हरि नामु भोजनु खाइआ ॥४॥२॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 705) जैतसरी महला ५ वार सलोका नालि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक ॥
आदि पूरन मधि पूरन अंति पूरन परमेसुरह ॥ सिमरंति संत सरबत्र रमणं नानक अघनासन जगदीसुरह ॥१॥

पेखन सुनन सुनावनो मन महि द्रिड़ीऐ साचु ॥ पूरि रहिओ सरबत्र मै नानक हरि रंगि राचु ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 706) पउड़ी ॥
हरि एकु निरंजनु गाईऐ सभ अंतरि सोई ॥ करण कारण समरथ प्रभु जो करे सु होई ॥ खिन महि थापि उथापदा तिसु बिनु नही कोई ॥ खंड ब्रहमंड पाताल दीप रविआ सभ लोई ॥ जिसु आपि बुझाए सो बुझसी निरमल जनु सोई ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 706) सलोक ॥
रचंति जीअ रचना मात गरभ असथापनं ॥ सासि सासि सिमरंति नानक महा अगनि न बिनासनं ॥१॥

मुखु तलै पैर उपरे वसंदो कुहथड़ै थाइ ॥ नानक सो धणी किउ विसारिओ उधरहि जिस दै नाइ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 706) पउड़ी ॥
रकतु बिंदु करि निमिआ अगनि उदर मझारि ॥ उरध मुखु कुचील बिकलु नरकि घोरि गुबारि ॥ हरि सिमरत तू ना जलहि मनि तनि उर धारि ॥ बिखम थानहु जिनि रखिआ तिसु तिलु न विसारि ॥ प्रभ बिसरत सुखु कदे नाहि जासहि जनमु हारि ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 706) सलोक ॥
मन इछा दान करणं सरबत्र आसा पूरनह ॥ खंडणं कलि कलेसह प्रभ सिमरि नानक नह दूरणह ॥१॥

हभि रंग माणहि जिसु संगि तै सिउ लाईऐ नेहु ॥ सो सहु बिंद न विसरउ नानक जिनि सुंदरु रचिआ देहु ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 706) पउड़ी ॥
जीउ प्रान तनु धनु दीआ दीने रस भोग ॥ ग्रिह मंदर रथ असु दीए रचि भले संजोग ॥ सुत बनिता साजन सेवक दीए प्रभ देवन जोग ॥ हरि सिमरत तनु मनु हरिआ लहि जाहि विजोग ॥ साधसंगि हरि गुण रमहु बिनसे सभि रोग ॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 706) सलोक ॥
कुट्मब जतन करणं माइआ अनेक उदमह ॥ हरि भगति भाव हीणं नानक प्रभ बिसरत ते प्रेततह ॥१॥

तुटड़ीआ सा प्रीति जो लाई बिअंन सिउ ॥ नानक सची रीति सांई सेती रतिआ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 706) पउड़ी ॥
जिसु बिसरत तनु भसम होइ कहते सभि प्रेतु ॥ खिनु ग्रिह महि बसन न देवही जिन सिउ सोई हेतु ॥ करि अनरथ दरबु संचिआ सो कारजि केतु ॥ जैसा बीजै सो लुणै करम इहु खेतु ॥ अकिरतघणा हरि विसरिआ जोनी भरमेतु ॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 706) सलोक ॥
कोटि दान इसनानं अनिक सोधन पवित्रतह ॥ उचरंति नानक हरि हरि रसना सरब पाप बिमुचते ॥१॥

ईधणु कीतोमू घणा भोरी दितीमु भाहि ॥ मनि वसंदड़ो सचु सहु नानक हभे डुखड़े उलाहि ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 707) पउड़ी ॥
कोटि अघा सभि नास होहि सिमरत हरि नाउ ॥ मन चिंदे फल पाईअहि हरि के गुण गाउ ॥ जनम मरण भै कटीअहि निहचल सचु थाउ ॥ पूरबि होवै लिखिआ हरि चरण समाउ ॥ करि किरपा प्रभ राखि लेहु नानक बलि जाउ ॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 707) सलोक ॥
ग्रिह रचना अपारं मनि बिलास सुआदं रसह ॥ कदांच नह सिमरंति नानक ते जंत बिसटा क्रिमह ॥१॥

मुचु अड्मबरु हभु किहु मंझि मुहबति नेह ॥ सो सांई जैं विसरै नानक सो तनु खेह ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 707) पउड़ी ॥
सुंदर सेज अनेक सुख रस भोगण पूरे ॥ ग्रिह सोइन चंदन सुगंध लाइ मोती हीरे ॥ मन इछे सुख माणदा किछु नाहि विसूरे ॥ सो प्रभु चिति न आवई विसटा के कीरे ॥ बिनु हरि नाम न सांति होइ कितु बिधि मनु धीरे ॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 707) सलोक ॥
चरन कमल बिरहं खोजंत बैरागी दह दिसह ॥ तिआगंत कपट रूप माइआ नानक आनंद रूप साध संगमह ॥१॥

मनि सांई मुखि उचरा वता हभे लोअ ॥ नानक हभि अड्मबर कूड़िआ सुणि जीवा सची सोइ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 707) पउड़ी ॥
बसता तूटी झु्मपड़ी चीर सभि छिंना ॥ जाति न पति न आदरो उदिआन भ्रमिंना ॥ मित्र न इठ धन रूपहीण किछु साकु न सिंना ॥ राजा सगली स्रिसटि का हरि नामि मनु भिंना ॥ तिस की धूड़ि मनु उधरै प्रभु होइ सुप्रसंना ॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 707) सलोक ॥
अनिक लीला राज रस रूपं छत्र चमर तखत आसनं ॥ रचंति मूड़ अगिआन अंधह नानक सुपन मनोरथ माइआ ॥१॥

सुपनै हभि रंग माणिआ मिठा लगड़ा मोहु ॥ नानक नाम विहूणीआ सुंदरि माइआ ध्रोहु ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 707) पउड़ी ॥
सुपने सेती चितु मूरखि लाइआ ॥ बिसरे राज रस भोग जागत भखलाइआ ॥ आरजा गई विहाइ धंधै धाइआ ॥ पूरन भए न काम मोहिआ माइआ ॥ किआ वेचारा जंतु जा आपि भुलाइआ ॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 707) सलोक ॥
बसंति स्वरग लोकह जितते प्रिथवी नव खंडणह ॥ बिसरंत हरि गोपालह नानक ते प्राणी उदिआन भरमणह ॥१॥

कउतक कोड तमासिआ चिति न आवसु नाउ ॥ नानक कोड़ी नरक बराबरे उजड़ु सोई थाउ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 707) पउड़ी ॥
महा भइआन उदिआन नगर करि मानिआ ॥ झूठ समग्री पेखि सचु करि जानिआ ॥ काम क्रोधि अहंकारि फिरहि देवानिआ ॥ सिरि लगा जम डंडु ता पछुतानिआ ॥ बिनु पूरे गुरदेव फिरै सैतानिआ ॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 708) सलोक ॥
राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥ संचंति बिखिआ छलं छिद्रं नानक बिनु हरि संगि न चालते ॥१॥

पेखंदड़ो की भुलु तुमा दिसमु सोहणा ॥ अढु न लहंदड़ो मुलु नानक साथि न जुलई माइआ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 708) पउड़ी ॥
चलदिआ नालि न चलै सो किउ संजीऐ ॥ तिस का कहु किआ जतनु जिस ते वंजीऐ ॥ हरि बिसरिऐ किउ त्रिपतावै ना मनु रंजीऐ ॥ प्रभू छोडि अन लागै नरकि समंजीऐ ॥ होहु क्रिपाल दइआल नानक भउ भंजीऐ ॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 708) सलोक ॥
नच राज सुख मिसटं नच भोग रस मिसटं नच मिसटं सुख माइआ ॥ मिसटं साधसंगि हरि नानक दास मिसटं प्रभ दरसनं ॥१॥

लगड़ा सो नेहु मंन मझाहू रतिआ ॥ विधड़ो सच थोकि नानक मिठड़ा सो धणी ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 708) पउड़ी ॥
हरि बिनु कछू न लागई भगतन कउ मीठा ॥ आन सुआद सभि फीकिआ करि निरनउ डीठा ॥ अगिआनु भरमु दुखु कटिआ गुर भए बसीठा ॥ चरन कमल मनु बेधिआ जिउ रंगु मजीठा ॥ जीउ प्राण तनु मनु प्रभू बिनसे सभि झूठा ॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 708) सलोक ॥
तिअकत जलं नह जीव मीनं नह तिआगि चात्रिक मेघ मंडलह ॥ बाण बेधंच कुरंक नादं अलि बंधन कुसम बासनह ॥ चरन कमल रचंति संतह नानक आन न रुचते ॥१॥

मुखु डेखाऊ पलक छडि आन न डेऊ चितु ॥ जीवण संगमु तिसु धणी हरि नानक संतां मितु ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 708) पउड़ी ॥
जिउ मछुली बिनु पाणीऐ किउ जीवणु पावै ॥ बूंद विहूणा चात्रिको किउ करि त्रिपतावै ॥ नाद कुरंकहि बेधिआ सनमुख उठि धावै ॥ भवरु लोभी कुसम बासु का मिलि आपु बंधावै ॥ तिउ संत जना हरि प्रीति है देखि दरसु अघावै ॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 708) सलोक ॥
चितवंति चरन कमलं सासि सासि अराधनह ॥ नह बिसरंति नाम अचुत नानक आस पूरन परमेसुरह ॥१॥

सीतड़ा मंन मंझाहि पलक न थीवै बाहरा ॥ नानक आसड़ी निबाहि सदा पेखंदो सचु धणी ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 708) पउड़ी ॥
आसावंती आस गुसाई पूरीऐ ॥ मिलि गोपाल गोबिंद न कबहू झूरीऐ ॥ देहु दरसु मनि चाउ लहि जाहि विसूरीऐ ॥ होइ पवित्र सरीरु चरना धूरीऐ ॥ पारब्रहम गुरदेव सदा हजूरीऐ ॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 709) सलोक ॥
रसना उचरंति नामं स्रवणं सुनंति सबद अम्रितह ॥ नानक तिन सद बलिहारं जिना धिआनु पारब्रहमणह ॥१॥

हभि कूड़ावे कम इकसु साई बाहरे ॥ नानक सेई धंनु जिना पिरहड़ी सच सिउ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 709) पउड़ी ॥
सद बलिहारी तिना जि सुनते हरि कथा ॥ पूरे ते परधान निवावहि प्रभ मथा ॥ हरि जसु लिखहि बेअंत सोहहि से हथा ॥ चरन पुनीत पवित्र चालहि प्रभ पथा ॥ संतां संगि उधारु सगला दुखु लथा ॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 709) सलोकु ॥
भावी उदोत करणं हरि रमणं संजोग पूरनह ॥ गोपाल दरस भेटं सफल नानक सो महूरतह ॥१॥

कीम न सका पाइ सुख मिती हू बाहरे ॥ नानक सा वेलड़ी परवाणु जितु मिलंदड़ो मा पिरी ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 709) पउड़ी ॥
सा वेला कहु कउणु है जितु प्रभ कउ पाई ॥ सो मूरतु भला संजोगु है जितु मिलै गुसाई ॥ आठ पहर हरि धिआइ कै मन इछ पुजाई ॥ वडै भागि सतसंगु होइ निवि लागा पाई ॥ मनि दरसन की पिआस है नानक बलि जाई ॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 709) सलोक ॥
पतित पुनीत गोबिंदह सरब दोख निवारणह ॥ सरणि सूर भगवानह जपंति नानक हरि हरि हरे ॥१॥

छडिओ हभु आपु लगड़ो चरणा पासि ॥ नठड़ो दुख तापु नानक प्रभु पेखंदिआ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 709) पउड़ी ॥
मेलि लैहु दइआल ढहि पए दुआरिआ ॥ रखि लेवहु दीन दइआल भ्रमत बहु हारिआ ॥ भगति वछलु तेरा बिरदु हरि पतित उधारिआ ॥ तुझ बिनु नाही कोइ बिनउ मोहि सारिआ ॥ करु गहि लेहु दइआल सागर संसारिआ ॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 709) सलोक ॥
संत उधरण दइआलं आसरं गोपाल कीरतनह ॥ निरमलं संत संगेण ओट नानक परमेसुरह ॥१॥

चंदन चंदु न सरद रुति मूलि न मिटई घांम ॥ सीतलु थीवै नानका जपंदड़ो हरि नामु ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 709) पउड़ी ॥
चरन कमल की ओट उधरे सगल जन ॥ सुणि परतापु गोविंद निरभउ भए मन ॥ तोटि न आवै मूलि संचिआ नामु धन ॥ संत जना सिउ संगु पाईऐ वडै पुन ॥ आठ पहर हरि धिआइ हरि जसु नित सुन ॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 709) सलोक ॥
दइआ करणं दुख हरणं उचरणं नाम कीरतनह ॥ दइआल पुरख भगवानह नानक लिपत न माइआ ॥१॥

भाहि बलंदड़ी बुझि गई रखंदड़ो प्रभु आपि ॥ जिनि उपाई मेदनी नानक सो प्रभु जापि ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 710) पउड़ी ॥
जा प्रभ भए दइआल न बिआपै माइआ ॥ कोटि अघा गए नास हरि इकु धिआइआ ॥ निरमल भए सरीर जन धूरी नाइआ ॥ मन तन भए संतोख पूरन प्रभु पाइआ ॥ तरे कुट्मब संगि लोग कुल सबाइआ ॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 710) सलोक ॥
गुर गोबिंद गोपाल गुर गुर पूरन नाराइणह ॥ गुर दइआल समरथ गुर गुर नानक पतित उधारणह ॥१॥

भउजलु बिखमु असगाहु गुरि बोहिथै तारिअमु ॥ नानक पूर करम सतिगुर चरणी लगिआ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 710) पउड़ी ॥
धंनु धंनु गुरदेव जिसु संगि हरि जपे ॥ गुर क्रिपाल जब भए त अवगुण सभि छपे ॥ पारब्रहम गुरदेव नीचहु उच थपे ॥ काटि सिलक दुख माइआ करि लीने अप दसे ॥ गुण गाए बेअंत रसना हरि जसे ॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 710) सलोक ॥
द्रिसटंत एको सुनीअंत एको वरतंत एको नरहरह ॥ नाम दानु जाचंति नानक दइआल पुरख क्रिपा करह ॥१॥

हिकु सेवी हिकु समला हरि इकसु पहि अरदासि ॥ नाम वखरु धनु संचिआ नानक सची रासि ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 710) पउड़ी ॥
प्रभ दइआल बेअंत पूरन इकु एहु ॥ सभु किछु आपे आपि दूजा कहा केहु ॥ आपि करहु प्रभ दानु आपे आपि लेहु ॥ आवण जाणा हुकमु सभु निहचलु तुधु थेहु ॥ नानकु मंगै दानु करि किरपा नामु देहु ॥२०॥१॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 710) जैतसरी बाणी भगता की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाथ कछूअ न जानउ ॥ मनु माइआ कै हाथि बिकानउ ॥१॥ रहाउ ॥

तुम कहीअत हौ जगत गुर सुआमी ॥ हम कहीअत कलिजुग के कामी ॥१॥

इन पंचन मेरो मनु जु बिगारिओ ॥ पलु पलु हरि जी ते अंतरु पारिओ ॥२॥

जत देखउ तत दुख की रासी ॥ अजौं न पत्याइ निगम भए साखी ॥३॥

गोतम नारि उमापति स्वामी ॥ सीसु धरनि सहस भग गांमी ॥४॥

इन दूतन खलु बधु करि मारिओ ॥ बडो निलाजु अजहू नही हारिओ ॥५॥

कहि रविदास कहा कैसे कीजै ॥ बिनु रघुनाथ सरनि का की लीजै ॥६॥१॥


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