Pt 3 - राग गूजरी - बाणी शब्द, Part 3 - Raag Gujri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अमरदास जी -- SGGS 513) मः ३ ॥
त्रै गुण माइआ वेखि भुले जिउ देखि दीपकि पतंग पचाइआ ॥ पंडित भुलि भुलि माइआ वेखहि दिखा किनै किहु आणि चड़ाइआ ॥ दूजै भाइ पड़हि नित बिखिआ नावहु दयि खुआइआ ॥ जोगी जंगम संनिआसी भुले ओन्हा अहंकारु बहु गरबु वधाइआ ॥ छादनु भोजनु न लैही सत भिखिआ मनहठि जनमु गवाइआ ॥ एतड़िआ विचहु सो जनु समधा जिनि गुरमुखि नामु धिआइआ ॥ जन नानक किस नो आखि सुणाईऐ जा करदे सभि कराइआ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 513) पउड़ी ॥
माइआ मोहु परेतु है कामु क्रोधु अहंकारा ॥ एह जम की सिरकार है एन्हा उपरि जम का डंडु करारा ॥ मनमुख जम मगि पाईअन्हि जिन्ह दूजा भाउ पिआरा ॥ जम पुरि बधे मारीअनि को सुणै न पूकारा ॥ जिस नो क्रिपा करे तिसु गुरु मिलै गुरमुखि निसतारा ॥१२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 513) सलोकु मः ३ ॥
हउमै ममता मोहणी मनमुखा नो गई खाइ ॥ जो मोहि दूजै चितु लाइदे तिना विआपि रही लपटाइ ॥ गुर कै सबदि परजालीऐ ता एह विचहु जाइ ॥ तनु मनु होवै उजला नामु वसै मनि आइ ॥ नानक माइआ का मारणु हरि नामु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 513) मः ३ ॥
इहु मनु केतड़िआ जुग भरमिआ थिरु रहै न आवै जाइ ॥ हरि भाणा ता भरमाइअनु करि परपंचु खेलु उपाइ ॥ जा हरि बखसे ता गुर मिलै असथिरु रहै समाइ ॥ नानक मन ही ते मनु मानिआ ना किछु मरै न जाइ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 514) पउड़ी ॥
काइआ कोटु अपारु है मिलणा संजोगी ॥ काइआ अंदरि आपि वसि रहिआ आपे रस भोगी ॥ आपि अतीतु अलिपतु है निरजोगु हरि जोगी ॥ जो तिसु भावै सो करे हरि करे सु होगी ॥ हरि गुरमुखि नामु धिआईऐ लहि जाहि विजोगी ॥१३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 514) सलोकु मः ३ ॥
वाहु वाहु आपि अखाइदा गुर सबदी सचु सोइ ॥ वाहु वाहु सिफति सलाह है गुरमुखि बूझै कोइ ॥ वाहु वाहु बाणी सचु है सचि मिलावा होइ ॥ नानक वाहु वाहु करतिआ प्रभु पाइआ करमि परापति होइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 514) मः ३ ॥
वाहु वाहु करती रसना सबदि सुहाई ॥ पूरै सबदि प्रभु मिलिआ आई ॥ वडभागीआ वाहु वाहु मुहहु कढाई ॥ वाहु वाहु करहि सेई जन सोहणे तिन्ह कउ परजा पूजण आई ॥ वाहु वाहु करमि परापति होवै नानक दरि सचै सोभा पाई ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 514) पउड़ी ॥
बजर कपाट काइआ गड़्ह भीतरि कूड़ु कुसतु अभिमानी ॥ भरमि भूले नदरि न आवनी मनमुख अंध अगिआनी ॥ उपाइ कितै न लभनी करि भेख थके भेखवानी ॥ गुर सबदी खोलाईअन्हि हरि नामु जपानी ॥ हरि जीउ अम्रित बिरखु है जिन पीआ ते त्रिपतानी ॥१४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 514) सलोकु मः ३ ॥
वाहु वाहु करतिआ रैणि सुखि विहाइ ॥ वाहु वाहु करतिआ सदा अनंदु होवै मेरी माइ ॥ वाहु वाहु करतिआ हरि सिउ लिव लाइ ॥ वाहु वाहु करमी बोलै बोलाइ ॥ वाहु वाहु करतिआ सोभा पाइ ॥ नानक वाहु वाहु सति रजाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 514) मः ३ ॥
वाहु वाहु बाणी सचु है गुरमुखि लधी भालि ॥ वाहु वाहु सबदे उचरै वाहु वाहु हिरदै नालि ॥ वाहु वाहु करतिआ हरि पाइआ सहजे गुरमुखि भालि ॥ से वडभागी नानका हरि हरि रिदै समालि ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 514) पउड़ी ॥
ए मना अति लोभीआ नित लोभे राता ॥ माइआ मनसा मोहणी दह दिस फिराता ॥ अगै नाउ जाति न जाइसी मनमुखि दुखु खाता ॥ रसना हरि रसु न चखिओ फीका बोलाता ॥ जिना गुरमुखि अम्रितु चाखिआ से जन त्रिपताता ॥१५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 514) सलोकु मः ३ ॥
वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सचा गहिर ग्मभीरु ॥ वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि गुणदाता मति धीरु ॥ वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि सभ महि रहिआ समाइ ॥ वाहु वाहु तिस नो आखीऐ जि देदा रिजकु सबाहि ॥ नानक वाहु वाहु इको करि सालाहीऐ जि सतिगुर दीआ दिखाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 515) मः ३ ॥
वाहु वाहु गुरमुख सदा करहि मनमुख मरहि बिखु खाइ ॥ ओना वाहु वाहु न भावई दुखे दुखि विहाइ ॥ गुरमुखि अम्रितु पीवणा वाहु वाहु करहि लिव लाइ ॥ नानक वाहु वाहु करहि से जन निरमले त्रिभवण सोझी पाइ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 515) पउड़ी ॥
हरि कै भाणै गुरु मिलै सेवा भगति बनीजै ॥ हरि कै भाणै हरि मनि वसै सहजे रसु पीजै ॥ हरि कै भाणै सुखु पाईऐ हरि लाहा नित लीजै ॥ हरि कै तखति बहालीऐ निज घरि सदा वसीजै ॥ हरि का भाणा तिनी मंनिआ जिना गुरू मिलीजै ॥१६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 515) सलोकु मः ३ ॥
वाहु वाहु से जन सदा करहि जिन्ह कउ आपे देइ बुझाइ ॥ वाहु वाहु करतिआ मनु निरमलु होवै हउमै विचहु जाइ ॥ वाहु वाहु गुरसिखु जो नित करे सो मन चिंदिआ फलु पाइ ॥ वाहु वाहु करहि से जन सोहणे हरि तिन्ह कै संगि मिलाइ ॥ वाहु वाहु हिरदै उचरा मुखहु भी वाहु वाहु करेउ ॥ नानक वाहु वाहु जो करहि हउ तनु मनु तिन्ह कउ देउ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 515) मः ३ ॥
वाहु वाहु साहिबु सचु है अम्रितु जा का नाउ ॥ जिनि सेविआ तिनि फलु पाइआ हउ तिन बलिहारै जाउ ॥ वाहु वाहु गुणी निधानु है जिस नो देइ सु खाइ ॥ वाहु वाहु जलि थलि भरपूरु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥ वाहु वाहु गुरसिख नित सभ करहु गुर पूरे वाहु वाहु भावै ॥ नानक वाहु वाहु जो मनि चिति करे तिसु जमकंकरु नेड़ि न आवै ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 515) पउड़ी ॥
हरि जीउ सचा सचु है सची गुरबाणी ॥ सतिगुर ते सचु पछाणीऐ सचि सहजि समाणी ॥ अनदिनु जागहि ना सवहि जागत रैणि विहाणी ॥ गुरमती हरि रसु चाखिआ से पुंन पराणी ॥ बिनु गुर किनै न पाइओ पचि मुए अजाणी ॥१७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 515) सलोकु मः ३ ॥
वाहु वाहु बाणी निरंकार है तिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥ वाहु वाहु अगम अथाहु है वाहु वाहु सचा सोइ ॥ वाहु वाहु वेपरवाहु है वाहु वाहु करे सु होइ ॥ वाहु वाहु अम्रित नामु है गुरमुखि पावै कोइ ॥ वाहु वाहु करमी पाईऐ आपि दइआ करि देइ ॥ नानक वाहु वाहु गुरमुखि पाईऐ अनदिनु नामु लएइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 516) मः ३ ॥
बिनु सतिगुर सेवे साति न आवई दूजी नाही जाइ ॥ जे बहुतेरा लोचीऐ विणु करमै न पाइआ जाइ ॥ जिन्हा अंतरि लोभ विकारु है दूजै भाइ खुआइ ॥ जमणु मरणु न चुकई हउमै विचि दुखु पाइ ॥ जिन्हा सतिगुर सिउ चितु लाइआ सु खाली कोई नाहि ॥ तिन जम की तलब न होवई ना ओइ दुख सहाहि ॥ नानक गुरमुखि उबरे सचै सबदि समाहि ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 516) पउड़ी ॥
ढाढी तिस नो आखीऐ जि खसमै धरे पिआरु ॥ दरि खड़ा सेवा करे गुर सबदी वीचारु ॥ ढाढी दरु घरु पाइसी सचु रखै उर धारि ॥ ढाढी का महलु अगला हरि कै नाइ पिआरि ॥ ढाढी की सेवा चाकरी हरि जपि हरि निसतारि ॥१८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 516) सलोकु मः ३ ॥
गूजरी जाति गवारि जा सहु पाए आपणा ॥ गुर कै सबदि वीचारि अनदिनु हरि जपु जापणा ॥ जिसु सतिगुरु मिलै तिसु भउ पवै सा कुलवंती नारि ॥ सा हुकमु पछाणै कंत का जिस नो क्रिपा कीती करतारि ॥ ओह कुचजी कुलखणी परहरि छोडी भतारि ॥ भै पइऐ मलु कटीऐ निरमल होवै सरीरु ॥ अंतरि परगासु मति ऊतम होवै हरि जपि गुणी गहीरु ॥ भै विचि बैसै भै रहै भै विचि कमावै कार ॥ ऐथै सुखु वडिआईआ दरगह मोख दुआर ॥ भै ते निरभउ पाईऐ मिलि जोती जोति अपार ॥ नानक खसमै भावै सा भली जिस नो आपे बखसे करतारु ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 516) मः ३ ॥
सदा सदा सालाहीऐ सचे कउ बलि जाउ ॥ नानक एकु छोडि दूजै लगै सा जिहवा जलि जाउ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 516) पउड़ी ॥
अंसा अउतारु उपाइओनु भाउ दूजा कीआ ॥ जिउ राजे राजु कमावदे दुख सुख भिड़ीआ ॥ ईसरु ब्रहमा सेवदे अंतु तिन्ही न लहीआ ॥ निरभउ निरंकारु अलखु है गुरमुखि प्रगटीआ ॥ तिथै सोगु विजोगु न विआपई असथिरु जगि थीआ ॥१९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 516) सलोकु मः ३ ॥
एहु सभु किछु आवण जाणु है जेता है आकारु ॥ जिनि एहु लेखा लिखिआ सो होआ परवाणु ॥ नानक जे को आपु गणाइदा सो मूरखु गावारु ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 516) मः ३ ॥
मनु कुंचरु पीलकु गुरू गिआनु कुंडा जह खिंचे तह जाइ ॥ नानक हसती कुंडे बाहरा फिरि फिरि उझड़ि पाइ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 516) पउड़ी ॥
तिसु आगै अरदासि जिनि उपाइआ ॥ सतिगुरु अपणा सेवि सभ फल पाइआ ॥ अम्रित हरि का नाउ सदा धिआइआ ॥ संत जना कै संगि दुखु मिटाइआ ॥ नानक भए अचिंतु हरि धनु निहचलाइआ ॥२०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 517) सलोक मः ३ ॥
खेति मिआला उचीआ घरु उचा निरणउ ॥ महल भगती घरि सरै सजण पाहुणिअउ ॥ बरसना त बरसु घना बहुड़ि बरसहि काहि ॥ नानक तिन्ह बलिहारणै जिन्ह गुरमुखि पाइआ मन माहि ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 517) मः ३ ॥
मिठा सो जो भावदा सजणु सो जि रासि ॥ नानक गुरमुखि जाणीऐ जा कउ आपि करे परगासु ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 517) पउड़ी ॥
प्रभ पासि जन की अरदासि तू सचा सांई ॥ तू रखवाला सदा सदा हउ तुधु धिआई ॥ जीअ जंत सभि तेरिआ तू रहिआ समाई ॥ जो दास तेरे की निंदा करे तिसु मारि पचाई ॥ चिंता छडि अचिंतु रहु नानक लगि पाई ॥२१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 517) सलोक मः ३ ॥
आसा करता जगु मुआ आसा मरै न जाइ ॥ नानक आसा पूरीआ सचे सिउ चितु लाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 517) मः ३ ॥
आसा मनसा मरि जाइसी जिनि कीती सो लै जाइ ॥ नानक निहचलु को नही बाझहु हरि कै नाइ ॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 517) पउड़ी ॥
आपे जगतु उपाइओनु करि पूरा थाटु ॥ आपे साहु आपे वणजारा आपे ही हरि हाटु ॥ आपे सागरु आपे बोहिथा आपे ही खेवाटु ॥ आपे गुरु चेला है आपे आपे दसे घाटु ॥ जन नानक नामु धिआइ तू सभि किलविख काटु ॥२२॥१॥ सुधु

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 517) रागु गूजरी वार महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु मः ५ ॥
अंतरि गुरु आराधणा जिहवा जपि गुर नाउ ॥ नेत्री सतिगुरु पेखणा स्रवणी सुनणा गुर नाउ ॥ सतिगुर सेती रतिआ दरगह पाईऐ ठाउ ॥ कहु नानक किरपा करे जिस नो एह वथु देइ ॥ जग महि उतम काढीअहि विरले केई केइ ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 517) मः ५ ॥
रखे रखणहारि आपि उबारिअनु ॥ गुर की पैरी पाइ काज सवारिअनु ॥ होआ आपि दइआलु मनहु न विसारिअनु ॥ साध जना कै संगि भवजलु तारिअनु ॥ साकत निंदक दुसट खिन माहि बिदारिअनु ॥ तिसु साहिब की टेक नानक मनै माहि ॥ जिसु सिमरत सुखु होइ सगले दूख जाहि ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 518) पउड़ी ॥
अकुल निरंजन पुरखु अगमु अपारीऐ ॥ सचो सचा सचु सचु निहारीऐ ॥ कूड़ु न जापै किछु तेरी धारीऐ ॥ सभसै दे दातारु जेत उपारीऐ ॥ इकतु सूति परोइ जोति संजारीऐ ॥ हुकमे भवजल मंझि हुकमे तारीऐ ॥ प्रभ जीउ तुधु धिआए सोइ जिसु भागु मथारीऐ ॥ तेरी गति मिति लखी न जाइ हउ तुधु बलिहारीऐ ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 518) सलोकु मः ५ ॥
जा तूं तुसहि मिहरवान अचिंतु वसहि मन माहि ॥ जा तूं तुसहि मिहरवान नउ निधि घर महि पाहि ॥ जा तूं तुसहि मिहरवान ता गुर का मंत्रु कमाहि ॥ जा तूं तुसहि मिहरवान ता नानक सचि समाहि ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 518) मः ५ ॥
किती बैहन्हि बैहणे मुचु वजाइनि वज ॥ नानक सचे नाम विणु किसै न रहीआ लज ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 518) पउड़ी ॥
तुधु धिआइन्हि बेद कतेबा सणु खड़े ॥ गणती गणी न जाइ तेरै दरि पड़े ॥ ब्रहमे तुधु धिआइन्हि इंद्र इंद्रासणा ॥ संकर बिसन अवतार हरि जसु मुखि भणा ॥ पीर पिकाबर सेख मसाइक अउलीए ॥ ओति पोति निरंकार घटि घटि मउलीए ॥ कूड़हु करे विणासु धरमे तगीऐ ॥ जितु जितु लाइहि आपि तितु तितु लगीऐ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 518) सलोकु मः ५ ॥
चंगिआईं आलकु करे बुरिआईं होइ सेरु ॥ नानक अजु कलि आवसी गाफल फाही पेरु ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 518) मः ५ ॥
कितीआ कुढंग गुझा थीऐ न हितु ॥ नानक तै सहि ढकिआ मन महि सचा मितु ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 518) पउड़ी ॥
हउ मागउ तुझै दइआल करि दासा गोलिआ ॥ नउ निधि पाई राजु जीवा बोलिआ ॥ अम्रित नामु निधानु दासा घरि घणा ॥ तिन कै संगि निहालु स्रवणी जसु सुणा ॥ कमावा तिन की कार सरीरु पवितु होइ ॥ पखा पाणी पीसि बिगसा पैर धोइ ॥ आपहु कछू न होइ प्रभ नदरि निहालीऐ ॥ मोहि निरगुण दिचै थाउ संत धरम सालीऐ ॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 518) सलोक मः ५ ॥
साजन तेरे चरन की होइ रहा सद धूरि ॥ नानक सरणि तुहारीआ पेखउ सदा हजूरि ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 518) मः ५ ॥
पतित पुनीत असंख होहि हरि चरणी मनु लाग ॥ अठसठि तीरथ नामु प्रभ जिसु नानक मसतकि भाग ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 518) पउड़ी ॥
नित जपीऐ सासि गिरासि नाउ परवदिगार दा ॥ जिस नो करे रहम तिसु न विसारदा ॥ आपि उपावणहार आपे ही मारदा ॥ सभु किछु जाणै जाणु बुझि वीचारदा ॥ अनिक रूप खिन माहि कुदरति धारदा ॥ जिस नो लाइ सचि तिसहि उधारदा ॥ जिस दै होवै वलि सु कदे न हारदा ॥ सदा अभगु दीबाणु है हउ तिसु नमसकारदा ॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 519) सलोक मः ५ ॥
कामु क्रोधु लोभु छोडीऐ दीजै अगनि जलाइ ॥ जीवदिआ नित जापीऐ नानक साचा नाउ ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 519) मः ५ ॥
सिमरत सिमरत प्रभु आपणा सभ फल पाए आहि ॥ नानक नामु अराधिआ गुर पूरै दीआ मिलाइ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 519) पउड़ी ॥
सो मुकता संसारि जि गुरि उपदेसिआ ॥ तिस की गई बलाइ मिटे अंदेसिआ ॥ तिस का दरसनु देखि जगतु निहालु होइ ॥ जन कै संगि निहालु पापा मैलु धोइ ॥ अम्रितु साचा नाउ ओथै जापीऐ ॥ मन कउ होइ संतोखु भुखा ध्रापीऐ ॥ जिसु घटि वसिआ नाउ तिसु बंधन काटीऐ ॥ गुर परसादि किनै विरलै हरि धनु खाटीऐ ॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 519) सलोक मः ५ ॥
मन महि चितवउ चितवनी उदमु करउ उठि नीत ॥ हरि कीरतन का आहरो हरि देहु नानक के मीत ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 519) मः ५ ॥
द्रिसटि धारि प्रभि राखिआ मनु तनु रता मूलि ॥ नानक जो प्रभ भाणीआ मरउ विचारी सूलि ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 519) पउड़ी ॥
जीअ की बिरथा होइ सु गुर पहि अरदासि करि ॥ छोडि सिआणप सगल मनु तनु अरपि धरि ॥ पूजहु गुर के पैर दुरमति जाइ जरि ॥ साध जना कै संगि भवजलु बिखमु तरि ॥ सेवहु सतिगुर देव अगै न मरहु डरि ॥ खिन महि करे निहालु ऊणे सुभर भरि ॥ मन कउ होइ संतोखु धिआईऐ सदा हरि ॥ सो लगा सतिगुर सेव जा कउ करमु धुरि ॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 519) सलोक मः ५ ॥
लगड़ी सुथानि जोड़णहारै जोड़ीआ ॥ नानक लहरी लख सै आन डुबण देइ न मा पिरी ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 519) मः ५ ॥
बनि भीहावलै हिकु साथी लधमु दुख हरता हरि नामा ॥ बलि बलि जाई संत पिआरे नानक पूरन कामां ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 519) पउड़ी ॥
पाईअनि सभि निधान तेरै रंगि रतिआ ॥ न होवी पछोताउ तुध नो जपतिआ ॥ पहुचि न सकै कोइ तेरी टेक जन ॥ गुर पूरे वाहु वाहु सुख लहा चितारि मन ॥ गुर पहि सिफति भंडारु करमी पाईऐ ॥ सतिगुर नदरि निहाल बहुड़ि न धाईऐ ॥ रखै आपि दइआलु करि दासा आपणे ॥ हरि हरि हरि हरि नामु जीवा सुणि सुणे ॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 520) सलोक मः ५ ॥
प्रेम पटोला तै सहि दिता ढकण कू पति मेरी ॥ दाना बीना साई मैडा नानक सार न जाणा तेरी ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 520) मः ५ ॥
तैडै सिमरणि हभु किछु लधमु बिखमु न डिठमु कोई ॥ जिसु पति रखै सचा साहिबु नानक मेटि न सकै कोई ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 520) पउड़ी ॥
होवै सुखु घणा दयि धिआइऐ ॥ वंञै रोगा घाणि हरि गुण गाइऐ ॥ अंदरि वरतै ठाढि प्रभि चिति आइऐ ॥ पूरन होवै आस नाइ मंनि वसाइऐ ॥ कोइ न लगै बिघनु आपु गवाइऐ ॥ गिआन पदारथु मति गुर ते पाइऐ ॥ तिनि पाए सभे थोक जिसु आपि दिवाइऐ ॥ तूं सभना का खसमु सभ तेरी छाइऐ ॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 520) सलोक मः ५ ॥
नदी तरंदड़ी मैडा खोजु न खु्मभै मंझि मुहबति तेरी ॥ तउ सह चरणी मैडा हीअड़ा सीतमु हरि नानक तुलहा बेड़ी ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 520) मः ५ ॥
जिन्हा दिसंदड़िआ दुरमति वंञै मित्र असाडड़े सेई ॥ हउ ढूढेदी जगु सबाइआ जन नानक विरले केई ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 520) पउड़ी ॥
आवै साहिबु चिति तेरिआ भगता डिठिआ ॥ मन की कटीऐ मैलु साधसंगि वुठिआ ॥ जनम मरण भउ कटीऐ जन का सबदु जपि ॥ बंधन खोलन्हि संत दूत सभि जाहि छपि ॥ तिसु सिउ लाइन्हि रंगु जिस दी सभ धारीआ ॥ ऊची हूं ऊचा थानु अगम अपारीआ ॥ रैणि दिनसु कर जोड़ि सासि सासि धिआईऐ ॥ जा आपे होइ दइआलु तां भगत संगु पाईऐ ॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 520) सलोक मः ५ ॥
बारि विडानड़ै हुमस धुमस कूका पईआ राही ॥ तउ सह सेती लगड़ी डोरी नानक अनद सेती बनु गाही ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 520) मः ५ ॥
सची बैसक तिन्हा संगि जिन संगि जपीऐ नाउ ॥ तिन्ह संगि संगु न कीचई नानक जिना आपणा सुआउ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 520) पउड़ी ॥
सा वेला परवाणु जितु सतिगुरु भेटिआ ॥ होआ साधू संगु फिरि दूख न तेटिआ ॥ पाइआ निहचलु थानु फिरि गरभि न लेटिआ ॥ नदरी आइआ इकु सगल ब्रहमेटिआ ॥ ततु गिआनु लाइ धिआनु द्रिसटि समेटिआ ॥ सभो जपीऐ जापु जि मुखहु बोलेटिआ ॥ हुकमे बुझि निहालु सुखि सुखेटिआ ॥ परखि खजानै पाए से बहुड़ि न खोटिआ ॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 520) सलोकु मः ५ ॥
विछोहे ज्मबूर खवे न वंञनि गाखड़े ॥ जे सो धणी मिलंनि नानक सुख स्मबूह सचु ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 521) मः ५ ॥
जिमी वसंदी पाणीऐ ईधणु रखै भाहि ॥ नानक सो सहु आहि जा कै आढलि हभु को ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 521) पउड़ी ॥
तेरे कीते कम तुधै ही गोचरे ॥ सोई वरतै जगि जि कीआ तुधु धुरे ॥ बिसमु भए बिसमाद देखि कुदरति तेरीआ ॥ सरणि परे तेरी दास करि गति होइ मेरीआ ॥ तेरै हथि निधानु भावै तिसु देहि ॥ जिस नो होइ दइआलु हरि नामु सेइ लेहि ॥ अगम अगोचर बेअंत अंतु न पाईऐ ॥ जिस नो होहि क्रिपालु सु नामु धिआईऐ ॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 521) सलोक मः ५ ॥
कड़छीआ फिरंन्हि सुआउ न जाणन्हि सुञीआ ॥ सेई मुख दिसंन्हि नानक रते प्रेम रसि ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 521) मः ५ ॥
खोजी लधमु खोजु छडीआ उजाड़ि ॥ तै सहि दिती वाड़ि नानक खेतु न छिजई ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 521) पउड़ी ॥
आराधिहु सचा सोइ सभु किछु जिसु पासि ॥ दुहा सिरिआ खसमु आपि खिन महि करे रासि ॥ तिआगहु सगल उपाव तिस की ओट गहु ॥ पउ सरणाई भजि सुखी हूं सुख लहु ॥ करम धरम ततु गिआनु संता संगु होइ ॥ जपीऐ अम्रित नामु बिघनु न लगै कोइ ॥ जिस नो आपि दइआलु तिसु मनि वुठिआ ॥ पाईअन्हि सभि निधान साहिबि तुठिआ ॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 521) सलोक मः ५ ॥
लधमु लभणहारु करमु करंदो मा पिरी ॥ इको सिरजणहारु नानक बिआ न पसीऐ ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 521) मः ५ ॥
पापड़िआ पछाड़ि बाणु सचावा संन्हि कै ॥ गुर मंत्रड़ा चितारि नानक दुखु न थीवई ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 521) पउड़ी ॥
वाहु वाहु सिरजणहार पाईअनु ठाढि आपि ॥ जीअ जंत मिहरवानु तिस नो सदा जापि ॥ दइआ धारी समरथि चुके बिल बिलाप ॥ नठे ताप दुख रोग पूरे गुर प्रतापि ॥ कीतीअनु आपणी रख गरीब निवाजि थापि ॥ आपे लइअनु छडाइ बंधन सगल कापि ॥ तिसन बुझी आस पुंनी मन संतोखि ध्रापि ॥ वडी हूं वडा अपार खसमु जिसु लेपु न पुंनि पापि ॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 521) सलोक मः ५ ॥
जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥ नानक प्रीति लगी तिन राम सिउ भेटत साध संगात ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 521) मः ५ ॥
रामु रमहु बडभागीहो जलि थलि महीअलि सोइ ॥ नानक नामि अराधिऐ बिघनु न लागै कोइ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 521) पउड़ी ॥
भगता का बोलिआ परवाणु है दरगह पवै थाइ ॥ भगता तेरी टेक रते सचि नाइ ॥ जिस नो होइ क्रिपालु तिस का दूखु जाइ ॥ भगत तेरे दइआल ओन्हा मिहर पाइ ॥ दूखु दरदु वड रोगु न पोहे तिसु माइ ॥ भगता एहु अधारु गुण गोविंद गाइ ॥ सदा सदा दिनु रैणि इको इकु धिआइ ॥ पीवति अम्रित नामु जन नामे रहे अघाइ ॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 522) सलोक मः ५ ॥
कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥ नानक अनदिनु बिलपते जिउ सुंञै घरि काउ ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 522) मः ५ ॥
पिरी मिलावा जा थीऐ साई सुहावी रुति ॥ घड़ी मुहतु नह वीसरै नानक रवीऐ नित ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 522) पउड़ी ॥
सूरबीर वरीआम किनै न होड़ीऐ ॥ फउज सताणी हाठ पंचा जोड़ीऐ ॥ दस नारी अउधूत देनि चमोड़ीऐ ॥ जिणि जिणि लैन्हि रलाइ एहो एना लोड़ीऐ ॥ त्रै गुण इन कै वसि किनै न मोड़ीऐ ॥ भरमु कोटु माइआ खाई कहु कितु बिधि तोड़ीऐ ॥ गुरु पूरा आराधि बिखम दलु फोड़ीऐ ॥ हउ तिसु अगै दिनु राति रहा कर जोड़ीऐ ॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 522) सलोक मः ५ ॥
किलविख सभे उतरनि नीत नीत गुण गाउ ॥ कोटि कलेसा ऊपजहि नानक बिसरै नाउ ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 522) मः ५ ॥
नानक सतिगुरि भेटिऐ पूरी होवै जुगति ॥ हसंदिआ खेलंदिआ पैनंदिआ खावंदिआ विचे होवै मुकति ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 522) पउड़ी ॥
सो सतिगुरु धनु धंनु जिनि भरम गड़ु तोड़िआ ॥ सो सतिगुरु वाहु वाहु जिनि हरि सिउ जोड़िआ ॥ नामु निधानु अखुटु गुरु देइ दारूओ ॥ महा रोगु बिकराल तिनै बिदारूओ ॥ पाइआ नामु निधानु बहुतु खजानिआ ॥ जिता जनमु अपारु आपु पछानिआ ॥ महिमा कही न जाइ गुर समरथ देव ॥ गुर पारब्रहम परमेसुर अपर्मपर अलख अभेव ॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 522) सलोकु मः ५ ॥
उदमु करेदिआ जीउ तूं कमावदिआ सुख भुंचु ॥ धिआइदिआ तूं प्रभू मिलु नानक उतरी चिंत ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 522) मः ५ ॥
सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥ नानक नामु न विसरउ इक घड़ी करि किरपा भगवंत ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 522) पउड़ी ॥
तेरा कीता होइ त काहे डरपीऐ ॥ जिसु मिलि जपीऐ नाउ तिसु जीउ अरपीऐ ॥ आइऐ चिति निहालु साहिब बेसुमार ॥ तिस नो पोहे कवणु जिसु वलि निरंकार ॥ सभु किछु तिस कै वसि न कोई बाहरा ॥ सो भगता मनि वुठा सचि समाहरा ॥ तेरे दास धिआइनि तुधु तूं रखण वालिआ ॥ सिरि सभना समरथु नदरि निहालिआ ॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 523) सलोक मः ५ ॥
काम क्रोध मद लोभ मोह दुसट बासना निवारि ॥ राखि लेहु प्रभ आपणे नानक सद बलिहारि ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 523) मः ५ ॥
खांदिआ खांदिआ मुहु घठा पैनंदिआ सभु अंगु ॥ नानक ध्रिगु तिना दा जीविआ जिन सचि न लगो रंगु ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 523) पउड़ी ॥
जिउ जिउ तेरा हुकमु तिवै तिउ होवणा ॥ जह जह रखहि आपि तह जाइ खड़ोवणा ॥ नाम तेरै कै रंगि दुरमति धोवणा ॥ जपि जपि तुधु निरंकार भरमु भउ खोवणा ॥ जो तेरै रंगि रते से जोनि न जोवणा ॥ अंतरि बाहरि इकु नैण अलोवणा ॥ जिन्ही पछाता हुकमु तिन्ह कदे न रोवणा ॥ नाउ नानक बखसीस मन माहि परोवणा ॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 523) सलोक मः ५ ॥
जीवदिआ न चेतिओ मुआ रलंदड़ो खाक ॥ नानक दुनीआ संगि गुदारिआ साकत मूड़ नपाक ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 523) मः ५ ॥
जीवंदिआ हरि चेतिआ मरंदिआ हरि रंगि ॥ जनमु पदारथु तारिआ नानक साधू संगि ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 523) पउड़ी ॥
आदि जुगादी आपि रखण वालिआ ॥ सचु नामु करतारु सचु पसारिआ ॥ ऊणा कही न होइ घटे घटि सारिआ ॥ मिहरवान समरथ आपे ही घालिआ ॥ जिन्ह मनि वुठा आपि से सदा सुखालिआ ॥ आपे रचनु रचाइ आपे ही पालिआ ॥ सभु किछु आपे आपि बेअंत अपारिआ ॥ गुर पूरे की टेक नानक सम्हालिआ ॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 523) सलोक मः ५ ॥
आदि मधि अरु अंति परमेसरि रखिआ ॥ सतिगुरि दिता हरि नामु अम्रितु चखिआ ॥ साधा संगु अपारु अनदिनु हरि गुण रवै ॥ पाए मनोरथ सभि जोनी नह भवै ॥ सभु किछु करते हथि कारणु जो करै ॥ नानकु मंगै दानु संता धूरि तरै ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 523) मः ५ ॥
तिस नो मंनि वसाइ जिनि उपाइआ ॥ जिनि जनि धिआइआ खसमु तिनि सुखु पाइआ ॥ सफलु जनमु परवानु गुरमुखि आइआ ॥ हुकमै बुझि निहालु खसमि फुरमाइआ ॥ जिसु होआ आपि क्रिपालु सु नह भरमाइआ ॥ जो जो दिता खसमि सोई सुखु पाइआ ॥ नानक जिसहि दइआलु बुझाए हुकमु मित ॥ जिसहि भुलाए आपि मरि मरि जमहि नित ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 523) पउड़ी ॥
निंदक मारे ततकालि खिनु टिकण न दिते ॥ प्रभ दास का दुखु न खवि सकहि फड़ि जोनी जुते ॥ मथे वालि पछाड़िअनु जम मारगि मुते ॥ दुखि लगै बिललाणिआ नरकि घोरि सुते ॥ कंठि लाइ दास रखिअनु नानक हरि सते ॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 524) सलोक मः ५ ॥
रामु जपहु वडभागीहो जलि थलि पूरनु सोइ ॥ नानक नामि धिआइऐ बिघनु न लागै कोइ ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 524) मः ५ ॥
कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥ नानक अनदिनु बिलपते जिउ सुंञै घरि काउ ॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 524) पउड़ी ॥
सिमरि सिमरि दातारु मनोरथ पूरिआ ॥ इछ पुंनी मनि आस गए विसूरिआ ॥ पाइआ नामु निधानु जिस नो भालदा ॥ जोति मिली संगि जोति रहिआ घालदा ॥ सूख सहज आनंद वुठे तितु घरि ॥ आवण जाण रहे जनमु न तहा मरि ॥ साहिबु सेवकु इकु इकु द्रिसटाइआ ॥ गुर प्रसादि नानक सचि समाइआ ॥२१॥१॥२॥ सुधु


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