Pt 3 - राग गउड़ी - बाणी शब्द, Part 3 - Raag Gauri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 208) गउड़ी महला ५ ॥
दइआ मइआ करि प्रानपति मोरे मोहि अनाथ सरणि प्रभ तोरी ॥ अंध कूप महि हाथ दे राखहु कछू सिआनप उकति न मोरी ॥१॥ रहाउ ॥

करन करावन सभ किछु तुम ही तुम समरथ नाही अन होरी ॥ तुमरी गति मिति तुम ही जानी से सेवक जिन भाग मथोरी ॥१॥

अपुने सेवक संगि तुम प्रभ राते ओति पोति भगतन संगि जोरी ॥ प्रिउ प्रिउ नामु तेरा दरसनु चाहै जैसे द्रिसटि ओह चंद चकोरी ॥२॥

राम संत महि भेदु किछु नाही एकु जनु कई महि लाख करोरी ॥ जा कै हीऐ प्रगटु प्रभु होआ अनदिनु कीरतनु रसन रमोरी ॥३॥

तुम समरथ अपार अति ऊचे सुखदाते प्रभ प्रान अधोरी ॥ नानक कउ प्रभ कीजै किरपा उन संतन कै संगि संगोरी ॥४॥१३॥१३४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 209) गउड़ी महला ५ ॥
तुम हरि सेती राते संतहु ॥ निबाहि लेहु मो कउ पुरख बिधाते ओड़ि पहुचावहु दाते ॥१॥ रहाउ ॥

तुमरा मरमु तुमा ही जानिआ तुम पूरन पुरख बिधाते ॥ राखहु सरणि अनाथ दीन कउ करहु हमारी गाते ॥१॥

तरण सागर बोहिथ चरण तुमारे तुम जानहु अपुनी भाते ॥ करि किरपा जिसु राखहु संगे ते ते पारि पराते ॥२॥

ईत ऊत प्रभ तुम समरथा सभु किछु तुमरै हाथे ॥ ऐसा निधानु देहु मो कउ हरि जन चलै हमारै साथे ॥३॥

निरगुनीआरे कउ गुनु कीजै हरि नामु मेरा मनु जापे ॥ संत प्रसादि नानक हरि भेटे मन तन सीतल ध्रापे ॥४॥१४॥१३५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 209) गउड़ी महला ५ ॥
सहजि समाइओ देव ॥ मो कउ सतिगुर भए दइआल देव ॥१॥ रहाउ ॥

काटि जेवरी कीओ दासरो संतन टहलाइओ ॥ एक नाम को थीओ पूजारी मो कउ अचरजु गुरहि दिखाइओ ॥१॥

भइओ प्रगासु सरब उजीआरा गुर गिआनु मनहि प्रगटाइओ ॥ अम्रितु नामु पीओ मनु त्रिपतिआ अनभै ठहराइओ ॥२॥

मानि आगिआ सरब सुख पाए दूखह ठाउ गवाइओ ॥ जउ सुप्रसंन भए प्रभ ठाकुर सभु आनद रूपु दिखाइओ ॥३॥

ना किछु आवत ना किछु जावत सभु खेलु कीओ हरि राइओ ॥ कहु नानक अगम अगम है ठाकुर भगत टेक हरि नाइओ ॥४॥१५॥१३६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 209) गउड़ी महला ५ ॥
पारब्रहम पूरन परमेसुर मन ता की ओट गहीजै रे ॥ जिनि धारे ब्रहमंड खंड हरि ता को नामु जपीजै रे ॥१॥ रहाउ ॥

मन की मति तिआगहु हरि जन हुकमु बूझि सुखु पाईऐ रे ॥ जो प्रभु करै सोई भल मानहु सुखि दुखि ओही धिआईऐ रे ॥१॥

कोटि पतित उधारे खिन महि करते बार न लागै रे ॥ दीन दरद दुख भंजन सुआमी जिसु भावै तिसहि निवाजै रे ॥२॥

सभ को मात पिता प्रतिपालक जीअ प्रान सुख सागरु रे ॥ देंदे तोटि नाही तिसु करते पूरि रहिओ रतनागरु रे ॥३॥

जाचिकु जाचै नामु तेरा सुआमी घट घट अंतरि सोई रे ॥ नानकु दासु ता की सरणाई जा ते ब्रिथा न कोई रे ॥४॥१६॥१३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 210) गउड़ी महला ५ ॥
मन धर तरबे हरि नाम नो ॥ सागर लहरि संसा संसारु गुरु बोहिथु पार गरामनो ॥१॥ रहाउ ॥

कलि कालख अंधिआरीआ ॥ गुर गिआन दीपक उजिआरीआ ॥१॥

बिखु बिखिआ पसरी अति घनी ॥ उबरे जपि जपि हरि गुनी ॥२॥

मतवारो माइआ सोइआ ॥ गुर भेटत भ्रमु भउ खोइआ ॥३॥

कहु नानक एकु धिआइआ ॥ घटि घटि नदरी आइआ ॥४॥२॥१४०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 210) गउड़ी महला ५ ॥
दीबानु हमारो तुही एक ॥ सेवा थारी गुरहि टेक ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक जुगति नही पाइआ ॥ गुरि चाकर लै लाइआ ॥१॥

मारे पंच बिखादीआ ॥ गुर किरपा ते दलु साधिआ ॥२॥

बखसीस वजहु मिलि एकु नाम ॥ सूख सहज आनंद बिस्राम ॥३॥

प्रभ के चाकर से भले ॥ नानक तिन मुख ऊजले ॥४॥३॥१४१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 211) गउड़ी महला ५ ॥
जीअरे ओल्हा नाम का ॥ अवरु जि करन करावनो तिन महि भउ है जाम का ॥१॥ रहाउ ॥

अवर जतनि नही पाईऐ ॥ वडै भागि हरि धिआईऐ ॥१॥

लाख हिकमती जानीऐ ॥ आगै तिलु नही मानीऐ ॥२॥

अह्मबुधि करम कमावने ॥ ग्रिह बालू नीरि बहावने ॥३॥

प्रभु क्रिपालु किरपा करै ॥ नामु नानक साधू संगि मिलै ॥४॥४॥१४२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 211) गउड़ी महला ५ ॥
बारनै बलिहारनै लख बरीआ ॥ नामो हो नामु साहिब को प्रान अधरीआ ॥१॥ रहाउ ॥

करन करावन तुही एक ॥ जीअ जंत की तुही टेक ॥१॥

राज जोबन प्रभ तूं धनी ॥ तूं निरगुन तूं सरगुनी ॥२॥

ईहा ऊहा तुम रखे ॥ गुर किरपा ते को लखे ॥३॥

अंतरजामी प्रभ सुजानु ॥ नानक तकीआ तुही ताणु ॥४॥५॥१४३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 211) गउड़ी महला ५ ॥
हरि हरि हरि आराधीऐ ॥ संतसंगि हरि मनि वसै भरमु मोहु भउ साधीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

बेद पुराण सिम्रिति भने ॥ सभ ऊच बिराजित जन सुने ॥१॥

सगल असथान भै भीत चीन ॥ राम सेवक भै रहत कीन ॥२॥

लख चउरासीह जोनि फिरहि ॥ गोबिंद लोक नही जनमि मरहि ॥३॥

बल बुधि सिआनप हउमै रही ॥ हरि साध सरणि नानक गही ॥४॥६॥१४४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 211) गउड़ी महला ५ ॥
मन राम नाम गुन गाईऐ ॥ नीत नीत हरि सेवीऐ सासि सासि हरि धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

संतसंगि हरि मनि वसै ॥ दुखु दरदु अनेरा भ्रमु नसै ॥१॥

संत प्रसादि हरि जापीऐ ॥ सो जनु दूखि न विआपीऐ ॥२॥

जा कउ गुरु हरि मंत्रु दे ॥ सो उबरिआ माइआ अगनि ते ॥३॥

नानक कउ प्रभ मइआ करि ॥ मेरै मनि तनि वासै नामु हरि ॥४॥७॥१४५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 211) गउड़ी महला ५ ॥
रसना जपीऐ एकु नाम ॥ ईहा सुखु आनंदु घना आगै जीअ कै संगि काम ॥१॥ रहाउ ॥

कटीऐ तेरा अहं रोगु ॥ तूं गुर प्रसादि करि राज जोगु ॥१॥

हरि रसु जिनि जनि चाखिआ ॥ ता की त्रिसना लाथीआ ॥२॥

हरि बिस्राम निधि पाइआ ॥ सो बहुरि न कत ही धाइआ ॥३॥

हरि हरि नामु जा कउ गुरि दीआ ॥ नानक ता का भउ गइआ ॥४॥८॥१४६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 212) गउड़ी महला ५ ॥
जा कउ बिसरै राम नाम ताहू कउ पीर ॥ साधसंगति मिलि हरि रवहि से गुणी गहीर ॥१॥ रहाउ ॥

जा कउ गुरमुखि रिदै बुधि ॥ ता कै कर तल नव निधि सिधि ॥१॥

जो जानहि हरि प्रभ धनी ॥ किछु नाही ता कै कमी ॥२॥

करणैहारु पछानिआ ॥ सरब सूख रंग माणिआ ॥३॥

हरि धनु जा कै ग्रिहि वसै ॥ कहु नानक तिन संगि दुखु नसै ॥४॥९॥१४७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 212) गउड़ी महला ५ ॥
गरबु बडो मूलु इतनो ॥ रहनु नही गहु कितनो ॥१॥ रहाउ ॥

बेबरजत बेद संतना उआहू सिउ रे हितनो ॥ हार जूआर जूआ बिधे इंद्री वसि लै जितनो ॥१॥

हरन भरन स्मपूरना चरन कमल रंगि रितनो ॥ नानक उधरे साधसंगि किरपा निधि मै दितनो ॥२॥१०॥१४८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 212) गउड़ी महला ५ ॥
मोहि दासरो ठाकुर को ॥ धानु प्रभ का खाना ॥१॥ रहाउ ॥

ऐसो है रे खसमु हमारा ॥ खिन महि साजि सवारणहारा ॥१॥

कामु करी जे ठाकुर भावा ॥ गीत चरित प्रभ के गुन गावा ॥२॥

सरणि परिओ ठाकुर वजीरा ॥ तिना देखि मेरा मनु धीरा ॥३॥

एक टेक एको आधारा ॥ जन नानक हरि की लागा कारा ॥४॥११॥१४९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 212) गउड़ी महला ५ ॥
है कोई ऐसा हउमै तोरै ॥ इसु मीठी ते इहु मनु होरै ॥१॥ रहाउ ॥

अगिआनी मानुखु भइआ जो नाही सो लोरै ॥ रैणि अंधारी कारीआ कवन जुगति जितु भोरै ॥१॥

भ्रमतो भ्रमतो हारिआ अनिक बिधी करि टोरै ॥ कहु नानक किरपा भई साधसंगति निधि मोरै ॥२॥१२॥१५०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 212) गउड़ी महला ५ ॥
चिंतामणि करुणा मए ॥१॥ रहाउ ॥

दीन दइआला पारब्रहम ॥ जा कै सिमरणि सुख भए ॥१॥

अकाल पुरख अगाधि बोध ॥ सुनत जसो कोटि अघ खए ॥२॥

किरपा निधि प्रभ मइआ धारि ॥ नानक हरि हरि नाम लए ॥३॥१३॥१५१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 213) रागु गउड़ी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
त्रिसना बिरले ही की बुझी हे ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि जोरे लाख क्रोरे मनु न होरे ॥ परै परै ही कउ लुझी हे ॥१॥

सुंदर नारी अनिक परकारी पर ग्रिह बिकारी ॥ बुरा भला नही सुझी हे ॥२॥

अनिक बंधन माइआ भरमतु भरमाइआ गुण निधि नही गाइआ ॥ मन बिखै ही महि लुझी हे ॥३॥

जा कउ रे किरपा करै जीवत सोई मरै साधसंगि माइआ तरै ॥ नानक सो जनु दरि हरि सिझी हे ॥४॥१॥१५४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 213) गउड़ी महला ५ ॥
सभहू को रसु हरि हो ॥१॥ रहाउ ॥

काहू जोग काहू भोग काहू गिआन काहू धिआन ॥ काहू हो डंड धरि हो ॥१॥

काहू जाप काहू ताप काहू पूजा होम नेम ॥ काहू हो गउनु करि हो ॥२॥

काहू तीर काहू नीर काहू बेद बीचार ॥ नानका भगति प्रिअ हो ॥३॥२॥१५५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 213) गउड़ी महला ५ ॥
गुन कीरति निधि मोरी ॥१॥ रहाउ ॥

तूंही रस तूंही जस तूंही रूप तूही रंग ॥ आस ओट प्रभ तोरी ॥१॥

तूही मान तूंही धान तूही पति तूही प्रान ॥ गुरि तूटी लै जोरी ॥२॥

तूही ग्रिहि तूही बनि तूही गाउ तूही सुनि ॥ है नानक नेर नेरी ॥३॥३॥१५६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 214) गउड़ी महला ५ ॥
मातो हरि रंगि मातो ॥१॥ रहाउ ॥

ओही पीओ ओही खीओ गुरहि दीओ दानु कीओ ॥ उआहू सिउ मनु रातो ॥१॥

ओही भाठी ओही पोचा उही पिआरो उही रूचा ॥ मनि ओहो सुखु जातो ॥२॥

सहज केल अनद खेल रहे फेर भए मेल ॥ नानक गुर सबदि परातो ॥३॥४॥१५७॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 219) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु गउड़ी महला ९ ॥
साधो मन का मानु तिआगउ ॥ कामु क्रोधु संगति दुरजन की ता ते अहिनिसि भागउ ॥१॥ रहाउ ॥

सुखु दुखु दोनो सम करि जानै अउरु मानु अपमाना ॥ हरख सोग ते रहै अतीता तिनि जगि ततु पछाना ॥१॥

उसतति निंदा दोऊ तिआगै खोजै पदु निरबाना ॥ जन नानक इहु खेलु कठनु है किनहूं गुरमुखि जाना ॥२॥१॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 219) गउड़ी महला ९ ॥
साधो रचना राम बनाई ॥ इकि बिनसै इक असथिरु मानै अचरजु लखिओ न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

काम क्रोध मोह बसि प्रानी हरि मूरति बिसराई ॥ झूठा तनु साचा करि मानिओ जिउ सुपना रैनाई ॥१॥

जो दीसै सो सगल बिनासै जिउ बादर की छाई ॥ जन नानक जगु जानिओ मिथिआ रहिओ राम सरनाई ॥२॥२॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 219) गउड़ी महला ९ ॥
प्रानी कउ हरि जसु मनि नही आवै ॥ अहिनिसि मगनु रहै माइआ मै कहु कैसे गुन गावै ॥१॥ रहाउ ॥

पूत मीत माइआ ममता सिउ इह बिधि आपु बंधावै ॥ म्रिग त्रिसना जिउ झूठो इहु जग देखि तासि उठि धावै ॥१॥

भुगति मुकति का कारनु सुआमी मूड़ ताहि बिसरावै ॥ जन नानक कोटन मै कोऊ भजनु राम को पावै ॥२॥३॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 219) गउड़ी महला ९ ॥
साधो इहु मनु गहिओ न जाई ॥ चंचल त्रिसना संगि बसतु है या ते थिरु न रहाई ॥१॥ रहाउ ॥

कठन करोध घट ही के भीतरि जिह सुधि सभ बिसराई ॥ रतनु गिआनु सभ को हिरि लीना ता सिउ कछु न बसाई ॥१॥

जोगी जतन करत सभि हारे गुनी रहे गुन गाई ॥ जन नानक हरि भए दइआला तउ सभ बिधि बनि आई ॥२॥४॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 219) गउड़ी महला ९ ॥
साधो गोबिंद के गुन गावउ ॥ मानस जनमु अमोलकु पाइओ बिरथा काहि गवावउ ॥१॥ रहाउ ॥

पतित पुनीत दीन बंध हरि सरनि ताहि तुम आवउ ॥ गज को त्रासु मिटिओ जिह सिमरत तुम काहे बिसरावउ ॥१॥

तजि अभिमान मोह माइआ फुनि भजन राम चितु लावउ ॥ नानक कहत मुकति पंथ इहु गुरमुखि होइ तुम पावउ ॥२॥५॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 219) गउड़ी महला ९ ॥
कोऊ माई भूलिओ मनु समझावै ॥ बेद पुरान साध मग सुनि करि निमख न हरि गुन गावै ॥१॥ रहाउ ॥

दुरलभ देह पाइ मानस की बिरथा जनमु सिरावै ॥ माइआ मोह महा संकट बन ता सिउ रुच उपजावै ॥१॥

अंतरि बाहरि सदा संगि प्रभु ता सिउ नेहु न लावै ॥ नानक मुकति ताहि तुम मानहु जिह घटि रामु समावै ॥२॥६॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 220) गउड़ी महला ९ ॥
साधो राम सरनि बिसरामा ॥ बेद पुरान पड़े को इह गुन सिमरे हरि को नामा ॥१॥ रहाउ ॥

लोभ मोह माइआ ममता फुनि अउ बिखिअन की सेवा ॥ हरख सोग परसै जिह नाहनि सो मूरति है देवा ॥१॥

सुरग नरक अम्रित बिखु ए सभ तिउ कंचन अरु पैसा ॥ उसतति निंदा ए सम जा कै लोभु मोहु फुनि तैसा ॥२॥

दुखु सुखु ए बाधे जिह नाहनि तिह तुम जानउ गिआनी ॥ नानक मुकति ताहि तुम मानउ इह बिधि को जो प्रानी ॥३॥७॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 220) गउड़ी महला ९ ॥
मन रे कहा भइओ तै बउरा ॥ अहिनिसि अउध घटै नही जानै भइओ लोभ संगि हउरा ॥१॥ रहाउ ॥

जो तनु तै अपनो करि मानिओ अरु सुंदर ग्रिह नारी ॥ इन मैं कछु तेरो रे नाहनि देखो सोच बिचारी ॥१॥

रतन जनमु अपनो तै हारिओ गोबिंद गति नही जानी ॥ निमख न लीन भइओ चरनन सिंउ बिरथा अउध सिरानी ॥२॥

कहु नानक सोई नरु सुखीआ राम नाम गुन गावै ॥ अउर सगल जगु माइआ मोहिआ निरभै पदु नही पावै ॥३॥८॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 220) गउड़ी महला ९ ॥
नर अचेत पाप ते डरु रे ॥ दीन दइआल सगल भै भंजन सरनि ताहि तुम परु रे ॥१॥ रहाउ ॥

बेद पुरान जास गुन गावत ता को नामु हीऐ मो धरु रे ॥ पावन नामु जगति मै हरि को सिमरि सिमरि कसमल सभ हरु रे ॥१॥

मानस देह बहुरि नह पावै कछू उपाउ मुकति का करु रे ॥ नानक कहत गाइ करुना मै भव सागर कै पारि उतरु रे ॥२॥९॥२५१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 223) गउड़ी महला १ ॥
दूजी माइआ जगत चित वासु ॥ काम क्रोध अहंकार बिनासु ॥१॥

दूजा कउणु कहा नही कोई ॥ सभ महि एकु निरंजनु सोई ॥१॥ रहाउ ॥

दूजी दुरमति आखै दोइ ॥ आवै जाइ मरि दूजा होइ ॥२॥

धरणि गगन नह देखउ दोइ ॥ नारी पुरख सबाई लोइ ॥३॥

रवि ससि देखउ दीपक उजिआला ॥ सरब निरंतरि प्रीतमु बाला ॥४॥

करि किरपा मेरा चितु लाइआ ॥ सतिगुरि मो कउ एकु बुझाइआ ॥५॥

एकु निरंजनु गुरमुखि जाता ॥ दूजा मारि सबदि पछाता ॥६॥

एको हुकमु वरतै सभ लोई ॥ एकसु ते सभ ओपति होई ॥७॥

राह दोवै खसमु एको जाणु ॥ गुर कै सबदि हुकमु पछाणु ॥८॥

सगल रूप वरन मन माही ॥ कहु नानक एको सालाही ॥९॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 223) गउड़ी महला १ ॥
अधिआतम करम करे ता साचा ॥ मुकति भेदु किआ जाणै काचा ॥१॥

ऐसा जोगी जुगति बीचारै ॥ पंच मारि साचु उरि धारै ॥१॥ रहाउ ॥

जिस कै अंतरि साचु वसावै ॥ जोग जुगति की कीमति पावै ॥२॥

रवि ससि एको ग्रिह उदिआनै ॥ करणी कीरति करम समानै ॥३॥

एक सबद इक भिखिआ मागै ॥ गिआनु धिआनु जुगति सचु जागै ॥४॥

भै रचि रहै न बाहरि जाइ ॥ कीमति कउण रहै लिव लाइ ॥५॥

आपे मेले भरमु चुकाए ॥ गुर परसादि परम पदु पाए ॥६॥

गुर की सेवा सबदु वीचारु ॥ हउमै मारे करणी सारु ॥७॥

जप तप संजम पाठ पुराणु ॥ कहु नानक अपर्मपर मानु ॥८॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 223) गउड़ी महला १ ॥
खिमा गही ब्रतु सील संतोखं ॥ रोगु न बिआपै ना जम दोखं ॥ मुकत भए प्रभ रूप न रेखं ॥१॥

जोगी कउ कैसा डरु होइ ॥ रूखि बिरखि ग्रिहि बाहरि सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

निरभउ जोगी निरंजनु धिआवै ॥ अनदिनु जागै सचि लिव लावै ॥ सो जोगी मेरै मनि भावै ॥२॥

कालु जालु ब्रहम अगनी जारे ॥ जरा मरण गतु गरबु निवारे ॥ आपि तरै पितरी निसतारे ॥३॥

सतिगुरु सेवे सो जोगी होइ ॥ भै रचि रहै सु निरभउ होइ ॥ जैसा सेवै तैसो होइ ॥४॥

नर निहकेवल निरभउ नाउ ॥ अनाथह नाथ करे बलि जाउ ॥ पुनरपि जनमु नाही गुण गाउ ॥५॥

अंतरि बाहरि एको जाणै ॥ गुर कै सबदे आपु पछाणै ॥ साचै सबदि दरि नीसाणै ॥६॥

सबदि मरै तिसु निज घरि वासा ॥ आवै न जावै चूकै आसा ॥ गुर कै सबदि कमलु परगासा ॥७॥

जो दीसै सो आस निरासा ॥ काम क्रोध बिखु भूख पिआसा ॥ नानक बिरले मिलहि उदासा ॥८॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 224) गउड़ी महला १ ॥
ऐसो दासु मिलै सुखु होई ॥ दुखु विसरै पावै सचु सोई ॥१॥

दरसनु देखि भई मति पूरी ॥ अठसठि मजनु चरनह धूरी ॥१॥ रहाउ ॥

नेत्र संतोखे एक लिव तारा ॥ जिहवा सूची हरि रस सारा ॥२॥

सचु करणी अभ अंतरि सेवा ॥ मनु त्रिपतासिआ अलख अभेवा ॥३॥

जह जह देखउ तह तह साचा ॥ बिनु बूझे झगरत जगु काचा ॥४॥

गुरु समझावै सोझी होई ॥ गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥५॥

करि किरपा राखहु रखवाले ॥ बिनु बूझे पसू भए बेताले ॥६॥

गुरि कहिआ अवरु नही दूजा ॥ किसु कहु देखि करउ अन पूजा ॥७॥

संत हेति प्रभि त्रिभवण धारे ॥ आतमु चीनै सु ततु बीचारे ॥८॥

साचु रिदै सचु प्रेम निवास ॥ प्रणवति नानक हम ता के दास ॥९॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 224) गउड़ी महला १ ॥
ब्रहमै गरबु कीआ नही जानिआ ॥ बेद की बिपति पड़ी पछुतानिआ ॥ जह प्रभ सिमरे तही मनु मानिआ ॥१॥

ऐसा गरबु बुरा संसारै ॥ जिसु गुरु मिलै तिसु गरबु निवारै ॥१॥ रहाउ ॥

बलि राजा माइआ अहंकारी ॥ जगन करै बहु भार अफारी ॥ बिनु गुर पूछे जाइ पइआरी ॥२॥

हरीचंदु दानु करै जसु लेवै ॥ बिनु गुर अंतु न पाइ अभेवै ॥ आपि भुलाइ आपे मति देवै ॥३॥

दुरमति हरणाखसु दुराचारी ॥ प्रभु नाराइणु गरब प्रहारी ॥ प्रहलाद उधारे किरपा धारी ॥४॥

भूलो रावणु मुगधु अचेति ॥ लूटी लंका सीस समेति ॥ गरबि गइआ बिनु सतिगुर हेति ॥५॥

सहसबाहु मधु कीट महिखासा ॥ हरणाखसु ले नखहु बिधासा ॥ दैत संघारे बिनु भगति अभिआसा ॥६॥

जरासंधि कालजमुन संघारे ॥ रकतबीजु कालुनेमु बिदारे ॥ दैत संघारि संत निसतारे ॥७॥

आपे सतिगुरु सबदु बीचारे ॥ दूजै भाइ दैत संघारे ॥ गुरमुखि साचि भगति निसतारे ॥८॥

बूडा दुरजोधनु पति खोई ॥ रामु न जानिआ करता सोई ॥ जन कउ दूखि पचै दुखु होई ॥९॥

जनमेजै गुर सबदु न जानिआ ॥ किउ सुखु पावै भरमि भुलानिआ ॥ इकु तिलु भूले बहुरि पछुतानिआ ॥१०॥

कंसु केसु चांडूरु न कोई ॥ रामु न चीनिआ अपनी पति खोई ॥ बिनु जगदीस न राखै कोई ॥११॥

बिनु गुर गरबु न मेटिआ जाइ ॥ गुरमति धरमु धीरजु हरि नाइ ॥ नानक नामु मिलै गुण गाइ ॥१२॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 225) गउड़ी महला १ ॥
चोआ चंदनु अंकि चड़ावउ ॥ पाट पट्मबर पहिरि हढावउ ॥ बिनु हरि नाम कहा सुखु पावउ ॥१॥

किआ पहिरउ किआ ओढि दिखावउ ॥ बिनु जगदीस कहा सुखु पावउ ॥१॥ रहाउ ॥

कानी कुंडल गलि मोतीअन की माला ॥ लाल निहाली फूल गुलाला ॥ बिनु जगदीस कहा सुखु भाला ॥२॥

नैन सलोनी सुंदर नारी ॥ खोड़ सीगार करै अति पिआरी ॥ बिनु जगदीस भजे नित खुआरी ॥३॥

दर घर महला सेज सुखाली ॥ अहिनिसि फूल बिछावै माली ॥ बिनु हरि नाम सु देह दुखाली ॥४॥

हैवर गैवर नेजे वाजे ॥ लसकर नेब खवासी पाजे ॥ बिनु जगदीस झूठे दिवाजे ॥५॥

सिधु कहावउ रिधि सिधि बुलावउ ॥ ताज कुलह सिरि छत्रु बनावउ ॥ बिनु जगदीस कहा सचु पावउ ॥६॥

खानु मलूकु कहावउ राजा ॥ अबे तबे कूड़े है पाजा ॥ बिनु गुर सबद न सवरसि काजा ॥७॥

हउमै ममता गुर सबदि विसारी ॥ गुरमति जानिआ रिदै मुरारी ॥ प्रणवति नानक सरणि तुमारी ॥८॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 225) गउड़ी महला १ ॥
सेवा एक न जानसि अवरे ॥ परपंच बिआधि तिआगै कवरे ॥ भाइ मिलै सचु साचै सचु रे ॥१॥

ऐसा राम भगतु जनु होई ॥ हरि गुण गाइ मिलै मलु धोई ॥१॥ रहाउ ॥

ऊंधो कवलु सगल संसारै ॥ दुरमति अगनि जगत परजारै ॥ सो उबरै गुर सबदु बीचारै ॥२॥

भ्रिंग पतंगु कुंचरु अरु मीना ॥ मिरगु मरै सहि अपुना कीना ॥ त्रिसना राचि ततु नही बीना ॥३॥

कामु चितै कामणि हितकारी ॥ क्रोधु बिनासै सगल विकारी ॥ पति मति खोवहि नामु विसारी ॥४॥

पर घरि चीतु मनमुखि डोलाइ ॥ गलि जेवरी धंधै लपटाइ ॥ गुरमुखि छूटसि हरि गुण गाइ ॥५॥

जिउ तनु बिधवा पर कउ देई ॥ कामि दामि चितु पर वसि सेई ॥ बिनु पिर त्रिपति न कबहूं होई ॥६॥

पड़ि पड़ि पोथी सिम्रिति पाठा ॥ बेद पुराण पड़ै सुणि थाटा ॥ बिनु रस राते मनु बहु नाटा ॥७॥

जिउ चात्रिक जल प्रेम पिआसा ॥ जिउ मीना जल माहि उलासा ॥ नानक हरि रसु पी त्रिपतासा ॥८॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 226) गउड़ी महला १ ॥
हठु करि मरै न लेखै पावै ॥ वेस करै बहु भसम लगावै ॥ नामु बिसारि बहुरि पछुतावै ॥१॥

तूं मनि हरि जीउ तूं मनि सूख ॥ नामु बिसारि सहहि जम दूख ॥१॥ रहाउ ॥

चोआ चंदन अगर कपूरि ॥ माइआ मगनु परम पदु दूरि ॥ नामि बिसारिऐ सभु कूड़ो कूरि ॥२॥

नेजे वाजे तखति सलामु ॥ अधकी त्रिसना विआपै कामु ॥ बिनु हरि जाचे भगति न नामु ॥३॥

वादि अहंकारि नाही प्रभ मेला ॥ मनु दे पावहि नामु सुहेला ॥ दूजै भाइ अगिआनु दुहेला ॥४॥

बिनु दम के सउदा नही हाट ॥ बिनु बोहिथ सागर नही वाट ॥ बिनु गुर सेवे घाटे घाटि ॥५॥

तिस कउ वाहु वाहु जि वाट दिखावै ॥ तिस कउ वाहु वाहु जि सबदु सुणावै ॥ तिस कउ वाहु वाहु जि मेलि मिलावै ॥६॥

वाहु वाहु तिस कउ जिस का इहु जीउ ॥ गुर सबदी मथि अम्रितु पीउ ॥ नाम वडाई तुधु भाणै दीउ ॥७॥

नाम बिना किउ जीवा माइ ॥ अनदिनु जपतु रहउ तेरी सरणाइ ॥ नानक नामि रते पति पाइ ॥८॥१२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 226) गउड़ी महला १ ॥
हउमै करत भेखी नही जानिआ ॥ गुरमुखि भगति विरले मनु मानिआ ॥१॥

हउ हउ करत नही सचु पाईऐ ॥ हउमै जाइ परम पदु पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

हउमै करि राजे बहु धावहि ॥ हउमै खपहि जनमि मरि आवहि ॥२॥

हउमै निवरै गुर सबदु वीचारै ॥ चंचल मति तिआगै पंच संघारै ॥३॥

अंतरि साचु सहज घरि आवहि ॥ राजनु जाणि परम गति पावहि ॥४॥

सचु करणी गुरु भरमु चुकावै ॥ निरभउ कै घरि ताड़ी लावै ॥५॥

हउ हउ करि मरणा किआ पावै ॥ पूरा गुरु भेटे सो झगरु चुकावै ॥६॥

जेती है तेती किहु नाही ॥ गुरमुखि गिआन भेटि गुण गाही ॥७॥

हउमै बंधन बंधि भवावै ॥ नानक राम भगति सुखु पावै ॥८॥१३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 227) गउड़ी महला १ ॥
प्रथमे ब्रहमा कालै घरि आइआ ॥ ब्रहम कमलु पइआलि न पाइआ ॥ आगिआ नही लीनी भरमि भुलाइआ ॥१॥

जो उपजै सो कालि संघारिआ ॥ हम हरि राखे गुर सबदु बीचारिआ ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ मोहे देवी सभि देवा ॥ कालु न छोडै बिनु गुर की सेवा ॥ ओहु अबिनासी अलख अभेवा ॥२॥

सुलतान खान बादिसाह नही रहना ॥ नामहु भूलै जम का दुखु सहना ॥ मै धर नामु जिउ राखहु रहना ॥३॥

चउधरी राजे नही किसै मुकामु ॥ साह मरहि संचहि माइआ दाम ॥ मै धनु दीजै हरि अम्रित नामु ॥४॥

रयति महर मुकदम सिकदारै ॥ निहचलु कोइ न दिसै संसारै ॥ अफरिउ कालु कूड़ु सिरि मारै ॥५॥

निहचलु एकु सचा सचु सोई ॥ जिनि करि साजी तिनहि सभ गोई ॥ ओहु गुरमुखि जापै तां पति होई ॥६॥

काजी सेख भेख फकीरा ॥ वडे कहावहि हउमै तनि पीरा ॥ कालु न छोडै बिनु सतिगुर की धीरा ॥७॥

कालु जालु जिहवा अरु नैणी ॥ कानी कालु सुणै बिखु बैणी ॥ बिनु सबदै मूठे दिनु रैणी ॥८॥

हिरदै साचु वसै हरि नाइ ॥ कालु न जोहि सकै गुण गाइ ॥ नानक गुरमुखि सबदि समाइ ॥९॥१४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 227) गउड़ी महला १ ॥
बोलहि साचु मिथिआ नही राई ॥ चालहि गुरमुखि हुकमि रजाई ॥ रहहि अतीत सचे सरणाई ॥१॥

सच घरि बैसै कालु न जोहै ॥ मनमुख कउ आवत जावत दुखु मोहै ॥१॥ रहाउ ॥

अपिउ पीअउ अकथु कथि रहीऐ ॥ निज घरि बैसि सहज घरु लहीऐ ॥ हरि रसि माते इहु सुखु कहीऐ ॥२॥

गुरमति चाल निहचल नही डोलै ॥ गुरमति साचि सहजि हरि बोलै ॥ पीवै अम्रितु ततु विरोलै ॥३॥

सतिगुरु देखिआ दीखिआ लीनी ॥ मनु तनु अरपिओ अंतर गति कीनी ॥ गति मिति पाई आतमु चीनी ॥४॥

भोजनु नामु निरंजन सारु ॥ परम हंसु सचु जोति अपार ॥ जह देखउ तह एकंकारु ॥५॥

रहै निरालमु एका सचु करणी ॥ परम पदु पाइआ सेवा गुर चरणी ॥ मन ते मनु मानिआ चूकी अहं भ्रमणी ॥६॥

इन बिधि कउणु कउणु नही तारिआ ॥ हरि जसि संत भगत निसतारिआ ॥ प्रभ पाए हम अवरु न भारिआ ॥७॥

साच महलि गुरि अलखु लखाइआ ॥ निहचल महलु नही छाइआ माइआ ॥ साचि संतोखे भरमु चुकाइआ ॥८॥

जिन कै मनि वसिआ सचु सोई ॥ तिन की संगति गुरमुखि होई ॥ नानक साचि नामि मलु खोई ॥९॥१५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 228) गउड़ी महला १ ॥
रामि नामि चितु रापै जा का ॥ उपज्मपि दरसनु कीजै ता का ॥१॥

राम न जपहु अभागु तुमारा ॥ जुगि जुगि दाता प्रभु रामु हमारा ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमति रामु जपै जनु पूरा ॥ तितु घट अनहत बाजे तूरा ॥२॥

जो जन राम भगति हरि पिआरि ॥ से प्रभि राखे किरपा धारि ॥३॥

जिन कै हिरदै हरि हरि सोई ॥ तिन का दरसु परसि सुखु होई ॥४॥

सरब जीआ महि एको रवै ॥ मनमुखि अहंकारी फिरि जूनी भवै ॥५॥

सो बूझै जो सतिगुरु पाए ॥ हउमै मारे गुर सबदे पाए ॥६॥

अरध उरध की संधि किउ जानै ॥ गुरमुखि संधि मिलै मनु मानै ॥७॥

हम पापी निरगुण कउ गुणु करीऐ ॥ प्रभ होइ दइआलु नानक जन तरीऐ ॥८॥१६॥

सोलह असटपदीआ गुआरेरी गउड़ी कीआ ॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 229) गउड़ी महला १ ॥
गुर परसादी बूझि ले तउ होइ निबेरा ॥ घरि घरि नामु निरंजना सो ठाकुरु मेरा ॥१॥

बिनु गुर सबद न छूटीऐ देखहु वीचारा ॥ जे लख करम कमावही बिनु गुर अंधिआरा ॥१॥ रहाउ ॥

अंधे अकली बाहरे किआ तिन सिउ कहीऐ ॥ बिनु गुर पंथु न सूझई कितु बिधि निरबहीऐ ॥२॥

खोटे कउ खरा कहै खरे सार न जाणै ॥ अंधे का नाउ पारखू कली काल विडाणै ॥३॥

सूते कउ जागतु कहै जागत कउ सूता ॥ जीवत कउ मूआ कहै मूए नही रोता ॥४॥

आवत कउ जाता कहै जाते कउ आइआ ॥ पर की कउ अपुनी कहै अपुनो नही भाइआ ॥५॥

मीठे कउ कउड़ा कहै कड़ूए कउ मीठा ॥ राते की निंदा करहि ऐसा कलि महि डीठा ॥६॥

चेरी की सेवा करहि ठाकुरु नही दीसै ॥ पोखरु नीरु विरोलीऐ माखनु नही रीसै ॥७॥

इसु पद जो अरथाइ लेइ सो गुरू हमारा ॥ नानक चीनै आप कउ सो अपर अपारा ॥८॥

सभु आपे आपि वरतदा आपे भरमाइआ ॥ गुर किरपा ते बूझीऐ सभु ब्रहमु समाइआ ॥९॥२॥१८॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates