Pt 2 - राग गउड़ी - बाणी शब्द, Part 2 - Raag Gauri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 195) गउड़ी महला ५ ॥
जिस का दीआ पैनै खाइ ॥ तिसु सिउ आलसु किउ बनै माइ ॥१॥

खसमु बिसारि आन कमि लागहि ॥ कउडी बदले रतनु तिआगहि ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभू तिआगि लागत अन लोभा ॥ दासि सलामु करत कत सोभा ॥२॥

अम्रित रसु खावहि खान पान ॥ जिनि दीए तिसहि न जानहि सुआन ॥३॥

कहु नानक हम लूण हरामी ॥ बखसि लेहु प्रभ अंतरजामी ॥४॥७६॥१४५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 195) गउड़ी महला ५ ॥
प्रभ के चरन मन माहि धिआनु ॥ सगल तीरथ मजन इसनानु ॥१॥

हरि दिनु हरि सिमरनु मेरे भाई ॥ कोटि जनम की मलु लहि जाई ॥१॥ रहाउ ॥

हरि की कथा रिद माहि बसाई ॥ मन बांछत सगले फल पाई ॥२॥

जीवन मरणु जनमु परवानु ॥ जा कै रिदै वसै भगवानु ॥३॥

कहु नानक सेई जन पूरे ॥ जिना परापति साधू धूरे ॥४॥७७॥१४६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 195) गउड़ी महला ५ ॥
खादा पैनदा मूकरि पाइ ॥ तिस नो जोहहि दूत धरमराइ ॥१॥

तिसु सिउ बेमुखु जिनि जीउ पिंडु दीना ॥ कोटि जनम भरमहि बहु जूना ॥१॥ रहाउ ॥

साकत की ऐसी है रीति ॥ जो किछु करै सगल बिपरीति ॥२॥

जीउ प्राण जिनि मनु तनु धारिआ ॥ सोई ठाकुरु मनहु बिसारिआ ॥३॥

बधे बिकार लिखे बहु कागर ॥ नानक उधरु क्रिपा सुख सागर ॥४॥

पारब्रहम तेरी सरणाइ ॥ बंधन काटि तरै हरि नाइ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥७८॥१४७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 195) गउड़ी महला ५ ॥
अपने लोभ कउ कीनो मीतु ॥ सगल मनोरथ मुकति पदु दीतु ॥१॥

ऐसा मीतु करहु सभु कोइ ॥ जा ते बिरथा कोइ न होइ ॥१॥ रहाउ ॥

अपुनै सुआइ रिदै लै धारिआ ॥ दूख दरद रोग सगल बिदारिआ ॥२॥

रसना गीधी बोलत राम ॥ पूरन होए सगले काम ॥३॥

अनिक बार नानक बलिहारा ॥ सफल दरसनु गोबिंदु हमारा ॥४॥७९॥१४८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 195) गउड़ी महला ५ ॥
कोटि बिघन हिरे खिन माहि ॥ हरि हरि कथा साधसंगि सुनाहि ॥१॥

पीवत राम रसु अम्रित गुण जासु ॥ जपि हरि चरण मिटी खुधि तासु ॥१॥ रहाउ ॥

सरब कलिआण सुख सहज निधान ॥ जा कै रिदै वसहि भगवान ॥२॥

अउखध मंत्र तंत सभि छारु ॥ करणैहारु रिदे महि धारु ॥३॥

तजि सभि भरम भजिओ पारब्रहमु ॥ कहु नानक अटल इहु धरमु ॥४॥८०॥१४९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 196) गउड़ी महला ५ ॥
करि किरपा भेटे गुर सोई ॥ तितु बलि रोगु न बिआपै कोई ॥१॥

राम रमण तरण भै सागर ॥ सरणि सूर फारे जम कागर ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरि मंत्रु दीओ हरि नाम ॥ इह आसर पूरन भए काम ॥२॥

जप तप संजम पूरी वडिआई ॥ गुर किरपाल हरि भए सहाई ॥३॥

मान मोह खोए गुरि भरम ॥ पेखु नानक पसरे पारब्रहम ॥४॥८१॥१५०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 196) गउड़ी महला ५ ॥
बिखै राज ते अंधुला भारी ॥ दुखि लागै राम नामु चितारी ॥१॥

तेरे दास कउ तुही वडिआई ॥ माइआ मगनु नरकि लै जाई ॥१॥ रहाउ ॥

रोग गिरसत चितारे नाउ ॥ बिखु माते का ठउर न ठाउ ॥२॥

चरन कमल सिउ लागी प्रीति ॥ आन सुखा नही आवहि चीति ॥३॥

सदा सदा सिमरउ प्रभ सुआमी ॥ मिलु नानक हरि अंतरजामी ॥४॥८२॥१५१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 196) गउड़ी महला ५ ॥
आठ पहर संगी बटवारे ॥ करि किरपा प्रभि लए निवारे ॥१॥

ऐसा हरि रसु रमहु सभु कोइ ॥ सरब कला पूरन प्रभु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

महा तपति सागर संसार ॥ प्रभ खिन महि पारि उतारणहार ॥२॥

अनिक बंधन तोरे नही जाहि ॥ सिमरत नाम मुकति फल पाहि ॥३॥

उकति सिआनप इस ते कछु नाहि ॥ करि किरपा नानक गुण गाहि ॥४॥८३॥१५२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 196) गउड़ी महला ५ ॥
थाती पाई हरि को नाम ॥ बिचरु संसार पूरन सभि काम ॥१॥

वडभागी हरि कीरतनु गाईऐ ॥ पारब्रहम तूं देहि त पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के चरण हिरदै उरि धारि ॥ भव सागरु चड़ि उतरहि पारि ॥२॥

साधू संगु करहु सभु कोइ ॥ सदा कलिआण फिरि दूखु न होइ ॥३॥

प्रेम भगति भजु गुणी निधानु ॥ नानक दरगह पाईऐ मानु ॥४॥८४॥१५३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 196) गउड़ी महला ५ ॥
जलि थलि महीअलि पूरन हरि मीत ॥ भ्रम बिनसे गाए गुण नीत ॥१॥

ऊठत सोवत हरि संगि पहरूआ ॥ जा कै सिमरणि जम नही डरूआ ॥१॥ रहाउ ॥

चरण कमल प्रभ रिदै निवासु ॥ सगल दूख का होइआ नासु ॥२॥

आसा माणु ताणु धनु एक ॥ साचे साह की मन महि टेक ॥३॥

महा गरीब जन साध अनाथ ॥ नानक प्रभि राखे दे हाथ ॥४॥८५॥१५४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 197) गउड़ी महला ५ ॥
हरि हरि नामि मजनु करि सूचे ॥ कोटि ग्रहण पुंन फल मूचे ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के चरण रिदे महि बसे ॥ जनम जनम के किलविख नसे ॥१॥

साधसंगि कीरतन फलु पाइआ ॥ जम का मारगु द्रिसटि न आइआ ॥२॥

मन बच क्रम गोविंद अधारु ॥ ता ते छुटिओ बिखु संसारु ॥३॥

करि किरपा प्रभि कीनो अपना ॥ नानक जापु जपे हरि जपना ॥४॥८६॥१५५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 197) गउड़ी महला ५ ॥
पउ सरणाई जिनि हरि जाते ॥ मनु तनु सीतलु चरण हरि राते ॥१॥

भै भंजन प्रभ मनि न बसाही ॥ डरपत डरपत जनम बहुतु जाही ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै रिदै बसिओ हरि नाम ॥ सगल मनोरथ ता के पूरन काम ॥२॥

जनमु जरा मिरतु जिसु वासि ॥ सो समरथु सिमरि सासि गिरासि ॥३॥

मीतु साजनु सखा प्रभु एक ॥ नामु सुआमी का नानक टेक ॥४॥८७॥१५६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 197) गउड़ी महला ५ ॥
बाहरि राखिओ रिदै समालि ॥ घरि आए गोविंदु लै नालि ॥१॥

हरि हरि नामु संतन कै संगि ॥ मनु तनु राता राम कै रंगि ॥१॥ रहाउ ॥

गुर परसादी सागरु तरिआ ॥ जनम जनम के किलविख सभि हिरिआ ॥२॥

सोभा सुरति नामि भगवंतु ॥ पूरे गुर का निरमल मंतु ॥३॥

चरण कमल हिरदे महि जापु ॥ नानकु पेखि जीवै परतापु ॥४॥८८॥१५७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 197) गउड़ी महला ५ ॥
धंनु इहु थानु गोविंद गुण गाए ॥ कुसल खेम प्रभि आपि बसाए ॥१॥ रहाउ ॥

बिपति तहा जहा हरि सिमरनु नाही ॥ कोटि अनंद जह हरि गुन गाही ॥१॥

हरि बिसरिऐ दुख रोग घनेरे ॥ प्रभ सेवा जमु लगै न नेरे ॥२॥

सो वडभागी निहचल थानु ॥ जह जपीऐ प्रभ केवल नामु ॥३॥

जह जाईऐ तह नालि मेरा सुआमी ॥ नानक कउ मिलिआ अंतरजामी ॥४॥८९॥१५८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 197) गउड़ी महला ५ ॥
जो प्राणी गोविंदु धिआवै ॥ पड़िआ अणपड़िआ परम गति पावै ॥१॥

साधू संगि सिमरि गोपाल ॥ बिनु नावै झूठा धनु मालु ॥१॥ रहाउ ॥

रूपवंतु सो चतुरु सिआणा ॥ जिनि जनि मानिआ प्रभ का भाणा ॥२॥

जग महि आइआ सो परवाणु ॥ घटि घटि अपणा सुआमी जाणु ॥३॥

कहु नानक जा के पूरन भाग ॥ हरि चरणी ता का मनु लाग ॥४॥९०॥१५९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 198) गउड़ी महला ५ ॥
हरि के दास सिउ साकत नही संगु ॥ ओहु बिखई ओसु राम को रंगु ॥१॥ रहाउ ॥

मन असवार जैसे तुरी सीगारी ॥ जिउ कापुरखु पुचारै नारी ॥१॥

बैल कउ नेत्रा पाइ दुहावै ॥ गऊ चरि सिंघ पाछै पावै ॥२॥

गाडर ले कामधेनु करि पूजी ॥ सउदे कउ धावै बिनु पूंजी ॥३॥

नानक राम नामु जपि चीत ॥ सिमरि सुआमी हरि सा मीत ॥४॥९१॥१६०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 198) गउड़ी महला ५ ॥
सा मति निरमल कहीअत धीर ॥ राम रसाइणु पीवत बीर ॥१॥

हरि के चरण हिरदै करि ओट ॥ जनम मरण ते होवत छोट ॥१॥ रहाउ ॥

सो तनु निरमलु जितु उपजै न पापु ॥ राम रंगि निरमल परतापु ॥२॥

साधसंगि मिटि जात बिकार ॥ सभ ते ऊच एहो उपकार ॥३॥

प्रेम भगति राते गोपाल ॥ नानक जाचै साध रवाल ॥४॥९२॥१६१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 198) गउड़ी महला ५ ॥
ऐसी प्रीति गोविंद सिउ लागी ॥ मेलि लए पूरन वडभागी ॥१॥ रहाउ ॥

भरता पेखि बिगसै जिउ नारी ॥ तिउ हरि जनु जीवै नामु चितारी ॥१॥

पूत पेखि जिउ जीवत माता ॥ ओति पोति जनु हरि सिउ राता ॥२॥

लोभी अनदु करै पेखि धना ॥ जन चरन कमल सिउ लागो मना ॥३॥

बिसरु नही इकु तिलु दातार ॥ नानक के प्रभ प्रान अधार ॥४॥९३॥१६२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 198) गउड़ी महला ५ ॥
राम रसाइणि जो जन गीधे ॥ चरन कमल प्रेम भगती बीधे ॥१॥ रहाउ ॥

आन रसा दीसहि सभि छारु ॥ नाम बिना निहफल संसार ॥१॥

अंध कूप ते काढे आपि ॥ गुण गोविंद अचरज परताप ॥२॥

वणि त्रिणि त्रिभवणि पूरन गोपाल ॥ ब्रहम पसारु जीअ संगि दइआल ॥३॥

कहु नानक सा कथनी सारु ॥ मानि लेतु जिसु सिरजनहारु ॥४॥९४॥१६३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 198) गउड़ी महला ५ ॥
नितप्रति नावणु राम सरि कीजै ॥ झोलि महा रसु हरि अम्रितु पीजै ॥१॥ रहाउ ॥

निरमल उदकु गोविंद का नाम ॥ मजनु करत पूरन सभि काम ॥१॥

संतसंगि तह गोसटि होइ ॥ कोटि जनम के किलविख खोइ ॥२॥

सिमरहि साध करहि आनंदु ॥ मनि तनि रविआ परमानंदु ॥३॥

जिसहि परापति हरि चरण निधान ॥ नानक दास तिसहि कुरबान ॥४॥९५॥१६४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 199) गउड़ी महला ५ ॥
सो किछु करि जितु मैलु न लागै ॥ हरि कीरतन महि एहु मनु जागै ॥१॥ रहाउ ॥

एको सिमरि न दूजा भाउ ॥ संतसंगि जपि केवल नाउ ॥१॥

करम धरम नेम ब्रत पूजा ॥ पारब्रहम बिनु जानु न दूजा ॥२॥

ता की पूरन होई घाल ॥ जा की प्रीति अपुने प्रभ नालि ॥३॥

सो बैसनो है अपर अपारु ॥ कहु नानक जिनि तजे बिकार ॥४॥९६॥१६५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 199) गउड़ी महला ५ ॥
जीवत छाडि जाहि देवाने ॥ मुइआ उन ते को वरसांने ॥१॥

सिमरि गोविंदु मनि तनि धुरि लिखिआ ॥ काहू काज न आवत बिखिआ ॥१॥ रहाउ ॥

बिखै ठगउरी जिनि जिनि खाई ॥ ता की त्रिसना कबहूं न जाई ॥२॥

दारन दुख दुतर संसारु ॥ राम नाम बिनु कैसे उतरसि पारि ॥३॥

साधसंगि मिलि दुइ कुल साधि ॥ राम नाम नानक आराधि ॥४॥९७॥१६६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 199) गउड़ी महला ५ ॥
गरीबा उपरि जि खिंजै दाड़ी ॥ पारब्रहमि सा अगनि महि साड़ी ॥१॥

पूरा निआउ करे करतारु ॥ अपुने दास कउ राखनहारु ॥१॥ रहाउ ॥

आदि जुगादि प्रगटि परतापु ॥ निंदकु मुआ उपजि वड तापु ॥२॥

तिनि मारिआ जि रखै न कोइ ॥ आगै पाछै मंदी सोइ ॥३॥

अपुने दास राखै कंठि लाइ ॥ सरणि नानक हरि नामु धिआइ ॥४॥९८॥१६७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 199) गउड़ी महला ५ ॥
महजरु झूठा कीतोनु आपि ॥ पापी कउ लागा संतापु ॥१॥

जिसहि सहाई गोबिदु मेरा ॥ तिसु कउ जमु नही आवै नेरा ॥१॥ रहाउ ॥

साची दरगह बोलै कूड़ु ॥ सिरु हाथ पछोड़ै अंधा मूड़ु ॥२॥

रोग बिआपे करदे पाप ॥ अदली होइ बैठा प्रभु आपि ॥३॥

अपन कमाइऐ आपे बाधे ॥ दरबु गइआ सभु जीअ कै साथै ॥४॥

नानक सरनि परे दरबारि ॥ राखी पैज मेरै करतारि ॥५॥९९॥१६८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 199) गउड़ी महला ५ ॥
जन की धूरि मन मीठ खटानी ॥ पूरबि करमि लिखिआ धुरि प्रानी ॥१॥ रहाउ ॥

अह्मबुधि मन पूरि थिधाई ॥ साध धूरि करि सुध मंजाई ॥१॥

अनिक जला जे धोवै देही ॥ मैलु न उतरै सुधु न तेही ॥२॥

सतिगुरु भेटिओ सदा क्रिपाल ॥ हरि सिमरि सिमरि काटिआ भउ काल ॥३॥

मुकति भुगति जुगति हरि नाउ ॥ प्रेम भगति नानक गुण गाउ ॥४॥१००॥१६९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
जीवन पदवी हरि के दास ॥ जिन मिलिआ आतम परगासु ॥१॥

हरि का सिमरनु सुनि मन कानी ॥ सुखु पावहि हरि दुआर परानी ॥१॥ रहाउ ॥

आठ पहर धिआईऐ गोपालु ॥ नानक दरसनु देखि निहालु ॥२॥१०१॥१७०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
सांति भई गुर गोबिदि पाई ॥ ताप पाप बिनसे मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥

राम नामु नित रसन बखान ॥ बिनसे रोग भए कलिआन ॥१॥

पारब्रहम गुण अगम बीचार ॥ साधू संगमि है निसतार ॥२॥

निरमल गुण गावहु नित नीत ॥ गई बिआधि उबरे जन मीत ॥३॥

मन बच क्रम प्रभु अपना धिआई ॥ नानक दास तेरी सरणाई ॥४॥१०२॥१७१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
नेत्र प्रगासु कीआ गुरदेव ॥ भरम गए पूरन भई सेव ॥१॥ रहाउ ॥

सीतला ते रखिआ बिहारी ॥ पारब्रहम प्रभ किरपा धारी ॥१॥

नानक नामु जपै सो जीवै ॥ साधसंगि हरि अम्रितु पीवै ॥२॥१०३॥१७२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
धनु ओहु मसतकु धनु तेरे नेत ॥ धनु ओइ भगत जिन तुम संगि हेत ॥१॥

नाम बिना कैसे सुखु लहीऐ ॥ रसना राम नाम जसु कहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

तिन ऊपरि जाईऐ कुरबाणु ॥ नानक जिनि जपिआ निरबाणु ॥२॥१०४॥१७३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
तूंहै मसलति तूंहै नालि ॥ तूहै राखहि सारि समालि ॥१॥

ऐसा रामु दीन दुनी सहाई ॥ दास की पैज रखै मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥

आगै आपि इहु थानु वसि जा कै ॥ आठ पहर मनु हरि कउ जापै ॥२॥

पति परवाणु सचु नीसाणु ॥ जा कउ आपि करहि फुरमानु ॥३॥

आपे दाता आपि प्रतिपालि ॥ नित नित नानक राम नामु समालि ॥४॥१०५॥१७४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 200) गउड़ी महला ५ ॥
सतिगुरु पूरा भइआ क्रिपालु ॥ हिरदै वसिआ सदा गुपालु ॥१॥

रामु रवत सद ही सुखु पाइआ ॥ मइआ करी पूरन हरि राइआ ॥१॥ रहाउ ॥

कहु नानक जा के पूरे भाग ॥ हरि हरि नामु असथिरु सोहागु ॥२॥१०६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 201) गउड़ी महला ५ ॥
धोती खोलि विछाए हेठि ॥ गरधप वांगू लाहे पेटि ॥१॥

बिनु करतूती मुकति न पाईऐ ॥ मुकति पदारथु नामु धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

पूजा तिलक करत इसनानां ॥ छुरी काढि लेवै हथि दाना ॥२॥

बेदु पड़ै मुखि मीठी बाणी ॥ जीआं कुहत न संगै पराणी ॥३॥

कहु नानक जिसु किरपा धारै ॥ हिरदा सुधु ब्रहमु बीचारै ॥४॥१०७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 201) गउड़ी महला ५ ॥
थिरु घरि बैसहु हरि जन पिआरे ॥ सतिगुरि तुमरे काज सवारे ॥१॥ रहाउ ॥

दुसट दूत परमेसरि मारे ॥ जन की पैज रखी करतारे ॥१॥

बादिसाह साह सभ वसि करि दीने ॥ अम्रित नाम महा रस पीने ॥२॥

निरभउ होइ भजहु भगवान ॥ साधसंगति मिलि कीनो दानु ॥३॥

सरणि परे प्रभ अंतरजामी ॥ नानक ओट पकरी प्रभ सुआमी ॥४॥१०८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 201) गउड़ी महला ५ ॥
हरि संगि राते भाहि न जलै ॥ हरि संगि राते माइआ नही छलै ॥ हरि संगि राते नही डूबै जला ॥ हरि संगि राते सुफल फला ॥१॥

सभ भै मिटहि तुमारै नाइ ॥ भेटत संगि हरि हरि गुन गाइ ॥ रहाउ ॥

हरि संगि राते मिटै सभ चिंता ॥ हरि सिउ सो रचै जिसु साध का मंता ॥ हरि संगि राते जम की नही त्रास ॥ हरि संगि राते पूरन आस ॥२॥

हरि संगि राते दूखु न लागै ॥ हरि संगि राता अनदिनु जागै ॥ हरि संगि राता सहज घरि वसै ॥ हरि संगि राते भ्रमु भउ नसै ॥३॥

हरि संगि राते मति ऊतम होइ ॥ हरि संगि राते निरमल सोइ ॥ कहु नानक तिन कउ बलि जाई ॥ जिन कउ प्रभु मेरा बिसरत नाही ॥४॥१०९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 201) गउड़ी महला ५ ॥
उदमु करत सीतल मन भए ॥ मारगि चलत सगल दुख गए ॥ नामु जपत मनि भए अनंद ॥ रसि गाए गुन परमानंद ॥१॥

खेम भइआ कुसल घरि आए ॥ भेटत साधसंगि गई बलाए ॥ रहाउ ॥

नेत्र पुनीत पेखत ही दरस ॥ धनि मसतक चरन कमल ही परस ॥ गोबिंद की टहल सफल इह कांइआ ॥ संत प्रसादि परम पदु पाइआ ॥२॥

जन की कीनी आपि सहाइ ॥ सुखु पाइआ लगि दासह पाइ ॥ आपु गइआ ता आपहि भए ॥ क्रिपा निधान की सरनी पए ॥३॥

जो चाहत सोई जब पाइआ ॥ तब ढूंढन कहा को जाइआ ॥ असथिर भए बसे सुख आसन ॥ गुर प्रसादि नानक सुख बासन ॥४॥११०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 202) गउड़ी महला ५ ॥
कोटि मजन कीनो इसनान ॥ लाख अरब खरब दीनो दानु ॥ जा मनि वसिओ हरि को नामु ॥१॥

सगल पवित गुन गाइ गुपाल ॥ पाप मिटहि साधू सरनि दइआल ॥ रहाउ ॥

बहुतु उरध तप साधन साधे ॥ अनिक लाभ मनोरथ लाधे ॥ हरि हरि नाम रसन आराधे ॥२॥

सिम्रिति सासत बेद बखाने ॥ जोग गिआन सिध सुख जाने ॥ नामु जपत प्रभ सिउ मन माने ॥३॥

अगाधि बोधि हरि अगम अपारे ॥ नामु जपत नामु रिदे बीचारे ॥ नानक कउ प्रभ किरपा धारे ॥४॥१११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 202) गउड़ी मः ५ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ ॥ चरन कमल गुर रिदै बसाइआ ॥१॥

गुर गोबिंदु पारब्रहमु पूरा ॥ तिसहि अराधि मेरा मनु धीरा ॥ रहाउ ॥

अनदिनु जपउ गुरू गुर नाम ॥ ता ते सिधि भए सगल कांम ॥२॥

दरसन देखि सीतल मन भए ॥ जनम जनम के किलबिख गए ॥३॥

कहु नानक कहा भै भाई ॥ अपने सेवक की आपि पैज रखाई ॥४॥११२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 202) गउड़ी महला ५ ॥
अपने सेवक कउ आपि सहाई ॥ नित प्रतिपारै बाप जैसे माई ॥१॥

प्रभ की सरनि उबरै सभ कोइ ॥ करन करावन पूरन सचु सोइ ॥ रहाउ ॥

अब मनि बसिआ करनैहारा ॥ भै बिनसे आतम सुख सारा ॥२॥

करि किरपा अपने जन राखे ॥ जनम जनम के किलबिख लाथे ॥३॥

कहनु न जाइ प्रभ की वडिआई ॥ नानक दास सदा सरनाई ॥४॥११३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 203) गउड़ी महला ५ ॥
भुज बल बीर ब्रहम सुख सागर गरत परत गहि लेहु अंगुरीआ ॥१॥ रहाउ ॥

स्रवनि न सुरति नैन सुंदर नही आरत दुआरि रटत पिंगुरीआ ॥१॥

दीना नाथ अनाथ करुणा मै साजन मीत पिता महतरीआ ॥ चरन कवल हिरदै गहि नानक भै सागर संत पारि उतरीआ ॥२॥२॥११५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 204) गउड़ी महला ५ ॥
प्रभ मिलबे कउ प्रीति मनि लागी ॥ पाइ लगउ मोहि करउ बेनती कोऊ संतु मिलै बडभागी ॥१॥ रहाउ ॥

मनु अरपउ धनु राखउ आगै मन की मति मोहि सगल तिआगी ॥ जो प्रभ की हरि कथा सुनावै अनदिनु फिरउ तिसु पिछै विरागी ॥१॥

पूरब करम अंकुर जब प्रगटे भेटिओ पुरखु रसिक बैरागी ॥ मिटिओ अंधेरु मिलत हरि नानक जनम जनम की सोई जागी ॥२॥२॥११९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 204) गउड़ी महला ५ ॥
निकसु रे पंखी सिमरि हरि पांख ॥ मिलि साधू सरणि गहु पूरन राम रतनु हीअरे संगि राखु ॥१॥ रहाउ ॥

भ्रम की कूई त्रिसना रस पंकज अति तीख्यण मोह की फास ॥ काटनहार जगत गुर गोबिद चरन कमल ता के करहु निवास ॥१॥

करि किरपा गोबिंद प्रभ प्रीतम दीना नाथ सुनहु अरदासि ॥ करु गहि लेहु नानक के सुआमी जीउ पिंडु सभु तुमरी रासि ॥२॥३॥१२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 204) गउड़ी महला ५ ॥
हरि पेखन कउ सिमरत मनु मेरा ॥ आस पिआसी चितवउ दिनु रैनी है कोई संतु मिलावै नेरा ॥१॥ रहाउ ॥

सेवा करउ दास दासन की अनिक भांति तिसु करउ निहोरा ॥ तुला धारि तोले सुख सगले बिनु हरि दरस सभो ही थोरा ॥१॥

संत प्रसादि गाए गुन सागर जनम जनम को जात बहोरा ॥ आनद सूख भेटत हरि नानक जनमु क्रितारथु सफलु सवेरा ॥२॥४॥१२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 205) गउड़ी महला ५ ॥
ऐसो परचउ पाइओ ॥ करी क्रिपा दइआल बीठुलै सतिगुर मुझहि बताइओ ॥१॥ रहाउ ॥

जत कत देखउ तत तत तुम ही मोहि इहु बिसुआसु होइ आइओ ॥ कै पहि करउ अरदासि बेनती जउ सुनतो है रघुराइओ ॥१॥

लहिओ सहसा बंधन गुरि तोरे तां सदा सहज सुखु पाइओ ॥ होणा सा सोई फुनि होसी सुखु दुखु कहा दिखाइओ ॥२॥

खंड ब्रहमंड का एको ठाणा गुरि परदा खोलि दिखाइओ ॥ नउ निधि नामु निधानु इक ठाई तउ बाहरि कैठै जाइओ ॥३॥

एकै कनिक अनिक भाति साजी बहु परकार रचाइओ ॥ कहु नानक भरमु गुरि खोई है इव ततै ततु मिलाइओ ॥४॥२॥१२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 205) गउड़ी महला ५ ॥
अउध घटै दिनसु रैनारे ॥ मन गुर मिलि काज सवारे ॥१॥ रहाउ ॥

करउ बेनंती सुनहु मेरे मीता संत टहल की बेला ॥ ईहा खाटि चलहु हरि लाहा आगै बसनु सुहेला ॥१॥

इहु संसारु बिकारु सहसे महि तरिओ ब्रहम गिआनी ॥ जिसहि जगाइ पीआए हरि रसु अकथ कथा तिनि जानी ॥२॥

जा कउ आए सोई विहाझहु हरि गुर ते मनहि बसेरा ॥ निज घरि महलु पावहु सुख सहजे बहुरि न होइगो फेरा ॥३॥

अंतरजामी पुरख बिधाते सरधा मन की पूरे ॥ नानकु दासु इही सुखु मागै मो कउ करि संतन की धूरे ॥४॥३॥१२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 205) गउड़ी महला ५ ॥
राखु पिता प्रभ मेरे ॥ मोहि निरगुनु सभ गुन तेरे ॥१॥ रहाउ ॥

पंच बिखादी एकु गरीबा राखहु राखनहारे ॥ खेदु करहि अरु बहुतु संतावहि आइओ सरनि तुहारे ॥१॥

करि करि हारिओ अनिक बहु भाती छोडहि कतहूं नाही ॥ एक बात सुनि ताकी ओटा साधसंगि मिटि जाही ॥२॥

करि किरपा संत मिले मोहि तिन ते धीरजु पाइआ ॥ संती मंतु दीओ मोहि निरभउ गुर का सबदु कमाइआ ॥३॥

जीति लए ओइ महा बिखादी सहज सुहेली बाणी ॥ कहु नानक मनि भइआ परगासा पाइआ पदु निरबाणी ॥४॥४॥१२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 206) गउड़ी महला ५ ॥
ओहु अबिनासी राइआ ॥ निरभउ संगि तुमारै बसते इहु डरनु कहा ते आइआ ॥१॥ रहाउ ॥

एक महलि तूं होहि अफारो एक महलि निमानो ॥ एक महलि तूं आपे आपे एक महलि गरीबानो ॥१॥

एक महलि तूं पंडितु बकता एक महलि खलु होता ॥ एक महलि तूं सभु किछु ग्राहजु एक महलि कछू न लेता ॥२॥

काठ की पुतरी कहा करै बपुरी खिलावनहारो जानै ॥ जैसा भेखु करावै बाजीगरु ओहु तैसो ही साजु आनै ॥३॥

अनिक कोठरी बहुतु भाति करीआ आपि होआ रखवारा ॥ जैसे महलि राखै तैसै रहना किआ इहु करै बिचारा ॥४॥

जिनि किछु कीआ सोई जानै जिनि इह सभ बिधि साजी ॥ कहु नानक अपर्मपर सुआमी कीमति अपुने काजी ॥५॥५॥१२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 206) गउड़ी महला ५ ॥
छोडि छोडि रे बिखिआ के रसूआ ॥ उरझि रहिओ रे बावर गावर जिउ किरखै हरिआइओ पसूआ ॥१॥ रहाउ ॥

जो जानहि तूं अपुने काजै सो संगि न चालै तेरै तसूआ ॥ नागो आइओ नाग सिधासी फेरि फिरिओ अरु कालि गरसूआ ॥१॥

पेखि पेखि रे कसु्मभ की लीला राचि माचि तिनहूं लउ हसूआ ॥ छीजत डोरि दिनसु अरु रैनी जीअ को काजु न कीनो कछूआ ॥२॥

करत करत इव ही बिरधानो हारिओ उकते तनु खीनसूआ ॥ जिउ मोहिओ उनि मोहनी बाला उस ते घटै नाही रुच चसूआ ॥३॥

जगु ऐसा मोहि गुरहि दिखाइओ तउ सरणि परिओ तजि गरबसूआ ॥ मारगु प्रभ को संति बताइओ द्रिड़ी नानक दास भगति हरि जसूआ ॥४॥६॥१२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 206) गउड़ी महला ५ ॥
तुझ बिनु कवनु हमारा ॥ मेरे प्रीतम प्रान अधारा ॥१॥ रहाउ ॥

अंतर की बिधि तुम ही जानी तुम ही सजन सुहेले ॥ सरब सुखा मै तुझ ते पाए मेरे ठाकुर अगह अतोले ॥१॥

बरनि न साकउ तुमरे रंगा गुण निधान सुखदाते ॥ अगम अगोचर प्रभ अबिनासी पूरे गुर ते जाते ॥२॥

भ्रमु भउ काटि कीए निहकेवल जब ते हउमै मारी ॥ जनम मरण को चूको सहसा साधसंगति दरसारी ॥३॥

चरण पखारि करउ गुर सेवा बारि जाउ लख बरीआ ॥ जिह प्रसादि इहु भउजलु तरिआ जन नानक प्रिअ संगि मिरीआ ॥४॥७॥१२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 207) गउड़ी महला ५ ॥
तुझ बिनु कवनु रीझावै तोही ॥ तेरो रूपु सगल देखि मोही ॥१॥ रहाउ ॥

सुरग पइआल मिरत भूअ मंडल सरब समानो एकै ओही ॥ सिव सिव करत सगल कर जोरहि सरब मइआ ठाकुर तेरी दोही ॥१॥

पतित पावन ठाकुर नामु तुमरा सुखदाई निरमल सीतलोही ॥ गिआन धिआन नानक वडिआई संत तेरे सिउ गाल गलोही ॥२॥८॥१२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 207) गउड़ी महला ५ ॥
मिलहु पिआरे जीआ ॥ प्रभ कीआ तुमारा थीआ ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक जनम बहु जोनी भ्रमिआ बहुरि बहुरि दुखु पाइआ ॥ तुमरी क्रिपा ते मानुख देह पाई है देहु दरसु हरि राइआ ॥१॥

सोई होआ जो तिसु भाणा अवरु न किन ही कीता ॥ तुमरै भाणै भरमि मोहि मोहिआ जागतु नाही सूता ॥२॥

बिनउ सुनहु तुम प्रानपति पिआरे किरपा निधि दइआला ॥ राखि लेहु पिता प्रभ मेरे अनाथह करि प्रतिपाला ॥३॥

जिस नो तुमहि दिखाइओ दरसनु साधसंगति कै पाछै ॥ करि किरपा धूरि देहु संतन की सुखु नानकु इहु बाछै ॥४॥९॥१३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 207) गउड़ी महला ५ ॥
हउ ता कै बलिहारी ॥ जा कै केवल नामु अधारी ॥१॥ रहाउ ॥

महिमा ता की केतक गनीऐ जन पारब्रहम रंगि राते ॥ सूख सहज आनंद तिना संगि उन समसरि अवर न दाते ॥१॥

जगत उधारण सेई आए जो जन दरस पिआसा ॥ उन की सरणि परै सो तरिआ संतसंगि पूरन आसा ॥२॥

ता कै चरणि परउ ता जीवा जन कै संगि निहाला ॥ भगतन की रेणु होइ मनु मेरा होहु प्रभू किरपाला ॥३॥

राजु जोबनु अवध जो दीसै सभु किछु जुग महि घाटिआ ॥ नामु निधानु सद नवतनु निरमलु इहु नानक हरि धनु खाटिआ ॥४॥१०॥१३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 208) गउड़ी महला ५ ॥
जोग जुगति सुनि आइओ गुर ते ॥ मो कउ सतिगुर सबदि बुझाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

नउ खंड प्रिथमी इसु तन महि रविआ निमख निमख नमसकारा ॥ दीखिआ गुर की मुंद्रा कानी द्रिड़िओ एकु निरंकारा ॥१॥

पंच चेले मिलि भए इकत्रा एकसु कै वसि कीए ॥ दस बैरागनि आगिआकारी तब निरमल जोगी थीए ॥२॥

भरमु जराइ चराई बिभूता पंथु एकु करि पेखिआ ॥ सहज सूख सो कीनी भुगता जो ठाकुरि मसतकि लेखिआ ॥३॥

जह भउ नाही तहा आसनु बाधिओ सिंगी अनहत बानी ॥ ततु बीचारु डंडा करि राखिओ जुगति नामु मनि भानी ॥४॥

ऐसा जोगी वडभागी भेटै माइआ के बंधन काटै ॥ सेवा पूज करउ तिसु मूरति की नानकु तिसु पग चाटै ॥५॥११॥१३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 208) गउड़ी महला ५ ॥
अनूप पदारथु नामु सुनहु सगल धिआइले मीता ॥ हरि अउखधु जा कउ गुरि दीआ ता के निरमल चीता ॥१॥ रहाउ ॥

अंधकारु मिटिओ तिह तन ते गुरि सबदि दीपकु परगासा ॥ भ्रम की जाली ता की काटी जा कउ साधसंगति बिस्वासा ॥१॥

तारीले भवजलु तारू बिखड़ा बोहिथ साधू संगा ॥ पूरन होई मन की आसा गुरु भेटिओ हरि रंगा ॥२॥

नाम खजाना भगती पाइआ मन तन त्रिपति अघाए ॥ नानक हरि जीउ ता कउ देवै जा कउ हुकमु मनाए ॥३॥१२॥१३३॥


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