राग गउड़ी - बाणी शब्द, Raag Gauri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू नानक देव जी -- SGGS 151) गउड़ी महला १ ॥
डरि घरु घरि डरु डरि डरु जाइ ॥ सो डरु केहा जितु डरि डरु पाइ ॥ तुधु बिनु दूजी नाही जाइ ॥ जो किछु वरतै सभ तेरी रजाइ ॥१॥

डरीऐ जे डरु होवै होरु ॥ डरि डरि डरणा मन का सोरु ॥१॥ रहाउ ॥

ना जीउ मरै न डूबै तरै ॥ जिनि किछु कीआ सो किछु करै ॥ हुकमे आवै हुकमे जाइ ॥ आगै पाछै हुकमि समाइ ॥२॥

हंसु हेतु आसा असमानु ॥ तिसु विचि भूख बहुतु नै सानु ॥ भउ खाणा पीणा आधारु ॥ विणु खाधे मरि होहि गवार ॥३॥

जिस का कोइ कोई कोइ कोइ ॥ सभु को तेरा तूं सभना का सोइ ॥ जा के जीअ जंत धनु मालु ॥ नानक आखणु बिखमु बीचारु ॥४॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 151) गउड़ी महला १ ॥
माता मति पिता संतोखु ॥ सतु भाई करि एहु विसेखु ॥१॥

कहणा है किछु कहणु न जाइ ॥ तउ कुदरति कीमति नही पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

सरम सुरति दुइ ससुर भए ॥ करणी कामणि करि मन लए ॥२॥

साहा संजोगु वीआहु विजोगु ॥ सचु संतति कहु नानक जोगु ॥३॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 152) गउड़ी महला १ ॥
पउणै पाणी अगनी का मेलु ॥ चंचल चपल बुधि का खेलु ॥ नउ दरवाजे दसवा दुआरु ॥ बुझु रे गिआनी एहु बीचारु ॥१॥

कथता बकता सुनता सोई ॥ आपु बीचारे सु गिआनी होई ॥१॥ रहाउ ॥

देही माटी बोलै पउणु ॥ बुझु रे गिआनी मूआ है कउणु ॥ मूई सुरति बादु अहंकारु ॥ ओहु न मूआ जो देखणहारु ॥२॥

जै कारणि तटि तीरथ जाही ॥ रतन पदारथ घट ही माही ॥ पड़ि पड़ि पंडितु बादु वखाणै ॥ भीतरि होदी वसतु न जाणै ॥३॥

हउ न मूआ मेरी मुई बलाइ ॥ ओहु न मूआ जो रहिआ समाइ ॥ कहु नानक गुरि ब्रहमु दिखाइआ ॥ मरता जाता नदरि न आइआ ॥४॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 152) गउड़ी महला १ ॥
जातो जाइ कहा ते आवै ॥ कह उपजै कह जाइ समावै ॥ किउ बाधिओ किउ मुकती पावै ॥ किउ अबिनासी सहजि समावै ॥१॥

नामु रिदै अम्रितु मुखि नामु ॥ नरहर नामु नरहर निहकामु ॥१॥ रहाउ ॥

सहजे आवै सहजे जाइ ॥ मन ते उपजै मन माहि समाइ ॥ गुरमुखि मुकतो बंधु न पाइ ॥ सबदु बीचारि छुटै हरि नाइ ॥२॥

तरवर पंखी बहु निसि बासु ॥ सुख दुखीआ मनि मोह विणासु ॥ साझ बिहाग तकहि आगासु ॥ दह दिसि धावहि करमि लिखिआसु ॥३॥

नाम संजोगी गोइलि थाटु ॥ काम क्रोध फूटै बिखु माटु ॥ बिनु वखर सूनो घरु हाटु ॥ गुर मिलि खोले बजर कपाट ॥४॥

साधु मिलै पूरब संजोग ॥ सचि रहसे पूरे हरि लोग ॥ मनु तनु दे लै सहजि सुभाइ ॥ नानक तिन कै लागउ पाइ ॥५॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 153) गउड़ी महला १ ॥
कामु क्रोधु माइआ महि चीतु ॥ झूठ विकारि जागै हित चीतु ॥ पूंजी पाप लोभ की कीतु ॥ तरु तारी मनि नामु सुचीतु ॥१॥

वाहु वाहु साचे मै तेरी टेक ॥ हउ पापी तूं निरमलु एक ॥१॥ रहाउ ॥

अगनि पाणी बोलै भड़वाउ ॥ जिहवा इंद्री एकु सुआउ ॥ दिसटि विकारी नाही भउ भाउ ॥ आपु मारे ता पाए नाउ ॥२॥

सबदि मरै फिरि मरणु न होइ ॥ बिनु मूए किउ पूरा होइ ॥ परपंचि विआपि रहिआ मनु दोइ ॥ थिरु नाराइणु करे सु होइ ॥३॥

बोहिथि चड़उ जा आवै वारु ॥ ठाके बोहिथ दरगह मार ॥ सचु सालाही धंनु गुरदुआरु ॥ नानक दरि घरि एकंकारु ॥४॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 153) गउड़ी महला १ ॥
उलटिओ कमलु ब्रहमु बीचारि ॥ अम्रित धार गगनि दस दुआरि ॥ त्रिभवणु बेधिआ आपि मुरारि ॥१॥

रे मन मेरे भरमु न कीजै ॥ मनि मानिऐ अम्रित रसु पीजै ॥१॥ रहाउ ॥

जनमु जीति मरणि मनु मानिआ ॥ आपि मूआ मनु मन ते जानिआ ॥ नजरि भई घरु घर ते जानिआ ॥२॥

जतु सतु तीरथु मजनु नामि ॥ अधिक बिथारु करउ किसु कामि ॥ नर नाराइण अंतरजामि ॥३॥

आन मनउ तउ पर घर जाउ ॥ किसु जाचउ नाही को थाउ ॥ नानक गुरमति सहजि समाउ ॥४॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 153) गउड़ी महला १ ॥
सतिगुरु मिलै सु मरणु दिखाए ॥ मरण रहण रसु अंतरि भाए ॥ गरबु निवारि गगन पुरु पाए ॥१॥

मरणु लिखाइ आए नही रहणा ॥ हरि जपि जापि रहणु हरि सरणा ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु मिलै त दुबिधा भागै ॥ कमलु बिगासि मनु हरि प्रभ लागै ॥ जीवतु मरै महा रसु आगै ॥२॥

सतिगुरि मिलिऐ सच संजमि सूचा ॥ गुर की पउड़ी ऊचो ऊचा ॥ करमि मिलै जम का भउ मूचा ॥३॥

गुरि मिलिऐ मिलि अंकि समाइआ ॥ करि किरपा घरु महलु दिखाइआ ॥ नानक हउमै मारि मिलाइआ ॥४॥९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 154) गउड़ी महला १ ॥
किरतु पइआ नह मेटै कोइ ॥ किआ जाणा किआ आगै होइ ॥ जो तिसु भाणा सोई हूआ ॥ अवरु न करणै वाला दूआ ॥१॥

ना जाणा करम केवड तेरी दाति ॥ करमु धरमु तेरे नाम की जाति ॥१॥ रहाउ ॥

तू एवडु दाता देवणहारु ॥ तोटि नाही तुधु भगति भंडार ॥ कीआ गरबु न आवै रासि ॥ जीउ पिंडु सभु तेरै पासि ॥२॥

तू मारि जीवालहि बखसि मिलाइ ॥ जिउ भावी तिउ नामु जपाइ ॥ तूं दाना बीना साचा सिरि मेरै ॥ गुरमति देइ भरोसै तेरै ॥३॥

तन महि मैलु नाही मनु राता ॥ गुर बचनी सचु सबदि पछाता ॥ तेरा ताणु नाम की वडिआई ॥ नानक रहणा भगति सरणाई ॥४॥१०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 154) गउड़ी महला १ ॥
जिनि अकथु कहाइआ अपिओ पीआइआ ॥ अन भै विसरे नामि समाइआ ॥१॥

किआ डरीऐ डरु डरहि समाना ॥ पूरे गुर कै सबदि पछाना ॥१॥ रहाउ ॥

जिसु नर रामु रिदै हरि रासि ॥ सहजि सुभाइ मिले साबासि ॥२॥

जाहि सवारै साझ बिआल ॥ इत उत मनमुख बाधे काल ॥३॥

अहिनिसि रामु रिदै से पूरे ॥ नानक राम मिले भ्रम दूरे ॥४॥११॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 154) गउड़ी महला १ ॥
जनमि मरै त्रै गुण हितकारु ॥ चारे बेद कथहि आकारु ॥ तीनि अवसथा कहहि वखिआनु ॥ तुरीआवसथा सतिगुर ते हरि जानु ॥१॥

राम भगति गुर सेवा तरणा ॥ बाहुड़ि जनमु न होइ है मरणा ॥१॥ रहाउ ॥

चारि पदारथ कहै सभु कोई ॥ सिम्रिति सासत पंडित मुखि सोई ॥ बिनु गुर अरथु बीचारु न पाइआ ॥ मुकति पदारथु भगति हरि पाइआ ॥२॥

जा कै हिरदै वसिआ हरि सोई ॥ गुरमुखि भगति परापति होई ॥ हरि की भगति मुकति आनंदु ॥ गुरमति पाए परमानंदु ॥३॥

जिनि पाइआ गुरि देखि दिखाइआ ॥ आसा माहि निरासु बुझाइआ ॥ दीना नाथु सरब सुखदाता ॥ नानक हरि चरणी मनु राता ॥४॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 186) गउड़ी महला ५ ॥
डरि डरि मरते जब जानीऐ दूरि ॥ डरु चूका देखिआ भरपूरि ॥१॥

सतिगुर अपने कउ बलिहारै ॥ छोडि न जाई सरपर तारै ॥१॥ रहाउ ॥

दूखु रोगु सोगु बिसरै जब नामु ॥ सदा अनंदु जा हरि गुण गामु ॥२॥

बुरा भला कोई न कहीजै ॥ छोडि मानु हरि चरन गहीजै ॥३॥

कहु नानक गुर मंत्रु चितारि ॥ सुखु पावहि साचै दरबारि ॥४॥३२॥१०१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 186) गउड़ी महला ५ ॥
जा का मीतु साजनु है समीआ ॥ तिसु जन कउ कहु का की कमीआ ॥१॥

जा की प्रीति गोबिंद सिउ लागी ॥ दूखु दरदु भ्रमु ता का भागी ॥१॥ रहाउ ॥

जा कउ रसु हरि रसु है आइओ ॥ सो अन रस नाही लपटाइओ ॥२॥

जा का कहिआ दरगह चलै ॥ सो किस कउ नदरि लै आवै तलै ॥३॥

जा का सभु किछु ता का होइ ॥ नानक ता कउ सदा सुखु होइ ॥४॥३३॥१०२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 186) गउड़ी महला ५ ॥
जा कै दुखु सुखु सम करि जापै ॥ ता कउ काड़ा कहा बिआपै ॥१॥

सहज अनंद हरि साधू माहि ॥ आगिआकारी हरि हरि राइ ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै अचिंतु वसै मनि आइ ॥ ता कउ चिंता कतहूं नाहि ॥२॥

जा कै बिनसिओ मन ते भरमा ॥ ता कै कछू नाही डरु जमा ॥३॥

जा कै हिरदै दीओ गुरि नामा ॥ कहु नानक ता कै सगल निधाना ॥४॥३४॥१०३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 186) गउड़ी महला ५ ॥
अगम रूप का मन महि थाना ॥ गुर प्रसादि किनै विरलै जाना ॥१॥

सहज कथा के अम्रित कुंटा ॥ जिसहि परापति तिसु लै भुंचा ॥१॥ रहाउ ॥

अनहत बाणी थानु निराला ॥ ता की धुनि मोहे गोपाला ॥२॥

तह सहज अखारे अनेक अनंता ॥ पारब्रहम के संगी संता ॥३॥

हरख अनंत सोग नही बीआ ॥ सो घरु गुरि नानक कउ दीआ ॥४॥३५॥१०४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 186) गउड़ी मः ५ ॥
कवन रूपु तेरा आराधउ ॥ कवन जोग काइआ ले साधउ ॥१॥

कवन गुनु जो तुझु लै गावउ ॥ कवन बोल पारब्रहम रीझावउ ॥१॥ रहाउ ॥

कवन सु पूजा तेरी करउ ॥ कवन सु बिधि जितु भवजल तरउ ॥२॥

कवन तपु जितु तपीआ होइ ॥ कवनु सु नामु हउमै मलु खोइ ॥३॥

गुण पूजा गिआन धिआन नानक सगल घाल ॥ जिसु करि किरपा सतिगुरु मिलै दइआल ॥४॥

तिस ही गुनु तिन ही प्रभु जाता ॥ जिस की मानि लेइ सुखदाता ॥१॥ रहाउ दूजा ॥३६॥१०५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 187) गउड़ी महला ५ ॥
आपन तनु नही जा को गरबा ॥ राज मिलख नही आपन दरबा ॥१॥

आपन नही का कउ लपटाइओ ॥ आपन नामु सतिगुर ते पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

सुत बनिता आपन नही भाई ॥ इसट मीत आप बापु न माई ॥२॥

सुइना रूपा फुनि नही दाम ॥ हैवर गैवर आपन नही काम ॥३॥

कहु नानक जो गुरि बखसि मिलाइआ ॥ तिस का सभु किछु जिस का हरि राइआ ॥४॥३७॥१०६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 187) गउड़ी महला ५ ॥
गुर के चरण ऊपरि मेरे माथे ॥ ता ते दुख मेरे सगले लाथे ॥१॥

सतिगुर अपुने कउ कुरबानी ॥ आतम चीनि परम रंग मानी ॥१॥ रहाउ ॥

चरण रेणु गुर की मुखि लागी ॥ अह्मबुधि तिनि सगल तिआगी ॥२॥

गुर का सबदु लगो मनि मीठा ॥ पारब्रहमु ता ते मोहि डीठा ॥३॥

गुरु सुखदाता गुरु करतारु ॥ जीअ प्राण नानक गुरु आधारु ॥४॥३८॥१०७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 187) गउड़ी महला ५ ॥
रे मन मेरे तूं ता कउ आहि ॥ जा कै ऊणा कछहू नाहि ॥१॥

हरि सा प्रीतमु करि मन मीत ॥ प्रान अधारु राखहु सद चीत ॥१॥ रहाउ ॥

रे मन मेरे तूं ता कउ सेवि ॥ आदि पुरख अपर्मपर देव ॥२॥

तिसु ऊपरि मन करि तूं आसा ॥ आदि जुगादि जा का भरवासा ॥३॥

जा की प्रीति सदा सुखु होइ ॥ नानकु गावै गुर मिलि सोइ ॥४॥३९॥१०८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 187) गउड़ी महला ५ ॥
मीतु करै सोई हम माना ॥ मीत के करतब कुसल समाना ॥१॥

एका टेक मेरै मनि चीत ॥ जिसु किछु करणा सु हमरा मीत ॥१॥ रहाउ ॥

मीतु हमारा वेपरवाहा ॥ गुर किरपा ते मोहि असनाहा ॥२॥

मीतु हमारा अंतरजामी ॥ समरथ पुरखु पारब्रहमु सुआमी ॥३॥

हम दासे तुम ठाकुर मेरे ॥ मानु महतु नानक प्रभु तेरे ॥४॥४०॥१०९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 188) गउड़ी महला ५ ॥
जा कउ तुम भए समरथ अंगा ॥ ता कउ कछु नाही कालंगा ॥१॥

माधउ जा कउ है आस तुमारी ॥ ता कउ कछु नाही संसारी ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै हिरदै ठाकुरु होइ ॥ ता कउ सहसा नाही कोइ ॥२॥

जा कउ तुम दीनी प्रभ धीर ॥ ता कै निकटि न आवै पीर ॥३॥

कहु नानक मै सो गुरु पाइआ ॥ पारब्रहम पूरन देखाइआ ॥४॥४१॥११०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 188) गउड़ी महला ५ ॥
दुलभ देह पाई वडभागी ॥ नामु न जपहि ते आतम घाती ॥१॥

मरि न जाही जिना बिसरत राम ॥ नाम बिहून जीवन कउन काम ॥१॥ रहाउ ॥

खात पीत खेलत हसत बिसथार ॥ कवन अरथ मिरतक सीगार ॥२॥

जो न सुनहि जसु परमानंदा ॥ पसु पंखी त्रिगद जोनि ते मंदा ॥३॥

कहु नानक गुरि मंत्रु द्रिड़ाइआ ॥ केवल नामु रिद माहि समाइआ ॥४॥४२॥१११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 188) गउड़ी महला ५ ॥
का की माई का को बाप ॥ नाम धारीक झूठे सभि साक ॥१॥

काहे कउ मूरख भखलाइआ ॥ मिलि संजोगि हुकमि तूं आइआ ॥१॥ रहाउ ॥

एका माटी एका जोति ॥ एको पवनु कहा कउनु रोति ॥२॥

मेरा मेरा करि बिललाही ॥ मरणहारु इहु जीअरा नाही ॥३॥

कहु नानक गुरि खोले कपाट ॥ मुकतु भए बिनसे भ्रम थाट ॥४॥४३॥११२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 188) गउड़ी महला ५ ॥
वडे वडे जो दीसहि लोग ॥ तिन कउ बिआपै चिंता रोग ॥१॥

कउन वडा माइआ वडिआई ॥ सो वडा जिनि राम लिव लाई ॥१॥ रहाउ ॥

भूमीआ भूमि ऊपरि नित लुझै ॥ छोडि चलै त्रिसना नही बुझै ॥२॥

कहु नानक इहु ततु बीचारा ॥ बिनु हरि भजन नाही छुटकारा ॥३॥४४॥११३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 188) गउड़ी महला ५ ॥
पूरा मारगु पूरा इसनानु ॥ सभु किछु पूरा हिरदै नामु ॥१॥

पूरी रही जा पूरै राखी ॥ पारब्रहम की सरणि जन ताकी ॥१॥ रहाउ ॥

पूरा सुखु पूरा संतोखु ॥ पूरा तपु पूरन राजु जोगु ॥२॥

हरि कै मारगि पतित पुनीत ॥ पूरी सोभा पूरा लोकीक ॥३॥

करणहारु सद वसै हदूरा ॥ कहु नानक मेरा सतिगुरु पूरा ॥४॥४५॥११४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 188) गउड़ी महला ५ ॥
संत की धूरि मिटे अघ कोट ॥ संत प्रसादि जनम मरण ते छोट ॥१॥

संत का दरसु पूरन इसनानु ॥ संत क्रिपा ते जपीऐ नामु ॥१॥ रहाउ ॥

संत कै संगि मिटिआ अहंकारु ॥ द्रिसटि आवै सभु एकंकारु ॥२॥

संत सुप्रसंन आए वसि पंचा ॥ अम्रितु नामु रिदै लै संचा ॥३॥

कहु नानक जा का पूरा करम ॥ तिसु भेटे साधू के चरन ॥४॥४६॥११५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 189) गउड़ी महला ५ ॥
हरि गुण जपत कमलु परगासै ॥ हरि सिमरत त्रास सभ नासै ॥१॥

सा मति पूरी जितु हरि गुण गावै ॥ वडै भागि साधू संगु पावै ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि पाईऐ निधि नामा ॥ साधसंगि पूरन सभि कामा ॥२॥

हरि की भगति जनमु परवाणु ॥ गुर किरपा ते नामु वखाणु ॥३॥

कहु नानक सो जनु परवानु ॥ जा कै रिदै वसै भगवानु ॥४॥४७॥११६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 189) गउड़ी महला ५ ॥
एकसु सिउ जा का मनु राता ॥ विसरी तिसै पराई ताता ॥१॥

बिनु गोबिंद न दीसै कोई ॥ करन करावन करता सोई ॥१॥ रहाउ ॥

मनहि कमावै मुखि हरि हरि बोलै ॥ सो जनु इत उत कतहि न डोलै ॥२॥

जा कै हरि धनु सो सच साहु ॥ गुरि पूरै करि दीनो विसाहु ॥३॥

जीवन पुरखु मिलिआ हरि राइआ ॥ कहु नानक परम पदु पाइआ ॥४॥४८॥११७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 189) गउड़ी महला ५ ॥
नामु भगत कै प्रान अधारु ॥ नामो धनु नामो बिउहारु ॥१॥

नाम वडाई जनु सोभा पाए ॥ करि किरपा जिसु आपि दिवाए ॥१॥ रहाउ ॥

नामु भगत कै सुख असथानु ॥ नाम रतु सो भगतु परवानु ॥२॥

हरि का नामु जन कउ धारै ॥ सासि सासि जनु नामु समारै ॥३॥

कहु नानक जिसु पूरा भागु ॥ नाम संगि ता का मनु लागु ॥४॥४९॥११८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 189) गउड़ी महला ५ ॥
संत प्रसादि हरि नामु धिआइआ ॥ तब ते धावतु मनु त्रिपताइआ ॥१॥

सुख बिस्रामु पाइआ गुण गाइ ॥ स्रमु मिटिआ मेरी हती बलाइ ॥१॥ रहाउ ॥

चरन कमल अराधि भगवंता ॥ हरि सिमरन ते मिटी मेरी चिंता ॥२॥

सभ तजि अनाथु एक सरणि आइओ ॥ ऊच असथानु तब सहजे पाइओ ॥३॥

दूखु दरदु भरमु भउ नसिआ ॥ करणहारु नानक मनि बसिआ ॥४॥५०॥११९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 189) गउड़ी महला ५ ॥
कर करि टहल रसना गुण गावउ ॥ चरन ठाकुर कै मारगि धावउ ॥१॥

भलो समो सिमरन की बरीआ ॥ सिमरत नामु भै पारि उतरीआ ॥१॥ रहाउ ॥

नेत्र संतन का दरसनु पेखु ॥ प्रभ अविनासी मन महि लेखु ॥२॥

सुणि कीरतनु साध पहि जाइ ॥ जनम मरण की त्रास मिटाइ ॥३॥

चरण कमल ठाकुर उरि धारि ॥ दुलभ देह नानक निसतारि ॥४॥५१॥१२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 190) गउड़ी महला ५ ॥
जा कउ अपनी किरपा धारै ॥ सो जनु रसना नामु उचारै ॥१॥

हरि बिसरत सहसा दुखु बिआपै ॥ सिमरत नामु भरमु भउ भागै ॥१॥ रहाउ ॥

हरि कीरतनु सुणै हरि कीरतनु गावै ॥ तिसु जन दूखु निकटि नही आवै ॥२॥

हरि की टहल करत जनु सोहै ॥ ता कउ माइआ अगनि न पोहै ॥३॥

मनि तनि मुखि हरि नामु दइआल ॥ नानक तजीअले अवरि जंजाल ॥४॥५२॥१२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 190) गउड़ी महला ५ ॥
छाडि सिआनप बहु चतुराई ॥ गुर पूरे की टेक टिकाई ॥१॥

दुख बिनसे सुख हरि गुण गाइ ॥ गुरु पूरा भेटिआ लिव लाइ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि का नामु दीओ गुरि मंत्रु ॥ मिटे विसूरे उतरी चिंत ॥२॥

अनद भए गुर मिलत क्रिपाल ॥ करि किरपा काटे जम जाल ॥३॥

कहु नानक गुरु पूरा पाइआ ॥ ता ते बहुरि न बिआपै माइआ ॥४॥५३॥१२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 190) गउड़ी महला ५ ॥
राखि लीआ गुरि पूरै आपि ॥ मनमुख कउ लागो संतापु ॥१॥

गुरू गुरू जपि मीत हमारे ॥ मुख ऊजल होवहि दरबारे ॥१॥ रहाउ ॥

गुर के चरण हिरदै वसाइ ॥ दुख दुसमन तेरी हतै बलाइ ॥२॥

गुर का सबदु तेरै संगि सहाई ॥ दइआल भए सगले जीअ भाई ॥३॥

गुरि पूरै जब किरपा करी ॥ भनति नानक मेरी पूरी परी ॥४॥५४॥१२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 190) गउड़ी महला ५ ॥
अनिक रसा खाए जैसे ढोर ॥ मोह की जेवरी बाधिओ चोर ॥१॥

मिरतक देह साधसंग बिहूना ॥ आवत जात जोनी दुख खीना ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक बसत्र सुंदर पहिराइआ ॥ जिउ डरना खेत माहि डराइआ ॥२॥

सगल सरीर आवत सभ काम ॥ निहफल मानुखु जपै नही नाम ॥३॥

कहु नानक जा कउ भए दइआला ॥ साधसंगि मिलि भजहि गोपाला ॥४॥५५॥१२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 190) गउड़ी महला ५ ॥
कलि कलेस गुर सबदि निवारे ॥ आवण जाण रहे सुख सारे ॥१॥

भै बिनसे निरभउ हरि धिआइआ ॥ साधसंगि हरि के गुण गाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

चरन कवल रिद अंतरि धारे ॥ अगनि सागर गुरि पारि उतारे ॥२॥

बूडत जात पूरै गुरि काढे ॥ जनम जनम के टूटे गाढे ॥३॥

कहु नानक तिसु गुर बलिहारी ॥ जिसु भेटत गति भई हमारी ॥४॥५६॥१२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 191) गउड़ी महला ५ ॥
साधसंगि ता की सरनी परहु ॥ मनु तनु अपना आगै धरहु ॥१॥

अम्रित नामु पीवहु मेरे भाई ॥ सिमरि सिमरि सभ तपति बुझाई ॥१॥ रहाउ ॥

तजि अभिमानु जनम मरणु निवारहु ॥ हरि के दास के चरण नमसकारहु ॥२॥

सासि सासि प्रभु मनहि समाले ॥ सो धनु संचहु जो चालै नाले ॥३॥

तिसहि परापति जिसु मसतकि भागु ॥ कहु नानक ता की चरणी लागु ॥४॥५७॥१२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 191) गउड़ी महला ५ ॥
सूके हरे कीए खिन माहे ॥ अम्रित द्रिसटि संचि जीवाए ॥१॥

काटे कसट पूरे गुरदेव ॥ सेवक कउ दीनी अपुनी सेव ॥१॥ रहाउ ॥

मिटि गई चिंत पुनी मन आसा ॥ करी दइआ सतिगुरि गुणतासा ॥२॥

दुख नाठे सुख आइ समाए ॥ ढील न परी जा गुरि फुरमाए ॥३॥

इछ पुनी पूरे गुर मिले ॥ नानक ते जन सुफल फले ॥४॥५८॥१२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 191) गउड़ी महला ५ ॥
ताप गए पाई प्रभि सांति ॥ सीतल भए कीनी प्रभ दाति ॥१॥

प्रभ किरपा ते भए सुहेले ॥ जनम जनम के बिछुरे मेले ॥१॥ रहाउ ॥

सिमरत सिमरत प्रभ का नाउ ॥ सगल रोग का बिनसिआ थाउ ॥२॥

सहजि सुभाइ बोलै हरि बाणी ॥ आठ पहर प्रभ सिमरहु प्राणी ॥३॥

दूखु दरदु जमु नेड़ि न आवै ॥ कहु नानक जो हरि गुन गावै ॥४॥५९॥१२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 191) गउड़ी महला ५ ॥
भले दिनस भले संजोग ॥ जितु भेटे पारब्रहम निरजोग ॥१॥

ओह बेला कउ हउ बलि जाउ ॥ जितु मेरा मनु जपै हरि नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

सफल मूरतु सफल ओह घरी ॥ जितु रसना उचरै हरि हरी ॥२॥

सफलु ओहु माथा संत नमसकारसि ॥ चरण पुनीत चलहि हरि मारगि ॥३॥

कहु नानक भला मेरा करम ॥ जितु भेटे साधू के चरन ॥४॥६०॥१२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 192) गउड़ी महला ५ ॥
गुर का सबदु राखु मन माहि ॥ नामु सिमरि चिंता सभ जाहि ॥१॥

बिनु भगवंत नाही अन कोइ ॥ मारै राखै एको सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर के चरण रिदै उरि धारि ॥ अगनि सागरु जपि उतरहि पारि ॥२॥

गुर मूरति सिउ लाइ धिआनु ॥ ईहा ऊहा पावहि मानु ॥३॥

सगल तिआगि गुर सरणी आइआ ॥ मिटे अंदेसे नानक सुखु पाइआ ॥४॥६१॥१३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 192) गउड़ी महला ५ ॥
जिसु सिमरत दूखु सभु जाइ ॥ नामु रतनु वसै मनि आइ ॥१॥

जपि मन मेरे गोविंद की बाणी ॥ साधू जन रामु रसन वखाणी ॥१॥ रहाउ ॥

इकसु बिनु नाही दूजा कोइ ॥ जा की द्रिसटि सदा सुखु होइ ॥२॥

साजनु मीतु सखा करि एकु ॥ हरि हरि अखर मन महि लेखु ॥३॥

रवि रहिआ सरबत सुआमी ॥ गुण गावै नानकु अंतरजामी ॥४॥६२॥१३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 192) गउड़ी महला ५ ॥
भै महि रचिओ सभु संसारा ॥ तिसु भउ नाही जिसु नामु अधारा ॥१॥

भउ न विआपै तेरी सरणा ॥ जो तुधु भावै सोई करणा ॥१॥ रहाउ ॥

सोग हरख महि आवण जाणा ॥ तिनि सुखु पाइआ जो प्रभ भाणा ॥२॥

अगनि सागरु महा विआपै माइआ ॥ से सीतल जिन सतिगुरु पाइआ ॥३॥

राखि लेइ प्रभु राखनहारा ॥ कहु नानक किआ जंत विचारा ॥४॥६३॥१३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 192) गउड़ी महला ५ ॥
तुमरी क्रिपा ते जपीऐ नाउ ॥ तुमरी क्रिपा ते दरगह थाउ ॥१॥

तुझ बिनु पारब्रहम नही कोइ ॥ तुमरी क्रिपा ते सदा सुखु होइ ॥१॥ रहाउ ॥

तुम मनि वसे तउ दूखु न लागै ॥ तुमरी क्रिपा ते भ्रमु भउ भागै ॥२॥

पारब्रहम अपर्मपर सुआमी ॥ सगल घटा के अंतरजामी ॥३॥

करउ अरदासि अपने सतिगुर पासि ॥ नानक नामु मिलै सचु रासि ॥४॥६४॥१३३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 192) गउड़ी महला ५ ॥
कण बिना जैसे थोथर तुखा ॥ नाम बिहून सूने से मुखा ॥१॥

हरि हरि नामु जपहु नित प्राणी ॥ नाम बिहून ध्रिगु देह बिगानी ॥१॥ रहाउ ॥

नाम बिना नाही मुखि भागु ॥ भरत बिहून कहा सोहागु ॥२॥

नामु बिसारि लगै अन सुआइ ॥ ता की आस न पूजै काइ ॥३॥

करि किरपा प्रभ अपनी दाति ॥ नानक नामु जपै दिन राति ॥४॥६५॥१३४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 193) गउड़ी महला ५ ॥
तूं समरथु तूंहै मेरा सुआमी ॥ सभु किछु तुम ते तूं अंतरजामी ॥१॥

पारब्रहम पूरन जन ओट ॥ तेरी सरणि उधरहि जन कोटि ॥१॥ रहाउ ॥

जेते जीअ तेते सभि तेरे ॥ तुमरी क्रिपा ते सूख घनेरे ॥२॥

जो किछु वरतै सभ तेरा भाणा ॥ हुकमु बूझै सो सचि समाणा ॥३॥

करि किरपा दीजै प्रभ दानु ॥ नानक सिमरै नामु निधानु ॥४॥६६॥१३५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 193) गउड़ी महला ५ ॥
ता का दरसु पाईऐ वडभागी ॥ जा की राम नामि लिव लागी ॥१॥

जा कै हरि वसिआ मन माही ॥ ता कउ दुखु सुपनै भी नाही ॥१॥ रहाउ ॥

सरब निधान राखे जन माहि ॥ ता कै संगि किलविख दुख जाहि ॥२॥

जन की महिमा कथी न जाइ ॥ पारब्रहमु जनु रहिआ समाइ ॥३॥

करि किरपा प्रभ बिनउ सुनीजै ॥ दास की धूरि नानक कउ दीजै ॥४॥६७॥१३६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 193) गउड़ी महला ५ ॥
हरि सिमरत तेरी जाइ बलाइ ॥ सरब कलिआण वसै मनि आइ ॥१॥

भजु मन मेरे एको नाम ॥ जीअ तेरे कै आवै काम ॥१॥ रहाउ ॥

रैणि दिनसु गुण गाउ अनंता ॥ गुर पूरे का निरमल मंता ॥२॥

छोडि उपाव एक टेक राखु ॥ महा पदारथु अम्रित रसु चाखु ॥३॥

बिखम सागरु तेई जन तरे ॥ नानक जा कउ नदरि करे ॥४॥६८॥१३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 193) गउड़ी महला ५ ॥
हिरदै चरन कमल प्रभ धारे ॥ पूरे सतिगुर मिलि निसतारे ॥१॥

गोविंद गुण गावहु मेरे भाई ॥ मिलि साधू हरि नामु धिआई ॥१॥ रहाउ ॥

दुलभ देह होई परवानु ॥ सतिगुर ते पाइआ नाम नीसानु ॥२॥

हरि सिमरत पूरन पदु पाइआ ॥ साधसंगि भै भरम मिटाइआ ॥३॥

जत कत देखउ तत रहिआ समाइ ॥ नानक दास हरि की सरणाइ ॥४॥६९॥१३८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 193) गउड़ी महला ५ ॥
गुर जी के दरसन कउ बलि जाउ ॥ जपि जपि जीवा सतिगुर नाउ ॥१॥

पारब्रहम पूरन गुरदेव ॥ करि किरपा लागउ तेरी सेव ॥१॥ रहाउ ॥

चरन कमल हिरदै उर धारी ॥ मन तन धन गुर प्रान अधारी ॥२॥

सफल जनमु होवै परवाणु ॥ गुरु पारब्रहमु निकटि करि जाणु ॥३॥

संत धूरि पाईऐ वडभागी ॥ नानक गुर भेटत हरि सिउ लिव लागी ॥४॥७०॥१३९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 194) गउड़ी महला ५ ॥
करै दुहकरम दिखावै होरु ॥ राम की दरगह बाधा चोरु ॥१॥

रामु रमै सोई रामाणा ॥ जलि थलि महीअलि एकु समाणा ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि बिखु मुखि अम्रितु सुणावै ॥ जम पुरि बाधा चोटा खावै ॥२॥

अनिक पड़दे महि कमावै विकार ॥ खिन महि प्रगट होहि संसार ॥३॥

अंतरि साचि नामि रसि राता ॥ नानक तिसु किरपालु बिधाता ॥४॥७१॥१४०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 194) गउड़ी महला ५ ॥
राम रंगु कदे उतरि न जाइ ॥ गुरु पूरा जिसु देइ बुझाइ ॥१॥

हरि रंगि राता सो मनु साचा ॥ लाल रंग पूरन पुरखु बिधाता ॥१॥ रहाउ ॥

संतह संगि बैसि गुन गाइ ॥ ता का रंगु न उतरै जाइ ॥२॥

बिनु हरि सिमरन सुखु नही पाइआ ॥ आन रंग फीके सभ माइआ ॥३॥

गुरि रंगे से भए निहाल ॥ कहु नानक गुर भए है दइआल ॥४॥७२॥१४१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 194) गउड़ी महला ५ ॥
सिमरत सुआमी किलविख नासे ॥ सूख सहज आनंद निवासे ॥१॥

राम जना कउ राम भरोसा ॥ नामु जपत सभु मिटिओ अंदेसा ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि कछु भउ न भराती ॥ गुण गोपाल गाईअहि दिनु राती ॥२॥

करि किरपा प्रभ बंधन छोट ॥ चरण कमल की दीनी ओट ॥३॥

कहु नानक मनि भई परतीति ॥ निरमल जसु पीवहि जन नीति ॥४॥७३॥१४२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 194) गउड़ी महला ५ ॥
हरि चरणी जा का मनु लागा ॥ दूखु दरदु भ्रमु ता का भागा ॥१॥

हरि धन को वापारी पूरा ॥ जिसहि निवाजे सो जनु सूरा ॥१॥ रहाउ ॥

जा कउ भए क्रिपाल गुसाई ॥ से जन लागे गुर की पाई ॥२॥

सूख सहज सांति आनंदा ॥ जपि जपि जीवे परमानंदा ॥३॥

नाम रासि साध संगि खाटी ॥ कहु नानक प्रभि अपदा काटी ॥४॥७४॥१४३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 194) गउड़ी महला ५ ॥
हरि सिमरत सभि मिटहि कलेस ॥ चरण कमल मन महि परवेस ॥१॥

उचरहु राम नामु लख बारी ॥ अम्रित रसु पीवहु प्रभ पिआरी ॥१॥ रहाउ ॥

सूख सहज रस महा अनंदा ॥ जपि जपि जीवे परमानंदा ॥२॥

काम क्रोध लोभ मद खोए ॥ साध कै संगि किलबिख सभ धोए ॥३॥

करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥ नानक दीजै साध रवाला ॥४॥७५॥१४४॥


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