राग गउड़ी चेती - बाणी शब्द, Raag Gauri Cheti - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 154) गउड़ी चेती महला १ ॥
अम्रित काइआ रहै सुखाली बाजी इहु संसारो ॥ लबु लोभु मुचु कूड़ु कमावहि बहुतु उठावहि भारो ॥ तूं काइआ मै रुलदी देखी जिउ धर उपरि छारो ॥१॥

सुणि सुणि सिख हमारी ॥ सुक्रितु कीता रहसी मेरे जीअड़े बहुड़ि न आवै वारी ॥१॥ रहाउ ॥

हउ तुधु आखा मेरी काइआ तूं सुणि सिख हमारी ॥ निंदा चिंदा करहि पराई झूठी लाइतबारी ॥ वेलि पराई जोहहि जीअड़े करहि चोरी बुरिआरी ॥ हंसु चलिआ तूं पिछै रहीएहि छुटड़ि होईअहि नारी ॥२॥

तूं काइआ रहीअहि सुपनंतरि तुधु किआ करम कमाइआ ॥ करि चोरी मै जा किछु लीआ ता मनि भला भाइआ ॥ हलति न सोभा पलति न ढोई अहिला जनमु गवाइआ ॥३॥

हउ खरी दुहेली होई बाबा नानक मेरी बात न पुछै कोई ॥१॥ रहाउ ॥

ताजी तुरकी सुइना रुपा कपड़ केरे भारा ॥ किस ही नालि न चले नानक झड़ि झड़ि पए गवारा ॥ कूजा मेवा मै सभ किछु चाखिआ इकु अम्रितु नामु तुमारा ॥४॥

दे दे नीव दिवाल उसारी भसमंदर की ढेरी ॥ संचे संचि न देई किस ही अंधु जाणै सभ मेरी ॥ सोइन लंका सोइन माड़ी स्मपै किसै न केरी ॥५॥

सुणि मूरख मंन अजाणा ॥ होगु तिसै का भाणा ॥१॥ रहाउ ॥

साहु हमारा ठाकुरु भारा हम तिस के वणजारे ॥ जीउ पिंडु सभ रासि तिसै की मारि आपे जीवाले ॥६॥१॥१३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 155) गउड़ी चेती महला १ ॥
अवरि पंच हम एक जना किउ राखउ घर बारु मना ॥ मारहि लूटहि नीत नीत किसु आगै करी पुकार जना ॥१॥

स्री राम नामा उचरु मना ॥ आगै जम दलु बिखमु घना ॥१॥ रहाउ ॥

उसारि मड़ोली राखै दुआरा भीतरि बैठी सा धना ॥ अम्रित केल करे नित कामणि अवरि लुटेनि सु पंच जना ॥२॥

ढाहि मड़ोली लूटिआ देहुरा सा धन पकड़ी एक जना ॥ जम डंडा गलि संगलु पड़िआ भागि गए से पंच जना ॥३॥

कामणि लोड़ै सुइना रुपा मित्र लुड़ेनि सु खाधाता ॥ नानक पाप करे तिन कारणि जासी जमपुरि बाधाता ॥४॥२॥१४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 155) गउड़ी चेती महला १ ॥
मुंद्रा ते घट भीतरि मुंद्रा कांइआ कीजै खिंथाता ॥ पंच चेले वसि कीजहि रावल इहु मनु कीजै डंडाता ॥१॥

जोग जुगति इव पावसिता ॥ एकु सबदु दूजा होरु नासति कंद मूलि मनु लावसिता ॥१॥ रहाउ ॥

मूंडि मुंडाइऐ जे गुरु पाईऐ हम गुरु कीनी गंगाता ॥ त्रिभवण तारणहारु सुआमी एकु न चेतसि अंधाता ॥२॥

करि पट्मबु गली मनु लावसि संसा मूलि न जावसिता ॥ एकसु चरणी जे चितु लावहि लबि लोभि की धावसिता ॥३॥

जपसि निरंजनु रचसि मना ॥ काहे बोलहि जोगी कपटु घना ॥१॥ रहाउ ॥

काइआ कमली हंसु इआणा मेरी मेरी करत बिहाणीता ॥ प्रणवति नानकु नागी दाझै फिरि पाछै पछुताणीता ॥४॥३॥१५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 156) गउड़ी चेती महला १ ॥
अउखध मंत्र मूलु मन एकै जे करि द्रिड़ु चितु कीजै रे ॥ जनम जनम के पाप करम के काटनहारा लीजै रे ॥१॥

मन एको साहिबु भाई रे ॥ तेरे तीनि गुणा संसारि समावहि अलखु न लखणा जाई रे ॥१॥ रहाउ ॥

सकर खंडु माइआ तनि मीठी हम तउ पंड उचाई रे ॥ राति अनेरी सूझसि नाही लजु टूकसि मूसा भाई रे ॥२॥

मनमुखि करहि तेता दुखु लागै गुरमुखि मिलै वडाई रे ॥ जो तिनि कीआ सोई होआ किरतु न मेटिआ जाई रे ॥३॥

सुभर भरे न होवहि ऊणे जो राते रंगु लाई रे ॥ तिन की पंक होवै जे नानकु तउ मूड़ा किछु पाई रे ॥४॥४॥१६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 156) गउड़ी चेती महला १ ॥
कत की माई बापु कत केरा किदू थावहु हम आए ॥ अगनि बि्मब जल भीतरि निपजे काहे कमि उपाए ॥१॥

मेरे साहिबा कउणु जाणै गुण तेरे ॥ कहे न जानी अउगण मेरे ॥१॥ रहाउ ॥

केते रुख बिरख हम चीने केते पसू उपाए ॥ केते नाग कुली महि आए केते पंख उडाए ॥२॥

हट पटण बिज मंदर भंनै करि चोरी घरि आवै ॥ अगहु देखै पिछहु देखै तुझ ते कहा छपावै ॥३॥

तट तीरथ हम नव खंड देखे हट पटण बाजारा ॥ लै कै तकड़ी तोलणि लागा घट ही महि वणजारा ॥४॥

जेता समुंदु सागरु नीरि भरिआ तेते अउगण हमारे ॥ दइआ करहु किछु मिहर उपावहु डुबदे पथर तारे ॥५॥

जीअड़ा अगनि बराबरि तपै भीतरि वगै काती ॥ प्रणवति नानकु हुकमु पछाणै सुखु होवै दिनु राती ॥६॥५॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 202) रागु गउड़ी चेती महला ५ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम को बलु पूरन भाई ॥ ता ते ब्रिथा न बिआपै काई ॥१॥ रहाउ ॥

जो जो चितवै दासु हरि माई ॥ सो सो करता आपि कराई ॥१॥

निंदक की प्रभि पति गवाई ॥ नानक हरि गुण निरभउ गाई ॥२॥११४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 210) रागु गउड़ी चेती महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुखु नाही रे हरि भगति बिना ॥ जीति जनमु इहु रतनु अमोलकु साधसंगति जपि इक खिना ॥१॥ रहाउ ॥

सुत स्मपति बनिता बिनोद ॥ छोडि गए बहु लोग भोग ॥१॥

हैवर गैवर राज रंग ॥ तिआगि चलिओ है मूड़ नंग ॥२॥

चोआ चंदन देह फूलिआ ॥ सो तनु धर संगि रूलिआ ॥३॥

मोहि मोहिआ जानै दूरि है ॥ कहु नानक सदा हदूरि है ॥४॥१॥१३९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 331) रागु गउड़ी चेती ॥
देखौ भाई ग्यान की आई आंधी ॥ सभै उडानी भ्रम की टाटी रहै न माइआ बांधी ॥१॥ रहाउ ॥

दुचिते की दुइ थूनि गिरानी मोह बलेडा टूटा ॥ तिसना छानि परी धर ऊपरि दुरमति भांडा फूटा ॥१॥

आंधी पाछे जो जलु बरखै तिहि तेरा जनु भीनां ॥ कहि कबीर मनि भइआ प्रगासा उदै भानु जब चीना ॥२॥४३॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 332) गउड़ी चेती
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि जसु सुनहि न हरि गुन गावहि ॥ बातन ही असमानु गिरावहि ॥१॥

ऐसे लोगन सिउ किआ कहीऐ ॥ जो प्रभ कीए भगति ते बाहज तिन ते सदा डराने रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

आपि न देहि चुरू भरि पानी ॥ तिह निंदहि जिह गंगा आनी ॥२॥

बैठत उठत कुटिलता चालहि ॥ आपु गए अउरन हू घालहि ॥३॥

छाडि कुचरचा आन न जानहि ॥ ब्रहमा हू को कहिओ न मानहि ॥४॥

आपु गए अउरन हू खोवहि ॥ आगि लगाइ मंदर मै सोवहि ॥५॥

अवरन हसत आप हहि कांने ॥ तिन कउ देखि कबीर लजाने ॥६॥१॥४४॥

(भक्त नामदेव जी -- SGGS 345) रागु गउड़ी चेती बाणी नामदेउ जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देवा पाहन तारीअले ॥ राम कहत जन कस न तरे ॥१॥ रहाउ ॥

तारीले गनिका बिनु रूप कुबिजा बिआधि अजामलु तारीअले ॥ चरन बधिक जन तेऊ मुकति भए ॥ हउ बलि बलि जिन राम कहे ॥१॥

दासी सुत जनु बिदरु सुदामा उग्रसैन कउ राज दीए ॥ जप हीन तप हीन कुल हीन क्रम हीन नामे के सुआमी तेऊ तरे ॥२॥१॥


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