राग गउड़ी बैरागणि - बाणी शब्द, Raag Gauri Baraigan - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू नानक देव जी -- SGGS 156) गउड़ी बैरागणि महला १ ॥
रैणि गवाई सोइ कै दिवसु गवाइआ खाइ ॥ हीरे जैसा जनमु है कउडी बदले जाइ ॥१॥

नामु न जानिआ राम का ॥ मूड़े फिरि पाछै पछुताहि रे ॥१॥ रहाउ ॥

अनता धनु धरणी धरे अनत न चाहिआ जाइ ॥ अनत कउ चाहन जो गए से आए अनत गवाइ ॥२॥

आपण लीआ जे मिलै ता सभु को भागठु होइ ॥ करमा उपरि निबड़ै जे लोचै सभु कोइ ॥३॥

नानक करणा जिनि कीआ सोई सार करेइ ॥ हुकमु न जापी खसम का किसै वडाई देइ ॥४॥१॥१८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 157) गउड़ी बैरागणि महला १ ॥
हरणी होवा बनि बसा कंद मूल चुणि खाउ ॥ गुर परसादी मेरा सहु मिलै वारि वारि हउ जाउ जीउ ॥१॥

मै बनजारनि राम की ॥ तेरा नामु वखरु वापारु जी ॥१॥ रहाउ ॥

कोकिल होवा अंबि बसा सहजि सबद बीचारु ॥ सहजि सुभाइ मेरा सहु मिलै दरसनि रूपि अपारु ॥२॥

मछुली होवा जलि बसा जीअ जंत सभि सारि ॥ उरवारि पारि मेरा सहु वसै हउ मिलउगी बाह पसारि ॥३॥

नागनि होवा धर वसा सबदु वसै भउ जाइ ॥ नानक सदा सोहागणी जिन जोती जोति समाइ ॥४॥२॥१९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 162) महला ३ गउड़ी बैरागणि ॥
जैसी धरती ऊपरि मेघुला बरसतु है किआ धरती मधे पाणी नाही ॥ जैसे धरती मधे पाणी परगासिआ बिनु पगा वरसत फिराही ॥१॥

बाबा तूं ऐसे भरमु चुकाही ॥ जो किछु करतु है सोई कोई है रे तैसे जाइ समाही ॥१॥ रहाउ ॥

इसतरी पुरख होइ कै किआ ओइ करम कमाही ॥ नाना रूप सदा हहि तेरे तुझ ही माहि समाही ॥२॥

इतने जनम भूलि परे से जा पाइआ ता भूले नाही ॥ जा का कारजु सोई परु जाणै जे गुर कै सबदि समाही ॥३॥

तेरा सबदु तूंहै हहि आपे भरमु कहा ही ॥ नानक ततु तत सिउ मिलिआ पुनरपि जनमि न आही ॥४॥१॥१५॥३५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 162) गउड़ी बैरागणि महला ३ ॥
सभु जगु कालै वसि है बाधा दूजै भाइ ॥ हउमै करम कमावदे मनमुखि मिलै सजाइ ॥१॥

मेरे मन गुर चरणी चितु लाइ ॥ गुरमुखि नामु निधानु लै दरगह लए छडाइ ॥१॥ रहाउ ॥

लख चउरासीह भरमदे मनहठि आवै जाइ ॥ गुर का सबदु न चीनिओ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥२॥

गुरमुखि आपु पछाणिआ हरि नामु वसिआ मनि आइ ॥ अनदिनु भगती रतिआ हरि नामे सुखि समाइ ॥३॥

मनु सबदि मरै परतीति होइ हउमै तजे विकार ॥ जन नानक करमी पाईअनि हरि नामा भगति भंडार ॥४॥२॥१६॥३६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 162) गउड़ी बैरागणि महला ३ ॥
पेईअड़ै दिन चारि है हरि हरि लिखि पाइआ ॥ सोभावंती नारि है गुरमुखि गुण गाइआ ॥ पेवकड़ै गुण समलै साहुरै वासु पाइआ ॥ गुरमुखि सहजि समाणीआ हरि हरि मनि भाइआ ॥१॥

ससुरै पेईऐ पिरु वसै कहु कितु बिधि पाईऐ ॥ आपि निरंजनु अलखु है आपे मेलाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

आपे ही प्रभु देहि मति हरि नामु धिआईऐ ॥ वडभागी सतिगुरु मिलै मुखि अम्रितु पाईऐ ॥ हउमै दुबिधा बिनसि जाइ सहजे सुखि समाईऐ ॥ सभु आपे आपि वरतदा आपे नाइ लाईऐ ॥२॥

मनमुखि गरबि न पाइओ अगिआन इआणे ॥ सतिगुर सेवा ना करहि फिरि फिरि पछुताणे ॥ गरभ जोनी वासु पाइदे गरभे गलि जाणे ॥ मेरे करते एवै भावदा मनमुख भरमाणे ॥३॥

मेरै हरि प्रभि लेखु लिखाइआ धुरि मसतकि पूरा ॥ हरि हरि नामु धिआइआ भेटिआ गुरु सूरा ॥ मेरा पिता माता हरि नामु है हरि बंधपु बीरा ॥ हरि हरि बखसि मिलाइ प्रभ जनु नानकु कीरा ॥४॥३॥१७॥३७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 163) गउड़ी बैरागणि महला ३ ॥
सतिगुर ते गिआनु पाइआ हरि ततु बीचारा ॥ मति मलीण परगटु भई जपि नामु मुरारा ॥ सिवि सकति मिटाईआ चूका अंधिआरा ॥ धुरि मसतकि जिन कउ लिखिआ तिन हरि नामु पिआरा ॥१॥

हरि कितु बिधि पाईऐ संत जनहु जिसु देखि हउ जीवा ॥ हरि बिनु चसा न जीवती गुर मेलिहु हरि रसु पीवा ॥१॥ रहाउ ॥

हउ हरि गुण गावा नित हरि सुणी हरि हरि गति कीनी ॥ हरि रसु गुर ते पाइआ मेरा मनु तनु लीनी ॥ धनु धनु गुरु सत पुरखु है जिनि भगति हरि दीनी ॥ जिसु गुर ते हरि पाइआ सो गुरु हम कीनी ॥२॥

गुणदाता हरि राइ है हम अवगणिआरे ॥ पापी पाथर डूबदे गुरमति हरि तारे ॥ तूं गुणदाता निरमला हम अवगणिआरे ॥ हरि सरणागति राखि लेहु मूड़ मुगध निसतारे ॥३॥

सहजु अनंदु सदा गुरमती हरि हरि मनि धिआइआ ॥ सजणु हरि प्रभु पाइआ घरि सोहिला गाइआ ॥ हरि दइआ धारि प्रभ बेनती हरि हरि चेताइआ ॥ जन नानकु मंगै धूड़ि तिन जिन सतिगुरु पाइआ ॥४॥४॥१८॥३८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 165) गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
साहु हमारा तूं धणी जैसी तूं रासि देहि तैसी हम लेहि ॥ हरि नामु वणंजह रंग सिउ जे आपि दइआलु होइ देहि ॥१॥

हम वणजारे राम के ॥ हरि वणजु करावै दे रासि रे ॥१॥ रहाउ ॥

लाहा हरि भगति धनु खटिआ हरि सचे साह मनि भाइआ ॥ हरि जपि हरि वखरु लदिआ जमु जागाती नेड़ि न आइआ ॥२॥

होरु वणजु करहि वापारीए अनंत तरंगी दुखु माइआ ॥ ओइ जेहै वणजि हरि लाइआ फलु तेहा तिन पाइआ ॥३॥

हरि हरि वणजु सो जनु करे जिसु क्रिपालु होइ प्रभु देई ॥ जन नानक साहु हरि सेविआ फिरि लेखा मूलि न लेई ॥४॥१॥७॥४५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 165) गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
जिउ जननी गरभु पालती सुत की करि आसा ॥ वडा होइ धनु खाटि देइ करि भोग बिलासा ॥ तिउ हरि जन प्रीति हरि राखदा दे आपि हथासा ॥१॥

मेरे राम मै मूरख हरि राखु मेरे गुसईआ ॥ जन की उपमा तुझहि वडईआ ॥१॥ रहाउ ॥

मंदरि घरि आनंदु हरि हरि जसु मनि भावै ॥ सभ रस मीठे मुखि लगहि जा हरि गुण गावै ॥ हरि जनु परवारु सधारु है इकीह कुली सभु जगतु छडावै ॥२॥

जो किछु कीआ सो हरि कीआ हरि की वडिआई ॥ हरि जीअ तेरे तूं वरतदा हरि पूज कराई ॥ हरि भगति भंडार लहाइदा आपे वरताई ॥३॥

लाला हाटि विहाझिआ किआ तिसु चतुराई ॥ जे राजि बहाले ता हरि गुलामु घासी कउ हरि नामु कढाई ॥ जनु नानकु हरि का दासु है हरि की वडिआई ॥४॥२॥८॥४६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 166) गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
नित दिनसु राति लालचु करे भरमै भरमाइआ ॥ वेगारि फिरै वेगारीआ सिरि भारु उठाइआ ॥ जो गुर की जनु सेवा करे सो घर कै कमि हरि लाइआ ॥१॥

मेरे राम तोड़ि बंधन माइआ घर कै कमि लाइ ॥ नित हरि गुण गावह हरि नामि समाइ ॥१॥ रहाउ ॥

नरु प्राणी चाकरी करे नरपति राजे अरथि सभ माइआ ॥ कै बंधै कै डानि लेइ कै नरपति मरि जाइआ ॥ धंनु धनु सेवा सफल सतिगुरू की जितु हरि हरि नामु जपि हरि सुखु पाइआ ॥२॥

नित सउदा सूदु कीचै बहु भाति करि माइआ कै ताई ॥ जा लाहा देइ ता सुखु मने तोटै मरि जाई ॥ जो गुण साझी गुर सिउ करे नित नित सुखु पाई ॥३॥

जितनी भूख अन रस साद है तितनी भूख फिरि लागै ॥ जिसु हरि आपि क्रिपा करे सो वेचे सिरु गुर आगै ॥ जन नानक हरि रसि त्रिपतिआ फिरि भूख न लागै ॥४॥४॥१०॥४८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 167) गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
हमरै मनि चिति हरि आस नित किउ देखा हरि दरसु तुमारा ॥ जिनि प्रीति लाई सो जाणता हमरै मनि चिति हरि बहुतु पिआरा ॥ हउ कुरबानी गुर आपणे जिनि विछुड़िआ मेलिआ मेरा सिरजनहारा ॥१॥

मेरे राम हम पापी सरणि परे हरि दुआरि ॥ मतु निरगुण हम मेलै कबहूं अपुनी किरपा धारि ॥१॥ रहाउ ॥

हमरे अवगुण बहुतु बहुतु है बहु बार बार हरि गणत न आवै ॥ तूं गुणवंता हरि हरि दइआलु हरि आपे बखसि लैहि हरि भावै ॥ हम अपराधी राखे गुर संगती उपदेसु दीओ हरि नामु छडावै ॥२॥

तुमरे गुण किआ कहा मेरे सतिगुरा जब गुरु बोलह तब बिसमु होइ जाइ ॥ हम जैसे अपराधी अवरु कोई राखै जैसे हम सतिगुरि राखि लीए छडाइ ॥ तूं गुरु पिता तूंहै गुरु माता तूं गुरु बंधपु मेरा सखा सखाइ ॥३॥

जो हमरी बिधि होती मेरे सतिगुरा सा बिधि तुम हरि जाणहु आपे ॥ हम रुलते फिरते कोई बात न पूछता गुर सतिगुर संगि कीरे हम थापे ॥ धंनु धंनु गुरू नानक जन केरा जितु मिलिऐ चूके सभि सोग संतापे ॥४॥५॥११॥४९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 167) गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
कंचन नारी महि जीउ लुभतु है मोहु मीठा माइआ ॥ घर मंदर घोड़े खुसी मनु अन रसि लाइआ ॥ हरि प्रभु चिति न आवई किउ छूटा मेरे हरि राइआ ॥१॥

मेरे राम इह नीच करम हरि मेरे ॥ गुणवंता हरि हरि दइआलु करि किरपा बखसि अवगण सभि मेरे ॥१॥ रहाउ ॥

किछु रूपु नही किछु जाति नाही किछु ढंगु न मेरा ॥ किआ मुहु लै बोलह गुण बिहून नामु जपिआ न तेरा ॥ हम पापी संगि गुर उबरे पुंनु सतिगुर केरा ॥२॥

सभु जीउ पिंडु मुखु नकु दीआ वरतण कउ पाणी ॥ अंनु खाणा कपड़ु पैनणु दीआ रस अनि भोगाणी ॥ जिनि दीए सु चिति न आवई पसू हउ करि जाणी ॥३॥

सभु कीता तेरा वरतदा तूं अंतरजामी ॥ हम जंत विचारे किआ करह सभु खेलु तुम सुआमी ॥ जन नानकु हाटि विहाझिआ हरि गुलम गुलामी ॥४॥६॥१२॥५०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 168) गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
जिउ जननी सुतु जणि पालती राखै नदरि मझारि ॥ अंतरि बाहरि मुखि दे गिरासु खिनु खिनु पोचारि ॥ तिउ सतिगुरु गुरसिख राखता हरि प्रीति पिआरि ॥१॥

मेरे राम हम बारिक हरि प्रभ के है इआणे ॥ धंनु धंनु गुरू गुरु सतिगुरु पाधा जिनि हरि उपदेसु दे कीए सिआणे ॥१॥ रहाउ ॥

जैसी गगनि फिरंती ऊडती कपरे बागे वाली ॥ ओह राखै चीतु पीछै बिचि बचरे नित हिरदै सारि समाली ॥ तिउ सतिगुर सिख प्रीति हरि हरि की गुरु सिख रखै जीअ नाली ॥२॥

जैसे काती तीस बतीस है विचि राखै रसना मास रतु केरी ॥ कोई जाणहु मास काती कै किछु हाथि है सभ वसगति है हरि केरी ॥ तिउ संत जना की नर निंदा करहि हरि राखै पैज जन केरी ॥३॥

भाई मत कोई जाणहु किसी कै किछु हाथि है सभ करे कराइआ ॥ जरा मरा तापु सिरति सापु सभु हरि कै वसि है कोई लागि न सकै बिनु हरि का लाइआ ॥ ऐसा हरि नामु मनि चिति निति धिआवहु जन नानक जो अंती अउसरि लए छडाइआ ॥४॥७॥१३॥५१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 168) गउड़ी बैरागणि महला ४ ॥
जिसु मिलिऐ मनि होइ अनंदु सो सतिगुरु कहीऐ ॥ मन की दुबिधा बिनसि जाइ हरि परम पदु लहीऐ ॥१॥

मेरा सतिगुरु पिआरा कितु बिधि मिलै ॥ हउ खिनु खिनु करी नमसकारु मेरा गुरु पूरा किउ मिलै ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा हरि मेलिआ मेरा सतिगुरु पूरा ॥ इछ पुंनी जन केरीआ ले सतिगुर धूरा ॥२॥

हरि भगति द्रिड़ावै हरि भगति सुणै तिसु सतिगुर मिलीऐ ॥ तोटा मूलि न आवई हरि लाभु निति द्रिड़ीऐ ॥३॥

जिस कउ रिदै विगासु है भाउ दूजा नाही ॥ नानक तिसु गुर मिलि उधरै हरि गुण गावाही ॥४॥८॥१४॥५२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 203) रागु गउड़ी बैरागणि महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दय गुसाई मीतुला तूं संगि हमारै बासु जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

तुझ बिनु घरी न जीवना ध्रिगु रहणा संसारि ॥ जीअ प्राण सुखदातिआ निमख निमख बलिहारि जी ॥१॥

हसत अल्मबनु देहु प्रभ गरतहु उधरु गोपाल ॥ मोहि निरगुन मति थोरीआ तूं सद ही दीन दइआल ॥२॥

किआ सुख तेरे समला कवन बिधी बीचार ॥ सरणि समाई दास हित ऊचे अगम अपार ॥३॥

सगल पदारथ असट सिधि नाम महा रस माहि ॥ सुप्रसंन भए केसवा से जन हरि गुण गाहि ॥४॥

मात पिता सुत बंधपो तूं मेरे प्राण अधार ॥ साधसंगि नानकु भजै बिखु तरिआ संसारु ॥५॥१॥११६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 203) गउड़ी बैरागणि रहोए के छंत के घरि मः ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
है कोई राम पिआरो गावै ॥ सरब कलिआण सूख सचु पावै ॥ रहाउ ॥

बनु बनु खोजत फिरत बैरागी ॥ बिरले काहू एक लिव लागी ॥ जिनि हरि पाइआ से वडभागी ॥१॥

ब्रहमादिक सनकादिक चाहै ॥ जोगी जती सिध हरि आहै ॥ जिसहि परापति सो हरि गुण गाहै ॥२॥

ता की सरणि जिन बिसरत नाही ॥ वडभागी हरि संत मिलाही ॥ जनम मरण तिह मूले नाही ॥३॥

करि किरपा मिलु प्रीतम पिआरे ॥ बिनउ सुनहु प्रभ ऊच अपारे ॥ नानकु मांगतु नामु अधारे ॥४॥१॥११७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 228) गउड़ी बैरागणि महला १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिउ गाई कउ गोइली राखहि करि सारा ॥ अहिनिसि पालहि राखि लेहि आतम सुखु धारा ॥१॥

इत उत राखहु दीन दइआला ॥ तउ सरणागति नदरि निहाला ॥१॥ रहाउ ॥

जह देखउ तह रवि रहे रखु राखनहारा ॥ तूं दाता भुगता तूंहै तूं प्राण अधारा ॥२॥

किरतु पइआ अध ऊरधी बिनु गिआन बीचारा ॥ बिनु उपमा जगदीस की बिनसै न अंधिआरा ॥३॥

जगु बिनसत हम देखिआ लोभे अहंकारा ॥ गुर सेवा प्रभु पाइआ सचु मुकति दुआरा ॥४॥

निज घरि महलु अपार को अपर्मपरु सोई ॥ बिनु सबदै थिरु को नही बूझै सुखु होई ॥५॥

किआ लै आइआ ले जाइ किआ फासहि जम जाला ॥ डोलु बधा कसि जेवरी आकासि पताला ॥६॥

गुरमति नामु न वीसरै सहजे पति पाईऐ ॥ अंतरि सबदु निधानु है मिलि आपु गवाईऐ ॥७॥

नदरि करे प्रभु आपणी गुण अंकि समावै ॥ नानक मेलु न चूकई लाहा सचु पावै ॥८॥१॥१७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 233) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु गउड़ी बैरागणि महला ३ ॥
सतिगुर ते जो मुह फेरे ते वेमुख बुरे दिसंनि ॥ अनदिनु बधे मारीअनि फिरि वेला ना लहंनि ॥१॥

हरि हरि राखहु क्रिपा धारि ॥ सतसंगति मेलाइ प्रभ हरि हिरदै हरि गुण सारि ॥१॥ रहाउ ॥

से भगत हरि भावदे जो गुरमुखि भाइ चलंनि ॥ आपु छोडि सेवा करनि जीवत मुए रहंनि ॥२॥

जिस दा पिंडु पराण है तिस की सिरि कार ॥ ओहु किउ मनहु विसारीऐ हरि रखीऐ हिरदै धारि ॥३॥

नामि मिलिऐ पति पाईऐ नामि मंनिऐ सुखु होइ ॥ सतिगुर ते नामु पाईऐ करमि मिलै प्रभु सोइ ॥४॥

सतिगुर ते जो मुहु फेरे ओइ भ्रमदे ना टिकंनि ॥ धरति असमानु न झलई विचि विसटा पए पचंनि ॥५॥

इहु जगु भरमि भुलाइआ मोह ठगउली पाइ ॥ जिना सतिगुरु भेटिआ तिन नेड़ि न भिटै माइ ॥६॥

सतिगुरु सेवनि सो सोहणे हउमै मैलु गवाइ ॥ सबदि रते से निरमले चलहि सतिगुर भाइ ॥७॥

हरि प्रभ दाता एकु तूं तूं आपे बखसि मिलाइ ॥ जनु नानकु सरणागती जिउ भावै तिवै छडाइ ॥८॥१॥९॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 332) रागु गउड़ी बैरागणि कबीर जी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जीवत पितर न मानै कोऊ मूएं सिराध कराही ॥ पितर भी बपुरे कहु किउ पावहि कऊआ कूकर खाही ॥१॥

मो कउ कुसलु बतावहु कोई ॥ कुसलु कुसलु करते जगु बिनसै कुसलु भी कैसे होई ॥१॥ रहाउ ॥

माटी के करि देवी देवा तिसु आगै जीउ देही ॥ ऐसे पितर तुमारे कहीअहि आपन कहिआ न लेही ॥२॥

सरजीउ काटहि निरजीउ पूजहि अंत काल कउ भारी ॥ राम नाम की गति नही जानी भै डूबे संसारी ॥३॥

देवी देवा पूजहि डोलहि पारब्रहमु नही जाना ॥ कहत कबीर अकुलु नही चेतिआ बिखिआ सिउ लपटाना ॥४॥१॥४५॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 333) गउड़ी बैरागणि तिपदे ॥
उलटत पवन चक्र खटु भेदे सुरति सुंन अनरागी ॥ आवै न जाइ मरै न जीवै तासु खोजु बैरागी ॥१॥

मेरे मन मन ही उलटि समाना ॥ गुर परसादि अकलि भई अवरै नातरु था बेगाना ॥१॥ रहाउ ॥

निवरै दूरि दूरि फुनि निवरै जिनि जैसा करि मानिआ ॥ अलउती का जैसे भइआ बरेडा जिनि पीआ तिनि जानिआ ॥२॥

तेरी निरगुन कथा काइ सिउ कहीऐ ऐसा कोइ बिबेकी ॥ कहु कबीर जिनि दीआ पलीता तिनि तैसी झल देखी ॥३॥३॥४७॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 345) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गउड़ी बैरागणि रविदास जीउ ॥
घट अवघट डूगर घणा इकु निरगुणु बैलु हमार ॥ रमईए सिउ इक बेनती मेरी पूंजी राखु मुरारि ॥१॥

को बनजारो राम को मेरा टांडा लादिआ जाइ रे ॥१॥ रहाउ ॥

हउ बनजारो राम को सहज करउ ब्यापारु ॥ मै राम नाम धनु लादिआ बिखु लादी संसारि ॥२॥

उरवार पार के दानीआ लिखि लेहु आल पतालु ॥ मोहि जम डंडु न लागई तजीले सरब जंजाल ॥३॥

जैसा रंगु कसु्मभ का तैसा इहु संसारु ॥ मेरे रमईए रंगु मजीठ का कहु रविदास चमार ॥४॥१॥

(भक्त रविदास जी -- SGGS 346) गउड़ी बैरागणि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतजुगि सतु तेता जगी दुआपरि पूजाचार ॥ तीनौ जुग तीनौ दिड़े कलि केवल नाम अधार ॥१॥

पारु कैसे पाइबो रे ॥ मो सउ कोऊ न कहै समझाइ ॥ जा ते आवा गवनु बिलाइ ॥१॥ रहाउ ॥

बहु बिधि धरम निरूपीऐ करता दीसै सभ लोइ ॥ कवन करम ते छूटीऐ जिह साधे सभ सिधि होइ ॥२॥

करम अकरम बीचारीऐ संका सुनि बेद पुरान ॥ संसा सद हिरदै बसै कउनु हिरै अभिमानु ॥३॥

बाहरु उदकि पखारीऐ घट भीतरि बिबिधि बिकार ॥ सुध कवन पर होइबो सुच कुंचर बिधि बिउहार ॥४॥

रवि प्रगास रजनी जथा गति जानत सभ संसार ॥ पारस मानो ताबो छुए कनक होत नही बार ॥५॥

परम परस गुरु भेटीऐ पूरब लिखत लिलाट ॥ उनमन मन मन ही मिले छुटकत बजर कपाट ॥६॥

भगति जुगति मति सति करी भ्रम बंधन काटि बिकार ॥ सोई बसि रसि मन मिले गुन निरगुन एक बिचार ॥७॥

अनिक जतन निग्रह कीए टारी न टरै भ्रम फास ॥ प्रेम भगति नही ऊपजै ता ते रविदास उदास ॥८॥१॥


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