राग धनासरी - बाणी शब्द, Raag Dhanasri - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 13) रागु धनासरी महला १ ॥
गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥ धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलंत जोती ॥१॥

कैसी आरती होइ ॥ भव खंडना तेरी आरती ॥ अनहता सबद वाजंत भेरी ॥१॥ रहाउ ॥

सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि कउ सहस मूरति नना एक तोही ॥ सहस पद बिमल नन एक पद गंध बिनु सहस तव गंध इव चलत मोही ॥२॥

सभ महि जोति जोति है सोइ ॥ तिस दै चानणि सभ महि चानणु होइ ॥ गुर साखी जोति परगटु होइ ॥ जो तिसु भावै सु आरती होइ ॥३॥

हरि चरण कवल मकरंद लोभित मनो अनदिनो मोहि आही पिआसा ॥ क्रिपा जलु देहि नानक सारिंग कउ होइ जा ते तेरै नाइ वासा ॥४॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 660) धनासरी महला १ घरु १ चउपदे
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
जीउ डरतु है आपणा कै सिउ करी पुकार ॥ दूख विसारणु सेविआ सदा सदा दातारु ॥१॥

साहिबु मेरा नीत नवा सदा सदा दातारु ॥१॥ रहाउ ॥

अनदिनु साहिबु सेवीऐ अंति छडाए सोइ ॥ सुणि सुणि मेरी कामणी पारि उतारा होइ ॥२॥

दइआल तेरै नामि तरा ॥ सद कुरबाणै जाउ ॥१॥ रहाउ ॥

सरबं साचा एकु है दूजा नाही कोइ ॥ ता की सेवा सो करे जा कउ नदरि करे ॥३॥

तुधु बाझु पिआरे केव रहा ॥ सा वडिआई देहि जितु नामि तेरे लागि रहां ॥ दूजा नाही कोइ जिसु आगै पिआरे जाइ कहा ॥१॥ रहाउ ॥

सेवी साहिबु आपणा अवरु न जाचंउ कोइ ॥ नानकु ता का दासु है बिंद बिंद चुख चुख होइ ॥४॥

साहिब तेरे नाम विटहु बिंद बिंद चुख चुख होइ ॥१॥ रहाउ ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 660) धनासरी महला १ ॥
हम आदमी हां इक दमी मुहलति मुहतु न जाणा ॥ नानकु बिनवै तिसै सरेवहु जा के जीअ पराणा ॥१॥

अंधे जीवना वीचारि देखि केते के दिना ॥१॥ रहाउ ॥

सासु मासु सभु जीउ तुमारा तू मै खरा पिआरा ॥ नानकु साइरु एव कहतु है सचे परवदगारा ॥२॥

जे तू किसै न देही मेरे साहिबा किआ को कढै गहणा ॥ नानकु बिनवै सो किछु पाईऐ पुरबि लिखे का लहणा ॥३॥

नामु खसम का चिति न कीआ कपटी कपटु कमाणा ॥ जम दुआरि जा पकड़ि चलाइआ ता चलदा पछुताणा ॥४॥

जब लगु दुनीआ रहीऐ नानक किछु सुणीऐ किछु कहीऐ ॥ भालि रहे हम रहणु न पाइआ जीवतिआ मरि रहीऐ ॥५॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 661) धनासरी महला १ घरु दूजा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किउ सिमरी सिवरिआ नही जाइ ॥ तपै हिआउ जीअड़ा बिललाइ ॥ सिरजि सवारे साचा सोइ ॥ तिसु विसरिऐ चंगा किउ होइ ॥१॥

हिकमति हुकमि न पाइआ जाइ ॥ किउ करि साचि मिलउ मेरी माइ ॥१॥ रहाउ ॥

वखरु नामु देखण कोई जाइ ॥ ना को चाखै ना को खाइ ॥ लोकि पतीणै ना पति होइ ॥ ता पति रहै राखै जा सोइ ॥२॥

जह देखा तह रहिआ समाइ ॥ तुधु बिनु दूजी नाही जाइ ॥ जे को करे कीतै किआ होइ ॥ जिस नो बखसे साचा सोइ ॥३॥

हुणि उठि चलणा मुहति कि तालि ॥ किआ मुहु देसा गुण नही नालि ॥ जैसी नदरि करे तैसा होइ ॥ विणु नदरी नानक नही कोइ ॥४॥१॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 661) धनासरी महला १ ॥
नदरि करे ता सिमरिआ जाइ ॥ आतमा द्रवै रहै लिव लाइ ॥ आतमा परातमा एको करै ॥ अंतर की दुबिधा अंतरि मरै ॥१॥

गुर परसादी पाइआ जाइ ॥ हरि सिउ चितु लागै फिरि कालु न खाइ ॥१॥ रहाउ ॥

सचि सिमरिऐ होवै परगासु ॥ ता ते बिखिआ महि रहै उदासु ॥ सतिगुर की ऐसी वडिआई ॥ पुत्र कलत्र विचे गति पाई ॥२॥

ऐसी सेवकु सेवा करै ॥ जिस का जीउ तिसु आगै धरै ॥ साहिब भावै सो परवाणु ॥ सो सेवकु दरगह पावै माणु ॥३॥

सतिगुर की मूरति हिरदै वसाए ॥ जो इछै सोई फलु पाए ॥ साचा साहिबु किरपा करै ॥ सो सेवकु जम ते कैसा डरै ॥४॥

भनति नानकु करे वीचारु ॥ साची बाणी सिउ धरे पिआरु ॥ ता को पावै मोख दुआरु ॥ जपु तपु सभु इहु सबदु है सारु ॥५॥२॥४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 661) धनासरी महला १ ॥
जीउ तपतु है बारो बार ॥ तपि तपि खपै बहुतु बेकार ॥ जै तनि बाणी विसरि जाइ ॥ जिउ पका रोगी विललाइ ॥१॥

बहुता बोलणु झखणु होइ ॥ विणु बोले जाणै सभु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि कन कीते अखी नाकु ॥ जिनि जिहवा दिती बोले तातु ॥ जिनि मनु राखिआ अगनी पाइ ॥ वाजै पवणु आखै सभ जाइ ॥२॥

जेता मोहु परीति सुआद ॥ सभा कालख दागा दाग ॥ दाग दोस मुहि चलिआ लाइ ॥ दरगह बैसण नाही जाइ ॥३॥

करमि मिलै आखणु तेरा नाउ ॥ जितु लगि तरणा होरु नही थाउ ॥ जे को डूबै फिरि होवै सार ॥ नानक साचा सरब दातार ॥४॥३॥५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 662) धनासरी महला १ ॥
चोरु सलाहे चीतु न भीजै ॥ जे बदी करे ता तसू न छीजै ॥ चोर की हामा भरे न कोइ ॥ चोरु कीआ चंगा किउ होइ ॥१॥

सुणि मन अंधे कुते कूड़िआर ॥ बिनु बोले बूझीऐ सचिआर ॥१॥ रहाउ ॥

चोरु सुआलिउ चोरु सिआणा ॥ खोटे का मुलु एकु दुगाणा ॥ जे साथि रखीऐ दीजै रलाइ ॥ जा परखीऐ खोटा होइ जाइ ॥२॥

जैसा करे सु तैसा पावै ॥ आपि बीजि आपे ही खावै ॥ जे वडिआईआ आपे खाइ ॥ जेही सुरति तेहै राहि जाइ ॥३॥

जे सउ कूड़ीआ कूड़ु कबाड़ु ॥ भावै सभु आखउ संसारु ॥ तुधु भावै अधी परवाणु ॥ नानक जाणै जाणु सुजाणु ॥४॥४॥६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 662) धनासरी महला १ ॥
काइआ कागदु मनु परवाणा ॥ सिर के लेख न पड़ै इआणा ॥ दरगह घड़ीअहि तीने लेख ॥ खोटा कामि न आवै वेखु ॥१॥

नानक जे विचि रुपा होइ ॥ खरा खरा आखै सभु कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

कादी कूड़ु बोलि मलु खाइ ॥ ब्राहमणु नावै जीआ घाइ ॥ जोगी जुगति न जाणै अंधु ॥ तीने ओजाड़े का बंधु ॥२॥

सो जोगी जो जुगति पछाणै ॥ गुर परसादी एको जाणै ॥ काजी सो जो उलटी करै ॥ गुर परसादी जीवतु मरै ॥ सो ब्राहमणु जो ब्रहमु बीचारै ॥ आपि तरै सगले कुल तारै ॥३॥

दानसबंदु सोई दिलि धोवै ॥ मुसलमाणु सोई मलु खोवै ॥ पड़िआ बूझै सो परवाणु ॥ जिसु सिरि दरगह का नीसाणु ॥४॥५॥७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 662) धनासरी महला १ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कालु नाही जोगु नाही नाही सत का ढबु ॥ थानसट जग भरिसट होए डूबता इव जगु ॥१॥

कल महि राम नामु सारु ॥ अखी त मीटहि नाक पकड़हि ठगण कउ संसारु ॥१॥ रहाउ ॥

आंट सेती नाकु पकड़हि सूझते तिनि लोअ ॥ मगर पाछै कछु न सूझै एहु पदमु अलोअ ॥२॥

खत्रीआ त धरमु छोडिआ मलेछ भाखिआ गही ॥ स्रिसटि सभ इक वरन होई धरम की गति रही ॥३॥

असट साज साजि पुराण सोधहि करहि बेद अभिआसु ॥ बिनु नाम हरि के मुकति नाही कहै नानकु दासु ॥४॥१॥६॥८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 663) धनासरी महला १ आरती
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥ धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलंत जोती ॥१॥

कैसी आरती होइ भव खंडना तेरी आरती ॥ अनहता सबद वाजंत भेरी ॥१॥ रहाउ ॥

सहस तव नैन नन नैन है तोहि कउ सहस मूरति नना एक तोही ॥ सहस पद बिमल नन एक पद गंध बिनु सहस तव गंध इव चलत मोही ॥२॥

सभ महि जोति जोति है सोइ ॥ तिस कै चानणि सभ महि चानणु होइ ॥ गुर साखी जोति परगटु होइ ॥ जो तिसु भावै सु आरती होइ ॥३॥

हरि चरण कमल मकरंद लोभित मनो अनदिनो मोहि आही पिआसा ॥ क्रिपा जलु देहि नानक सारिंग कउ होइ जा ते तेरै नामि वासा ॥४॥१॥७॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 663) धनासरी महला ३ घरु २ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इहु धनु अखुटु न निखुटै न जाइ ॥ पूरै सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥ अपुने सतिगुर कउ सद बलि जाई ॥ गुर किरपा ते हरि मंनि वसाई ॥१॥

से धनवंत हरि नामि लिव लाइ ॥ गुरि पूरै हरि धनु परगासिआ हरि किरपा ते वसै मनि आइ ॥ रहाउ ॥

अवगुण काटि गुण रिदै समाइ ॥ पूरे गुर कै सहजि सुभाइ ॥ पूरे गुर की साची बाणी ॥ सुख मन अंतरि सहजि समाणी ॥२॥

एकु अचरजु जन देखहु भाई ॥ दुबिधा मारि हरि मंनि वसाई ॥ नामु अमोलकु न पाइआ जाइ ॥ गुर परसादि वसै मनि आइ ॥३॥

सभ महि वसै प्रभु एको सोइ ॥ गुरमती घटि परगटु होइ ॥ सहजे जिनि प्रभु जाणि पछाणिआ ॥ नानक नामु मिलै मनु मानिआ ॥४॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 664) धनासरी महला ३ ॥
हरि नामु धनु निरमलु अति अपारा ॥ गुर कै सबदि भरे भंडारा ॥ नाम धन बिनु होर सभ बिखु जाणु ॥ माइआ मोहि जलै अभिमानु ॥१॥

गुरमुखि हरि रसु चाखै कोइ ॥ तिसु सदा अनंदु होवै दिनु राती पूरै भागि परापति होइ ॥ रहाउ ॥

सबदु दीपकु वरतै तिहु लोइ ॥ जो चाखै सो निरमलु होइ ॥ निरमल नामि हउमै मलु धोइ ॥ साची भगति सदा सुखु होइ ॥२॥

जिनि हरि रसु चाखिआ सो हरि जनु लोगु ॥ तिसु सदा हरखु नाही कदे सोगु ॥ आपि मुकतु अवरा मुकतु करावै ॥ हरि नामु जपै हरि ते सुखु पावै ॥३॥

बिनु सतिगुर सभ मुई बिललाइ ॥ अनदिनु दाझहि साति न पाइ ॥ सतिगुरु मिलै सभु त्रिसन बुझाए ॥ नानक नामि सांति सुखु पाए ॥४॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 664) धनासरी महला ३ ॥
सदा धनु अंतरि नामु समाले ॥ जीअ जंत जिनहि प्रतिपाले ॥ मुकति पदारथु तिन कउ पाए ॥ हरि कै नामि रते लिव लाए ॥१॥

गुर सेवा ते हरि नामु धनु पावै ॥ अंतरि परगासु हरि नामु धिआवै ॥ रहाउ ॥

इहु हरि रंगु गूड़ा धन पिर होइ ॥ सांति सीगारु रावे प्रभु सोइ ॥ हउमै विचि प्रभु कोइ न पाए ॥ मूलहु भुला जनमु गवाए ॥२॥

गुर ते साति सहज सुखु बाणी ॥ सेवा साची नामि समाणी ॥ सबदि मिलै प्रीतमु सदा धिआए ॥ साच नामि वडिआई पाए ॥३॥

आपे करता जुगि जुगि सोइ ॥ नदरि करे मेलावा होइ ॥ गुरबाणी ते हरि मंनि वसाए ॥ नानक साचि रते प्रभि आपि मिलाए ॥४॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 664) धनासरी महला ३ तीजा ॥
जगु मैला मैलो होइ जाइ ॥ आवै जाइ दूजै लोभाइ ॥ दूजै भाइ सभ परज विगोई ॥ मनमुखि चोटा खाइ अपुनी पति खोई ॥१॥

गुर सेवा ते जनु निरमलु होइ ॥ अंतरि नामु वसै पति ऊतम होइ ॥ रहाउ ॥

गुरमुखि उबरे हरि सरणाई ॥ राम नामि राते भगति द्रिड़ाई ॥ भगति करे जनु वडिआई पाए ॥ साचि रते सुख सहजि समाए ॥२॥

साचे का गाहकु विरला को जाणु ॥ गुर कै सबदि आपु पछाणु ॥ साची रासि साचा वापारु ॥ सो धंनु पुरखु जिसु नामि पिआरु ॥३॥

तिनि प्रभि साचै इकि सचि लाए ॥ ऊतम बाणी सबदु सुणाए ॥ प्रभ साचे की साची कार ॥ नानक नामि सवारणहार ॥४॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 665) धनासरी महला ३ ॥
जो हरि सेवहि तिन बलि जाउ ॥ तिन हिरदै साचु सचा मुखि नाउ ॥ साचो साचु समालिहु दुखु जाइ ॥ साचै सबदि वसै मनि आइ ॥१॥

गुरबाणी सुणि मैलु गवाए ॥ सहजे हरि नामु मंनि वसाए ॥१॥ रहाउ ॥

कूड़ु कुसतु त्रिसना अगनि बुझाए ॥ अंतरि सांति सहजि सुखु पाए ॥ गुर कै भाणै चलै ता आपु जाइ ॥ साचु महलु पाए हरि गुण गाइ ॥२॥

न सबदु बूझै न जाणै बाणी ॥ मनमुखि अंधे दुखि विहाणी ॥ सतिगुरु भेटे ता सुखु पाए ॥ हउमै विचहु ठाकि रहाए ॥३॥

किस नो कहीऐ दाता इकु सोइ ॥ किरपा करे सबदि मिलावा होइ ॥ मिलि प्रीतम साचे गुण गावा ॥ नानक साचे साचा भावा ॥४॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 665) धनासरी महला ३ ॥
मनु मरै धातु मरि जाइ ॥ बिनु मन मूए कैसे हरि पाइ ॥ इहु मनु मरै दारू जाणै कोइ ॥ मनु सबदि मरै बूझै जनु सोइ ॥१॥

जिस नो बखसे हरि दे वडिआई ॥ गुर परसादि वसै मनि आई ॥ रहाउ ॥

गुरमुखि करणी कार कमावै ॥ ता इसु मन की सोझी पावै ॥ मनु मै मतु मैगल मिकदारा ॥ गुरु अंकसु मारि जीवालणहारा ॥२॥

मनु असाधु साधै जनु कोई ॥ अचरु चरै ता निरमलु होई ॥ गुरमुखि इहु मनु लइआ सवारि ॥ हउमै विचहु तजै विकार ॥३॥

जो धुरि रखिअनु मेलि मिलाइ ॥ कदे न विछुड़हि सबदि समाइ ॥ आपणी कला आपे प्रभु जाणै ॥ नानक गुरमुखि नामु पछाणै ॥४॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 665) धनासरी महला ३ ॥
काचा धनु संचहि मूरख गावार ॥ मनमुख भूले अंध गावार ॥ बिखिआ कै धनि सदा दुखु होइ ॥ ना साथि जाइ न परापति होइ ॥१॥

साचा धनु गुरमती पाए ॥ काचा धनु फुनि आवै जाए ॥ रहाउ ॥

मनमुखि भूले सभि मरहि गवार ॥ भवजलि डूबे न उरवारि न पारि ॥ सतिगुरु भेटे पूरै भागि ॥ साचि रते अहिनिसि बैरागि ॥२॥

चहु जुग महि अम्रितु साची बाणी ॥ पूरै भागि हरि नामि समाणी ॥ सिध साधिक तरसहि सभि लोइ ॥ पूरै भागि परापति होइ ॥३॥

सभु किछु साचा साचा है सोइ ॥ ऊतम ब्रहमु पछाणै कोइ ॥ सचु साचा सचु आपि द्रिड़ाए ॥ नानक आपे वेखै आपे सचि लाए ॥४॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 666) धनासरी महला ३ ॥
नावै की कीमति मिति कही न जाइ ॥ से जन धंनु जिन इक नामि लिव लाइ ॥ गुरमति साची साचा वीचारु ॥ आपे बखसे दे वीचारु ॥१॥

हरि नामु अचरजु प्रभु आपि सुणाए ॥ कली काल विचि गुरमुखि पाए ॥१॥ रहाउ ॥

हम मूरख मूरख मन माहि ॥ हउमै विचि सभ कार कमाहि ॥ गुर परसादी हंउमै जाइ ॥ आपे बखसे लए मिलाइ ॥२॥

बिखिआ का धनु बहुतु अभिमानु ॥ अहंकारि डूबै न पावै मानु ॥ आपु छोडि सदा सुखु होई ॥ गुरमति सालाही सचु सोई ॥३॥

आपे साजे करता सोइ ॥ तिसु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥ जिसु सचि लाए सोई लागै ॥ नानक नामि सदा सुखु आगै ॥४॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 666) रागु धनासिरी महला ३ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हम भीखक भेखारी तेरे तू निज पति है दाता ॥ होहु दैआल नामु देहु मंगत जन कंउ सदा रहउ रंगि राता ॥१॥

हंउ बलिहारै जाउ साचे तेरे नाम विटहु ॥ करण कारण सभना का एको अवरु न दूजा कोई ॥१॥ रहाउ ॥

बहुते फेर पए किरपन कउ अब किछु किरपा कीजै ॥ होहु दइआल दरसनु देहु अपुना ऐसी बखस करीजै ॥२॥

भनति नानक भरम पट खूल्हे गुर परसादी जानिआ ॥ साची लिव लागी है भीतरि सतिगुर सिउ मनु मानिआ ॥३॥१॥९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 666) धनासरी महला ४ घरु १ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो हरि सेवहि संत भगत तिन के सभि पाप निवारी ॥ हम ऊपरि किरपा करि सुआमी रखु संगति तुम जु पिआरी ॥१॥

हरि गुण कहि न सकउ बनवारी ॥ हम पापी पाथर नीरि डुबत करि किरपा पाखण हम तारी ॥ रहाउ ॥

जनम जनम के लागे बिखु मोरचा लगि संगति साध सवारी ॥ जिउ कंचनु बैसंतरि ताइओ मलु काटी कटित उतारी ॥२॥

हरि हरि जपनु जपउ दिनु राती जपि हरि हरि हरि उरि धारी ॥ हरि हरि हरि अउखधु जगि पूरा जपि हरि हरि हउमै मारी ॥३॥

हरि हरि अगम अगाधि बोधि अपर्मपर पुरख अपारी ॥ जन कउ क्रिपा करहु जगजीवन जन नानक पैज सवारी ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 667) धनासरी महला ४ ॥
हरि के संत जना हरि जपिओ तिन का दूखु भरमु भउ भागी ॥ अपनी सेवा आपि कराई गुरमति अंतरि जागी ॥१॥

हरि कै नामि रता बैरागी ॥ हरि हरि कथा सुणी मनि भाई गुरमति हरि लिव लागी ॥१॥ रहाउ ॥

संत जना की जाति हरि सुआमी तुम्ह ठाकुर हम सांगी ॥ जैसी मति देवहु हरि सुआमी हम तैसे बुलग बुलागी ॥२॥

किआ हम किरम नान्ह निक कीरे तुम्ह वड पुरख वडागी ॥ तुम्हरी गति मिति कहि न सकह प्रभ हम किउ करि मिलह अभागी ॥३॥

हरि प्रभ सुआमी किरपा धारहु हम हरि हरि सेवा लागी ॥ नानक दासनि दासु करहु प्रभ हम हरि कथा कथागी ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 667) धनासरी महला ४ ॥
हरि का संतु सतगुरु सत पुरखा जो बोलै हरि हरि बानी ॥ जो जो कहै सुणै सो मुकता हम तिस कै सद कुरबानी ॥१॥

हरि के संत सुनहु जसु कानी ॥ हरि हरि कथा सुनहु इक निमख पल सभि किलविख पाप लहि जानी ॥१॥ रहाउ ॥

ऐसा संतु साधु जिन पाइआ ते वड पुरख वडानी ॥ तिन की धूरि मंगह प्रभ सुआमी हम हरि लोच लुचानी ॥२॥

हरि हरि सफलिओ बिरखु प्रभ सुआमी जिन जपिओ से त्रिपतानी ॥ हरि हरि अम्रितु पी त्रिपतासे सभ लाथी भूख भुखानी ॥३॥

जिन के वडे भाग वड ऊचे तिन हरि जपिओ जपानी ॥ तिन हरि संगति मेलि प्रभ सुआमी जन नानक दास दसानी ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 667) धनासरी महला ४ ॥
हम अंधुले अंध बिखै बिखु राते किउ चालह गुर चाली ॥ सतगुरु दइआ करे सुखदाता हम लावै आपन पाली ॥१॥

गुरसिख मीत चलहु गुर चाली ॥ जो गुरु कहै सोई भल मानहु हरि हरि कथा निराली ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के संत सुणहु जन भाई गुरु सेविहु बेगि बेगाली ॥ सतगुरु सेवि खरचु हरि बाधहु मत जाणहु आजु कि काल्ही ॥२॥

हरि के संत जपहु हरि जपणा हरि संतु चलै हरि नाली ॥ जिन हरि जपिआ से हरि होए हरि मिलिआ केल केलाली ॥३॥

हरि हरि जपनु जपि लोच लोचानी हरि किरपा करि बनवाली ॥ जन नानक संगति साध हरि मेलहु हम साध जना पग राली ॥४॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 668) धनासरी महला ४ ॥
हरि हरि बूंद भए हरि सुआमी हम चात्रिक बिलल बिललाती ॥ हरि हरि क्रिपा करहु प्रभ अपनी मुखि देवहु हरि निमखाती ॥१॥

हरि बिनु रहि न सकउ इक राती ॥ जिउ बिनु अमलै अमली मरि जाई है तिउ हरि बिनु हम मरि जाती ॥ रहाउ ॥

तुम हरि सरवर अति अगाह हम लहि न सकहि अंतु माती ॥ तू परै परै अपर्मपरु सुआमी मिति जानहु आपन गाती ॥२॥

हरि के संत जना हरि जपिओ गुर रंगि चलूलै राती ॥ हरि हरि भगति बनी अति सोभा हरि जपिओ ऊतम पाती ॥३॥

आपे ठाकुरु आपे सेवकु आपि बनावै भाती ॥ नानकु जनु तुमरी सरणाई हरि राखहु लाज भगाती ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 668) धनासरी महला ४ ॥
कलिजुग का धरमु कहहु तुम भाई किव छूटह हम छुटकाकी ॥ हरि हरि जपु बेड़ी हरि तुलहा हरि जपिओ तरै तराकी ॥१॥

हरि जी लाज रखहु हरि जन की ॥ हरि हरि जपनु जपावहु अपना हम मागी भगति इकाकी ॥ रहाउ ॥

हरि के सेवक से हरि पिआरे जिन जपिओ हरि बचनाकी ॥ लेखा चित्र गुपति जो लिखिआ सभ छूटी जम की बाकी ॥२॥

हरि के संत जपिओ मनि हरि हरि लगि संगति साध जना की ॥ दिनीअरु सूरु त्रिसना अगनि बुझानी सिव चरिओ चंदु चंदाकी ॥३॥

तुम वड पुरख वड अगम अगोचर तुम आपे आपि अपाकी ॥ जन नानक कउ प्रभ किरपा कीजै करि दासनि दास दसाकी ॥४॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 668) धनासरी महला ४ घरु ५ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उर धारि बीचारि मुरारि रमो रमु मनमोहन नामु जपीने ॥ अद्रिसटु अगोचरु अपर्मपर सुआमी गुरि पूरै प्रगट करि दीने ॥१॥

राम पारस चंदन हम कासट लोसट ॥ हरि संगि हरी सतसंगु भए हरि कंचनु चंदनु कीने ॥१॥ रहाउ ॥

नव छिअ खटु बोलहि मुख आगर मेरा हरि प्रभु इव न पतीने ॥ जन नानक हरि हिरदै सद धिआवहु इउ हरि प्रभु मेरा भीने ॥२॥१॥७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 668) धनासरी महला ४ ॥
गुन कहु हरि लहु करि सेवा सतिगुर इव हरि हरि नामु धिआई ॥ हरि दरगह भावहि फिरि जनमि न आवहि हरि हरि हरि जोति समाई ॥१॥

जपि मन नामु हरी होहि सरब सुखी ॥ हरि जसु ऊच सभना ते ऊपरि हरि हरि हरि सेवि छडाई ॥ रहाउ ॥

हरि क्रिपा निधि कीनी गुरि भगति हरि दीनी तब हरि सिउ प्रीति बनि आई ॥ बहु चिंत विसारी हरि नामु उरि धारी नानक हरि भए है सखाई ॥२॥२॥८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 669) धनासरी महला ४ ॥
हरि पड़ु हरि लिखु हरि जपि हरि गाउ हरि भउजलु पारि उतारी ॥ मनि बचनि रिदै धिआइ हरि होइ संतुसटु इव भणु हरि नामु मुरारी ॥१॥

मनि जपीऐ हरि जगदीस ॥ मिलि संगति साधू मीत ॥ सदा अनंदु होवै दिनु राती हरि कीरति करि बनवारी ॥ रहाउ ॥

हरि हरि करी द्रिसटि तब भइओ मनि उदमु हरि हरि नामु जपिओ गति भई हमारी ॥ जन नानक की पति राखु मेरे सुआमी हरि आइ परिओ है सरणि तुमारी ॥२॥३॥९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 669) धनासरी महला ४ ॥
चउरासीह सिध बुध तेतीस कोटि मुनि जन सभि चाहहि हरि जीउ तेरो नाउ ॥ गुर प्रसादि को विरला पावै जिन कउ लिलाटि लिखिआ धुरि भाउ ॥१॥

जपि मन रामै नामु हरि जसु ऊतम काम ॥ जो गावहि सुणहि तेरा जसु सुआमी हउ तिन कै सद बलिहारै जाउ ॥ रहाउ ॥

सरणागति प्रतिपालक हरि सुआमी जो तुम देहु सोई हउ पाउ ॥ दीन दइआल क्रिपा करि दीजै नानक हरि सिमरण का है चाउ ॥२॥४॥१०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 669) धनासरी महला ४ ॥
सेवक सिख पूजण सभि आवहि सभि गावहि हरि हरि ऊतम बानी ॥ गाविआ सुणिआ तिन का हरि थाइ पावै जिन सतिगुर की आगिआ सति सति करि मानी ॥१॥

बोलहु भाई हरि कीरति हरि भवजल तीरथि ॥ हरि दरि तिन की ऊतम बात है संतहु हरि कथा जिन जनहु जानी ॥ रहाउ ॥

आपे गुरु चेला है आपे आपे हरि प्रभु चोज विडानी ॥ जन नानक आपि मिलाए सोई हरि मिलसी अवर सभ तिआगि ओहा हरि भानी ॥२॥५॥११॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 669) धनासरी महला ४ ॥
इछा पूरकु सरब सुखदाता हरि जा कै वसि है कामधेना ॥ सो ऐसा हरि धिआईऐ मेरे जीअड़े ता सरब सुख पावहि मेरे मना ॥१॥

जपि मन सति नामु सदा सति नामु ॥ हलति पलति मुख ऊजल होई है नित धिआईऐ हरि पुरखु निरंजना ॥ रहाउ ॥

जह हरि सिमरनु भइआ तह उपाधि गतु कीनी वडभागी हरि जपना ॥ जन नानक कउ गुरि इह मति दीनी जपि हरि भवजलु तरना ॥२॥६॥१२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 670) धनासरी महला ४ ॥
मेरे साहा मै हरि दरसन सुखु होइ ॥ हमरी बेदनि तू जानता साहा अवरु किआ जानै कोइ ॥ रहाउ ॥

साचा साहिबु सचु तू मेरे साहा तेरा कीआ सचु सभु होइ ॥ झूठा किस कउ आखीऐ साहा दूजा नाही कोइ ॥१॥

सभना विचि तू वरतदा साहा सभि तुझहि धिआवहि दिनु राति ॥ सभि तुझ ही थावहु मंगदे मेरे साहा तू सभना करहि इक दाति ॥२॥

सभु को तुझ ही विचि है मेरे साहा तुझ ते बाहरि कोई नाहि ॥ सभि जीअ तेरे तू सभस दा मेरे साहा सभि तुझ ही माहि समाहि ॥३॥

सभना की तू आस है मेरे पिआरे सभि तुझहि धिआवहि मेरे साह ॥ जिउ भावै तिउ रखु तू मेरे पिआरे सचु नानक के पातिसाह ॥४॥७॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 670) धनासरी महला ५ घरु १ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भव खंडन दुख भंजन स्वामी भगति वछल निरंकारे ॥ कोटि पराध मिटे खिन भीतरि जां गुरमुखि नामु समारे ॥१॥

मेरा मनु लागा है राम पिआरे ॥ दीन दइआलि करी प्रभि किरपा वसि कीने पंच दूतारे ॥१॥ रहाउ ॥

तेरा थानु सुहावा रूपु सुहावा तेरे भगत सोहहि दरबारे ॥ सरब जीआ के दाते सुआमी करि किरपा लेहु उबारे ॥२॥

तेरा वरनु न जापै रूपु न लखीऐ तेरी कुदरति कउनु बीचारे ॥ जलि थलि महीअलि रविआ स्रब ठाई अगम रूप गिरधारे ॥३॥

कीरति करहि सगल जन तेरी तू अबिनासी पुरखु मुरारे ॥ जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी जन नानक सरनि दुआरे ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 670) धनासरी महला ५ ॥
बिनु जल प्रान तजे है मीना जिनि जल सिउ हेतु बढाइओ ॥ कमल हेति बिनसिओ है भवरा उनि मारगु निकसि न पाइओ ॥१॥

अब मन एकस सिउ मोहु कीना ॥ मरै न जावै सद ही संगे सतिगुर सबदी चीना ॥१॥ रहाउ ॥

काम हेति कुंचरु लै फांकिओ ओहु पर वसि भइओ बिचारा ॥ नाद हेति सिरु डारिओ कुरंका उस ही हेत बिदारा ॥२॥

देखि कुट्मबु लोभि मोहिओ प्रानी माइआ कउ लपटाना ॥ अति रचिओ करि लीनो अपुना उनि छोडि सरापर जाना ॥३॥

बिनु गोबिंद अवर संगि नेहा ओहु जाणहु सदा दुहेला ॥ कहु नानक गुर इहै बुझाइओ प्रीति प्रभू सद केला ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 671) धनासरी मः ५ ॥
करि किरपा दीओ मोहि नामा बंधन ते छुटकाए ॥ मन ते बिसरिओ सगलो धंधा गुर की चरणी लाए ॥१॥

साधसंगि चिंत बिरानी छाडी ॥ अह्मबुधि मोह मन बासन दे करि गडहा गाडी ॥१॥ रहाउ ॥

ना को मेरा दुसमनु रहिआ ना हम किस के बैराई ॥ ब्रहमु पसारु पसारिओ भीतरि सतिगुर ते सोझी पाई ॥२॥

सभु को मीतु हम आपन कीना हम सभना के साजन ॥ दूरि पराइओ मन का बिरहा ता मेलु कीओ मेरै राजन ॥३॥

बिनसिओ ढीठा अम्रितु वूठा सबदु लगो गुर मीठा ॥ जलि थलि महीअलि सरब निवासी नानक रमईआ डीठा ॥४॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 671) धनासरी मः ५ ॥
जब ते दरसन भेटे साधू भले दिनस ओइ आए ॥ महा अनंदु सदा करि कीरतनु पुरख बिधाता पाए ॥१॥

अब मोहि राम जसो मनि गाइओ ॥ भइओ प्रगासु सदा सुखु मन महि सतिगुरु पूरा पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

गुण निधानु रिद भीतरि वसिआ ता दूखु भरम भउ भागा ॥ भई परापति वसतु अगोचर राम नामि रंगु लागा ॥२॥

चिंत अचिंता सोच असोचा सोगु लोभु मोहु थाका ॥ हउमै रोग मिटे किरपा ते जम ते भए बिबाका ॥३॥

गुर की टहल गुरू की सेवा गुर की आगिआ भाणी ॥ कहु नानक जिनि जम ते काढे तिसु गुर कै कुरबाणी ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 671) धनासरी महला ५ ॥
जिस का तनु मनु धनु सभु तिस का सोई सुघड़ु सुजानी ॥ तिन ही सुणिआ दुखु सुखु मेरा तउ बिधि नीकी खटानी ॥१॥

जीअ की एकै ही पहि मानी ॥ अवरि जतन करि रहे बहुतेरे तिन तिलु नही कीमति जानी ॥ रहाउ ॥

अम्रित नामु निरमोलकु हीरा गुरि दीनो मंतानी ॥ डिगै न डोलै द्रिड़ु करि रहिओ पूरन होइ त्रिपतानी ॥२॥

ओइ जु बीच हम तुम कछु होते तिन की बात बिलानी ॥ अलंकार मिलि थैली होई है ता ते कनिक वखानी ॥३॥

प्रगटिओ जोति सहज सुख सोभा बाजे अनहत बानी ॥ कहु नानक निहचल घरु बाधिओ गुरि कीओ बंधानी ॥४॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 672) धनासरी महला ५ ॥
वडे वडे राजन अरु भूमन ता की त्रिसन न बूझी ॥ लपटि रहे माइआ रंग माते लोचन कछू न सूझी ॥१॥

बिखिआ महि किन ही त्रिपति न पाई ॥ जिउ पावकु ईधनि नही ध्रापै बिनु हरि कहा अघाई ॥ रहाउ ॥

दिनु दिनु करत भोजन बहु बिंजन ता की मिटै न भूखा ॥ उदमु करै सुआन की निआई चारे कुंटा घोखा ॥२॥

कामवंत कामी बहु नारी पर ग्रिह जोह न चूकै ॥ दिन प्रति करै करै पछुतापै सोग लोभ महि सूकै ॥३॥

हरि हरि नामु अपार अमोला अम्रितु एकु निधाना ॥ सूखु सहजु आनंदु संतन कै नानक गुर ते जाना ॥४॥६॥


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