राग बिलावलु - बाणी शब्द, Raag Bilaval - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू नानक देव जी -- SGGS 795) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु बिलावलु महला १ चउपदे घरु १ ॥
तू सुलतानु कहा हउ मीआ तेरी कवन वडाई ॥ जो तू देहि सु कहा सुआमी मै मूरख कहणु न जाई ॥१॥

तेरे गुण गावा देहि बुझाई ॥ जैसे सच महि रहउ रजाई ॥१॥ रहाउ ॥

जो किछु होआ सभु किछु तुझ ते तेरी सभ असनाई ॥ तेरा अंतु न जाणा मेरे साहिब मै अंधुले किआ चतुराई ॥२॥

किआ हउ कथी कथे कथि देखा मै अकथु न कथना जाई ॥ जो तुधु भावै सोई आखा तिलु तेरी वडिआई ॥३॥

एते कूकर हउ बेगाना भउका इसु तन ताई ॥ भगति हीणु नानकु जे होइगा ता खसमै नाउ न जाई ॥४॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 795) बिलावलु महला १ ॥
मनु मंदरु तनु वेस कलंदरु घट ही तीरथि नावा ॥ एकु सबदु मेरै प्रानि बसतु है बाहुड़ि जनमि न आवा ॥१॥

मनु बेधिआ दइआल सेती मेरी माई ॥ कउणु जाणै पीर पराई ॥ हम नाही चिंत पराई ॥१॥ रहाउ ॥

अगम अगोचर अलख अपारा चिंता करहु हमारी ॥ जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा घटि घटि जोति तुम्हारी ॥२॥

सिख मति सभ बुधि तुम्हारी मंदिर छावा तेरे ॥ तुझ बिनु अवरु न जाणा मेरे साहिबा गुण गावा नित तेरे ॥३॥

जीअ जंत सभि सरणि तुम्हारी सरब चिंत तुधु पासे ॥ जो तुधु भावै सोई चंगा इक नानक की अरदासे ॥४॥२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 795) बिलावलु महला १ ॥
आपे सबदु आपे नीसानु ॥ आपे सुरता आपे जानु ॥ आपे करि करि वेखै ताणु ॥ तू दाता नामु परवाणु ॥१॥

ऐसा नामु निरंजन देउ ॥ हउ जाचिकु तू अलख अभेउ ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ मोहु धरकटी नारि ॥ भूंडी कामणि कामणिआरि ॥ राजु रूपु झूठा दिन चारि ॥ नामु मिलै चानणु अंधिआरि ॥२॥

चखि छोडी सहसा नही कोइ ॥ बापु दिसै वेजाति न होइ ॥ एके कउ नाही भउ कोइ ॥ करता करे करावै सोइ ॥३॥

सबदि मुए मनु मन ते मारिआ ॥ ठाकि रहे मनु साचै धारिआ ॥ अवरु न सूझै गुर कउ वारिआ ॥ नानक नामि रते निसतारिआ ॥४॥३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 796) बिलावलु महला १ ॥
गुर बचनी मनु सहज धिआने ॥ हरि कै रंगि रता मनु माने ॥ मनमुख भरमि भुले बउराने ॥ हरि बिनु किउ रहीऐ गुर सबदि पछाने ॥१॥

बिनु दरसन कैसे जीवउ मेरी माई ॥ हरि बिनु जीअरा रहि न सकै खिनु सतिगुरि बूझ बुझाई ॥१॥ रहाउ ॥

मेरा प्रभु बिसरै हउ मरउ दुखाली ॥ सासि गिरासि जपउ अपुने हरि भाली ॥ सद बैरागनि हरि नामु निहाली ॥ अब जाने गुरमुखि हरि नाली ॥२॥

अकथ कथा कहीऐ गुर भाइ ॥ प्रभु अगम अगोचरु देइ दिखाइ ॥ बिनु गुर करणी किआ कार कमाइ ॥ हउमै मेटि चलै गुर सबदि समाइ ॥३॥

मनमुखु विछुड़ै खोटी रासि ॥ गुरमुखि नामि मिलै साबासि ॥ हरि किरपा धारी दासनि दास ॥ जन नानक हरि नाम धनु रासि ॥४॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 796) बिलावलु महला ३ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ध्रिगु ध्रिगु खाइआ ध्रिगु ध्रिगु सोइआ ध्रिगु ध्रिगु कापड़ु अंगि चड़ाइआ ॥ ध्रिगु सरीरु कुट्मब सहित सिउ जितु हुणि खसमु न पाइआ ॥ पउड़ी छुड़की फिरि हाथि न आवै अहिला जनमु गवाइआ ॥१॥

दूजा भाउ न देई लिव लागणि जिनि हरि के चरण विसारे ॥ जगजीवन दाता जन सेवक तेरे तिन के तै दूख निवारे ॥१॥ रहाउ ॥

तू दइआलु दइआपति दाता किआ एहि जंत विचारे ॥ मुकत बंध सभि तुझ ते होए ऐसा आखि वखाणे ॥ गुरमुखि होवै सो मुकतु कहीऐ मनमुख बंध विचारे ॥२॥

सो जनु मुकतु जिसु एक लिव लागी सदा रहै हरि नाले ॥ तिन की गहण गति कही न जाई सचै आपि सवारे ॥ भरमि भुलाणे सि मनमुख कहीअहि ना उरवारि न पारे ॥३॥

जिस नो नदरि करे सोई जनु पाए गुर का सबदु सम्हाले ॥ हरि जन माइआ माहि निसतारे ॥ नानक भागु होवै जिसु मसतकि कालहि मारि बिदारे ॥४॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 797) बिलावलु महला ३ ॥
अतुलु किउ तोलिआ जाइ ॥ दूजा होइ त सोझी पाइ ॥ तिस ते दूजा नाही कोइ ॥ तिस दी कीमति किकू होइ ॥१॥

गुर परसादि वसै मनि आइ ॥ ता को जाणै दुबिधा जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

आपि सराफु कसवटी लाए ॥ आपे परखे आपि चलाए ॥ आपे तोले पूरा होइ ॥ आपे जाणै एको सोइ ॥२॥

माइआ का रूपु सभु तिस ते होइ ॥ जिस नो मेले सु निरमलु होइ ॥ जिस नो लाए लगै तिसु आइ ॥ सभु सचु दिखाले ता सचि समाइ ॥३॥

आपे लिव धातु है आपे ॥ आपि बुझाए आपे जापे ॥ आपे सतिगुरु सबदु है आपे ॥ नानक आखि सुणाए आपे ॥४॥२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 797) बिलावलु महला ३ ॥
साहिब ते सेवकु सेव साहिब ते किआ को कहै बहाना ॥ ऐसा इकु तेरा खेलु बनिआ है सभ महि एकु समाना ॥१॥

सतिगुरि परचै हरि नामि समाना ॥ जिसु करमु होवै सो सतिगुरु पाए अनदिनु लागै सहज धिआना ॥१॥ रहाउ ॥

किआ कोई तेरी सेवा करे किआ को करे अभिमाना ॥ जब अपुनी जोति खिंचहि तू सुआमी तब कोई करउ दिखा वखिआना ॥२॥

आपे गुरु चेला है आपे आपे गुणी निधाना ॥ जिउ आपि चलाए तिवै कोई चालै जिउ हरि भावै भगवाना ॥३॥

कहत नानकु तू साचा साहिबु कउणु जाणै तेरे कामां ॥ इकना घर महि दे वडिआई इकि भरमि भवहि अभिमाना ॥४॥३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 797) बिलावलु महला ३ ॥
पूरा थाटु बणाइआ पूरै वेखहु एक समाना ॥ इसु परपंच महि साचे नाम की वडिआई मतु को धरहु गुमाना ॥१॥

सतिगुर की जिस नो मति आवै सो सतिगुर माहि समाना ॥ इह बाणी जो जीअहु जाणै तिसु अंतरि रवै हरि नामा ॥१॥ रहाउ ॥

चहु जुगा का हुणि निबेड़ा नर मनुखा नो एकु निधाना ॥ जतु संजम तीरथ ओना जुगा का धरमु है कलि महि कीरति हरि नामा ॥२॥

जुगि जुगि आपो आपणा धरमु है सोधि देखहु बेद पुराना ॥ गुरमुखि जिनी धिआइआ हरि हरि जगि ते पूरे परवाना ॥३॥

कहत नानकु सचे सिउ प्रीति लाए चूकै मनि अभिमाना ॥ कहत सुणत सभे सुख पावहि मानत पाहि निधाना ॥४॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 798) बिलावलु महला ३ ॥
गुरमुखि प्रीति जिस नो आपे लाए ॥ तितु घरि बिलावलु गुर सबदि सुहाए ॥ मंगलु नारी गावहि आए ॥ मिलि प्रीतम सदा सुखु पाए ॥१॥

हउ तिन बलिहारै जिन्ह हरि मंनि वसाए ॥ हरि जन कउ मिलिआ सुखु पाईऐ हरि गुण गावै सहजि सुभाए ॥१॥ रहाउ ॥

सदा रंगि राते तेरै चाए ॥ हरि जीउ आपि वसै मनि आए ॥ आपे सोभा सद ही पाए ॥ गुरमुखि मेलै मेलि मिलाए ॥२॥

गुरमुखि राते सबदि रंगाए ॥ निज घरि वासा हरि गुण गाए ॥ रंगि चलूलै हरि रसि भाए ॥ इहु रंगु कदे न उतरै साचि समाए ॥३॥

अंतरि सबदु मिटिआ अगिआनु अंधेरा ॥ सतिगुर गिआनु मिलिआ प्रीतमु मेरा ॥ जो सचि राते तिन बहुड़ि न फेरा ॥ नानक नामु द्रिड़ाए पूरा गुरु मेरा ॥४॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 798) बिलावलु महला ३ ॥
पूरे गुर ते वडिआई पाई ॥ अचिंत नामु वसिआ मनि आई ॥ हउमै माइआ सबदि जलाई ॥ दरि साचै गुर ते सोभा पाई ॥१॥

जगदीस सेवउ मै अवरु न काजा ॥ अनदिनु अनदु होवै मनि मेरै गुरमुखि मागउ तेरा नामु निवाजा ॥१॥ रहाउ ॥

मन की परतीति मन ते पाई ॥ पूरे गुर ते सबदि बुझाई ॥ जीवण मरणु को समसरि वेखै ॥ बहुड़ि न मरै ना जमु पेखै ॥२॥

घर ही महि सभि कोट निधान ॥ सतिगुरि दिखाए गइआ अभिमानु ॥ सद ही लागा सहजि धिआन ॥ अनदिनु गावै एको नाम ॥३॥

इसु जुग महि वडिआई पाई ॥ पूरे गुर ते नामु धिआई ॥ जह देखा तह रहिआ समाई ॥ सदा सुखदाता कीमति नही पाई ॥४॥

पूरै भागि गुरु पूरा पाइआ ॥ अंतरि नामु निधानु दिखाइआ ॥ गुर का सबदु अति मीठा लाइआ ॥ नानक त्रिसन बुझी मनि तनि सुखु पाइआ ॥५॥६॥४॥६॥१०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 798) रागु बिलावलु महला ४ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उदम मति प्रभ अंतरजामी जिउ प्रेरे तिउ करना ॥ जिउ नटूआ तंतु वजाए तंती तिउ वाजहि जंत जना ॥१॥

जपि मन राम नामु रसना ॥ मसतकि लिखत लिखे गुरु पाइआ हरि हिरदै हरि बसना ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ गिरसति भ्रमतु है प्रानी रखि लेवहु जनु अपना ॥ जिउ प्रहिलादु हरणाखसि ग्रसिओ हरि राखिओ हरि सरना ॥२॥

कवन कवन की गति मिति कहीऐ हरि कीए पतित पवंना ॥ ओहु ढोवै ढोर हाथि चमु चमरे हरि उधरिओ परिओ सरना ॥३॥

प्रभ दीन दइआल भगत भव तारन हम पापी राखु पपना ॥ हरि दासन दास दास हम करीअहु जन नानक दास दासंना ॥४॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 799) बिलावलु महला ४ ॥
हम मूरख मुगध अगिआन मती सरणागति पुरख अजनमा ॥ करि किरपा रखि लेवहु मेरे ठाकुर हम पाथर हीन अकरमा ॥१॥

मेरे मन भजु राम नामै रामा ॥ गुरमति हरि रसु पाईऐ होरि तिआगहु निहफल कामा ॥१॥ रहाउ ॥

हरि जन सेवक से हरि तारे हम निरगुन राखु उपमा ॥ तुझ बिनु अवरु न कोई मेरे ठाकुर हरि जपीऐ वडे करमा ॥२॥

नामहीन ध्रिगु जीवते तिन वड दूख सहमा ॥ ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि मंदभागी मूड़ अकरमा ॥३॥

हरि जन नामु अधारु है धुरि पूरबि लिखे वड करमा ॥ गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ जन नानक सफलु जनमा ॥४॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 799) बिलावलु महला ४ ॥
हमरा चितु लुभत मोहि बिखिआ बहु दुरमति मैलु भरा ॥ तुम्हरी सेवा करि न सकह प्रभ हम किउ करि मुगध तरा ॥१॥

मेरे मन जपि नरहर नामु नरहरा ॥ जन ऊपरि किरपा प्रभि धारी मिलि सतिगुर पारि परा ॥१॥ रहाउ ॥

हमरे पिता ठाकुर प्रभ सुआमी हरि देहु मती जसु करा ॥ तुम्हरै संगि लगे से उधरे जिउ संगि कासट लोह तरा ॥२॥

साकत नर होछी मति मधिम जिन्ह हरि हरि सेव न करा ॥ ते नर भागहीन दुहचारी ओइ जनमि मुए फिरि मरा ॥३॥

जिन कउ तुम्ह हरि मेलहु सुआमी ते न्हाए संतोख गुर सरा ॥ दुरमति मैलु गई हरि भजिआ जन नानक पारि परा ॥४॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 799) बिलावलु महला ४ ॥
आवहु संत मिलहु मेरे भाई मिलि हरि हरि कथा करहु ॥ हरि हरि नामु बोहिथु है कलजुगि खेवटु गुर सबदि तरहु ॥१॥

मेरे मन हरि गुण हरि उचरहु ॥ मसतकि लिखत लिखे गुन गाए मिलि संगति पारि परहु ॥१॥ रहाउ ॥

काइआ नगर महि राम रसु ऊतमु किउ पाईऐ उपदेसु जन करहु ॥ सतिगुरु सेवि सफल हरि दरसनु मिलि अम्रितु हरि रसु पीअहु ॥२॥

हरि हरि नामु अम्रितु हरि मीठा हरि संतहु चाखि दिखहु ॥ गुरमति हरि रसु मीठा लागा तिन बिसरे सभि बिख रसहु ॥३॥

राम नामु रसु राम रसाइणु हरि सेवहु संत जनहु ॥ चारि पदारथ चारे पाए गुरमति नानक हरि भजहु ॥४॥४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 800) बिलावलु महला ४ ॥
खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु को जापै हरि मंत्रु जपैनी ॥ गुरु सतिगुरु पारब्रहमु करि पूजहु नित सेवहु दिनसु सभ रैनी ॥१॥

हरि जन देखहु सतिगुरु नैनी ॥ जो इछहु सोई फलु पावहु हरि बोलहु गुरमति बैनी ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक उपाव चितवीअहि बहुतेरे सा होवै जि बात होवैनी ॥ अपना भला सभु कोई बाछै सो करे जि मेरै चिति न चितैनी ॥२॥

मन की मति तिआगहु हरि जन एहा बात कठैनी ॥ अनदिनु हरि हरि नामु धिआवहु गुर सतिगुर की मति लैनी ॥३॥

मति सुमति तेरै वसि सुआमी हम जंत तू पुरखु जंतैनी ॥ जन नानक के प्रभ करते सुआमी जिउ भावै तिवै बुलैनी ॥४॥५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 800) बिलावलु महला ४ ॥
अनद मूलु धिआइओ पुरखोतमु अनदिनु अनद अनंदे ॥ धरम राइ की काणि चुकाई सभि चूके जम के छंदे ॥१॥

जपि मन हरि हरि नामु गोबिंदे ॥ वडभागी गुरु सतिगुरु पाइआ गुण गाए परमानंदे ॥१॥ रहाउ ॥

साकत मूड़ माइआ के बधिक विचि माइआ फिरहि फिरंदे ॥ त्रिसना जलत किरत के बाधे जिउ तेली बलद भवंदे ॥२॥

गुरमुखि सेव लगे से उधरे वडभागी सेव करंदे ॥ जिन हरि जपिआ तिन फलु पाइआ सभि तूटे माइआ फंदे ॥३॥

आपे ठाकुरु आपे सेवकु सभु आपे आपि गोविंदे ॥ जन नानक आपे आपि सभु वरतै जिउ राखै तिवै रहंदे ॥४॥६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 800) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु बिलावलु महला ४ पड़ताल घरु १३ ॥
बोलहु भईआ राम नामु पतित पावनो ॥ हरि संत भगत तारनो ॥ हरि भरिपुरे रहिआ ॥ जलि थले राम नामु ॥ नित गाईऐ हरि दूख बिसारनो ॥१॥ रहाउ ॥

हरि कीआ है सफल जनमु हमारा ॥ हरि जपिआ हरि दूख बिसारनहारा ॥ गुरु भेटिआ है मुकति दाता ॥ हरि कीई हमारी सफल जाता ॥ मिलि संगती गुन गावनो ॥१॥

मन राम नाम करि आसा ॥ भाउ दूजा बिनसि बिनासा ॥ विचि आसा होइ निरासी ॥ सो जनु मिलिआ हरि पासी ॥ कोई राम नाम गुन गावनो ॥ जनु नानकु तिसु पगि लावनो ॥२॥१॥७॥४॥६॥७॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 801) रागु बिलावलु महला ५ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नदरी आवै तिसु सिउ मोहु ॥ किउ मिलीऐ प्रभ अबिनासी तोहि ॥ करि किरपा मोहि मारगि पावहु ॥ साधसंगति कै अंचलि लावहु ॥१॥

किउ तरीऐ बिखिआ संसारु ॥ सतिगुरु बोहिथु पावै पारि ॥१॥ रहाउ ॥

पवन झुलारे माइआ देइ ॥ हरि के भगत सदा थिरु सेइ ॥ हरख सोग ते रहहि निरारा ॥ सिर ऊपरि आपि गुरू रखवारा ॥२॥

पाइआ वेड़ु माइआ सरब भुइअंगा ॥ हउमै पचे दीपक देखि पतंगा ॥ सगल सीगार करे नही पावै ॥ जा होइ क्रिपालु ता गुरू मिलावै ॥३॥

हउ फिरउ उदासी मै इकु रतनु दसाइआ ॥ निरमोलकु हीरा मिलै न उपाइआ ॥ हरि का मंदरु तिसु महि लालु ॥ गुरि खोलिआ पड़दा देखि भई निहालु ॥४॥

जिनि चाखिआ तिसु आइआ सादु ॥ जिउ गूंगा मन महि बिसमादु ॥ आनद रूपु सभु नदरी आइआ ॥ जन नानक हरि गुण आखि समाइआ ॥५॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 801) बिलावलु महला ५ ॥
सरब कलिआण कीए गुरदेव ॥ सेवकु अपनी लाइओ सेव ॥ बिघनु न लागै जपि अलख अभेव ॥१॥

धरति पुनीत भई गुन गाए ॥ दुरतु गइआ हरि नामु धिआए ॥१॥ रहाउ ॥

सभनी थांई रविआ आपि ॥ आदि जुगादि जा का वड परतापु ॥ गुर परसादि न होइ संतापु ॥२॥

गुर के चरन लगे मनि मीठे ॥ निरबिघन होइ सभ थांई वूठे ॥ सभि सुख पाए सतिगुर तूठे ॥३॥

पारब्रहम प्रभ भए रखवाले ॥ जिथै किथै दीसहि नाले ॥ नानक दास खसमि प्रतिपाले ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 801) बिलावलु महला ५ ॥
सुख निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥ अगनत गुण ठाकुर प्रभ तेरे ॥ मोहि अनाथ तुमरी सरणाई ॥ करि किरपा हरि चरन धिआई ॥१॥

दइआ करहु बसहु मनि आइ ॥ मोहि निरगुन लीजै लड़ि लाइ ॥ रहाउ ॥

प्रभु चिति आवै ता कैसी भीड़ ॥ हरि सेवक नाही जम पीड़ ॥ सरब दूख हरि सिमरत नसे ॥ जा कै संगि सदा प्रभु बसै ॥२॥

प्रभ का नामु मनि तनि आधारु ॥ बिसरत नामु होवत तनु छारु ॥ प्रभ चिति आए पूरन सभ काज ॥ हरि बिसरत सभ का मुहताज ॥३॥

चरन कमल संगि लागी प्रीति ॥ बिसरि गई सभ दुरमति रीति ॥ मन तन अंतरि हरि हरि मंत ॥ नानक भगतन कै घरि सदा अनंद ॥४॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 802) रागु बिलावलु महला ५ घरु २ यानड़ीए कै घरि गावणा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मै मनि तेरी टेक मेरे पिआरे मै मनि तेरी टेक ॥ अवर सिआणपा बिरथीआ पिआरे राखन कउ तुम एक ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु पूरा जे मिलै पिआरे सो जनु होत निहाला ॥ गुर की सेवा सो करे पिआरे जिस नो होइ दइआला ॥ सफल मूरति गुरदेउ सुआमी सरब कला भरपूरे ॥ नानक गुरु पारब्रहमु परमेसरु सदा सदा हजूरे ॥१॥

सुणि सुणि जीवा सोइ तिना की जिन्ह अपुना प्रभु जाता ॥ हरि नामु अराधहि नामु वखाणहि हरि नामे ही मनु राता ॥ सेवकु जन की सेवा मागै पूरै करमि कमावा ॥ नानक की बेनंती सुआमी तेरे जन देखणु पावा ॥२॥

वडभागी से काढीअहि पिआरे संतसंगति जिना वासो ॥ अम्रित नामु अराधीऐ निरमलु मनै होवै परगासो ॥ जनम मरण दुखु काटीऐ पिआरे चूकै जम की काणे ॥ तिना परापति दरसनु नानक जो प्रभ अपणे भाणे ॥३॥

ऊच अपार बेअंत सुआमी कउणु जाणै गुण तेरे ॥ गावते उधरहि सुणते उधरहि बिनसहि पाप घनेरे ॥ पसू परेत मुगध कउ तारे पाहन पारि उतारै ॥ नानक दास तेरी सरणाई सदा सदा बलिहारै ॥४॥१॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 802) बिलावलु महला ५ ॥
बिखै बनु फीका तिआगि री सखीए नामु महा रसु पीओ ॥ बिनु रस चाखे बुडि गई सगली सुखी न होवत जीओ ॥ मानु महतु न सकति ही काई साधा दासी थीओ ॥ नानक से दरि सोभावंते जो प्रभि अपुनै कीओ ॥१॥

हरिचंदउरी चित भ्रमु सखीए म्रिग त्रिसना द्रुम छाइआ ॥ चंचलि संगि न चालती सखीए अंति तजि जावत माइआ ॥ रसि भोगण अति रूप रस माते इन संगि सूखु न पाइआ ॥ धंनि धंनि हरि साध जन सखीए नानक जिनी नामु धिआइआ ॥२॥

जाइ बसहु वडभागणी सखीए संता संगि समाईऐ ॥ तह दूख न भूख न रोगु बिआपै चरन कमल लिव लाईऐ ॥ तह जनम न मरणु न आवण जाणा निहचलु सरणी पाईऐ ॥ प्रेम बिछोहु न मोहु बिआपै नानक हरि एकु धिआईऐ ॥३॥

द्रिसटि धारि मनु बेधिआ पिआरे रतड़े सहजि सुभाए ॥ सेज सुहावी संगि मिलि प्रीतम अनद मंगल गुण गाए ॥ सखी सहेली राम रंगि राती मन तन इछ पुजाए ॥ नानक अचरजु अचरज सिउ मिलिआ कहणा कछू न जाए ॥४॥२॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 803) रागु बिलावलु महला ५ घरु ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एक रूप सगलो पासारा ॥ आपे बनजु आपि बिउहारा ॥१॥

ऐसो गिआनु बिरलो ई पाए ॥ जत जत जाईऐ तत द्रिसटाए ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक रंग निरगुन इक रंगा ॥ आपे जलु आप ही तरंगा ॥२॥

आप ही मंदरु आपहि सेवा ॥ आप ही पूजारी आप ही देवा ॥३॥

आपहि जोग आप ही जुगता ॥ नानक के प्रभ सद ही मुकता ॥४॥१॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 803) बिलावलु महला ५ ॥
आपि उपावन आपि सधरना ॥ आपि करावन दोसु न लैना ॥१॥

आपन बचनु आप ही करना ॥ आपन बिभउ आप ही जरना ॥१॥ रहाउ ॥

आप ही मसटि आप ही बुलना ॥ आप ही अछलु न जाई छलना ॥२॥

आप ही गुपत आपि परगटना ॥ आप ही घटि घटि आपि अलिपना ॥३॥

आपे अविगतु आप संगि रचना ॥ कहु नानक प्रभ के सभि जचना ॥४॥२॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 803) बिलावलु महला ५ ॥
भूले मारगु जिनहि बताइआ ॥ ऐसा गुरु वडभागी पाइआ ॥१॥

सिमरि मना राम नामु चितारे ॥ बसि रहे हिरदै गुर चरन पिआरे ॥१॥ रहाउ ॥

कामि क्रोधि लोभि मोहि मनु लीना ॥ बंधन काटि मुकति गुरि कीना ॥२॥

दुख सुख करत जनमि फुनि मूआ ॥ चरन कमल गुरि आस्रमु दीआ ॥३॥

अगनि सागर बूडत संसारा ॥ नानक बाह पकरि सतिगुरि निसतारा ॥४॥३॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 804) बिलावलु महला ५ ॥
तनु मनु धनु अरपउ सभु अपना ॥ कवन सु मति जितु हरि हरि जपना ॥१॥

करि आसा आइओ प्रभ मागनि ॥ तुम्ह पेखत सोभा मेरै आगनि ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक जुगति करि बहुतु बीचारउ ॥ साधसंगि इसु मनहि उधारउ ॥२॥

मति बुधि सुरति नाही चतुराई ॥ ता मिलीऐ जा लए मिलाई ॥३॥

नैन संतोखे प्रभ दरसनु पाइआ ॥ कहु नानक सफलु सो आइआ ॥४॥४॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 804) बिलावलु महला ५ ॥
मात पिता सुत साथि न माइआ ॥ साधसंगि सभु दूखु मिटाइआ ॥१॥

रवि रहिआ प्रभु सभ महि आपे ॥ हरि जपु रसना दुखु न विआपे ॥१॥ रहाउ ॥

तिखा भूख बहु तपति विआपिआ ॥ सीतल भए हरि हरि जसु जापिआ ॥२॥

कोटि जतन संतोखु न पाइआ ॥ मनु त्रिपताना हरि गुण गाइआ ॥३॥

देहु भगति प्रभ अंतरजामी ॥ नानक की बेनंती सुआमी ॥४॥५॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 804) बिलावलु महला ५ ॥
गुरु पूरा वडभागी पाईऐ ॥ मिलि साधू हरि नामु धिआईऐ ॥१॥

पारब्रहम प्रभ तेरी सरना ॥ किलबिख काटै भजु गुर के चरना ॥१॥ रहाउ ॥

अवरि करम सभि लोकाचार ॥ मिलि साधू संगि होइ उधार ॥२॥

सिम्रिति सासत बेद बीचारे ॥ जपीऐ नामु जितु पारि उतारे ॥३॥

जन नानक कउ प्रभ किरपा करीऐ ॥ साधू धूरि मिलै निसतरीऐ ॥४॥६॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 804) बिलावलु महला ५ ॥
गुर का सबदु रिदे महि चीना ॥ सगल मनोरथ पूरन आसीना ॥१॥

संत जना का मुखु ऊजलु कीना ॥ करि किरपा अपुना नामु दीना ॥१॥ रहाउ ॥

अंध कूप ते करु गहि लीना ॥ जै जै कारु जगति प्रगटीना ॥२॥

नीचा ते ऊच ऊन पूरीना ॥ अम्रित नामु महा रसु लीना ॥३॥

मन तन निरमल पाप जलि खीना ॥ कहु नानक प्रभ भए प्रसीना ॥४॥७॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 804) बिलावलु महला ५ ॥
सगल मनोरथ पाईअहि मीता ॥ चरन कमल सिउ लाईऐ चीता ॥१॥

हउ बलिहारी जो प्रभू धिआवत ॥ जलनि बुझै हरि हरि गुन गावत ॥१॥ रहाउ ॥

सफल जनमु होवत वडभागी ॥ साधसंगि रामहि लिव लागी ॥२॥

मति पति धनु सुख सहज अनंदा ॥ इक निमख न विसरहु परमानंदा ॥३॥

हरि दरसन की मनि पिआस घनेरी ॥ भनति नानक सरणि प्रभ तेरी ॥४॥८॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 805) बिलावलु महला ५ ॥
मोहि निरगुन सभ गुणह बिहूना ॥ दइआ धारि अपुना करि लीना ॥१॥

मेरा मनु तनु हरि गोपालि सुहाइआ ॥ करि किरपा प्रभु घर महि आइआ ॥१॥ रहाउ ॥

भगति वछल भै काटनहारे ॥ संसार सागर अब उतरे पारे ॥२॥

पतित पावन प्रभ बिरदु बेदि लेखिआ ॥ पारब्रहमु सो नैनहु पेखिआ ॥३॥

साधसंगि प्रगटे नाराइण ॥ नानक दास सभि दूख पलाइण ॥४॥९॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 805) बिलावलु महला ५ ॥
कवनु जानै प्रभ तुम्हरी सेवा ॥ प्रभ अविनासी अलख अभेवा ॥१॥

गुण बेअंत प्रभ गहिर ग्मभीरे ॥ ऊच महल सुआमी प्रभ मेरे ॥ तू अपर्मपर ठाकुर मेरे ॥१॥ रहाउ ॥

एकस बिनु नाही को दूजा ॥ तुम्ह ही जानहु अपनी पूजा ॥२॥

आपहु कछू न होवत भाई ॥ जिसु प्रभु देवै सो नामु पाई ॥३॥

कहु नानक जो जनु प्रभ भाइआ ॥ गुण निधान प्रभु तिन ही पाइआ ॥४॥१०॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 805) बिलावलु महला ५ ॥
मात गरभ महि हाथ दे राखिआ ॥ हरि रसु छोडि बिखिआ फलु चाखिआ ॥१॥

भजु गोबिद सभ छोडि जंजाल ॥ जब जमु आइ संघारै मूड़े तब तनु बिनसि जाइ बेहाल ॥१॥ रहाउ ॥

तनु मनु धनु अपना करि थापिआ ॥ करनहारु इक निमख न जापिआ ॥२॥

महा मोह अंध कूप परिआ ॥ पारब्रहमु माइआ पटलि बिसरिआ ॥३॥

वडै भागि प्रभ कीरतनु गाइआ ॥ संतसंगि नानक प्रभु पाइआ ॥४॥११॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 805) बिलावलु महला ५ ॥
मात पिता सुत बंधप भाई ॥ नानक होआ पारब्रहमु सहाई ॥१॥

सूख सहज आनंद घणे ॥ गुरु पूरा पूरी जा की बाणी अनिक गुणा जा के जाहि न गणे ॥१॥ रहाउ ॥

सगल सरंजाम करे प्रभु आपे ॥ भए मनोरथ सो प्रभु जापे ॥२॥

अरथ धरम काम मोख का दाता ॥ पूरी भई सिमरि सिमरि बिधाता ॥३॥

साधसंगि नानकि रंगु माणिआ ॥ घरि आइआ पूरै गुरि आणिआ ॥४॥१२॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 806) बिलावलु महला ५ ॥
स्रब निधान पूरन गुरदेव ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि नामु जपत नर जीवे ॥ मरि खुआरु साकत नर थीवे ॥१॥

राम नामु होआ रखवारा ॥ झख मारउ साकतु वेचारा ॥२॥

निंदा करि करि पचहि घनेरे ॥ मिरतक फास गलै सिरि पैरे ॥३॥

कहु नानक जपहि जन नाम ॥ ता के निकटि न आवै जाम ॥४॥१३॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 806) रागु बिलावलु महला ५ घरु ४ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कवन संजोग मिलउ प्रभ अपने ॥ पलु पलु निमख सदा हरि जपने ॥१॥

चरन कमल प्रभ के नित धिआवउ ॥ कवन सु मति जितु प्रीतमु पावउ ॥१॥ रहाउ ॥

ऐसी क्रिपा करहु प्रभ मेरे ॥ हरि नानक बिसरु न काहू बेरे ॥२॥१॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 806) बिलावलु महला ५ ॥
चरन कमल प्रभ हिरदै धिआए ॥ रोग गए सगले सुख पाए ॥१॥

गुरि दुखु काटिआ दीनो दानु ॥ सफल जनमु जीवन परवानु ॥१॥ रहाउ ॥

अकथ कथा अम्रित प्रभ बानी ॥ कहु नानक जपि जीवे गिआनी ॥२॥२॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 806) बिलावलु महला ५ ॥
सांति पाई गुरि सतिगुरि पूरे ॥ सुख उपजे बाजे अनहद तूरे ॥१॥ रहाउ ॥

ताप पाप संताप बिनासे ॥ हरि सिमरत किलविख सभि नासे ॥१॥

अनदु करहु मिलि सुंदर नारी ॥ गुरि नानकि मेरी पैज सवारी ॥२॥३॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 806) बिलावलु महला ५ ॥
ममता मोह ध्रोह मदि माता बंधनि बाधिआ अति बिकराल ॥ दिनु दिनु छिजत बिकार करत अउध फाही फाथा जम कै जाल ॥१॥

तेरी सरणि प्रभ दीन दइआला ॥ महा बिखम सागरु अति भारी उधरहु साधू संगि रवाला ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभ सुखदाते समरथ सुआमी जीउ पिंडु सभु तुमरा माल ॥ भ्रम के बंधन काटहु परमेसर नानक के प्रभ सदा क्रिपाल ॥२॥४॥२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 806) बिलावलु महला ५ ॥
सगल अनंदु कीआ परमेसरि अपणा बिरदु सम्हारिआ ॥ साध जना होए किरपाला बिगसे सभि परवारिआ ॥१॥

कारजु सतिगुरि आपि सवारिआ ॥ वडी आरजा हरि गोबिंद की सूख मंगल कलिआण बीचारिआ ॥१॥ रहाउ ॥

वण त्रिण त्रिभवण हरिआ होए सगले जीअ साधारिआ ॥ मन इछे नानक फल पाए पूरन इछ पुजारिआ ॥२॥५॥२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 807) बिलावलु महला ५ ॥
जिसु ऊपरि होवत दइआलु ॥ हरि सिमरत काटै सो कालु ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि भजीऐ गोपालु ॥ गुन गावत तूटै जम जालु ॥१॥

आपे सतिगुरु आपे प्रतिपाल ॥ नानकु जाचै साध रवाल ॥२॥६॥२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 807) बिलावलु महला ५ ॥
मन महि सिंचहु हरि हरि नाम ॥ अनदिनु कीरतनु हरि गुण गाम ॥१॥

ऐसी प्रीति करहु मन मेरे ॥ आठ पहर प्रभ जानहु नेरे ॥१॥ रहाउ ॥

कहु नानक जा के निरमल भाग ॥ हरि चरनी ता का मनु लाग ॥२॥७॥२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 807) बिलावलु महला ५ ॥
रोगु गइआ प्रभि आपि गवाइआ ॥ नीद पई सुख सहज घरु आइआ ॥१॥ रहाउ ॥

रजि रजि भोजनु खावहु मेरे भाई ॥ अम्रित नामु रिद माहि धिआई ॥१॥

नानक गुर पूरे सरनाई ॥ जिनि अपने नाम की पैज रखाई ॥२॥८॥२६॥


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