Pt 2 - राग बिहागड़ा - बाणी शब्द, Part 2 - Raag Bihagra - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अमरदास जी -- SGGS 549) सलोक मः ३ ॥
मनि परतीति न आईआ सहजि न लगो भाउ ॥ सबदै सादु न पाइओ मनहठि किआ गुण गाइ ॥ नानक आइआ सो परवाणु है जि गुरमुखि सचि समाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 549) मः ३ ॥
आपणा आपु न पछाणै मूड़ा अवरा आखि दुखाए ॥ मुंढै दी खसलति न गईआ अंधे विछुड़ि चोटा खाए ॥ सतिगुर कै भै भंनि न घड़िओ रहै अंकि समाए ॥ अनदिनु सहसा कदे न चूकै बिनु सबदै दुखु पाए ॥ कामु क्रोधु लोभु अंतरि सबला नित धंधा करत विहाए ॥ चरण कर देखत सुणि थके दिह मुके नेड़ै आए ॥ सचा नामु न लगो मीठा जितु नामि नव निधि पाए ॥ जीवतु मरै मरै फुनि जीवै तां मोखंतरु पाए ॥ धुरि करमु न पाइओ पराणी विणु करमा किआ पाए ॥ गुर का सबदु समालि तू मूड़े गति मति सबदे पाए ॥ नानक सतिगुरु तद ही पाए जां विचहु आपु गवाए ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 550) पउड़ी ॥
जिस दै चिति वसिआ मेरा सुआमी तिस नो किउ अंदेसा किसै गलै दा लोड़ीऐ ॥ हरि सुखदाता सभना गला का तिस नो धिआइदिआ किव निमख घड़ी मुहु मोड़ीऐ ॥ जिनि हरि धिआइआ तिस नो सरब कलिआण होए नित संत जना की संगति जाइ बहीऐ मुहु जोड़ीऐ ॥ सभि दुख भुख रोग गए हरि सेवक के सभि जन के बंधन तोड़ीऐ ॥ हरि किरपा ते होआ हरि भगतु हरि भगत जना कै मुहि डिठै जगतु तरिआ सभु लोड़ीऐ ॥४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 550) सलोक मः ३ ॥
सा रसना जलि जाउ जिनि हरि का सुआउ न पाइआ ॥ नानक रसना सबदि रसाइ जिनि हरि हरि मंनि वसाइआ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 550) मः ३ ॥
सा रसना जलि जाउ जिनि हरि का नाउ विसारिआ ॥ नानक गुरमुखि रसना हरि जपै हरि कै नाइ पिआरिआ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 550) पउड़ी ॥
हरि आपे ठाकुरु सेवकु भगतु हरि आपे करे कराए ॥ हरि आपे वेखै विगसै आपे जितु भावै तितु लाए ॥ हरि इकना मारगि पाए आपे हरि इकना उझड़ि पाए ॥ हरि सचा साहिबु सचु तपावसु करि वेखै चलत सबाए ॥ गुर परसादि कहै जनु नानकु हरि सचे के गुण गाए ॥५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 550) सलोक मः ३ ॥
दरवेसी को जाणसी विरला को दरवेसु ॥ जे घरि घरि हंढै मंगदा धिगु जीवणु धिगु वेसु ॥ जे आसा अंदेसा तजि रहै गुरमुखि भिखिआ नाउ ॥ तिस के चरन पखालीअहि नानक हउ बलिहारै जाउ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 550) मः ३ ॥
नानक तरवरु एकु फलु दुइ पंखेरू आहि ॥ आवत जात न दीसही ना पर पंखी ताहि ॥ बहु रंगी रस भोगिआ सबदि रहै निरबाणु ॥ हरि रसि फलि राते नानका करमि सचा नीसाणु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 550) पउड़ी ॥
आपे धरती आपे है राहकु आपि जमाइ पीसावै ॥ आपि पकावै आपि भांडे देइ परोसै आपे ही बहि खावै ॥ आपे जलु आपे दे छिंगा आपे चुली भरावै ॥ आपे संगति सदि बहालै आपे विदा करावै ॥ जिस नो किरपालु होवै हरि आपे तिस नो हुकमु मनावै ॥६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 551) सलोक मः ३ ॥
करम धरम सभि बंधना पाप पुंन सनबंधु ॥ ममता मोहु सु बंधना पुत्र कलत्र सु धंधु ॥ जह देखा तह जेवरी माइआ का सनबंधु ॥ नानक सचे नाम बिनु वरतणि वरतै अंधु ॥१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 551) मः ४ ॥
अंधे चानणु ता थीऐ जा सतिगुरु मिलै रजाइ ॥ बंधन तोड़ै सचि वसै अगिआनु अधेरा जाइ ॥ सभु किछु देखै तिसै का जिनि कीआ तनु साजि ॥ नानक सरणि करतार की करता राखै लाज ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 551) पउड़ी ॥
जदहु आपे थाटु कीआ बहि करतै तदहु पुछि न सेवकु बीआ ॥ तदहु किआ को लेवै किआ को देवै जां अवरु न दूजा कीआ ॥ फिरि आपे जगतु उपाइआ करतै दानु सभना कउ दीआ ॥ आपे सेव बणाईअनु गुरमुखि आपे अम्रितु पीआ ॥ आपि निरंकार आकारु है आपे आपे करै सु थीआ ॥७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 551) सलोक मः ३ ॥
गुरमुखि प्रभु सेवहि सद साचा अनदिनु सहजि पिआरि ॥ सदा अनंदि गावहि गुण साचे अरधि उरधि उरि धारि ॥ अंतरि प्रीतमु वसिआ धुरि करमु लिखिआ करतारि ॥ नानक आपि मिलाइअनु आपे किरपा धारि ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 551) मः ३ ॥
कहिऐ कथिऐ न पाईऐ अनदिनु रहै सदा गुण गाइ ॥ विणु करमै किनै न पाइओ भउकि मुए बिललाइ ॥ गुर कै सबदि मनु तनु भिजै आपि वसै मनि आइ ॥ नानक नदरी पाईऐ आपे लए मिलाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 551) पउड़ी ॥
आपे वेद पुराण सभि सासत आपि कथै आपि भीजै ॥ आपे ही बहि पूजे करता आपि परपंचु करीजै ॥ आपि परविरति आपि निरविरती आपे अकथु कथीजै ॥ आपे पुंनु सभु आपि कराए आपि अलिपतु वरतीजै ॥ आपे सुखु दुखु देवै करता आपे बखस करीजै ॥८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 551) सलोक मः ३ ॥
सेखा अंदरहु जोरु छडि तू भउ करि झलु गवाइ ॥ गुर कै भै केते निसतरे भै विचि निरभउ पाइ ॥ मनु कठोरु सबदि भेदि तूं सांति वसै मनि आइ ॥ सांती विचि कार कमावणी सा खसमु पाए थाइ ॥ नानक कामि क्रोधि किनै न पाइओ पुछहु गिआनी जाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 551) मः ३ ॥
मनमुख माइआ मोहु है नामि न लगो पिआरु ॥ कूड़ु कमावै कूड़ु संग्रहै कूड़ु करे आहारु ॥ बिखु माइआ धनु संचि मरहि अंते होइ सभु छारु ॥ करम धरम सुच संजम करहि अंतरि लोभु विकारु ॥ नानक जि मनमुखु कमावै सु थाइ ना पवै दरगहि होइ खुआरु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 552) पउड़ी ॥
आपे खाणी आपे बाणी आपे खंड वरभंड करे ॥ आपि समुंदु आपि है सागरु आपे ही विचि रतन धरे ॥ आपि लहाए करे जिसु किरपा जिस नो गुरमुखि करे हरे ॥ आपे भउजलु आपि है बोहिथा आपे खेवटु आपि तरे ॥ आपे करे कराए करता अवरु न दूजा तुझै सरे ॥९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 552) सलोक मः ३ ॥
सतिगुर की सेवा सफल है जे को करे चितु लाइ ॥ नामु पदारथु पाईऐ अचिंतु वसै मनि आइ ॥ जनम मरन दुखु कटीऐ हउमै ममता जाइ ॥ उतम पदवी पाईऐ सचे रहै समाइ ॥ नानक पूरबि जिन कउ लिखिआ तिना सतिगुरु मिलिआ आइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 552) मः ३ ॥
नामि रता सतिगुरू है कलिजुग बोहिथु होइ ॥ गुरमुखि होवै सु पारि पवै जिना अंदरि सचा सोइ ॥ नामु सम्हाले नामु संग्रहै नामे ही पति होइ ॥ नानक सतिगुरु पाइआ करमि परापति होइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 552) पउड़ी ॥
आपे पारसु आपि धातु है आपि कीतोनु कंचनु ॥ आपे ठाकुरु सेवकु आपे आपे ही पाप खंडनु ॥ आपे सभि घट भोगवै सुआमी आपे ही सभु अंजनु ॥ आपि बिबेकु आपि सभु बेता आपे गुरमुखि भंजनु ॥ जनु नानकु सालाहि न रजै तुधु करते तू हरि सुखदाता वडनु ॥१०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 552) सलोकु मः ४ ॥
बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना जेते करम कमाहि ॥ बिनु सतिगुर सेवे ठवर न पावही मरि जमहि आवहि जाहि ॥ बिनु सतिगुर सेवे फिका बोलणा नामु न वसै मनि आइ ॥ नानक बिनु सतिगुर सेवे जम पुरि बधे मारीअहि मुहि कालै उठि जाहि ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 552) मः ३ ॥
इकि सतिगुर की सेवा करहि चाकरी हरि नामे लगै पिआरु ॥ नानक जनमु सवारनि आपणा कुल का करनि उधारु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 552) पउड़ी ॥
आपे चाटसाल आपि है पाधा आपे चाटड़े पड़ण कउ आणे ॥ आपे पिता माता है आपे आपे बालक करे सिआणे ॥ इक थै पड़ि बुझै सभु आपे इक थै आपे करे इआणे ॥ इकना अंदरि महलि बुलाए जा आपि तेरै मनि सचे भाणे ॥ जिना आपे गुरमुखि दे वडिआई से जन सची दरगहि जाणे ॥११॥

(भाई मरदाना जी -- SGGS 553) सलोकु मरदाना १ ॥
कलि कलवाली कामु मदु मनूआ पीवणहारु ॥ क्रोध कटोरी मोहि भरी पीलावा अहंकारु ॥ मजलस कूड़े लब की पी पी होइ खुआरु ॥ करणी लाहणि सतु गुड़ु सचु सरा करि सारु ॥ गुण मंडे करि सीलु घिउ सरमु मासु आहारु ॥ गुरमुखि पाईऐ नानका खाधै जाहि बिकार ॥१॥

(भाई मरदाना जी -- SGGS 553) मरदाना १ ॥
काइआ लाहणि आपु मदु मजलस त्रिसना धातु ॥ मनसा कटोरी कूड़ि भरी पीलाए जमकालु ॥ इतु मदि पीतै नानका बहुते खटीअहि बिकार ॥ गिआनु गुड़ु सालाह मंडे भउ मासु आहारु ॥ नानक इहु भोजनु सचु है सचु नामु आधारु ॥२॥

कांयां लाहणि आपु मदु अम्रित तिस की धार ॥ सतसंगति सिउ मेलापु होइ लिव कटोरी अम्रित भरी पी पी कटहि बिकार ॥३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 553) पउड़ी ॥
आपे सुरि नर गण गंधरबा आपे खट दरसन की बाणी ॥ आपे सिव संकर महेसा आपे गुरमुखि अकथ कहाणी ॥ आपे जोगी आपे भोगी आपे संनिआसी फिरै बिबाणी ॥ आपै नालि गोसटि आपि उपदेसै आपे सुघड़ु सरूपु सिआणी ॥ आपणा चोजु करि वेखै आपे आपे सभना जीआ का है जाणी ॥१२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 553) सलोकु मः ३ ॥
एहा संधिआ परवाणु है जितु हरि प्रभु मेरा चिति आवै ॥ हरि सिउ प्रीति ऊपजै माइआ मोहु जलावै ॥ गुर परसादी दुबिधा मरै मनूआ असथिरु संधिआ करे वीचारु ॥ नानक संधिआ करै मनमुखी जीउ न टिकै मरि जमै होइ खुआरु ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 553) मः ३ ॥
प्रिउ प्रिउ करती सभु जगु फिरी मेरी पिआस न जाइ ॥ नानक सतिगुरि मिलिऐ मेरी पिआस गई पिरु पाइआ घरि आइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 553) पउड़ी ॥
आपे तंतु परम तंतु सभु आपे आपे ठाकुरु दासु भइआ ॥ आपे दस अठ वरन उपाइअनु आपि ब्रहमु आपि राजु लइआ ॥ आपे मारे आपे छोडै आपे बखसे करे दइआ ॥ आपि अभुलु न भुलै कब ही सभु सचु तपावसु सचु थिआ ॥ आपे जिना बुझाए गुरमुखि तिन अंदरहु दूजा भरमु गइआ ॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 553) सलोकु मः ५ ॥
हरि नामु न सिमरहि साधसंगि तै तनि उडै खेह ॥ जिनि कीती तिसै न जाणई नानक फिटु अलूणी देह ॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 554) मः ५ ॥
घटि वसहि चरणारबिंद रसना जपै गुपाल ॥ नानक सो प्रभु सिमरीऐ तिसु देही कउ पालि ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 554) पउड़ी ॥
आपे अठसठि तीरथ करता आपि करे इसनानु ॥ आपे संजमि वरतै स्वामी आपि जपाइहि नामु ॥ आपि दइआलु होइ भउ खंडनु आपि करै सभु दानु ॥ जिस नो गुरमुखि आपि बुझाए सो सद ही दरगहि पाए मानु ॥ जिस दी पैज रखै हरि सुआमी सो सचा हरि जानु ॥१४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 554) सलोकु मः ३ ॥
नानक बिनु सतिगुर भेटे जगु अंधु है अंधे करम कमाइ ॥ सबदै सिउ चितु न लावई जितु सुखु वसै मनि आइ ॥ तामसि लगा सदा फिरै अहिनिसि जलतु बिहाइ ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ कहणा किछू न जाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 554) मः ३ ॥
सतिगुरू फुरमाइआ कारी एह करेहु ॥ गुरू दुआरै होइ कै साहिबु समालेहु ॥ साहिबु सदा हजूरि है भरमै के छउड़ कटि कै अंतरि जोति धरेहु ॥ हरि का नामु अम्रितु है दारू एहु लाएहु ॥ सतिगुर का भाणा चिति रखहु संजमु सचा नेहु ॥ नानक ऐथै सुखै अंदरि रखसी अगै हरि सिउ केल करेहु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 554) पउड़ी ॥
आपे भार अठारह बणसपति आपे ही फल लाए ॥ आपे माली आपि सभु सिंचै आपे ही मुहि पाए ॥ आपे करता आपे भुगता आपे देइ दिवाए ॥ आपे साहिबु आपे है राखा आपे रहिआ समाए ॥ जनु नानक वडिआई आखै हरि करते की जिस नो तिलु न तमाए ॥१५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 554) सलोक मः ३ ॥
माणसु भरिआ आणिआ माणसु भरिआ आइ ॥ जितु पीतै मति दूरि होइ बरलु पवै विचि आइ ॥ आपणा पराइआ न पछाणई खसमहु धके खाइ ॥ जितु पीतै खसमु विसरै दरगह मिलै सजाइ ॥ झूठा मदु मूलि न पीचई जे का पारि वसाइ ॥ नानक नदरी सचु मदु पाईऐ सतिगुरु मिलै जिसु आइ ॥ सदा साहिब कै रंगि रहै महली पावै थाउ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 554) मः ३ ॥
इहु जगतु जीवतु मरै जा इस नो सोझी होइ ॥ जा तिन्हि सवालिआ तां सवि रहिआ जगाए तां सुधि होइ ॥ नानक नदरि करे जे आपणी सतिगुरु मेलै सोइ ॥ गुर प्रसादि जीवतु मरै ता फिरि मरणु न होइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 554) पउड़ी ॥
जिस दा कीता सभु किछु होवै तिस नो परवाह नाही किसै केरी ॥ हरि जीउ तेरा दिता सभु को खावै सभ मुहताजी कढै तेरी ॥ जि तुध नो सालाहे सु सभु किछु पावै जिस नो किरपा निरंजन केरी ॥ सोई साहु सचा वणजारा जिनि वखरु लदिआ हरि नामु धनु तेरी ॥ सभि तिसै नो सालाहिहु संतहु जिनि दूजे भाव की मारि विडारी ढेरी ॥१६॥

(भक्त कबीर जी -- SGGS 555) सलोक ॥
कबीरा मरता मरता जगु मुआ मरि भि न जानै कोइ ॥ ऐसी मरनी जो मरै बहुरि न मरना होइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 555) मः ३ ॥
किआ जाणा किव मरहगे कैसा मरणा होइ ॥ जे करि साहिबु मनहु न वीसरै ता सहिला मरणा होइ ॥ मरणै ते जगतु डरै जीविआ लोड़ै सभु कोइ ॥ गुर परसादी जीवतु मरै हुकमै बूझै सोइ ॥ नानक ऐसी मरनी जो मरै ता सद जीवणु होइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 555) पउड़ी ॥
जा आपि क्रिपालु होवै हरि सुआमी ता आपणां नाउ हरि आपि जपावै ॥ आपे सतिगुरु मेलि सुखु देवै आपणां सेवकु आपि हरि भावै ॥ आपणिआ सेवका की आपि पैज रखै आपणिआ भगता की पैरी पावै ॥ धरम राइ है हरि का कीआ हरि जन सेवक नेड़ि न आवै ॥ जो हरि का पिआरा सो सभना का पिआरा होर केती झखि झखि आवै जावै ॥१७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 555) सलोक मः ३ ॥
रामु रामु करता सभु जगु फिरै रामु न पाइआ जाइ ॥ अगमु अगोचरु अति वडा अतुलु न तुलिआ जाइ ॥ कीमति किनै न पाईआ कितै न लइआ जाइ ॥ गुर कै सबदि भेदिआ इन बिधि वसिआ मनि आइ ॥ नानक आपि अमेउ है गुर किरपा ते रहिआ समाइ ॥ आपे मिलिआ मिलि रहिआ आपे मिलिआ आइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 555) मः ३ ॥
ए मन इहु धनु नामु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥ तोटा मूलि न आवई लाहा सद ही होइ ॥ खाधै खरचिऐ तोटि न आवई सदा सदा ओहु देइ ॥ सहसा मूलि न होवई हाणत कदे न होइ ॥ नानक गुरमुखि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 555) पउड़ी ॥
आपे सभ घट अंदरे आपे ही बाहरि ॥ आपे गुपतु वरतदा आपे ही जाहरि ॥ जुग छतीह गुबारु करि वरतिआ सुंनाहरि ॥ ओथै वेद पुरान न सासता आपे हरि नरहरि ॥ बैठा ताड़ी लाइ आपि सभ दू ही बाहरि ॥ आपणी मिति आपि जाणदा आपे ही गउहरु ॥१८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 555) सलोक मः ३ ॥
हउमै विचि जगतु मुआ मरदो मरदा जाइ ॥ जिचरु विचि दमु है तिचरु न चेतई कि करेगु अगै जाइ ॥ गिआनी होइ सु चेतंनु होइ अगिआनी अंधु कमाइ ॥ नानक एथै कमावै सो मिलै अगै पाए जाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 556) मः ३ ॥
धुरि खसमै का हुकमु पइआ विणु सतिगुर चेतिआ न जाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ अंतरि रवि रहिआ सदा रहिआ लिव लाइ ॥ दमि दमि सदा समालदा दमु न बिरथा जाइ ॥ जनम मरन का भउ गइआ जीवन पदवी पाइ ॥ नानक इहु मरतबा तिस नो देइ जिस नो किरपा करे रजाइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 556) पउड़ी ॥
आपे दानां बीनिआ आपे परधानां ॥ आपे रूप दिखालदा आपे लाइ धिआनां ॥ आपे मोनी वरतदा आपे कथै गिआनां ॥ कउड़ा किसै न लगई सभना ही भाना ॥ उसतति बरनि न सकीऐ सद सद कुरबाना ॥१९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 556) सलोक मः १ ॥
कली अंदरि नानका जिंनां दा अउतारु ॥ पुतु जिनूरा धीअ जिंनूरी जोरू जिंना दा सिकदारु ॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 556) मः १ ॥
हिंदू मूले भूले अखुटी जांही ॥ नारदि कहिआ सि पूज करांही ॥ अंधे गुंगे अंध अंधारु ॥ पाथरु ले पूजहि मुगध गवार ॥ ओहि जा आपि डुबे तुम कहा तरणहारु ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 556) पउड़ी ॥
सभु किहु तेरै वसि है तू सचा साहु ॥ भगत रते रंगि एक कै पूरा वेसाहु ॥ अम्रितु भोजनु नामु हरि रजि रजि जन खाहु ॥ सभि पदारथ पाईअनि सिमरणु सचु लाहु ॥ संत पिआरे पारब्रहम नानक हरि अगम अगाहु ॥२०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 556) सलोक मः ३ ॥
सभु किछु हुकमे आवदा सभु किछु हुकमे जाइ ॥ जे को मूरखु आपहु जाणै अंधा अंधु कमाइ ॥ नानक हुकमु को गुरमुखि बुझै जिस नो किरपा करे रजाइ ॥१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 556) मः ३ ॥
सो जोगी जुगति सो पाए जिस नो गुरमुखि नामु परापति होइ ॥ तिसु जोगी की नगरी सभु को वसै भेखी जोगु न होइ ॥ नानक ऐसा विरला को जोगी जिसु घटि परगटु होइ ॥२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 556) पउड़ी ॥
आपे जंत उपाइअनु आपे आधारु ॥ आपे सूखमु भालीऐ आपे पासारु ॥ आपि इकाती होइ रहै आपे वड परवारु ॥ नानकु मंगै दानु हरि संता रेनारु ॥ होरु दातारु न सुझई तू देवणहारु ॥२१॥१॥ सुधु ॥


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