राग आसावरी - बाणी शब्द, Raag Asavari - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


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(गुरू रामदास जी -- SGGS 369) रागु आसावरी घरु १६ के २ महला ४ सुधंग
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हउ अनदिनु हरि नामु कीरतनु करउ ॥ सतिगुरि मो कउ हरि नामु बताइआ हउ हरि बिनु खिनु पलु रहि न सकउ ॥१॥ रहाउ ॥

हमरै स्रवणु सिमरनु हरि कीरतनु हउ हरि बिनु रहि न सकउ हउ इकु खिनु ॥ जैसे हंसु सरवर बिनु रहि न सकै तैसे हरि जनु किउ रहै हरि सेवा बिनु ॥१॥

किनहूं प्रीति लाई दूजा भाउ रिद धारि किनहूं प्रीति लाई मोह अपमान ॥ हरि जन प्रीति लाई हरि निरबाण पद नानक सिमरत हरि हरि भगवान ॥२॥१४॥६६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 369) आसावरी महला ४ ॥
माई मोरो प्रीतमु रामु बतावहु री माई ॥ हउ हरि बिनु खिनु पलु रहि न सकउ जैसे करहलु बेलि रीझाई ॥१॥ रहाउ ॥

हमरा मनु बैराग बिरकतु भइओ हरि दरसन मीत कै ताई ॥ जैसे अलि कमला बिनु रहि न सकै तैसे मोहि हरि बिनु रहनु न जाई ॥१॥

राखु सरणि जगदीसुर पिआरे मोहि सरधा पूरि हरि गुसाई ॥ जन नानक कै मनि अनदु होत है हरि दरसनु निमख दिखाई ॥२॥३९॥१३॥१५॥६७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 409) आसावरी महला ५ ॥
मनसा एक मानि हां ॥ गुर सिउ नेत धिआनि हां ॥ द्रिड़ु संत मंत गिआनि हां ॥ सेवा गुर चरानि हां ॥ तउ मिलीऐ गुर क्रिपानि मेरे मना ॥१॥ रहाउ ॥

टूटे अन भरानि हां ॥ रविओ सरब थानि हां ॥ लहिओ जम भइआनि हां ॥ पाइओ पेड थानि हां ॥ तउ चूकी सगल कानि ॥१॥

लहनो जिसु मथानि हां ॥ भै पावक पारि परानि हां ॥ निज घरि तिसहि थानि हां ॥ हरि रस रसहि मानि हां ॥ लाथी तिस भुखानि हां ॥ नानक सहजि समाइओ रे मना ॥२॥२॥१५८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 409) आसावरी महला ५ ॥
हरि हरि हरि गुनी हां ॥ जपीऐ सहज धुनी हां ॥ साधू रसन भनी हां ॥ छूटन बिधि सुनी हां ॥ पाईऐ वड पुनी मेरे मना ॥१॥ रहाउ ॥

खोजहि जन मुनी हां ॥ स्रब का प्रभ धनी हां ॥ दुलभ कलि दुनी हां ॥ दूख बिनासनी हां ॥ प्रभ पूरन आसनी मेरे मना ॥१॥

मन सो सेवीऐ हां ॥ अलख अभेवीऐ हां ॥ तां सिउ प्रीति करि हां ॥ बिनसि न जाइ मरि हां ॥ गुर ते जानिआ हां ॥ नानक मनु मानिआ मेरे मना ॥२॥३॥१५९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 410) आसावरी महला ५ ॥
एका ओट गहु हां ॥ गुर का सबदु कहु हां ॥ आगिआ सति सहु हां ॥ मनहि निधानु लहु हां ॥ सुखहि समाईऐ मेरे मना ॥१॥ रहाउ ॥

जीवत जो मरै हां ॥ दुतरु सो तरै हां ॥ सभ की रेनु होइ हां ॥ निरभउ कहउ सोइ हां ॥ मिटे अंदेसिआ हां ॥ संत उपदेसिआ मेरे मना ॥१॥

जिसु जन नाम सुखु हां ॥ तिसु निकटि न कदे दुखु हां ॥ जो हरि हरि जसु सुने हां ॥ सभु को तिसु मंने हां ॥ सफलु सु आइआ हां ॥ नानक प्रभ भाइआ मेरे मना ॥२॥४॥१६०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 410) आसावरी महला ५ ॥
मिलि हरि जसु गाईऐ हां ॥ परम पदु पाईऐ हां ॥ उआ रस जो बिधे हां ॥ ता कउ सगल सिधे हां ॥ अनदिनु जागिआ हां ॥ नानक बडभागिआ मेरे मना ॥१॥ रहाउ ॥

संत पग धोईऐ हां ॥ दुरमति खोईऐ हां ॥ दासह रेनु होइ हां ॥ बिआपै दुखु न कोइ हां ॥ भगतां सरनि परु हां ॥ जनमि न कदे मरु हां ॥ असथिरु से भए हां ॥ हरि हरि जिन्ह जपि लए मेरे मना ॥१॥

साजनु मीतु तूं हां ॥ नामु द्रिड़ाइ मूं हां ॥ तिसु बिनु नाहि कोइ हां ॥ मनहि अराधि सोइ हां ॥ निमख न वीसरै हां ॥ तिसु बिनु किउ सरै हां ॥ गुर कउ कुरबानु जाउ हां ॥ नानकु जपे नाउ मेरे मना ॥२॥५॥१६१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 410) आसावरी महला ५ ॥
कारन करन तूं हां ॥ अवरु ना सुझै मूं हां ॥ करहि सु होईऐ हां ॥ सहजि सुखि सोईऐ हां ॥ धीरज मनि भए हां ॥ प्रभ कै दरि पए मेरे मना ॥१॥ रहाउ ॥

साधू संगमे हां ॥ पूरन संजमे हां ॥ जब ते छुटे आप हां ॥ तब ते मिटे ताप हां ॥ किरपा धारीआ हां ॥ पति रखु बनवारीआ मेरे मना ॥१॥

इहु सुखु जानीऐ हां ॥ हरि करे सु मानीऐ हां ॥ मंदा नाहि कोइ हां ॥ संत की रेन होइ हां ॥ आपे जिसु रखै हां ॥ हरि अम्रितु सो चखै मेरे मना ॥२॥

जिस का नाहि कोइ हां ॥ तिस का प्रभू सोइ हां ॥ अंतरगति बुझै हां ॥ सभु किछु तिसु सुझै हां ॥ पतित उधारि लेहु हां ॥ नानक अरदासि एहु मेरे मना ॥३॥६॥१६२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 410) आसावरी महला ५ इकतुका ॥
ओइ परदेसीआ हां ॥ सुनत संदेसिआ हां ॥१॥ रहाउ ॥

जा सिउ रचि रहे हां ॥ सभ कउ तजि गए हां ॥ सुपना जिउ भए हां ॥ हरि नामु जिन्हि लए ॥१॥

हरि तजि अन लगे हां ॥ जनमहि मरि भगे हां ॥ हरि हरि जनि लहे हां ॥ जीवत से रहे हां ॥ जिसहि क्रिपालु होइ हां ॥ नानक भगतु सोइ ॥२॥७॥१६३॥२३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 431) आसावरी महला ५ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन हरि सिउ लागी प्रीति ॥ साधसंगि हरि हरि जपत निरमल साची रीति ॥१॥ रहाउ ॥

दरसन की पिआस घणी चितवत अनिक प्रकार ॥ करहु अनुग्रहु पारब्रहम हरि किरपा धारि मुरारि ॥१॥

मनु परदेसी आइआ मिलिओ साध कै संगि ॥ जिसु वखर कउ चाहता सो पाइओ नामहि रंगि ॥२॥

जेते माइआ रंग रस बिनसि जाहि खिन माहि ॥ भगत रते तेरे नाम सिउ सुखु भुंचहि सभ ठाइ ॥३॥

सभु जगु चलतउ पेखीऐ निहचलु हरि को नाउ ॥ करि मित्राई साध सिउ निहचलु पावहि ठाउ ॥४॥

मीत साजन सुत बंधपा कोऊ होत न साथ ॥ एकु निवाहू राम नाम दीना का प्रभु नाथ ॥५॥

चरन कमल बोहिथ भए लगि सागरु तरिओ तेह ॥ भेटिओ पूरा सतिगुरू साचा प्रभ सिउ नेह ॥६॥

साध तेरे की जाचना विसरु न सासि गिरासि ॥ जो तुधु भावै सो भला तेरै भाणै कारज रासि ॥७॥

सुख सागर प्रीतम मिले उपजे महा अनंद ॥ कहु नानक सभ दुख मिटे प्रभ भेटे परमानंद ॥८॥१॥२॥


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