Pt 5 - राग आसा - बाणी शब्द, Part 5 - Raag Asa - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 393) आसा महला ५ दुपदा १ ॥
साधू संगि सिखाइओ नामु ॥ सरब मनोरथ पूरन काम ॥ बुझि गई त्रिसना हरि जसहि अघाने ॥ जपि जपि जीवा सारिगपाने ॥१॥

करन करावन सरनि परिआ ॥ गुर परसादि सहज घरु पाइआ मिटिआ अंधेरा चंदु चड़िआ ॥१॥ रहाउ ॥

लाल जवेहर भरे भंडार ॥ तोटि न आवै जपि निरंकार ॥ अम्रित सबदु पीवै जनु कोइ ॥ नानक ता की परम गति होइ ॥२॥४१॥९२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 394) आसा घरु ७ महला ५ ॥
हरि का नामु रिदै नित धिआई ॥ संगी साथी सगल तरांई ॥१॥

गुरु मेरै संगि सदा है नाले ॥ सिमरि सिमरि तिसु सदा सम्हाले ॥१॥ रहाउ ॥

तेरा कीआ मीठा लागै ॥ हरि नामु पदारथु नानकु मांगै ॥२॥४२॥९३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 394) आसा महला ५ ॥
साधू संगति तरिआ संसारु ॥ हरि का नामु मनहि आधारु ॥१॥

चरन कमल गुरदेव पिआरे ॥ पूजहि संत हरि प्रीति पिआरे ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै मसतकि लिखिआ भागु ॥ कहु नानक ता का थिरु सोहागु ॥२॥४३॥९४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 394) आसा महला ५ ॥
मीठी आगिआ पिर की लागी ॥ सउकनि घर की कंति तिआगी ॥ प्रिअ सोहागनि सीगारि करी ॥ मन मेरे की तपति हरी ॥१॥

भलो भइओ प्रिअ कहिआ मानिआ ॥ सूखु सहजु इसु घर का जानिआ ॥ रहाउ ॥

हउ बंदी प्रिअ खिजमतदार ॥ ओहु अबिनासी अगम अपार ॥ ले पखा प्रिअ झलउ पाए ॥ भागि गए पंच दूत लावे ॥२॥

ना मै कुलु ना सोभावंत ॥ किआ जाना किउ भानी कंत ॥ मोहि अनाथ गरीब निमानी ॥ कंत पकरि हम कीनी रानी ॥३॥

जब मुखि प्रीतमु साजनु लागा ॥ सूख सहज मेरा धनु सोहागा ॥ कहु नानक मोरी पूरन आसा ॥ सतिगुर मेली प्रभ गुणतासा ॥४॥१॥९५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 394) आसा महला ५ ॥
माथै त्रिकुटी द्रिसटि करूरि ॥ बोलै कउड़ा जिहबा की फूड़ि ॥ सदा भूखी पिरु जानै दूरि ॥१॥

ऐसी इसत्री इक रामि उपाई ॥ उनि सभु जगु खाइआ हम गुरि राखे मेरे भाई ॥ रहाउ ॥

पाइ ठगउली सभु जगु जोहिआ ॥ ब्रहमा बिसनु महादेउ मोहिआ ॥ गुरमुखि नामि लगे से सोहिआ ॥२॥

वरत नेम करि थाके पुनहचरना ॥ तट तीरथ भवे सभ धरना ॥ से उबरे जि सतिगुर की सरना ॥३॥

माइआ मोहि सभो जगु बाधा ॥ हउमै पचै मनमुख मूराखा ॥ गुर नानक बाह पकरि हम राखा ॥४॥२॥९६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 394) आसा महला ५ ॥
सरब दूख जब बिसरहि सुआमी ॥ ईहा ऊहा कामि न प्रानी ॥१॥

संत त्रिपतासे हरि हरि ध्याइ ॥ करि किरपा अपुनै नाइ लाए सरब सूख प्रभ तुमरी रजाइ ॥ रहाउ ॥

संगि होवत कउ जानत दूरि ॥ सो जनु मरता नित नित झूरि ॥२॥

जिनि सभु किछु दीआ तिसु चितवत नाहि ॥ महा बिखिआ महि दिनु रैनि जाहि ॥३॥

कहु नानक प्रभु सिमरहु एक ॥ गति पाईऐ गुर पूरे टेक ॥४॥३॥९७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 395) आसा महला ५ ॥
नामु जपत मनु तनु सभु हरिआ ॥ कलमल दोख सगल परहरिआ ॥१॥

सोई दिवसु भला मेरे भाई ॥ हरि गुन गाइ परम गति पाई ॥ रहाउ ॥

साध जना के पूजे पैर ॥ मिटे उपद्रह मन ते बैर ॥२॥

गुर पूरे मिलि झगरु चुकाइआ ॥ पंच दूत सभि वसगति आइआ ॥३॥

जिसु मनि वसिआ हरि का नामु ॥ नानक तिसु ऊपरि कुरबान ॥४॥४॥९८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 395) आसा महला ५ ॥
गावि लेहि तू गावनहारे ॥ जीअ पिंड के प्रान अधारे ॥ जा की सेवा सरब सुख पावहि ॥ अवर काहू पहि बहुड़ि न जावहि ॥१॥

सदा अनंद अनंदी साहिबु गुन निधान नित नित जापीऐ ॥ बलिहारी तिसु संत पिआरे जिसु प्रसादि प्रभु मनि वासीऐ ॥ रहाउ ॥

जा का दानु निखूटै नाही ॥ भली भाति सभ सहजि समाही ॥ जा की बखस न मेटै कोई ॥ मनि वासाईऐ साचा सोई ॥२॥

सगल समग्री ग्रिह जा कै पूरन ॥ प्रभ के सेवक दूख न झूरन ॥ ओटि गही निरभउ पदु पाईऐ ॥ सासि सासि सो गुन निधि गाईऐ ॥३॥

दूरि न होई कतहू जाईऐ ॥ नदरि करे ता हरि हरि पाईऐ ॥ अरदासि करी पूरे गुर पासि ॥ नानकु मंगै हरि धनु रासि ॥४॥५॥९९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 395) आसा महला ५ ॥
प्रथमे मिटिआ तन का दूख ॥ मन सगल कउ होआ सूखु ॥ करि किरपा गुर दीनो नाउ ॥ बलि बलि तिसु सतिगुर कउ जाउ ॥१॥

गुरु पूरा पाइओ मेरे भाई ॥ रोग सोग सभ दूख बिनासे सतिगुर की सरणाई ॥ रहाउ ॥

गुर के चरन हिरदै वसाए ॥ मन चिंतत सगले फल पाए ॥ अगनि बुझी सभ होई सांति ॥ करि किरपा गुरि कीनी दाति ॥२॥

निथावे कउ गुरि दीनो थानु ॥ निमाने कउ गुरि कीनो मानु ॥ बंधन काटि सेवक करि राखे ॥ अम्रित बानी रसना चाखे ॥३॥

वडै भागि पूज गुर चरना ॥ सगल तिआगि पाई प्रभ सरना ॥ गुरु नानक जा कउ भइआ दइआला ॥ सो जनु होआ सदा निहाला ॥४॥६॥१००॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 396) आसा महला ५ ॥
सतिगुर साचै दीआ भेजि ॥ चिरु जीवनु उपजिआ संजोगि ॥ उदरै माहि आइ कीआ निवासु ॥ माता कै मनि बहुतु बिगासु ॥१॥

जमिआ पूतु भगतु गोविंद का ॥ प्रगटिआ सभ महि लिखिआ धुर का ॥ रहाउ ॥

दसी मासी हुकमि बालक जनमु लीआ ॥ मिटिआ सोगु महा अनंदु थीआ ॥ गुरबाणी सखी अनंदु गावै ॥ साचे साहिब कै मनि भावै ॥२॥

वधी वेलि बहु पीड़ी चाली ॥ धरम कला हरि बंधि बहाली ॥ मन चिंदिआ सतिगुरू दिवाइआ ॥ भए अचिंत एक लिव लाइआ ॥३॥

जिउ बालकु पिता ऊपरि करे बहु माणु ॥ बुलाइआ बोलै गुर कै भाणि ॥ गुझी छंनी नाही बात ॥ गुरु नानकु तुठा कीनी दाति ॥४॥७॥१०१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 396) आसा महला ५ ॥
गुर पूरे राखिआ दे हाथ ॥ प्रगटु भइआ जन का परतापु ॥१॥

गुरु गुरु जपी गुरू गुरु धिआई ॥ जीअ की अरदासि गुरू पहि पाई ॥ रहाउ ॥

सरनि परे साचे गुरदेव ॥ पूरन होई सेवक सेव ॥२॥

जीउ पिंडु जोबनु राखै प्रान ॥ कहु नानक गुर कउ कुरबान ॥३॥८॥१०२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 401) आसा घरु ९ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चितवउ चितवि सरब सुख पावउ आगै भावउ कि न भावउ ॥ एकु दातारु सगल है जाचिक दूसर कै पहि जावउ ॥१॥

हउ मागउ आन लजावउ ॥ सगल छत्रपति एको ठाकुरु कउनु समसरि लावउ ॥१॥ रहाउ ॥

ऊठउ बैसउ रहि भि न साकउ दरसनु खोजि खोजावउ ॥ ब्रहमादिक सनकादिक सनक सनंदन सनातन सनतकुमार तिन्ह कउ महलु दुलभावउ ॥२॥

अगम अगम आगाधि बोध कीमति परै न पावउ ॥ ताकी सरणि सति पुरख की सतिगुरु पुरखु धिआवउ ॥३॥

भइओ क्रिपालु दइआलु प्रभु ठाकुरु काटिओ बंधु गरावउ ॥ कहु नानक जउ साधसंगु पाइओ तउ फिरि जनमि न आवउ ॥४॥१॥१२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 401) आसा महला ५ ॥
अंतरि गावउ बाहरि गावउ गावउ जागि सवारी ॥ संगि चलन कउ तोसा दीन्हा गोबिंद नाम के बिउहारी ॥१॥

अवर बिसारी बिसारी ॥ नाम दानु गुरि पूरै दीओ मै एहो आधारी ॥१॥ रहाउ ॥

दूखनि गावउ सुखि भी गावउ मारगि पंथि सम्हारी ॥ नाम द्रिड़ु गुरि मन महि दीआ मोरी तिसा बुझारी ॥२॥

दिनु भी गावउ रैनी गावउ गावउ सासि सासि रसनारी ॥ सतसंगति महि बिसासु होइ हरि जीवत मरत संगारी ॥३॥

जन नानक कउ इहु दानु देहु प्रभ पावउ संत रेन उरि धारी ॥ स्रवनी कथा नैन दरसु पेखउ मसतकु गुर चरनारी ॥४॥२॥१२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 401) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा घरु १० महला ५ ॥
जिस नो तूं असथिरु करि मानहि ते पाहुन दो दाहा ॥ पुत्र कलत्र ग्रिह सगल समग्री सभ मिथिआ असनाहा ॥१॥

रे मन किआ करहि है हा हा ॥ द्रिसटि देखु जैसे हरिचंदउरी इकु राम भजनु लै लाहा ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे बसतर देह ओढाने दिन दोइ चारि भोराहा ॥ भीति ऊपरे केतकु धाईऐ अंति ओरको आहा ॥२॥

जैसे अंभ कुंड करि राखिओ परत सिंधु गलि जाहा ॥ आवगि आगिआ पारब्रहम की उठि जासी मुहत चसाहा ॥३॥

रे मन लेखै चालहि लेखै बैसहि लेखै लैदा साहा ॥ सदा कीरति करि नानक हरि की उबरे सतिगुर चरण ओटाहा ॥४॥१॥१२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 402) आसा महला ५ ॥
अपुसट बात ते भई सीधरी दूत दुसट सजनई ॥ अंधकार महि रतनु प्रगासिओ मलीन बुधि हछनई ॥१॥

जउ किरपा गोबिंद भई ॥ सुख स्मपति हरि नाम फल पाए सतिगुर मिलई ॥१॥ रहाउ ॥

मोहि किरपन कउ कोइ न जानत सगल भवन प्रगटई ॥ संगि बैठनो कही न पावत हुणि सगल चरण सेवई ॥२॥

आढ आढ कउ फिरत ढूंढते मन सगल त्रिसन बुझि गई ॥ एकु बोलु भी खवतो नाही साधसंगति सीतलई ॥३॥

एक जीह गुण कवन वखानै अगम अगम अगमई ॥ दासु दास दास को करीअहु जन नानक हरि सरणई ॥४॥२॥१२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 402) आसा महला ५ ॥
रे मूड़े लाहे कउ तूं ढीला ढीला तोटे कउ बेगि धाइआ ॥ ससत वखरु तूं घिंनहि नाही पापी बाधा रेनाइआ ॥१॥

सतिगुर तेरी आसाइआ ॥ पतित पावनु तेरो नामु पारब्रहम मै एहा ओटाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

गंधण वैण सुणहि उरझावहि नामु लैत अलकाइआ ॥ निंद चिंद कउ बहुतु उमाहिओ बूझी उलटाइआ ॥२॥

पर धन पर तन पर ती निंदा अखाधि खाहि हरकाइआ ॥ साच धरम सिउ रुचि नही आवै सति सुनत छोहाइआ ॥३॥

दीन दइआल क्रिपाल प्रभ ठाकुर भगत टेक हरि नाइआ ॥ नानक आहि सरण प्रभ आइओ राखु लाज अपनाइआ ॥४॥३॥१२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 402) आसा महला ५ ॥
मिथिआ संगि संगि लपटाए मोह माइआ करि बाधे ॥ जह जानो सो चीति न आवै अह्मबुधि भए आंधे ॥१॥

मन बैरागी किउ न अराधे ॥ काच कोठरी माहि तूं बसता संगि सगल बिखै की बिआधे ॥१॥ रहाउ ॥

मेरी मेरी करत दिनु रैनि बिहावै पलु खिनु छीजै अरजाधे ॥ जैसे मीठै सादि लोभाए झूठ धंधि दुरगाधे ॥२॥

काम क्रोध अरु लोभ मोह इह इंद्री रसि लपटाधे ॥ दीई भवारी पुरखि बिधातै बहुरि बहुरि जनमाधे ॥३॥

जउ भइओ क्रिपालु दीन दुख भंजनु तउ गुर मिलि सभ सुख लाधे ॥ कहु नानक दिनु रैनि धिआवउ मारि काढी सगल उपाधे ॥४॥

इउ जपिओ भाई पुरखु बिधाते ॥ भइओ क्रिपालु दीन दुख भंजनु जनम मरण दुख लाथे ॥१॥ रहाउ दूजा ॥४॥४॥१२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 403) आसा महला ५ ॥
निमख काम सुआद कारणि कोटि दिनस दुखु पावहि ॥ घरी मुहत रंग माणहि फिरि बहुरि बहुरि पछुतावहि ॥१॥

अंधे चेति हरि हरि राइआ ॥ तेरा सो दिनु नेड़ै आइआ ॥१॥ रहाउ ॥

पलक द्रिसटि देखि भूलो आक नीम को तूमरु ॥ जैसा संगु बिसीअर सिउ है रे तैसो ही इहु पर ग्रिहु ॥२॥

बैरी कारणि पाप करता बसतु रही अमाना ॥ छोडि जाहि तिन ही सिउ संगी साजन सिउ बैराना ॥३॥

सगल संसारु इहै बिधि बिआपिओ सो उबरिओ जिसु गुरु पूरा ॥ कहु नानक भव सागरु तरिओ भए पुनीत सरीरा ॥४॥५॥१२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 403) आसा महला ५ दुपदे ॥
लूकि कमानो सोई तुम्ह पेखिओ मूड़ मुगध मुकरानी ॥ आप कमाने कउ ले बांधे फिरि पाछै पछुतानी ॥१॥

प्रभ मेरे सभ बिधि आगै जानी ॥ भ्रम के मूसे तूं राखत परदा पाछै जीअ की मानी ॥१॥ रहाउ ॥

जितु जितु लाए तितु तितु लागे किआ को करै परानी ॥ बखसि लैहु पारब्रहम सुआमी नानक सद कुरबानी ॥२॥६॥१२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 403) आसा महला ५ ॥
अपुने सेवक की आपे राखै आपे नामु जपावै ॥ जह जह काज किरति सेवक की तहा तहा उठि धावै ॥१॥

सेवक कउ निकटी होइ दिखावै ॥ जो जो कहै ठाकुर पहि सेवकु ततकाल होइ आवै ॥१॥ रहाउ ॥

तिसु सेवक कै हउ बलिहारी जो अपने प्रभ भावै ॥ तिस की सोइ सुणी मनु हरिआ तिसु नानक परसणि आवै ॥२॥७॥१२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 403) आसा घरु ११ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नटूआ भेख दिखावै बहु बिधि जैसा है ओहु तैसा रे ॥ अनिक जोनि भ्रमिओ भ्रम भीतरि सुखहि नाही परवेसा रे ॥१॥

साजन संत हमारे मीता बिनु हरि हरि आनीता रे ॥ साधसंगि मिलि हरि गुण गाए इहु जनमु पदारथु जीता रे ॥१॥ रहाउ ॥

त्रै गुण माइआ ब्रहम की कीन्ही कहहु कवन बिधि तरीऐ रे ॥ घूमन घेर अगाह गाखरी गुर सबदी पारि उतरीऐ रे ॥२॥

खोजत खोजत खोजि बीचारिओ ततु नानक इहु जाना रे ॥ सिमरत नामु निधानु निरमोलकु मनु माणकु पतीआना रे ॥३॥१॥१३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 404) आसा महला ५ दुपदे ॥
गुर परसादि मेरै मनि वसिआ जो मागउ सो पावउ रे ॥ नाम रंगि इहु मनु त्रिपताना बहुरि न कतहूं धावउ रे ॥१॥

हमरा ठाकुरु सभ ते ऊचा रैणि दिनसु तिसु गावउ रे ॥ खिन महि थापि उथापनहारा तिस ते तुझहि डरावउ रे ॥१॥ रहाउ ॥

जब देखउ प्रभु अपुना सुआमी तउ अवरहि चीति न पावउ रे ॥ नानकु दासु प्रभि आपि पहिराइआ भ्रमु भउ मेटि लिखावउ रे ॥२॥२॥१३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 404) आसा महला ५ ॥
चारि बरन चउहा के मरदन खटु दरसन कर तली रे ॥ सुंदर सुघर सरूप सिआने पंचहु ही मोहि छली रे ॥१॥

जिनि मिलि मारे पंच सूरबीर ऐसो कउनु बली रे ॥ जिनि पंच मारि बिदारि गुदारे सो पूरा इह कली रे ॥१॥ रहाउ ॥

वडी कोम वसि भागहि नाही मुहकम फउज हठली रे ॥ कहु नानक तिनि जनि निरदलिआ साधसंगति कै झली रे ॥२॥३॥१३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 404) आसा महला ५ ॥
नीकी जीअ की हरि कथा ऊतम आन सगल रस फीकी रे ॥१॥ रहाउ ॥

बहु गुनि धुनि मुनि जन खटु बेते अवरु न किछु लाईकी रे ॥१॥

बिखारी निरारी अपारी सहजारी साधसंगि नानक पीकी रे ॥२॥४॥१३३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 404) आसा महला ५ ॥
हमारी पिआरी अम्रित धारी गुरि निमख न मन ते टारी रे ॥१॥ रहाउ ॥

दरसन परसन सरसन हरसन रंगि रंगी करतारी रे ॥१॥

खिनु रम गुर गम हरि दम नह जम हरि कंठि नानक उरि हारी रे ॥२॥५॥१३४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 404) आसा महला ५ ॥
नीकी साध संगानी ॥ रहाउ ॥

पहर मूरत पल गावत गावत गोविंद गोविंद वखानी ॥१॥

चालत बैसत सोवत हरि जसु मनि तनि चरन खटानी ॥२॥

हंउ हउरो तू ठाकुरु गउरो नानक सरनि पछानी ॥३॥६॥१३५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 405) रागु आसा महला ५ घरु १२
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिआगि सगल सिआनपा भजु पारब्रहम निरंकारु ॥ एक साचे नाम बाझहु सगल दीसै छारु ॥१॥

सो प्रभु जाणीऐ सद संगि ॥ गुर प्रसादी बूझीऐ एक हरि कै रंगि ॥१॥ रहाउ ॥

सरणि समरथ एक केरी दूजा नाही ठाउ ॥ महा भउजलु लंघीऐ सदा हरि गुण गाउ ॥२॥

जनम मरणु निवारीऐ दुखु न जम पुरि होइ ॥ नामु निधानु सोई पाए क्रिपा करे प्रभु सोइ ॥३॥

एक टेक अधारु एको एक का मनि जोरु ॥ नानक जपीऐ मिलि साधसंगति हरि बिनु अवरु न होरु ॥४॥१॥१३६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 405) आसा महला ५ ॥
जीउ मनु तनु प्रान प्रभ के दीए सभि रस भोग ॥ दीन बंधप जीअ दाता सरणि राखण जोगु ॥१॥

मेरे मन धिआइ हरि हरि नाउ ॥ हलति पलति सहाइ संगे एक सिउ लिव लाउ ॥१॥ रहाउ ॥

बेद सासत्र जन धिआवहि तरण कउ संसारु ॥ करम धरम अनेक किरिआ सभ ऊपरि नामु अचारु ॥२॥

कामु क्रोधु अहंकारु बिनसै मिलै सतिगुर देव ॥ नामु द्रिड़ु करि भगति हरि की भली प्रभ की सेव ॥३॥

चरण सरण दइआल तेरी तूं निमाणे माणु ॥ जीअ प्राण अधारु तेरा नानक का प्रभु ताणु ॥४॥२॥१३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 405) आसा महला ५ ॥
डोलि डोलि महा दुखु पाइआ बिना साधू संग ॥ खाटि लाभु गोबिंद हरि रसु पारब्रहम इक रंग ॥१॥

हरि को नामु जपीऐ नीति ॥ सासि सासि धिआइ सो प्रभु तिआगि अवर परीति ॥१॥ रहाउ ॥

करण कारण समरथ सो प्रभु जीअ दाता आपि ॥ तिआगि सगल सिआणपा आठ पहर प्रभु जापि ॥२॥

मीतु सखा सहाइ संगी ऊच अगम अपारु ॥ चरण कमल बसाइ हिरदै जीअ को आधारु ॥३॥

करि किरपा प्रभ पारब्रहम गुण तेरा जसु गाउ ॥ सरब सूख वडी वडिआई जपि जीवै नानकु नाउ ॥४॥३॥१३८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 405) आसा महला ५ ॥
उदमु करउ करावहु ठाकुर पेखत साधू संगि ॥ हरि हरि नामु चरावहु रंगनि आपे ही प्रभ रंगि ॥१॥

मन महि राम नामा जापि ॥ करि किरपा वसहु मेरै हिरदै होइ सहाई आपि ॥१॥ रहाउ ॥

सुणि सुणि नामु तुमारा प्रीतम प्रभु पेखन का चाउ ॥ दइआ करहु किरम अपुने कउ इहै मनोरथु सुआउ ॥२॥

तनु धनु तेरा तूं प्रभु मेरा हमरै वसि किछु नाहि ॥ जिउ जिउ राखहि तिउ तिउ रहणा तेरा दीआ खाहि ॥३॥

जनम जनम के किलविख काटै मजनु हरि जन धूरि ॥ भाइ भगति भरम भउ नासै हरि नानक सदा हजूरि ॥४॥४॥१३९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 406) आसा महला ५ ॥
अगम अगोचरु दरसु तेरा सो पाए जिसु मसतकि भागु ॥ आपि क्रिपालि क्रिपा प्रभि धारी सतिगुरि बखसिआ हरि नामु ॥१॥

कलिजुगु उधारिआ गुरदेव ॥ मल मूत मूड़ जि मुघद होते सभि लगे तेरी सेव ॥१॥ रहाउ ॥

तू आपि करता सभ स्रिसटि धरता सभ महि रहिआ समाइ ॥ धरम राजा बिसमादु होआ सभ पई पैरी आइ ॥२॥

सतजुगु त्रेता दुआपरु भणीऐ कलिजुगु ऊतमो जुगा माहि ॥ अहि करु करे सु अहि करु पाए कोई न पकड़ीऐ किसै थाइ ॥३॥

हरि जीउ सोई करहि जि भगत तेरे जाचहि एहु तेरा बिरदु ॥ कर जोड़ि नानक दानु मागै अपणिआ संता देहि हरि दरसु ॥४॥५॥१४०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 406) रागु आसा महला ५ घरु १३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर बचन तुम्हारे ॥ निरगुण निसतारे ॥१॥ रहाउ ॥

महा बिखादी दुसट अपवादी ते पुनीत संगारे ॥१॥

जनम भवंते नरकि पड़ंते तिन्ह के कुल उधारे ॥२॥

कोइ न जानै कोइ न मानै से परगटु हरि दुआरे ॥३॥

कवन उपमा देउ कवन वडाई नानक खिनु खिनु वारे ॥४॥१॥१४१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 406) आसा महला ५ ॥
बावर सोइ रहे ॥१॥ रहाउ ॥

मोह कुट्मब बिखै रस माते मिथिआ गहन गहे ॥१॥

मिथन मनोरथ सुपन आनंद उलास मनि मुखि सति कहे ॥२॥

अम्रितु नामु पदारथु संगे तिलु मरमु न लहे ॥३॥

करि किरपा राखे सतसंगे नानक सरणि आहे ॥४॥२॥१४२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 406) आसा महला ५ तिपदे ॥
ओहा प्रेम पिरी ॥१॥ रहाउ ॥

कनिक माणिक गज मोतीअन लालन नह नाह नही ॥१॥

राज न भाग न हुकम न साद न ॥ किछु किछु न चाही ॥२॥

चरनन सरनन संतन बंदन ॥ सुखो सुखु पाही ॥ नानक तपति हरी ॥ मिले प्रेम पिरी ॥३॥३॥१४३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 407) आसा महला ५ ॥
गुरहि दिखाइओ लोइना ॥१॥ रहाउ ॥

ईतहि ऊतहि घटि घटि घटि घटि तूंही तूंही मोहिना ॥१॥

कारन करना धारन धरना एकै एकै सोहिना ॥२॥

संतन परसन बलिहारी दरसन नानक सुखि सुखि सोइना ॥३॥४॥१४४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 407) आसा महला ५ ॥
हरि हरि नामु अमोला ॥ ओहु सहजि सुहेला ॥१॥ रहाउ ॥

संगि सहाई छोडि न जाई ओहु अगह अतोला ॥१॥

प्रीतमु भाई बापु मोरो माई भगतन का ओल्हा ॥२॥

अलखु लखाइआ गुर ते पाइआ नानक इहु हरि का चोल्हा ॥३॥५॥१४५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 407) आसा महला ५ ॥
आपुनी भगति निबाहि ॥ ठाकुर आइओ आहि ॥१॥ रहाउ ॥

नामु पदारथु होइ सकारथु हिरदै चरन बसाहि ॥१॥

एह मुकता एह जुगता राखहु संत संगाहि ॥२॥

नामु धिआवउ सहजि समावउ नानक हरि गुन गाहि ॥३॥६॥१४६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 407) आसा महला ५ ॥
ठाकुर चरण सुहावे ॥ हरि संतन पावे ॥१॥ रहाउ ॥

आपु गवाइआ सेव कमाइआ गुन रसि रसि गावे ॥१॥

एकहि आसा दरस पिआसा आन न भावे ॥२॥

दइआ तुहारी किआ जंत विचारी नानक बलि बलि जावे ॥३॥७॥१४७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 407) आसा महला ५ ॥
एकु सिमरि मन माही ॥१॥ रहाउ ॥

नामु धिआवहु रिदै बसावहु तिसु बिनु को नाही ॥१॥

प्रभ सरनी आईऐ सरब फल पाईऐ सगले दुख जाही ॥२॥

जीअन को दाता पुरखु बिधाता नानक घटि घटि आही ॥३॥८॥१४८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 407) आसा महला ५ ॥
हरि बिसरत सो मूआ ॥१॥ रहाउ ॥

नामु धिआवै सरब फल पावै सो जनु सुखीआ हूआ ॥१॥

राजु कहावै हउ करम कमावै बाधिओ नलिनी भ्रमि सूआ ॥२॥

कहु नानक जिसु सतिगुरु भेटिआ सो जनु निहचलु थीआ ॥३॥९॥१४९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 407) आसा महला ५ घरु १४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओहु नेहु नवेला ॥ अपुने प्रीतम सिउ लागि रहै ॥१॥ रहाउ ॥

जो प्रभ भावै जनमि न आवै ॥ हरि प्रेम भगति हरि प्रीति रचै ॥१॥

प्रभ संगि मिलीजै इहु मनु दीजै ॥ नानक नामु मिलै अपनी दइआ करहु ॥२॥१॥१५०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 408) आसा महला ५ ॥
मिलु राम पिआरे तुम बिनु धीरजु को न करै ॥१॥ रहाउ ॥

सिम्रिति सासत्र बहु करम कमाए प्रभ तुमरे दरस बिनु सुखु नाही ॥१॥

वरत नेम संजम करि थाके नानक साध सरनि प्रभ संगि वसै ॥२॥२॥१५१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 408) आसा महला ५ घरु १५ पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बिकार माइआ मादि सोइओ सूझ बूझ न आवै ॥ पकरि केस जमि उठारिओ तद ही घरि जावै ॥१॥

लोभ बिखिआ बिखै लागे हिरि वित चित दुखाही ॥ खिन भंगुना कै मानि माते असुर जाणहि नाही ॥१॥ रहाउ ॥

बेद सासत्र जन पुकारहि सुनै नाही डोरा ॥ निपटि बाजी हारि मूका पछुताइओ मनि भोरा ॥२॥

डानु सगल गैर वजहि भरिआ दीवान लेखै न परिआ ॥ जेंह कारजि रहै ओल्हा सोइ कामु न करिआ ॥३॥

ऐसो जगु मोहि गुरि दिखाइओ तउ एक कीरति गाइआ ॥ मानु तानु तजि सिआनप सरणि नानकु आइआ ॥४॥१॥१५२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 408) आसा महला ५ ॥
बापारि गोविंद नाए ॥ साध संत मनाए प्रिअ पाए गुन गाए पंच नाद तूर बजाए ॥१॥ रहाउ ॥

किरपा पाए सहजाए दरसाए अब रातिआ गोविंद सिउ ॥ संत सेवि प्रीति नाथ रंगु लालन लाए ॥१॥

गुर गिआनु मनि द्रिड़ाए रहसाए नही आए सहजाए मनि निधानु पाए ॥ सभ तजी मनै की काम करा ॥ चिरु चिरु चिरु चिरु भइआ मनि बहुतु पिआस लागी ॥ हरि दरसनो दिखावहु मोहि तुम बतावहु ॥ नानक दीन सरणि आए गलि लाए ॥२॥२॥१५३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 408) आसा महला ५ ॥
कोऊ बिखम गार तोरै ॥ आस पिआस धोह मोह भरम ही ते होरै ॥१॥ रहाउ ॥

काम क्रोध लोभ मान इह बिआधि छोरै ॥१॥

संतसंगि नाम रंगि गुन गोविंद गावउ ॥ अनदिनो प्रभ धिआवउ ॥ भ्रम भीति जीति मिटावउ ॥ निधि नामु नानक मोरै ॥२॥३॥१५४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 408) आसा महला ५ ॥
कामु क्रोधु लोभु तिआगु ॥ मनि सिमरि गोबिंद नाम ॥ हरि भजन सफल काम ॥१॥ रहाउ ॥

तजि मान मोह विकार मिथिआ जपि राम राम राम ॥ मन संतना कै चरनि लागु ॥१॥

प्रभ गोपाल दीन दइआल पतित पावन पारब्रहम हरि चरण सिमरि जागु ॥ करि भगति नानक पूरन भागु ॥२॥४॥१५५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 409) आसा महला ५ ॥
हरख सोग बैराग अनंदी खेलु री दिखाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

खिनहूं भै निरभै खिनहूं खिनहूं उठि धाइओ ॥ खिनहूं रस भोगन खिनहूं खिनहू तजि जाइओ ॥१॥

खिनहूं जोग ताप बहु पूजा खिनहूं भरमाइओ ॥ खिनहूं किरपा साधू संग नानक हरि रंगु लाइओ ॥२॥५॥१५६॥

(गुरू तेग बहादुर जी -- SGGS 411) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा महला ९ ॥
बिरथा कहउ कउन सिउ मन की ॥ लोभि ग्रसिओ दस हू दिस धावत आसा लागिओ धन की ॥१॥ रहाउ ॥

सुख कै हेति बहुतु दुखु पावत सेव करत जन जन की ॥ दुआरहि दुआरि सुआन जिउ डोलत नह सुध राम भजन की ॥१॥

मानस जनम अकारथ खोवत लाज न लोक हसन की ॥ नानक हरि जसु किउ नही गावत कुमति बिनासै तन की ॥२॥१॥२३३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 411) रागु आसा महला १ असटपदीआ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उतरि अवघटि सरवरि न्हावै ॥ बकै न बोलै हरि गुण गावै ॥ जलु आकासी सुंनि समावै ॥ रसु सतु झोलि महा रसु पावै ॥१॥

ऐसा गिआनु सुनहु अभ मोरे ॥ भरिपुरि धारि रहिआ सभ ठउरे ॥१॥ रहाउ ॥

सचु ब्रतु नेमु न कालु संतावै ॥ सतिगुर सबदि करोधु जलावै ॥ गगनि निवासि समाधि लगावै ॥ पारसु परसि परम पदु पावै ॥२॥

सचु मन कारणि ततु बिलोवै ॥ सुभर सरवरि मैलु न धोवै ॥ जै सिउ राता तैसो होवै ॥ आपे करता करे सु होवै ॥३॥

गुर हिव सीतलु अगनि बुझावै ॥ सेवा सुरति बिभूत चड़ावै ॥ दरसनु आपि सहज घरि आवै ॥ निरमल बाणी नादु वजावै ॥४॥

अंतरि गिआनु महा रसु सारा ॥ तीरथ मजनु गुर वीचारा ॥ अंतरि पूजा थानु मुरारा ॥ जोती जोति मिलावणहारा ॥५॥

रसि रसिआ मति एकै भाइ ॥ तखत निवासी पंच समाइ ॥ कार कमाई खसम रजाइ ॥ अविगत नाथु न लखिआ जाइ ॥६॥

जल महि उपजै जल ते दूरि ॥ जल महि जोति रहिआ भरपूरि ॥ किसु नेड़ै किसु आखा दूरि ॥ निधि गुण गावा देखि हदूरि ॥७॥

अंतरि बाहरि अवरु न कोइ ॥ जो तिसु भावै सो फुनि होइ ॥ सुणि भरथरि नानकु कहै बीचारु ॥ निरमल नामु मेरा आधारु ॥८॥१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 412) आसा महला १ ॥
सभि जप सभि तप सभ चतुराई ॥ ऊझड़ि भरमै राहि न पाई ॥ बिनु बूझे को थाइ न पाई ॥ नाम बिहूणै माथे छाई ॥१॥

साच धणी जगु आइ बिनासा ॥ छूटसि प्राणी गुरमुखि दासा ॥१॥ रहाउ ॥

जगु मोहि बाधा बहुती आसा ॥ गुरमती इकि भए उदासा ॥ अंतरि नामु कमलु परगासा ॥ तिन्ह कउ नाही जम की त्रासा ॥२॥

जगु त्रिअ जितु कामणि हितकारी ॥ पुत्र कलत्र लगि नामु विसारी ॥ बिरथा जनमु गवाइआ बाजी हारी ॥ सतिगुरु सेवे करणी सारी ॥३॥

बाहरहु हउमै कहै कहाए ॥ अंदरहु मुकतु लेपु कदे न लाए ॥ माइआ मोहु गुर सबदि जलाए ॥ निरमल नामु सद हिरदै धिआए ॥४॥

धावतु राखै ठाकि रहाए ॥ सिख संगति करमि मिलाए ॥ गुर बिनु भूलो आवै जाए ॥ नदरि करे संजोगि मिलाए ॥५॥

रूड़ो कहउ न कहिआ जाई ॥ अकथ कथउ नह कीमति पाई ॥ सभ दुख तेरे सूख रजाई ॥ सभि दुख मेटे साचै नाई ॥६॥

कर बिनु वाजा पग बिनु ताला ॥ जे सबदु बुझै ता सचु निहाला ॥ अंतरि साचु सभे सुख नाला ॥ नदरि करे राखै रखवाला ॥७॥

त्रिभवण सूझै आपु गवावै ॥ बाणी बूझै सचि समावै ॥ सबदु वीचारे एक लिव तारा ॥ नानक धंनु सवारणहारा ॥८॥२॥


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