Pt 3 - राग आसा - बाणी शब्द, Part 3 - Raag Asa - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू रामदास जी -- SGGS 369) आसा महला ४ ॥
जनमु पदारथु पाइ नामु धिआइआ ॥ गुर परसादी बुझि सचि समाइआ ॥१॥

जिन्ह धुरि लिखिआ लेखु तिन्ही नामु कमाइआ ॥ दरि सचै सचिआर महलि बुलाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि नामु निधानु गुरमुखि पाईऐ ॥ अनदिनु नामु धिआइ हरि गुण गाईऐ ॥२॥

अंतरि वसतु अनेक मनमुखि नही पाईऐ ॥ हउमै गरबै गरबु आपि खुआईऐ ॥३॥

नानक आपे आपि आपि खुआईऐ ॥ गुरमति मनि परगासु सचा पाईऐ ॥४॥१३॥६५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 370) रागु आसा घरु २ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिनि लाई प्रीति सोई फिरि खाइआ ॥ जिनि सुखि बैठाली तिसु भउ बहुतु दिखाइआ ॥ भाई मीत कुट्मब देखि बिबादे ॥ हम आई वसगति गुर परसादे ॥१॥

ऐसा देखि बिमोहित होए ॥ साधिक सिध सुरदेव मनुखा बिनु साधू सभि ध्रोहनि ध्रोहे ॥१॥ रहाउ ॥

इकि फिरहि उदासी तिन्ह कामि विआपै ॥ इकि संचहि गिरही तिन्ह होइ न आपै ॥ इकि सती कहावहि तिन्ह बहुतु कलपावै ॥ हम हरि राखे लगि सतिगुर पावै ॥२॥

तपु करते तपसी भूलाए ॥ पंडित मोहे लोभि सबाए ॥ त्रै गुण मोहे मोहिआ आकासु ॥ हम सतिगुर राखे दे करि हाथु ॥३॥

गिआनी की होइ वरती दासि ॥ कर जोड़े सेवा करे अरदासि ॥ जो तूं कहहि सु कार कमावा ॥ जन नानक गुरमुख नेड़ि न आवा ॥४॥१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 370) आसा महला ५ ॥
ससू ते पिरि कीनी वाखि ॥ देर जिठाणी मुई दूखि संतापि ॥ घर के जिठेरे की चूकी काणि ॥ पिरि रखिआ कीनी सुघड़ सुजाणि ॥१॥

सुनहु लोका मै प्रेम रसु पाइआ ॥ दुरजन मारे वैरी संघारे सतिगुरि मो कउ हरि नामु दिवाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

प्रथमे तिआगी हउमै प्रीति ॥ दुतीआ तिआगी लोगा रीति ॥ त्रै गुण तिआगि दुरजन मीत समाने ॥ तुरीआ गुणु मिलि साध पछाने ॥२॥

सहज गुफा महि आसणु बाधिआ ॥ जोति सरूप अनाहदु वाजिआ ॥ महा अनंदु गुर सबदु वीचारि ॥ प्रिअ सिउ राती धन सोहागणि नारि ॥३॥

जन नानकु बोले ब्रहम बीचारु ॥ जो सुणे कमावै सु उतरै पारि ॥ जनमि न मरै न आवै न जाइ ॥ हरि सेती ओहु रहै समाइ ॥४॥२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 370) आसा महला ५ ॥
निज भगती सीलवंती नारि ॥ रूपि अनूप पूरी आचारि ॥ जितु ग्रिहि वसै सो ग्रिहु सोभावंता ॥ गुरमुखि पाई किनै विरलै जंता ॥१॥

सुकरणी कामणि गुर मिलि हम पाई ॥ जजि काजि परथाइ सुहाई ॥१॥ रहाउ ॥

जिचरु वसी पिता कै साथि ॥ तिचरु कंतु बहु फिरै उदासि ॥ करि सेवा सत पुरखु मनाइआ ॥ गुरि आणी घर महि ता सरब सुख पाइआ ॥२॥

बतीह सुलखणी सचु संतति पूत ॥ आगिआकारी सुघड़ सरूप ॥ इछ पूरे मन कंत सुआमी ॥ सगल संतोखी देर जेठानी ॥३॥

सभ परवारै माहि सरेसट ॥ मती देवी देवर जेसट ॥ धंनु सु ग्रिहु जितु प्रगटी आइ ॥ जन नानक सुखे सुखि विहाइ ॥४॥३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 371) आसा महला ५ ॥
मता करउ सो पकनि न देई ॥ सील संजम कै निकटि खलोई ॥ वेस करे बहु रूप दिखावै ॥ ग्रिहि बसनि न देई वखि वखि भरमावै ॥१॥

घर की नाइकि घर वासु न देवै ॥ जतन करउ उरझाइ परेवै ॥१॥ रहाउ ॥

धुर की भेजी आई आमरि ॥ नउ खंड जीते सभि थान थनंतर ॥ तटि तीरथि न छोडै जोग संनिआस ॥ पड़ि थाके सिम्रिति बेद अभिआस ॥२॥

जह बैसउ तह नाले बैसै ॥ सगल भवन महि सबल प्रवेसै ॥ होछी सरणि पइआ रहणु न पाई ॥ कहु मीता हउ कै पहि जाई ॥३॥

सुणि उपदेसु सतिगुर पहि आइआ ॥ गुरि हरि हरि नामु मोहि मंत्रु द्रिड़ाइआ ॥ निज घरि वसिआ गुण गाइ अनंता ॥ प्रभु मिलिओ नानक भए अचिंता ॥४॥

घरु मेरा इह नाइकि हमारी ॥ इह आमरि हम गुरि कीए दरबारी ॥१॥ रहाउ दूजा ॥४॥४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 371) आसा महला ५ ॥
प्रथमे मता जि पत्री चलावउ ॥ दुतीए मता दुइ मानुख पहुचावउ ॥ त्रितीए मता किछु करउ उपाइआ ॥ मै सभु किछु छोडि प्रभ तुही धिआइआ ॥१॥

महा अनंद अचिंत सहजाइआ ॥ दुसमन दूत मुए सुखु पाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरि मो कउ दीआ उपदेसु ॥ जीउ पिंडु सभु हरि का देसु ॥ जो किछु करी सु तेरा ताणु ॥ तूं मेरी ओट तूंहै दीबाणु ॥२॥

तुधनो छोडि जाईऐ प्रभ कैं धरि ॥ आन न बीआ तेरी समसरि ॥ तेरे सेवक कउ किस की काणि ॥ साकतु भूला फिरै बेबाणि ॥३॥

तेरी वडिआई कही न जाइ ॥ जह कह राखि लैहि गलि लाइ ॥ नानक दास तेरी सरणाई ॥ प्रभि राखी पैज वजी वाधाई ॥४॥५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 372) आसा महला ५ ॥
परदेसु झागि सउदे कउ आइआ ॥ वसतु अनूप सुणी लाभाइआ ॥ गुण रासि बंन्हि पलै आनी ॥ देखि रतनु इहु मनु लपटानी ॥१॥

साह वापारी दुआरै आए ॥ वखरु काढहु सउदा कराए ॥१॥ रहाउ ॥

साहि पठाइआ साहै पासि ॥ अमोल रतन अमोला रासि ॥ विसटु सुभाई पाइआ मीत ॥ सउदा मिलिआ निहचल चीत ॥२॥

भउ नही तसकर पउण न पानी ॥ सहजि विहाझी सहजि लै जानी ॥ सत कै खटिऐ दुखु नही पाइआ ॥ सही सलामति घरि लै आइआ ॥३॥

मिलिआ लाहा भए अनंद ॥ धंनु साह पूरे बखसिंद ॥ इहु सउदा गुरमुखि किनै विरलै पाइआ ॥ सहली खेप नानकु लै आइआ ॥४॥६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 372) आसा महला ५ ॥
गुनु अवगनु मेरो कछु न बीचारो ॥ नह देखिओ रूप रंग सींगारो ॥ चज अचार किछु बिधि नही जानी ॥ बाह पकरि प्रिअ सेजै आनी ॥१॥

सुनिबो सखी कंति हमारो कीअलो खसमाना ॥ करु मसतकि धारि राखिओ करि अपुना किआ जानै इहु लोकु अजाना ॥१॥ रहाउ ॥

सुहागु हमारो अब हुणि सोहिओ ॥ कंतु मिलिओ मेरो सभु दुखु जोहिओ ॥ आंगनि मेरै सोभा चंद ॥ निसि बासुर प्रिअ संगि अनंद ॥२॥

बसत्र हमारे रंगि चलूल ॥ सगल आभरण सोभा कंठि फूल ॥ प्रिअ पेखी द्रिसटि पाए सगल निधान ॥ दुसट दूत की चूकी कानि ॥३॥

सद खुसीआ सदा रंग माणे ॥ नउ निधि नामु ग्रिह महि त्रिपताने ॥ कहु नानक जउ पिरहि सीगारी ॥ थिरु सोहागनि संगि भतारी ॥४॥७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 372) आसा महला ५ ॥
दानु देइ करि पूजा करना ॥ लैत देत उन्ह मूकरि परना ॥ जितु दरि तुम्ह है ब्राहमण जाणा ॥ तितु दरि तूंही है पछुताणा ॥१॥

ऐसे ब्राहमण डूबे भाई ॥ निरापराध चितवहि बुरिआई ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि लोभु फिरहि हलकाए ॥ निंदा करहि सिरि भारु उठाए ॥ माइआ मूठा चेतै नाही ॥ भरमे भूला बहुती राही ॥२॥

बाहरि भेख करहि घनेरे ॥ अंतरि बिखिआ उतरी घेरे ॥ अवर उपदेसै आपि न बूझै ॥ ऐसा ब्राहमणु कही न सीझै ॥३॥

मूरख बामण प्रभू समालि ॥ देखत सुनत तेरै है नालि ॥ कहु नानक जे होवी भागु ॥ मानु छोडि गुर चरणी लागु ॥४॥८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 372) आसा महला ५ ॥
दूख रोग भए गतु तन ते मनु निरमलु हरि हरि गुण गाइ ॥ भए अनंद मिलि साधू संगि अब मेरा मनु कत ही न जाइ ॥१॥

तपति बुझी गुर सबदी माइ ॥ बिनसि गइओ ताप सभ सहसा गुरु सीतलु मिलिओ सहजि सुभाइ ॥१॥ रहाउ ॥

धावत रहे एकु इकु बूझिआ आइ बसे अब निहचलु थाइ ॥ जगतु उधारन संत तुमारे दरसनु पेखत रहे अघाइ ॥२॥

जनम दोख परे मेरे पाछै अब पकरे निहचलु साधू पाइ ॥ सहज धुनि गावै मंगल मनूआ अब ता कउ फुनि कालु न खाइ ॥३॥

करन कारन समरथ हमारे सुखदाई मेरे हरि हरि राइ ॥ नामु तेरा जपि जीवै नानकु ओति पोति मेरै संगि सहाइ ॥४॥९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 373) आसा महला ५ ॥
अरड़ावै बिललावै निंदकु ॥ पारब्रहमु परमेसरु बिसरिआ अपणा कीता पावै निंदकु ॥१॥ रहाउ ॥

जे कोई उस का संगी होवै नाले लए सिधावै ॥ अणहोदा अजगरु भारु उठाए निंदकु अगनी माहि जलावै ॥१॥

परमेसर कै दुआरै जि होइ बितीतै सु नानकु आखि सुणावै ॥ भगत जना कउ सदा अनंदु है हरि कीरतनु गाइ बिगसावै ॥२॥१०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 373) आसा महला ५ ॥
जउ मै कीओ सगल सीगारा ॥ तउ भी मेरा मनु न पतीआरा ॥ अनिक सुगंधत तन महि लावउ ॥ ओहु सुखु तिलु समानि नही पावउ ॥ मन महि चितवउ ऐसी आसाई ॥ प्रिअ देखत जीवउ मेरी माई ॥१॥

माई कहा करउ इहु मनु न धीरै ॥ प्रिअ प्रीतम बैरागु हिरै ॥१॥ रहाउ ॥

बसत्र बिभूखन सुख बहुत बिसेखै ॥ ओइ भी जानउ कितै न लेखै ॥ पति सोभा अरु मानु महतु ॥ आगिआकारी सगल जगतु ॥ ग्रिहु ऐसा है सुंदर लाल ॥ प्रभ भावा ता सदा निहाल ॥२॥

बिंजन भोजन अनिक परकार ॥ रंग तमासे बहुतु बिसथार ॥ राज मिलख अरु बहुतु फुरमाइसि ॥ मनु नही ध्रापै त्रिसना न जाइसि ॥ बिनु मिलबे इहु दिनु न बिहावै ॥ मिलै प्रभू ता सभ सुख पावै ॥३॥

खोजत खोजत सुनी इह सोइ ॥ साधसंगति बिनु तरिओ न कोइ ॥ जिसु मसतकि भागु तिनि सतिगुरु पाइआ ॥ पूरी आसा मनु त्रिपताइआ ॥ प्रभ मिलिआ ता चूकी डंझा ॥ नानक लधा मन तन मंझा ॥४॥११॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 373) आसा महला ५ पंचपदे ॥
प्रथमे तेरी नीकी जाति ॥ दुतीआ तेरी मनीऐ पांति ॥ त्रितीआ तेरा सुंदर थानु ॥ बिगड़ रूपु मन महि अभिमानु ॥१॥

सोहनी सरूपि सुजाणि बिचखनि ॥ अति गरबै मोहि फाकी तूं ॥१॥ रहाउ ॥

अति सूची तेरी पाकसाल ॥ करि इसनानु पूजा तिलकु लाल ॥ गली गरबहि मुखि गोवहि गिआन ॥ सभ बिधि खोई लोभि सुआन ॥२॥

कापर पहिरहि भोगहि भोग ॥ आचार करहि सोभा महि लोग ॥ चोआ चंदन सुगंध बिसथार ॥ संगी खोटा क्रोधु चंडाल ॥३॥

अवर जोनि तेरी पनिहारी ॥ इसु धरती महि तेरी सिकदारी ॥ सुइना रूपा तुझ पहि दाम ॥ सीलु बिगारिओ तेरा काम ॥४॥

जा कउ द्रिसटि मइआ हरि राइ ॥ सा बंदी ते लई छडाइ ॥ साधसंगि मिलि हरि रसु पाइआ ॥ कहु नानक सफल ओह काइआ ॥५॥

सभि रूप सभि सुख बने सुहागनि ॥ अति सुंदरि बिचखनि तूं ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 374) आसा महला ५ इकतुके २ ॥
जीवत दीसै तिसु सरपर मरणा ॥ मुआ होवै तिसु निहचलु रहणा ॥१॥

जीवत मुए मुए से जीवे ॥ हरि हरि नामु अवखधु मुखि पाइआ गुर सबदी रसु अम्रितु पीवे ॥१॥ रहाउ ॥

काची मटुकी बिनसि बिनासा ॥ जिसु छूटै त्रिकुटी तिसु निज घरि वासा ॥२॥

ऊचा चड़ै सु पवै पइआला ॥ धरनि पड़ै तिसु लगै न काला ॥३॥

भ्रमत फिरे तिन किछू न पाइआ ॥ से असथिर जिन गुर सबदु कमाइआ ॥४॥

जीउ पिंडु सभु हरि का मालु ॥ नानक गुर मिलि भए निहाल ॥५॥१३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 374) आसा महला ५ ॥
पुतरी तेरी बिधि करि थाटी ॥ जानु सति करि होइगी माटी ॥१॥

मूलु समालहु अचेत गवारा ॥ इतने कउ तुम्ह किआ गरबे ॥१॥ रहाउ ॥

तीनि सेर का दिहाड़ी मिहमानु ॥ अवर वसतु तुझ पाहि अमान ॥२॥

बिसटा असत रकतु परेटे चाम ॥ इसु ऊपरि ले राखिओ गुमान ॥३॥

एक वसतु बूझहि ता होवहि पाक ॥ बिनु बूझे तूं सदा नापाक ॥४॥

कहु नानक गुर कउ कुरबानु ॥ जिस ते पाईऐ हरि पुरखु सुजानु ॥५॥१४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 374) आसा महला ५ इकतुके चउपदे ॥
इक घड़ी दिनसु मो कउ बहुतु दिहारे ॥ मनु न रहै कैसे मिलउ पिआरे ॥१॥

इकु पलु दिनसु मो कउ कबहु न बिहावै ॥ दरसन की मनि आस घनेरी कोई ऐसा संतु मो कउ पिरहि मिलावै ॥१॥ रहाउ ॥

चारि पहर चहु जुगह समाने ॥ रैणि भई तब अंतु न जाने ॥२॥

पंच दूत मिलि पिरहु विछोड़ी ॥ भ्रमि भ्रमि रोवै हाथ पछोड़ी ॥३॥

जन नानक कउ हरि दरसु दिखाइआ ॥ आतमु चीन्हि परम सुखु पाइआ ॥४॥१५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 375) आसा महला ५ ॥
हरि सेवा महि परम निधानु ॥ हरि सेवा मुखि अम्रित नामु ॥१॥

हरि मेरा साथी संगि सखाई ॥ दुखि सुखि सिमरी तह मउजूदु जमु बपुरा मो कउ कहा डराई ॥१॥ रहाउ ॥

हरि मेरी ओट मै हरि का ताणु ॥ हरि मेरा सखा मन माहि दीबाणु ॥२॥

हरि मेरी पूंजी मेरा हरि वेसाहु ॥ गुरमुखि धनु खटी हरि मेरा साहु ॥३॥

गुर किरपा ते इह मति आवै ॥ जन नानकु हरि कै अंकि समावै ॥४॥१६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 375) आसा महला ५ ॥
प्रभु होइ क्रिपालु त इहु मनु लाई ॥ सतिगुरु सेवि सभै फल पाई ॥१॥

मन किउ बैरागु करहिगा सतिगुरु मेरा पूरा ॥ मनसा का दाता सभ सुख निधानु अम्रित सरि सद ही भरपूरा ॥१॥ रहाउ ॥

चरण कमल रिद अंतरि धारे ॥ प्रगटी जोति मिले राम पिआरे ॥२॥

पंच सखी मिलि मंगलु गाइआ ॥ अनहद बाणी नादु वजाइआ ॥३॥

गुरु नानकु तुठा मिलिआ हरि राइ ॥ सुखि रैणि विहाणी सहजि सुभाइ ॥४॥१७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 375) आसा महला ५ ॥
करि किरपा हरि परगटी आइआ ॥ मिलि सतिगुर धनु पूरा पाइआ ॥१॥

ऐसा हरि धनु संचीऐ भाई ॥ भाहि न जालै जलि नही डूबै संगु छोडि करि कतहु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

तोटि न आवै निखुटि न जाइ ॥ खाइ खरचि मनु रहिआ अघाइ ॥२॥

सो सचु साहु जिसु घरि हरि धनु संचाणा ॥ इसु धन ते सभु जगु वरसाणा ॥३॥

तिनि हरि धनु पाइआ जिसु पुरब लिखे का लहणा ॥ जन नानक अंति वार नामु गहणा ॥४॥१८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 375) आसा महला ५ ॥
जैसे किरसाणु बोवै किरसानी ॥ काची पाकी बाढि परानी ॥१॥

जो जनमै सो जानहु मूआ ॥ गोविंद भगतु असथिरु है थीआ ॥१॥ रहाउ ॥

दिन ते सरपर पउसी राति ॥ रैणि गई फिरि होइ परभाति ॥२॥

माइआ मोहि सोइ रहे अभागे ॥ गुर प्रसादि को विरला जागे ॥३॥

कहु नानक गुण गाईअहि नीत ॥ मुख ऊजल होइ निरमल चीत ॥४॥१९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 376) आसा महला ५ ॥
नउ निधि तेरै सगल निधान ॥ इछा पूरकु रखै निदान ॥१॥

तूं मेरो पिआरो ता कैसी भूखा ॥ तूं मनि वसिआ लगै न दूखा ॥१॥ रहाउ ॥

जो तूं करहि सोई परवाणु ॥ साचे साहिब तेरा सचु फुरमाणु ॥२॥

जा तुधु भावै ता हरि गुण गाउ ॥ तेरै घरि सदा सदा है निआउ ॥३॥

साचे साहिब अलख अभेव ॥ नानक लाइआ लागा सेव ॥४॥२०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 376) आसा महला ५ ॥
निकटि जीअ कै सद ही संगा ॥ कुदरति वरतै रूप अरु रंगा ॥१॥

कर्है न झुरै ना मनु रोवनहारा ॥ अविनासी अविगतु अगोचरु सदा सलामति खसमु हमारा ॥१॥ रहाउ ॥

तेरे दासरे कउ किस की काणि ॥ जिस की मीरा राखै आणि ॥२॥

जो लउडा प्रभि कीआ अजाति ॥ तिसु लउडे कउ किस की ताति ॥३॥

वेमुहताजा वेपरवाहु ॥ नानक दास कहहु गुर वाहु ॥४॥२१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 376) आसा महला ५ ॥
हरि रसु छोडि होछै रसि माता ॥ घर महि वसतु बाहरि उठि जाता ॥१॥

सुनी न जाई सचु अम्रित काथा ॥ रारि करत झूठी लगि गाथा ॥१॥ रहाउ ॥

वजहु साहिब का सेव बिरानी ॥ ऐसे गुनह अछादिओ प्रानी ॥२॥

तिसु सिउ लूक जो सद ही संगी ॥ कामि न आवै सो फिरि फिरि मंगी ॥३॥

कहु नानक प्रभ दीन दइआला ॥ जिउ भावै तिउ करि प्रतिपाला ॥४॥२२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 376) आसा महला ५ ॥
जीअ प्रान धनु हरि को नामु ॥ ईहा ऊहां उन संगि कामु ॥१॥

बिनु हरि नाम अवरु सभु थोरा ॥ त्रिपति अघावै हरि दरसनि मनु मोरा ॥१॥ रहाउ ॥

भगति भंडार गुरबाणी लाल ॥ गावत सुनत कमावत निहाल ॥२॥

चरण कमल सिउ लागो मानु ॥ सतिगुरि तूठै कीनो दानु ॥३॥

नानक कउ गुरि दीखिआ दीन्ह ॥ प्रभ अबिनासी घटि घटि चीन्ह ॥४॥२३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 376) आसा महला ५ ॥
अनद बिनोद भरेपुरि धारिआ ॥ अपुना कारजु आपि सवारिआ ॥१॥

पूर समग्री पूरे ठाकुर की ॥ भरिपुरि धारि रही सोभ जा की ॥१॥ रहाउ ॥

नामु निधानु जा की निरमल सोइ ॥ आपे करता अवरु न कोइ ॥२॥

जीअ जंत सभि ता कै हाथि ॥ रवि रहिआ प्रभु सभ कै साथि ॥३॥

पूरा गुरु पूरी बणत बणाई ॥ नानक भगत मिली वडिआई ॥४॥२४॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 377) आसा महला ५ ॥
गुर कै सबदि बनावहु इहु मनु ॥ गुर का दरसनु संचहु हरि धनु ॥१॥

ऊतम मति मेरै रिदै तूं आउ ॥ धिआवउ गावउ गुण गोविंदा अति प्रीतम मोहि लागै नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

त्रिपति अघावनु साचै नाइ ॥ अठसठि मजनु संत धूराइ ॥२॥

सभ महि जानउ करता एक ॥ साधसंगति मिलि बुधि बिबेक ॥३॥

दासु सगल का छोडि अभिमानु ॥ नानक कउ गुरि दीनो दानु ॥४॥२५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 377) आसा महला ५ ॥
बुधि प्रगास भई मति पूरी ॥ ता ते बिनसी दुरमति दूरी ॥१॥

ऐसी गुरमति पाईअले ॥ बूडत घोर अंध कूप महि निकसिओ मेरे भाई रे ॥१॥ रहाउ ॥

महा अगाह अगनि का सागरु ॥ गुरु बोहिथु तारे रतनागरु ॥२॥

दुतर अंध बिखम इह माइआ ॥ गुरि पूरै परगटु मारगु दिखाइआ ॥३॥

जाप ताप कछु उकति न मोरी ॥ गुर नानक सरणागति तोरी ॥४॥२६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 377) आसा महला ५ तिपदे २ ॥
हरि रसु पीवत सद ही राता ॥ आन रसा खिन महि लहि जाता ॥ हरि रस के माते मनि सदा अनंद ॥ आन रसा महि विआपै चिंद ॥१॥

हरि रसु पीवै अलमसतु मतवारा ॥ आन रसा सभि होछे रे ॥१॥ रहाउ ॥

हरि रस की कीमति कही न जाइ ॥ हरि रसु साधू हाटि समाइ ॥ लाख करोरी मिलै न केह ॥ जिसहि परापति तिस ही देहि ॥२॥

नानक चाखि भए बिसमादु ॥ नानक गुर ते आइआ सादु ॥ ईत ऊत कत छोडि न जाइ ॥ नानक गीधा हरि रस माहि ॥३॥२७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 377) आसा महला ५ ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु मिटावै छुटकै दुरमति अपुनी धारी ॥ होइ निमाणी सेव कमावहि ता प्रीतम होवहि मनि पिआरी ॥१॥

सुणि सुंदरि साधू बचन उधारी ॥ दूख भूख मिटै तेरो सहसा सुख पावहि तूं सुखमनि नारी ॥१॥ रहाउ ॥

चरण पखारि करउ गुर सेवा आतम सुधु बिखु तिआस निवारी ॥ दासन की होइ दासि दासरी ता पावहि सोभा हरि दुआरी ॥२॥

इही अचार इही बिउहारा आगिआ मानि भगति होइ तुम्हारी ॥ जो इहु मंत्रु कमावै नानक सो भउजलु पारि उतारी ॥३॥२८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 378) आसा महला ५ दुपदे ॥
भई परापति मानुख देहुरीआ ॥ गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ ॥ अवरि काज तेरै कितै न काम ॥ मिलु साधसंगति भजु केवल नाम ॥१॥

सरंजामि लागु भवजल तरन कै ॥ जनमु ब्रिथा जात रंगि माइआ कै ॥१॥ रहाउ ॥

जपु तपु संजमु धरमु न कमाइआ ॥ सेवा साध न जानिआ हरि राइआ ॥ कहु नानक हम नीच करमा ॥ सरणि परे की राखहु सरमा ॥२॥२९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 378) आसा महला ५ ॥
तुझ बिनु अवरु नाही मै दूजा तूं मेरे मन माही ॥ तूं साजनु संगी प्रभु मेरा काहे जीअ डराही ॥१॥

तुमरी ओट तुमारी आसा ॥ बैठत ऊठत सोवत जागत विसरु नाही तूं सास गिरासा ॥१॥ रहाउ ॥

राखु राखु सरणि प्रभ अपनी अगनि सागर विकराला ॥ नानक के सुखदाते सतिगुर हम तुमरे बाल गुपाला ॥२॥३०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 378) आसा महला ५ ॥
हरि जन लीने प्रभू छडाइ ॥ प्रीतम सिउ मेरो मनु मानिआ तापु मुआ बिखु खाइ ॥१॥ रहाउ ॥

पाला ताऊ कछू न बिआपै राम नाम गुन गाइ ॥ डाकी को चिति कछू न लागै चरन कमल सरनाइ ॥१॥

संत प्रसादि भए किरपाला होए आपि सहाइ ॥ गुन निधान निति गावै नानकु सहसा दुखु मिटाइ ॥२॥३१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 378) आसा महला ५ ॥
अउखधु खाइओ हरि को नाउ ॥ सुख पाए दुख बिनसिआ थाउ ॥१॥

तापु गइआ बचनि गुर पूरे ॥ अनदु भइआ सभि मिटे विसूरे ॥१॥ रहाउ ॥

जीअ जंत सगल सुखु पाइआ ॥ पारब्रहमु नानक मनि धिआइआ ॥२॥३२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 378) आसा महला ५ ॥
बांछत नाही सु बेला आई ॥ बिनु हुकमै किउ बुझै बुझाई ॥१॥

ठंढी ताती मिटी खाई ॥ ओहु न बाला बूढा भाई ॥१॥ रहाउ ॥

नानक दास साध सरणाई ॥ गुर प्रसादि भउ पारि पराई ॥२॥३३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 378) आसा महला ५ ॥
सदा सदा आतम परगासु ॥ साधसंगति हरि चरण निवासु ॥१॥

राम नाम निति जपि मन मेरे ॥ सीतल सांति सदा सुख पावहि किलविख जाहि सभे मन तेरे ॥१॥ रहाउ ॥

कहु नानक जा के पूरन करम ॥ सतिगुर भेटे पूरन पारब्रहम ॥२॥३४॥

दूजे घर के चउतीस ॥ (गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 378) आसा महला ५ ॥
जा का हरि सुआमी प्रभु बेली ॥ पीड़ गई फिरि नही दुहेली ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा चरन संगि मेली ॥ सूख सहज आनंद सुहेली ॥१॥

साधसंगि गुण गाइ अतोली ॥ हरि सिमरत नानक भई अमोली ॥२॥३५॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 379) आसा महला ५ ॥
काम क्रोध माइआ मद मतसर ए खेलत सभि जूऐ हारे ॥ सतु संतोखु दइआ धरमु सचु इह अपुनै ग्रिह भीतरि वारे ॥१॥

जनम मरन चूके सभि भारे ॥ मिलत संगि भइओ मनु निरमलु गुरि पूरै लै खिन महि तारे ॥१॥ रहाउ ॥

सभ की रेनु होइ रहै मनूआ सगले दीसहि मीत पिआरे ॥ सभ मधे रविआ मेरा ठाकुरु दानु देत सभि जीअ सम्हारे ॥२॥

एको एकु आपि इकु एकै एकै है सगला पासारे ॥ जपि जपि होए सगल साध जन एकु नामु धिआइ बहुतु उधारे ॥३॥

गहिर ग्मभीर बिअंत गुसाई अंतु नही किछु पारावारे ॥ तुम्हरी क्रिपा ते गुन गावै नानक धिआइ धिआइ प्रभ कउ नमसकारे ॥४॥३६॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 379) आसा महला ५ ॥
तू बिअंतु अविगतु अगोचरु इहु सभु तेरा आकारु ॥ किआ हम जंत करह चतुराई जां सभु किछु तुझै मझारि ॥१॥

मेरे सतिगुर अपने बालिक राखहु लीला धारि ॥ देहु सुमति सदा गुण गावा मेरे ठाकुर अगम अपार ॥१॥ रहाउ ॥

जैसे जननि जठर महि प्रानी ओहु रहता नाम अधारि ॥ अनदु करै सासि सासि सम्हारै ना पोहै अगनारि ॥२॥

पर धन पर दारा पर निंदा इन सिउ प्रीति निवारि ॥ चरन कमल सेवी रिद अंतरि गुर पूरे कै आधारि ॥३॥

ग्रिहु मंदर महला जो दीसहि ना कोई संगारि ॥ जब लगु जीवहि कली काल महि जन नानक नामु सम्हारि ॥४॥३७॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 379) आसा घरु ३ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राज मिलक जोबन ग्रिह सोभा रूपवंतु जोआनी ॥ बहुतु दरबु हसती अरु घोड़े लाल लाख बै आनी ॥ आगै दरगहि कामि न आवै छोडि चलै अभिमानी ॥१॥

काहे एक बिना चितु लाईऐ ॥ ऊठत बैठत सोवत जागत सदा सदा हरि धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

महा बचित्र सुंदर आखाड़े रण महि जिते पवाड़े ॥ हउ मारउ हउ बंधउ छोडउ मुख ते एव बबाड़े ॥ आइआ हुकमु पारब्रहम का छोडि चलिआ एक दिहाड़े ॥२॥

करम धरम जुगति बहु करता करणैहारु न जानै ॥ उपदेसु करै आपि न कमावै ततु सबदु न पछानै ॥ नांगा आइआ नांगो जासी जिउ हसती खाकु छानै ॥३॥

संत सजन सुनहु सभि मीता झूठा एहु पसारा ॥ मेरी मेरी करि करि डूबे खपि खपि मुए गवारा ॥ गुर मिलि नानक नामु धिआइआ साचि नामि निसतारा ॥४॥१॥३८॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 380) रागु आसा घरु ५ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भ्रम महि सोई सगल जगत धंध अंध ॥ कोऊ जागै हरि जनु ॥१॥

महा मोहनी मगन प्रिअ प्रीति प्रान ॥ कोऊ तिआगै विरला ॥२॥

चरन कमल आनूप हरि संत मंत ॥ कोऊ लागै साधू ॥३॥

नानक साधू संगि जागे गिआन रंगि ॥ वडभागे किरपा ॥४॥१॥३९॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 380) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा घरु ६ महला ५ ॥
जो तुधु भावै सो परवाना सूखु सहजु मनि सोई ॥ करण कारण समरथ अपारा अवरु नाही रे कोई ॥१॥

तेरे जन रसकि रसकि गुण गावहि ॥ मसलति मता सिआणप जन की जो तूं करहि करावहि ॥१॥ रहाउ ॥

अम्रितु नामु तुमारा पिआरे साधसंगि रसु पाइआ ॥ त्रिपति अघाइ सेई जन पूरे सुख निधानु हरि गाइआ ॥२॥

जा कउ टेक तुम्हारी सुआमी ता कउ नाही चिंता ॥ जा कउ दइआ तुमारी होई से साह भले भगवंता ॥३॥

भरम मोह ध्रोह सभि निकसे जब का दरसनु पाइआ ॥ वरतणि नामु नानक सचु कीना हरि नामे रंगि समाइआ ॥४॥१॥४०॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 380) आसा महला ५ ॥
जनम जनम की मलु धोवै पराई आपणा कीता पावै ॥ ईहा सुखु नही दरगह ढोई जम पुरि जाइ पचावै ॥१॥

निंदकि अहिला जनमु गवाइआ ॥ पहुचि न साकै काहू बातै आगै ठउर न पाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

किरतु पइआ निंदक बपुरे का किआ ओहु करै बिचारा ॥ तहा बिगूता जह कोइ न राखै ओहु किसु पहि करे पुकारा ॥२॥

निंदक की गति कतहूं नाही खसमै एवै भाणा ॥ जो जो निंद करे संतन की तिउ संतन सुखु माना ॥३॥

संता टेक तुमारी सुआमी तूं संतन का सहाई ॥ कहु नानक संत हरि राखे निंदक दीए रुड़ाई ॥४॥२॥४१॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 381) आसा महला ५ ॥
बाहरु धोइ अंतरु मनु मैला दुइ ठउर अपुने खोए ॥ ईहा कामि क्रोधि मोहि विआपिआ आगै मुसि मुसि रोए ॥१॥

गोविंद भजन की मति है होरा ॥ वरमी मारी सापु न मरई नामु न सुनई डोरा ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ की किरति छोडि गवाई भगती सार न जानै ॥ बेद सासत्र कउ तरकनि लागा ततु जोगु न पछानै ॥२॥

उघरि गइआ जैसा खोटा ढबूआ नदरि सराफा आइआ ॥ अंतरजामी सभु किछु जानै उस ते कहा छपाइआ ॥३॥

कूड़ि कपटि बंचि निमुनीआदा बिनसि गइआ ततकाले ॥ सति सति सति नानकि कहिआ अपनै हिरदै देखु समाले ॥४॥३॥४२॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 381) आसा महला ५ ॥
उदमु करत होवै मनु निरमलु नाचै आपु निवारे ॥ पंच जना ले वसगति राखै मन महि एकंकारे ॥१॥

तेरा जनु निरति करे गुन गावै ॥ रबाबु पखावज ताल घुंघरू अनहद सबदु वजावै ॥१॥ रहाउ ॥

प्रथमे मनु परबोधै अपना पाछै अवर रीझावै ॥ राम नाम जपु हिरदै जापै मुख ते सगल सुनावै ॥२॥

कर संगि साधू चरन पखारै संत धूरि तनि लावै ॥ मनु तनु अरपि धरे गुर आगै सति पदारथु पावै ॥३॥

जो जो सुनै पेखै लाइ सरधा ता का जनम मरन दुखु भागै ॥ ऐसी निरति नरक निवारै नानक गुरमुखि जागै ॥४॥४॥४३॥

(गुरू अर्जन देव जी -- SGGS 381) आसा महला ५ ॥
अधम चंडाली भई ब्रहमणी सूदी ते स्रेसटाई रे ॥ पाताली आकासी सखनी लहबर बूझी खाई रे ॥१॥

घर की बिलाई अवर सिखाई मूसा देखि डराई रे ॥ अज कै वसि गुरि कीनो केहरि कूकर तिनहि लगाई रे ॥१॥ रहाउ ॥

बाझु थूनीआ छपरा थाम्हिआ नीघरिआ घरु पाइआ रे ॥ बिनु जड़ीए लै जड़िओ जड़ावा थेवा अचरजु लाइआ रे ॥२॥

दादी दादि न पहुचनहारा चूपी निरनउ पाइआ रे ॥ मालि दुलीचै बैठी ले मिरतकु नैन दिखालनु धाइआ रे ॥३॥

सोई अजाणु कहै मै जाना जानणहारु न छाना रे ॥ कहु नानक गुरि अमिउ पीआइआ रसकि रसकि बिगसाना रे ॥४॥५॥४४॥


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