Pt 2 - राग आसा - बाणी शब्द, Part 2 - Raag Asa - Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(गुरू नानक देव जी -- SGGS 356) आसा महला १ पंचपदे ॥
मोहु कुट्मबु मोहु सभ कार ॥ मोहु तुम तजहु सगल वेकार ॥१॥

मोहु अरु भरमु तजहु तुम्ह बीर ॥ साचु नामु रिदे रवै सरीर ॥१॥ रहाउ ॥

सचु नामु जा नव निधि पाई ॥ रोवै पूतु न कलपै माई ॥२॥

एतु मोहि डूबा संसारु ॥ गुरमुखि कोई उतरै पारि ॥३॥

एतु मोहि फिरि जूनी पाहि ॥ मोहे लागा जम पुरि जाहि ॥४॥

गुर दीखिआ ले जपु तपु कमाहि ॥ ना मोहु तूटै ना थाइ पाहि ॥५॥

नदरि करे ता एहु मोहु जाइ ॥ नानक हरि सिउ रहै समाइ ॥६॥२३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 356) आसा महला १ ॥
आपि करे सचु अलख अपारु ॥ हउ पापी तूं बखसणहारु ॥१॥

तेरा भाणा सभु किछु होवै ॥ मनहठि कीचै अंति विगोवै ॥१॥ रहाउ ॥

मनमुख की मति कूड़ि विआपी ॥ बिनु हरि सिमरण पापि संतापी ॥२॥

दुरमति तिआगि लाहा किछु लेवहु ॥ जो उपजै सो अलख अभेवहु ॥३॥

ऐसा हमरा सखा सहाई ॥ गुर हरि मिलिआ भगति द्रिड़ाई ॥४॥

सगलीं सउदीं तोटा आवै ॥ नानक राम नामु मनि भावै ॥५॥२४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 356) आसा महला १ चउपदे ॥
विदिआ वीचारी तां परउपकारी ॥ जां पंच रासी तां तीरथ वासी ॥१॥

घुंघरू वाजै जे मनु लागै ॥ तउ जमु कहा करे मो सिउ आगै ॥१॥ रहाउ ॥

आस निरासी तउ संनिआसी ॥ जां जतु जोगी तां काइआ भोगी ॥२॥

दइआ दिग्मबरु देह बीचारी ॥ आपि मरै अवरा नह मारी ॥३॥

एकु तू होरि वेस बहुतेरे ॥ नानकु जाणै चोज न तेरे ॥४॥२५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 356) आसा महला १ ॥
एक न भरीआ गुण करि धोवा ॥ मेरा सहु जागै हउ निसि भरि सोवा ॥१॥

इउ किउ कंत पिआरी होवा ॥ सहु जागै हउ निस भरि सोवा ॥१॥ रहाउ ॥

आस पिआसी सेजै आवा ॥ आगै सह भावा कि न भावा ॥२॥

किआ जाना किआ होइगा री माई ॥ हरि दरसन बिनु रहनु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

प्रेमु न चाखिआ मेरी तिस न बुझानी ॥ गइआ सु जोबनु धन पछुतानी ॥३॥

अजै सु जागउ आस पिआसी ॥ भईले उदासी रहउ निरासी ॥१॥ रहाउ ॥

हउमै खोइ करे सीगारु ॥ तउ कामणि सेजै रवै भतारु ॥४॥

तउ नानक कंतै मनि भावै ॥ छोडि वडाई अपणे खसम समावै ॥१॥ रहाउ ॥२६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 357) आसा महला १ ॥
पेवकड़ै धन खरी इआणी ॥ तिसु सह की मै सार न जाणी ॥१॥

सहु मेरा एकु दूजा नही कोई ॥ नदरि करे मेलावा होई ॥१॥ रहाउ ॥

साहुरड़ै धन साचु पछाणिआ ॥ सहजि सुभाइ अपणा पिरु जाणिआ ॥२॥

गुर परसादी ऐसी मति आवै ॥ तां कामणि कंतै मनि भावै ॥३॥

कहतु नानकु भै भाव का करे सीगारु ॥ सद ही सेजै रवै भतारु ॥४॥२७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 357) आसा महला १ ॥
न किस का पूतु न किस की माई ॥ झूठै मोहि भरमि भुलाई ॥१॥

मेरे साहिब हउ कीता तेरा ॥ जां तूं देहि जपी नाउ तेरा ॥१॥ रहाउ ॥

बहुते अउगण कूकै कोई ॥ जा तिसु भावै बखसे सोई ॥२॥

गुर परसादी दुरमति खोई ॥ जह देखा तह एको सोई ॥३॥

कहत नानक ऐसी मति आवै ॥ तां को सचे सचि समावै ॥४॥२८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 357) आसा महला १ दुपदे ॥
तितु सरवरड़ै भईले निवासा पाणी पावकु तिनहि कीआ ॥ पंकजु मोह पगु नही चालै हम देखा तह डूबीअले ॥१॥

मन एकु न चेतसि मूड़ मना ॥ हरि बिसरत तेरे गुण गलिआ ॥१॥ रहाउ ॥

ना हउ जती सती नही पड़िआ मूरख मुगधा जनमु भइआ ॥ प्रणवति नानक तिन्ह की सरणा जिन्ह तूं नाही वीसरिआ ॥२॥२९॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 357) आसा महला १ ॥
छिअ घर छिअ गुर छिअ उपदेस ॥ गुर गुरु एको वेस अनेक ॥१॥

जै घरि करते कीरति होइ ॥ सो घरु राखु वडाई तोहि ॥१॥ रहाउ ॥

विसुए चसिआ घड़ीआ पहरा थिती वारी माहु भइआ ॥ सूरजु एको रुति अनेक ॥ नानक करते के केते वेस ॥२॥३०॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 358) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा घरु ३ महला १ ॥
लख लसकर लख वाजे नेजे लख उठि करहि सलामु ॥ लखा उपरि फुरमाइसि तेरी लख उठि राखहि मानु ॥ जां पति लेखै ना पवै तां सभि निराफल काम ॥१॥

हरि के नाम बिना जगु धंधा ॥ जे बहुता समझाईऐ भोला भी सो अंधो अंधा ॥१॥ रहाउ ॥

लख खटीअहि लख संजीअहि खाजहि लख आवहि लख जाहि ॥ जां पति लेखै ना पवै तां जीअ किथै फिरि पाहि ॥२॥

लख सासत समझावणी लख पंडित पड़हि पुराण ॥ जां पति लेखै ना पवै तां सभे कुपरवाण ॥३॥

सच नामि पति ऊपजै करमि नामु करतारु ॥ अहिनिसि हिरदै जे वसै नानक नदरी पारु ॥४॥१॥३१॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 358) आसा महला १ ॥
दीवा मेरा एकु नामु दुखु विचि पाइआ तेलु ॥ उनि चानणि ओहु सोखिआ चूका जम सिउ मेलु ॥१॥

लोका मत को फकड़ि पाइ ॥ लख मड़िआ करि एकठे एक रती ले भाहि ॥१॥ रहाउ ॥

पिंडु पतलि मेरी केसउ किरिआ सचु नामु करतारु ॥ ऐथै ओथै आगै पाछै एहु मेरा आधारु ॥२॥

गंग बनारसि सिफति तुमारी नावै आतम राउ ॥ सचा नावणु तां थीऐ जां अहिनिसि लागै भाउ ॥३॥

इक लोकी होरु छमिछरी ब्राहमणु वटि पिंडु खाइ ॥ नानक पिंडु बखसीस का कबहूं निखूटसि नाहि ॥४॥२॥३२॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 358) आसा घरु ४ महला १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
देवतिआ दरसन कै ताई दूख भूख तीरथ कीए ॥ जोगी जती जुगति महि रहते करि करि भगवे भेख भए ॥१॥

तउ कारणि साहिबा रंगि रते ॥ तेरे नाम अनेका रूप अनंता कहणु न जाही तेरे गुण केते ॥१॥ रहाउ ॥

दर घर महला हसती घोड़े छोडि विलाइति देस गए ॥ पीर पेकांबर सालिक सादिक छोडी दुनीआ थाइ पए ॥२॥

साद सहज सुख रस कस तजीअले कापड़ छोडे चमड़ लीए ॥ दुखीए दरदवंद दरि तेरै नामि रते दरवेस भए ॥३॥

खलड़ी खपरी लकड़ी चमड़ी सिखा सूतु धोती कीन्ही ॥ तूं साहिबु हउ सांगी तेरा प्रणवै नानकु जाति कैसी ॥४॥१॥३३॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 359) आसा घरु ५ महला १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भीतरि पंच गुपत मनि वासे ॥ थिरु न रहहि जैसे भवहि उदासे ॥१॥

मनु मेरा दइआल सेती थिरु न रहै ॥ लोभी कपटी पापी पाखंडी माइआ अधिक लगै ॥१॥ रहाउ ॥

फूल माला गलि पहिरउगी हारो ॥ मिलैगा प्रीतमु तब करउगी सीगारो ॥२॥

पंच सखी हम एकु भतारो ॥ पेडि लगी है जीअड़ा चालणहारो ॥३॥

पंच सखी मिलि रुदनु करेहा ॥ साहु पजूता प्रणवति नानक लेखा देहा ॥४॥१॥३४॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 359) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा घरु ६ महला १ ॥
मनु मोती जे गहणा होवै पउणु होवै सूत धारी ॥ खिमा सीगारु कामणि तनि पहिरै रावै लाल पिआरी ॥१॥

लाल बहु गुणि कामणि मोही ॥ तेरे गुण होहि न अवरी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि हारु कंठि ले पहिरै दामोदरु दंतु लेई ॥ कर करि करता कंगन पहिरै इन बिधि चितु धरेई ॥२॥

मधुसूदनु कर मुंदरी पहिरै परमेसरु पटु लेई ॥ धीरजु धड़ी बंधावै कामणि स्रीरंगु सुरमा देई ॥३॥

मन मंदरि जे दीपकु जाले काइआ सेज करेई ॥ गिआन राउ जब सेजै आवै त नानक भोगु करेई ॥४॥१॥३५॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 359) आसा महला १ ॥
कीता होवै करे कराइआ तिसु किआ कहीऐ भाई ॥ जो किछु करणा सो करि रहिआ कीते किआ चतुराई ॥१॥

तेरा हुकमु भला तुधु भावै ॥ नानक ता कउ मिलै वडाई साचे नामि समावै ॥१॥ रहाउ ॥

किरतु पइआ परवाणा लिखिआ बाहुड़ि हुकमु न होई ॥ जैसा लिखिआ तैसा पड़िआ मेटि न सकै कोई ॥२॥

जे को दरगह बहुता बोलै नाउ पवै बाजारी ॥ सतरंज बाजी पकै नाही कची आवै सारी ॥३॥

ना को पड़िआ पंडितु बीना ना को मूरखु मंदा ॥ बंदी अंदरि सिफति कराए ता कउ कहीऐ बंदा ॥४॥२॥३६॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 359) आसा महला १ ॥
गुर का सबदु मनै महि मुंद्रा खिंथा खिमा हढावउ ॥ जो किछु करै भला करि मानउ सहज जोग निधि पावउ ॥१॥

बाबा जुगता जीउ जुगह जुग जोगी परम तंत महि जोगं ॥ अम्रितु नामु निरंजन पाइआ गिआन काइआ रस भोगं ॥१॥ रहाउ ॥

सिव नगरी महि आसणि बैसउ कलप तिआगी बादं ॥ सिंङी सबदु सदा धुनि सोहै अहिनिसि पूरै नादं ॥२॥

पतु वीचारु गिआन मति डंडा वरतमान बिभूतं ॥ हरि कीरति रहरासि हमारी गुरमुखि पंथु अतीतं ॥३॥

सगली जोति हमारी समिआ नाना वरन अनेकं ॥ कहु नानक सुणि भरथरि जोगी पारब्रहम लिव एकं ॥४॥३॥३७॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 360) आसा महला १ ॥
गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि धावै करि करणी कसु पाईऐ ॥ भाठी भवनु प्रेम का पोचा इतु रसि अमिउ चुआईऐ ॥१॥

बाबा मनु मतवारो नाम रसु पीवै सहज रंग रचि रहिआ ॥ अहिनिसि बनी प्रेम लिव लागी सबदु अनाहद गहिआ ॥१॥ रहाउ ॥

पूरा साचु पिआला सहजे तिसहि पीआए जा कउ नदरि करे ॥ अम्रित का वापारी होवै किआ मदि छूछै भाउ धरे ॥२॥

गुर की साखी अम्रित बाणी पीवत ही परवाणु भइआ ॥ दर दरसन का प्रीतमु होवै मुकति बैकुंठै करै किआ ॥३॥

सिफती रता सद बैरागी जूऐ जनमु न हारै ॥ कहु नानक सुणि भरथरि जोगी खीवा अम्रित धारै ॥४॥४॥३८॥

(गुरू नानक देव जी -- SGGS 360) आसा महला १ ॥
खुरासान खसमाना कीआ हिंदुसतानु डराइआ ॥ आपै दोसु न देई करता जमु करि मुगलु चड़ाइआ ॥ एती मार पई करलाणे तैं की दरदु न आइआ ॥१॥

करता तूं सभना का सोई ॥ जे सकता सकते कउ मारे ता मनि रोसु न होई ॥१॥ रहाउ ॥

सकता सीहु मारे पै वगै खसमै सा पुरसाई ॥ रतन विगाड़ि विगोए कुतीं मुइआ सार न काई ॥ आपे जोड़ि विछोड़े आपे वेखु तेरी वडिआई ॥२॥

जे को नाउ धराए वडा साद करे मनि भाणे ॥ खसमै नदरी कीड़ा आवै जेते चुगै दाणे ॥ मरि मरि जीवै ता किछु पाए नानक नामु वखाणे ॥३॥५॥३९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 360) रागु आसा घरु २ महला ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि दरसनु पावै वडभागि ॥ गुर कै सबदि सचै बैरागि ॥ खटु दरसनु वरतै वरतारा ॥ गुर का दरसनु अगम अपारा ॥१॥

गुर कै दरसनि मुकति गति होइ ॥ साचा आपि वसै मनि सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर दरसनि उधरै संसारा ॥ जे को लाए भाउ पिआरा ॥ भाउ पिआरा लाए विरला कोइ ॥ गुर कै दरसनि सदा सुखु होइ ॥२॥

गुर कै दरसनि मोख दुआरु ॥ सतिगुरु सेवै परवार साधारु ॥ निगुरे कउ गति काई नाही ॥ अवगणि मुठे चोटा खाही ॥३॥

गुर कै सबदि सुखु सांति सरीर ॥ गुरमुखि ता कउ लगै न पीर ॥ जमकालु तिसु नेड़ि न आवै ॥ नानक गुरमुखि साचि समावै ॥४॥१॥४०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 361) आसा महला ३ ॥
सबदि मुआ विचहु आपु गवाइ ॥ सतिगुरु सेवे तिलु न तमाइ ॥ निरभउ दाता सदा मनि होइ ॥ सची बाणी पाए भागि कोइ ॥१॥

गुण संग्रहु विचहु अउगुण जाहि ॥ पूरे गुर कै सबदि समाहि ॥१॥ रहाउ ॥

गुणा का गाहकु होवै सो गुण जाणै ॥ अम्रित सबदि नामु वखाणै ॥ साची बाणी सूचा होइ ॥ गुण ते नामु परापति होइ ॥२॥

गुण अमोलक पाए न जाहि ॥ मनि निरमल साचै सबदि समाहि ॥ से वडभागी जिन्ह नामु धिआइआ ॥ सदा गुणदाता मंनि वसाइआ ॥३॥

जो गुण संग्रहै तिन्ह बलिहारै जाउ ॥ दरि साचै साचे गुण गाउ ॥ आपे देवै सहजि सुभाइ ॥ नानक कीमति कहणु न जाइ ॥४॥२॥४१॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 361) आसा महला ३ ॥
सतिगुर विचि वडी वडिआई ॥ चिरी विछुंने मेलि मिलाई ॥ आपे मेले मेलि मिलाए ॥ आपणी कीमति आपे पाए ॥१॥

हरि की कीमति किन बिधि होइ ॥ हरि अपर्मपरु अगम अगोचरु गुर कै सबदि मिलै जनु कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि कीमति जाणै कोइ ॥ विरले करमि परापति होइ ॥ ऊची बाणी ऊचा होइ ॥ गुरमुखि सबदि वखाणै कोइ ॥२॥

विणु नावै दुखु दरदु सरीरि ॥ सतिगुरु भेटे ता उतरै पीर ॥ बिनु गुर भेटे दुखु कमाइ ॥ मनमुखि बहुती मिलै सजाइ ॥३॥

हरि का नामु मीठा अति रसु होइ ॥ पीवत रहै पीआए सोइ ॥ गुर किरपा ते हरि रसु पाए ॥ नानक नामि रते गति पाए ॥४॥३॥४२॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 361) आसा महला ३ ॥
मेरा प्रभु साचा गहिर ग्मभीर ॥ सेवत ही सुखु सांति सरीर ॥ सबदि तरे जन सहजि सुभाइ ॥ तिन कै हम सद लागह पाइ ॥१॥

जो मनि राते हरि रंगु लाइ ॥ तिन का जनम मरण दुखु लाथा ते हरि दरगह मिले सुभाइ ॥१॥ रहाउ ॥

सबदु चाखै साचा सादु पाए ॥ हरि का नामु मंनि वसाए ॥ हरि प्रभु सदा रहिआ भरपूरि ॥ आपे नेड़ै आपे दूरि ॥२॥

आखणि आखै बकै सभु कोइ ॥ आपे बखसि मिलाए सोइ ॥ कहणै कथनि न पाइआ जाइ ॥ गुर परसादि वसै मनि आइ ॥३॥

गुरमुखि विचहु आपु गवाइ ॥ हरि रंगि राते मोहु चुकाइ ॥ अति निरमलु गुर सबद वीचार ॥ नानक नामि सवारणहार ॥४॥४॥४३॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 362) आसा महला ३ ॥
दूजै भाइ लगे दुखु पाइआ ॥ बिनु सबदै बिरथा जनमु गवाइआ ॥ सतिगुरु सेवै सोझी होइ ॥ दूजै भाइ न लागै कोइ ॥१॥

मूलि लागे से जन परवाणु ॥ अनदिनु राम नामु जपि हिरदै गुर सबदी हरि एको जाणु ॥१॥ रहाउ ॥

डाली लागै निहफलु जाइ ॥ अंधीं कमी अंध सजाइ ॥ मनमुखु अंधा ठउर न पाइ ॥ बिसटा का कीड़ा बिसटा माहि पचाइ ॥२॥

गुर की सेवा सदा सुखु पाए ॥ संतसंगति मिलि हरि गुण गाए ॥ नामे नामि करे वीचारु ॥ आपि तरै कुल उधरणहारु ॥३॥

गुर की बाणी नामि वजाए ॥ नानक महलु सबदि घरु पाए ॥ गुरमति सत सरि हरि जलि नाइआ ॥ दुरमति मैलु सभु दुरतु गवाइआ ॥४॥५॥४४॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 362) आसा महला ३ ॥
मनमुख मरहि मरि मरणु विगाड़हि ॥ दूजै भाइ आतम संघारहि ॥ मेरा मेरा करि करि विगूता ॥ आतमु न चीन्है भरमै विचि सूता ॥१॥

मरु मुइआ सबदे मरि जाइ ॥ उसतति निंदा गुरि सम जाणाई इसु जुग महि लाहा हरि जपि लै जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

नाम विहूण गरभ गलि जाइ ॥ बिरथा जनमु दूजै लोभाइ ॥ नाम बिहूणी दुखि जलै सबाई ॥ सतिगुरि पूरै बूझ बुझाई ॥२॥

मनु चंचलु बहु चोटा खाइ ॥ एथहु छुड़किआ ठउर न पाइ ॥ गरभ जोनि विसटा का वासु ॥ तितु घरि मनमुखु करे निवासु ॥३॥

अपुने सतिगुर कउ सदा बलि जाई ॥ गुरमुखि जोती जोति मिलाई ॥ निरमल बाणी निज घरि वासा ॥ नानक हउमै मारे सदा उदासा ॥४॥६॥४५॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 362) आसा महला ३ ॥
लालै आपणी जाति गवाई ॥ तनु मनु अरपे सतिगुर सरणाई ॥ हिरदै नामु वडी वडिआई ॥ सदा प्रीतमु प्रभु होइ सखाई ॥१॥

सो लाला जीवतु मरै ॥ सोगु हरखु दुइ सम करि जाणै गुर परसादी सबदि उधरै ॥१॥ रहाउ ॥

करणी कार धुरहु फुरमाई ॥ बिनु सबदै को थाइ न पाई ॥ करणी कीरति नामु वसाई ॥ आपे देवै ढिल न पाई ॥२॥

मनमुखि भरमि भुलै संसारु ॥ बिनु रासी कूड़ा करे वापारु ॥ विणु रासी वखरु पलै न पाइ ॥ मनमुखि भुला जनमु गवाइ ॥३॥

सतिगुरु सेवे सु लाला होइ ॥ ऊतम जाती ऊतमु सोइ ॥ गुर पउड़ी सभ दू ऊचा होइ ॥ नानक नामि वडाई होइ ॥४॥७॥४६॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 363) आसा महला ३ ॥
मनमुखि झूठो झूठु कमावै ॥ खसमै का महलु कदे न पावै ॥ दूजै लगी भरमि भुलावै ॥ ममता बाधा आवै जावै ॥१॥

दोहागणी का मन देखु सीगारु ॥ पुत्र कलति धनि माइआ चितु लाए झूठु मोहु पाखंड विकारु ॥१॥ रहाउ ॥

सदा सोहागणि जो प्रभ भावै ॥ गुर सबदी सीगारु बणावै ॥ सेज सुखाली अनदिनु हरि रावै ॥ मिलि प्रीतम सदा सुखु पावै ॥२॥

सा सोहागणि साची जिसु साचि पिआरु ॥ अपणा पिरु राखै सदा उर धारि ॥ नेड़ै वेखै सदा हदूरि ॥ मेरा प्रभु सरब रहिआ भरपूरि ॥३॥

आगै जाति रूपु न जाइ ॥ तेहा होवै जेहे करम कमाइ ॥ सबदे ऊचो ऊचा होइ ॥ नानक साचि समावै सोइ ॥४॥८॥४७॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 363) आसा महला ३ ॥
भगति रता जनु सहजि सुभाइ ॥ गुर कै भै साचै साचि समाइ ॥ बिनु गुर पूरे भगति न होइ ॥ मनमुख रुंने अपनी पति खोइ ॥१॥

मेरे मन हरि जपि सदा धिआइ ॥ सदा अनंदु होवै दिनु राती जो इछै सोई फलु पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर पूरे ते पूरा पाए ॥ हिरदै सबदु सचु नामु वसाए ॥ अंतरु निरमलु अम्रित सरि नाए ॥ सदा सूचे साचि समाए ॥२॥

हरि प्रभु वेखै सदा हजूरि ॥ गुर परसादि रहिआ भरपूरि ॥ जहा जाउ तह वेखा सोइ ॥ गुर बिनु दाता अवरु न कोइ ॥३॥

गुरु सागरु पूरा भंडार ॥ ऊतम रतन जवाहर अपार ॥ गुर परसादी देवणहारु ॥ नानक बखसे बखसणहारु ॥४॥९॥४८॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 363) आसा महला ३ ॥
गुरु साइरु सतिगुरु सचु सोइ ॥ पूरै भागि गुर सेवा होइ ॥ सो बूझै जिसु आपि बुझाए ॥ गुर परसादी सेव कराए ॥१॥

गिआन रतनि सभ सोझी होइ ॥ गुर परसादि अगिआनु बिनासै अनदिनु जागै वेखै सचु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

मोहु गुमानु गुर सबदि जलाए ॥ पूरे गुर ते सोझी पाए ॥ अंतरि महलु गुर सबदि पछाणै ॥ आवण जाणु रहै थिरु नामि समाणे ॥२॥

जमणु मरणा है संसारु ॥ मनमुखु अचेतु माइआ मोहु गुबारु ॥ पर निंदा बहु कूड़ु कमावै ॥ विसटा का कीड़ा विसटा माहि समावै ॥३॥

सतसंगति मिलि सभ सोझी पाए ॥ गुर का सबदु हरि भगति द्रिड़ाए ॥ भाणा मंने सदा सुखु होइ ॥ नानक सचि समावै सोइ ॥४॥१०॥४९॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 364) आसा महला ३ पंचपदे ॥
सबदि मरै तिसु सदा अनंद ॥ सतिगुर भेटे गुर गोबिंद ॥ ना फिरि मरै न आवै जाइ ॥ पूरे गुर ते साचि समाइ ॥१॥

जिन्ह कउ नामु लिखिआ धुरि लेखु ॥ ते अनदिनु नामु सदा धिआवहि गुर पूरे ते भगति विसेखु ॥१॥ रहाउ ॥

जिन्ह कउ हरि प्रभु लए मिलाइ ॥ तिन्ह की गहण गति कही न जाइ ॥ पूरै सतिगुर दिती वडिआई ॥ ऊतम पदवी हरि नामि समाई ॥२॥

जो किछु करे सु आपे आपि ॥ एक घड़ी महि थापि उथापि ॥ कहि कहि कहणा आखि सुणाए ॥ जे सउ घाले थाइ न पाए ॥३॥

जिन्ह कै पोतै पुंनु तिन्हा गुरू मिलाए ॥ सचु बाणी गुरु सबदु सुणाए ॥ जहां सबदु वसै तहां दुखु जाए ॥ गिआनि रतनि साचै सहजि समाए ॥४॥

नावै जेवडु होरु धनु नाही कोइ ॥ जिस नो बखसे साचा सोइ ॥ पूरै सबदि मंनि वसाए ॥ नानक नामि रते सुखु पाए ॥५॥११॥५०॥

(गुरू अमरदास जी -- SGGS 364) आसा महला ३ ॥
निरति करे बहु वाजे वजाए ॥ इहु मनु अंधा बोला है किसु आखि सुणाए ॥ अंतरि लोभु भरमु अनल वाउ ॥ दीवा बलै न सोझी पाइ ॥१॥

गुरमुखि भगति घटि चानणु होइ ॥ आपु पछाणि मिलै प्रभु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि निरति हरि लागै भाउ ॥ पूरे ताल विचहु आपु गवाइ ॥ मेरा प्रभु साचा आपे जाणु ॥ गुर कै सबदि अंतरि ब्रहमु पछाणु ॥२॥

गुरमुखि भगति अंतरि प्रीति पिआरु ॥ गुर का सबदु सहजि वीचारु ॥ गुरमुखि भगति जुगति सचु सोइ ॥ पाखंडि भगति निरति दुखु होइ ॥३॥

एहा भगति जनु जीवत मरै ॥ गुर परसादी भवजलु तरै ॥ गुर कै बचनि भगति थाइ पाइ ॥ हरि जीउ आपि वसै मनि आइ ॥४॥

हरि क्रिपा करे सतिगुरू मिलाए ॥ निहचल भगति हरि सिउ चितु लाए ॥ भगति रते तिन्ह सची सोइ ॥ नानक नामि रते सुखु होइ ॥५॥१२॥५१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 365) आसा महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥ जो तउ भावै सोई थीसी जो तूं देहि सोई हउ पाई ॥१॥ रहाउ ॥

सभ तेरी तूं सभनी धिआइआ ॥ जिस नो क्रिपा करहि तिनि नाम रतनु पाइआ ॥ गुरमुखि लाधा मनमुखि गवाइआ ॥ तुधु आपि विछोड़िआ आपि मिलाइआ ॥१॥

तूं दरीआउ सभ तुझ ही माहि ॥ तुझ बिनु दूजा कोई नाहि ॥ जीअ जंत सभि तेरा खेलु ॥ विजोगि मिलि विछुड़िआ संजोगी मेलु ॥२॥

जिस नो तू जाणाइहि सोई जनु जाणै ॥ हरि गुण सद ही आखि वखाणै ॥ जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥ सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥३॥

तू आपे करता तेरा कीआ सभु होइ ॥ तुधु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥ तू करि करि वेखहि जाणहि सोइ ॥ जन नानक गुरमुखि परगटु होइ ॥४॥१॥५३॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 366) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा घरु २ महला ४ ॥
किस ही धड़ा कीआ मित्र सुत नालि भाई ॥ किस ही धड़ा कीआ कुड़म सके नालि जवाई ॥ किस ही धड़ा कीआ सिकदार चउधरी नालि आपणै सुआई ॥ हमारा धड़ा हरि रहिआ समाई ॥१॥

हम हरि सिउ धड़ा कीआ मेरी हरि टेक ॥ मै हरि बिनु पखु धड़ा अवरु न कोई हउ हरि गुण गावा असंख अनेक ॥१॥ रहाउ ॥

जिन्ह सिउ धड़े करहि से जाहि ॥ झूठु धड़े करि पछोताहि ॥ थिरु न रहहि मनि खोटु कमाहि ॥ हम हरि सिउ धड़ा कीआ जिस का कोई समरथु नाहि ॥२॥

एह सभि धड़े माइआ मोह पसारी ॥ माइआ कउ लूझहि गावारी ॥ जनमि मरहि जूऐ बाजी हारी ॥ हमरै हरि धड़ा जि हलतु पलतु सभु सवारी ॥३॥

कलिजुग महि धड़े पंच चोर झगड़ाए ॥ कामु क्रोधु लोभु मोहु अभिमानु वधाए ॥ जिस नो क्रिपा करे तिसु सतसंगि मिलाए ॥ हमरा हरि धड़ा जिनि एह धड़े सभि गवाए ॥४॥

मिथिआ दूजा भाउ धड़े बहि पावै ॥ पराइआ छिद्रु अटकलै आपणा अहंकारु वधावै ॥ जैसा बीजै तैसा खावै ॥ जन नानक का हरि धड़ा धरमु सभ स्रिसटि जिणि आवै ॥५॥२॥५४॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 366) आसा महला ४ ॥
हिरदै सुणि सुणि मनि अम्रितु भाइआ ॥ गुरबाणी हरि अलखु लखाइआ ॥१॥

गुरमुखि नामु सुनहु मेरी भैना ॥ एको रवि रहिआ घट अंतरि मुखि बोलहु गुर अम्रित बैना ॥१॥ रहाउ ॥

मै मनि तनि प्रेमु महा बैरागु ॥ सतिगुरु पुरखु पाइआ वडभागु ॥२॥

दूजै भाइ भवहि बिखु माइआ ॥ भागहीन नही सतिगुरु पाइआ ॥३॥

अम्रितु हरि रसु हरि आपि पीआइआ ॥ गुरि पूरै नानक हरि पाइआ ॥४॥३॥५५॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 366) आसा महला ४ ॥
मेरै मनि तनि प्रेमु नामु आधारु ॥ नामु जपी नामो सुख सारु ॥१॥

नामु जपहु मेरे साजन सैना ॥ नाम बिना मै अवरु न कोई वडै भागि गुरमुखि हरि लैना ॥१॥ रहाउ ॥

नाम बिना नही जीविआ जाइ ॥ वडै भागि गुरमुखि हरि पाइ ॥२॥

नामहीन कालख मुखि माइआ ॥ नाम बिना ध्रिगु ध्रिगु जीवाइआ ॥३॥

वडा वडा हरि भाग करि पाइआ ॥ नानक गुरमुखि नामु दिवाइआ ॥४॥४॥५६॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 367) आसा महला ४ ॥
गुण गावा गुण बोली बाणी ॥ गुरमुखि हरि गुण आखि वखाणी ॥१॥

जपि जपि नामु मनि भइआ अनंदा ॥ सति सति सतिगुरि नामु दिड़ाइआ रसि गाए गुण परमानंदा ॥१॥ रहाउ ॥

हरि गुण गावै हरि जन लोगा ॥ वडै भागि पाए हरि निरजोगा ॥२॥

गुण विहूण माइआ मलु धारी ॥ विणु गुण जनमि मुए अहंकारी ॥३॥

सरीरि सरोवरि गुण परगटि कीए ॥ नानक गुरमुखि मथि ततु कढीए ॥४॥५॥५७॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 367) आसा महला ४ ॥
नामु सुणी नामो मनि भावै ॥ वडै भागि गुरमुखि हरि पावै ॥१॥

नामु जपहु गुरमुखि परगासा ॥ नाम बिना मै धर नही काई नामु रविआ सभ सास गिरासा ॥१॥ रहाउ ॥

नामै सुरति सुनी मनि भाई ॥ जो नामु सुनावै सो मेरा मीतु सखाई ॥२॥

नामहीण गए मूड़ नंगा ॥ पचि पचि मुए बिखु देखि पतंगा ॥३॥

आपे थापे थापि उथापे ॥ नानक नामु देवै हरि आपे ॥४॥६॥५८॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 367) आसा महला ४ ॥
गुरमुखि हरि हरि वेलि वधाई ॥ फल लागे हरि रसक रसाई ॥१॥

हरि हरि नामु जपि अनत तरंगा ॥ जपि जपि नामु गुरमति सालाही मारिआ कालु जमकंकर भुइअंगा ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि गुर महि भगति रखाई ॥ गुरु तुठा सिख देवै मेरे भाई ॥२॥

हउमै करम किछु बिधि नही जाणै ॥ जिउ कुंचरु नाइ खाकु सिरि छाणै ॥३॥

जे वड भाग होवहि वड ऊचे ॥ नानक नामु जपहि सचि सूचे ॥४॥७॥५९॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 367) आसा महला ४ ॥
हरि हरि नाम की मनि भूख लगाई ॥ नामि सुनिऐ मनु त्रिपतै मेरे भाई ॥१॥

नामु जपहु मेरे गुरसिख मीता ॥ नामु जपहु नामे सुखु पावहु नामु रखहु गुरमति मनि चीता ॥१॥ रहाउ ॥

नामो नामु सुणी मनु सरसा ॥ नामु लाहा लै गुरमति बिगसा ॥२॥

नाम बिना कुसटी मोह अंधा ॥ सभ निहफल करम कीए दुखु धंधा ॥३॥

हरि हरि हरि जसु जपै वडभागी ॥ नानक गुरमति नामि लिव लागी ॥४॥८॥६०॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 368) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
महला ४ रागु आसा घरु ६ के ३ ॥
हथि करि तंतु वजावै जोगी थोथर वाजै बेन ॥ गुरमति हरि गुण बोलहु जोगी इहु मनूआ हरि रंगि भेन ॥१॥

जोगी हरि देहु मती उपदेसु ॥ जुगु जुगु हरि हरि एको वरतै तिसु आगै हम आदेसु ॥१॥ रहाउ ॥

गावहि राग भाति बहु बोलहि इहु मनूआ खेलै खेल ॥ जोवहि कूप सिंचन कउ बसुधा उठि बैल गए चरि बेल ॥२॥

काइआ नगर महि करम हरि बोवहु हरि जामै हरिआ खेतु ॥ मनूआ असथिरु बैलु मनु जोवहु हरि सिंचहु गुरमति जेतु ॥३॥

जोगी जंगम स्रिसटि सभ तुमरी जो देहु मती तितु चेल ॥ जन नानक के प्रभ अंतरजामी हरि लावहु मनूआ पेल ॥४॥९॥६१॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 368) आसा महला ४ ॥
कब को भालै घुंघरू ताला कब को बजावै रबाबु ॥ आवत जात बार खिनु लागै हउ तब लगु समारउ नामु ॥१॥

मेरै मनि ऐसी भगति बनि आई ॥ हउ हरि बिनु खिनु पलु रहि न सकउ जैसे जल बिनु मीनु मरि जाई ॥१॥ रहाउ ॥

कब कोऊ मेलै पंच सत गाइण कब को राग धुनि उठावै ॥ मेलत चुनत खिनु पलु चसा लागै तब लगु मेरा मनु राम गुन गावै ॥२॥

कब को नाचै पाव पसारै कब को हाथ पसारै ॥ हाथ पाव पसारत बिलमु तिलु लागै तब लगु मेरा मनु राम सम्हारै ॥३॥

कब कोऊ लोगन कउ पतीआवै लोकि पतीणै ना पति होइ ॥ जन नानक हरि हिरदै सद धिआवहु ता जै जै करे सभु कोइ ॥४॥१०॥६२॥

(गुरू रामदास जी -- SGGS 368) आसा महला ४ ॥
सतसंगति मिलीऐ हरि साधू मिलि संगति हरि गुण गाइ ॥ गिआन रतनु बलिआ घटि चानणु अगिआनु अंधेरा जाइ ॥१॥

हरि जन नाचहु हरि हरि धिआइ ॥ ऐसे संत मिलहि मेरे भाई हम जन के धोवह पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि नामु जपहु मन मेरे अनदिनु हरि लिव लाइ ॥ जो इछहु सोई फलु पावहु फिरि भूख न लागै आइ ॥२॥

आपे हरि अपर्मपरु करता हरि आपे बोलि बुलाइ ॥ सेई संत भले तुधु भावहि जिन्ह की पति पावहि थाइ ॥३॥

नानकु आखि न राजै हरि गुण जिउ आखै तिउ सुखु पाइ ॥ भगति भंडार दीए हरि अपुने गुण गाहकु वणजि लै जाइ ॥४॥११॥६३॥


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