Pt 2 - भक्त कबीर जी - सलोक दोहे बाणी शब्द, Part 2 - Bhagat Kabir ji - Slok Dohe Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग गउड़ी -- SGGS 336) गउड़ी ॥
जिउ कपि के कर मुसटि चनन की लुबधि न तिआगु दइओ ॥ जो जो करम कीए लालच सिउ ते फिरि गरहि परिओ ॥१॥

भगति बिनु बिरथे जनमु गइओ ॥ साधसंगति भगवान भजन बिनु कही न सचु रहिओ ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ उदिआन कुसम परफुलित किनहि न घ्राउ लइओ ॥ तैसे भ्रमत अनेक जोनि महि फिरि फिरि काल हइओ ॥२॥

इआ धन जोबन अरु सुत दारा पेखन कउ जु दइओ ॥ तिन ही माहि अटकि जो उरझे इंद्री प्रेरि लइओ ॥३॥

अउध अनल तनु तिन को मंदरु चहु दिस ठाटु ठइओ ॥ कहि कबीर भै सागर तरन कउ मै सतिगुर ओट लइओ ॥४॥१॥८॥५९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 336) गउड़ी ॥
पानी मैला माटी गोरी ॥ इस माटी की पुतरी जोरी ॥१॥

मै नाही कछु आहि न मोरा ॥ तनु धनु सभु रसु गोबिंद तोरा ॥१॥ रहाउ ॥

इस माटी महि पवनु समाइआ ॥ झूठा परपंचु जोरि चलाइआ ॥२॥

किनहू लाख पांच की जोरी ॥ अंत की बार गगरीआ फोरी ॥३॥

कहि कबीर इक नीव उसारी ॥ खिन महि बिनसि जाइ अहंकारी ॥४॥१॥९॥६०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 337) गउड़ी ॥
राम जपउ जीअ ऐसे ऐसे ॥ ध्रू प्रहिलाद जपिओ हरि जैसे ॥१॥

दीन दइआल भरोसे तेरे ॥ सभु परवारु चड़ाइआ बेड़े ॥१॥ रहाउ ॥

जा तिसु भावै ता हुकमु मनावै ॥ इस बेड़े कउ पारि लघावै ॥२॥

गुर परसादि ऐसी बुधि समानी ॥ चूकि गई फिरि आवन जानी ॥३॥

कहु कबीर भजु सारिगपानी ॥ उरवारि पारि सभ एको दानी ॥४॥२॥१०॥६१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 337) गउड़ी ९ ॥
जोनि छाडि जउ जग महि आइओ ॥ लागत पवन खसमु बिसराइओ ॥१॥

जीअरा हरि के गुना गाउ ॥१॥ रहाउ ॥

गरभ जोनि महि उरध तपु करता ॥ तउ जठर अगनि महि रहता ॥२॥

लख चउरासीह जोनि भ्रमि आइओ ॥ अब के छुटके ठउर न ठाइओ ॥३॥

कहु कबीर भजु सारिगपानी ॥ आवत दीसै जात न जानी ॥४॥१॥११॥६२॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 337) गउड़ी पूरबी ॥
सुरग बासु न बाछीऐ डरीऐ न नरकि निवासु ॥ होना है सो होई है मनहि न कीजै आस ॥१॥

रमईआ गुन गाईऐ ॥ जा ते पाईऐ परम निधानु ॥१॥ रहाउ ॥

किआ जपु किआ तपु संजमो किआ बरतु किआ इसनानु ॥ जब लगु जुगति न जानीऐ भाउ भगति भगवान ॥२॥

स्मपै देखि न हरखीऐ बिपति देखि न रोइ ॥ जिउ स्मपै तिउ बिपति है बिध ने रचिआ सो होइ ॥३॥

कहि कबीर अब जानिआ संतन रिदै मझारि ॥ सेवक सो सेवा भले जिह घट बसै मुरारि ॥४॥१॥१२॥६३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 337) गउड़ी ॥
रे मन तेरो कोइ नही खिंचि लेइ जिनि भारु ॥ बिरख बसेरो पंखि को तैसो इहु संसारु ॥१॥

राम रसु पीआ रे ॥ जिह रस बिसरि गए रस अउर ॥१॥ रहाउ ॥

अउर मुए किआ रोईऐ जउ आपा थिरु न रहाइ ॥ जो उपजै सो बिनसि है दुखु करि रोवै बलाइ ॥२॥

जह की उपजी तह रची पीवत मरदन लाग ॥ कहि कबीर चिति चेतिआ राम सिमरि बैराग ॥३॥२॥१३॥६४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 337) रागु गउड़ी ॥
पंथु निहारै कामनी लोचन भरी ले उसासा ॥ उर न भीजै पगु ना खिसै हरि दरसन की आसा ॥१॥

उडहु न कागा कारे ॥ बेगि मिलीजै अपुने राम पिआरे ॥१॥ रहाउ ॥

कहि कबीर जीवन पद कारनि हरि की भगति करीजै ॥ एकु आधारु नामु नाराइन रसना रामु रवीजै ॥२॥१॥१४॥६५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 338) रागु गउड़ी ११ ॥
आस पास घन तुरसी का बिरवा माझ बना रसि गाऊं रे ॥ उआ का सरूपु देखि मोही गुआरनि मो कउ छोडि न आउ न जाहू रे ॥१॥

तोहि चरन मनु लागो सारिंगधर ॥ सो मिलै जो बडभागो ॥१॥ रहाउ ॥

बिंद्राबन मन हरन मनोहर क्रिसन चरावत गाऊ रे ॥ जा का ठाकुरु तुही सारिंगधर मोहि कबीरा नाऊ रे ॥२॥२॥१५॥६६॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 338) गउड़ी पूरबी १२ ॥
बिपल बसत्र केते है पहिरे किआ बन मधे बासा ॥ कहा भइआ नर देवा धोखे किआ जलि बोरिओ गिआता ॥१॥

जीअरे जाहिगा मै जानां ॥ अबिगत समझु इआना ॥ जत जत देखउ बहुरि न पेखउ संगि माइआ लपटाना ॥१॥ रहाउ ॥

गिआनी धिआनी बहु उपदेसी इहु जगु सगलो धंधा ॥ कहि कबीर इक राम नाम बिनु इआ जगु माइआ अंधा ॥२॥१॥१६॥६७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 338) गउड़ी १२ ॥
मन रे छाडहु भरमु प्रगट होइ नाचहु इआ माइआ के डांडे ॥ सूरु कि सनमुख रन ते डरपै सती कि सांचै भांडे ॥१॥

डगमग छाडि रे मन बउरा ॥ अब तउ जरे मरे सिधि पाईऐ लीनो हाथि संधउरा ॥१॥ रहाउ ॥

काम क्रोध माइआ के लीने इआ बिधि जगतु बिगूता ॥ कहि कबीर राजा राम न छोडउ सगल ऊच ते ऊचा ॥२॥२॥१७॥६८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 338) गउड़ी १३ ॥
फुरमानु तेरा सिरै ऊपरि फिरि न करत बीचार ॥ तुही दरीआ तुही करीआ तुझै ते निसतार ॥१॥

बंदे बंदगी इकतीआर ॥ साहिबु रोसु धरउ कि पिआरु ॥१॥ रहाउ ॥

नामु तेरा आधारु मेरा जिउ फूलु जई है नारि ॥ कहि कबीर गुलामु घर का जीआइ भावै मारि ॥२॥१८॥६९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 338) गउड़ी ॥
लख चउरासीह जीअ जोनि महि भ्रमत नंदु बहु थाको रे ॥ भगति हेति अवतारु लीओ है भागु बडो बपुरा को रे ॥१॥

तुम्ह जु कहत हउ नंद को नंदनु नंद सु नंदनु का को रे ॥ धरनि अकासु दसो दिस नाही तब इहु नंदु कहा थो रे ॥१॥ रहाउ ॥

संकटि नही परै जोनि नही आवै नामु निरंजन जा को रे ॥ कबीर को सुआमी ऐसो ठाकुरु जा कै माई न बापो रे ॥२॥१९॥७०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 339) गउड़ी ॥
निंदउ निंदउ मो कउ लोगु निंदउ ॥ निंदा जन कउ खरी पिआरी ॥ निंदा बापु निंदा महतारी ॥१॥ रहाउ ॥

निंदा होइ त बैकुंठि जाईऐ ॥ नामु पदारथु मनहि बसाईऐ ॥ रिदै सुध जउ निंदा होइ ॥ हमरे कपरे निंदकु धोइ ॥१॥

निंदा करै सु हमरा मीतु ॥ निंदक माहि हमारा चीतु ॥ निंदकु सो जो निंदा होरै ॥ हमरा जीवनु निंदकु लोरै ॥२॥

निंदा हमरी प्रेम पिआरु ॥ निंदा हमरा करै उधारु ॥ जन कबीर कउ निंदा सारु ॥ निंदकु डूबा हम उतरे पारि ॥३॥२०॥७१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 339) राजा राम तूं ऐसा निरभउ तरन तारन राम राइआ ॥१॥ रहाउ ॥

जब हम होते तब तुम नाही अब तुम हहु हम नाही ॥ अब हम तुम एक भए हहि एकै देखत मनु पतीआही ॥१॥

जब बुधि होती तब बलु कैसा अब बुधि बलु न खटाई ॥ कहि कबीर बुधि हरि लई मेरी बुधि बदली सिधि पाई ॥२॥२१॥७२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 339) गउड़ी ॥
खट नेम करि कोठड़ी बांधी बसतु अनूपु बीच पाई ॥ कुंजी कुलफु प्रान करि राखे करते बार न लाई ॥१॥

अब मन जागत रहु रे भाई ॥ गाफलु होइ कै जनमु गवाइओ चोरु मुसै घरु जाई ॥१॥ रहाउ ॥

पंच पहरूआ दर महि रहते तिन का नही पतीआरा ॥ चेति सुचेत चित होइ रहु तउ लै परगासु उजारा ॥२॥

नउ घर देखि जु कामनि भूली बसतु अनूप न पाई ॥ कहतु कबीर नवै घर मूसे दसवैं ततु समाई ॥३॥२२॥७३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 339) गउड़ी ॥
माई मोहि अवरु न जानिओ आनानां ॥ सिव सनकादि जासु गुन गावहि तासु बसहि मोरे प्रानानां ॥ रहाउ ॥ हिरदे प्रगासु गिआन गुर गमित गगन मंडल महि धिआनानां ॥ बिखै रोग भै बंधन भागे मन निज घरि सुखु जानाना ॥१॥

एक सुमति रति जानि मानि प्रभ दूसर मनहि न आनाना ॥ चंदन बासु भए मन बासन तिआगि घटिओ अभिमानाना ॥२॥

जो जन गाइ धिआइ जसु ठाकुर तासु प्रभू है थानानां ॥ तिह बड भाग बसिओ मनि जा कै करम प्रधान मथानाना ॥३॥

काटि सकति सिव सहजु प्रगासिओ एकै एक समानाना ॥ कहि कबीर गुर भेटि महा सुख भ्रमत रहे मनु मानानां ॥४॥२३॥७४॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) रागु गउड़ी पूरबी बावन अखरी कबीर जीउ की
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
बावन अछर लोक त्रै सभु कछु इन ही माहि ॥ ए अखर खिरि जाहिगे ओइ अखर इन महि नाहि ॥१॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) जहा बोल तह अछर आवा ॥ जह अबोल तह मनु न रहावा ॥ बोल अबोल मधि है सोई ॥ जस ओहु है तस लखै न कोई ॥२॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) अलह लहउ तउ किआ कहउ कहउ त को उपकार ॥ बटक बीज महि रवि रहिओ जा को तीनि लोक बिसथार ॥३॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) अलह लहंता भेद छै कछु कछु पाइओ भेद ॥ उलटि भेद मनु बेधिओ पाइओ अभंग अछेद ॥४॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) तुरक तरीकति जानीऐ हिंदू बेद पुरान ॥ मन समझावन कारने कछूअक पड़ीऐ गिआन ॥५॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) ओअंकार आदि मै जाना ॥ लिखि अरु मेटै ताहि न माना ॥ ओअंकार लखै जउ कोई ॥ सोई लखि मेटणा न होई ॥६॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) कका किरणि कमल महि पावा ॥ ससि बिगास स्मपट नही आवा ॥ अरु जे तहा कुसम रसु पावा ॥ अकह कहा कहि का समझावा ॥७॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) खखा इहै खोड़ि मन आवा ॥ खोड़े छाडि न दह दिस धावा ॥ खसमहि जाणि खिमा करि रहै ॥ तउ होइ निखिअउ अखै पदु लहै ॥८॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) गगा गुर के बचन पछाना ॥ दूजी बात न धरई काना ॥ रहै बिहंगम कतहि न जाई ॥ अगह गहै गहि गगन रहाई ॥९॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) घघा घटि घटि निमसै सोई ॥ घट फूटे घटि कबहि न होई ॥ ता घट माहि घाट जउ पावा ॥ सो घटु छाडि अवघट कत धावा ॥१०॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) ङंङा निग्रहि सनेहु करि निरवारो संदेह ॥ नाही देखि न भाजीऐ परम सिआनप एह ॥११॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) चचा रचित चित्र है भारी ॥ तजि चित्रै चेतहु चितकारी ॥ चित्र बचित्र इहै अवझेरा ॥ तजि चित्रै चितु राखि चितेरा ॥१२॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) छछा इहै छत्रपति पासा ॥ छकि कि न रहहु छाडि कि न आसा ॥ रे मन मै तउ छिन छिन समझावा ॥ ताहि छाडि कत आपु बधावा ॥१३॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 340) जजा जउ तन जीवत जरावै ॥ जोबन जारि जुगति सो पावै ॥ अस जरि पर जरि जरि जब रहै ॥ तब जाइ जोति उजारउ लहै ॥१४॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) झझा उरझि सुरझि नही जाना ॥ रहिओ झझकि नाही परवाना ॥ कत झखि झखि अउरन समझावा ॥ झगरु कीए झगरउ ही पावा ॥१५॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) ञंञा निकटि जु घट रहिओ दूरि कहा तजि जाइ ॥ जा कारणि जगु ढूढिअउ नेरउ पाइअउ ताहि ॥१६॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) टटा बिकट घाट घट माही ॥ खोलि कपाट महलि कि न जाही ॥ देखि अटल टलि कतहि न जावा ॥ रहै लपटि घट परचउ पावा ॥१७॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) ठठा इहै दूरि ठग नीरा ॥ नीठि नीठि मनु कीआ धीरा ॥ जिनि ठगि ठगिआ सगल जगु खावा ॥ सो ठगु ठगिआ ठउर मनु आवा ॥१८॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) डडा डर उपजे डरु जाई ॥ ता डर महि डरु रहिआ समाई ॥ जउ डर डरै त फिरि डरु लागै ॥ निडर हूआ डरु उर होइ भागै ॥१९॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) ढढा ढिग ढूढहि कत आना ॥ ढूढत ही ढहि गए पराना ॥ चड़ि सुमेरि ढूढि जब आवा ॥ जिह गड़ु गड़िओ सु गड़ महि पावा ॥२०॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) णाणा रणि रूतउ नर नेही करै ॥ ना निवै ना फुनि संचरै ॥ धंनि जनमु ताही को गणै ॥ मारै एकहि तजि जाइ घणै ॥२१॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) तता अतर तरिओ नह जाई ॥ तन त्रिभवण महि रहिओ समाई ॥ जउ त्रिभवण तन माहि समावा ॥ तउ ततहि तत मिलिआ सचु पावा ॥२२॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) थथा अथाह थाह नही पावा ॥ ओहु अथाह इहु थिरु न रहावा ॥ थोड़ै थलि थानक आर्मभै ॥ बिनु ही थाभह मंदिरु थ्मभै ॥२३॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) ददा देखि जु बिनसनहारा ॥ जस अदेखि तस राखि बिचारा ॥ दसवै दुआरि कुंची जब दीजै ॥ तउ दइआल को दरसनु कीजै ॥२४॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) धधा अरधहि उरध निबेरा ॥ अरधहि उरधह मंझि बसेरा ॥ अरधह छाडि उरध जउ आवा ॥ तउ अरधहि उरध मिलिआ सुख पावा ॥२५॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) नंना निसि दिनु निरखत जाई ॥ निरखत नैन रहे रतवाई ॥ निरखत निरखत जब जाइ पावा ॥ तब ले निरखहि निरख मिलावा ॥२६॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) पपा अपर पारु नही पावा ॥ परम जोति सिउ परचउ लावा ॥ पांचउ इंद्री निग्रह करई ॥ पापु पुंनु दोऊ निरवरई ॥२७॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) फफा बिनु फूलह फलु होई ॥ ता फल फंक लखै जउ कोई ॥ दूणि न परई फंक बिचारै ॥ ता फल फंक सभै तन फारै ॥२८॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 341) बबा बिंदहि बिंद मिलावा ॥ बिंदहि बिंदि न बिछुरन पावा ॥ बंदउ होइ बंदगी गहै ॥ बंदक होइ बंध सुधि लहै ॥२९॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) भभा भेदहि भेद मिलावा ॥ अब भउ भानि भरोसउ आवा ॥ जो बाहरि सो भीतरि जानिआ ॥ भइआ भेदु भूपति पहिचानिआ ॥३०॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) ममा मूल गहिआ मनु मानै ॥ मरमी होइ सु मन कउ जानै ॥ मत कोई मन मिलता बिलमावै ॥ मगन भइआ ते सो सचु पावै ॥३१॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) ममा मन सिउ काजु है मन साधे सिधि होइ ॥ मन ही मन सिउ कहै कबीरा मन सा मिलिआ न कोइ ॥३२॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) इहु मनु सकती इहु मनु सीउ ॥ इहु मनु पंच तत को जीउ ॥ इहु मनु ले जउ उनमनि रहै ॥ तउ तीनि लोक की बातै कहै ॥३३॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) यया जउ जानहि तउ दुरमति हनि करि बसि काइआ गाउ ॥ रणि रूतउ भाजै नही सूरउ थारउ नाउ ॥३४॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) रारा रसु निरस करि जानिआ ॥ होइ निरस सु रसु पहिचानिआ ॥ इह रस छाडे उह रसु आवा ॥ उह रसु पीआ इह रसु नही भावा ॥३५॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) लला ऐसे लिव मनु लावै ॥ अनत न जाइ परम सचु पावै ॥ अरु जउ तहा प्रेम लिव लावै ॥ तउ अलह लहै लहि चरन समावै ॥३६॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) ववा बार बार बिसन सम्हारि ॥ बिसन सम्हारि न आवै हारि ॥ बलि बलि जे बिसनतना जसु गावै ॥ विसन मिले सभ ही सचु पावै ॥३७॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) वावा वाही जानीऐ वा जाने इहु होइ ॥ इहु अरु ओहु जब मिलै तब मिलत न जानै कोइ ॥३८॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) ससा सो नीका करि सोधहु ॥ घट परचा की बात निरोधहु ॥ घट परचै जउ उपजै भाउ ॥ पूरि रहिआ तह त्रिभवण राउ ॥३९॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) खखा खोजि परै जउ कोई ॥ जो खोजै सो बहुरि न होई ॥ खोज बूझि जउ करै बीचारा ॥ तउ भवजल तरत न लावै बारा ॥४०॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) ससा सो सह सेज सवारै ॥ सोई सही संदेह निवारै ॥ अलप सुख छाडि परम सुख पावा ॥ तब इह त्रीअ ओहु कंतु कहावा ॥४१॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) हाहा होत होइ नही जाना ॥ जब ही होइ तबहि मनु माना ॥ है तउ सही लखै जउ कोई ॥ तब ओही उहु एहु न होई ॥४२॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) लिंउ लिंउ करत फिरै सभु लोगु ॥ ता कारणि बिआपै बहु सोगु ॥ लखिमी बर सिउ जउ लिउ लावै ॥ सोगु मिटै सभ ही सुख पावै ॥४३॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 342) खखा खिरत खपत गए केते ॥ खिरत खपत अजहूं नह चेते ॥ अब जगु जानि जउ मना रहै ॥ जह का बिछुरा तह थिरु लहै ॥४४॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 343) बावन अखर जोरे आनि ॥ सकिआ न अखरु एकु पछानि ॥ सत का सबदु कबीरा कहै ॥ पंडित होइ सु अनभै रहै ॥ पंडित लोगह कउ बिउहार ॥ गिआनवंत कउ ततु बीचार ॥ जा कै जीअ जैसी बुधि होई ॥ कहि कबीर जानैगा सोई ॥४५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु गउड़ी थितीं कबीर जी कीं ॥
सलोकु ॥
पंद्रह थितीं सात वार ॥ कहि कबीर उरवार न पार ॥ साधिक सिध लखै जउ भेउ ॥ आपे करता आपे देउ ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) थितीं ॥
अमावस महि आस निवारहु ॥ अंतरजामी रामु समारहु ॥ जीवत पावहु मोख दुआर ॥ अनभउ सबदु ततु निजु सार ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) चरन कमल गोबिंद रंगु लागा ॥ संत प्रसादि भए मन निरमल हरि कीरतन महि अनदिनु जागा ॥१॥ रहाउ ॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) परिवा प्रीतम करहु बीचार ॥ घट महि खेलै अघट अपार ॥ काल कलपना कदे न खाइ ॥ आदि पुरख महि रहै समाइ ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) दुतीआ दुह करि जानै अंग ॥ माइआ ब्रहम रमै सभ संग ॥ ना ओहु बढै न घटता जाइ ॥ अकुल निरंजन एकै भाइ ॥३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) त्रितीआ तीने सम करि लिआवै ॥ आनद मूल परम पदु पावै ॥ साधसंगति उपजै बिस्वास ॥ बाहरि भीतरि सदा प्रगास ॥४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) चउथहि चंचल मन कउ गहहु ॥ काम क्रोध संगि कबहु न बहहु ॥ जल थल माहे आपहि आप ॥ आपै जपहु आपना जाप ॥५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) पांचै पंच तत बिसथार ॥ कनिक कामिनी जुग बिउहार ॥ प्रेम सुधा रसु पीवै कोइ ॥ जरा मरण दुखु फेरि न होइ ॥६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) छठि खटु चक्र छहूं दिस धाइ ॥ बिनु परचै नही थिरा रहाइ ॥ दुबिधा मेटि खिमा गहि रहहु ॥ करम धरम की सूल न सहहु ॥७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) सातैं सति करि बाचा जाणि ॥ आतम रामु लेहु परवाणि ॥ छूटै संसा मिटि जाहि दुख ॥ सुंन सरोवरि पावहु सुख ॥८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) असटमी असट धातु की काइआ ॥ ता महि अकुल महा निधि राइआ ॥ गुर गम गिआन बतावै भेद ॥ उलटा रहै अभंग अछेद ॥९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 343) नउमी नवै दुआर कउ साधि ॥ बहती मनसा राखहु बांधि ॥ लोभ मोह सभ बीसरि जाहु ॥ जुगु जुगु जीवहु अमर फल खाहु ॥१०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) दसमी दह दिस होइ अनंद ॥ छूटै भरमु मिलै गोबिंद ॥ जोति सरूपी तत अनूप ॥ अमल न मल न छाह नही धूप ॥११॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) एकादसी एक दिस धावै ॥ तउ जोनी संकट बहुरि न आवै ॥ सीतल निरमल भइआ सरीरा ॥ दूरि बतावत पाइआ नीरा ॥१२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) बारसि बारह उगवै सूर ॥ अहिनिसि बाजे अनहद तूर ॥ देखिआ तिहूं लोक का पीउ ॥ अचरजु भइआ जीव ते सीउ ॥१३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) तेरसि तेरह अगम बखाणि ॥ अरध उरध बिचि सम पहिचाणि ॥ नीच ऊच नही मान अमान ॥ बिआपिक राम सगल सामान ॥१४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) चउदसि चउदह लोक मझारि ॥ रोम रोम महि बसहि मुरारि ॥ सत संतोख का धरहु धिआन ॥ कथनी कथीऐ ब्रहम गिआन ॥१५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) पूनिउ पूरा चंद अकास ॥ पसरहि कला सहज परगास ॥ आदि अंति मधि होइ रहिआ थीर ॥ सुख सागर महि रमहि कबीर ॥१६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु गउड़ी वार कबीर जीउ के ७ ॥
बार बार हरि के गुन गावउ ॥ गुर गमि भेदु सु हरि का पावउ ॥१॥ रहाउ ॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) आदित करै भगति आर्मभ ॥ काइआ मंदर मनसा थ्मभ ॥ अहिनिसि अखंड सुरही जाइ ॥ तउ अनहद बेणु सहज महि बाइ ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) सोमवारि ससि अम्रितु झरै ॥ चाखत बेगि सगल बिख हरै ॥ बाणी रोकिआ रहै दुआर ॥ तउ मनु मतवारो पीवनहार ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) मंगलवारे ले माहीति ॥ पंच चोर की जाणै रीति ॥ घर छोडें बाहरि जिनि जाइ ॥ नातरु खरा रिसै है राइ ॥३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) बुधवारि बुधि करै प्रगास ॥ हिरदै कमल महि हरि का बास ॥ गुर मिलि दोऊ एक सम धरै ॥ उरध पंक लै सूधा करै ॥४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) ब्रिहसपति बिखिआ देइ बहाइ ॥ तीनि देव एक संगि लाइ ॥ तीनि नदी तह त्रिकुटी माहि ॥ अहिनिसि कसमल धोवहि नाहि ॥५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) सुक्रितु सहारै सु इह ब्रति चड़ै ॥ अनदिन आपि आप सिउ लड़ै ॥ सुरखी पांचउ राखै सबै ॥ तउ दूजी द्रिसटि न पैसै कबै ॥६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 344) थावर थिरु करि राखै सोइ ॥ जोति दी वटी घट महि जोइ ॥ बाहरि भीतरि भइआ प्रगासु ॥ तब हूआ सगल करम का नासु ॥७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 345) जब लगु घट महि दूजी आन ॥ तउ लउ महलि न लाभै जान ॥ रमत राम सिउ लागो रंगु ॥ कहि कबीर तब निरमल अंग ॥८॥१॥

(राग आसा -- SGGS 475) ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु आसा बाणी भगता की ॥
कबीर जीउ नामदेउ जीउ रविदास जीउ ॥
आसा स्री कबीर जीउ ॥
गुर चरण लागि हम बिनवता पूछत कह जीउ पाइआ ॥ कवन काजि जगु उपजै बिनसै कहहु मोहि समझाइआ ॥१॥

देव करहु दइआ मोहि मारगि लावहु जितु भै बंधन तूटै ॥ जनम मरन दुख फेड़ करम सुख जीअ जनम ते छूटै ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ फास बंध नही फारै अरु मन सुंनि न लूके ॥ आपा पदु निरबाणु न चीन्हिआ इन बिधि अभिउ न चूके ॥२॥

कही न उपजै उपजी जाणै भाव अभाव बिहूणा ॥ उदै असत की मन बुधि नासी तउ सदा सहजि लिव लीणा ॥३॥

जिउ प्रतिबि्मबु बि्मब कउ मिली है उदक कु्मभु बिगराना ॥ कहु कबीर ऐसा गुण भ्रमु भागा तउ मनु सुंनि समानां ॥४॥१॥

(राग आसा -- SGGS 476) आसा ॥
गज साढे तै तै धोतीआ तिहरे पाइनि तग ॥ गली जिन्हा जपमालीआ लोटे हथि निबग ॥ ओइ हरि के संत न आखीअहि बानारसि के ठग ॥१॥

ऐसे संत न मो कउ भावहि ॥ डाला सिउ पेडा गटकावहि ॥१॥ रहाउ ॥

बासन मांजि चरावहि ऊपरि काठी धोइ जलावहि ॥ बसुधा खोदि करहि दुइ चूल्हे सारे माणस खावहि ॥२॥

ओइ पापी सदा फिरहि अपराधी मुखहु अपरस कहावहि ॥ सदा सदा फिरहि अभिमानी सगल कुट्मब डुबावहि ॥३॥

जितु को लाइआ तित ही लागा तैसे करम कमावै ॥ कहु कबीर जिसु सतिगुरु भेटै पुनरपि जनमि न आवै ॥४॥२॥

(राग आसा -- SGGS 476) आसा ॥
बापि दिलासा मेरो कीन्हा ॥ सेज सुखाली मुखि अम्रितु दीन्हा ॥ तिसु बाप कउ किउ मनहु विसारी ॥ आगै गइआ न बाजी हारी ॥१॥

मुई मेरी माई हउ खरा सुखाला ॥ पहिरउ नही दगली लगै न पाला ॥१॥ रहाउ ॥

बलि तिसु बापै जिनि हउ जाइआ ॥ पंचा ते मेरा संगु चुकाइआ ॥ पंच मारि पावा तलि दीने ॥ हरि सिमरनि मेरा मनु तनु भीने ॥२॥

पिता हमारो वड गोसाई ॥ तिसु पिता पहि हउ किउ करि जाई ॥ सतिगुर मिले त मारगु दिखाइआ ॥ जगत पिता मेरै मनि भाइआ ॥३॥

हउ पूतु तेरा तूं बापु मेरा ॥ एकै ठाहर दुहा बसेरा ॥ कहु कबीर जनि एको बूझिआ ॥ गुर प्रसादि मै सभु किछु सूझिआ ॥४॥३॥

(राग आसा -- SGGS 476) आसा ॥
इकतु पतरि भरि उरकट कुरकट इकतु पतरि भरि पानी ॥ आसि पासि पंच जोगीआ बैठे बीचि नकट दे रानी ॥१॥

नकटी को ठनगनु बाडा डूं ॥ किनहि बिबेकी काटी तूं ॥१॥ रहाउ ॥

सगल माहि नकटी का वासा सगल मारि अउहेरी ॥ सगलिआ की हउ बहिन भानजी जिनहि बरी तिसु चेरी ॥२॥

हमरो भरता बडो बिबेकी आपे संतु कहावै ॥ ओहु हमारै माथै काइमु अउरु हमरै निकटि न आवै ॥३॥

नाकहु काटी कानहु काटी काटि कूटि कै डारी ॥ कहु कबीर संतन की बैरनि तीनि लोक की पिआरी ॥४॥४॥

(राग आसा -- SGGS 476) आसा ॥
जोगी जती तपी संनिआसी बहु तीरथ भ्रमना ॥ लुंजित मुंजित मोनि जटाधर अंति तऊ मरना ॥१॥

ता ते सेवीअले रामना ॥ रसना राम नाम हितु जा कै कहा करै जमना ॥१॥ रहाउ ॥

आगम निरगम जोतिक जानहि बहु बहु बिआकरना ॥ तंत मंत्र सभ अउखध जानहि अंति तऊ मरना ॥२॥

राज भोग अरु छत्र सिंघासन बहु सुंदरि रमना ॥ पान कपूर सुबासक चंदन अंति तऊ मरना ॥३॥

बेद पुरान सिम्रिति सभ खोजे कहू न ऊबरना ॥ कहु कबीर इउ रामहि ज्मपउ मेटि जनम मरना ॥४॥५॥

(राग आसा -- SGGS 477) आसा ॥
फीलु रबाबी बलदु पखावज कऊआ ताल बजावै ॥ पहिरि चोलना गदहा नाचै भैसा भगति करावै ॥१॥

राजा राम ककरीआ बरे पकाए ॥ किनै बूझनहारै खाए ॥१॥ रहाउ ॥

बैठि सिंघु घरि पान लगावै घीस गलउरे लिआवै ॥ घरि घरि मुसरी मंगलु गावहि कछूआ संखु बजावै ॥२॥

बंस को पूतु बीआहन चलिआ सुइने मंडप छाए ॥ रूप कंनिआ सुंदरि बेधी ससै सिंघ गुन गाए ॥३॥

कहत कबीर सुनहु रे संतहु कीटी परबतु खाइआ ॥ कछूआ कहै अंगार भि लोरउ लूकी सबदु सुनाइआ ॥४॥६॥

(राग आसा -- SGGS 477) आसा ॥
बटूआ एकु बहतरि आधारी एको जिसहि दुआरा ॥ नवै खंड की प्रिथमी मागै सो जोगी जगि सारा ॥१॥

ऐसा जोगी नउ निधि पावै ॥ तल का ब्रहमु ले गगनि चरावै ॥१॥ रहाउ ॥

खिंथा गिआन धिआन करि सूई सबदु तागा मथि घालै ॥ पंच ततु की करि मिरगाणी गुर कै मारगि चालै ॥२॥

दइआ फाहुरी काइआ करि धूई द्रिसटि की अगनि जलावै ॥ तिस का भाउ लए रिद अंतरि चहु जुग ताड़ी लावै ॥३॥

सभ जोगतण राम नामु है जिस का पिंडु पराना ॥ कहु कबीर जे किरपा धारै देइ सचा नीसाना ॥४॥७॥

(राग आसा -- SGGS 477) आसा ॥
हिंदू तुरक कहा ते आए किनि एह राह चलाई ॥ दिल महि सोचि बिचारि कवादे भिसत दोजक किनि पाई ॥१॥

काजी तै कवन कतेब बखानी ॥ पड़्हत गुनत ऐसे सभ मारे किनहूं खबरि न जानी ॥१॥ रहाउ ॥

सकति सनेहु करि सुंनति करीऐ मै न बदउगा भाई ॥ जउ रे खुदाइ मोहि तुरकु करैगा आपन ही कटि जाई ॥२॥

सुंनति कीए तुरकु जे होइगा अउरत का किआ करीऐ ॥ अरध सरीरी नारि न छोडै ता ते हिंदू ही रहीऐ ॥३॥

छाडि कतेब रामु भजु बउरे जुलम करत है भारी ॥ कबीरै पकरी टेक राम की तुरक रहे पचिहारी ॥४॥८॥

(राग आसा -- SGGS 477) आसा ॥
जब लगु तेलु दीवे मुखि बाती तब सूझै सभु कोई ॥ तेल जले बाती ठहरानी सूंना मंदरु होई ॥१॥

रे बउरे तुहि घरी न राखै कोई ॥ तूं राम नामु जपि सोई ॥१॥ रहाउ ॥

का की मात पिता कहु का को कवन पुरख की जोई ॥ घट फूटे कोऊ बात न पूछै काढहु काढहु होई ॥२॥

देहुरी बैठी माता रोवै खटीआ ले गए भाई ॥ लट छिटकाए तिरीआ रोवै हंसु इकेला जाई ॥३॥

कहत कबीर सुनहु रे संतहु भै सागर कै ताई ॥ इसु बंदे सिरि जुलमु होत है जमु नही हटै गुसाई ॥४॥९॥

(राग आसा -- SGGS 478) दुतुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा स्री कबीर जीउ के चउपदे इकतुके ॥
सनक सनंद अंतु नही पाइआ ॥ बेद पड़े पड़ि ब्रहमे जनमु गवाइआ ॥१॥

हरि का बिलोवना बिलोवहु मेरे भाई ॥ सहजि बिलोवहु जैसे ततु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

तनु करि मटुकी मन माहि बिलोई ॥ इसु मटुकी महि सबदु संजोई ॥२॥

हरि का बिलोवना मन का बीचारा ॥ गुर प्रसादि पावै अम्रित धारा ॥३॥

कहु कबीर नदरि करे जे मींरा ॥ राम नाम लगि उतरे तीरा ॥४॥१॥१०॥

(राग आसा -- SGGS 478) आसा ॥
बाती सूकी तेलु निखूटा ॥ मंदलु न बाजै नटु पै सूता ॥१॥

बुझि गई अगनि न निकसिओ धूंआ ॥ रवि रहिआ एकु अवरु नही दूआ ॥१॥ रहाउ ॥

टूटी तंतु न बजै रबाबु ॥ भूलि बिगारिओ अपना काजु ॥२॥

कथनी बदनी कहनु कहावनु ॥ समझि परी तउ बिसरिओ गावनु ॥३॥

कहत कबीर पंच जो चूरे ॥ तिन ते नाहि परम पदु दूरे ॥४॥२॥११॥

(राग आसा -- SGGS 478) आसा ॥
सुतु अपराध करत है जेते ॥ जननी चीति न राखसि तेते ॥१॥

रामईआ हउ बारिकु तेरा ॥ काहे न खंडसि अवगनु मेरा ॥१॥ रहाउ ॥

जे अति क्रोप करे करि धाइआ ॥ ता भी चीति न राखसि माइआ ॥२॥

चिंत भवनि मनु परिओ हमारा ॥ नाम बिना कैसे उतरसि पारा ॥३॥

देहि बिमल मति सदा सरीरा ॥ सहजि सहजि गुन रवै कबीरा ॥४॥३॥१२॥

(राग आसा -- SGGS 478) आसा ॥
हज हमारी गोमती तीर ॥ जहा बसहि पीत्मबर पीर ॥१॥

वाहु वाहु किआ खूबु गावता है ॥ हरि का नामु मेरै मनि भावता है ॥१॥ रहाउ ॥

नारद सारद करहि खवासी ॥ पासि बैठी बीबी कवला दासी ॥२॥

कंठे माला जिहवा रामु ॥ सहंस नामु लै लै करउ सलामु ॥३॥

कहत कबीर राम गुन गावउ ॥ हिंदू तुरक दोऊ समझावउ ॥४॥४॥१३॥

(राग आसा -- SGGS 479) आसा स्री कबीर जीउ के पंचपदे ९ दुतुके ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पाती तोरै मालिनी पाती पाती जीउ ॥ जिसु पाहन कउ पाती तोरै सो पाहन निरजीउ ॥१॥

भूली मालनी है एउ ॥ सतिगुरु जागता है देउ ॥१॥ रहाउ ॥

ब्रहमु पाती बिसनु डारी फूल संकरदेउ ॥ तीनि देव प्रतखि तोरहि करहि किस की सेउ ॥२॥

पाखान गढि कै मूरति कीन्ही दे कै छाती पाउ ॥ जे एह मूरति साची है तउ गड़्हणहारे खाउ ॥३॥

भातु पहिति अरु लापसी करकरा कासारु ॥ भोगनहारे भोगिआ इसु मूरति के मुख छारु ॥४॥

मालिनि भूली जगु भुलाना हम भुलाने नाहि ॥ कहु कबीर हम राम राखे क्रिपा करि हरि राइ ॥५॥१॥१४॥

(राग आसा -- SGGS 479) आसा ॥
बारह बरस बालपन बीते बीस बरस कछु तपु न कीओ ॥ तीस बरस कछु देव न पूजा फिरि पछुताना बिरधि भइओ ॥१॥

मेरी मेरी करते जनमु गइओ ॥ साइरु सोखि भुजं बलइओ ॥१॥ रहाउ ॥

सूके सरवरि पालि बंधावै लूणै खेति हथ वारि करै ॥ आइओ चोरु तुरंतह ले गइओ मेरी राखत मुगधु फिरै ॥२॥

चरन सीसु कर क्मपन लागे नैनी नीरु असार बहै ॥ जिहवा बचनु सुधु नही निकसै तब रे धरम की आस करै ॥३॥

हरि जीउ क्रिपा करै लिव लावै लाहा हरि हरि नामु लीओ ॥ गुर परसादी हरि धनु पाइओ अंते चलदिआ नालि चलिओ ॥४॥

कहत कबीर सुनहु रे संतहु अनु धनु कछूऐ लै न गइओ ॥ आई तलब गोपाल राइ की माइआ मंदर छोडि चलिओ ॥५॥२॥१५॥

(राग आसा -- SGGS 479) आसा ॥
काहू दीन्हे पाट पट्मबर काहू पलघ निवारा ॥ काहू गरी गोदरी नाही काहू खान परारा ॥१॥

अहिरख वादु न कीजै रे मन ॥ सुक्रितु करि करि लीजै रे मन ॥१॥ रहाउ ॥

कुम्हारै एक जु माटी गूंधी बहु बिधि बानी लाई ॥ काहू महि मोती मुकताहल काहू बिआधि लगाई ॥२॥

सूमहि धनु राखन कउ दीआ मुगधु कहै धनु मेरा ॥ जम का डंडु मूंड महि लागै खिन महि करै निबेरा ॥३॥

हरि जनु ऊतमु भगतु सदावै आगिआ मनि सुखु पाई ॥ जो तिसु भावै सति करि मानै भाणा मंनि वसाई ॥४॥

कहै कबीरु सुनहु रे संतहु मेरी मेरी झूठी ॥ चिरगट फारि चटारा लै गइओ तरी तागरी छूटी ॥५॥३॥१६॥


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