भक्त कबीर जी - सलोक दोहे बाणी शब्द, Bhagat Kabir ji - Slok Dohe Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग सिरीरागु -- SGGS 91) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिरीरागु कबीर जीउ का ॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा
जननी जानत सुतु बडा होतु है इतना कु न जानै जि दिन दिन अवध घटतु है ॥ मोर मोर करि अधिक लाडु धरि पेखत ही जमराउ हसै ॥१॥

ऐसा तैं जगु भरमि लाइआ ॥ कैसे बूझै जब मोहिआ है माइआ ॥१॥ रहाउ ॥

कहत कबीर छोडि बिखिआ रस इतु संगति निहचउ मरणा ॥ रमईआ जपहु प्राणी अनत जीवण बाणी इन बिधि भव सागरु तरणा ॥२॥

जां तिसु भावै ता लागै भाउ ॥ भरमु भुलावा विचहु जाइ ॥ उपजै सहजु गिआन मति जागै ॥ गुर प्रसादि अंतरि लिव लागै ॥३॥

इतु संगति नाही मरणा ॥ हुकमु पछाणि ता खसमै मिलणा ॥१॥ रहाउ दूजा ॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 92) स्रीरागु भगत कबीर जीउ का ॥
अचरज एकु सुनहु रे पंडीआ अब किछु कहनु न जाई ॥ सुरि नर गण गंध्रब जिनि मोहे त्रिभवण मेखुली लाई ॥१॥

राजा राम अनहद किंगुरी बाजै ॥ जा की दिसटि नाद लिव लागै ॥१॥ रहाउ ॥

भाठी गगनु सिंङिआ अरु चुंङिआ कनक कलस इकु पाइआ ॥ तिसु महि धार चुऐ अति निरमल रस महि रसन चुआइआ ॥२॥

एक जु बात अनूप बनी है पवन पिआला साजिआ ॥ तीनि भवन महि एको जोगी कहहु कवनु है राजा ॥३॥

ऐसे गिआन प्रगटिआ पुरखोतम कहु कबीर रंगि राता ॥ अउर दुनी सभ भरमि भुलानी मनु राम रसाइन माता ॥४॥३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 323) रागु गउड़ी भगतां की बाणी
ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
गउड़ी गुआरेरी स्री कबीर जीउ के चउपदे १४ ॥

अब मोहि जलत राम जलु पाइआ ॥ राम उदकि तनु जलत बुझाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

मनु मारण कारणि बन जाईऐ ॥ सो जलु बिनु भगवंत न पाईऐ ॥१॥

जिह पावक सुरि नर है जारे ॥ राम उदकि जन जलत उबारे ॥२॥

भव सागर सुख सागर माही ॥ पीवि रहे जल निखुटत नाही ॥३॥

कहि कबीर भजु सारिंगपानी ॥ राम उदकि मेरी तिखा बुझानी ॥४॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 323) गउड़ी कबीर जी ॥
माधउ जल की पिआस न जाइ ॥ जल महि अगनि उठी अधिकाइ ॥१॥ रहाउ ॥

तूं जलनिधि हउ जल का मीनु ॥ जल महि रहउ जलहि बिनु खीनु ॥१॥

तूं पिंजरु हउ सूअटा तोर ॥ जमु मंजारु कहा करै मोर ॥२॥

तूं तरवरु हउ पंखी आहि ॥ मंदभागी तेरो दरसनु नाहि ॥३॥

तूं सतिगुरु हउ नउतनु चेला ॥ कहि कबीर मिलु अंत की बेला ॥४॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 324) गउड़ी कबीर जी ॥
जब हम एको एकु करि जानिआ ॥ तब लोगह काहे दुखु मानिआ ॥१॥

हम अपतह अपुनी पति खोई ॥ हमरै खोजि परहु मति कोई ॥१॥ रहाउ ॥

हम मंदे मंदे मन माही ॥ साझ पाति काहू सिउ नाही ॥२॥

पति अपति ता की नही लाज ॥ तब जानहुगे जब उघरैगो पाज ॥३॥

कहु कबीर पति हरि परवानु ॥ सरब तिआगि भजु केवल रामु ॥४॥३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 324) गउड़ी कबीर जी ॥
नगन फिरत जौ पाईऐ जोगु ॥ बन का मिरगु मुकति सभु होगु ॥१॥

किआ नागे किआ बाधे चाम ॥ जब नही चीनसि आतम राम ॥१॥ रहाउ ॥

मूड मुंडाए जौ सिधि पाई ॥ मुकती भेड न गईआ काई ॥२॥

बिंदु राखि जौ तरीऐ भाई ॥ खुसरै किउ न परम गति पाई ॥३॥

कहु कबीर सुनहु नर भाई ॥ राम नाम बिनु किनि गति पाई ॥४॥४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 324) गउड़ी कबीर जी ॥
संधिआ प्रात इस्नानु कराही ॥ जिउ भए दादुर पानी माही ॥१॥

जउ पै राम राम रति नाही ॥ ते सभि धरम राइ कै जाही ॥१॥ रहाउ ॥

काइआ रति बहु रूप रचाही ॥ तिन कउ दइआ सुपनै भी नाही ॥२॥

चारि चरन कहहि बहु आगर ॥ साधू सुखु पावहि कलि सागर ॥३॥

कहु कबीर बहु काइ करीजै ॥ सरबसु छोडि महा रसु पीजै ॥४॥५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 324) कबीर जी गउड़ी ॥
किआ जपु किआ तपु किआ ब्रत पूजा ॥ जा कै रिदै भाउ है दूजा ॥१॥

रे जन मनु माधउ सिउ लाईऐ ॥ चतुराई न चतुरभुजु पाईऐ ॥ रहाउ ॥ परहरु लोभु अरु लोकाचारु ॥ परहरु कामु क्रोधु अहंकारु ॥२॥

करम करत बधे अहमेव ॥ मिलि पाथर की करही सेव ॥३॥

कहु कबीर भगति करि पाइआ ॥ भोले भाइ मिले रघुराइआ ॥४॥६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 324) गउड़ी कबीर जी ॥
गरभ वास महि कुलु नही जाती ॥ ब्रहम बिंदु ते सभ उतपाती ॥१॥

कहु रे पंडित बामन कब के होए ॥ बामन कहि कहि जनमु मत खोए ॥१॥ रहाउ ॥

जौ तूं ब्राहमणु ब्रहमणी जाइआ ॥ तउ आन बाट काहे नही आइआ ॥२॥

तुम कत ब्राहमण हम कत सूद ॥ हम कत लोहू तुम कत दूध ॥३॥

कहु कबीर जो ब्रहमु बीचारै ॥ सो ब्राहमणु कहीअतु है हमारै ॥४॥७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 325) गउड़ी कबीर जी ॥
अंधकार सुखि कबहि न सोई है ॥ राजा रंकु दोऊ मिलि रोई है ॥१॥

जउ पै रसना रामु न कहिबो ॥ उपजत बिनसत रोवत रहिबो ॥१॥ रहाउ ॥

जस देखीऐ तरवर की छाइआ ॥ प्रान गए कहु का की माइआ ॥२॥

जस जंती महि जीउ समाना ॥ मूए मरमु को का कर जाना ॥३॥

हंसा सरवरु कालु सरीर ॥ राम रसाइन पीउ रे कबीर ॥४॥८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 325) गउड़ी कबीर जी ॥
जोति की जाति जाति की जोती ॥ तितु लागे कंचूआ फल मोती ॥१॥

कवनु सु घरु जो निरभउ कहीऐ ॥ भउ भजि जाइ अभै होइ रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

तटि तीरथि नही मनु पतीआइ ॥ चार अचार रहे उरझाइ ॥२॥

पाप पुंन दुइ एक समान ॥ निज घरि पारसु तजहु गुन आन ॥३॥

कबीर निरगुण नाम न रोसु ॥ इसु परचाइ परचि रहु एसु ॥४॥९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 325) गउड़ी कबीर जी ॥
जो जन परमिति परमनु जाना ॥ बातन ही बैकुंठ समाना ॥१॥

ना जाना बैकुंठ कहा ही ॥ जानु जानु सभि कहहि तहा ही ॥१॥ रहाउ ॥

कहन कहावन नह पतीअई है ॥ तउ मनु मानै जा ते हउमै जई है ॥२॥

जब लगु मनि बैकुंठ की आस ॥ तब लगु होइ नही चरन निवासु ॥३॥

कहु कबीर इह कहीऐ काहि ॥ साधसंगति बैकुंठै आहि ॥४॥१०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 325) गउड़ी कबीर जी ॥
उपजै निपजै निपजि समाई ॥ नैनह देखत इहु जगु जाई ॥१॥

लाज न मरहु कहहु घरु मेरा ॥ अंत की बार नही कछु तेरा ॥१॥ रहाउ ॥

अनिक जतन करि काइआ पाली ॥ मरती बार अगनि संगि जाली ॥२॥

चोआ चंदनु मरदन अंगा ॥ सो तनु जलै काठ कै संगा ॥३॥

कहु कबीर सुनहु रे गुनीआ ॥ बिनसैगो रूपु देखै सभ दुनीआ ॥४॥११॥

(राग गउड़ी -- SGGS 325) गउड़ी कबीर जी ॥
अवर मूए किआ सोगु करीजै ॥ तउ कीजै जउ आपन जीजै ॥१॥

मै न मरउ मरिबो संसारा ॥ अब मोहि मिलिओ है जीआवनहारा ॥१॥ रहाउ ॥

इआ देही परमल महकंदा ॥ ता सुख बिसरे परमानंदा ॥२॥

कूअटा एकु पंच पनिहारी ॥ टूटी लाजु भरै मति हारी ॥३॥

कहु कबीर इक बुधि बीचारी ॥ ना ओहु कूअटा ना पनिहारी ॥४॥१२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 325) गउड़ी कबीर जी ॥
असथावर जंगम कीट पतंगा ॥ अनिक जनम कीए बहु रंगा ॥१॥

ऐसे घर हम बहुतु बसाए ॥ जब हम राम गरभ होइ आए ॥१॥ रहाउ ॥

जोगी जती तपी ब्रहमचारी ॥ कबहू राजा छत्रपति कबहू भेखारी ॥२॥

साकत मरहि संत सभि जीवहि ॥ राम रसाइनु रसना पीवहि ॥३॥

कहु कबीर प्रभ किरपा कीजै ॥ हारि परे अब पूरा दीजै ॥४॥१३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 326) गउड़ी कबीर जी की नालि रलाइ लिखिआ महला ५ ॥
ऐसो अचरजु देखिओ कबीर ॥ दधि कै भोलै बिरोलै नीरु ॥१॥ रहाउ ॥

हरी अंगूरी गदहा चरै ॥ नित उठि हासै हीगै मरै ॥१॥

माता भैसा अमुहा जाइ ॥ कुदि कुदि चरै रसातलि पाइ ॥२॥

कहु कबीर परगटु भई खेड ॥ लेले कउ चूघै नित भेड ॥३॥

राम रमत मति परगटी आई ॥ कहु कबीर गुरि सोझी पाई ॥४॥१॥१४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 326) गउड़ी कबीर जी पंचपदे ॥
जिउ जल छोडि बाहरि भइओ मीना ॥ पूरब जनम हउ तप का हीना ॥१॥

अब कहु राम कवन गति मोरी ॥ तजी ले बनारस मति भई थोरी ॥१॥ रहाउ ॥

सगल जनमु सिव पुरी गवाइआ ॥ मरती बार मगहरि उठि आइआ ॥२॥

बहुतु बरस तपु कीआ कासी ॥ मरनु भइआ मगहर की बासी ॥३॥

कासी मगहर सम बीचारी ॥ ओछी भगति कैसे उतरसि पारी ॥४॥

कहु गुर गज सिव सभु को जानै ॥ मुआ कबीरु रमत स्री रामै ॥५॥१५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 326) गउड़ी कबीर जी ॥
चोआ चंदन मरदन अंगा ॥ सो तनु जलै काठ कै संगा ॥१॥

इसु तन धन की कवन बडाई ॥ धरनि परै उरवारि न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

राति जि सोवहि दिन करहि काम ॥ इकु खिनु लेहि न हरि को नाम ॥२॥

हाथि त डोर मुखि खाइओ त्मबोर ॥ मरती बार कसि बाधिओ चोर ॥३॥

गुरमति रसि रसि हरि गुन गावै ॥ रामै राम रमत सुखु पावै ॥४॥

किरपा करि कै नामु द्रिड़ाई ॥ हरि हरि बासु सुगंध बसाई ॥५॥

कहत कबीर चेति रे अंधा ॥ सति रामु झूठा सभु धंधा ॥६॥१६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 326) गउड़ी कबीर जी तिपदे चारतुके ॥
जम ते उलटि भए है राम ॥ दुख बिनसे सुख कीओ बिसराम ॥ बैरी उलटि भए है मीता ॥ साकत उलटि सुजन भए चीता ॥१॥

अब मोहि सरब कुसल करि मानिआ ॥ सांति भई जब गोबिदु जानिआ ॥१॥ रहाउ ॥

तन महि होती कोटि उपाधि ॥ उलटि भई सुख सहजि समाधि ॥ आपु पछानै आपै आप ॥ रोगु न बिआपै तीनौ ताप ॥२॥

अब मनु उलटि सनातनु हूआ ॥ तब जानिआ जब जीवत मूआ ॥ कहु कबीर सुखि सहजि समावउ ॥ आपि न डरउ न अवर डरावउ ॥३॥१७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 327) गउड़ी कबीर जी ॥
पिंडि मूऐ जीउ किह घरि जाता ॥ सबदि अतीति अनाहदि राता ॥ जिनि रामु जानिआ तिनहि पछानिआ ॥ जिउ गूंगे साकर मनु मानिआ ॥१॥

ऐसा गिआनु कथै बनवारी ॥ मन रे पवन द्रिड़ सुखमन नारी ॥१॥ रहाउ ॥

सो गुरु करहु जि बहुरि न करना ॥ सो पदु रवहु जि बहुरि न रवना ॥ सो धिआनु धरहु जि बहुरि न धरना ॥ ऐसे मरहु जि बहुरि न मरना ॥२॥

उलटी गंगा जमुन मिलावउ ॥ बिनु जल संगम मन महि न्हावउ ॥ लोचा समसरि इहु बिउहारा ॥ ततु बीचारि किआ अवरि बीचारा ॥३॥

अपु तेजु बाइ प्रिथमी आकासा ॥ ऐसी रहत रहउ हरि पासा ॥ कहै कबीर निरंजन धिआवउ ॥ तितु घरि जाउ जि बहुरि न आवउ ॥४॥१८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 327) गउड़ी कबीर जी तिपदे ॥
कंचन सिउ पाईऐ नही तोलि ॥ मनु दे रामु लीआ है मोलि ॥१॥

अब मोहि रामु अपुना करि जानिआ ॥ सहज सुभाइ मेरा मनु मानिआ ॥१॥ रहाउ ॥

ब्रहमै कथि कथि अंतु न पाइआ ॥ राम भगति बैठे घरि आइआ ॥२॥

कहु कबीर चंचल मति तिआगी ॥ केवल राम भगति निज भागी ॥३॥१॥१९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 327) गउड़ी कबीर जी ॥
जिह मरनै सभु जगतु तरासिआ ॥ सो मरना गुर सबदि प्रगासिआ ॥१॥

अब कैसे मरउ मरनि मनु मानिआ ॥ मरि मरि जाते जिन रामु न जानिआ ॥१॥ रहाउ ॥

मरनो मरनु कहै सभु कोई ॥ सहजे मरै अमरु होइ सोई ॥२॥

कहु कबीर मनि भइआ अनंदा ॥ गइआ भरमु रहिआ परमानंदा ॥३॥२०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 327) गउड़ी कबीर जी ॥
कत नही ठउर मूलु कत लावउ ॥ खोजत तन महि ठउर न पावउ ॥१॥

लागी होइ सु जानै पीर ॥ राम भगति अनीआले तीर ॥१॥ रहाउ ॥

एक भाइ देखउ सभ नारी ॥ किआ जानउ सह कउन पिआरी ॥२॥

कहु कबीर जा कै मसतकि भागु ॥ सभ परहरि ता कउ मिलै सुहागु ॥३॥२१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 328) गउड़ी कबीर जी ॥
जा कै हरि सा ठाकुरु भाई ॥ मुकति अनंत पुकारणि जाई ॥१॥

अब कहु राम भरोसा तोरा ॥ तब काहू का कवनु निहोरा ॥१॥ रहाउ ॥

तीनि लोक जा कै हहि भार ॥ सो काहे न करै प्रतिपार ॥२॥

कहु कबीर इक बुधि बीचारी ॥ किआ बसु जउ बिखु दे महतारी ॥३॥२२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 328) गउड़ी कबीर जी ॥
बिनु सत सती होइ कैसे नारि ॥ पंडित देखहु रिदै बीचारि ॥१॥

प्रीति बिना कैसे बधै सनेहु ॥ जब लगु रसु तब लगु नही नेहु ॥१॥ रहाउ ॥

साहनि सतु करै जीअ अपनै ॥ सो रमये कउ मिलै न सुपनै ॥२॥

तनु मनु धनु ग्रिहु सउपि सरीरु ॥ सोई सुहागनि कहै कबीरु ॥३॥२३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 328) गउड़ी कबीर जी ॥
बिखिआ बिआपिआ सगल संसारु ॥ बिखिआ लै डूबी परवारु ॥१॥

रे नर नाव चउड़ि कत बोड़ी ॥ हरि सिउ तोड़ि बिखिआ संगि जोड़ी ॥१॥ रहाउ ॥

सुरि नर दाधे लागी आगि ॥ निकटि नीरु पसु पीवसि न झागि ॥२॥

चेतत चेतत निकसिओ नीरु ॥ सो जलु निरमलु कथत कबीरु ॥३॥२४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 328) गउड़ी कबीर जी ॥
जिह कुलि पूतु न गिआन बीचारी ॥ बिधवा कस न भई महतारी ॥१॥

जिह नर राम भगति नहि साधी ॥ जनमत कस न मुओ अपराधी ॥१॥ रहाउ ॥

मुचु मुचु गरभ गए कीन बचिआ ॥ बुडभुज रूप जीवे जग मझिआ ॥२॥

कहु कबीर जैसे सुंदर सरूप ॥ नाम बिना जैसे कुबज कुरूप ॥३॥२५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 328) गउड़ी कबीर जी ॥
जो जन लेहि खसम का नाउ ॥ तिन कै सद बलिहारै जाउ ॥१॥

सो निरमलु निरमल हरि गुन गावै ॥ सो भाई मेरै मनि भावै ॥१॥ रहाउ ॥

जिह घट रामु रहिआ भरपूरि ॥ तिन की पग पंकज हम धूरि ॥२॥

जाति जुलाहा मति का धीरु ॥ सहजि सहजि गुण रमै कबीरु ॥३॥२६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 328) गउड़ी कबीर जी ॥
गगनि रसाल चुऐ मेरी भाठी ॥ संचि महा रसु तनु भइआ काठी ॥१॥

उआ कउ कहीऐ सहज मतवारा ॥ पीवत राम रसु गिआन बीचारा ॥१॥ रहाउ ॥

सहज कलालनि जउ मिलि आई ॥ आनंदि माते अनदिनु जाई ॥२॥

चीनत चीतु निरंजन लाइआ ॥ कहु कबीर तौ अनभउ पाइआ ॥३॥२७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 328) गउड़ी कबीर जी ॥
मन का सुभाउ मनहि बिआपी ॥ मनहि मारि कवन सिधि थापी ॥१॥

कवनु सु मुनि जो मनु मारै ॥ मन कउ मारि कहहु किसु तारै ॥१॥ रहाउ ॥

मन अंतरि बोलै सभु कोई ॥ मन मारे बिनु भगति न होई ॥२॥

कहु कबीर जो जानै भेउ ॥ मनु मधुसूदनु त्रिभवण देउ ॥३॥२८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 329) गउड़ी कबीर जी ॥
ओइ जु दीसहि अंबरि तारे ॥ किनि ओइ चीते चीतनहारे ॥१॥

कहु रे पंडित अंबरु का सिउ लागा ॥ बूझै बूझनहारु सभागा ॥१॥ रहाउ ॥

सूरज चंदु करहि उजीआरा ॥ सभ महि पसरिआ ब्रहम पसारा ॥२॥

कहु कबीर जानैगा सोइ ॥ हिरदै रामु मुखि रामै होइ ॥३॥२९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 329) गउड़ी कबीर जी ॥
बेद की पुत्री सिम्रिति भाई ॥ सांकल जेवरी लै है आई ॥१॥

आपन नगरु आप ते बाधिआ ॥ मोह कै फाधि काल सरु सांधिआ ॥१॥ रहाउ ॥

कटी न कटै तूटि नह जाई ॥ सा सापनि होइ जग कउ खाई ॥२॥

हम देखत जिनि सभु जगु लूटिआ ॥ कहु कबीर मै राम कहि छूटिआ ॥३॥३०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 329) गउड़ी कबीर जी ॥
देइ मुहार लगामु पहिरावउ ॥ सगल त जीनु गगन दउरावउ ॥१॥

अपनै बीचारि असवारी कीजै ॥ सहज कै पावड़ै पगु धरि लीजै ॥१॥ रहाउ ॥

चलु रे बैकुंठ तुझहि ले तारउ ॥ हिचहि त प्रेम कै चाबुक मारउ ॥२॥

कहत कबीर भले असवारा ॥ बेद कतेब ते रहहि निरारा ॥३॥३१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 329) गउड़ी कबीर जी ॥
जिह मुखि पांचउ अम्रित खाए ॥ तिह मुख देखत लूकट लाए ॥१॥

इकु दुखु राम राइ काटहु मेरा ॥ अगनि दहै अरु गरभ बसेरा ॥१॥ रहाउ ॥

काइआ बिगूती बहु बिधि भाती ॥ को जारे को गडि ले माटी ॥२॥

कहु कबीर हरि चरण दिखावहु ॥ पाछै ते जमु किउ न पठावहु ॥३॥३२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 329) गउड़ी कबीर जी ॥
आपे पावकु आपे पवना ॥ जारै खसमु त राखै कवना ॥१॥

राम जपत तनु जरि की न जाइ ॥ राम नाम चितु रहिआ समाइ ॥१॥ रहाउ ॥

का को जरै काहि होइ हानि ॥ नट वट खेलै सारिगपानि ॥२॥

कहु कबीर अखर दुइ भाखि ॥ होइगा खसमु त लेइगा राखि ॥३॥३३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 329) गउड़ी कबीर जी दुपदे ॥
ना मै जोग धिआन चितु लाइआ ॥ बिनु बैराग न छूटसि माइआ ॥१॥

कैसे जीवनु होइ हमारा ॥ जब न होइ राम नाम अधारा ॥१॥ रहाउ ॥

कहु कबीर खोजउ असमान ॥ राम समान न देखउ आन ॥२॥३४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 330) गउड़ी कबीर जी ॥
जिह सिरि रचि रचि बाधत पाग ॥ सो सिरु चुंच सवारहि काग ॥१॥

इसु तन धन को किआ गरबईआ ॥ राम नामु काहे न द्रिड़्हीआ ॥१॥ रहाउ ॥

कहत कबीर सुनहु मन मेरे ॥ इही हवाल होहिगे तेरे ॥२॥३५॥

गउड़ी गुआरेरी के पदे पैतीस ॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 330) रागु गउड़ी गुआरेरी असटपदी कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुखु मांगत दुखु आगै आवै ॥ सो सुखु हमहु न मांगिआ भावै ॥१॥

बिखिआ अजहु सुरति सुख आसा ॥ कैसे होई है राजा राम निवासा ॥१॥ रहाउ ॥

इसु सुख ते सिव ब्रहम डराना ॥ सो सुखु हमहु साचु करि जाना ॥२॥

सनकादिक नारद मुनि सेखा ॥ तिन भी तन महि मनु नही पेखा ॥३॥

इसु मन कउ कोई खोजहु भाई ॥ तन छूटे मनु कहा समाई ॥४॥

गुर परसादी जैदेउ नामां ॥ भगति कै प्रेमि इन ही है जानां ॥५॥

इसु मन कउ नही आवन जाना ॥ जिस का भरमु गइआ तिनि साचु पछाना ॥६॥

इसु मन कउ रूपु न रेखिआ काई ॥ हुकमे होइआ हुकमु बूझि समाई ॥७॥

इस मन का कोई जानै भेउ ॥ इह मनि लीण भए सुखदेउ ॥८॥

जीउ एकु अरु सगल सरीरा ॥ इसु मन कउ रवि रहे कबीरा ॥९॥१॥३६॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 330) गउड़ी गुआरेरी ॥
अहिनिसि एक नाम जो जागे ॥ केतक सिध भए लिव लागे ॥१॥ रहाउ ॥

साधक सिध सगल मुनि हारे ॥ एक नाम कलिप तर तारे ॥१॥

जो हरि हरे सु होहि न आना ॥ कहि कबीर राम नाम पछाना ॥२॥३७॥

(राग गउड़ी सोरठि -- SGGS 330) गउड़ी भी सोरठि भी ॥
रे जीअ निलज लाज तोहि नाही ॥ हरि तजि कत काहू के जांही ॥१॥ रहाउ ॥

जा को ठाकुरु ऊचा होई ॥ सो जनु पर घर जात न सोही ॥१॥

सो साहिबु रहिआ भरपूरि ॥ सदा संगि नाही हरि दूरि ॥२॥

कवला चरन सरन है जा के ॥ कहु जन का नाही घर ता के ॥३॥

सभु कोऊ कहै जासु की बाता ॥ सो सम्रथु निज पति है दाता ॥४॥

कहै कबीरु पूरन जग सोई ॥ जा के हिरदै अवरु न होई ॥५॥३८॥

(राग गउड़ी सोरठि -- SGGS 331) कउनु को पूतु पिता को का को ॥ कउनु मरै को देइ संतापो ॥१॥

हरि ठग जग कउ ठगउरी लाई ॥ हरि के बिओग कैसे जीअउ मेरी माई ॥१॥ रहाउ ॥

कउन को पुरखु कउन की नारी ॥ इआ तत लेहु सरीर बिचारी ॥२॥

कहि कबीर ठग सिउ मनु मानिआ ॥ गई ठगउरी ठगु पहिचानिआ ॥३॥३९॥

(राग गउड़ी सोरठि -- SGGS 331) अब मो कउ भए राजा राम सहाई ॥ जनम मरन कटि परम गति पाई ॥१॥ रहाउ ॥

साधू संगति दीओ रलाइ ॥ पंच दूत ते लीओ छडाइ ॥ अम्रित नामु जपउ जपु रसना ॥ अमोल दासु करि लीनो अपना ॥१॥

सतिगुर कीनो परउपकारु ॥ काढि लीन सागर संसार ॥ चरन कमल सिउ लागी प्रीति ॥ गोबिंदु बसै निता नित चीत ॥२॥

माइआ तपति बुझिआ अंगिआरु ॥ मनि संतोखु नामु आधारु ॥ जलि थलि पूरि रहे प्रभ सुआमी ॥ जत पेखउ तत अंतरजामी ॥३॥

अपनी भगति आप ही द्रिड़ाई ॥ पूरब लिखतु मिलिआ मेरे भाई ॥ जिसु क्रिपा करे तिसु पूरन साज ॥ कबीर को सुआमी गरीब निवाज ॥४॥४०॥

(राग गउड़ी सोरठि -- SGGS 331) जलि है सूतकु थलि है सूतकु सूतक ओपति होई ॥ जनमे सूतकु मूए फुनि सूतकु सूतक परज बिगोई ॥१॥

कहु रे पंडीआ कउन पवीता ॥ ऐसा गिआनु जपहु मेरे मीता ॥१॥ रहाउ ॥

नैनहु सूतकु बैनहु सूतकु सूतकु स्रवनी होई ॥ ऊठत बैठत सूतकु लागै सूतकु परै रसोई ॥२॥

फासन की बिधि सभु कोऊ जानै छूटन की इकु कोई ॥ कहि कबीर रामु रिदै बिचारै सूतकु तिनै न होई ॥३॥४१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 331) गउड़ी ॥
झगरा एकु निबेरहु राम ॥ जउ तुम अपने जन सौ कामु ॥१॥ रहाउ ॥

इहु मनु बडा कि जा सउ मनु मानिआ ॥ रामु बडा कै रामहि जानिआ ॥१॥

ब्रहमा बडा कि जासु उपाइआ ॥ बेदु बडा कि जहां ते आइआ ॥२॥

कहि कबीर हउ भइआ उदासु ॥ तीरथु बडा कि हरि का दासु ॥३॥४२॥

(राग गउड़ी चेती -- SGGS 331) रागु गउड़ी चेती ॥
देखौ भाई ग्यान की आई आंधी ॥ सभै उडानी भ्रम की टाटी रहै न माइआ बांधी ॥१॥ रहाउ ॥

दुचिते की दुइ थूनि गिरानी मोह बलेडा टूटा ॥ तिसना छानि परी धर ऊपरि दुरमति भांडा फूटा ॥१॥

आंधी पाछे जो जलु बरखै तिहि तेरा जनु भीनां ॥ कहि कबीर मनि भइआ प्रगासा उदै भानु जब चीना ॥२॥४३॥

(राग गउड़ी चेती -- SGGS 332) गउड़ी चेती
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि जसु सुनहि न हरि गुन गावहि ॥ बातन ही असमानु गिरावहि ॥१॥

ऐसे लोगन सिउ किआ कहीऐ ॥ जो प्रभ कीए भगति ते बाहज तिन ते सदा डराने रहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

आपि न देहि चुरू भरि पानी ॥ तिह निंदहि जिह गंगा आनी ॥२॥

बैठत उठत कुटिलता चालहि ॥ आपु गए अउरन हू घालहि ॥३॥

छाडि कुचरचा आन न जानहि ॥ ब्रहमा हू को कहिओ न मानहि ॥४॥

आपु गए अउरन हू खोवहि ॥ आगि लगाइ मंदर मै सोवहि ॥५॥

अवरन हसत आप हहि कांने ॥ तिन कउ देखि कबीर लजाने ॥६॥१॥४४॥

(राग गउड़ी बैरागणि -- SGGS 332) रागु गउड़ी बैरागणि कबीर जी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जीवत पितर न मानै कोऊ मूएं सिराध कराही ॥ पितर भी बपुरे कहु किउ पावहि कऊआ कूकर खाही ॥१॥

मो कउ कुसलु बतावहु कोई ॥ कुसलु कुसलु करते जगु बिनसै कुसलु भी कैसे होई ॥१॥ रहाउ ॥

माटी के करि देवी देवा तिसु आगै जीउ देही ॥ ऐसे पितर तुमारे कहीअहि आपन कहिआ न लेही ॥२॥

सरजीउ काटहि निरजीउ पूजहि अंत काल कउ भारी ॥ राम नाम की गति नही जानी भै डूबे संसारी ॥३॥

देवी देवा पूजहि डोलहि पारब्रहमु नही जाना ॥ कहत कबीर अकुलु नही चेतिआ बिखिआ सिउ लपटाना ॥४॥१॥४५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 332) गउड़ी ॥
जीवत मरै मरै फुनि जीवै ऐसे सुंनि समाइआ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ बहुड़ि न भवजलि पाइआ ॥१॥

मेरे राम ऐसा खीरु बिलोईऐ ॥ गुरमति मनूआ असथिरु राखहु इन बिधि अम्रितु पीओईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर कै बाणि बजर कल छेदी प्रगटिआ पदु परगासा ॥ सकति अधेर जेवड़ी भ्रमु चूका निहचलु सिव घरि बासा ॥२॥

तिनि बिनु बाणै धनखु चढाईऐ इहु जगु बेधिआ भाई ॥ दह दिस बूडी पवनु झुलावै डोरि रही लिव लाई ॥३॥

उनमनि मनूआ सुंनि समाना दुबिधा दुरमति भागी ॥ कहु कबीर अनभउ इकु देखिआ राम नामि लिव लागी ॥४॥२॥४६॥

(राग गउड़ी बैरागणि -- SGGS 333) गउड़ी बैरागणि तिपदे ॥
उलटत पवन चक्र खटु भेदे सुरति सुंन अनरागी ॥ आवै न जाइ मरै न जीवै तासु खोजु बैरागी ॥१॥

मेरे मन मन ही उलटि समाना ॥ गुर परसादि अकलि भई अवरै नातरु था बेगाना ॥१॥ रहाउ ॥

निवरै दूरि दूरि फुनि निवरै जिनि जैसा करि मानिआ ॥ अलउती का जैसे भइआ बरेडा जिनि पीआ तिनि जानिआ ॥२॥

तेरी निरगुन कथा काइ सिउ कहीऐ ऐसा कोइ बिबेकी ॥ कहु कबीर जिनि दीआ पलीता तिनि तैसी झल देखी ॥३॥३॥४७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 333) गउड़ी ॥
तह पावस सिंधु धूप नही छहीआ तह उतपति परलउ नाही ॥ जीवन मिरतु न दुखु सुखु बिआपै सुंन समाधि दोऊ तह नाही ॥१॥

सहज की अकथ कथा है निरारी ॥ तुलि नही चढै जाइ न मुकाती हलुकी लगै न भारी ॥१॥ रहाउ ॥

अरध उरध दोऊ तह नाही राति दिनसु तह नाही ॥ जलु नही पवनु पावकु फुनि नाही सतिगुर तहा समाही ॥२॥

अगम अगोचरु रहै निरंतरि गुर किरपा ते लहीऐ ॥ कहु कबीर बलि जाउ गुर अपुने सतसंगति मिलि रहीऐ ॥३॥४॥४८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 333) गउड़ी ॥
पापु पुंनु दुइ बैल बिसाहे पवनु पूजी परगासिओ ॥ त्रिसना गूणि भरी घट भीतरि इन बिधि टांड बिसाहिओ ॥१॥

ऐसा नाइकु रामु हमारा ॥ सगल संसारु कीओ बनजारा ॥१॥ रहाउ ॥

कामु क्रोधु दुइ भए जगाती मन तरंग बटवारा ॥ पंच ततु मिलि दानु निबेरहि टांडा उतरिओ पारा ॥२॥

कहत कबीरु सुनहु रे संतहु अब ऐसी बनि आई ॥ घाटी चढत बैलु इकु थाका चलो गोनि छिटकाई ॥३॥५॥४९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 333) गउड़ी पंचपदा ॥
पेवकड़ै दिन चारि है साहुरड़ै जाणा ॥ अंधा लोकु न जाणई मूरखु एआणा ॥१॥

कहु डडीआ बाधै धन खड़ी ॥ पाहू घरि आए मुकलाऊ आए ॥१॥ रहाउ ॥

ओह जि दिसै खूहड़ी कउन लाजु वहारी ॥ लाजु घड़ी सिउ तूटि पड़ी उठि चली पनिहारी ॥२॥

साहिबु होइ दइआलु क्रिपा करे अपुना कारजु सवारे ॥ ता सोहागणि जाणीऐ गुर सबदु बीचारे ॥३॥

किरत की बांधी सभ फिरै देखहु बीचारी ॥ एस नो किआ आखीऐ किआ करे विचारी ॥४॥

भई निरासी उठि चली चित बंधि न धीरा ॥ हरि की चरणी लागि रहु भजु सरणि कबीरा ॥५॥६॥५०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 334) गउड़ी ॥
जोगी कहहि जोगु भल मीठा अवरु न दूजा भाई ॥ रुंडित मुंडित एकै सबदी एइ कहहि सिधि पाई ॥१॥

हरि बिनु भरमि भुलाने अंधा ॥ जा पहि जाउ आपु छुटकावनि ते बाधे बहु फंधा ॥१॥ रहाउ ॥

जह ते उपजी तही समानी इह बिधि बिसरी तब ही ॥ पंडित गुणी सूर हम दाते एहि कहहि बड हम ही ॥२॥

जिसहि बुझाए सोई बूझै बिनु बूझे किउ रहीऐ ॥ सतिगुरु मिलै अंधेरा चूकै इन बिधि माणकु लहीऐ ॥३॥

तजि बावे दाहने बिकारा हरि पदु द्रिड़ु करि रहीऐ ॥ कहु कबीर गूंगै गुड़ु खाइआ पूछे ते किआ कहीऐ ॥४॥७॥५१॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 334) रागु गउड़ी पूरबी कबीर जी ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जह कछु अहा तहा किछु नाही पंच ततु तह नाही ॥ इड़ा पिंगुला सुखमन बंदे ए अवगन कत जाही ॥१॥

तागा तूटा गगनु बिनसि गइआ तेरा बोलतु कहा समाई ॥ एह संसा मो कउ अनदिनु बिआपै मो कउ को न कहै समझाई ॥१॥ रहाउ ॥

जह बरभंडु पिंडु तह नाही रचनहारु तह नाही ॥ जोड़नहारो सदा अतीता इह कहीऐ किसु माही ॥२॥

जोड़ी जुड़ै न तोड़ी तूटै जब लगु होइ बिनासी ॥ का को ठाकुरु का को सेवकु को काहू कै जासी ॥३॥

कहु कबीर लिव लागि रही है जहा बसे दिन राती ॥ उआ का मरमु ओही परु जानै ओहु तउ सदा अबिनासी ॥४॥१॥५२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 334) गउड़ी ॥
सुरति सिम्रिति दुइ कंनी मुंदा परमिति बाहरि खिंथा ॥ सुंन गुफा महि आसणु बैसणु कलप बिबरजित पंथा ॥१॥

मेरे राजन मै बैरागी जोगी ॥ मरत न सोग बिओगी ॥१॥ रहाउ ॥

खंड ब्रहमंड महि सिंङी मेरा बटूआ सभु जगु भसमाधारी ॥ ताड़ी लागी त्रिपलु पलटीऐ छूटै होइ पसारी ॥२॥

मनु पवनु दुइ तू्मबा करी है जुग जुग सारद साजी ॥ थिरु भई तंती तूटसि नाही अनहद किंगुरी बाजी ॥३॥

सुनि मन मगन भए है पूरे माइआ डोल न लागी ॥ कहु कबीर ता कउ पुनरपि जनमु नही खेलि गइओ बैरागी ॥४॥२॥५३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 335) गउड़ी ॥
गज नव गज दस गज इकीस पुरीआ एक तनाई ॥ साठ सूत नव खंड बहतरि पाटु लगो अधिकाई ॥१॥

गई बुनावन माहो ॥ घर छोडिऐ जाइ जुलाहो ॥१॥ रहाउ ॥

गजी न मिनीऐ तोलि न तुलीऐ पाचनु सेर अढाई ॥ जौ करि पाचनु बेगि न पावै झगरु करै घरहाई ॥२॥

दिन की बैठ खसम की बरकस इह बेला कत आई ॥ छूटे कूंडे भीगै पुरीआ चलिओ जुलाहो रीसाई ॥३॥

छोछी नली तंतु नही निकसै नतर रही उरझाई ॥ छोडि पसारु ईहा रहु बपुरी कहु कबीर समझाई ॥४॥३॥५४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 335) गउड़ी ॥
एक जोति एका मिली कि्मबा होइ महोइ ॥ जितु घटि नामु न ऊपजै फूटि मरै जनु सोइ ॥१॥

सावल सुंदर रामईआ ॥ मेरा मनु लागा तोहि ॥१॥ रहाउ ॥

साधु मिलै सिधि पाईऐ कि एहु जोगु कि भोगु ॥ दुहु मिलि कारजु ऊपजै राम नाम संजोगु ॥२॥

लोगु जानै इहु गीतु है इहु तउ ब्रहम बीचार ॥ जिउ कासी उपदेसु होइ मानस मरती बार ॥३॥

कोई गावै को सुणै हरि नामा चितु लाइ ॥ कहु कबीर संसा नही अंति परम गति पाइ ॥४॥१॥४॥५५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 335) गउड़ी ॥
जेते जतन करत ते डूबे भव सागरु नही तारिओ रे ॥ करम धरम करते बहु संजम अह्मबुधि मनु जारिओ रे ॥१॥

सास ग्रास को दातो ठाकुरु सो किउ मनहु बिसारिओ रे ॥ हीरा लालु अमोलु जनमु है कउडी बदलै हारिओ रे ॥१॥ रहाउ ॥

त्रिसना त्रिखा भूख भ्रमि लागी हिरदै नाहि बीचारिओ रे ॥ उनमत मान हिरिओ मन माही गुर का सबदु न धारिओ रे ॥२॥

सुआद लुभत इंद्री रस प्रेरिओ मद रस लैत बिकारिओ रे ॥ करम भाग संतन संगाने कासट लोह उधारिओ रे ॥३॥

धावत जोनि जनम भ्रमि थाके अब दुख करि हम हारिओ रे ॥ कहि कबीर गुर मिलत महा रसु प्रेम भगति निसतारिओ रे ॥४॥१॥५॥५६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 335) गउड़ी ॥
कालबूत की हसतनी मन बउरा रे चलतु रचिओ जगदीस ॥ काम सुआइ गज बसि परे मन बउरा रे अंकसु सहिओ सीस ॥१॥

बिखै बाचु हरि राचु समझु मन बउरा रे ॥ निरभै होइ न हरि भजे मन बउरा रे गहिओ न राम जहाजु ॥१॥ रहाउ ॥

मरकट मुसटी अनाज की मन बउरा रे लीनी हाथु पसारि ॥ छूटन को सहसा परिआ मन बउरा रे नाचिओ घर घर बारि ॥२॥

जिउ नलनी सूअटा गहिओ मन बउरा रे माया इहु बिउहारु ॥ जैसा रंगु कसु्मभ का मन बउरा रे तिउ पसरिओ पासारु ॥३॥

नावन कउ तीरथ घने मन बउरा रे पूजन कउ बहु देव ॥ कहु कबीर छूटनु नही मन बउरा रे छूटनु हरि की सेव ॥४॥१॥६॥५७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 336) गउड़ी ॥
अगनि न दहै पवनु नही मगनै तसकरु नेरि न आवै ॥ राम नाम धनु करि संचउनी सो धनु कत ही न जावै ॥१॥

हमरा धनु माधउ गोबिंदु धरणीधरु इहै सार धनु कहीऐ ॥ जो सुखु प्रभ गोबिंद की सेवा सो सुखु राजि न लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

इसु धन कारणि सिव सनकादिक खोजत भए उदासी ॥ मनि मुकंदु जिहबा नाराइनु परै न जम की फासी ॥२॥

निज धनु गिआनु भगति गुरि दीनी तासु सुमति मनु लागा ॥ जलत अंभ थ्मभि मनु धावत भरम बंधन भउ भागा ॥३॥

कहै कबीरु मदन के माते हिरदै देखु बीचारी ॥ तुम घरि लाख कोटि अस्व हसती हम घरि एकु मुरारी ॥४॥१॥७॥५८॥


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