Pt 9 - गुरू रामदास जी - सलोक बाणी शब्द, Part 9 - Guru Ramdas ji (Mahalla 4) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग जैतसरी -- SGGS 699) जैतसरी महला ४ ॥
आपे जोगी जुगति जुगाहा ॥ आपे निरभउ ताड़ी लाहा ॥ आपे ही आपि आपि वरतै आपे नामि ओमाहा राम ॥१॥

आपे दीप लोअ दीपाहा ॥ आपे सतिगुरु समुंदु मथाहा ॥ आपे मथि मथि ततु कढाए जपि नामु रतनु ओमाहा राम ॥२॥

सखी मिलहु मिलि गुण गावाहा ॥ गुरमुखि नामु जपहु हरि लाहा ॥ हरि हरि भगति द्रिड़ी मनि भाई हरि हरि नामु ओमाहा राम ॥३॥

आपे वड दाणा वड साहा ॥ गुरमुखि पूंजी नामु विसाहा ॥ हरि हरि दाति करहु प्रभ भावै गुण नानक नामु ओमाहा राम ॥४॥४॥१०॥

(राग जैतसरी -- SGGS 699) जैतसरी महला ४ ॥
मिलि सतसंगति संगि गुराहा ॥ पूंजी नामु गुरमुखि वेसाहा ॥ हरि हरि क्रिपा धारि मधुसूदन मिलि सतसंगि ओमाहा राम ॥१॥

हरि गुण बाणी स्रवणि सुणाहा ॥ करि किरपा सतिगुरू मिलाहा ॥ गुण गावह गुण बोलह बाणी हरि गुण जपि ओमाहा राम ॥२॥

सभि तीरथ वरत जग पुंन तोलाहा ॥ हरि हरि नाम न पुजहि पुजाहा ॥ हरि हरि अतुलु तोलु अति भारी गुरमति जपि ओमाहा राम ॥३॥

सभि करम धरम हरि नामु जपाहा ॥ किलविख मैलु पाप धोवाहा ॥ दीन दइआल होहु जन ऊपरि देहु नानक नामु ओमाहा राम ॥४॥५॥११॥

(राग टोडी -- SGGS 711) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु टोडी महला ४ घरु १ ॥
हरि बिनु रहि न सकै मनु मेरा ॥ मेरे प्रीतम प्रान हरि प्रभु गुरु मेले बहुरि न भवजलि फेरा ॥१॥ रहाउ ॥

मेरै हीअरै लोच लगी प्रभ केरी हरि नैनहु हरि प्रभ हेरा ॥ सतिगुरि दइआलि हरि नामु द्रिड़ाइआ हरि पाधरु हरि प्रभ केरा ॥१॥

हरि रंगी हरि नामु प्रभ पाइआ हरि गोविंद हरि प्रभ केरा ॥ हरि हिरदै मनि तनि मीठा लागा मुखि मसतकि भागु चंगेरा ॥२॥

लोभ विकार जिना मनु लागा हरि विसरिआ पुरखु चंगेरा ॥ ओइ मनमुख मूड़ अगिआनी कहीअहि तिन मसतकि भागु मंदेरा ॥३॥

बिबेक बुधि सतिगुर ते पाई गुर गिआनु गुरू प्रभ केरा ॥ जन नानक नामु गुरू ते पाइआ धुरि मसतकि भागु लिखेरा ॥४॥१॥

(राग बैराड़ी -- SGGS 719) रागु बैराड़ी महला ४ घरु १ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुनि मन अकथ कथा हरि नाम ॥ रिधि बुधि सिधि सुख पावहि भजु गुरमति हरि राम राम ॥१॥ रहाउ ॥

नाना खिआन पुरान जसु ऊतम खट दरसन गावहि राम ॥ संकर क्रोड़ि तेतीस धिआइओ नही जानिओ हरि मरमाम ॥१॥

सुरि नर गण गंध्रब जसु गावहि सभ गावत जेत उपाम ॥ नानक क्रिपा करी हरि जिन कउ ते संत भले हरि राम ॥२॥१॥

(राग बैराड़ी -- SGGS 719) बैराड़ी महला ४ ॥
मन मिलि संत जना जसु गाइओ ॥ हरि हरि रतनु रतनु हरि नीको गुरि सतिगुरि दानु दिवाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

तिसु जन कउ मनु तनु सभु देवउ जिनि हरि हरि नामु सुनाइओ ॥ धनु माइआ स्मपै तिसु देवउ जिनि हरि मीतु मिलाइओ ॥१॥

खिनु किंचित क्रिपा करी जगदीसरि तब हरि हरि हरि जसु धिआइओ ॥ जन नानक कउ हरि भेटे सुआमी दुखु हउमै रोगु गवाइओ ॥२॥२॥

(राग बैराड़ी -- SGGS 719) बैराड़ी महला ४ ॥
हरि जनु राम नाम गुन गावै ॥ जे कोई निंद करे हरि जन की अपुना गुनु न गवावै ॥१॥ रहाउ ॥

जो किछु करे सु आपे सुआमी हरि आपे कार कमावै ॥ हरि आपे ही मति देवै सुआमी हरि आपे बोलि बुलावै ॥१॥

हरि आपे पंच ततु बिसथारा विचि धातू पंच आपि पावै ॥ जन नानक सतिगुरु मेले आपे हरि आपे झगरु चुकावै ॥२॥३॥

(राग बैराड़ी -- SGGS 720) बैराड़ी महला ४ ॥
जपि मन राम नामु निसतारा ॥ कोट कोटंतर के पाप सभि खोवै हरि भवजलु पारि उतारा ॥१॥ रहाउ ॥

काइआ नगरि बसत हरि सुआमी हरि निरभउ निरवैरु निरंकारा ॥ हरि निकटि बसत कछु नदरि न आवै हरि लाधा गुर वीचारा ॥१॥

हरि आपे साहु सराफु रतनु हीरा हरि आपि कीआ पासारा ॥ नानक जिसु क्रिपा करे सु हरि नामु विहाझे सो साहु सचा वणजारा ॥२॥४॥

(राग बैराड़ी -- SGGS 720) बैराड़ी महला ४ ॥
जपि मन हरि निरंजनु निरंकारा ॥ सदा सदा हरि धिआईऐ सुखदाता जा का अंतु न पारावारा ॥१॥ रहाउ ॥

अगनि कुंट महि उरध लिव लागा हरि राखै उदर मंझारा ॥ सो ऐसा हरि सेवहु मेरे मन हरि अंति छडावणहारा ॥१॥

जा कै हिरदै बसिआ मेरा हरि हरि तिसु जन कउ करहु नमसकारा ॥ हरि किरपा ते पाईऐ हरि जपु नानक नामु अधारा ॥२॥५॥

(राग बैराड़ी -- SGGS 720) बैराड़ी महला ४ ॥
जपि मन हरि हरि नामु नित धिआइ ॥ जो इछहि सोई फलु पावहि फिरि दूखु न लागै आइ ॥१॥ रहाउ ॥

सो जपु सो तपु सा ब्रत पूजा जितु हरि सिउ प्रीति लगाइ ॥ बिनु हरि प्रीति होर प्रीति सभ झूठी इक खिन महि बिसरि सभ जाइ ॥१॥

तू बेअंतु सरब कल पूरा किछु कीमति कही न जाइ ॥ नानक सरणि तुम्हारी हरि जीउ भावै तिवै छडाइ ॥२॥६॥

(राग तिलंग -- SGGS 723) तिलंग महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभि आए हुकमि खसमाहु हुकमि सभ वरतनी ॥ सचु साहिबु साचा खेलु सभु हरि धनी ॥१॥

सालाहिहु सचु सभ ऊपरि हरि धनी ॥ जिसु नाही कोइ सरीकु किसु लेखै हउ गनी ॥ रहाउ ॥ पउण पाणी धरती आकासु घर मंदर हरि बनी ॥ विचि वरतै नानक आपि झूठु कहु किआ गनी ॥२॥१॥

(राग तिलंग -- SGGS 723) तिलंग महला ४ ॥
नित निहफल करम कमाइ बफावै दुरमतीआ ॥ जब आणै वलवंच करि झूठु तब जाणै जगु जितीआ ॥१॥

ऐसा बाजी सैसारु न चेतै हरि नामा ॥ खिन महि बिनसै सभु झूठु मेरे मन धिआइ रामा ॥ रहाउ ॥ सा वेला चिति न आवै जितु आइ कंटकु कालु ग्रसै ॥ तिसु नानक लए छडाइ जिसु किरपा करि हिरदै वसै ॥२॥२॥

(राग तिलंग -- SGGS 725) तिलंग महला ४ ॥
हरि कीआ कथा कहाणीआ गुरि मीति सुणाईआ ॥ बलिहारी गुर आपणे गुर कउ बलि जाईआ ॥१॥

आइ मिलु गुरसिख आइ मिलु तू मेरे गुरू के पिआरे ॥ रहाउ ॥ हरि के गुण हरि भावदे से गुरू ते पाए ॥ जिन गुर का भाणा मंनिआ तिन घुमि घुमि जाए ॥२॥

जिन सतिगुरु पिआरा देखिआ तिन कउ हउ वारी ॥ जिन गुर की कीती चाकरी तिन सद बलिहारी ॥३॥

हरि हरि तेरा नामु है दुख मेटणहारा ॥ गुर सेवा ते पाईऐ गुरमुखि निसतारा ॥४॥

जो हरि नामु धिआइदे ते जन परवाना ॥ तिन विटहु नानकु वारिआ सदा सदा कुरबाना ॥५॥

सा हरि तेरी उसतति है जो हरि प्रभ भावै ॥ जो गुरमुखि पिआरा सेवदे तिन हरि फलु पावै ॥६॥

जिना हरि सेती पिरहड़ी तिना जीअ प्रभ नाले ॥ ओइ जपि जपि पिआरा जीवदे हरि नामु समाले ॥७॥

जिन गुरमुखि पिआरा सेविआ तिन कउ घुमि जाइआ ॥ ओइ आपि छुटे परवार सिउ सभु जगतु छडाइआ ॥८॥

गुरि पिआरै हरि सेविआ गुरु धंनु गुरु धंनो ॥ गुरि हरि मारगु दसिआ गुर पुंनु वड पुंनो ॥९॥

जो गुरसिख गुरु सेवदे से पुंन पराणी ॥ जनु नानकु तिन कउ वारिआ सदा सदा कुरबाणी ॥१०॥

गुरमुखि सखी सहेलीआ से आपि हरि भाईआ ॥ हरि दरगह पैनाईआ हरि आपि गलि लाईआ ॥११॥

जो गुरमुखि नामु धिआइदे तिन दरसनु दीजै ॥ हम तिन के चरण पखालदे धूड़ि घोलि घोलि पीजै ॥१२॥

पान सुपारी खातीआ मुखि बीड़ीआ लाईआ ॥ हरि हरि कदे न चेतिओ जमि पकड़ि चलाईआ ॥१३॥

जिन हरि नामा हरि चेतिआ हिरदै उरि धारे ॥ तिन जमु नेड़ि न आवई गुरसिख गुर पिआरे ॥१४॥

हरि का नामु निधानु है कोई गुरमुखि जाणै ॥ नानक जिन सतिगुरु भेटिआ रंगि रलीआ माणै ॥१५॥

सतिगुरु दाता आखीऐ तुसि करे पसाओ ॥ हउ गुर विटहु सद वारिआ जिनि दितड़ा नाओ ॥१६॥

सो धंनु गुरू साबासि है हरि देइ सनेहा ॥ हउ वेखि वेखि गुरू विगसिआ गुर सतिगुर देहा ॥१७॥

गुर रसना अम्रितु बोलदी हरि नामि सुहावी ॥ जिन सुणि सिखा गुरु मंनिआ तिना भुख सभ जावी ॥१८॥

हरि का मारगु आखीऐ कहु कितु बिधि जाईऐ ॥ हरि हरि तेरा नामु है हरि खरचु लै जाईऐ ॥१९॥

जिन गुरमुखि हरि आराधिआ से साह वड दाणे ॥ हउ सतिगुर कउ सद वारिआ गुर बचनि समाणे ॥२०॥

तू ठाकुरु तू साहिबो तूहै मेरा मीरा ॥ तुधु भावै तेरी बंदगी तू गुणी गहीरा ॥२१॥

आपे हरि इक रंगु है आपे बहु रंगी ॥ जो तिसु भावै नानका साई गल चंगी ॥२२॥२॥

(राग सूही -- SGGS 731) रागु सूही महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मनि राम नामु आराधिआ गुर सबदि गुरू गुर के ॥ सभि इछा मनि तनि पूरीआ सभु चूका डरु जम के ॥१॥

मेरे मन गुण गावहु राम नाम हरि के ॥ गुरि तुठै मनु परबोधिआ हरि पीआ रसु गटके ॥१॥ रहाउ ॥

सतसंगति ऊतम सतिगुर केरी गुन गावै हरि प्रभ के ॥ हरि किरपा धारि मेलहु सतसंगति हम धोवह पग जन के ॥२॥

राम नामु सभु है राम नामा रसु गुरमति रसु रसके ॥ हरि अम्रितु हरि जलु पाइआ सभ लाथी तिस तिस के ॥३॥

हमरी जाति पाति गुरु सतिगुरु हम वेचिओ सिरु गुर के ॥ जन नानक नामु परिओ गुर चेला गुर राखहु लाज जन के ॥४॥१॥

(राग सूही -- SGGS 731) सूही महला ४ ॥
हरि हरि नामु भजिओ पुरखोतमु सभि बिनसे दालद दलघा ॥ भउ जनम मरणा मेटिओ गुर सबदी हरि असथिरु सेवि सुखि समघा ॥१॥

मेरे मन भजु राम नाम अति पिरघा ॥ मै मनु तनु अरपि धरिओ गुर आगै सिरु वेचि लीओ मुलि महघा ॥१॥ रहाउ ॥

नरपति राजे रंग रस माणहि बिनु नावै पकड़ि खड़े सभि कलघा ॥ धरम राइ सिरि डंडु लगाना फिरि पछुताने हथ फलघा ॥२॥

हरि राखु राखु जन किरम तुमारे सरणागति पुरख प्रतिपलघा ॥ दरसनु संत देहु सुखु पावै प्रभ लोच पूरि जनु तुमघा ॥३॥

तुम समरथ पुरख वडे प्रभ सुआमी मो कउ कीजै दानु हरि निमघा ॥ जन नानक नामु मिलै सुखु पावै हम नाम विटहु सद घुमघा ॥४॥२॥

(राग सूही -- SGGS 731) सूही महला ४ ॥
हरि नामा हरि रंङु है हरि रंङु मजीठै रंङु ॥ गुरि तुठै हरि रंगु चाड़िआ फिरि बहुड़ि न होवी भंङु ॥१॥

मेरे मन हरि राम नामि करि रंङु ॥ गुरि तुठै हरि उपदेसिआ हरि भेटिआ राउ निसंङु ॥१॥ रहाउ ॥

मुंध इआणी मनमुखी फिरि आवण जाणा अंङु ॥ हरि प्रभु चिति न आइओ मनि दूजा भाउ सहलंङु ॥२॥

हम मैलु भरे दुहचारीआ हरि राखहु अंगी अंङु ॥ गुरि अम्रित सरि नवलाइआ सभि लाथे किलविख पंङु ॥३॥

हरि दीना दीन दइआल प्रभु सतसंगति मेलहु संङु ॥ मिलि संगति हरि रंगु पाइआ जन नानक मनि तनि रंङु ॥४॥३॥

(राग सूही -- SGGS 732) सूही महला ४ ॥
हरि हरि करहि नित कपटु कमावहि हिरदा सुधु न होई ॥ अनदिनु करम करहि बहुतेरे सुपनै सुखु न होई ॥१॥

गिआनी गुर बिनु भगति न होई ॥ कोरै रंगु कदे न चड़ै जे लोचै सभु कोई ॥१॥ रहाउ ॥

जपु तप संजम वरत करे पूजा मनमुख रोगु न जाई ॥ अंतरि रोगु महा अभिमाना दूजै भाइ खुआई ॥२॥

बाहरि भेख बहुतु चतुराई मनूआ दह दिसि धावै ॥ हउमै बिआपिआ सबदु न चीन्है फिरि फिरि जूनी आवै ॥३॥

नानक नदरि करे सो बूझै सो जनु नामु धिआए ॥ गुर परसादी एको बूझै एकसु माहि समाए ॥४॥४॥

(राग सूही -- SGGS 732) सूही महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरमति नगरी खोजि खोजाई ॥ हरि हरि नामु पदारथु पाई ॥१॥

मेरै मनि हरि हरि सांति वसाई ॥ तिसना अगनि बुझी खिन अंतरि गुरि मिलिऐ सभ भुख गवाई ॥१॥ रहाउ ॥

हरि गुण गावा जीवा मेरी माई ॥ सतिगुरि दइआलि गुण नामु द्रिड़ाई ॥२॥

हउ हरि प्रभु पिआरा ढूढि ढूढाई ॥ सतसंगति मिलि हरि रसु पाई ॥३॥

धुरि मसतकि लेख लिखे हरि पाई ॥ गुरु नानकु तुठा मेलै हरि भाई ॥४॥१॥५॥

(राग सूही -- SGGS 732) सूही महला ४ ॥
हरि क्रिपा करे मनि हरि रंगु लाए ॥ गुरमुखि हरि हरि नामि समाए ॥१॥

हरि रंगि राता मनु रंग माणे ॥ सदा अनंदि रहै दिन राती पूरे गुर कै सबदि समाणे ॥१॥ रहाउ ॥

हरि रंग कउ लोचै सभु कोई ॥ गुरमुखि रंगु चलूला होई ॥२॥

मनमुखि मुगधु नरु कोरा होइ ॥ जे सउ लोचै रंगु न होवै कोइ ॥३॥

नदरि करे ता सतिगुरु पावै ॥ नानक हरि रसि हरि रंगि समावै ॥४॥२॥६॥

(राग सूही -- SGGS 733) सूही महला ४ ॥
जिहवा हरि रसि रही अघाइ ॥ गुरमुखि पीवै सहजि समाइ ॥१॥

हरि रसु जन चाखहु जे भाई ॥ तउ कत अनत सादि लोभाई ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमति रसु राखहु उर धारि ॥ हरि रसि राते रंगि मुरारि ॥२॥

मनमुखि हरि रसु चाखिआ न जाइ ॥ हउमै करै बहुती मिलै सजाइ ॥३॥

नदरि करे ता हरि रसु पावै ॥ नानक हरि रसि हरि गुण गावै ॥४॥३॥७॥

(राग सूही -- SGGS 733) सूही महला ४ घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नीच जाति हरि जपतिआ उतम पदवी पाइ ॥ पूछहु बिदर दासी सुतै किसनु उतरिआ घरि जिसु जाइ ॥१॥

हरि की अकथ कथा सुनहु जन भाई जितु सहसा दूख भूख सभ लहि जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

रविदासु चमारु उसतति करे हरि कीरति निमख इक गाइ ॥ पतित जाति उतमु भइआ चारि वरन पए पगि आइ ॥२॥

नामदेअ प्रीति लगी हरि सेती लोकु छीपा कहै बुलाइ ॥ खत्री ब्राहमण पिठि दे छोडे हरि नामदेउ लीआ मुखि लाइ ॥३॥

जितने भगत हरि सेवका मुखि अठसठि तीरथ तिन तिलकु कढाइ ॥ जनु नानकु तिन कउ अनदिनु परसे जे क्रिपा करे हरि राइ ॥४॥१॥८॥

(राग सूही -- SGGS 733) सूही महला ४ ॥
तिन्ही अंतरि हरि आराधिआ जिन कउ धुरि लिखिआ लिखतु लिलारा ॥ तिन की बखीली कोई किआ करे जिन का अंगु करे मेरा हरि करतारा ॥१॥

हरि हरि धिआइ मन मेरे मन धिआइ हरि जनम जनम के सभि दूख निवारणहारा ॥१॥ रहाउ ॥

धुरि भगत जना कउ बखसिआ हरि अम्रित भगति भंडारा ॥ मूरखु होवै सु उन की रीस करे तिसु हलति पलति मुहु कारा ॥२॥

से भगत से सेवका जिना हरि नामु पिआरा ॥ तिन की सेवा ते हरि पाईऐ सिरि निंदक कै पवै छारा ॥३॥

जिसु घरि विरती सोई जाणै जगत गुर नानक पूछि करहु बीचारा ॥ चहु पीड़ी आदि जुगादि बखीली किनै न पाइओ हरि सेवक भाइ निसतारा ॥४॥२॥९॥

(राग सूही -- SGGS 733) सूही महला ४ ॥
जिथै हरि आराधीऐ तिथै हरि मितु सहाई ॥ गुर किरपा ते हरि मनि वसै होरतु बिधि लइआ न जाई ॥१॥

हरि धनु संचीऐ भाई ॥ जि हलति पलति हरि होइ सखाई ॥१॥ रहाउ ॥

सतसंगती संगि हरि धनु खटीऐ होर थै होरतु उपाइ हरि धनु कितै न पाई ॥ हरि रतनै का वापारीआ हरि रतन धनु विहाझे कचै के वापारीए वाकि हरि धनु लइआ न जाई ॥२॥

हरि धनु रतनु जवेहरु माणकु हरि धनै नालि अम्रित वेलै वतै हरि भगती हरि लिव लाई ॥ हरि धनु अम्रित वेलै वतै का बीजिआ भगत खाइ खरचि रहे निखुटै नाही ॥ हलति पलति हरि धनै की भगता कउ मिली वडिआई ॥३॥

हरि धनु निरभउ सदा सदा असथिरु है साचा इहु हरि धनु अगनी तसकरै पाणीऐ जमदूतै किसै का गवाइआ न जाई ॥ हरि धन कउ उचका नेड़ि न आवई जमु जागाती डंडु न लगाई ॥४॥

साकती पाप करि कै बिखिआ धनु संचिआ तिना इक विख नालि न जाई ॥ हलतै विचि साकत दुहेले भए हथहु छुड़कि गइआ अगै पलति साकतु हरि दरगह ढोई न पाई ॥५॥

इसु हरि धन का साहु हरि आपि है संतहु जिस नो देइ सु हरि धनु लदि चलाई ॥ इसु हरि धनै का तोटा कदे न आवई जन नानक कउ गुरि सोझी पाई ॥६॥३॥१०॥

(राग सूही -- SGGS 734) सूही महला ४ ॥
जिस नो हरि सुप्रसंनु होइ सो हरि गुणा रवै सो भगतु सो परवानु ॥ तिस की महिमा किआ वरनीऐ जिस कै हिरदै वसिआ हरि पुरखु भगवानु ॥१॥

गोविंद गुण गाईऐ जीउ लाइ सतिगुरू नालि धिआनु ॥१॥ रहाउ ॥

सो सतिगुरू सा सेवा सतिगुर की सफल है जिस ते पाईऐ परम निधानु ॥ जो दूजै भाइ साकत कामना अरथि दुरगंध सरेवदे सो निहफल सभु अगिआनु ॥२॥

जिस नो परतीति होवै तिस का गाविआ थाइ पवै सो पावै दरगह मानु ॥ जो बिनु परतीती कपटी कूड़ी कूड़ी अखी मीटदे उन का उतरि जाइगा झूठु गुमानु ॥३॥

जेता जीउ पिंडु सभु तेरा तूं अंतरजामी पुरखु भगवानु ॥ दासनि दासु कहै जनु नानकु जेहा तूं कराइहि तेहा हउ करी वखिआनु ॥४॥४॥११॥

(राग सूही -- SGGS 735) सूही महला ४ घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥ तुमरी महिमा बरनि न साकउ तूं ठाकुर ऊच भगवाना ॥१॥

मै हरि हरि नामु धर सोई ॥ जिउ भावै तिउ राखु मेरे साहिब मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥१॥ रहाउ ॥

मै ताणु दीबाणु तूहै मेरे सुआमी मै तुधु आगै अरदासि ॥ मै होरु थाउ नाही जिसु पहि करउ बेनंती मेरा दुखु सुखु तुझ ही पासि ॥२॥

विचे धरती विचे पाणी विचि कासट अगनि धरीजै ॥ बकरी सिंघु इकतै थाइ राखे मन हरि जपि भ्रमु भउ दूरि कीजै ॥३॥

हरि की वडिआई देखहु संतहु हरि निमाणिआ माणु देवाए ॥ जिउ धरती चरण तले ते ऊपरि आवै तिउ नानक साध जना जगतु आणि सभु पैरी पाए ॥४॥१॥१२॥

(राग सूही -- SGGS 735) सूही महला ४ ॥
तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥ बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै जेहा को करे तेहा को पाईऐ ॥१॥

मेरे साहिब तूं अंतर की बिधि जाणहि ॥ बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै तुधु भावै तिवै बुलावहि ॥१॥ रहाउ ॥

सभु मोहु माइआ सरीरु हरि कीआ विचि देही मानुख भगति कराई ॥ इकना सतिगुरु मेलि सुखु देवहि इकि मनमुखि धंधु पिटाई ॥२॥

सभु को तेरा तूं सभना का मेरे करते तुधु सभना सिरि लिखिआ लेखु ॥ जेही तूं नदरि करहि तेहा को होवै बिनु नदरी नाही को भेखु ॥३॥

तेरी वडिआई तूंहै जाणहि सभ तुधनो नित धिआए ॥ जिस नो तुधु भावै तिस नो तूं मेलहि जन नानक सो थाइ पाए ॥४॥२॥१३॥

(राग सूही -- SGGS 735) सूही महला ४ ॥
जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥ ते मुकत भए जिन हरि नामु धिआइआ तिन पवितु परम पदु पाए ॥१॥

मेरे राम हरि जन आरोग भए ॥ गुर बचनी जिना जपिआ मेरा हरि हरि तिन के हउमै रोग गए ॥१॥ रहाउ ॥

ब्रहमा बिसनु महादेउ त्रै गुण रोगी विचि हउमै कार कमाई ॥ जिनि कीए तिसहि न चेतहि बपुड़े हरि गुरमुखि सोझी पाई ॥२॥

हउमै रोगि सभु जगतु बिआपिआ तिन कउ जनम मरण दुखु भारी ॥ गुर परसादी को विरला छूटै तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥३॥

जिनि सिसटि साजी सोई हरि जाणै ता का रूपु अपारो ॥ नानक आपे वेखि हरि बिगसै गुरमुखि ब्रहम बीचारो ॥४॥३॥१४॥

(राग सूही -- SGGS 736) सूही महला ४ ॥
कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥ आपणा कीता किछू न होवै जिउ हरि भावै तिउ रखीऐ ॥१॥

मेरे हरि जीउ सभु को तेरै वसि ॥ असा जोरु नाही जे किछु करि हम साकह जिउ भावै तिवै बखसि ॥१॥ रहाउ ॥

सभु जीउ पिंडु दीआ तुधु आपे तुधु आपे कारै लाइआ ॥ जेहा तूं हुकमु करहि तेहे को करम कमावै जेहा तुधु धुरि लिखि पाइआ ॥२॥

पंच ततु करि तुधु स्रिसटि सभ साजी कोई छेवा करिउ जे किछु कीता होवै ॥ इकना सतिगुरु मेलि तूं बुझावहि इकि मनमुखि करहि सि रोवै ॥३॥

हरि की वडिआई हउ आखि न साका हउ मूरखु मुगधु नीचाणु ॥ जन नानक कउ हरि बखसि लै मेरे सुआमी सरणागति पइआ अजाणु ॥४॥४॥१५॥२४॥

(राग सूही -- SGGS 757) रागु सूही असटपदीआ महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोई आणि मिलावै मेरा प्रीतमु पिआरा हउ तिसु पहि आपु वेचाई ॥१॥

दरसनु हरि देखण कै ताई ॥ क्रिपा करहि ता सतिगुरु मेलहि हरि हरि नामु धिआई ॥१॥ रहाउ ॥

जे सुखु देहि त तुझहि अराधी दुखि भी तुझै धिआई ॥२॥

जे भुख देहि त इत ही राजा दुख विचि सूख मनाई ॥३॥

तनु मनु काटि काटि सभु अरपी विचि अगनी आपु जलाई ॥४॥

पखा फेरी पाणी ढोवा जो देवहि सो खाई ॥५॥

नानकु गरीबु ढहि पइआ दुआरै हरि मेलि लैहु वडिआई ॥६॥

अखी काढि धरी चरणा तलि सभ धरती फिरि मत पाई ॥७॥

जे पासि बहालहि ता तुझहि अराधी जे मारि कढहि भी धिआई ॥८॥

जे लोकु सलाहे ता तेरी उपमा जे निंदै त छोडि न जाई ॥९॥

जे तुधु वलि रहै ता कोई किहु आखउ तुधु विसरिऐ मरि जाई ॥१०॥

वारि वारि जाई गुर ऊपरि पै पैरी संत मनाई ॥११॥

नानकु विचारा भइआ दिवाना हरि तउ दरसन कै ताई ॥१२॥

झखड़ु झागी मीहु वरसै भी गुरु देखण जाई ॥१३॥

समुंदु सागरु होवै बहु खारा गुरसिखु लंघि गुर पहि जाई ॥१४॥

जिउ प्राणी जल बिनु है मरता तिउ सिखु गुर बिनु मरि जाई ॥१५॥

जिउ धरती सोभ करे जलु बरसै तिउ सिखु गुर मिलि बिगसाई ॥१६॥

सेवक का होइ सेवकु वरता करि करि बिनउ बुलाई ॥१७॥

नानक की बेनंती हरि पहि गुर मिलि गुर सुखु पाई ॥१८॥

तू आपे गुरु चेला है आपे गुर विचु दे तुझहि धिआई ॥१९॥

जो तुधु सेवहि सो तूहै होवहि तुधु सेवक पैज रखाई ॥२०॥

भंडार भरे भगती हरि तेरे जिसु भावै तिसु देवाई ॥२१॥

जिसु तूं देहि सोई जनु पाए होर निहफल सभ चतुराई ॥२२॥

सिमरि सिमरि सिमरि गुरु अपुना सोइआ मनु जागाई ॥२३॥

इकु दानु मंगै नानकु वेचारा हरि दासनि दासु कराई ॥२४॥

जे गुरु झिड़के त मीठा लागै जे बखसे त गुर वडिआई ॥२५॥

गुरमुखि बोलहि सो थाइ पाए मनमुखि किछु थाइ न पाई ॥२६॥

पाला ककरु वरफ वरसै गुरसिखु गुर देखण जाई ॥२७॥

सभु दिनसु रैणि देखउ गुरु अपुना विचि अखी गुर पैर धराई ॥२८॥

अनेक उपाव करी गुर कारणि गुर भावै सो थाइ पाई ॥२९॥

रैणि दिनसु गुर चरण अराधी दइआ करहु मेरे साई ॥३०॥

नानक का जीउ पिंडु गुरू है गुर मिलि त्रिपति अघाई ॥३१॥

नानक का प्रभु पूरि रहिओ है जत कत तत गोसाई ॥३२॥१॥

(राग सूही -- SGGS 758) रागु सूही महला ४ असटपदीआ घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंदरि सचा नेहु लाइआ प्रीतम आपणै ॥ तनु मनु होइ निहालु जा गुरु देखा साम्हणे ॥१॥

मै हरि हरि नामु विसाहु ॥ गुर पूरे ते पाइआ अम्रितु अगम अथाहु ॥१॥ रहाउ ॥

हउ सतिगुरु वेखि विगसीआ हरि नामे लगा पिआरु ॥ किरपा करि कै मेलिअनु पाइआ मोख दुआरु ॥२॥

सतिगुरु बिरही नाम का जे मिलै त तनु मनु देउ ॥ जे पूरबि होवै लिखिआ ता अम्रितु सहजि पीएउ ॥३॥

सुतिआ गुरु सालाहीऐ उठदिआ भी गुरु आलाउ ॥ कोई ऐसा गुरमुखि जे मिलै हउ ता के धोवा पाउ ॥४॥

कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु मै प्रीतमु देइ मिलाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ हरि पाइआ मिलिआ सहजि सुभाइ ॥५॥

सतिगुरु सागरु गुण नाम का मै तिसु देखण का चाउ ॥ हउ तिसु बिनु घड़ी न जीवऊ बिनु देखे मरि जाउ ॥६॥

जिउ मछुली विणु पाणीऐ रहै न कितै उपाइ ॥ तिउ हरि बिनु संतु न जीवई बिनु हरि नामै मरि जाइ ॥७॥

मै सतिगुर सेती पिरहड़ी किउ गुर बिनु जीवा माउ ॥ मै गुरबाणी आधारु है गुरबाणी लागि रहाउ ॥८॥

हरि हरि नामु रतंनु है गुरु तुठा देवै माइ ॥ मै धर सचे नाम की हरि नामि रहा लिव लाइ ॥९॥

गुर गिआनु पदारथु नामु है हरि नामो देइ द्रिड़ाइ ॥ जिसु परापति सो लहै गुर चरणी लागै आइ ॥१०॥

अकथ कहाणी प्रेम की को प्रीतमु आखै आइ ॥ तिसु देवा मनु आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥११॥

सजणु मेरा एकु तूं करता पुरखु सुजाणु ॥ सतिगुरि मीति मिलाइआ मै सदा सदा तेरा ताणु ॥१२॥

सतिगुरु मेरा सदा सदा ना आवै ना जाइ ॥ ओहु अबिनासी पुरखु है सभ महि रहिआ समाइ ॥१३॥

राम नाम धनु संचिआ साबतु पूंजी रासि ॥ नानक दरगह मंनिआ गुर पूरे साबासि ॥१४॥१॥२॥११॥

(राग सूही -- SGGS 773) रागु सूही महला ४ छंत घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुरु पुरखु मिलाइ अवगण विकणा गुण रवा बलि राम जीउ ॥ हरि हरि नामु धिआइ गुरबाणी नित नित चवा बलि राम जीउ ॥ गुरबाणी सद मीठी लागी पाप विकार गवाइआ ॥ हउमै रोगु गइआ भउ भागा सहजे सहजि मिलाइआ ॥ काइआ सेज गुर सबदि सुखाली गिआन तति करि भोगो ॥ अनदिनु सुखि माणे नित रलीआ नानक धुरि संजोगो ॥१॥

सतु संतोखु करि भाउ कुड़मु कुड़माई आइआ बलि राम जीउ ॥ संत जना करि मेलु गुरबाणी गावाईआ बलि राम जीउ ॥ बाणी गुर गाई परम गति पाई पंच मिले सोहाइआ ॥ गइआ करोधु ममता तनि नाठी पाखंडु भरमु गवाइआ ॥ हउमै पीर गई सुखु पाइआ आरोगत भए सरीरा ॥ गुर परसादी ब्रहमु पछाता नानक गुणी गहीरा ॥२॥

मनमुखि विछुड़ी दूरि महलु न पाए बलि गई बलि राम जीउ ॥ अंतरि ममता कूरि कूड़ु विहाझे कूड़ि लई बलि राम जीउ ॥ कूड़ु कपटु कमावै महा दुखु पावै विणु सतिगुर मगु न पाइआ ॥ उझड़ पंथि भ्रमै गावारी खिनु खिनु धके खाइआ ॥ आपे दइआ करे प्रभु दाता सतिगुरु पुरखु मिलाए ॥ जनम जनम के विछुड़े जन मेले नानक सहजि सुभाए ॥३॥

आइआ लगनु गणाइ हिरदै धन ओमाहीआ बलि राम जीउ ॥ पंडित पाधे आणि पती बहि वाचाईआ बलि राम जीउ ॥ पती वाचाई मनि वजी वधाई जब साजन सुणे घरि आए ॥ गुणी गिआनी बहि मता पकाइआ फेरे ततु दिवाए ॥ वरु पाइआ पुरखु अगमु अगोचरु सद नवतनु बाल सखाई ॥ नानक किरपा करि कै मेले विछुड़ि कदे न जाई ॥४॥१॥

(राग सूही -- SGGS 773) सूही महला ४ ॥
हरि पहिलड़ी लाव परविरती करम द्रिड़ाइआ बलि राम जीउ ॥ बाणी ब्रहमा वेदु धरमु द्रिड़हु पाप तजाइआ बलि राम जीउ ॥ धरमु द्रिड़हु हरि नामु धिआवहु सिम्रिति नामु द्रिड़ाइआ ॥ सतिगुरु गुरु पूरा आराधहु सभि किलविख पाप गवाइआ ॥ सहज अनंदु होआ वडभागी मनि हरि हरि मीठा लाइआ ॥ जनु कहै नानकु लाव पहिली आर्मभु काजु रचाइआ ॥१॥

हरि दूजड़ी लाव सतिगुरु पुरखु मिलाइआ बलि राम जीउ ॥ निरभउ भै मनु होइ हउमै मैलु गवाइआ बलि राम जीउ ॥ निरमलु भउ पाइआ हरि गुण गाइआ हरि वेखै रामु हदूरे ॥ हरि आतम रामु पसारिआ सुआमी सरब रहिआ भरपूरे ॥ अंतरि बाहरि हरि प्रभु एको मिलि हरि जन मंगल गाए ॥ जन नानक दूजी लाव चलाई अनहद सबद वजाए ॥२॥

हरि तीजड़ी लाव मनि चाउ भइआ बैरागीआ बलि राम जीउ ॥ संत जना हरि मेलु हरि पाइआ वडभागीआ बलि राम जीउ ॥ निरमलु हरि पाइआ हरि गुण गाइआ मुखि बोली हरि बाणी ॥ संत जना वडभागी पाइआ हरि कथीऐ अकथ कहाणी ॥ हिरदै हरि हरि हरि धुनि उपजी हरि जपीऐ मसतकि भागु जीउ ॥ जनु नानकु बोले तीजी लावै हरि उपजै मनि बैरागु जीउ ॥३॥

हरि चउथड़ी लाव मनि सहजु भइआ हरि पाइआ बलि राम जीउ ॥ गुरमुखि मिलिआ सुभाइ हरि मनि तनि मीठा लाइआ बलि राम जीउ ॥ हरि मीठा लाइआ मेरे प्रभ भाइआ अनदिनु हरि लिव लाई ॥ मन चिंदिआ फलु पाइआ सुआमी हरि नामि वजी वाधाई ॥ हरि प्रभि ठाकुरि काजु रचाइआ धन हिरदै नामि विगासी ॥ जनु नानकु बोले चउथी लावै हरि पाइआ प्रभु अविनासी ॥४॥२॥


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