Pt 16 - गुरू रामदास जी - सलोक बाणी शब्द, Part 16 - Guru Ramdas ji (Mahalla 4) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग प्रभाती -- SGGS 1335) प्रभाती महला ४ ॥
इकु खिनु हरि प्रभि किरपा धारी गुन गाए रसक रसीक ॥ गावत सुनत दोऊ भए मुकते जिना गुरमुखि खिनु हरि पीक ॥१॥

मेरै मनि हरि हरि राम नामु रसु टीक ॥ गुरमुखि नामु सीतल जलु पाइआ हरि हरि नामु पीआ रसु झीक ॥१॥ रहाउ ॥

जिन हरि हिरदै प्रीति लगानी तिना मसतकि ऊजल टीक ॥ हरि जन सोभा सभ जग ऊपरि जिउ विचि उडवा ससि कीक ॥२॥

जिन हरि हिरदै नामु न वसिओ तिन सभि कारज फीक ॥ जैसे सीगारु करै देह मानुख नाम बिना नकटे नक कीक ॥३॥

घटि घटि रमईआ रमत राम राइ सभ वरतै सभ महि ईक ॥ जन नानक कउ हरि किरपा धारी गुर बचन धिआइओ घरी मीक ॥४॥३॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1336) प्रभाती महला ४ ॥
अगम दइआल क्रिपा प्रभि धारी मुखि हरि हरि नामु हम कहे ॥ पतित पावन हरि नामु धिआइओ सभि किलबिख पाप लहे ॥१॥

जपि मन राम नामु रवि रहे ॥ दीन दइआलु दुख भंजनु गाइओ गुरमति नामु पदारथु लहे ॥१॥ रहाउ ॥

काइआ नगरि नगरि हरि बसिओ मति गुरमति हरि हरि सहे ॥ सरीरि सरोवरि नामु हरि प्रगटिओ घरि मंदरि हरि प्रभु लहे ॥२॥

जो नर भरमि भरमि उदिआने ते साकत मूड़ मुहे ॥ जिउ म्रिग नाभि बसै बासु बसना भ्रमि भ्रमिओ झार गहे ॥३॥

तुम वड अगम अगाधि बोधि प्रभ मति देवहु हरि प्रभ लहे ॥ जन नानक कउ गुरि हाथु सिरि धरिओ हरि राम नामि रवि रहे ॥४॥४॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1336) प्रभाती महला ४ ॥
मनि लागी प्रीति राम नाम हरि हरि जपिओ हरि प्रभु वडफा ॥ सतिगुर बचन सुखाने हीअरै हरि धारी हरि प्रभ क्रिपफा ॥१॥

मेरे मन भजु राम नाम हरि निमखफा ॥ हरि हरि दानु दीओ गुरि पूरै हरि नामा मनि तनि बसफा ॥१॥ रहाउ ॥

काइआ नगरि वसिओ घरि मंदरि जपि सोभा गुरमुखि करपफा ॥ हलति पलति जन भए सुहेले मुख ऊजल गुरमुखि तरफा ॥२॥

अनभउ हरि हरि हरि लिव लागी हरि उर धारिओ गुरि निमखफा ॥ कोटि कोटि के दोख सभ जन के हरि दूरि कीए इक पलफा ॥३॥

तुमरे जन तुम ही ते जाने प्रभ जानिओ जन ते मुखफा ॥ हरि हरि आपु धरिओ हरि जन महि जन नानकु हरि प्रभु इकफा ॥४॥५॥

(राग प्रभाती -- SGGS 1337) प्रभाती महला ४ ॥
गुर सतिगुरि नामु द्रिड़ाइओ हरि हरि हम मुए जीवे हरि जपिभा ॥ धनु धंनु गुरू गुरु सतिगुरु पूरा बिखु डुबदे बाह देइ कढिभा ॥१॥

जपि मन राम नामु अरधांभा ॥ उपज्मपि उपाइ न पाईऐ कतहू गुरि पूरै हरि प्रभु लाभा ॥१॥ रहाउ ॥

राम नामु रसु राम रसाइणु रसु पीआ गुरमति रसभा ॥ लोह मनूर कंचनु मिलि संगति हरि उर धारिओ गुरि हरिभा ॥२॥

हउमै बिखिआ नित लोभि लुभाने पुत कलत मोहि लुभिभा ॥ तिन पग संत न सेवे कबहू ते मनमुख भू्मभर भरभा ॥३॥

तुमरे गुन तुम ही प्रभ जानहु हम परे हारि तुम सरनभा ॥ जिउ जानहु तिउ राखहु सुआमी जन नानकु दासु तुमनभा ॥४॥६॥ छका १ ॥

(राग परभाती बिभास -- SGGS 1337) प्रभाती बिभास पड़ताल महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपि मन हरि हरि नामु निधान ॥ हरि दरगह पावहि मान ॥ जिनि जपिआ ते पारि परान ॥१॥ रहाउ ॥

सुनि मन हरि हरि नामु करि धिआनु ॥ सुनि मन हरि कीरति अठसठि मजानु ॥ सुनि मन गुरमुखि पावहि मानु ॥१॥

जपि मन परमेसुरु परधानु ॥ खिन खोवै पाप कोटान ॥ मिलु नानक हरि भगवान ॥२॥१॥७॥

(SGGS 1421) सलोक महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
वडभागीआ सोहागणी जिन्हा गुरमुखि मिलिआ हरि राइ ॥ अंतरि जोति परगासीआ नानक नामि समाइ ॥१॥

(SGGS 1421) वाहु वाहु सतिगुरु पुरखु है जिनि सचु जाता सोइ ॥ जितु मिलिऐ तिख उतरै तनु मनु सीतलु होइ ॥ वाहु वाहु सतिगुरु सति पुरखु है जिस नो समतु सभ कोइ ॥ वाहु वाहु सतिगुरु निरवैरु है जिसु निंदा उसतति तुलि होइ ॥ वाहु वाहु सतिगुरु सुजाणु है जिसु अंतरि ब्रहमु वीचारु ॥ वाहु वाहु सतिगुरु निरंकारु है जिसु अंतु न पारावारु ॥ वाहु वाहु सतिगुरू है जि सचु द्रिड़ाए सोइ ॥ नानक सतिगुर वाहु वाहु जिस ते नामु परापति होइ ॥२॥

(SGGS 1421) हरि प्रभ सचा सोहिला गुरमुखि नामु गोविंदु ॥ अनदिनु नामु सलाहणा हरि जपिआ मनि आनंदु ॥ वडभागी हरि पाइआ पूरन परमानंदु ॥ जन नानक नामु सलाहिआ बहुड़ि न मनि तनि भंगु ॥३॥

(SGGS 1421) मूं पिरीआ सउ नेहु किउ सजण मिलहि पिआरिआ ॥ हउ ढूढेदी तिन सजण सचि सवारिआ ॥ सतिगुरु मैडा मितु है जे मिलै त इहु मनु वारिआ ॥ देंदा मूं पिरु दसि हरि सजणु सिरजणहारिआ ॥ नानक हउ पिरु भाली आपणा सतिगुर नालि दिखालिआ ॥४॥

(SGGS 1421) हउ खड़ी निहाली पंधु मतु मूं सजणु आवए ॥ को आणि मिलावै अजु मै पिरु मेलि मिलावए ॥ हउ जीउ करी तिस विटउ चउ खंनीऐ जो मै पिरी दिखावए ॥ नानक हरि होइ दइआलु तां गुरु पूरा मेलावए ॥५॥

(SGGS 1422) अंतरि जोरु हउमै तनि माइआ कूड़ी आवै जाइ ॥ सतिगुर का फुरमाइआ मंनि न सकी दुतरु तरिआ न जाइ ॥ नदरि करे जिसु आपणी सो चलै सतिगुर भाइ ॥ सतिगुर का दरसनु सफलु है जो इछै सो फलु पाइ ॥ जिनी सतिगुरु मंनिआं हउ तिन के लागउ पाइ ॥ नानकु ता का दासु है जि अनदिनु रहै लिव लाइ ॥६॥

(SGGS 1422) जिना पिरी पिआरु बिनु दरसन किउ त्रिपतीऐ ॥ नानक मिले सुभाइ गुरमुखि इहु मनु रहसीऐ ॥७॥

(SGGS 1422) जिना पिरी पिआरु किउ जीवनि पिर बाहरे ॥ जां सहु देखनि आपणा नानक थीवनि भी हरे ॥८॥

(SGGS 1422) जिना गुरमुखि अंदरि नेहु तै प्रीतम सचै लाइआ ॥ राती अतै डेहु नानक प्रेमि समाइआ ॥९॥

(SGGS 1422) गुरमुखि सची आसकी जितु प्रीतमु सचा पाईऐ ॥ अनदिनु रहहि अनंदि नानक सहजि समाईऐ ॥१०॥

(SGGS 1422) सचा प्रेम पिआरु गुर पूरे ते पाईऐ ॥ कबहू न होवै भंगु नानक हरि गुण गाईऐ ॥११॥

(SGGS 1422) जिन्हा अंदरि सचा नेहु किउ जीवन्हि पिरी विहूणिआ ॥ गुरमुखि मेले आपि नानक चिरी विछुंनिआ ॥१२॥

(SGGS 1422) जिन कउ प्रेम पिआरु तउ आपे लाइआ करमु करि ॥ नानक लेहु मिलाइ मै जाचिक दीजै नामु हरि ॥१३॥

(SGGS 1422) गुरमुखि हसै गुरमुखि रोवै ॥ जि गुरमुखि करे साई भगति होवै ॥ गुरमुखि होवै सु करे वीचारु ॥ गुरमुखि नानक पावै पारु ॥१४॥

(SGGS 1422) जिना अंदरि नामु निधानु है गुरबाणी वीचारि ॥ तिन के मुख सद उजले तितु सचै दरबारि ॥ तिन बहदिआ उठदिआ कदे न विसरै जि आपि बखसे करतारि ॥ नानक गुरमुखि मिले न विछुड़हि जि मेले सिरजणहारि ॥१५॥

(SGGS 1422) गुर पीरां की चाकरी महां करड़ी सुख सारु ॥ नदरि करे जिसु आपणी तिसु लाए हेत पिआरु ॥ सतिगुर की सेवै लगिआ भउजलु तरै संसारु ॥ मन चिंदिआ फलु पाइसी अंतरि बिबेक बीचारु ॥ नानक सतिगुरि मिलिऐ प्रभु पाईऐ सभु दूख निवारणहारु ॥१६॥

(SGGS 1422) मनमुख सेवा जो करे दूजै भाइ चितु लाइ ॥ पुतु कलतु कुट्मबु है माइआ मोहु वधाइ ॥ दरगहि लेखा मंगीऐ कोई अंति न सकी छडाइ ॥ बिनु नावै सभु दुखु है दुखदाई मोह माइ ॥ नानक गुरमुखि नदरी आइआ मोह माइआ विछुड़ि सभ जाइ ॥१७॥

(SGGS 1423) गुरमुखि हुकमु मंने सह केरा हुकमे ही सुखु पाए ॥ हुकमो सेवे हुकमु अराधे हुकमे समै समाए ॥ हुकमु वरतु नेमु सुच संजमु मन चिंदिआ फलु पाए ॥ सदा सुहागणि जि हुकमै बुझै सतिगुरु सेवै लिव लाए ॥ नानक क्रिपा करे जिन ऊपरि तिना हुकमे लए मिलाए ॥१८॥

(SGGS 1423) मनमुखि हुकमु न बुझे बपुड़ी नित हउमै करम कमाइ ॥ वरत नेमु सुच संजमु पूजा पाखंडि भरमु न जाइ ॥ अंतरहु कुसुधु माइआ मोहि बेधे जिउ हसती छारु उडाए ॥ जिनि उपाए तिसै न चेतहि बिनु चेते किउ सुखु पाए ॥ नानक परपंचु कीआ धुरि करतै पूरबि लिखिआ कमाए ॥१९॥

(SGGS 1423) गुरमुखि परतीति भई मनु मानिआ अनदिनु सेवा करत समाइ ॥ अंतरि सतिगुरु गुरू सभ पूजे सतिगुर का दरसु देखै सभ आइ ॥ मंनीऐ सतिगुर परम बीचारी जितु मिलिऐ तिसना भुख सभ जाइ ॥ हउ सदा सदा बलिहारी गुर अपुने जो प्रभु सचा देइ मिलाइ ॥ नानक करमु पाइआ तिन सचा जो गुर चरणी लगे आइ ॥२०॥

(SGGS 1423) जिन पिरीआ सउ नेहु से सजण मै नालि ॥ अंतरि बाहरि हउ फिरां भी हिरदै रखा समालि ॥२१॥

(SGGS 1423) जिना इक मनि इक चिति धिआइआ सतिगुर सउ चितु लाइ ॥ तिन की दुख भुख हउमै वडा रोगु गइआ निरदोख भए लिव लाइ ॥ गुण गावहि गुण उचरहि गुण महि सवै समाइ ॥ नानक गुर पूरे ते पाइआ सहजि मिलिआ प्रभु आइ ॥२२॥

(SGGS 1423) मनमुखि माइआ मोहु है नामि न लगै पिआरु ॥ कूड़ु कमावै कूड़ु संघरै कूड़ि करै आहारु ॥ बिखु माइआ धनु संचि मरहि अंति होइ सभु छारु ॥ करम धरम सुचि संजमु करहि अंतरि लोभु विकार ॥ नानक मनमुखि जि कमावै सु थाइ न पवै दरगह होइ खुआरु ॥२३॥

(SGGS 1423) सभना रागां विचि सो भला भाई जितु वसिआ मनि आइ ॥ रागु नादु सभु सचु है कीमति कही न जाइ ॥ रागै नादै बाहरा इनी हुकमु न बूझिआ जाइ ॥ नानक हुकमै बूझै तिना रासि होइ सतिगुर ते सोझी पाइ ॥ सभु किछु तिस ते होइआ जिउ तिसै दी रजाइ ॥२४॥

सतिगुर विचि अम्रित नामु है अम्रितु कहै कहाइ ॥ गुरमती नामु निरमलो निरमल नामु धिआइ ॥ अम्रित बाणी ततु है गुरमुखि वसै मनि आइ ॥ हिरदै कमलु परगासिआ जोती जोति मिलाइ ॥ नानक सतिगुरु तिन कउ मेलिओनु जिन धुरि मसतकि भागु लिखाइ ॥२५॥

(SGGS 1424) अंदरि तिसना अगि है मनमुख भुख न जाइ ॥ मोहु कुट्मबु सभु कूड़ु है कूड़ि रहिआ लपटाइ ॥ अनदिनु चिंता चिंतवै चिंता बधा जाइ ॥ जमणु मरणु न चुकई हउमै करम कमाइ ॥ गुर सरणाई उबरै नानक लए छडाइ ॥२६॥

(SGGS 1424) सतिगुर पुरखु हरि धिआइदा सतसंगति सतिगुर भाइ ॥ सतसंगति सतिगुर सेवदे हरि मेले गुरु मेलाइ ॥ एहु भउजलु जगतु संसारु है गुरु बोहिथु नामि तराइ ॥ गुरसिखी भाणा मंनिआ गुरु पूरा पारि लंघाइ ॥ गुरसिखां की हरि धूड़ि देहि हम पापी भी गति पांहि ॥ धुरि मसतकि हरि प्रभ लिखिआ गुर नानक मिलिआ आइ ॥ जमकंकर मारि बिदारिअनु हरि दरगह लए छडाइ ॥ गुरसिखा नो साबासि है हरि तुठा मेलि मिलाइ ॥२७॥

(SGGS 1424) गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ जिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥ राम नामु हरि कीरति गाइ करि चानणु मगु देखाइआ ॥ हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥ गुरमती जमु जोहि न सकै सचै नाइ समाइआ ॥ सभु आपे आपि वरतै करता जो भावै सो नाइ लाइआ ॥ जन नानकु नाउ लए तां जीवै बिनु नावै खिनु मरि जाइआ ॥२८॥

(SGGS 1424) मन अंतरि हउमै रोगु भ्रमि भूले हउमै साकत दुरजना ॥ नानक रोगु गवाइ मिलि सतिगुर साधू सजणा ॥२९॥

(SGGS 1424) गुरमती हरि हरि बोले ॥ हरि प्रेमि कसाई दिनसु राति हरि रती हरि रंगि चोले ॥ हरि जैसा पुरखु न लभई सभु देखिआ जगतु मै टोले ॥ गुर सतिगुरि नामु दिड़ाइआ मनु अनत न काहू डोले ॥ जन नानकु हरि का दासु है गुर सतिगुर के गुल गोले ॥३०॥


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