Pt 12 - गुरू रामदास जी - सलोक बाणी शब्द, Part 12 - Guru Ramdas ji (Mahalla 4) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग माली गउड़ा -- SGGS 985) माली गउड़ा महला ४ ॥
मेरे मन भजु हरि हरि नामु गुपाला ॥ मेरा मनु तनु लीनु भइआ राम नामै मति गुरमति राम रसाला ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमति नामु धिआईऐ हरि हरि मनि जपीऐ हरि जपमाला ॥ जिन्ह कै मसतकि लीखिआ हरि मिलिआ हरि बनमाला ॥१॥

जिन्ह हरि नामु धिआइआ तिन्ह चूके सरब जंजाला ॥ तिन्ह जमु नेड़ि न आवई गुरि राखे हरि रखवाला ॥२॥

हम बारिक किछू न जाणहू हरि मात पिता प्रतिपाला ॥ करु माइआ अगनि नित मेलते गुरि राखे दीन दइआला ॥३॥

बहु मैले निरमल होइआ सभ किलबिख हरि जसि जाला ॥ मनि अनदु भइआ गुरु पाइआ जन नानक सबदि निहाला ॥४॥५॥

(राग माली गउड़ा -- SGGS 985) माली गउड़ा महला ४ ॥
मेरे मन हरि भजु सभ किलबिख काट ॥ हरि हरि उर धारिओ गुरि पूरै मेरा सीसु कीजै गुर वाट ॥१॥ रहाउ ॥

मेरे हरि प्रभ की मै बात सुनावै तिसु मनु देवउ कटि काट ॥ हरि साजनु मेलिओ गुरि पूरै गुर बचनि बिकानो हटि हाट ॥१॥

मकर प्रागि दानु बहु कीआ सरीरु दीओ अध काटि ॥ बिनु हरि नाम को मुकति न पावै बहु कंचनु दीजै कटि काट ॥२॥

हरि कीरति गुरमति जसु गाइओ मनि उघरे कपट कपाट ॥ त्रिकुटी फोरि भरमु भउ भागा लज भानी मटुकी माट ॥३॥

कलजुगि गुरु पूरा तिन पाइआ जिन धुरि मसतकि लिखे लिलाट ॥ जन नानक रसु अम्रितु पीआ सभ लाथी भूख तिखाट ॥४॥६॥ छका १ ॥

(राग मारू -- SGGS 995) मारू महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जपिओ नामु सुक जनक गुर बचनी हरि हरि सरणि परे ॥ दालदु भंजि सुदामे मिलिओ भगती भाइ तरे ॥ भगति वछलु हरि नामु क्रितारथु गुरमुखि क्रिपा करे ॥१॥

मेरे मन नामु जपत उधरे ॥ ध्रू प्रहिलादु बिदरु दासी सुतु गुरमुखि नामि तरे ॥१॥ रहाउ ॥

कलजुगि नामु प्रधानु पदारथु भगत जना उधरे ॥ नामा जैदेउ कबीरु त्रिलोचनु सभि दोख गए चमरे ॥ गुरमुखि नामि लगे से उधरे सभि किलबिख पाप टरे ॥२॥

जो जो नामु जपै अपराधी सभि तिन के दोख परहरे ॥ बेसुआ रवत अजामलु उधरिओ मुखि बोलै नाराइणु नरहरे ॥ नामु जपत उग्रसैणि गति पाई तोड़ि बंधन मुकति करे ॥३॥

जन कउ आपि अनुग्रहु कीआ हरि अंगीकारु करे ॥ सेवक पैज रखै मेरा गोविदु सरणि परे उधरे ॥ जन नानक हरि किरपा धारी उर धरिओ नामु हरे ॥४॥१॥

(राग मारू -- SGGS 995) मारू महला ४ ॥
सिध समाधि जपिओ लिव लाई साधिक मुनि जपिआ ॥ जती सती संतोखी धिआइआ मुखि इंद्रादिक रविआ ॥ सरणि परे जपिओ ते भाए गुरमुखि पारि पइआ ॥१॥

मेरे मन नामु जपत तरिआ ॥ धंना जटु बालमीकु बटवारा गुरमुखि पारि पइआ ॥१॥ रहाउ ॥

सुरि नर गण गंधरबे जपिओ रिखि बपुरै हरि गाइआ ॥ संकरि ब्रहमै देवी जपिओ मुखि हरि हरि नामु जपिआ ॥ हरि हरि नामि जिना मनु भीना ते गुरमुखि पारि पइआ ॥२॥

कोटि कोटि तेतीस धिआइओ हरि जपतिआ अंतु न पाइआ ॥ बेद पुराण सिम्रिति हरि जपिआ मुखि पंडित हरि गाइआ ॥ नामु रसालु जिना मनि वसिआ ते गुरमुखि पारि पइआ ॥३॥

अनत तरंगी नामु जिन जपिआ मै गणत न करि सकिआ ॥ गोबिदु क्रिपा करे थाइ पाए जो हरि प्रभ मनि भाइआ ॥ गुरि धारि क्रिपा हरि नामु द्रिड़ाइओ जन नानक नामु लइआ ॥४॥२॥

(राग मारू -- SGGS 996) मारू महला ४ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि नामु निधानु लै गुरमति हरि पति पाइ ॥ हलति पलति नालि चलदा हरि अंते लए छडाइ ॥ जिथै अवघट गलीआ भीड़ीआ तिथै हरि हरि मुकति कराइ ॥१॥

मेरे सतिगुरा मै हरि हरि नामु द्रिड़ाइ ॥ मेरा मात पिता सुत बंधपो मै हरि बिनु अवरु न माइ ॥१॥ रहाउ ॥

मै हरि बिरही हरि नामु है कोई आणि मिलावै माइ ॥ तिसु आगै मै जोदड़ी मेरा प्रीतमु देइ मिलाइ ॥ सतिगुरु पुरखु दइआल प्रभु हरि मेले ढिल न पाइ ॥२॥

जिन हरि हरि नामु न चेतिओ से भागहीण मरि जाइ ॥ ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि मरि जमहि आवै जाइ ॥ ओइ जम दरि बधे मारीअहि हरि दरगह मिलै सजाइ ॥३॥

तू प्रभु हम सरणागती मो कउ मेलि लैहु हरि राइ ॥ हरि धारि क्रिपा जगजीवना गुर सतिगुर की सरणाइ ॥ हरि जीउ आपि दइआलु होइ जन नानक हरि मेलाइ ॥४॥१॥३॥

(राग मारू -- SGGS 996) मारू महला ४ ॥
हउ पूंजी नामु दसाइदा को दसे हरि धनु रासि ॥ हउ तिसु विटहु खन खंनीऐ मै मेले हरि प्रभ पासि ॥ मै अंतरि प्रेमु पिरम का किउ सजणु मिलै मिलासि ॥१॥

मन पिआरिआ मित्रा मै हरि हरि नामु धनु रासि ॥ गुरि पूरै नामु द्रिड़ाइआ हरि धीरक हरि साबासि ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि आपि मिलाइ गुरु मै दसे हरि धनु रासि ॥ बिनु गुर प्रेमु न लभई जन वेखहु मनि निरजासि ॥ हरि गुर विचि आपु रखिआ हरि मेले गुर साबासि ॥२॥

सागर भगति भंडार हरि पूरे सतिगुर पासि ॥ सतिगुरु तुठा खोलि देइ मुखि गुरमुखि हरि परगासि ॥ मनमुखि भाग विहूणिआ तिख मुईआ कंधी पासि ॥३॥

गुरु दाता दातारु है हउ मागउ दानु गुर पासि ॥ चिरी विछुंना मेलि प्रभ मै मनि तनि वडड़ी आस ॥ गुर भावै सुणि बेनती जन नानक की अरदासि ॥४॥२॥४॥

(राग मारू -- SGGS 996) मारू महला ४ ॥
हरि हरि कथा सुणाइ प्रभ गुरमति हरि रिदै समाणी ॥ जपि हरि हरि कथा वडभागीआ हरि उतम पदु निरबाणी ॥ गुरमुखा मनि परतीति है गुरि पूरै नामि समाणी ॥१॥

मन मेरे मै हरि हरि कथा मनि भाणी ॥ हरि हरि कथा नित सदा करि गुरमुखि अकथ कहाणी ॥१॥ रहाउ ॥

मै मनु तनु खोजि ढंढोलिआ किउ पाईऐ अकथ कहाणी ॥ संत जना मिलि पाइआ सुणि अकथ कथा मनि भाणी ॥ मेरै मनि तनि नामु अधारु हरि मै मेले पुरखु सुजाणी ॥२॥

गुर पुरखै पुरखु मिलाइ प्रभ मिलि सुरती सुरति समाणी ॥ वडभागी गुरु सेविआ हरि पाइआ सुघड़ सुजाणी ॥ मनमुख भाग विहूणिआ तिन दुखी रैणि विहाणी ॥३॥

हम जाचिक दीन प्रभ तेरिआ मुखि दीजै अम्रित बाणी ॥ सतिगुरु मेरा मित्रु प्रभ हरि मेलहु सुघड़ सुजाणी ॥ जन नानक सरणागती करि किरपा नामि समाणी ॥४॥३॥५॥

(राग मारू -- SGGS 997) मारू महला ४ ॥
हरि भाउ लगा बैरागीआ वडभागी हरि मनि राखु ॥ मिलि संगति सरधा ऊपजै गुर सबदी हरि रसु चाखु ॥ सभु मनु तनु हरिआ होइआ गुरबाणी हरि गुण भाखु ॥१॥

मन पिआरिआ मित्रा हरि हरि नाम रसु चाखु ॥ गुरि पूरै हरि पाइआ हलति पलति पति राखु ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि नामु धिआईऐ हरि कीरति गुरमुखि चाखु ॥ तनु धरती हरि बीजीऐ विचि संगति हरि प्रभ राखु ॥ अम्रितु हरि हरि नामु है गुरि पूरै हरि रसु चाखु ॥२॥

मनमुख त्रिसना भरि रहे मनि आसा दह दिस बहु लाखु ॥ बिनु नावै ध्रिगु जीवदे विचि बिसटा मनमुख राखु ॥ ओइ आवहि जाहि भवाईअहि बहु जोनी दुरगंध भाखु ॥३॥

त्राहि त्राहि सरणागती हरि दइआ धारि प्रभ राखु ॥ संतसंगति मेलापु करि हरि नामु मिलै पति साखु ॥ हरि हरि नामु धनु पाइआ जन नानक गुरमति भाखु ॥४॥४॥६॥

(राग मारू -- SGGS 997) मारू महला ४ घरु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि भगति भरे भंडारा ॥ गुरमुखि रामु करे निसतारा ॥ जिस नो क्रिपा करे मेरा सुआमी सो हरि के गुण गावै जीउ ॥१॥

हरि हरि क्रिपा करे बनवाली ॥ हरि हिरदै सदा सदा समाली ॥ हरि हरि नामु जपहु मेरे जीअड़े जपि हरि हरि नामु छडावै जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

सुख सागरु अम्रितु हरि नाउ ॥ मंगत जनु जाचै हरि देहु पसाउ ॥ हरि सति सति सदा हरि सति हरि सति मेरै मनि भावै जीउ ॥२॥

नवे छिद्र स्रवहि अपवित्रा ॥ बोलि हरि नाम पवित्र सभि किता ॥ जे हरि सुप्रसंनु होवै मेरा सुआमी हरि सिमरत मलु लहि जावै जीउ ॥३॥

माइआ मोहु बिखमु है भारी ॥ किउ तरीऐ दुतरु संसारी ॥ सतिगुरु बोहिथु देइ प्रभु साचा जपि हरि हरि पारि लंघावै जीउ ॥४॥

तू सरबत्र तेरा सभु कोई ॥ जो तू करहि सोई प्रभ होई ॥ जनु नानकु गुण गावै बेचारा हरि भावै हरि थाइ पावै जीउ ॥५॥१॥७॥

(राग मारू -- SGGS 998) मारू महला ४ ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे ॥ सभि किलविख काटै हरि तेरे ॥ हरि धनु राखहु हरि धनु संचहु हरि चलदिआ नालि सखाई जीउ ॥१॥

जिस नो क्रिपा करे सो धिआवै ॥ नित हरि जपु जापै जपि हरि सुखु पावै ॥ गुर परसादी हरि रसु आवै जपि हरि हरि पारि लंघाई जीउ ॥१॥ रहाउ ॥

निरभउ निरंकारु सति नामु ॥ जग महि स्रेसटु ऊतम कामु ॥ दुसमन दूत जमकालु ठेह मारउ हरि सेवक नेड़ि न जाई जीउ ॥२॥

जिसु उपरि हरि का मनु मानिआ ॥ सो सेवकु चहु जुग चहु कुंट जानिआ ॥ जे उस का बुरा कहै कोई पापी तिसु जमकंकरु खाई जीउ ॥३॥

सभ महि एकु निरंजन करता ॥ सभि करि करि वेखै अपणे चलता ॥ जिसु हरि राखै तिसु कउणु मारै जिसु करता आपि छडाई जीउ ॥४॥

हउ अनदिनु नामु लई करतारे ॥ जिनि सेवक भगत सभे निसतारे ॥ दस अठ चारि वेद सभि पूछहु जन नानक नामु छडाई जीउ ॥५॥२॥८॥

(राग मारू -- SGGS 1069) मारू सोलहे महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सचा आपि सवारणहारा ॥ अवर न सूझसि बीजी कारा ॥ गुरमुखि सचु वसै घट अंतरि सहजे सचि समाई हे ॥१॥

सभना सचु वसै मन माही ॥ गुर परसादी सहजि समाही ॥ गुरु गुरु करत सदा सुखु पाइआ गुर चरणी चितु लाई हे ॥२॥

सतिगुरु है गिआनु सतिगुरु है पूजा ॥ सतिगुरु सेवी अवरु न दूजा ॥ सतिगुर ते नामु रतन धनु पाइआ सतिगुर की सेवा भाई हे ॥३॥

बिनु सतिगुर जो दूजै लागे ॥ आवहि जाहि भ्रमि मरहि अभागे ॥ नानक तिन की फिरि गति होवै जि गुरमुखि रहहि सरणाई हे ॥४॥

गुरमुखि प्रीति सदा है साची ॥ सतिगुर ते मागउ नामु अजाची ॥ होहु दइआलु क्रिपा करि हरि जीउ रखि लेवहु गुर सरणाई हे ॥५॥

अम्रित रसु सतिगुरू चुआइआ ॥ दसवै दुआरि प्रगटु होइ आइआ ॥ तह अनहद सबद वजहि धुनि बाणी सहजे सहजि समाई हे ॥६॥

जिन कउ करतै धुरि लिखि पाई ॥ अनदिनु गुरु गुरु करत विहाई ॥ बिनु सतिगुर को सीझै नाही गुर चरणी चितु लाई हे ॥७॥

जिसु भावै तिसु आपे देइ ॥ गुरमुखि नामु पदारथु लेइ ॥ आपे क्रिपा करे नामु देवै नानक नामि समाई हे ॥८॥

गिआन रतनु मनि परगटु भइआ ॥ नामु पदारथु सहजे लइआ ॥ एह वडिआई गुर ते पाई सतिगुर कउ सद बलि जाई हे ॥९॥

प्रगटिआ सूरु निसि मिटिआ अंधिआरा ॥ अगिआनु मिटिआ गुर रतनि अपारा ॥ सतिगुर गिआनु रतनु अति भारी करमि मिलै सुखु पाई हे ॥१०॥

गुरमुखि नामु प्रगटी है सोइ ॥ चहु जुगि निरमलु हछा लोइ ॥ नामे नामि रते सुखु पाइआ नामि रहिआ लिव लाई हे ॥११॥

गुरमुखि नामु परापति होवै ॥ सहजे जागै सहजे सोवै ॥ गुरमुखि नामि समाइ समावै नानक नामु धिआई हे ॥१२॥

भगता मुखि अम्रित है बाणी ॥ गुरमुखि हरि नामु आखि वखाणी ॥ हरि हरि करत सदा मनु बिगसै हरि चरणी मनु लाई हे ॥१३॥

हम मूरख अगिआन गिआनु किछु नाही ॥ सतिगुर ते समझ पड़ी मन माही ॥ होहु दइआलु क्रिपा करि हरि जीउ सतिगुर की सेवा लाई हे ॥१४॥

जिनि सतिगुरु जाता तिनि एकु पछाता ॥ सरबे रवि रहिआ सुखदाता ॥ आतमु चीनि परम पदु पाइआ सेवा सुरति समाई हे ॥१५॥

जिन कउ आदि मिली वडिआई ॥ सतिगुरु मनि वसिआ लिव लाई ॥ आपि मिलिआ जगजीवनु दाता नानक अंकि समाई हे ॥१६॥१॥

(राग मारू -- SGGS 1070) मारू महला ४ ॥
हरि अगम अगोचरु सदा अबिनासी ॥ सरबे रवि रहिआ घट वासी ॥ तिसु बिनु अवरु न कोई दाता हरि तिसहि सरेवहु प्राणी हे ॥१॥

जा कउ राखै हरि राखणहारा ॥ ता कउ कोइ न साकसि मारा ॥ सो ऐसा हरि सेवहु संतहु जा की ऊतम बाणी हे ॥२॥

जा जापै किछु किथाऊ नाही ॥ ता करता भरपूरि समाही ॥ सूके ते फुनि हरिआ कीतोनु हरि धिआवहु चोज विडाणी हे ॥३॥

जो जीआ की वेदन जाणै ॥ तिसु साहिब कै हउ कुरबाणै ॥ तिसु आगै जन करि बेनंती जो सरब सुखा का दाणी हे ॥४॥

जो जीऐ की सार न जाणै ॥ तिसु सिउ किछु न कहीऐ अजाणै ॥ मूरख सिउ नह लूझु पराणी हरि जपीऐ पदु निरबाणी हे ॥५॥

ना करि चिंत चिंता है करते ॥ हरि देवै जलि थलि जंता सभतै ॥ अचिंत दानु देइ प्रभु मेरा विचि पाथर कीट पखाणी हे ॥६॥

ना करि आस मीत सुत भाई ॥ ना करि आस किसै साह बिउहार की पराई ॥ बिनु हरि नावै को बेली नाही हरि जपीऐ सारंगपाणी हे ॥७॥

अनदिनु नामु जपहु बनवारी ॥ सभ आसा मनसा पूरै थारी ॥ जन नानक नामु जपहु भव खंडनु सुखि सहजे रैणि विहाणी हे ॥८॥

जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥ सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥ जो सरणि परै तिस की पति राखै जाइ पूछहु वेद पुराणी हे ॥९॥

जिसु हरि सेवा लाए सोई जनु लागै ॥ गुर कै सबदि भरम भउ भागै ॥ विचे ग्रिह सदा रहै उदासी जिउ कमलु रहै विचि पाणी हे ॥१०॥

विचि हउमै सेवा थाइ न पाए ॥ जनमि मरै फिरि आवै जाए ॥ सो तपु पूरा साई सेवा जो हरि मेरे मनि भाणी हे ॥११॥

हउ किआ गुण तेरे आखा सुआमी ॥ तू सरब जीआ का अंतरजामी ॥ हउ मागउ दानु तुझै पहि करते हरि अनदिनु नामु वखाणी हे ॥१२॥

किस ही जोरु अहंकार बोलण का ॥ किस ही जोरु दीबान माइआ का ॥ मै हरि बिनु टेक धर अवर न काई तू करते राखु मै निमाणी हे ॥१३॥

निमाणे माणु करहि तुधु भावै ॥ होर केती झखि झखि आवै जावै ॥ जिन का पखु करहि तू सुआमी तिन की ऊपरि गल तुधु आणी हे ॥१४॥

हरि हरि नामु जिनी सदा धिआइआ ॥ तिनी गुर परसादि परम पदु पाइआ ॥ जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ बिनु सेवा पछोताणी हे ॥१५॥

तू सभ महि वरतहि हरि जगंनाथु ॥ सो हरि जपै जिसु गुर मसतकि हाथु ॥ हरि की सरणि पइआ हरि जापी जनु नानकु दासु दसाणी हे ॥१६॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1087) मः ४ ॥
नाम विहूणे भरमसहि आवहि जावहि नीत ॥ इकि बांधे इकि ढीलिआ इकि सुखीए हरि प्रीति ॥ नानक सचा मंनि लै सचु करणी सचु रीति ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1087) मः ४ ॥
सागरु देखउ डरि मरउ भै तेरै डरु नाहि ॥ गुर कै सबदि संतोखीआ नानक बिगसा नाइ ॥२॥

(राग मारू -- SGGS 1087) मः ४ ॥
चड़ि बोहिथै चालसउ सागरु लहरी देइ ॥ ठाक न सचै बोहिथै जे गुरु धीरक देइ ॥ तितु दरि जाइ उतारीआ गुरु दिसै सावधानु ॥ नानक नदरी पाईऐ दरगह चलै मानु ॥३॥

(राग तुखारी -- SGGS 1113) तुखारी छंत महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अंतरि पिरी पिआरु किउ पिर बिनु जीवीऐ राम ॥ जब लगु दरसु न होइ किउ अम्रितु पीवीऐ राम ॥ किउ अम्रितु पीवीऐ हरि बिनु जीवीऐ तिसु बिनु रहनु न जाए ॥ अनदिनु प्रिउ प्रिउ करे दिनु राती पिर बिनु पिआस न जाए ॥ अपणी क्रिपा करहु हरि पिआरे हरि हरि नामु सद सारिआ ॥ गुर कै सबदि मिलिआ मै प्रीतमु हउ सतिगुर विटहु वारिआ ॥१॥

जब देखां पिरु पिआरा हरि गुण रसि रवा राम ॥ मेरै अंतरि होइ विगासु प्रिउ प्रिउ सचु नित चवा राम ॥ प्रिउ चवा पिआरे सबदि निसतारे बिनु देखे त्रिपति न आवए ॥ सबदि सीगारु होवै नित कामणि हरि हरि नामु धिआवए ॥ दइआ दानु मंगत जन दीजै मै प्रीतमु देहु मिलाए ॥ अनदिनु गुरु गोपालु धिआई हम सतिगुर विटहु घुमाए ॥२॥

हम पाथर गुरु नाव बिखु भवजलु तारीऐ राम ॥ गुर देवहु सबदु सुभाइ मै मूड़ निसतारीऐ राम ॥ हम मूड़ मुगध किछु मिति नही पाई तू अगमु वड जाणिआ ॥ तू आपि दइआलु दइआ करि मेलहि हम निरगुणी निमाणिआ ॥ अनेक जनम पाप करि भरमे हुणि तउ सरणागति आए ॥ दइआ करहु रखि लेवहु हरि जीउ हम लागह सतिगुर पाए ॥३॥

गुर पारस हम लोह मिलि कंचनु होइआ राम ॥ जोती जोति मिलाइ काइआ गड़ु सोहिआ राम ॥ काइआ गड़ु सोहिआ मेरै प्रभि मोहिआ किउ सासि गिरासि विसारीऐ ॥ अद्रिसटु अगोचरु पकड़िआ गुर सबदी हउ सतिगुर कै बलिहारीऐ ॥ सतिगुर आगै सीसु भेट देउ जे सतिगुर साचे भावै ॥ आपे दइआ करहु प्रभ दाते नानक अंकि समावै ॥४॥१॥

(राग तुखारी -- SGGS 1114) तुखारी महला ४ ॥
हरि हरि अगम अगाधि अपर्मपर अपरपरा ॥ जो तुम धिआवहि जगदीस ते जन भउ बिखमु तरा ॥ बिखम भउ तिन तरिआ सुहेला जिन हरि हरि नामु धिआइआ ॥ गुर वाकि सतिगुर जो भाइ चले तिन हरि हरि आपि मिलाइआ ॥ जोती जोति मिलि जोति समाणी हरि क्रिपा करि धरणीधरा ॥ हरि हरि अगम अगाधि अपर्मपर अपरपरा ॥१॥

तुम सुआमी अगम अथाह तू घटि घटि पूरि रहिआ ॥ तू अलख अभेउ अगमु गुर सतिगुर बचनि लहिआ ॥ धनु धंनु ते जन पुरख पूरे जिन गुर संतसंगति मिलि गुण रवे ॥ बिबेक बुधि बीचारि गुरमुखि गुर सबदि खिनु खिनु हरि नित चवे ॥ जा बहहि गुरमुखि हरि नामु बोलहि जा खड़े गुरमुखि हरि हरि कहिआ ॥ तुम सुआमी अगम अथाह तू घटि घटि पूरि रहिआ ॥२॥

सेवक जन सेवहि ते परवाणु जिन सेविआ गुरमति हरे ॥ तिन के कोटि सभि पाप खिनु परहरि हरि दूरि करे ॥ तिन के पाप दोख सभि बिनसे जिन मनि चिति इकु अराधिआ ॥ तिन का जनमु सफलिओ सभु कीआ करतै जिन गुर बचनी सचु भाखिआ ॥ ते धंनु जन वड पुरख पूरे जो गुरमति हरि जपि भउ बिखमु तरे ॥ सेवक जन सेवहि ते परवाणु जिन सेविआ गुरमति हरे ॥३॥

तू अंतरजामी हरि आपि जिउ तू चलावहि पिआरे हउ तिवै चला ॥ हमरै हाथि किछु नाहि जा तू मेलहि ता हउ आइ मिला ॥ जिन कउ तू हरि मेलहि सुआमी सभु तिन का लेखा छुटकि गइआ ॥ तिन की गणत न करिअहु को भाई जो गुर बचनी हरि मेलि लइआ ॥ नानक दइआलु होआ तिन ऊपरि जिन गुर का भाणा मंनिआ भला ॥ तू अंतरजामी हरि आपि जिउ तू चलावहि पिआरे हउ तिवै चला ॥४॥२॥

(राग तुखारी -- SGGS 1115) तुखारी महला ४ ॥
तू जगजीवनु जगदीसु सभ करता स्रिसटि नाथु ॥ तिन तू धिआइआ मेरा रामु जिन कै धुरि लेखु माथु ॥ जिन कउ धुरि हरि लिखिआ सुआमी तिन हरि हरि नामु अराधिआ ॥ तिन के पाप इक निमख सभि लाथे जिन गुर बचनी हरि जापिआ ॥ धनु धंनु ते जन जिन हरि नामु जपिआ तिन देखे हउ भइआ सनाथु ॥ तू जगजीवनु जगदीसु सभ करता स्रिसटि नाथु ॥१॥

तू जलि थलि महीअलि भरपूरि सभ ऊपरि साचु धणी ॥ जिन जपिआ हरि मनि चीति हरि जपि जपि मुकतु घणी ॥ जिन जपिआ हरि ते मुकत प्राणी तिन के ऊजल मुख हरि दुआरि ॥ ओइ हलति पलति जन भए सुहेले हरि राखि लीए रखनहारि ॥ हरि संतसंगति जन सुणहु भाई गुरमुखि हरि सेवा सफल बणी ॥ तू जलि थलि महीअलि भरपूरि सभ ऊपरि साचु धणी ॥२॥

तू थान थनंतरि हरि एकु हरि एको एकु रविआ ॥ वणि त्रिणि त्रिभवणि सभ स्रिसटि मुखि हरि हरि नामु चविआ ॥ सभि चवहि हरि हरि नामु करते असंख अगणत हरि धिआवए ॥ सो धंनु धनु हरि संतु साधू जो हरि प्रभ करते भावए ॥ सो सफलु दरसनु देहु करते जिसु हरि हिरदै नामु सद चविआ ॥ तू थान थनंतरि हरि एकु हरि एको एकु रविआ ॥३॥

तेरी भगति भंडार असंख जिसु तू देवहि मेरे सुआमी तिसु मिलहि ॥ जिस कै मसतकि गुर हाथु तिसु हिरदै हरि गुण टिकहि ॥ हरि गुण हिरदै टिकहि तिस कै जिसु अंतरि भउ भावनी होई ॥ बिनु भै किनै न प्रेमु पाइआ बिनु भै पारि न उतरिआ कोई ॥ भउ भाउ प्रीति नानक तिसहि लागै जिसु तू आपणी किरपा करहि ॥ तेरी भगति भंडार असंख जिसु तू देवहि मेरे सुआमी तिसु मिलहि ॥४॥३॥

(राग तुखारी -- SGGS 1116) तुखारी महला ४ ॥
नावणु पुरबु अभीचु गुर सतिगुर दरसु भइआ ॥ दुरमति मैलु हरी अगिआनु अंधेरु गइआ ॥ गुर दरसु पाइआ अगिआनु गवाइआ अंतरि जोति प्रगासी ॥ जनम मरण दुख खिन महि बिनसे हरि पाइआ प्रभु अबिनासी ॥ हरि आपि करतै पुरबु कीआ सतिगुरू कुलखेति नावणि गइआ ॥ नावणु पुरबु अभीचु गुर सतिगुर दरसु भइआ ॥१॥

मारगि पंथि चले गुर सतिगुर संगि सिखा ॥ अनदिनु भगति बणी खिनु खिनु निमख विखा ॥ हरि हरि भगति बणी प्रभ केरी सभु लोकु वेखणि आइआ ॥ जिन दरसु सतिगुर गुरू कीआ तिन आपि हरि मेलाइआ ॥ तीरथ उदमु सतिगुरू कीआ सभ लोक उधरण अरथा ॥ मारगि पंथि चले गुर सतिगुर संगि सिखा ॥२॥

प्रथम आए कुलखेति गुर सतिगुर पुरबु होआ ॥ खबरि भई संसारि आए त्रै लोआ ॥ देखणि आए तीनि लोक सुरि नर मुनि जन सभि आइआ ॥ जिन परसिआ गुरु सतिगुरू पूरा तिन के किलविख नास गवाइआ ॥ जोगी दिग्मबर संनिआसी खटु दरसन करि गए गोसटि ढोआ ॥ प्रथम आए कुलखेति गुर सतिगुर पुरबु होआ ॥३॥

दुतीआ जमुन गए गुरि हरि हरि जपनु कीआ ॥ जागाती मिले दे भेट गुर पिछै लंघाइ दीआ ॥ सभ छुटी सतिगुरू पिछै जिनि हरि हरि नामु धिआइआ ॥ गुर बचनि मारगि जो पंथि चाले तिन जमु जागाती नेड़ि न आइआ ॥ सभ गुरू गुरू जगतु बोलै गुर कै नाइ लइऐ सभि छुटकि गइआ ॥ दुतीआ जमुन गए गुरि हरि हरि जपनु कीआ ॥४॥

त्रितीआ आए सुरसरी तह कउतकु चलतु भइआ ॥ सभ मोही देखि दरसनु गुर संत किनै आढु न दामु लइआ ॥ आढु दामु किछु पइआ न बोलक जागातीआ मोहण मुंदणि पई ॥ भाई हम करह किआ किसु पासि मांगह सभ भागि सतिगुर पिछै पई ॥ जागातीआ उपाव सिआणप करि वीचारु डिठा भंनि बोलका सभि उठि गइआ ॥ त्रितीआ आए सुरसरी तह कउतकु चलतु भइआ ॥५॥

मिलि आए नगर महा जना गुर सतिगुर ओट गही ॥ गुरु सतिगुरु गुरु गोविदु पुछि सिम्रिति कीता सही ॥ सिम्रिति सासत्र सभनी सही कीता सुकि प्रहिलादि स्रीरामि करि गुर गोविदु धिआइआ ॥ देही नगरि कोटि पंच चोर वटवारे तिन का थाउ थेहु गवाइआ ॥ कीरतन पुराण नित पुंन होवहि गुर बचनि नानकि हरि भगति लही ॥ मिलि आए नगर महा जना गुर सतिगुर ओट गही ॥६॥४॥१०॥

(राग केदारा -- SGGS 1118) केदारा महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन राम नाम नित गावीऐ रे ॥ अगम अगोचरु न जाई हरि लखिआ गुरु पूरा मिलै लखावीऐ रे ॥ रहाउ ॥ जिसु आपे किरपा करे मेरा सुआमी तिसु जन कउ हरि लिव लावीऐ रे ॥ सभु को भगति करे हरि केरी हरि भावै सो थाइ पावीऐ रे ॥१॥

हरि हरि नामु अमोलकु हरि पहि हरि देवै ता नामु धिआवीऐ रे ॥ जिस नो नामु देइ मेरा सुआमी तिसु लेखा सभु छडावीऐ रे ॥२॥

हरि नामु अराधहि से धंनु जन कहीअहि तिन मसतकि भागु धुरि लिखि पावीऐ रे ॥ तिन देखे मेरा मनु बिगसै जिउ सुतु मिलि मात गलि लावीऐ रे ॥३॥

हम बारिक हरि पिता प्रभ मेरे मो कउ देहु मती जितु हरि पावीऐ रे ॥ जिउ बछुरा देखि गऊ सुखु मानै तिउ नानक हरि गलि लावीऐ रे ॥४॥१॥

(राग केदारा -- SGGS 1118) केदारा महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन हरि हरि गुन कहु रे ॥ सतिगुरू के चरन धोइ धोइ पूजहु इन बिधि मेरा हरि प्रभु लहु रे ॥ रहाउ ॥ कामु क्रोधु लोभु मोहु अभिमानु बिखै रस इन संगति ते तू रहु रे ॥ मिलि सतसंगति कीजै हरि गोसटि साधू सिउ गोसटि हरि प्रेम रसाइणु राम नामु रसाइणु हरि राम नाम राम रमहु रे ॥१॥

अंतर का अभिमानु जोरु तू किछु किछु किछु जानता इहु दूरि करहु आपन गहु रे ॥ जन नानक कउ हरि दइआल होहु सुआमी हरि संतन की धूरि करि हरे ॥२॥१॥२॥

(राग भैरउ -- SGGS 1133) रागु भैरउ महला ४ चउपदे घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि जन संत करि किरपा पगि लाइणु ॥ गुर सबदी हरि भजु सुरति समाइणु ॥१॥

मेरे मन हरि भजु नामु नराइणु ॥ हरि हरि क्रिपा करे सुखदाता गुरमुखि भवजलु हरि नामि तराइणु ॥१॥ रहाउ ॥

संगति साध मेलि हरि गाइणु ॥ गुरमती ले राम रसाइणु ॥२॥

गुर साधू अम्रित गिआन सरि नाइणु ॥ सभि किलविख पाप गए गावाइणु ॥३॥

तू आपे करता स्रिसटि धराइणु ॥ जनु नानकु मेलि तेरा दास दसाइणु ॥४॥१॥

(राग भैरउ -- SGGS 1134) भैरउ महला ४ ॥
बोलि हरि नामु सफल सा घरी ॥ गुर उपदेसि सभि दुख परहरी ॥१॥

मेरे मन हरि भजु नामु नरहरी ॥ करि किरपा मेलहु गुरु पूरा सतसंगति संगि सिंधु भउ तरी ॥१॥ रहाउ ॥

जगजीवनु धिआइ मनि हरि सिमरी ॥ कोट कोटंतर तेरे पाप परहरी ॥२॥

सतसंगति साध धूरि मुखि परी ॥ इसनानु कीओ अठसठि सुरसरी ॥३॥

हम मूरख कउ हरि किरपा करी ॥ जनु नानकु तारिओ तारण हरी ॥४॥२॥

(राग भैरउ -- SGGS 1134) भैरउ महला ४ ॥
सुक्रितु करणी सारु जपमाली ॥ हिरदै फेरि चलै तुधु नाली ॥१॥

हरि हरि नामु जपहु बनवाली ॥ करि किरपा मेलहु सतसंगति तूटि गई माइआ जम जाली ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखि सेवा घाल जिनि घाली ॥ तिसु घड़ीऐ सबदु सची टकसाली ॥२॥

हरि अगम अगोचरु गुरि अगम दिखाली ॥ विचि काइआ नगर लधा हरि भाली ॥३॥

हम बारिक हरि पिता प्रतिपाली ॥ जन नानक तारहु नदरि निहाली ॥४॥३॥

(राग भैरउ -- SGGS 1134) भैरउ महला ४ ॥
सभि घट तेरे तू सभना माहि ॥ तुझ ते बाहरि कोई नाहि ॥१॥

हरि सुखदाता मेरे मन जापु ॥ हउ तुधु सालाही तू मेरा हरि प्रभु बापु ॥१॥ रहाउ ॥

जह जह देखा तह हरि प्रभु सोइ ॥ सभ तेरै वसि दूजा अवरु न कोइ ॥२॥

जिस कउ तुम हरि राखिआ भावै ॥ तिस कै नेड़ै कोइ न जावै ॥३॥

तू जलि थलि महीअलि सभ तै भरपूरि ॥ जन नानक हरि जपि हाजरा हजूरि ॥४॥४॥

(राग भैरउ -- SGGS 1134) भैरउ महला ४ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि का संतु हरि की हरि मूरति जिसु हिरदै हरि नामु मुरारि ॥ मसतकि भागु होवै जिसु लिखिआ सो गुरमति हिरदै हरि नामु सम्हारि ॥१॥

मधुसूदनु जपीऐ उर धारि ॥ देही नगरि तसकर पंच धातू गुर सबदी हरि काढे मारि ॥१॥ रहाउ ॥

जिन का हरि सेती मनु मानिआ तिन कारज हरि आपि सवारि ॥ तिन चूकी मुहताजी लोकन की हरि अंगीकारु कीआ करतारि ॥२॥

मता मसूरति तां किछु कीजै जे किछु होवै हरि बाहरि ॥ जो किछु करे सोई भल होसी हरि धिआवहु अनदिनु नामु मुरारि ॥३॥

हरि जो किछु करे सु आपे आपे ओहु पूछि न किसै करे बीचारि ॥ नानक सो प्रभु सदा धिआईऐ जिनि मेलिआ सतिगुरु किरपा धारि ॥४॥१॥५॥


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates