Pt 11 - गुरू रामदास जी - सलोक बाणी शब्द, Part 11 - Guru Ramdas ji (Mahalla 4) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग गोंड -- SGGS 859) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु गोंड चउपदे महला ४ घरु १ ॥
जे मनि चिति आस रखहि हरि ऊपरि ता मन चिंदे अनेक अनेक फल पाई ॥ हरि जाणै सभु किछु जो जीइ वरतै प्रभु घालिआ किसै का इकु तिलु न गवाई ॥ हरि तिस की आस कीजै मन मेरे जो सभ महि सुआमी रहिआ समाई ॥१॥

मेरे मन आसा करि जगदीस गुसाई ॥ जो बिनु हरि आस अवर काहू की कीजै सा निहफल आस सभ बिरथी जाई ॥१॥ रहाउ ॥

जो दीसै माइआ मोह कुट्मबु सभु मत तिस की आस लगि जनमु गवाई ॥ इन्ह कै किछु हाथि नही कहा करहि इहि बपुड़े इन्ह का वाहिआ कछु न वसाई ॥ मेरे मन आस करि हरि प्रीतम अपुने की जो तुझु तारै तेरा कुट्मबु सभु छडाई ॥२॥

जे किछु आस अवर करहि परमित्री मत तूं जाणहि तेरै कितै कमि आई ॥ इह आस परमित्री भाउ दूजा है खिन महि झूठु बिनसि सभ जाई ॥ मेरे मन आसा करि हरि प्रीतम साचे की जो तेरा घालिआ सभु थाइ पाई ॥३॥

आसा मनसा सभ तेरी मेरे सुआमी जैसी तू आस करावहि तैसी को आस कराई ॥ किछु किसी कै हथि नाही मेरे सुआमी ऐसी मेरै सतिगुरि बूझ बुझाई ॥ जन नानक की आस तू जाणहि हरि दरसनु देखि हरि दरसनि त्रिपताई ॥४॥१॥

(राग गोंड -- SGGS 860) गोंड महला ४ ॥
ऐसा हरि सेवीऐ नित धिआईऐ जो खिन महि किलविख सभि करे बिनासा ॥ जे हरि तिआगि अवर की आस कीजै ता हरि निहफल सभ घाल गवासा ॥ मेरे मन हरि सेविहु सुखदाता सुआमी जिसु सेविऐ सभ भुख लहासा ॥१॥

मेरे मन हरि ऊपरि कीजै भरवासा ॥ जह जाईऐ तह नालि मेरा सुआमी हरि अपनी पैज रखै जन दासा ॥१॥ रहाउ ॥

जे अपनी बिरथा कहहु अवरा पहि ता आगै अपनी बिरथा बहु बहुतु कढासा ॥ अपनी बिरथा कहहु हरि अपुने सुआमी पहि जो तुम्हरे दूख ततकाल कटासा ॥ सो ऐसा प्रभु छोडि अपनी बिरथा अवरा पहि कहीऐ अवरा पहि कहि मन लाज मरासा ॥२॥

जो संसारै के कुट्मब मित्र भाई दीसहि मन मेरे ते सभि अपनै सुआइ मिलासा ॥ जितु दिनि उन्ह का सुआउ होइ न आवै तितु दिनि नेड़ै को न ढुकासा ॥ मन मेरे अपना हरि सेवि दिनु राती जो तुधु उपकरै दूखि सुखासा ॥३॥

तिस का भरवासा किउ कीजै मन मेरे जो अंती अउसरि रखि न सकासा ॥ हरि जपु मंतु गुर उपदेसु लै जापहु तिन्ह अंति छडाए जिन्ह हरि प्रीति चितासा ॥ जन नानक अनदिनु नामु जपहु हरि संतहु इहु छूटण का साचा भरवासा ॥४॥२॥

(राग गोंड -- SGGS 860) गोंड महला ४ ॥
हरि सिमरत सदा होइ अनंदु सुखु अंतरि सांति सीतल मनु अपना ॥ जैसे सकति सूरु बहु जलता गुर ससि देखे लहि जाइ सभ तपना ॥१॥

मेरे मन अनदिनु धिआइ नामु हरि जपना ॥ जहा कहा तुझु राखै सभ ठाई सो ऐसा प्रभु सेवि सदा तू अपना ॥१॥ रहाउ ॥

जा महि सभि निधान सो हरि जपि मन मेरे गुरमुखि खोजि लहहु हरि रतना ॥ जिन हरि धिआइआ तिन हरि पाइआ मेरा सुआमी तिन के चरण मलहु हरि दसना ॥२॥

सबदु पछाणि राम रसु पावहु ओहु ऊतमु संतु भइओ बड बडना ॥ तिसु जन की वडिआई हरि आपि वधाई ओहु घटै न किसै की घटाई इकु तिलु तिलु तिलना ॥३॥

जिस ते सुख पावहि मन मेरे सो सदा धिआइ नित कर जुरना ॥ जन नानक कउ हरि दानु इकु दीजै नित बसहि रिदै हरी मोहि चरना ॥४॥३॥

(राग गोंड -- SGGS 861) गोंड महला ४ ॥
जितने साह पातिसाह उमराव सिकदार चउधरी सभि मिथिआ झूठु भाउ दूजा जाणु ॥ हरि अबिनासी सदा थिरु निहचलु तिसु मेरे मन भजु परवाणु ॥१॥

मेरे मन नामु हरी भजु सदा दीबाणु ॥ जो हरि महलु पावै गुर बचनी तिसु जेवडु अवरु नाही किसै दा ताणु ॥१॥ रहाउ ॥

जितने धनवंत कुलवंत मिलखवंत दीसहि मन मेरे सभि बिनसि जाहि जिउ रंगु कसु्मभ कचाणु ॥ हरि सति निरंजनु सदा सेवि मन मेरे जितु हरि दरगह पावहि तू माणु ॥२॥

ब्राहमणु खत्री सूद वैस चारि वरन चारि आस्रम हहि जो हरि धिआवै सो परधानु ॥ जिउ चंदन निकटि वसै हिरडु बपुड़ा तिउ सतसंगति मिलि पतित परवाणु ॥३॥

ओहु सभ ते ऊचा सभ ते सूचा जा कै हिरदै वसिआ भगवानु ॥ जन नानकु तिस के चरन पखालै जो हरि जनु नीचु जाति सेवकाणु ॥४॥४॥

(राग गोंड -- SGGS 861) गोंड महला ४ ॥
हरि अंतरजामी सभतै वरतै जेहा हरि कराए तेहा को करईऐ ॥ सो ऐसा हरि सेवि सदा मन मेरे जो तुधनो सभ दू रखि लईऐ ॥१॥

मेरे मन हरि जपि हरि नित पड़ईऐ ॥ हरि बिनु को मारि जीवालि न साकै ता मेरे मन काइतु कड़ईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि परपंचु कीआ सभु करतै विचि आपे आपणी जोति धरईऐ ॥ हरि एको बोलै हरि एकु बुलाए गुरि पूरै हरि एकु दिखईऐ ॥२॥

हरि अंतरि नाले बाहरि नाले कहु तिसु पासहु मन किआ चोरईऐ ॥ निहकपट सेवा कीजै हरि केरी तां मेरे मन सरब सुख पईऐ ॥३॥

जिस दै वसि सभु किछु सो सभ दू वडा सो मेरे मन सदा धिअईऐ ॥ जन नानक सो हरि नालि है तेरै हरि सदा धिआइ तू तुधु लए छडईऐ ॥४॥५॥

(राग गोंड -- SGGS 861) गोंड महला ४ ॥
हरि दरसन कउ मेरा मनु बहु तपतै जिउ त्रिखावंतु बिनु नीर ॥१॥

मेरै मनि प्रेमु लगो हरि तीर ॥ हमरी बेदन हरि प्रभु जानै मेरे मन अंतर की पीर ॥१॥ रहाउ ॥

मेरे हरि प्रीतम की कोई बात सुनावै सो भाई सो मेरा बीर ॥२॥

मिलु मिलु सखी गुण कहु मेरे प्रभ के ले सतिगुर की मति धीर ॥३॥

जन नानक की हरि आस पुजावहु हरि दरसनि सांति सरीर ॥४॥६॥ छका १ ॥

(राग रामकली -- SGGS 880) रामकली महला ४ घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जे वड भाग होवहि वडभागी ता हरि हरि नामु धिआवै ॥ नामु जपत नामे सुखु पावै हरि नामे नामि समावै ॥१॥

गुरमुखि भगति करहु सद प्राणी ॥ हिरदै प्रगासु होवै लिव लागै गुरमति हरि हरि नामि समाणी ॥१॥ रहाउ ॥

हीरा रतन जवेहर माणक बहु सागर भरपूरु कीआ ॥ जिसु वड भागु होवै वड मसतकि तिनि गुरमति कढि कढि लीआ ॥२॥

रतनु जवेहरु लालु हरि नामा गुरि काढि तली दिखलाइआ ॥ भागहीण मनमुखि नही लीआ त्रिण ओलै लाखु छपाइआ ॥३॥

मसतकि भागु होवै धुरि लिखिआ ता सतगुरु सेवा लाए ॥ नानक रतन जवेहर पावै धनु धनु गुरमति हरि पाए ॥४॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 880) रामकली महला ४ ॥
राम जना मिलि भइआ अनंदा हरि नीकी कथा सुनाइ ॥ दुरमति मैलु गई सभ नीकलि सतसंगति मिलि बुधि पाइ ॥१॥

राम जन गुरमति रामु बोलाइ ॥ जो जो सुणै कहै सो मुकता राम जपत सोहाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जे वड भाग होवहि मुखि मसतकि हरि राम जना भेटाइ ॥ दरसनु संत देहु करि किरपा सभु दालदु दुखु लहि जाइ ॥२॥

हरि के लोग राम जन नीके भागहीण न सुखाइ ॥ जिउ जिउ राम कहहि जन ऊचे नर निंदक डंसु लगाइ ॥३॥

ध्रिगु ध्रिगु नर निंदक जिन जन नही भाए हरि के सखा सखाइ ॥ से हरि के चोर वेमुख मुख काले जिन गुर की पैज न भाइ ॥४॥

दइआ दइआ करि राखहु हरि जीउ हम दीन तेरी सरणाइ ॥ हम बारिक तुम पिता प्रभ मेरे जन नानक बखसि मिलाइ ॥५॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 881) रामकली महला ४ ॥
हरि के सखा साध जन नीके तिन ऊपरि हाथु वतावै ॥ गुरमुखि साध सेई प्रभ भाए करि किरपा आपि मिलावै ॥१॥

राम मो कउ हरि जन मेलि मनि भावै ॥ अमिउ अमिउ हरि रसु है मीठा मिलि संत जना मुखि पावै ॥१॥ रहाउ ॥

हरि के लोग राम जन ऊतम मिलि ऊतम पदवी पावै ॥ हम होवत चेरी दास दासन की मेरा ठाकुरु खुसी करावै ॥२॥

सेवक जन सेवहि से वडभागी रिद मनि तनि प्रीति लगावै ॥ बिनु प्रीती करहि बहु बाता कूड़ु बोलि कूड़ो फलु पावै ॥३॥

मो कउ धारि क्रिपा जगजीवन दाते हरि संत पगी ले पावै ॥ हउ काटउ काटि बाढि सिरु राखउ जितु नानक संतु चड़ि आवै ॥४॥३॥

(राग रामकली -- SGGS 881) रामकली महला ४ ॥
जे वड भाग होवहि वड मेरे जन मिलदिआ ढिल न लाईऐ ॥ हरि जन अम्रित कुंट सर नीके वडभागी तितु नावाईऐ ॥१॥

राम मो कउ हरि जन कारै लाईऐ ॥ हउ पाणी पखा पीसउ संत आगै पग मलि मलि धूरि मुखि लाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि जन वडे वडे वड ऊचे जो सतगुर मेलि मिलाईऐ ॥ सतगुर जेवडु अवरु न कोई मिलि सतगुर पुरख धिआईऐ ॥२॥

सतगुर सरणि परे तिन पाइआ मेरे ठाकुर लाज रखाईऐ ॥ इकि अपणै सुआइ आइ बहहि गुर आगै जिउ बगुल समाधि लगाईऐ ॥३॥

बगुला काग नीच की संगति जाइ करंग बिखू मुखि लाईऐ ॥ नानक मेलि मेलि प्रभ संगति मिलि संगति हंसु कराईऐ ॥४॥४॥

(राग रामकली -- SGGS 882) रामकली महला ४ ॥
सतगुर दइआ करहु हरि मेलहु मेरे प्रीतम प्राण हरि राइआ ॥ हम चेरी होइ लगह गुर चरणी जिनि हरि प्रभ मारगु पंथु दिखाइआ ॥१॥

राम मै हरि हरि नामु मनि भाइआ ॥ मै हरि बिनु अवरु न कोई बेली मेरा पिता माता हरि सखाइआ ॥१॥ रहाउ ॥

मेरे इकु खिनु प्रान न रहहि बिनु प्रीतम बिनु देखे मरहि मेरी माइआ ॥ धनु धनु वड भाग गुर सरणी आए हरि गुर मिलि दरसनु पाइआ ॥२॥

मै अवरु न कोई सूझै बूझै मनि हरि जपु जपउ जपाइआ ॥ नामहीण फिरहि से नकटे तिन घसि घसि नक वढाइआ ॥३॥

मो कउ जगजीवन जीवालि लै सुआमी रिद अंतरि नामु वसाइआ ॥ नानक गुरू गुरू है पूरा मिलि सतिगुर नामु धिआइआ ॥४॥५॥

(राग रामकली -- SGGS 882) रामकली महला ४ ॥
सतगुरु दाता वडा वड पुरखु है जितु मिलिऐ हरि उर धारे ॥ जीअ दानु गुरि पूरै दीआ हरि अम्रित नामु समारे ॥१॥

राम गुरि हरि हरि नामु कंठि धारे ॥ गुरमुखि कथा सुणी मनि भाई धनु धनु वड भाग हमारे ॥१॥ रहाउ ॥

कोटि कोटि तेतीस धिआवहि ता का अंतु न पावहि पारे ॥ हिरदै काम कामनी मागहि रिधि मागहि हाथु पसारे ॥२॥

हरि जसु जपि जपु वडा वडेरा गुरमुखि रखउ उरि धारे ॥ जे वड भाग होवहि ता जपीऐ हरि भउजलु पारि उतारे ॥३॥

हरि जन निकटि निकटि हरि जन है हरि राखै कंठि जन धारे ॥ नानक पिता माता है हरि प्रभु हम बारिक हरि प्रतिपारे ॥४॥६॥१८॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 975) रागु नट नाराइन महला ४
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
मेरे मन जपि अहिनिसि नामु हरे ॥ कोटि कोटि दोख बहु कीने सभ परहरि पासि धरे ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि नामु जपहि आराधहि सेवक भाइ खरे ॥ किलबिख दोख गए सभ नीकरि जिउ पानी मैलु हरे ॥१॥

खिनु खिनु नरु नाराइनु गावहि मुखि बोलहि नर नरहरे ॥ पंच दोख असाध नगर महि इकु खिनु पलु दूरि करे ॥२॥

वडभागी हरि नामु धिआवहि हरि के भगत हरे ॥ तिन की संगति देहि प्रभ जाचउ मै मूड़ मुगध निसतरे ॥३॥

क्रिपा क्रिपा धारि जगजीवन रखि लेवहु सरनि परे ॥ नानकु जनु तुमरी सरनाई हरि राखहु लाज हरे ॥४॥१॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 975) नट महला ४ ॥
राम जपि जन रामै नामि रले ॥ राम नामु जपिओ गुर बचनी हरि धारी हरि क्रिपले ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि अगम अगोचरु सुआमी जन जपि मिलि सलल सलले ॥ हरि के संत मिलि राम रसु पाइआ हम जन कै बलि बलले ॥१॥

पुरखोतमु हरि नामु जनि गाइओ सभि दालद दुख दलले ॥ विचि देही दोख असाध पंच धातू हरि कीए खिन परले ॥२॥

हरि के संत मनि प्रीति लगाई जिउ देखै ससि कमले ॥ उनवै घनु घन घनिहरु गरजै मनि बिगसै मोर मुरले ॥३॥

हमरै सुआमी लोच हम लाई हम जीवह देखि हरि मिले ॥ जन नानक हरि अमल हरि लाए हरि मेलहु अनद भले ॥४॥२॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 975) नट महला ४ ॥
मेरे मन जपि हरि हरि नामु सखे ॥ गुर परसादी हरि नामु धिआइओ हम सतिगुर चरन पखे ॥१॥ रहाउ ॥

ऊतम जगंनाथ जगदीसुर हम पापी सरनि रखे ॥ तुम वड पुरख दीन दुख भंजन हरि दीओ नामु मुखे ॥१॥

हरि गुन ऊच नीच हम गाए गुर सतिगुर संगि सखे ॥ जिउ चंदन संगि बसै निमु बिरखा गुन चंदन के बसखे ॥२॥

हमरे अवगन बिखिआ बिखै के बहु बार बार निमखे ॥ अवगनिआरे पाथर भारे हरि तारे संगि जनखे ॥३॥

जिन कउ तुम हरि राखहु सुआमी सभ तिन के पाप क्रिखे ॥ जन नानक के दइआल प्रभ सुआमी तुम दुसट तारे हरणखे ॥४॥३॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 976) नट महला ४ ॥
मेरे मन जपि हरि हरि राम रंगे ॥ हरि हरि क्रिपा करी जगदीसुरि हरि धिआइओ जन पगि लगे ॥१॥ रहाउ ॥

जनम जनम के भूल चूक हम अब आए प्रभ सरनगे ॥ तुम सरणागति प्रतिपालक सुआमी हम राखहु वड पापगे ॥१॥

तुमरी संगति हरि को को न उधरिओ प्रभ कीए पतित पवगे ॥ गुन गावत छीपा दुसटारिओ प्रभि राखी पैज जनगे ॥२॥

जो तुमरे गुन गावहि सुआमी हउ बलि बलि बलि तिनगे ॥ भवन भवन पवित्र सभि कीए जह धूरि परी जन पगे ॥३॥

तुमरे गुन प्रभ कहि न सकहि हम तुम वड वड पुरख वडगे ॥ जन नानक कउ दइआ प्रभ धारहु हम सेवह तुम जन पगे ॥४॥४॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 976) नट महला ४ ॥
मेरे मन जपि हरि हरि नामु मने ॥ जगंनाथि किरपा प्रभि धारी मति गुरमति नाम बने ॥१॥ रहाउ ॥

हरि जन हरि जसु हरि हरि गाइओ उपदेसि गुरू गुर सुने ॥ किलबिख पाप नाम हरि काटे जिव खेत क्रिसानि लुने ॥१॥

तुमरी उपमा तुम ही प्रभ जानहु हम कहि न सकहि हरि गुने ॥ जैसे तुम तैसे प्रभ तुम ही गुन जानहु प्रभ अपुने ॥२॥

माइआ फास बंध बहु बंधे हरि जपिओ खुल खुलने ॥ जिउ जल कुंचरु तदूऐ बांधिओ हरि चेतिओ मोख मुखने ॥३॥

सुआमी पारब्रहम परमेसरु तुम खोजहु जुग जुगने ॥ तुमरी थाह पाई नही पावै जन नानक के प्रभ वडने ॥४॥५॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 976) नट महला ४ ॥
मेरे मन कलि कीरति हरि प्रवणे ॥ हरि हरि दइआलि दइआ प्रभ धारी लगि सतिगुर हरि जपणे ॥१॥ रहाउ ॥

हरि तुम वड अगम अगोचर सुआमी सभि धिआवहि हरि रुड़णे ॥ जिन कउ तुम्हरे वड कटाख है ते गुरमुखि हरि सिमरणे ॥१॥

इहु परपंचु कीआ प्रभ सुआमी सभु जगजीवनु जुगणे ॥ जिउ सललै सलल उठहि बहु लहरी मिलि सललै सलल समणे ॥२॥

जो प्रभ कीआ सु तुम ही जानहु हम नह जाणी हरि गहणे ॥ हम बारिक कउ रिद उसतति धारहु हम करह प्रभू सिमरणे ॥३॥

तुम जल निधि हरि मान सरोवर जो सेवै सभ फलणे ॥ जनु नानकु हरि हरि हरि हरि बांछै हरि देवहु करि क्रिपणे ॥४॥६॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 977) नट नाराइन महला ४ पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन सेव सफल हरि घाल ॥ ले गुर पग रेन रवाल ॥ सभि दालिद भंजि दुख दाल ॥ हरि हो हो हो नदरि निहाल ॥१॥ रहाउ ॥

हरि का ग्रिहु हरि आपि सवारिओ हरि रंग रंग महल बेअंत लाल लाल हरि लाल ॥ हरि आपनी क्रिपा करी आपि ग्रिहि आइओ हम हरि की गुर कीई है बसीठी हम हरि देखे भई निहाल निहाल निहाल निहाल ॥१॥

हरि आवते की खबरि गुरि पाई मनि तनि आनदो आनंद भए हरि आवते सुने मेरे लाल हरि लाल ॥ जनु नानकु हरि हरि मिले भए गलतान हाल निहाल निहाल ॥२॥१॥७॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 977) नट महला ४ ॥
मन मिलु संतसंगति सुभवंती ॥ सुनि अकथ कथा सुखवंती ॥ सभ किलबिख पाप लहंती ॥ हरि हो हो हो लिखतु लिखंती ॥१॥ रहाउ ॥

हरि कीरति कलजुग विचि ऊतम मति गुरमति कथा भजंती ॥ जिनि जनि सुणी मनी है जिनि जनि तिसु जन कै हउ कुरबानंती ॥१॥

हरि अकथ कथा का जिनि रसु चाखिआ तिसु जन सभ भूख लहंती ॥ नानक जन हरि कथा सुणि त्रिपते जपि हरि हरि हरि होवंती ॥२॥२॥८॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 977) नट महला ४ ॥
कोई आनि सुनावै हरि की हरि गाल ॥ तिस कउ हउ बलि बलि बाल ॥ सो हरि जनु है भल भाल ॥ हरि हो हो हो मेलि निहाल ॥१॥ रहाउ ॥

हरि का मारगु गुर संति बताइओ गुरि चाल दिखाई हरि चाल ॥ अंतरि कपटु चुकावहु मेरे गुरसिखहु निहकपट कमावहु हरि की हरि घाल निहाल निहाल निहाल ॥१॥

ते गुर के सिख मेरे हरि प्रभि भाए जिना हरि प्रभु जानिओ मेरा नालि ॥ जन नानक कउ मति हरि प्रभि दीनी हरि देखि निकटि हदूरि निहाल निहाल निहाल निहाल ॥२॥३॥९॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 980) नट असटपदीआ महला ४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम मेरे मनि तनि नामु अधारे ॥ खिनु पलु रहि न सकउ बिनु सेवा मै गुरमति नामु सम्हारे ॥१॥ रहाउ ॥

हरि हरि हरि हरि हरि मनि धिआवहु मै हरि हरि नामु पिआरे ॥ दीन दइआल भए प्रभ ठाकुर गुर कै सबदि सवारे ॥१॥

मधसूदन जगजीवन माधो मेरे ठाकुर अगम अपारे ॥ इक बिनउ बेनती करउ गुर आगै मै साधू चरन पखारे ॥२॥

सहस नेत्र नेत्र है प्रभ कउ प्रभ एको पुरखु निरारे ॥ सहस मूरति एको प्रभु ठाकुरु प्रभु एको गुरमति तारे ॥३॥

गुरमति नामु दमोदरु पाइआ हरि हरि नामु उरि धारे ॥ हरि हरि कथा बनी अति मीठी जिउ गूंगा गटक सम्हारे ॥४॥

रसना साद चखै भाइ दूजै अति फीके लोभ बिकारे ॥ जो गुरमुखि साद चखहि राम नामा सभ अन रस साद बिसारे ॥५॥

गुरमति राम नामु धनु पाइआ सुणि कहतिआ पाप निवारे ॥ धरम राइ जमु नेड़ि न आवै मेरे ठाकुर के जन पिआरे ॥६॥

सास सास सास है जेते मै गुरमति नामु सम्हारे ॥ सासु सासु जाइ नामै बिनु सो बिरथा सासु बिकारे ॥७॥

क्रिपा क्रिपा करि दीन प्रभ सरनी मो कउ हरि जन मेलि पिआरे ॥ नानक दासनि दासु कहतु है हम दासन के पनिहारे ॥८॥१॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 981) नट महला ४ ॥
राम हम पाथर निरगुनीआरे ॥ क्रिपा क्रिपा करि गुरू मिलाए हम पाहन सबदि गुर तारे ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुर नामु द्रिड़ाए अति मीठा मैलागरु मलगारे ॥ नामै सुरति वजी है दह दिसि हरि मुसकी मुसक गंधारे ॥१॥

तेरी निरगुण कथा कथा है मीठी गुरि नीके बचन समारे ॥ गावत गावत हरि गुन गाए गुन गावत गुरि निसतारे ॥२॥

बिबेकु गुरू गुरू समदरसी तिसु मिलीऐ संक उतारे ॥ सतिगुर मिलिऐ परम पदु पाइआ हउ सतिगुर कै बलिहारे ॥३॥

पाखंड पाखंड करि करि भरमे लोभु पाखंडु जगि बुरिआरे ॥ हलति पलति दुखदाई होवहि जमकालु खड़ा सिरि मारे ॥४॥

उगवै दिनसु आलु जालु सम्हालै बिखु माइआ के बिसथारे ॥ आई रैनि भइआ सुपनंतरु बिखु सुपनै भी दुख सारे ॥५॥

कलरु खेतु लै कूड़ु जमाइआ सभ कूड़ै के खलवारे ॥ साकत नर सभि भूख भुखाने दरि ठाढे जम जंदारे ॥६॥

मनमुख करजु चड़िआ बिखु भारी उतरै सबदु वीचारे ॥ जितने करज करज के मंगीए करि सेवक पगि लगि वारे ॥७॥

जगंनाथ सभि जंत्र उपाए नकि खीनी सभ नथहारे ॥ नानक प्रभु खिंचै तिव चलीऐ जिउ भावै राम पिआरे ॥८॥२॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 981) नट महला ४ ॥
राम हरि अम्रित सरि नावारे ॥ सतिगुरि गिआनु मजनु है नीको मिलि कलमल पाप उतारे ॥१॥ रहाउ ॥

संगति का गुनु बहुतु अधिकाई पड़ि सूआ गनक उधारे ॥ परस नपरस भए कुबिजा कउ लै बैकुंठि सिधारे ॥१॥

अजामल प्रीति पुत्र प्रति कीनी करि नाराइण बोलारे ॥ मेरे ठाकुर कै मनि भाइ भावनी जमकंकर मारि बिदारे ॥२॥

मानुखु कथै कथि लोक सुनावै जो बोलै सो न बीचारे ॥ सतसंगति मिलै त दिड़ता आवै हरि राम नामि निसतारे ॥३॥

जब लगु जीउ पिंडु है साबतु तब लगि किछु न समारे ॥ जब घर मंदरि आगि लगानी कढि कूपु कढै पनिहारे ॥४॥

साकत सिउ मन मेलु न करीअहु जिनि हरि हरि नामु बिसारे ॥ साकत बचन बिछूआ जिउ डसीऐ तजि साकत परै परारे ॥५॥

लगि लगि प्रीति बहु प्रीति लगाई लगि साधू संगि सवारे ॥ गुर के बचन सति सति करि माने मेरे ठाकुर बहुतु पिआरे ॥६॥

पूरबि जनमि परचून कमाए हरि हरि हरि नामि पिआरे ॥ गुर प्रसादि अम्रित रसु पाइआ रसु गावै रसु वीचारे ॥७॥

हरि हरि रूप रंग सभि तेरे मेरे लालन लाल गुलारे ॥ जैसा रंगु देहि सो होवै किआ नानक जंत विचारे ॥८॥३॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 982) नट महला ४ ॥
राम गुर सरनि प्रभू रखवारे ॥ जिउ कुंचरु तदूऐ पकरि चलाइओ करि ऊपरु कढि निसतारे ॥१॥ रहाउ ॥

प्रभ के सेवक बहुतु अति नीके मनि सरधा करि हरि धारे ॥ मेरे प्रभि सरधा भगति मनि भावै जन की पैज सवारे ॥१॥

हरि हरि सेवकु सेवा लागै सभु देखै ब्रहम पसारे ॥ एकु पुरखु इकु नदरी आवै सभ एका नदरि निहारे ॥२॥

हरि प्रभु ठाकुरु रविआ सभ ठाई सभु चेरी जगतु समारे ॥ आपि दइआलु दइआ दानु देवै विचि पाथर कीरे कारे ॥३॥

अंतरि वासु बहुतु मुसकाई भ्रमि भूला मिरगु सिंङ्हारे ॥ बनु बनु ढूढि ढूढि फिरि थाकी गुरि पूरै घरि निसतारे ॥४॥

बाणी गुरू गुरू है बाणी विचि बाणी अम्रितु सारे ॥ गुरु बाणी कहै सेवकु जनु मानै परतखि गुरू निसतारे ॥५॥

सभु है ब्रहमु ब्रहमु है पसरिआ मनि बीजिआ खावारे ॥ जिउ जन चंद्रहांसु दुखिआ ध्रिसटबुधी अपुना घरु लूकी जारे ॥६॥

प्रभ कउ जनु अंतरि रिद लोचै प्रभ जन के सास निहारे ॥ क्रिपा क्रिपा करि भगति द्रिड़ाए जन पीछै जगु निसतारे ॥७॥

आपन आपि आपि प्रभु ठाकुरु प्रभु आपे स्रिसटि सवारे ॥ जन नानक आपे आपि सभु वरतै करि क्रिपा आपि निसतारे ॥८॥४॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 982) नट महला ४ ॥
राम करि किरपा लेहु उबारे ॥ जिउ पकरि द्रोपती दुसटां आनी हरि हरि लाज निवारे ॥१॥ रहाउ ॥

करि किरपा जाचिक जन तेरे इकु मागउ दानु पिआरे ॥ सतिगुर की नित सरधा लागी मो कउ हरि गुरु मेलि सवारे ॥१॥

साकत करम पाणी जिउ मथीऐ नित पाणी झोल झुलारे ॥ मिलि सतसंगति परम पदु पाइआ कढि माखन के गटकारे ॥२॥

नित नित काइआ मजनु कीआ नित मलि मलि देह सवारे ॥ मेरे सतिगुर के मनि बचन न भाए सभ फोकट चार सीगारे ॥३॥

मटकि मटकि चलु सखी सहेली मेरे ठाकुर के गुन सारे ॥ गुरमुखि सेवा मेरे प्रभ भाई मै सतिगुर अलखु लखारे ॥४॥

नारी पुरखु पुरखु सभ नारी सभु एको पुरखु मुरारे ॥ संत जना की रेनु मनि भाई मिलि हरि जन हरि निसतारे ॥५॥

ग्राम ग्राम नगर सभ फिरिआ रिद अंतरि हरि जन भारे ॥ सरधा सरधा उपाइ मिलाए मो कउ हरि गुर गुरि निसतारे ॥६॥

पवन सूतु सभु नीका करिआ सतिगुरि सबदु वीचारे ॥ निज घरि जाइ अम्रित रसु पीआ बिनु नैना जगतु निहारे ॥७॥

तउ गुन ईस बरनि नही साकउ तुम मंदर हम निक कीरे ॥ नानक क्रिपा करहु गुर मेलहु मै रामु जपत मनु धीरे ॥८॥५॥

(राग नट नाराइन -- SGGS 983) नट महला ४ ॥
मेरे मन भजु ठाकुर अगम अपारे ॥ हम पापी बहु निरगुणीआरे करि किरपा गुरि निसतारे ॥१॥ रहाउ ॥

साधू पुरख साध जन पाए इक बिनउ करउ गुर पिआरे ॥ राम नामु धनु पूजी देवहु सभु तिसना भूख निवारे ॥१॥

पचै पतंगु म्रिग भ्रिंग कुंचर मीन इक इंद्री पकरि सघारे ॥ पंच भूत सबल है देही गुरु सतिगुरु पाप निवारे ॥२॥

सासत्र बेद सोधि सोधि देखे मुनि नारद बचन पुकारे ॥ राम नामु पड़हु गति पावहु सतसंगति गुरि निसतारे ॥३॥

प्रीतम प्रीति लगी प्रभ केरी जिव सूरजु कमलु निहारे ॥ मेर सुमेर मोरु बहु नाचै जब उनवै घन घनहारे ॥४॥

साकत कउ अम्रित बहु सिंचहु सभ डाल फूल बिसुकारे ॥ जिउ जिउ निवहि साकत नर सेती छेड़ि छेड़ि कढै बिखु खारे ॥५॥

संतन संत साध मिलि रहीऐ गुण बोलहि परउपकारे ॥ संतै संतु मिलै मनु बिगसै जिउ जल मिलि कमल सवारे ॥६॥

लोभ लहरि सभु सुआनु हलकु है हलकिओ सभहि बिगारे ॥ मेरे ठाकुर कै दीबानि खबरि होई गुरि गिआनु खड़गु लै मारे ॥७॥

राखु राखु राखु प्रभ मेरे मै राखहु किरपा धारे ॥ नानक मै धर अवर न काई मै सतिगुरु गुरु निसतारे ॥८॥६॥ छका १ ॥

(राग माली गउड़ा -- SGGS 984) रागु माली गउड़ा महला ४
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
अनिक जतन करि रहे हरि अंतु नाही पाइआ ॥ हरि अगम अगम अगाधि बोधि आदेसु हरि प्रभ राइआ ॥१॥ रहाउ ॥

कामु क्रोधु लोभु मोहु नित झगरते झगराइआ ॥ हम राखु राखु दीन तेरे हरि सरनि हरि प्रभ आइआ ॥१॥

सरणागती प्रभ पालते हरि भगति वछलु नाइआ ॥ प्रहिलादु जनु हरनाखि पकरिआ हरि राखि लीओ तराइआ ॥२॥

हरि चेति रे मन महलु पावण सभ दूख भंजनु राइआ ॥ भउ जनम मरन निवारि ठाकुर हरि गुरमती प्रभु पाइआ ॥३॥

हरि पतित पावन नामु सुआमी भउ भगत भंजनु गाइआ ॥ हरि हारु हरि उरि धारिओ जन नानक नामि समाइआ ॥४॥१॥

(राग माली गउड़ा -- SGGS 984) माली गउड़ा महला ४ ॥
जपि मन राम नामु सुखदाता ॥ सतसंगति मिलि हरि सादु आइआ गुरमुखि ब्रहमु पछाता ॥१॥ रहाउ ॥

वडभागी गुर दरसनु पाइआ गुरि मिलिऐ हरि प्रभु जाता ॥ दुरमति मैलु गई सभ नीकरि हरि अम्रिति हरि सरि नाता ॥१॥

धनु धनु साध जिन्ही हरि प्रभु पाइआ तिन्ह पूछउ हरि की बाता ॥ पाइ लगउ नित करउ जुदरीआ हरि मेलहु करमि बिधाता ॥२॥

लिलाट लिखे पाइआ गुरु साधू गुर बचनी मनु तनु राता ॥ हरि प्रभ आइ मिले सुखु पाइआ सभ किलविख पाप गवाता ॥३॥

राम रसाइणु जिन्ह गुरमति पाइआ तिन्ह की ऊतम बाता ॥ तिन की पंक पाईऐ वडभागी जन नानकु चरनि पराता ॥४॥२॥

(राग माली गउड़ा -- SGGS 985) माली गउड़ा महला ४ ॥
सभि सिध साधिक मुनि जना मनि भावनी हरि धिआइओ ॥ अपर्मपरो पारब्रहमु सुआमी हरि अलखु गुरू लखाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

हम नीच मधिम करम कीए नही चेतिओ हरि राइओ ॥ हरि आनि मेलिओ सतिगुरू खिनु बंध मुकति कराइओ ॥१॥

प्रभि मसतके धुरि लीखिआ गुरमती हरि लिव लाइओ ॥ पंच सबद दरगह बाजिआ हरि मिलिओ मंगलु गाइओ ॥२॥

पतित पावनु नामु नरहरि मंदभागीआं नही भाइओ ॥ ते गरभ जोनी गालीअहि जिउ लोनु जलहि गलाइओ ॥३॥

मति देहि हरि प्रभ अगम ठाकुर गुर चरन मनु मै लाइओ ॥ हरि राम नामै रहउ लागो जन नानक नामि समाइओ ॥४॥३॥

(राग माली गउड़ा -- SGGS 985) माली गउड़ा महला ४ ॥
मेरा मनु राम नामि रसि लागा ॥ कमल प्रगासु भइआ गुरु पाइआ हरि जपिओ भ्रमु भउ भागा ॥१॥ रहाउ ॥

भै भाइ भगति लागो मेरा हीअरा मनु सोइओ गुरमति जागा ॥ किलबिख खीन भए सांति आई हरि उर धारिओ वडभागा ॥१॥

मनमुखु रंगु कसु्मभु है कचूआ जिउ कुसम चारि दिन चागा ॥ खिन महि बिनसि जाइ परतापै डंडु धरम राइ का लागा ॥२॥

सतसंगति प्रीति साध अति गूड़ी जिउ रंगु मजीठ बहु लागा ॥ काइआ कापरु चीर बहु फारे हरि रंगु न लहै सभागा ॥३॥

हरि चार्हिओ रंगु मिलै गुरु सोभा हरि रंगि चलूलै रांगा ॥ जन नानकु तिन के चरन पखारै जो हरि चरनी जनु लागा ॥४॥४॥


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