गुरू रामदास जी - सलोक बाणी शब्द, Guru Ramdas ji (Mahalla 4) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग गूजरी -- SGGS 10) रागु गूजरी महला ४ ॥
हरि के जन सतिगुर सतपुरखा बिनउ करउ गुर पासि ॥ हम कीरे किरम सतिगुर सरणाई करि दइआ नामु परगासि ॥१॥

मेरे मीत गुरदेव मो कउ राम नामु परगासि ॥ गुरमति नामु मेरा प्रान सखाई हरि कीरति हमरी रहरासि ॥१॥ रहाउ ॥

हरि जन के वड भाग वडेरे जिन हरि हरि सरधा हरि पिआस ॥ हरि हरि नामु मिलै त्रिपतासहि मिलि संगति गुण परगासि ॥२॥

जिन हरि हरि हरि रसु नामु न पाइआ ते भागहीण जम पासि ॥ जो सतिगुर सरणि संगति नही आए ध्रिगु जीवे ध्रिगु जीवासि ॥३॥

जिन हरि जन सतिगुर संगति पाई तिन धुरि मसतकि लिखिआ लिखासि ॥ धनु धंनु सतसंगति जितु हरि रसु पाइआ मिलि जन नानक नामु परगासि ॥४॥४॥

(राग आसा -- SGGS 10) रागु आसा महला ४ सो पुरखु
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥ सभि धिआवहि सभि धिआवहि तुधु जी हरि सचे सिरजणहारा ॥ सभि जीअ तुमारे जी तूं जीआ का दातारा ॥ हरि धिआवहु संतहु जी सभि दूख विसारणहारा ॥ हरि आपे ठाकुरु हरि आपे सेवकु जी किआ नानक जंत विचारा ॥१॥

तूं घट घट अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समाणा ॥ इकि दाते इकि भेखारी जी सभि तेरे चोज विडाणा ॥ तूं आपे दाता आपे भुगता जी हउ तुधु बिनु अवरु न जाणा ॥ तूं पारब्रहमु बेअंतु बेअंतु जी तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥ जो सेवहि जो सेवहि तुधु जी जनु नानकु तिन कुरबाणा ॥२॥

हरि धिआवहि हरि धिआवहि तुधु जी से जन जुग महि सुखवासी ॥ से मुकतु से मुकतु भए जिन हरि धिआइआ जी तिन तूटी जम की फासी ॥ जिन निरभउ जिन हरि निरभउ धिआइआ जी तिन का भउ सभु गवासी ॥ जिन सेविआ जिन सेविआ मेरा हरि जी ते हरि हरि रूपि समासी ॥ से धंनु से धंनु जिन हरि धिआइआ जी जनु नानकु तिन बलि जासी ॥३॥

तेरी भगति तेरी भगति भंडार जी भरे बिअंत बेअंता ॥ तेरे भगत तेरे भगत सलाहनि तुधु जी हरि अनिक अनेक अनंता ॥ तेरी अनिक तेरी अनिक करहि हरि पूजा जी तपु तापहि जपहि बेअंता ॥ तेरे अनेक तेरे अनेक पड़हि बहु सिम्रिति सासत जी करि किरिआ खटु करम करंता ॥ से भगत से भगत भले जन नानक जी जो भावहि मेरे हरि भगवंता ॥४॥

तूं आदि पुरखु अपर्मपरु करता जी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥ तूं जुगु जुगु एको सदा सदा तूं एको जी तूं निहचलु करता सोई ॥ तुधु आपे भावै सोई वरतै जी तूं आपे करहि सु होई ॥ तुधु आपे स्रिसटि सभ उपाई जी तुधु आपे सिरजि सभ गोई ॥ जनु नानकु गुण गावै करते के जी जो सभसै का जाणोई ॥५॥१॥

(राग आसा -- SGGS 11) आसा महला ४ ॥
तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥ जो तउ भावै सोई थीसी जो तूं देहि सोई हउ पाई ॥१॥ रहाउ ॥

सभ तेरी तूं सभनी धिआइआ ॥ जिस नो क्रिपा करहि तिनि नाम रतनु पाइआ ॥ गुरमुखि लाधा मनमुखि गवाइआ ॥ तुधु आपि विछोड़िआ आपि मिलाइआ ॥१॥

तूं दरीआउ सभ तुझ ही माहि ॥ तुझ बिनु दूजा कोई नाहि ॥ जीअ जंत सभि तेरा खेलु ॥ विजोगि मिलि विछुड़िआ संजोगी मेलु ॥२॥

जिस नो तू जाणाइहि सोई जनु जाणै ॥ हरि गुण सद ही आखि वखाणै ॥ जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥ सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥३॥

तू आपे करता तेरा कीआ सभु होइ ॥ तुधु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥ तू करि करि वेखहि जाणहि सोइ ॥ जन नानक गुरमुखि परगटु होइ ॥४॥२॥

(राग गउड़ी पूरबी -- SGGS 13) रागु गउड़ी पूरबी महला ४ ॥
कामि करोधि नगरु बहु भरिआ मिलि साधू खंडल खंडा हे ॥ पूरबि लिखत लिखे गुरु पाइआ मनि हरि लिव मंडल मंडा हे ॥१॥

करि साधू अंजुली पुनु वडा हे ॥ करि डंडउत पुनु वडा हे ॥१॥ रहाउ ॥

साकत हरि रस सादु न जाणिआ तिन अंतरि हउमै कंडा हे ॥ जिउ जिउ चलहि चुभै दुखु पावहि जमकालु सहहि सिरि डंडा हे ॥२॥

हरि जन हरि हरि नामि समाणे दुखु जनम मरण भव खंडा हे ॥ अबिनासी पुरखु पाइआ परमेसरु बहु सोभ खंड ब्रहमंडा हे ॥३॥

हम गरीब मसकीन प्रभ तेरे हरि राखु राखु वड वडा हे ॥ जन नानक नामु अधारु टेक है हरि नामे ही सुखु मंडा हे ॥४॥४॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 39) सिरीरागु महला ४ घरु १ ॥
मै मनि तनि बिरहु अति अगला किउ प्रीतमु मिलै घरि आइ ॥ जा देखा प्रभु आपणा प्रभि देखिऐ दुखु जाइ ॥ जाइ पुछा तिन सजणा प्रभु कितु बिधि मिलै मिलाइ ॥१॥

मेरे सतिगुरा मै तुझ बिनु अवरु न कोइ ॥ हम मूरख मुगध सरणागती करि किरपा मेले हरि सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

सतिगुरु दाता हरि नाम का प्रभु आपि मिलावै सोइ ॥ सतिगुरि हरि प्रभु बुझिआ गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥ हउ गुर सरणाई ढहि पवा करि दइआ मेले प्रभु सोइ ॥२॥

मनहठि किनै न पाइआ करि उपाव थके सभु कोइ ॥ सहस सिआणप करि रहे मनि कोरै रंगु न होइ ॥ कूड़ि कपटि किनै न पाइओ जो बीजै खावै सोइ ॥३॥

सभना तेरी आस प्रभु सभ जीअ तेरे तूं रासि ॥ प्रभ तुधहु खाली को नही दरि गुरमुखा नो साबासि ॥ बिखु भउजल डुबदे कढि लै जन नानक की अरदासि ॥४॥१॥६५॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 40) सिरीरागु महला ४ ॥
नामु मिलै मनु त्रिपतीऐ बिनु नामै ध्रिगु जीवासु ॥ कोई गुरमुखि सजणु जे मिलै मै दसे प्रभु गुणतासु ॥ हउ तिसु विटहु चउ खंनीऐ मै नाम करे परगासु ॥१॥

मेरे प्रीतमा हउ जीवा नामु धिआइ ॥ बिनु नावै जीवणु ना थीऐ मेरे सतिगुर नामु द्रिड़ाइ ॥१॥ रहाउ ॥

नामु अमोलकु रतनु है पूरे सतिगुर पासि ॥ सतिगुर सेवै लगिआ कढि रतनु देवै परगासि ॥ धंनु वडभागी वड भागीआ जो आइ मिले गुर पासि ॥२॥

जिना सतिगुरु पुरखु न भेटिओ से भागहीण वसि काल ॥ ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि विचि विसटा करि विकराल ॥ ओना पासि दुआसि न भिटीऐ जिन अंतरि क्रोधु चंडाल ॥३॥

सतिगुरु पुरखु अम्रित सरु वडभागी नावहि आइ ॥ उन जनम जनम की मैलु उतरै निरमल नामु द्रिड़ाइ ॥ जन नानक उतम पदु पाइआ सतिगुर की लिव लाइ ॥४॥२॥६६॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 40) सिरीरागु महला ४ ॥
गुण गावा गुण विथरा गुण बोली मेरी माइ ॥ गुरमुखि सजणु गुणकारीआ मिलि सजण हरि गुण गाइ ॥ हीरै हीरु मिलि बेधिआ रंगि चलूलै नाइ ॥१॥

मेरे गोविंदा गुण गावा त्रिपति मनि होइ ॥ अंतरि पिआस हरि नाम की गुरु तुसि मिलावै सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

मनु रंगहु वडभागीहो गुरु तुठा करे पसाउ ॥ गुरु नामु द्रिड़ाए रंग सिउ हउ सतिगुर कै बलि जाउ ॥ बिनु सतिगुर हरि नामु न लभई लख कोटी करम कमाउ ॥२॥

बिनु भागा सतिगुरु ना मिलै घरि बैठिआ निकटि नित पासि ॥ अंतरि अगिआन दुखु भरमु है विचि पड़दा दूरि पईआसि ॥ बिनु सतिगुर भेटे कंचनु ना थीऐ मनमुखु लोहु बूडा बेड़ी पासि ॥३॥

सतिगुरु बोहिथु हरि नाव है कितु बिधि चड़िआ जाइ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै विचि बोहिथ बैठा आइ ॥ धंनु धंनु वडभागी नानका जिना सतिगुरु लए मिलाइ ॥४॥३॥६७॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 41) सिरीरागु महला ४ ॥
हउ पंथु दसाई नित खड़ी कोई प्रभु दसे तिनि जाउ ॥ जिनी मेरा पिआरा राविआ तिन पीछै लागि फिराउ ॥ करि मिंनति करि जोदड़ी मै प्रभु मिलणै का चाउ ॥१॥

मेरे भाई जना कोई मो कउ हरि प्रभु मेलि मिलाइ ॥ हउ सतिगुर विटहु वारिआ जिनि हरि प्रभु दीआ दिखाइ ॥१॥ रहाउ ॥

होइ निमाणी ढहि पवा पूरे सतिगुर पासि ॥ निमाणिआ गुरु माणु है गुरु सतिगुरु करे साबासि ॥ हउ गुरु सालाहि न रजऊ मै मेले हरि प्रभु पासि ॥२॥

सतिगुर नो सभ को लोचदा जेता जगतु सभु कोइ ॥ बिनु भागा दरसनु ना थीऐ भागहीण बहि रोइ ॥ जो हरि प्रभ भाणा सो थीआ धुरि लिखिआ न मेटै कोइ ॥३॥

आपे सतिगुरु आपि हरि आपे मेलि मिलाइ ॥ आपि दइआ करि मेलसी गुर सतिगुर पीछै पाइ ॥ सभु जगजीवनु जगि आपि है नानक जलु जलहि समाइ ॥४॥४॥६८॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 41) सिरीरागु महला ४ ॥
रसु अम्रितु नामु रसु अति भला कितु बिधि मिलै रसु खाइ ॥ जाइ पुछहु सोहागणी तुसा किउ करि मिलिआ प्रभु आइ ॥ ओइ वेपरवाह न बोलनी हउ मलि मलि धोवा तिन पाइ ॥१॥

भाई रे मिलि सजण हरि गुण सारि ॥ सजणु सतिगुरु पुरखु है दुखु कढै हउमै मारि ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमुखीआ सोहागणी तिन दइआ पई मनि आइ ॥ सतिगुर वचनु रतंनु है जो मंने सु हरि रसु खाइ ॥ से वडभागी वड जाणीअहि जिन हरि रसु खाधा गुर भाइ ॥२॥

इहु हरि रसु वणि तिणि सभतु है भागहीण नही खाइ ॥ बिनु सतिगुर पलै ना पवै मनमुख रहे बिललाइ ॥ ओइ सतिगुर आगै ना निवहि ओना अंतरि क्रोधु बलाइ ॥३॥

हरि हरि हरि रसु आपि है आपे हरि रसु होइ ॥ आपि दइआ करि देवसी गुरमुखि अम्रितु चोइ ॥ सभु तनु मनु हरिआ होइआ नानक हरि वसिआ मनि सोइ ॥४॥५॥६९॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 41) सिरीरागु महला ४ ॥
दिनसु चड़ै फिरि आथवै रैणि सबाई जाइ ॥ आव घटै नरु ना बुझै निति मूसा लाजु टुकाइ ॥ गुड़ु मिठा माइआ पसरिआ मनमुखु लगि माखी पचै पचाइ ॥१॥

भाई रे मै मीतु सखा प्रभु सोइ ॥ पुतु कलतु मोहु बिखु है अंति बेली कोइ न होइ ॥१॥ रहाउ ॥

गुरमति हरि लिव उबरे अलिपतु रहे सरणाइ ॥ ओनी चलणु सदा निहालिआ हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥ गुरमुखि दरगह मंनीअहि हरि आपि लए गलि लाइ ॥२॥

गुरमुखा नो पंथु परगटा दरि ठाक न कोई पाइ ॥ हरि नामु सलाहनि नामु मनि नामि रहनि लिव लाइ ॥ अनहद धुनी दरि वजदे दरि सचै सोभा पाइ ॥३॥

जिनी गुरमुखि नामु सलाहिआ तिना सभ को कहै साबासि ॥ तिन की संगति देहि प्रभ मै जाचिक की अरदासि ॥ नानक भाग वडे तिना गुरमुखा जिन अंतरि नामु परगासि ॥४॥३३॥३१॥६॥७०॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 76) सिरीरागु महला ४ ॥
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि पाइआ उदर मंझारि ॥ हरि धिआवै हरि उचरै वणजारिआ मित्रा हरि हरि नामु समारि ॥ हरि हरि नामु जपे आराधे विचि अगनी हरि जपि जीविआ ॥ बाहरि जनमु भइआ मुखि लागा सरसे पिता मात थीविआ ॥ जिस की वसतु तिसु चेतहु प्राणी करि हिरदै गुरमुखि बीचारि ॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै हरि जपीऐ किरपा धारि ॥१॥

दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लागा दूजै भाइ ॥ मेरा मेरा करि पालीऐ वणजारिआ मित्रा ले मात पिता गलि लाइ ॥ लावै मात पिता सदा गल सेती मनि जाणै खटि खवाए ॥ जो देवै तिसै न जाणै मूड़ा दिते नो लपटाए ॥ कोई गुरमुखि होवै सु करै वीचारु हरि धिआवै मनि लिव लाइ ॥ कहु नानक दूजै पहरै प्राणी तिसु कालु न कबहूं खाइ ॥२॥

तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लगा आलि जंजालि ॥ धनु चितवै धनु संचवै वणजारिआ मित्रा हरि नामा हरि न समालि ॥ हरि नामा हरि हरि कदे न समालै जि होवै अंति सखाई ॥ इहु धनु स्मपै माइआ झूठी अंति छोडि चलिआ पछुताई ॥ जिस नो किरपा करे गुरु मेले सो हरि हरि नामु समालि ॥ कहु नानक तीजै पहरै प्राणी से जाइ मिले हरि नालि ॥३॥

चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि चलण वेला आदी ॥ करि सेवहु पूरा सतिगुरू वणजारिआ मित्रा सभ चली रैणि विहादी ॥ हरि सेवहु खिनु खिनु ढिल मूलि न करिहु जितु असथिरु जुगु जुगु होवहु ॥ हरि सेती सद माणहु रलीआ जनम मरण दुख खोवहु ॥ गुर सतिगुर सुआमी भेदु न जाणहु जितु मिलि हरि भगति सुखांदी ॥ कहु नानक प्राणी चउथै पहरै सफलिओ रैणि भगता दी ॥४॥१॥३॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 78) सिरीरागु महला ४ घरु २ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुंध इआणी पेईअड़ै किउ करि हरि दरसनु पिखै ॥ हरि हरि अपनी किरपा करे गुरमुखि साहुरड़ै कम सिखै ॥ साहुरड़ै कम सिखै गुरमुखि हरि हरि सदा धिआए ॥ सहीआ विचि फिरै सुहेली हरि दरगह बाह लुडाए ॥ लेखा धरम राइ की बाकी जपि हरि हरि नामु किरखै ॥ मुंध इआणी पेईअड़ै गुरमुखि हरि दरसनु दिखै ॥१॥

वीआहु होआ मेरे बाबुला गुरमुखे हरि पाइआ ॥ अगिआनु अंधेरा कटिआ गुर गिआनु प्रचंडु बलाइआ ॥ बलिआ गुर गिआनु अंधेरा बिनसिआ हरि रतनु पदारथु लाधा ॥ हउमै रोगु गइआ दुखु लाथा आपु आपै गुरमति खाधा ॥ अकाल मूरति वरु पाइआ अबिनासी ना कदे मरै न जाइआ ॥ वीआहु होआ मेरे बाबोला गुरमुखे हरि पाइआ ॥२॥

हरि सति सते मेरे बाबुला हरि जन मिलि जंञ सुहंदी ॥ पेवकड़ै हरि जपि सुहेली विचि साहुरड़ै खरी सोहंदी ॥ साहुरड़ै विचि खरी सोहंदी जिनि पेवकड़ै नामु समालिआ ॥ सभु सफलिओ जनमु तिना दा गुरमुखि जिना मनु जिणि पासा ढालिआ ॥ हरि संत जना मिलि कारजु सोहिआ वरु पाइआ पुरखु अनंदी ॥ हरि सति सति मेरे बाबोला हरि जन मिलि जंञ सोहंदी ॥३॥

हरि प्रभु मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मै दाजो ॥ हरि कपड़ो हरि सोभा देवहु जितु सवरै मेरा काजो ॥ हरि हरि भगती काजु सुहेला गुरि सतिगुरि दानु दिवाइआ ॥ खंडि वरभंडि हरि सोभा होई इहु दानु न रलै रलाइआ ॥ होरि मनमुख दाजु जि रखि दिखालहि सु कूड़ु अहंकारु कचु पाजो ॥ हरि प्रभ मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मै दाजो ॥४॥

हरि राम राम मेरे बाबोला पिर मिलि धन वेल वधंदी ॥ हरि जुगह जुगो जुग जुगह जुगो सद पीड़ी गुरू चलंदी ॥ जुगि जुगि पीड़ी चलै सतिगुर की जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ ॥ हरि पुरखु न कब ही बिनसै जावै नित देवै चड़ै सवाइआ ॥ नानक संत संत हरि एको जपि हरि हरि नामु सोहंदी ॥ हरि राम राम मेरे बाबुला पिर मिलि धन वेल वधंदी ॥५॥१॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 81) सिरीरागु महला ४ वणजारा
ੴ सतिनामु गुरप्रसादि ॥
हरि हरि उतमु नामु है जिनि सिरिआ सभु कोइ जीउ ॥ हरि जीअ सभे प्रतिपालदा घटि घटि रमईआ सोइ ॥ सो हरि सदा धिआईऐ तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ जो मोहि माइआ चितु लाइदे से छोडि चले दुखु रोइ ॥ जन नानक नामु धिआइआ हरि अंति सखाई होइ ॥१॥

मै हरि बिनु अवरु न कोइ ॥ हरि गुर सरणाई पाईऐ वणजारिआ मित्रा वडभागि परापति होइ ॥१॥ रहाउ ॥

संत जना विणु भाईआ हरि किनै न पाइआ नाउ ॥ विचि हउमै करम कमावदे जिउ वेसुआ पुतु निनाउ ॥ पिता जाति ता होईऐ गुरु तुठा करे पसाउ ॥ वडभागी गुरु पाइआ हरि अहिनिसि लगा भाउ ॥ जन नानकि ब्रहमु पछाणिआ हरि कीरति करम कमाउ ॥२॥

मनि हरि हरि लगा चाउ ॥ गुरि पूरै नामु द्रिड़ाइआ हरि मिलिआ हरि प्रभ नाउ ॥१॥ रहाउ ॥

जब लगु जोबनि सासु है तब लगु नामु धिआइ ॥ चलदिआ नालि हरि चलसी हरि अंते लए छडाइ ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जिन हरि मनि वुठा आइ ॥ जिनी हरि हरि नामु न चेतिओ से अंति गए पछुताइ ॥ धुरि मसतकि हरि प्रभि लिखिआ जन नानक नामु धिआइ ॥३॥

मन हरि हरि प्रीति लगाइ ॥ वडभागी गुरु पाइआ गुर सबदी पारि लघाइ ॥१॥ रहाउ ॥

हरि आपे आपु उपाइदा हरि आपे देवै लेइ ॥ हरि आपे भरमि भुलाइदा हरि आपे ही मति देइ ॥ गुरमुखा मनि परगासु है से विरले केई केइ ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जिन हरि पाइआ गुरमते ॥ जन नानकि कमलु परगासिआ मनि हरि हरि वुठड़ा हे ॥४॥

मनि हरि हरि जपनु करे ॥ हरि गुर सरणाई भजि पउ जिंदू सभ किलविख दुख परहरे ॥१॥ रहाउ ॥

घटि घटि रमईआ मनि वसै किउ पाईऐ कितु भति ॥ गुरु पूरा सतिगुरु भेटीऐ हरि आइ वसै मनि चिति ॥ मै धर नामु अधारु है हरि नामै ते गति मति ॥ मै हरि हरि नामु विसाहु है हरि नामे ही जति पति ॥ जन नानक नामु धिआइआ रंगि रतड़ा हरि रंगि रति ॥५॥

हरि धिआवहु हरि प्रभु सति ॥ गुर बचनी हरि प्रभु जाणिआ सभ हरि प्रभु ते उतपति ॥१॥ रहाउ ॥

जिन कउ पूरबि लिखिआ से आइ मिले गुर पासि ॥ सेवक भाइ वणजारिआ मित्रा गुरु हरि हरि नामु प्रगासि ॥ धनु धनु वणजु वापारीआ जिन वखरु लदिअड़ा हरि रासि ॥ गुरमुखा दरि मुख उजले से आइ मिले हरि पासि ॥ जन नानक गुरु तिन पाइआ जिना आपि तुठा गुणतासि ॥६॥

हरि धिआवहु सासि गिरासि ॥ मनि प्रीति लगी तिना गुरमुखा हरि नामु जिना रहरासि ॥१॥ रहाउ ॥१॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 83) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिरीराग की वार महला ४ सलोका नालि ॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 83) पउड़ी ॥
हरि इको करता इकु इको दीबाणु हरि ॥ हरि इकसै दा है अमरु इको हरि चिति धरि ॥ हरि तिसु बिनु कोई नाहि डरु भ्रमु भउ दूरि करि ॥ हरि तिसै नो सालाहि जि तुधु रखै बाहरि घरि ॥ हरि जिस नो होइ दइआलु सो हरि जपि भउ बिखमु तरि ॥१॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 83) पउड़ी ॥
सभ आपे तुधु उपाइ कै आपि कारै लाई ॥ तूं आपे वेखि विगसदा आपणी वडिआई ॥ हरि तुधहु बाहरि किछु नाही तूं सचा साई ॥ तूं आपे आपि वरतदा सभनी ही थाई ॥ हरि तिसै धिआवहु संत जनहु जो लए छडाई ॥२॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 83) पउड़ी ॥
तुधु आपे धरती साजीऐ चंदु सूरजु दुइ दीवे ॥ दस चारि हट तुधु साजिआ वापारु करीवे ॥ इकना नो हरि लाभु देइ जो गुरमुखि थीवे ॥ तिन जमकालु न विआपई जिन सचु अम्रितु पीवे ॥ ओइ आपि छुटे परवार सिउ तिन पिछै सभु जगतु छुटीवे ॥३॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 84) पउड़ी ॥
सपत दीप सपत सागरा नव खंड चारि वेद दस असट पुराणा ॥ हरि सभना विचि तूं वरतदा हरि सभना भाणा ॥ सभि तुझै धिआवहि जीअ जंत हरि सारग पाणा ॥ जो गुरमुखि हरि आराधदे तिन हउ कुरबाणा ॥ तूं आपे आपि वरतदा करि चोज विडाणा ॥४॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 84) पउड़ी ॥
हरि अंदरि बाहरि इकु तूं तूं जाणहि भेतु ॥ जो कीचै सो हरि जाणदा मेरे मन हरि चेतु ॥ सो डरै जि पाप कमावदा धरमी विगसेतु ॥ तूं सचा आपि निआउ सचु ता डरीऐ केतु ॥ जिना नानक सचु पछाणिआ से सचि रलेतु ॥५॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 84) पउड़ी ॥
हरि की वडिआई वडी है हरि कीरतनु हरि का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा निआउ है धरम का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा फलु है जीअ का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा न सुणई कहिआ चुगल का ॥ हरि की वडिआई वडी है अपुछिआ दानु देवका ॥६॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 85) पउड़ी ॥
तूं आपे जलु मीना है आपे आपे ही आपि जालु ॥ तूं आपे जालु वताइदा आपे विचि सेबालु ॥ तूं आपे कमलु अलिपतु है सै हथा विचि गुलालु ॥ तूं आपे मुकति कराइदा इक निमख घड़ी करि खिआलु ॥ हरि तुधहु बाहरि किछु नही गुर सबदी वेखि निहालु ॥७॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 85) पउड़ी ॥
सिसटि उपाई सभ तुधु आपे रिजकु स्मबाहिआ ॥ इकि वलु छलु करि कै खावदे मुहहु कूड़ु कुसतु तिनी ढाहिआ ॥ तुधु आपे भावै सो करहि तुधु ओतै कमि ओइ लाइआ ॥ इकना सचु बुझाइओनु तिना अतुट भंडार देवाइआ ॥ हरि चेति खाहि तिना सफलु है अचेता हथ तडाइआ ॥८॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 86) पउड़ी ॥
सभु को तेरा तूं सभसु दा तूं सभना रासि ॥ सभि तुधै पासहु मंगदे नित करि अरदासि ॥ जिसु तूं देहि तिसु सभु किछु मिलै इकना दूरि है पासि ॥ तुधु बाझहु थाउ को नाही जिसु पासहु मंगीऐ मनि वेखहु को निरजासि ॥ सभि तुधै नो सालाहदे दरि गुरमुखा नो परगासि ॥९॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 86) पउड़ी ॥
हरि की सेवा सफल है गुरमुखि पावै थाइ ॥ जिसु हरि भावै तिसु गुरु मिलै सो हरि नामु धिआइ ॥ गुर सबदी हरि पाईऐ हरि पारि लघाइ ॥ मनहठि किनै न पाइओ पुछहु वेदा जाइ ॥ नानक हरि की सेवा सो करे जिसु लए हरि लाइ ॥१०॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 87) पउड़ी ॥
जो मिलिआ हरि दीबाण सिउ सो सभनी दीबाणी मिलिआ ॥ जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु सुरखरू उस कै मुहि डिठै सभ पापी तरिआ ॥ ओसु अंतरि नामु निधानु है नामो परवरिआ ॥ नाउ पूजीऐ नाउ मंनीऐ नाइ किलविख सभ हिरिआ ॥ जिनी नामु धिआइआ इक मनि इक चिति से असथिरु जगि रहिआ ॥११॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 87) पउड़ी ॥
हरि के संत सुणहु जन भाई हरि सतिगुर की इक साखी ॥ जिसु धुरि भागु होवै मुखि मसतकि तिनि जनि लै हिरदै राखी ॥ हरि अम्रित कथा सरेसट ऊतम गुर बचनी सहजे चाखी ॥ तह भइआ प्रगासु मिटिआ अंधिआरा जिउ सूरज रैणि किराखी ॥ अदिसटु अगोचरु अलखु निरंजनु सो देखिआ गुरमुखि आखी ॥१२॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 88) पउड़ी ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सदा सुखु होवै दिनु राती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सिमरत सभि किलविख पाप लहाती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु दालदु दुख भुख सभ लहि जाती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे मुखि गुरमुखि प्रीति लगाती ॥ जितु मुखि भागु लिखिआ धुरि साचै हरि तितु मुखि नामु जपाती ॥१३॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 88) पउड़ी ॥
सतिगुरु जिनी धिआइआ से कड़ि न सवाही ॥ सतिगुरु जिनी धिआइआ से त्रिपति अघाही ॥ सतिगुरु जिनी धिआइआ तिन जम डरु नाही ॥ जिन कउ होआ क्रिपालु हरि से सतिगुर पैरी पाही ॥ तिन ऐथै ओथै मुख उजले हरि दरगह पैधे जाही ॥१४॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 89) पउड़ी ॥
सो ऐसा हरि नामु धिआईऐ मन मेरे जो सभना उपरि हुकमु चलाए ॥ सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जो अंती अउसरि लए छडाए ॥ सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जु मन की त्रिसना सभ भुख गवाए ॥ सो गुरमुखि नामु जपिआ वडभागी तिन निंदक दुसट सभि पैरी पाए ॥ नानक नामु अराधि सभना ते वडा सभि नावै अगै आणि निवाए ॥१५॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 89) पउड़ी ॥
हरि जलि थलि महीअलि भरपूरि दूजा नाहि कोइ ॥ हरि आपि बहि करे निआउ कूड़िआर सभ मारि कढोइ ॥ सचिआरा देइ वडिआई हरि धरम निआउ कीओइ ॥ सभ हरि की करहु उसतति जिनि गरीब अनाथ राखि लीओइ ॥ जैकारु कीओ धरमीआ का पापी कउ डंडु दीओइ ॥१६॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 90) पउड़ी ॥
हरि तेरी सभ करहि उसतति जिनि फाथे काढिआ ॥ हरि तुधनो करहि सभ नमसकारु जिनि पापै ते राखिआ ॥ हरि निमाणिआ तूं माणु हरि डाढी हूं तूं डाढिआ ॥ हरि अहंकारीआ मारि निवाए मनमुख मूड़ साधिआ ॥ हरि भगता देइ वडिआई गरीब अनाथिआ ॥१७॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 90) पउड़ी ॥
हरि की भगता परतीति हरि सभ किछु जाणदा ॥ हरि जेवडु नाही कोई जाणु हरि धरमु बीचारदा ॥ काड़ा अंदेसा किउ कीजै जा नाही अधरमि मारदा ॥ सचा साहिबु सचु निआउ पापी नरु हारदा ॥ सालाहिहु भगतहु कर जोड़ि हरि भगत जन तारदा ॥१८॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 90) पउड़ी ॥
हरि आपणी भगति कराइ वडिआई वेखालीअनु ॥ आपणी आपि करे परतीति आपे सेव घालीअनु ॥ हरि भगता नो देइ अनंदु थिरु घरी बहालिअनु ॥ पापीआ नो न देई थिरु रहणि चुणि नरक घोरि चालिअनु ॥ हरि भगता नो देइ पिआरु करि अंगु निसतारिअनु ॥१९॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 91) पउड़ी ॥
कीता लोड़ीऐ कमु सु हरि पहि आखीऐ ॥ कारजु देइ सवारि सतिगुर सचु साखीऐ ॥ संता संगि निधानु अम्रितु चाखीऐ ॥ भै भंजन मिहरवान दास की राखीऐ ॥ नानक हरि गुण गाइ अलखु प्रभु लाखीऐ ॥२०॥

(राग सिरीरागु -- SGGS 91) पउड़ी ॥
हउ ढाढी हरि प्रभ खसम का हरि कै दरि आइआ ॥ हरि अंदरि सुणी पूकार ढाढी मुखि लाइआ ॥ हरि पुछिआ ढाढी सदि कै कितु अरथि तूं आइआ ॥ नित देवहु दानु दइआल प्रभ हरि नामु धिआइआ ॥ हरि दातै हरि नामु जपाइआ नानकु पैनाइआ ॥२१॥१॥ सुधु

(राग माझ -- SGGS 94) रागु माझ चउपदे घरु १ महला ४
ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
हरि हरि नामु मै हरि मनि भाइआ ॥ वडभागी हरि नामु धिआइआ ॥ गुरि पूरै हरि नाम सिधि पाई को विरला गुरमति चलै जीउ ॥१॥

मै हरि हरि खरचु लइआ बंनि पलै ॥ मेरा प्राण सखाई सदा नालि चलै ॥ गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ हरि निहचलु हरि धनु पलै जीउ ॥२॥

हरि हरि सजणु मेरा प्रीतमु राइआ ॥ कोई आणि मिलावै मेरे प्राण जीवाइआ ॥ हउ रहि न सका बिनु देखे प्रीतमा मै नीरु वहे वहि चलै जीउ ॥३॥

सतिगुरु मित्रु मेरा बाल सखाई ॥ हउ रहि न सका बिनु देखे मेरी माई ॥ हरि जीउ क्रिपा करहु गुरु मेलहु जन नानक हरि धनु पलै जीउ ॥४॥१॥

(राग माझ -- SGGS 94) माझ महला ४ ॥
मधुसूदन मेरे मन तन प्राना ॥ हउ हरि बिनु दूजा अवरु न जाना ॥ कोई सजणु संतु मिलै वडभागी मै हरि प्रभु पिआरा दसै जीउ ॥१॥

हउ मनु तनु खोजी भालि भालाई ॥ किउ पिआरा प्रीतमु मिलै मेरी माई ॥ मिलि सतसंगति खोजु दसाई विचि संगति हरि प्रभु वसै जीउ ॥२॥

मेरा पिआरा प्रीतमु सतिगुरु रखवाला ॥ हम बारिक दीन करहु प्रतिपाला ॥ मेरा मात पिता गुरु सतिगुरु पूरा गुर जल मिलि कमलु विगसै जीउ ॥३॥

मै बिनु गुर देखे नीद न आवै ॥ मेरे मन तनि वेदन गुर बिरहु लगावै ॥ हरि हरि दइआ करहु गुरु मेलहु जन नानक गुर मिलि रहसै जीउ ॥४॥२॥

(राग माझ -- SGGS 95) माझ महला ४ ॥
हरि गुण पड़ीऐ हरि गुण गुणीऐ ॥ हरि हरि नाम कथा नित सुणीऐ ॥ मिलि सतसंगति हरि गुण गाए जगु भउजलु दुतरु तरीऐ जीउ ॥१॥

आउ सखी हरि मेलु करेहा ॥ मेरे प्रीतम का मै देइ सनेहा ॥ मेरा मित्रु सखा सो प्रीतमु भाई मै दसे हरि नरहरीऐ जीउ ॥२॥

मेरी बेदन हरि गुरु पूरा जाणै ॥ हउ रहि न सका बिनु नाम वखाणे ॥ मै अउखधु मंत्रु दीजै गुर पूरे मै हरि हरि नामि उधरीऐ जीउ ॥३॥

हम चात्रिक दीन सतिगुर सरणाई ॥ हरि हरि नामु बूंद मुखि पाई ॥ हरि जलनिधि हम जल के मीने जन नानक जल बिनु मरीऐ जीउ ॥४॥३॥

(राग माझ -- SGGS 95) माझ महला ४ ॥
हरि जन संत मिलहु मेरे भाई ॥ मेरा हरि प्रभु दसहु मै भुख लगाई ॥ मेरी सरधा पूरि जगजीवन दाते मिलि हरि दरसनि मनु भीजै जीउ ॥१॥

मिलि सतसंगि बोली हरि बाणी ॥ हरि हरि कथा मेरै मनि भाणी ॥ हरि हरि अम्रितु हरि मनि भावै मिलि सतिगुर अम्रितु पीजै जीउ ॥२॥

वडभागी हरि संगति पावहि ॥ भागहीन भ्रमि चोटा खावहि ॥ बिनु भागा सतसंगु न लभै बिनु संगति मैलु भरीजै जीउ ॥३॥

मै आइ मिलहु जगजीवन पिआरे ॥ हरि हरि नामु दइआ मनि धारे ॥ गुरमति नामु मीठा मनि भाइआ जन नानक नामि मनु भीजै जीउ ॥४॥४॥


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