Pt 13 - गुरू नानक देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 13 - Guru Nanak Dev ji (Mahalla 1) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग सूही -- SGGS 790) मः १ ॥
बांगा बुरगू सिंङीआ नाले मिली कलाण ॥ इकि दाते इकि मंगते नामु तेरा परवाणु ॥ नानक जिन्ही सुणि कै मंनिआ हउ तिना विटहु कुरबाणु ॥२॥

(राग सूही -- SGGS 790) सलोक मः १ ॥
सतिगुर भीखिआ देहि मै तूं सम्रथु दातारु ॥ हउमै गरबु निवारीऐ कामु क्रोधु अहंकारु ॥ लबु लोभु परजालीऐ नामु मिलै आधारु ॥ अहिनिसि नवतन निरमला मैला कबहूं न होइ ॥ नानक इह बिधि छुटीऐ नदरि तेरी सुखु होइ ॥१॥

(राग सूही -- SGGS 790) मः १ ॥
इको कंतु सबाईआ जिती दरि खड़ीआह ॥ नानक कंतै रतीआ पुछहि बातड़ीआह ॥२॥

(राग सूही -- SGGS 790) मः १ ॥
सभे कंतै रतीआ मै दोहागणि कितु ॥ मै तनि अवगण एतड़े खसमु न फेरे चितु ॥३॥

(राग सूही -- SGGS 790) मः १ ॥
हउ बलिहारी तिन कउ सिफति जिना दै वाति ॥ सभि राती सोहागणी इक मै दोहागणि राति ॥४॥

(राग सूही -- SGGS 790) सलोक मः १ ॥
जिनी न पाइओ प्रेम रसु कंत न पाइओ साउ ॥ सुंञे घर का पाहुणा जिउ आइआ तिउ जाउ ॥१॥

(राग सूही -- SGGS 790) मः १ ॥
सउ ओलाम्हे दिनै के राती मिलन्हि सहंस ॥ सिफति सलाहणु छडि कै करंगी लगा हंसु ॥ फिटु इवेहा जीविआ जितु खाइ वधाइआ पेटु ॥ नानक सचे नाम विणु सभो दुसमनु हेतु ॥२॥

(राग सूही -- SGGS 791) सलोक मः १ ॥
दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥ बेद पाठ मति पापा खाइ ॥ उगवै सूरु न जापै चंदु ॥ जह गिआन प्रगासु अगिआनु मिटंतु ॥ बेद पाठ संसार की कार ॥ पड़्हि पड़्हि पंडित करहि बीचार ॥ बिनु बूझे सभ होइ खुआर ॥ नानक गुरमुखि उतरसि पारि ॥१॥

(राग सूही -- SGGS 791) मः १ ॥
सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥ रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥ नानक पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥२॥

(राग सूही -- SGGS 791) सलोक मः १ ॥
काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥ एनी फुली रउ करे अवर कि चुणीअहि डाल ॥१॥

(राग सूही -- SGGS 791) सलोक मः १ ॥
पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥ जितु मउलिऐ सभ मउलीऐ तिसहि न मउलिहु कोइ ॥१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 795) ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु बिलावलु महला १ चउपदे घरु १ ॥
तू सुलतानु कहा हउ मीआ तेरी कवन वडाई ॥ जो तू देहि सु कहा सुआमी मै मूरख कहणु न जाई ॥१॥

तेरे गुण गावा देहि बुझाई ॥ जैसे सच महि रहउ रजाई ॥१॥ रहाउ ॥

जो किछु होआ सभु किछु तुझ ते तेरी सभ असनाई ॥ तेरा अंतु न जाणा मेरे साहिब मै अंधुले किआ चतुराई ॥२॥

किआ हउ कथी कथे कथि देखा मै अकथु न कथना जाई ॥ जो तुधु भावै सोई आखा तिलु तेरी वडिआई ॥३॥

एते कूकर हउ बेगाना भउका इसु तन ताई ॥ भगति हीणु नानकु जे होइगा ता खसमै नाउ न जाई ॥४॥१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 795) बिलावलु महला १ ॥
मनु मंदरु तनु वेस कलंदरु घट ही तीरथि नावा ॥ एकु सबदु मेरै प्रानि बसतु है बाहुड़ि जनमि न आवा ॥१॥

मनु बेधिआ दइआल सेती मेरी माई ॥ कउणु जाणै पीर पराई ॥ हम नाही चिंत पराई ॥१॥ रहाउ ॥

अगम अगोचर अलख अपारा चिंता करहु हमारी ॥ जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा घटि घटि जोति तुम्हारी ॥२॥

सिख मति सभ बुधि तुम्हारी मंदिर छावा तेरे ॥ तुझ बिनु अवरु न जाणा मेरे साहिबा गुण गावा नित तेरे ॥३॥

जीअ जंत सभि सरणि तुम्हारी सरब चिंत तुधु पासे ॥ जो तुधु भावै सोई चंगा इक नानक की अरदासे ॥४॥२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 795) बिलावलु महला १ ॥
आपे सबदु आपे नीसानु ॥ आपे सुरता आपे जानु ॥ आपे करि करि वेखै ताणु ॥ तू दाता नामु परवाणु ॥१॥

ऐसा नामु निरंजन देउ ॥ हउ जाचिकु तू अलख अभेउ ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ मोहु धरकटी नारि ॥ भूंडी कामणि कामणिआरि ॥ राजु रूपु झूठा दिन चारि ॥ नामु मिलै चानणु अंधिआरि ॥२॥

चखि छोडी सहसा नही कोइ ॥ बापु दिसै वेजाति न होइ ॥ एके कउ नाही भउ कोइ ॥ करता करे करावै सोइ ॥३॥

सबदि मुए मनु मन ते मारिआ ॥ ठाकि रहे मनु साचै धारिआ ॥ अवरु न सूझै गुर कउ वारिआ ॥ नानक नामि रते निसतारिआ ॥४॥३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 796) बिलावलु महला १ ॥
गुर बचनी मनु सहज धिआने ॥ हरि कै रंगि रता मनु माने ॥ मनमुख भरमि भुले बउराने ॥ हरि बिनु किउ रहीऐ गुर सबदि पछाने ॥१॥

बिनु दरसन कैसे जीवउ मेरी माई ॥ हरि बिनु जीअरा रहि न सकै खिनु सतिगुरि बूझ बुझाई ॥१॥ रहाउ ॥

मेरा प्रभु बिसरै हउ मरउ दुखाली ॥ सासि गिरासि जपउ अपुने हरि भाली ॥ सद बैरागनि हरि नामु निहाली ॥ अब जाने गुरमुखि हरि नाली ॥२॥

अकथ कथा कहीऐ गुर भाइ ॥ प्रभु अगम अगोचरु देइ दिखाइ ॥ बिनु गुर करणी किआ कार कमाइ ॥ हउमै मेटि चलै गुर सबदि समाइ ॥३॥

मनमुखु विछुड़ै खोटी रासि ॥ गुरमुखि नामि मिलै साबासि ॥ हरि किरपा धारी दासनि दास ॥ जन नानक हरि नाम धनु रासि ॥४॥४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 831) बिलावलु असटपदीआ महला १ घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
निकटि वसै देखै सभु सोई ॥ गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥ विणु भै पइऐ भगति न होई ॥ सबदि रते सदा सुखु होई ॥१॥

ऐसा गिआनु पदारथु नामु ॥ गुरमुखि पावसि रसि रसि मानु ॥१॥ रहाउ ॥

गिआनु गिआनु कथै सभु कोई ॥ कथि कथि बादु करे दुखु होई ॥ कथि कहणै ते रहै न कोई ॥ बिनु रस राते मुकति न होई ॥२॥

गिआनु धिआनु सभु गुर ते होई ॥ साची रहत साचा मनि सोई ॥ मनमुख कथनी है परु रहत न होई ॥ नावहु भूले थाउ न कोई ॥३॥

मनु माइआ बंधिओ सर जालि ॥ घटि घटि बिआपि रहिओ बिखु नालि ॥ जो आंजै सो दीसै कालि ॥ कारजु सीधो रिदै सम्हालि ॥४॥

सो गिआनी जिनि सबदि लिव लाई ॥ मनमुखि हउमै पति गवाई ॥ आपे करतै भगति कराई ॥ गुरमुखि आपे दे वडिआई ॥५॥

रैणि अंधारी निरमल जोति ॥ नाम बिना झूठे कुचल कछोति ॥ बेदु पुकारै भगति सरोति ॥ सुणि सुणि मानै वेखै जोति ॥६॥

सासत्र सिम्रिति नामु द्रिड़ामं ॥ गुरमुखि सांति ऊतम करामं ॥ मनमुखि जोनी दूख सहामं ॥ बंधन तूटे इकु नामु वसामं ॥७॥

मंने नामु सची पति पूजा ॥ किसु वेखा नाही को दूजा ॥ देखि कहउ भावै मनि सोइ ॥ नानकु कहै अवरु नही कोइ ॥८॥१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 832) बिलावलु महला १ ॥
मन का कहिआ मनसा करै ॥ इहु मनु पुंनु पापु उचरै ॥ माइआ मदि माते त्रिपति न आवै ॥ त्रिपति मुकति मनि साचा भावै ॥१॥

तनु धनु कलतु सभु देखु अभिमाना ॥ बिनु नावै किछु संगि न जाना ॥१॥ रहाउ ॥

कीचहि रस भोग खुसीआ मन केरी ॥ धनु लोकां तनु भसमै ढेरी ॥ खाकू खाकु रलै सभु फैलु ॥ बिनु सबदै नही उतरै मैलु ॥२॥

गीत राग घन ताल सि कूरे ॥ त्रिहु गुण उपजै बिनसै दूरे ॥ दूजी दुरमति दरदु न जाइ ॥ छूटै गुरमुखि दारू गुण गाइ ॥३॥

धोती ऊजल तिलकु गलि माला ॥ अंतरि क्रोधु पड़हि नाट साला ॥ नामु विसारि माइआ मदु पीआ ॥ बिनु गुर भगति नाही सुखु थीआ ॥४॥

सूकर सुआन गरधभ मंजारा ॥ पसू मलेछ नीच चंडाला ॥ गुर ते मुहु फेरे तिन्ह जोनि भवाईऐ ॥ बंधनि बाधिआ आईऐ जाईऐ ॥५॥

गुर सेवा ते लहै पदारथु ॥ हिरदै नामु सदा किरतारथु ॥ साची दरगह पूछ न होइ ॥ माने हुकमु सीझै दरि सोइ ॥६॥

सतिगुरु मिलै त तिस कउ जाणै ॥ रहै रजाई हुकमु पछाणै ॥ हुकमु पछाणि सचै दरि वासु ॥ काल बिकाल सबदि भए नासु ॥७॥

रहै अतीतु जाणै सभु तिस का ॥ तनु मनु अरपै है इहु जिस का ॥ ना ओहु आवै ना ओहु जाइ ॥ नानक साचे साचि समाइ ॥८॥२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 838) बिलावलु महला १ थिती घरु १० जति
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एकम एकंकारु निराला ॥ अमरु अजोनी जाति न जाला ॥ अगम अगोचरु रूपु न रेखिआ ॥ खोजत खोजत घटि घटि देखिआ ॥ जो देखि दिखावै तिस कउ बलि जाई ॥ गुर परसादि परम पदु पाई ॥१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 839) किआ जपु जापउ बिनु जगदीसै ॥ गुर कै सबदि महलु घरु दीसै ॥१॥ रहाउ ॥

दूजै भाइ लगे पछुताणे ॥ जम दरि बाधे आवण जाणे ॥ किआ लै आवहि किआ ले जाहि ॥ सिरि जमकालु सि चोटा खाहि ॥ बिनु गुर सबद न छूटसि कोइ ॥ पाखंडि कीन्है मुकति न होइ ॥२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 839) आपे सचु कीआ कर जोड़ि ॥ अंडज फोड़ि जोड़ि विछोड़ि ॥ धरति अकासु कीए बैसण कउ थाउ ॥ राति दिनंतु कीए भउ भाउ ॥ जिनि कीए करि वेखणहारा ॥ अवरु न दूजा सिरजणहारा ॥३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 839) त्रितीआ ब्रहमा बिसनु महेसा ॥ देवी देव उपाए वेसा ॥ जोती जाती गणत न आवै ॥ जिनि साजी सो कीमति पावै ॥ कीमति पाइ रहिआ भरपूरि ॥ किसु नेड़ै किसु आखा दूरि ॥४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 839) चउथि उपाए चारे बेदा ॥ खाणी चारे बाणी भेदा ॥ असट दसा खटु तीनि उपाए ॥ सो बूझै जिसु आपि बुझाए ॥ तीनि समावै चउथै वासा ॥ प्रणवति नानक हम ता के दासा ॥५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 839) पंचमी पंच भूत बेताला ॥ आपि अगोचरु पुरखु निराला ॥ इकि भ्रमि भूखे मोह पिआसे ॥ इकि रसु चाखि सबदि त्रिपतासे ॥ इकि रंगि राते इकि मरि धूरि ॥ इकि दरि घरि साचै देखि हदूरि ॥६॥

(राग बिलावलु -- SGGS 839) झूठे कउ नाही पति नाउ ॥ कबहु न सूचा काला काउ ॥ पिंजरि पंखी बंधिआ कोइ ॥ छेरीं भरमै मुकति न होइ ॥ तउ छूटै जा खसमु छडाए ॥ गुरमति मेले भगति द्रिड़ाए ॥७॥

(राग बिलावलु -- SGGS 839) खसटी खटु दरसन प्रभ साजे ॥ अनहद सबदु निराला वाजे ॥ जे प्रभ भावै ता महलि बुलावै ॥ सबदे भेदे तउ पति पावै ॥ करि करि वेस खपहि जलि जावहि ॥ साचै साचे साचि समावहि ॥८॥

(राग बिलावलु -- SGGS 839) सपतमी सतु संतोखु सरीरि ॥ सात समुंद भरे निरमल नीरि ॥ मजनु सीलु सचु रिदै वीचारि ॥ गुर कै सबदि पावै सभि पारि ॥ मनि साचा मुखि साचउ भाइ ॥ सचु नीसाणै ठाक न पाइ ॥९॥

(राग बिलावलु -- SGGS 839) असटमी असट सिधि बुधि साधै ॥ सचु निहकेवलु करमि अराधै ॥ पउण पाणी अगनी बिसराउ ॥ तही निरंजनु साचो नाउ ॥ तिसु महि मनूआ रहिआ लिव लाइ ॥ प्रणवति नानकु कालु न खाइ ॥१०॥

(राग बिलावलु -- SGGS 839) नाउ नउमी नवे नाथ नव खंडा ॥ घटि घटि नाथु महा बलवंडा ॥ आई पूता इहु जगु सारा ॥ प्रभ आदेसु आदि रखवारा ॥ आदि जुगादी है भी होगु ॥ ओहु अपर्मपरु करणै जोगु ॥११॥

(राग बिलावलु -- SGGS 840) दसमी नामु दानु इसनानु ॥ अनदिनु मजनु सचा गुण गिआनु ॥ सचि मैलु न लागै भ्रमु भउ भागै ॥ बिलमु न तूटसि काचै तागै ॥ जिउ तागा जगु एवै जाणहु ॥ असथिरु चीतु साचि रंगु माणहु ॥१२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 840) एकादसी इकु रिदै वसावै ॥ हिंसा ममता मोहु चुकावै ॥ फलु पावै ब्रतु आतम चीनै ॥ पाखंडि राचि ततु नही बीनै ॥ निरमलु निराहारु निहकेवलु ॥ सूचै साचे ना लागै मलु ॥१३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 840) जह देखउ तह एको एका ॥ होरि जीअ उपाए वेको वेका ॥ फलोहार कीए फलु जाइ ॥ रस कस खाए सादु गवाइ ॥ कूड़ै लालचि लपटै लपटाइ ॥ छूटै गुरमुखि साचु कमाइ ॥१४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 840) दुआदसि मुद्रा मनु अउधूता ॥ अहिनिसि जागहि कबहि न सूता ॥ जागतु जागि रहै लिव लाइ ॥ गुर परचै तिसु कालु न खाइ ॥ अतीत भए मारे बैराई ॥ प्रणवति नानक तह लिव लाई ॥१५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 840) दुआदसी दइआ दानु करि जाणै ॥ बाहरि जातो भीतरि आणै ॥ बरती बरत रहै निहकाम ॥ अजपा जापु जपै मुखि नाम ॥ तीनि भवण महि एको जाणै ॥ सभि सुचि संजम साचु पछाणै ॥१६॥

(राग बिलावलु -- SGGS 840) तेरसि तरवर समुद कनारै ॥ अम्रितु मूलु सिखरि लिव तारै ॥ डर डरि मरै न बूडै कोइ ॥ निडरु बूडि मरै पति खोइ ॥ डर महि घरु घर महि डरु जाणै ॥ तखति निवासु सचु मनि भाणै ॥१७॥

(राग बिलावलु -- SGGS 840) चउदसि चउथे थावहि लहि पावै ॥ राजस तामस सत काल समावै ॥ ससीअर कै घरि सूरु समावै ॥ जोग जुगति की कीमति पावै ॥ चउदसि भवन पाताल समाए ॥ खंड ब्रहमंड रहिआ लिव लाए ॥१८॥

(राग बिलावलु -- SGGS 840) अमावसिआ चंदु गुपतु गैणारि ॥ बूझहु गिआनी सबदु बीचारि ॥ ससीअरु गगनि जोति तिहु लोई ॥ करि करि वेखै करता सोई ॥ गुर ते दीसै सो तिस ही माहि ॥ मनमुखि भूले आवहि जाहि ॥१९॥

(राग बिलावलु -- SGGS 840) घरु दरु थापि थिरु थानि सुहावै ॥ आपु पछाणै जा सतिगुरु पावै ॥ जह आसा तह बिनसि बिनासा ॥ फूटै खपरु दुबिधा मनसा ॥ ममता जाल ते रहै उदासा ॥ प्रणवति नानक हम ता के दासा ॥२०॥१॥

(राग बिलावलु दखणी -- SGGS 843) बिलावलु महला १ छंत दखणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुंध नवेलड़ीआ गोइलि आई राम ॥ मटुकी डारि धरी हरि लिव लाई राम ॥ लिव लाइ हरि सिउ रही गोइलि सहजि सबदि सीगारीआ ॥ कर जोड़ि गुर पहि करि बिनंती मिलहु साचि पिआरीआ ॥ धन भाइ भगती देखि प्रीतम काम क्रोधु निवारिआ ॥ नानक मुंध नवेल सुंदरि देखि पिरु साधारिआ ॥१॥

सचि नवेलड़ीए जोबनि बाली राम ॥ आउ न जाउ कही अपने सह नाली राम ॥ नाह अपने संगि दासी मै भगति हरि की भावए ॥ अगाधि बोधि अकथु कथीऐ सहजि प्रभ गुण गावए ॥ राम नाम रसाल रसीआ रवै साचि पिआरीआ ॥ गुरि सबदु दीआ दानु कीआ नानका वीचारीआ ॥२॥

स्रीधर मोहिअड़ी पिर संगि सूती राम ॥ गुर कै भाइ चलो साचि संगूती राम ॥ धन साचि संगूती हरि संगि सूती संगि सखी सहेलीआ ॥ इक भाइ इक मनि नामु वसिआ सतिगुरू हम मेलीआ ॥ दिनु रैणि घड़ी न चसा विसरै सासि सासि निरंजनो ॥ सबदि जोति जगाइ दीपकु नानका भउ भंजनो ॥३॥

जोति सबाइड़ीए त्रिभवण सारे राम ॥ घटि घटि रवि रहिआ अलख अपारे राम ॥ अलख अपार अपारु साचा आपु मारि मिलाईऐ ॥ हउमै ममता लोभु जालहु सबदि मैलु चुकाईऐ ॥ दरि जाइ दरसनु करी भाणै तारि तारणहारिआ ॥ हरि नामु अम्रितु चाखि त्रिपती नानका उर धारिआ ॥४॥१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 843) बिलावलु महला १ ॥
मै मनि चाउ घणा साचि विगासी राम ॥ मोही प्रेम पिरे प्रभि अबिनासी राम ॥ अविगतो हरि नाथु नाथह तिसै भावै सो थीऐ ॥ किरपालु सदा दइआलु दाता जीआ अंदरि तूं जीऐ ॥ मै अवरु गिआनु न धिआनु पूजा हरि नामु अंतरि वसि रहे ॥ भेखु भवनी हठु न जाना नानका सचु गहि रहे ॥१॥

भिंनड़ी रैणि भली दिनस सुहाए राम ॥ निज घरि सूतड़ीए पिरमु जगाए राम ॥ नव हाणि नव धन सबदि जागी आपणे पिर भाणीआ ॥ तजि कूड़ु कपटु सुभाउ दूजा चाकरी लोकाणीआ ॥ मै नामु हरि का हारु कंठे साच सबदु नीसाणिआ ॥ कर जोड़ि नानकु साचु मागै नदरि करि तुधु भाणिआ ॥२॥

जागु सलोनड़ीए बोलै गुरबाणी राम ॥ जिनि सुणि मंनिअड़ी अकथ कहाणी राम ॥ अकथ कहाणी पदु निरबाणी को विरला गुरमुखि बूझए ॥ ओहु सबदि समाए आपु गवाए त्रिभवण सोझी सूझए ॥ रहै अतीतु अपर्मपरि राता साचु मनि गुण सारिआ ॥ ओहु पूरि रहिआ सरब ठाई नानका उरि धारिआ ॥३॥

महलि बुलाइड़ीए भगति सनेही राम ॥ गुरमति मनि रहसी सीझसि देही राम ॥ मनु मारि रीझै सबदि सीझै त्रै लोक नाथु पछाणए ॥ मनु डीगि डोलि न जाइ कत ही आपणा पिरु जाणए ॥ मै आधारु तेरा तू खसमु मेरा मै ताणु तकीआ तेरओ ॥ साचि सूचा सदा नानक गुर सबदि झगरु निबेरओ ॥४॥२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 854) सलोक मः १ ॥
कोई वाहे को लुणै को पाए खलिहानि ॥ नानक एव न जापई कोई खाइ निदानि ॥१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 854) मः १ ॥
जिसु मनि वसिआ तरिआ सोइ ॥ नानक जो भावै सो होइ ॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 876) रामकली महला १ घरु १ चउपदे
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
कोई पड़ता सहसाकिरता कोई पड़ै पुराना ॥ कोई नामु जपै जपमाली लागै तिसै धिआना ॥ अब ही कब ही किछू न जाना तेरा एको नामु पछाना ॥१॥

न जाणा हरे मेरी कवन गते ॥ हम मूरख अगिआन सरनि प्रभ तेरी करि किरपा राखहु मेरी लाज पते ॥१॥ रहाउ ॥

कबहू जीअड़ा ऊभि चड़तु है कबहू जाइ पइआले ॥ लोभी जीअड़ा थिरु न रहतु है चारे कुंडा भाले ॥२॥

मरणु लिखाइ मंडल महि आए जीवणु साजहि माई ॥ एकि चले हम देखह सुआमी भाहि बलंती आई ॥३॥

न किसी का मीतु न किसी का भाई ना किसै बापु न माई ॥ प्रणवति नानक जे तू देवहि अंते होइ सखाई ॥४॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 876) रामकली महला १ ॥
सरब जोति तेरी पसरि रही ॥ जह जह देखा तह नरहरी ॥१॥

जीवन तलब निवारि सुआमी ॥ अंध कूपि माइआ मनु गाडिआ किउ करि उतरउ पारि सुआमी ॥१॥ रहाउ ॥

जह भीतरि घट भीतरि बसिआ बाहरि काहे नाही ॥ तिन की सार करे नित साहिबु सदा चिंत मन माही ॥२॥

आपे नेड़ै आपे दूरि ॥ आपे सरब रहिआ भरपूरि ॥ सतगुरु मिलै अंधेरा जाइ ॥ जह देखा तह रहिआ समाइ ॥३॥

अंतरि सहसा बाहरि माइआ नैणी लागसि बाणी ॥ प्रणवति नानकु दासनि दासा परतापहिगा प्राणी ॥४॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 877) रामकली महला १ ॥
जितु दरि वसहि कवनु दरु कहीऐ दरा भीतरि दरु कवनु लहै ॥ जिसु दर कारणि फिरा उदासी सो दरु कोई आइ कहै ॥१॥

किन बिधि सागरु तरीऐ ॥ जीवतिआ नह मरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥

दुखु दरवाजा रोहु रखवाला आसा अंदेसा दुइ पट जड़े ॥ माइआ जलु खाई पाणी घरु बाधिआ सत कै आसणि पुरखु रहै ॥२॥

किंते नामा अंतु न जाणिआ तुम सरि नाही अवरु हरे ॥ ऊचा नही कहणा मन महि रहणा आपे जाणै आपि करे ॥३॥

जब आसा अंदेसा तब ही किउ करि एकु कहै ॥ आसा भीतरि रहै निरासा तउ नानक एकु मिलै ॥४॥

इन बिधि सागरु तरीऐ ॥ जीवतिआ इउ मरीऐ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥३॥

(राग रामकली -- SGGS 877) रामकली महला १ ॥
सुरति सबदु साखी मेरी सिंङी बाजै लोकु सुणे ॥ पतु झोली मंगण कै ताई भीखिआ नामु पड़े ॥१॥

बाबा गोरखु जागै ॥ गोरखु सो जिनि गोइ उठाली करते बार न लागै ॥१॥ रहाउ ॥

पाणी प्राण पवणि बंधि राखे चंदु सूरजु मुखि दीए ॥ मरण जीवण कउ धरती दीनी एते गुण विसरे ॥२॥

सिध साधिक अरु जोगी जंगम पीर पुरस बहुतेरे ॥ जे तिन मिला त कीरति आखा ता मनु सेव करे ॥३॥

कागदु लूणु रहै घ्रित संगे पाणी कमलु रहै ॥ ऐसे भगत मिलहि जन नानक तिन जमु किआ करै ॥४॥४॥

(राग रामकली -- SGGS 877) रामकली महला १ ॥
सुणि माछिंद्रा नानकु बोलै ॥ वसगति पंच करे नह डोलै ॥ ऐसी जुगति जोग कउ पाले ॥ आपि तरै सगले कुल तारे ॥१॥

सो अउधूतु ऐसी मति पावै ॥ अहिनिसि सुंनि समाधि समावै ॥१॥ रहाउ ॥

भिखिआ भाइ भगति भै चलै ॥ होवै सु त्रिपति संतोखि अमुलै ॥ धिआन रूपि होइ आसणु पावै ॥ सचि नामि ताड़ी चितु लावै ॥२॥

नानकु बोलै अम्रित बाणी ॥ सुणि माछिंद्रा अउधू नीसाणी ॥ आसा माहि निरासु वलाए ॥ निहचउ नानक करते पाए ॥३॥

प्रणवति नानकु अगमु सुणाए ॥ गुर चेले की संधि मिलाए ॥ दीखिआ दारू भोजनु खाइ ॥ छिअ दरसन की सोझी पाइ ॥४॥५॥

(राग रामकली -- SGGS 878) रामकली महला १ ॥
हम डोलत बेड़ी पाप भरी है पवणु लगै मतु जाई ॥ सनमुख सिध भेटण कउ आए निहचउ देहि वडिआई ॥१॥

गुर तारि तारणहारिआ ॥ देहि भगति पूरन अविनासी हउ तुझ कउ बलिहारिआ ॥१॥ रहाउ ॥

सिध साधिक जोगी अरु जंगम एकु सिधु जिनी धिआइआ ॥ परसत पैर सिझत ते सुआमी अखरु जिन कउ आइआ ॥२॥

जप तप संजम करम न जाना नामु जपी प्रभ तेरा ॥ गुरु परमेसरु नानक भेटिओ साचै सबदि निबेरा ॥३॥६॥

(राग रामकली -- SGGS 878) रामकली महला १ ॥
सुरती सुरति रलाईऐ एतु ॥ तनु करि तुलहा लंघहि जेतु ॥ अंतरि भाहि तिसै तू रखु ॥ अहिनिसि दीवा बलै अथकु ॥१॥

ऐसा दीवा नीरि तराइ ॥ जितु दीवै सभ सोझी पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

हछी मिटी सोझी होइ ॥ ता का कीआ मानै सोइ ॥ करणी ते करि चकहु ढालि ॥ ऐथै ओथै निबही नालि ॥२॥

आपे नदरि करे जा सोइ ॥ गुरमुखि विरला बूझै कोइ ॥ तितु घटि दीवा निहचलु होइ ॥ पाणी मरै न बुझाइआ जाइ ॥ ऐसा दीवा नीरि तराइ ॥३॥

डोलै वाउ न वडा होइ ॥ जापै जिउ सिंघासणि लोइ ॥ खत्री ब्राहमणु सूदु कि वैसु ॥ निरति न पाईआ गणी सहंस ॥ ऐसा दीवा बाले कोइ ॥ नानक सो पारंगति होइ ॥४॥७॥

(राग रामकली -- SGGS 878) रामकली महला १ ॥
तुधनो निवणु मंनणु तेरा नाउ ॥ साचु भेट बैसण कउ थाउ ॥ सतु संतोखु होवै अरदासि ॥ ता सुणि सदि बहाले पासि ॥१॥

नानक बिरथा कोइ न होइ ॥ ऐसी दरगह साचा सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

प्रापति पोता करमु पसाउ ॥ तू देवहि मंगत जन चाउ ॥ भाडै भाउ पवै तितु आइ ॥ धुरि तै छोडी कीमति पाइ ॥२॥

जिनि किछु कीआ सो किछु करै ॥ अपनी कीमति आपे धरै ॥ गुरमुखि परगटु होआ हरि राइ ॥ ना को आवै ना को जाइ ॥३॥

लोकु धिकारु कहै मंगत जन मागत मानु न पाइआ ॥ सह कीआ गला दर कीआ बाता तै ता कहणु कहाइआ ॥४॥८॥

(राग रामकली -- SGGS 878) रामकली महला १ ॥
सागर महि बूंद बूंद महि सागरु कवणु बुझै बिधि जाणै ॥ उतभुज चलत आपि करि चीनै आपे ततु पछाणै ॥१॥

ऐसा गिआनु बीचारै कोई ॥ तिस ते मुकति परम गति होई ॥१॥ रहाउ ॥

दिन महि रैणि रैणि महि दिनीअरु उसन सीत बिधि सोई ॥ ता की गति मिति अवरु न जाणै गुर बिनु समझ न होई ॥२॥

पुरख महि नारि नारि महि पुरखा बूझहु ब्रहम गिआनी ॥ धुनि महि धिआनु धिआन महि जानिआ गुरमुखि अकथ कहानी ॥३॥

मन महि जोति जोति महि मनूआ पंच मिले गुर भाई ॥ नानक तिन कै सद बलिहारी जिन एक सबदि लिव लाई ॥४॥९॥

(राग रामकली -- SGGS 879) रामकली महला १ ॥
जा हरि प्रभि किरपा धारी ॥ ता हउमै विचहु मारी ॥ सो सेवकि राम पिआरी ॥ जो गुर सबदी बीचारी ॥१॥

सो हरि जनु हरि प्रभ भावै ॥ अहिनिसि भगति करे दिनु राती लाज छोडि हरि के गुण गावै ॥१॥ रहाउ ॥

धुनि वाजे अनहद घोरा ॥ मनु मानिआ हरि रसि मोरा ॥ गुर पूरै सचु समाइआ ॥ गुरु आदि पुरखु हरि पाइआ ॥२॥

सभि नाद बेद गुरबाणी ॥ मनु राता सारिगपाणी ॥ तह तीरथ वरत तप सारे ॥ गुर मिलिआ हरि निसतारे ॥३॥

जह आपु गइआ भउ भागा ॥ गुर चरणी सेवकु लागा ॥ गुरि सतिगुरि भरमु चुकाइआ ॥ कहु नानक सबदि मिलाइआ ॥४॥१०॥

(राग रामकली -- SGGS 879) रामकली महला १ ॥
छादनु भोजनु मागतु भागै ॥ खुधिआ दुसट जलै दुखु आगै ॥ गुरमति नही लीनी दुरमति पति खोई ॥ गुरमति भगति पावै जनु कोई ॥१॥

जोगी जुगति सहज घरि वासै ॥ एक द्रिसटि एको करि देखिआ भीखिआ भाइ सबदि त्रिपतासै ॥१॥ रहाउ ॥

पंच बैल गडीआ देह धारी ॥ राम कला निबहै पति सारी ॥ धर तूटी गाडो सिर भारि ॥ लकरी बिखरि जरी मंझ भारि ॥२॥

गुर का सबदु वीचारि जोगी ॥ दुखु सुखु सम करणा सोग बिओगी ॥ भुगति नामु गुर सबदि बीचारी ॥ असथिरु कंधु जपै निरंकारी ॥३॥

सहज जगोटा बंधन ते छूटा ॥ कामु क्रोधु गुर सबदी लूटा ॥ मन महि मुंद्रा हरि गुर सरणा ॥ नानक राम भगति जन तरणा ॥४॥११॥

(राग रामकली -- SGGS 902) रामकली महला १ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सोई चंदु चड़हि से तारे सोई दिनीअरु तपत रहै ॥ सा धरती सो पउणु झुलारे जुग जीअ खेले थाव कैसे ॥१॥

जीवन तलब निवारि ॥ होवै परवाणा करहि धिङाणा कलि लखण वीचारि ॥१॥ रहाउ ॥

कितै देसि न आइआ सुणीऐ तीरथ पासि न बैठा ॥ दाता दानु करे तह नाही महल उसारि न बैठा ॥२॥

जे को सतु करे सो छीजै तप घरि तपु न होई ॥ जे को नाउ लए बदनावी कलि के लखण एई ॥३॥

जिसु सिकदारी तिसहि खुआरी चाकर केहे डरणा ॥ जा सिकदारै पवै जंजीरी ता चाकर हथहु मरणा ॥४॥

आखु गुणा कलि आईऐ ॥ तिहु जुग केरा रहिआ तपावसु जे गुण देहि त पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

कलि कलवाली सरा निबेड़ी काजी क्रिसना होआ ॥ बाणी ब्रहमा बेदु अथरबणु करणी कीरति लहिआ ॥५॥

पति विणु पूजा सत विणु संजमु जत विणु काहे जनेऊ ॥ नावहु धोवहु तिलकु चड़ावहु सुच विणु सोच न होई ॥६॥

कलि परवाणु कतेब कुराणु ॥ पोथी पंडित रहे पुराण ॥ नानक नाउ भइआ रहमाणु ॥ करि करता तू एको जाणु ॥७॥

नानक नामु मिलै वडिआई एदू उपरि करमु नही ॥ जे घरि होदै मंगणि जाईऐ फिरि ओलामा मिलै तही ॥८॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 903) रामकली महला १ ॥
जगु परबोधहि मड़ी बधावहि ॥ आसणु तिआगि काहे सचु पावहि ॥ ममता मोहु कामणि हितकारी ॥ ना अउधूती ना संसारी ॥१॥

जोगी बैसि रहहु दुबिधा दुखु भागै ॥ घरि घरि मागत लाज न लागै ॥१॥ रहाउ ॥

गावहि गीत न चीनहि आपु ॥ किउ लागी निवरै परतापु ॥ गुर कै सबदि रचै मन भाइ ॥ भिखिआ सहज वीचारी खाइ ॥२॥

भसम चड़ाइ करहि पाखंडु ॥ माइआ मोहि सहहि जम डंडु ॥ फूटै खापरु भीख न भाइ ॥ बंधनि बाधिआ आवै जाइ ॥३॥

बिंदु न राखहि जती कहावहि ॥ माई मागत त्रै लोभावहि ॥ निरदइआ नही जोति उजाला ॥ बूडत बूडे सरब जंजाला ॥४॥

भेख करहि खिंथा बहु थटूआ ॥ झूठो खेलु खेलै बहु नटूआ ॥ अंतरि अगनि चिंता बहु जारे ॥ विणु करमा कैसे उतरसि पारे ॥५॥

मुंद्रा फटक बनाई कानि ॥ मुकति नही बिदिआ बिगिआनि ॥ जिहवा इंद्री सादि लोभाना ॥ पसू भए नही मिटै नीसाना ॥६॥

त्रिबिधि लोगा त्रिबिधि जोगा ॥ सबदु वीचारै चूकसि सोगा ॥ ऊजलु साचु सु सबदु होइ ॥ जोगी जुगति वीचारे सोइ ॥७॥

तुझ पहि नउ निधि तू करणै जोगु ॥ थापि उथापे करे सु होगु ॥ जतु सतु संजमु सचु सुचीतु ॥ नानक जोगी त्रिभवण मीतु ॥८॥२॥


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