Pt 11 - गुरू नानक देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 11 - Guru Nanak Dev ji (Mahalla 1) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग सोरठि -- SGGS 598) सोरठि महला १ ॥
सरब जीआ सिरि लेखु धुराहू बिनु लेखै नही कोई जीउ ॥ आपि अलेखु कुदरति करि देखै हुकमि चलाए सोई जीउ ॥१॥

मन रे राम जपहु सुखु होई ॥ अहिनिसि गुर के चरन सरेवहु हरि दाता भुगता सोई ॥ रहाउ ॥ जो अंतरि सो बाहरि देखहु अवरु न दूजा कोई जीउ ॥ गुरमुखि एक द्रिसटि करि देखहु घटि घटि जोति समोई जीउ ॥२॥

चलतौ ठाकि रखहु घरि अपनै गुर मिलिऐ इह मति होई जीउ ॥ देखि अद्रिसटु रहउ बिसमादी दुखु बिसरै सुखु होई जीउ ॥३॥

पीवहु अपिउ परम सुखु पाईऐ निज घरि वासा होई जीउ ॥ जनम मरण भव भंजनु गाईऐ पुनरपि जनमु न होई जीउ ॥४॥

ततु निरंजनु जोति सबाई सोहं भेदु न कोई जीउ ॥ अपर्मपर पारब्रहमु परमेसरु नानक गुरु मिलिआ सोई जीउ ॥५॥११॥

(राग सोरठि -- SGGS 599) सोरठि महला १ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जा तिसु भावा तद ही गावा ॥ ता गावे का फलु पावा ॥ गावे का फलु होई ॥ जा आपे देवै सोई ॥१॥

मन मेरे गुर बचनी निधि पाई ॥ ता ते सच महि रहिआ समाई ॥ रहाउ ॥ गुर साखी अंतरि जागी ॥ ता चंचल मति तिआगी ॥ गुर साखी का उजीआरा ॥ ता मिटिआ सगल अंध्यारा ॥२॥

गुर चरनी मनु लागा ॥ ता जम का मारगु भागा ॥ भै विचि निरभउ पाइआ ॥ ता सहजै कै घरि आइआ ॥३॥

भणति नानकु बूझै को बीचारी ॥ इसु जग महि करणी सारी ॥ करणी कीरति होई ॥ जा आपे मिलिआ सोई ॥४॥१॥१२॥

(राग सोरठि -- SGGS 634) सोरठि महला १ घरु १ असटपदीआ चउतुकी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुबिधा न पड़उ हरि बिनु होरु न पूजउ मड़ै मसाणि न जाई ॥ त्रिसना राचि न पर घरि जावा त्रिसना नामि बुझाई ॥ घर भीतरि घरु गुरू दिखाइआ सहजि रते मन भाई ॥ तू आपे दाना आपे बीना तू देवहि मति साई ॥१॥

मनु बैरागि रतउ बैरागी सबदि मनु बेधिआ मेरी माई ॥ अंतरि जोति निरंतरि बाणी साचे साहिब सिउ लिव लाई ॥ रहाउ ॥ असंख बैरागी कहहि बैराग सो बैरागी जि खसमै भावै ॥ हिरदै सबदि सदा भै रचिआ गुर की कार कमावै ॥ एको चेतै मनूआ न डोलै धावतु वरजि रहावै ॥ सहजे माता सदा रंगि राता साचे के गुण गावै ॥२॥

मनूआ पउणु बिंदु सुखवासी नामि वसै सुख भाई ॥ जिहबा नेत्र सोत्र सचि राते जलि बूझी तुझहि बुझाई ॥ आस निरास रहै बैरागी निज घरि ताड़ी लाई ॥ भिखिआ नामि रजे संतोखी अम्रितु सहजि पीआई ॥३॥

दुबिधा विचि बैरागु न होवी जब लगु दूजी राई ॥ सभु जगु तेरा तू एको दाता अवरु न दूजा भाई ॥ मनमुखि जंत दुखि सदा निवासी गुरमुखि दे वडिआई ॥ अपर अपार अगम अगोचर कहणै कीम न पाई ॥४॥

सुंन समाधि महा परमारथु तीनि भवण पति नामं ॥ मसतकि लेखु जीआ जगि जोनी सिरि सिरि लेखु सहामं ॥ करम सुकरम कराए आपे आपे भगति द्रिड़ामं ॥ मनि मुखि जूठि लहै भै मानं आपे गिआनु अगामं ॥५॥

जिन चाखिआ सेई सादु जाणनि जिउ गुंगे मिठिआई ॥ अकथै का किआ कथीऐ भाई चालउ सदा रजाई ॥ गुरु दाता मेले ता मति होवै निगुरे मति न काई ॥ जिउ चलाए तिउ चालह भाई होर किआ को करे चतुराई ॥६॥

इकि भरमि भुलाए इकि भगती राते तेरा खेलु अपारा ॥ जितु तुधु लाए तेहा फलु पाइआ तू हुकमि चलावणहारा ॥ सेवा करी जे किछु होवै अपणा जीउ पिंडु तुमारा ॥ सतिगुरि मिलिऐ किरपा कीनी अम्रित नामु अधारा ॥७॥

गगनंतरि वासिआ गुण परगासिआ गुण महि गिआन धिआनं ॥ नामु मनि भावै कहै कहावै ततो ततु वखानं ॥ सबदु गुर पीरा गहिर ग्मभीरा बिनु सबदै जगु बउरानं ॥ पूरा बैरागी सहजि सुभागी सचु नानक मनु मानं ॥८॥१॥

(राग सोरठि -- SGGS 635) सोरठि महला १ तितुकी ॥
आसा मनसा बंधनी भाई करम धरम बंधकारी ॥ पापि पुंनि जगु जाइआ भाई बिनसै नामु विसारी ॥ इह माइआ जगि मोहणी भाई करम सभे वेकारी ॥१॥

सुणि पंडित करमा कारी ॥ जितु करमि सुखु ऊपजै भाई सु आतम ततु बीचारी ॥ रहाउ ॥ सासतु बेदु बकै खड़ो भाई करम करहु संसारी ॥ पाखंडि मैलु न चूकई भाई अंतरि मैलु विकारी ॥ इन बिधि डूबी माकुरी भाई ऊंडी सिर कै भारी ॥२॥

दुरमति घणी विगूती भाई दूजै भाइ खुआई ॥ बिनु सतिगुर नामु न पाईऐ भाई बिनु नामै भरमु न जाई ॥ सतिगुरु सेवे ता सुखु पाए भाई आवणु जाणु रहाई ॥३॥

साचु सहजु गुर ते ऊपजै भाई मनु निरमलु साचि समाई ॥ गुरु सेवे सो बूझै भाई गुर बिनु मगु न पाई ॥ जिसु अंतरि लोभु कि करम कमावै भाई कूड़ु बोलि बिखु खाई ॥४॥

पंडित दही विलोईऐ भाई विचहु निकलै तथु ॥ जलु मथीऐ जलु देखीऐ भाई इहु जगु एहा वथु ॥ गुर बिनु भरमि विगूचीऐ भाई घटि घटि देउ अलखु ॥५॥

इहु जगु तागो सूत को भाई दह दिस बाधो माइ ॥ बिनु गुर गाठि न छूटई भाई थाके करम कमाइ ॥ इहु जगु भरमि भुलाइआ भाई कहणा किछू न जाइ ॥६॥

गुर मिलिऐ भउ मनि वसै भाई भै मरणा सचु लेखु ॥ मजनु दानु चंगिआईआ भाई दरगह नामु विसेखु ॥ गुरु अंकसु जिनि नामु द्रिड़ाइआ भाई मनि वसिआ चूका भेखु ॥७॥

इहु तनु हाटु सराफ को भाई वखरु नामु अपारु ॥ इहु वखरु वापारी सो द्रिड़ै भाई गुर सबदि करे वीचारु ॥ धनु वापारी नानका भाई मेलि करे वापारु ॥८॥२॥

(राग सोरठि -- SGGS 636) सोरठि महला १ ॥
जिन्ही सतिगुरु सेविआ पिआरे तिन्ह के साथ तरे ॥ तिन्हा ठाक न पाईऐ पिआरे अम्रित रसन हरे ॥ बूडे भारे भै बिना पिआरे तारे नदरि करे ॥१॥

भी तूहै सालाहणा पिआरे भी तेरी सालाह ॥ विणु बोहिथ भै डुबीऐ पिआरे कंधी पाइ कहाह ॥१॥ रहाउ ॥

सालाही सालाहणा पिआरे दूजा अवरु न कोइ ॥ मेरे प्रभ सालाहनि से भले पिआरे सबदि रते रंगु होइ ॥ तिस की संगति जे मिलै पिआरे रसु लै ततु विलोइ ॥२॥

पति परवाना साच का पिआरे नामु सचा नीसाणु ॥ आइआ लिखि लै जावणा पिआरे हुकमी हुकमु पछाणु ॥ गुर बिनु हुकमु न बूझीऐ पिआरे साचे साचा ताणु ॥३॥

हुकमै अंदरि निमिआ पिआरे हुकमै उदर मझारि ॥ हुकमै अंदरि जमिआ पिआरे ऊधउ सिर कै भारि ॥ गुरमुखि दरगह जाणीऐ पिआरे चलै कारज सारि ॥४॥

हुकमै अंदरि आइआ पिआरे हुकमे जादो जाइ ॥ हुकमे बंन्हि चलाईऐ पिआरे मनमुखि लहै सजाइ ॥ हुकमे सबदि पछाणीऐ पिआरे दरगह पैधा जाइ ॥५॥

हुकमे गणत गणाईऐ पिआरे हुकमे हउमै दोइ ॥ हुकमे भवै भवाईऐ पिआरे अवगणि मुठी रोइ ॥ हुकमु सिञापै साह का पिआरे सचु मिलै वडिआई होइ ॥६॥

आखणि अउखा आखीऐ पिआरे किउ सुणीऐ सचु नाउ ॥ जिन्ही सो सालाहिआ पिआरे हउ तिन्ह बलिहारै जाउ ॥ नाउ मिलै संतोखीआं पिआरे नदरी मेलि मिलाउ ॥७॥

काइआ कागदु जे थीऐ पिआरे मनु मसवाणी धारि ॥ ललता लेखणि सच की पिआरे हरि गुण लिखहु वीचारि ॥ धनु लेखारी नानका पिआरे साचु लिखै उरि धारि ॥८॥३॥

(राग सोरठि -- SGGS 636) सोरठि महला १ पहिला दुतुकी ॥
तू गुणदातौ निरमलो भाई निरमलु ना मनु होइ ॥ हम अपराधी निरगुणे भाई तुझ ही ते गुणु सोइ ॥१॥

मेरे प्रीतमा तू करता करि वेखु ॥ हउ पापी पाखंडीआ भाई मनि तनि नाम विसेखु ॥ रहाउ ॥ बिखु माइआ चितु मोहिआ भाई चतुराई पति खोइ ॥ चित महि ठाकुरु सचि वसै भाई जे गुर गिआनु समोइ ॥२॥

रूड़ौ रूड़ौ आखीऐ भाई रूड़ौ लाल चलूलु ॥ जे मनु हरि सिउ बैरागीऐ भाई दरि घरि साचु अभूलु ॥३॥

पाताली आकासि तू भाई घरि घरि तू गुण गिआनु ॥ गुर मिलिऐ सुखु पाइआ भाई चूका मनहु गुमानु ॥४॥

जलि मलि काइआ माजीऐ भाई भी मैला तनु होइ ॥ गिआनि महा रसि नाईऐ भाई मनु तनु निरमलु होइ ॥५॥

देवी देवा पूजीऐ भाई किआ मागउ किआ देहि ॥ पाहणु नीरि पखालीऐ भाई जल महि बूडहि तेहि ॥६॥

गुर बिनु अलखु न लखीऐ भाई जगु बूडै पति खोइ ॥ मेरे ठाकुर हाथि वडाईआ भाई जै भावै तै देइ ॥७॥

बईअरि बोलै मीठुली भाई साचु कहै पिर भाइ ॥ बिरहै बेधी सचि वसी भाई अधिक रही हरि नाइ ॥८॥

सभु को आखै आपणा भाई गुर ते बुझै सुजानु ॥ जो बीधे से ऊबरे भाई सबदु सचा नीसानु ॥९॥

ईधनु अधिक सकेलीऐ भाई पावकु रंचक पाइ ॥ खिनु पलु नामु रिदै वसै भाई नानक मिलणु सुभाइ ॥१०॥४॥

सलोकु मः १ ॥ सोरठि सदा सुहावणी जे सचा मनि होइ ॥ दंदी मैलु न कतु मनि जीभै सचा सोइ ॥ ससुरै पेईऐ भै वसी सतिगुरु सेवि निसंग ॥ परहरि कपड़ु जे पिर मिलै खुसी रावै पिरु संगि ॥ सदा सीगारी नाउ मनि कदे न मैलु पतंगु ॥ देवर जेठ मुए दुखि ससू का डरु किसु ॥ जे पिर भावै नानका करम मणी सभु सचु ॥१॥

(राग सोरठि -- SGGS 648) मः १ ॥
इक दझहि इक दबीअहि इकना कुते खाहि ॥ इकि पाणी विचि उसटीअहि इकि भी फिरि हसणि पाहि ॥ नानक एव न जापई किथै जाइ समाहि ॥२॥

(राग सोरठि -- SGGS 653) सलोक मः १ ॥
ता की रजाइ लेखिआ पाइ अब किआ कीजै पांडे ॥ हुकमु होआ हासलु तदे होइ निबड़िआ हंढहि जीअ कमांदे ॥१॥

(राग धनासरी -- SGGS 660) धनासरी महला १ घरु १ चउपदे
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
जीउ डरतु है आपणा कै सिउ करी पुकार ॥ दूख विसारणु सेविआ सदा सदा दातारु ॥१॥

साहिबु मेरा नीत नवा सदा सदा दातारु ॥१॥ रहाउ ॥

अनदिनु साहिबु सेवीऐ अंति छडाए सोइ ॥ सुणि सुणि मेरी कामणी पारि उतारा होइ ॥२॥

दइआल तेरै नामि तरा ॥ सद कुरबाणै जाउ ॥१॥ रहाउ ॥

सरबं साचा एकु है दूजा नाही कोइ ॥ ता की सेवा सो करे जा कउ नदरि करे ॥३॥

तुधु बाझु पिआरे केव रहा ॥ सा वडिआई देहि जितु नामि तेरे लागि रहां ॥ दूजा नाही कोइ जिसु आगै पिआरे जाइ कहा ॥१॥ रहाउ ॥

सेवी साहिबु आपणा अवरु न जाचंउ कोइ ॥ नानकु ता का दासु है बिंद बिंद चुख चुख होइ ॥४॥

साहिब तेरे नाम विटहु बिंद बिंद चुख चुख होइ ॥१॥ रहाउ ॥४॥१॥

(राग धनासरी -- SGGS 660) धनासरी महला १ ॥
हम आदमी हां इक दमी मुहलति मुहतु न जाणा ॥ नानकु बिनवै तिसै सरेवहु जा के जीअ पराणा ॥१॥

अंधे जीवना वीचारि देखि केते के दिना ॥१॥ रहाउ ॥

सासु मासु सभु जीउ तुमारा तू मै खरा पिआरा ॥ नानकु साइरु एव कहतु है सचे परवदगारा ॥२॥

जे तू किसै न देही मेरे साहिबा किआ को कढै गहणा ॥ नानकु बिनवै सो किछु पाईऐ पुरबि लिखे का लहणा ॥३॥

नामु खसम का चिति न कीआ कपटी कपटु कमाणा ॥ जम दुआरि जा पकड़ि चलाइआ ता चलदा पछुताणा ॥४॥

जब लगु दुनीआ रहीऐ नानक किछु सुणीऐ किछु कहीऐ ॥ भालि रहे हम रहणु न पाइआ जीवतिआ मरि रहीऐ ॥५॥२॥

(राग धनासरी -- SGGS 661) धनासरी महला १ घरु दूजा
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किउ सिमरी सिवरिआ नही जाइ ॥ तपै हिआउ जीअड़ा बिललाइ ॥ सिरजि सवारे साचा सोइ ॥ तिसु विसरिऐ चंगा किउ होइ ॥१॥

हिकमति हुकमि न पाइआ जाइ ॥ किउ करि साचि मिलउ मेरी माइ ॥१॥ रहाउ ॥

वखरु नामु देखण कोई जाइ ॥ ना को चाखै ना को खाइ ॥ लोकि पतीणै ना पति होइ ॥ ता पति रहै राखै जा सोइ ॥२॥

जह देखा तह रहिआ समाइ ॥ तुधु बिनु दूजी नाही जाइ ॥ जे को करे कीतै किआ होइ ॥ जिस नो बखसे साचा सोइ ॥३॥

हुणि उठि चलणा मुहति कि तालि ॥ किआ मुहु देसा गुण नही नालि ॥ जैसी नदरि करे तैसा होइ ॥ विणु नदरी नानक नही कोइ ॥४॥१॥३॥

(राग धनासरी -- SGGS 661) धनासरी महला १ ॥
नदरि करे ता सिमरिआ जाइ ॥ आतमा द्रवै रहै लिव लाइ ॥ आतमा परातमा एको करै ॥ अंतर की दुबिधा अंतरि मरै ॥१॥

गुर परसादी पाइआ जाइ ॥ हरि सिउ चितु लागै फिरि कालु न खाइ ॥१॥ रहाउ ॥

सचि सिमरिऐ होवै परगासु ॥ ता ते बिखिआ महि रहै उदासु ॥ सतिगुर की ऐसी वडिआई ॥ पुत्र कलत्र विचे गति पाई ॥२॥

ऐसी सेवकु सेवा करै ॥ जिस का जीउ तिसु आगै धरै ॥ साहिब भावै सो परवाणु ॥ सो सेवकु दरगह पावै माणु ॥३॥

सतिगुर की मूरति हिरदै वसाए ॥ जो इछै सोई फलु पाए ॥ साचा साहिबु किरपा करै ॥ सो सेवकु जम ते कैसा डरै ॥४॥

भनति नानकु करे वीचारु ॥ साची बाणी सिउ धरे पिआरु ॥ ता को पावै मोख दुआरु ॥ जपु तपु सभु इहु सबदु है सारु ॥५॥२॥४॥

(राग धनासरी -- SGGS 661) धनासरी महला १ ॥
जीउ तपतु है बारो बार ॥ तपि तपि खपै बहुतु बेकार ॥ जै तनि बाणी विसरि जाइ ॥ जिउ पका रोगी विललाइ ॥१॥

बहुता बोलणु झखणु होइ ॥ विणु बोले जाणै सभु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि कन कीते अखी नाकु ॥ जिनि जिहवा दिती बोले तातु ॥ जिनि मनु राखिआ अगनी पाइ ॥ वाजै पवणु आखै सभ जाइ ॥२॥

जेता मोहु परीति सुआद ॥ सभा कालख दागा दाग ॥ दाग दोस मुहि चलिआ लाइ ॥ दरगह बैसण नाही जाइ ॥३॥

करमि मिलै आखणु तेरा नाउ ॥ जितु लगि तरणा होरु नही थाउ ॥ जे को डूबै फिरि होवै सार ॥ नानक साचा सरब दातार ॥४॥३॥५॥

(राग धनासरी -- SGGS 662) धनासरी महला १ ॥
चोरु सलाहे चीतु न भीजै ॥ जे बदी करे ता तसू न छीजै ॥ चोर की हामा भरे न कोइ ॥ चोरु कीआ चंगा किउ होइ ॥१॥

सुणि मन अंधे कुते कूड़िआर ॥ बिनु बोले बूझीऐ सचिआर ॥१॥ रहाउ ॥

चोरु सुआलिउ चोरु सिआणा ॥ खोटे का मुलु एकु दुगाणा ॥ जे साथि रखीऐ दीजै रलाइ ॥ जा परखीऐ खोटा होइ जाइ ॥२॥

जैसा करे सु तैसा पावै ॥ आपि बीजि आपे ही खावै ॥ जे वडिआईआ आपे खाइ ॥ जेही सुरति तेहै राहि जाइ ॥३॥

जे सउ कूड़ीआ कूड़ु कबाड़ु ॥ भावै सभु आखउ संसारु ॥ तुधु भावै अधी परवाणु ॥ नानक जाणै जाणु सुजाणु ॥४॥४॥६॥

(राग धनासरी -- SGGS 662) धनासरी महला १ ॥
काइआ कागदु मनु परवाणा ॥ सिर के लेख न पड़ै इआणा ॥ दरगह घड़ीअहि तीने लेख ॥ खोटा कामि न आवै वेखु ॥१॥

नानक जे विचि रुपा होइ ॥ खरा खरा आखै सभु कोइ ॥१॥ रहाउ ॥

कादी कूड़ु बोलि मलु खाइ ॥ ब्राहमणु नावै जीआ घाइ ॥ जोगी जुगति न जाणै अंधु ॥ तीने ओजाड़े का बंधु ॥२॥

सो जोगी जो जुगति पछाणै ॥ गुर परसादी एको जाणै ॥ काजी सो जो उलटी करै ॥ गुर परसादी जीवतु मरै ॥ सो ब्राहमणु जो ब्रहमु बीचारै ॥ आपि तरै सगले कुल तारै ॥३॥

दानसबंदु सोई दिलि धोवै ॥ मुसलमाणु सोई मलु खोवै ॥ पड़िआ बूझै सो परवाणु ॥ जिसु सिरि दरगह का नीसाणु ॥४॥५॥७॥

(राग धनासरी -- SGGS 662) धनासरी महला १ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कालु नाही जोगु नाही नाही सत का ढबु ॥ थानसट जग भरिसट होए डूबता इव जगु ॥१॥

कल महि राम नामु सारु ॥ अखी त मीटहि नाक पकड़हि ठगण कउ संसारु ॥१॥ रहाउ ॥

आंट सेती नाकु पकड़हि सूझते तिनि लोअ ॥ मगर पाछै कछु न सूझै एहु पदमु अलोअ ॥२॥

खत्रीआ त धरमु छोडिआ मलेछ भाखिआ गही ॥ स्रिसटि सभ इक वरन होई धरम की गति रही ॥३॥

असट साज साजि पुराण सोधहि करहि बेद अभिआसु ॥ बिनु नाम हरि के मुकति नाही कहै नानकु दासु ॥४॥१॥६॥८॥

(राग धनासरी -- SGGS 663) धनासरी महला १ आरती
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥ धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलंत जोती ॥१॥

कैसी आरती होइ भव खंडना तेरी आरती ॥ अनहता सबद वाजंत भेरी ॥१॥ रहाउ ॥

सहस तव नैन नन नैन है तोहि कउ सहस मूरति नना एक तोही ॥ सहस पद बिमल नन एक पद गंध बिनु सहस तव गंध इव चलत मोही ॥२॥

सभ महि जोति जोति है सोइ ॥ तिस कै चानणि सभ महि चानणु होइ ॥ गुर साखी जोति परगटु होइ ॥ जो तिसु भावै सु आरती होइ ॥३॥

हरि चरण कमल मकरंद लोभित मनो अनदिनो मोहि आही पिआसा ॥ क्रिपा जलु देहि नानक सारिंग कउ होइ जा ते तेरै नामि वासा ॥४॥१॥७॥९॥

(राग धनासरी -- SGGS 685) धनासरी महला १ घरु २ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु सागरु रतनी भरपूरे ॥ अम्रितु संत चुगहि नही दूरे ॥ हरि रसु चोग चुगहि प्रभ भावै ॥ सरवर महि हंसु प्रानपति पावै ॥१॥

किआ बगु बपुड़ा छपड़ी नाइ ॥ कीचड़ि डूबै मैलु न जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

रखि रखि चरन धरे वीचारी ॥ दुबिधा छोडि भए निरंकारी ॥ मुकति पदारथु हरि रस चाखे ॥ आवण जाण रहे गुरि राखे ॥२॥

सरवर हंसा छोडि न जाइ ॥ प्रेम भगति करि सहजि समाइ ॥ सरवर महि हंसु हंस महि सागरु ॥ अकथ कथा गुर बचनी आदरु ॥३॥

सुंन मंडल इकु जोगी बैसे ॥ नारि न पुरखु कहहु कोऊ कैसे ॥ त्रिभवण जोति रहे लिव लाई ॥ सुरि नर नाथ सचे सरणाई ॥४॥

आनंद मूलु अनाथ अधारी ॥ गुरमुखि भगति सहजि बीचारी ॥ भगति वछल भै काटणहारे ॥ हउमै मारि मिले पगु धारे ॥५॥

अनिक जतन करि कालु संताए ॥ मरणु लिखाइ मंडल महि आए ॥ जनमु पदारथु दुबिधा खोवै ॥ आपु न चीनसि भ्रमि भ्रमि रोवै ॥६॥

कहतउ पड़तउ सुणतउ एक ॥ धीरज धरमु धरणीधर टेक ॥ जतु सतु संजमु रिदै समाए ॥ चउथे पद कउ जे मनु पतीआए ॥७॥

साचे निरमल मैलु न लागै ॥ गुर कै सबदि भरम भउ भागै ॥ सूरति मूरति आदि अनूपु ॥ नानकु जाचै साचु सरूपु ॥८॥१॥

(राग धनासरी -- SGGS 686) धनासरी महला १ ॥
सहजि मिलै मिलिआ परवाणु ॥ ना तिसु मरणु न आवणु जाणु ॥ ठाकुर महि दासु दास महि सोइ ॥ जह देखा तह अवरु न कोइ ॥१॥

गुरमुखि भगति सहज घरु पाईऐ ॥ बिनु गुर भेटे मरि आईऐ जाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

सो गुरु करउ जि साचु द्रिड़ावै ॥ अकथु कथावै सबदि मिलावै ॥ हरि के लोग अवर नही कारा ॥ साचउ ठाकुरु साचु पिआरा ॥२॥

तन महि मनूआ मन महि साचा ॥ सो साचा मिलि साचे राचा ॥ सेवकु प्रभ कै लागै पाइ ॥ सतिगुरु पूरा मिलै मिलाइ ॥३॥

आपि दिखावै आपे देखै ॥ हठि न पतीजै ना बहु भेखै ॥ घड़ि भाडे जिनि अम्रितु पाइआ ॥ प्रेम भगति प्रभि मनु पतीआइआ ॥४॥

पड़ि पड़ि भूलहि चोटा खाहि ॥ बहुतु सिआणप आवहि जाहि ॥ नामु जपै भउ भोजनु खाइ ॥ गुरमुखि सेवक रहे समाइ ॥५॥

पूजि सिला तीरथ बन वासा ॥ भरमत डोलत भए उदासा ॥ मनि मैलै सूचा किउ होइ ॥ साचि मिलै पावै पति सोइ ॥६॥

आचारा वीचारु सरीरि ॥ आदि जुगादि सहजि मनु धीरि ॥ पल पंकज महि कोटि उधारे ॥ करि किरपा गुरु मेलि पिआरे ॥७॥

किसु आगै प्रभ तुधु सालाही ॥ तुधु बिनु दूजा मै को नाही ॥ जिउ तुधु भावै तिउ राखु रजाइ ॥ नानक सहजि भाइ गुण गाइ ॥८॥२॥

(राग धनासरी -- SGGS 687) धनासरी महला १ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तीरथि नावण जाउ तीरथु नामु है ॥ तीरथु सबद बीचारु अंतरि गिआनु है ॥ गुर गिआनु साचा थानु तीरथु दस पुरब सदा दसाहरा ॥ हउ नामु हरि का सदा जाचउ देहु प्रभ धरणीधरा ॥ संसारु रोगी नामु दारू मैलु लागै सच बिना ॥ गुर वाकु निरमलु सदा चानणु नित साचु तीरथु मजना ॥१॥

साचि न लागै मैलु किआ मलु धोईऐ ॥ गुणहि हारु परोइ किस कउ रोईऐ ॥ वीचारि मारै तरै तारै उलटि जोनि न आवए ॥ आपि पारसु परम धिआनी साचु साचे भावए ॥ आनंदु अनदिनु हरखु साचा दूख किलविख परहरे ॥ सचु नामु पाइआ गुरि दिखाइआ मैलु नाही सच मने ॥२॥

संगति मीत मिलापु पूरा नावणो ॥ गावै गावणहारु सबदि सुहावणो ॥ सालाहि साचे मंनि सतिगुरु पुंन दान दइआ मते ॥ पिर संगि भावै सहजि नावै बेणी त संगमु सत सते ॥ आराधि एकंकारु साचा नित देइ चड़ै सवाइआ ॥ गति संगि मीता संतसंगति करि नदरि मेलि मिलाइआ ॥३॥

कहणु कहै सभु कोइ केवडु आखीऐ ॥ हउ मूरखु नीचु अजाणु समझा साखीऐ ॥ सचु गुर की साखी अम्रित भाखी तितु मनु मानिआ मेरा ॥ कूचु करहि आवहि बिखु लादे सबदि सचै गुरु मेरा ॥ आखणि तोटि न भगति भंडारी भरिपुरि रहिआ सोई ॥ नानक साचु कहै बेनंती मनु मांजै सचु सोई ॥४॥१॥

(राग धनासरी -- SGGS 688) धनासरी महला १ ॥
जीवा तेरै नाइ मनि आनंदु है जीउ ॥ साचो साचा नाउ गुण गोविंदु है जीउ ॥ गुर गिआनु अपारा सिरजणहारा जिनि सिरजी तिनि गोई ॥ परवाणा आइआ हुकमि पठाइआ फेरि न सकै कोई ॥ आपे करि वेखै सिरि सिरि लेखै आपे सुरति बुझाई ॥ नानक साहिबु अगम अगोचरु जीवा सची नाई ॥१॥

तुम सरि अवरु न कोइ आइआ जाइसी जीउ ॥ हुकमी होइ निबेड़ु भरमु चुकाइसी जीउ ॥ गुरु भरमु चुकाए अकथु कहाए सच महि साचु समाणा ॥ आपि उपाए आपि समाए हुकमी हुकमु पछाणा ॥ सची वडिआई गुर ते पाई तू मनि अंति सखाई ॥ नानक साहिबु अवरु न दूजा नामि तेरै वडिआई ॥२॥

तू सचा सिरजणहारु अलख सिरंदिआ जीउ ॥ एकु साहिबु दुइ राह वाद वधंदिआ जीउ ॥ दुइ राह चलाए हुकमि सबाए जनमि मुआ संसारा ॥ नाम बिना नाही को बेली बिखु लादी सिरि भारा ॥ हुकमी आइआ हुकमु न बूझै हुकमि सवारणहारा ॥ नानक साहिबु सबदि सिञापै साचा सिरजणहारा ॥३॥

भगत सोहहि दरवारि सबदि सुहाइआ जीउ ॥ बोलहि अम्रित बाणि रसन रसाइआ जीउ ॥ रसन रसाए नामि तिसाए गुर कै सबदि विकाणे ॥ पारसि परसिऐ पारसु होए जा तेरै मनि भाणे ॥ अमरा पदु पाइआ आपु गवाइआ विरला गिआन वीचारी ॥ नानक भगत सोहनि दरि साचै साचे के वापारी ॥४॥

भूख पिआसो आथि किउ दरि जाइसा जीउ ॥ सतिगुर पूछउ जाइ नामु धिआइसा जीउ ॥ सचु नामु धिआई साचु चवाई गुरमुखि साचु पछाणा ॥ दीना नाथु दइआलु निरंजनु अनदिनु नामु वखाणा ॥ करणी कार धुरहु फुरमाई आपि मुआ मनु मारी ॥ नानक नामु महा रसु मीठा त्रिसना नामि निवारी ॥५॥२॥

(राग धनासरी -- SGGS 689) धनासरी छंत महला १ ॥
पिर संगि मूठड़ीए खबरि न पाईआ जीउ ॥ मसतकि लिखिअड़ा लेखु पुरबि कमाइआ जीउ ॥ लेखु न मिटई पुरबि कमाइआ किआ जाणा किआ होसी ॥ गुणी अचारि नही रंगि राती अवगुण बहि बहि रोसी ॥ धनु जोबनु आक की छाइआ बिरधि भए दिन पुंनिआ ॥ नानक नाम बिना दोहागणि छूटी झूठि विछुंनिआ ॥१॥

बूडी घरु घालिओ गुर कै भाइ चलो ॥ साचा नामु धिआइ पावहि सुखि महलो ॥ हरि नामु धिआए ता सुखु पाए पेईअड़ै दिन चारे ॥ निज घरि जाइ बहै सचु पाए अनदिनु नालि पिआरे ॥ विणु भगती घरि वासु न होवी सुणिअहु लोक सबाए ॥ नानक सरसी ता पिरु पाए राती साचै नाए ॥२॥

पिरु धन भावै ता पिर भावै नारी जीउ ॥ रंगि प्रीतम राती गुर कै सबदि वीचारी जीउ ॥ गुर सबदि वीचारी नाह पिआरी निवि निवि भगति करेई ॥ माइआ मोहु जलाए प्रीतमु रस महि रंगु करेई ॥ प्रभ साचे सेती रंगि रंगेती लाल भई मनु मारी ॥ नानक साचि वसी सोहागणि पिर सिउ प्रीति पिआरी ॥३॥

पिर घरि सोहै नारि जे पिर भावए जीउ ॥ झूठे वैण चवे कामि न आवए जीउ ॥ झूठु अलावै कामि न आवै ना पिरु देखै नैणी ॥ अवगुणिआरी कंति विसारी छूटी विधण रैणी ॥ गुर सबदु न मानै फाही फाथी सा धन महलु न पाए ॥ नानक आपे आपु पछाणै गुरमुखि सहजि समाए ॥४॥

धन सोहागणि नारि जिनि पिरु जाणिआ जीउ ॥ नाम बिना कूड़िआरि कूड़ु कमाणिआ जीउ ॥ हरि भगति सुहावी साचे भावी भाइ भगति प्रभ राती ॥ पिरु रलीआला जोबनि बाला तिसु रावे रंगि राती ॥ गुर सबदि विगासी सहु रावासी फलु पाइआ गुणकारी ॥ नानक साचु मिलै वडिआई पिर घरि सोहै नारी ॥५॥३॥

(राग तिलंग -- SGGS 721) रागु तिलंग महला १ घरु १
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
यक अरज गुफतम पेसि तो दर गोस कुन करतार ॥ हका कबीर करीम तू बेऐब परवदगार ॥१॥

दुनीआ मुकामे फानी तहकीक दिल दानी ॥ मम सर मूइ अजराईल गिरफतह दिल हेचि न दानी ॥१॥ रहाउ ॥

जन पिसर पदर बिरादरां कस नेस दसतंगीर ॥ आखिर बिअफतम कस न दारद चूं सवद तकबीर ॥२॥

सब रोज गसतम दर हवा करदेम बदी खिआल ॥ गाहे न नेकी कार करदम मम ईं चिनी अहवाल ॥३॥

बदबखत हम चु बखील गाफिल बेनजर बेबाक ॥ नानक बुगोयद जनु तुरा तेरे चाकरां पा खाक ॥४॥१॥

(राग तिलंग -- SGGS 721) तिलंग महला १ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भउ तेरा भांग खलड़ी मेरा चीतु ॥ मै देवाना भइआ अतीतु ॥ कर कासा दरसन की भूख ॥ मै दरि मागउ नीता नीत ॥१॥

तउ दरसन की करउ समाइ ॥ मै दरि मागतु भीखिआ पाइ ॥१॥ रहाउ ॥

केसरि कुसम मिरगमै हरणा सरब सरीरी चड़्हणा ॥ चंदन भगता जोति इनेही सरबे परमलु करणा ॥२॥

घिअ पट भांडा कहै न कोइ ॥ ऐसा भगतु वरन महि होइ ॥ तेरै नामि निवे रहे लिव लाइ ॥ नानक तिन दरि भीखिआ पाइ ॥३॥१॥२॥

(राग तिलंग -- SGGS 721) तिलंग महला १ घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इहु तनु माइआ पाहिआ पिआरे लीतड़ा लबि रंगाए ॥ मेरै कंत न भावै चोलड़ा पिआरे किउ धन सेजै जाए ॥१॥

हंउ कुरबानै जाउ मिहरवाना हंउ कुरबानै जाउ ॥ हंउ कुरबानै जाउ तिना कै लैनि जो तेरा नाउ ॥ लैनि जो तेरा नाउ तिना कै हंउ सद कुरबानै जाउ ॥१॥ रहाउ ॥

काइआ रंङणि जे थीऐ पिआरे पाईऐ नाउ मजीठ ॥ रंङण वाला जे रंङै साहिबु ऐसा रंगु न डीठ ॥२॥

जिन के चोले रतड़े पिआरे कंतु तिना कै पासि ॥ धूड़ि तिना की जे मिलै जी कहु नानक की अरदासि ॥३॥

आपे साजे आपे रंगे आपे नदरि करेइ ॥ नानक कामणि कंतै भावै आपे ही रावेइ ॥४॥१॥३॥

(राग तिलंग -- SGGS 722) तिलंग मः १ ॥
इआनड़ीए मानड़ा काइ करेहि ॥ आपनड़ै घरि हरि रंगो की न माणेहि ॥ सहु नेड़ै धन कमलीए बाहरु किआ ढूढेहि ॥ भै कीआ देहि सलाईआ नैणी भाव का करि सीगारो ॥ ता सोहागणि जाणीऐ लागी जा सहु धरे पिआरो ॥१॥

इआणी बाली किआ करे जा धन कंत न भावै ॥ करण पलाह करे बहुतेरे सा धन महलु न पावै ॥ विणु करमा किछु पाईऐ नाही जे बहुतेरा धावै ॥ लब लोभ अहंकार की माती माइआ माहि समाणी ॥ इनी बाती सहु पाईऐ नाही भई कामणि इआणी ॥२॥

जाइ पुछहु सोहागणी वाहै किनी बाती सहु पाईऐ ॥ जो किछु करे सो भला करि मानीऐ हिकमति हुकमु चुकाईऐ ॥ जा कै प्रेमि पदारथु पाईऐ तउ चरणी चितु लाईऐ ॥ सहु कहै सो कीजै तनु मनो दीजै ऐसा परमलु लाईऐ ॥ एव कहहि सोहागणी भैणे इनी बाती सहु पाईऐ ॥३॥

आपु गवाईऐ ता सहु पाईऐ अउरु कैसी चतुराई ॥ सहु नदरि करि देखै सो दिनु लेखै कामणि नउ निधि पाई ॥ आपणे कंत पिआरी सा सोहागणि नानक सा सभराई ॥ ऐसै रंगि राती सहज की माती अहिनिसि भाइ समाणी ॥ सुंदरि साइ सरूप बिचखणि कहीऐ सा सिआणी ॥४॥२॥४॥


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