Pt 8 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 8 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग गउड़ी -- SGGS 239) गउड़ी महला ५ ॥
बिनु सिमरन जैसे सरप आरजारी ॥ तिउ जीवहि साकत नामु बिसारी ॥१॥

एक निमख जो सिमरन महि जीआ ॥ कोटि दिनस लाख सदा थिरु थीआ ॥१॥ रहाउ ॥

बिनु सिमरन ध्रिगु करम करास ॥ काग बतन बिसटा महि वास ॥२॥

बिनु सिमरन भए कूकर काम ॥ साकत बेसुआ पूत निनाम ॥३॥

बिनु सिमरन जैसे सीङ छतारा ॥ बोलहि कूरु साकत मुखु कारा ॥४॥

बिनु सिमरन गरधभ की निआई ॥ साकत थान भरिसट फिराही ॥५॥

बिनु सिमरन कूकर हरकाइआ ॥ साकत लोभी बंधु न पाइआ ॥६॥

बिनु सिमरन है आतम घाती ॥ साकत नीच तिसु कुलु नही जाती ॥७॥

जिसु भइआ क्रिपालु तिसु सतसंगि मिलाइआ ॥ कहु नानक गुरि जगतु तराइआ ॥८॥७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 239) गउड़ी महला ५ ॥
गुर कै बचनि मोहि परम गति पाई ॥ गुरि पूरै मेरी पैज रखाई ॥१॥

गुर कै बचनि धिआइओ मोहि नाउ ॥ गुर परसादि मोहि मिलिआ थाउ ॥१॥ रहाउ ॥

गुर कै बचनि सुणि रसन वखाणी ॥ गुर किरपा ते अम्रित मेरी बाणी ॥२॥

गुर कै बचनि मिटिआ मेरा आपु ॥ गुर की दइआ ते मेरा वड परतापु ॥३॥

गुर कै बचनि मिटिआ मेरा भरमु ॥ गुर कै बचनि पेखिओ सभु ब्रहमु ॥४॥

गुर कै बचनि कीनो राजु जोगु ॥ गुर कै संगि तरिआ सभु लोगु ॥५॥

गुर कै बचनि मेरे कारज सिधि ॥ गुर कै बचनि पाइआ नाउ निधि ॥६॥

जिनि जिनि कीनी मेरे गुर की आसा ॥ तिस की कटीऐ जम की फासा ॥७॥

गुर कै बचनि जागिआ मेरा करमु ॥ नानक गुरु भेटिआ पारब्रहमु ॥८॥८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 239) गउड़ी महला ५ ॥
तिसु गुर कउ सिमरउ सासि सासि ॥ गुरु मेरे प्राण सतिगुरु मेरी रासि ॥१॥ रहाउ ॥

गुर का दरसनु देखि देखि जीवा ॥ गुर के चरण धोइ धोइ पीवा ॥१॥

गुर की रेणु नित मजनु करउ ॥ जनम जनम की हउमै मलु हरउ ॥२॥

तिसु गुर कउ झूलावउ पाखा ॥ महा अगनि ते हाथु दे राखा ॥३॥

तिसु गुर कै ग्रिहि ढोवउ पाणी ॥ जिसु गुर ते अकल गति जाणी ॥४॥

तिसु गुर कै ग्रिहि पीसउ नीत ॥ जिसु परसादि वैरी सभ मीत ॥५॥

जिनि गुरि मो कउ दीना जीउ ॥ आपुना दासरा आपे मुलि लीउ ॥६॥

आपे लाइओ अपना पिआरु ॥ सदा सदा तिसु गुर कउ करी नमसकारु ॥७॥

कलि कलेस भै भ्रम दुख लाथा ॥ कहु नानक मेरा गुरु समराथा ॥८॥९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 240) गउड़ी महला ५ ॥
मिलु मेरे गोबिंद अपना नामु देहु ॥ नाम बिना ध्रिगु ध्रिगु असनेहु ॥१॥ रहाउ ॥

नाम बिना जो पहिरै खाइ ॥ जिउ कूकरु जूठन महि पाइ ॥१॥

नाम बिना जेता बिउहारु ॥ जिउ मिरतक मिथिआ सीगारु ॥२॥

नामु बिसारि करे रस भोग ॥ सुखु सुपनै नही तन महि रोग ॥३॥

नामु तिआगि करे अन काज ॥ बिनसि जाइ झूठे सभि पाज ॥४॥

नाम संगि मनि प्रीति न लावै ॥ कोटि करम करतो नरकि जावै ॥५॥

हरि का नामु जिनि मनि न आराधा ॥ चोर की निआई जम पुरि बाधा ॥६॥

लाख अड्मबर बहुतु बिसथारा ॥ नाम बिना झूठे पासारा ॥७॥

हरि का नामु सोई जनु लेइ ॥ करि किरपा नानक जिसु देइ ॥८॥१०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 240) गउड़ी महला ५ ॥
आदि मधि जो अंति निबाहै ॥ सो साजनु मेरा मनु चाहै ॥१॥

हरि की प्रीति सदा संगि चालै ॥ दइआल पुरख पूरन प्रतिपालै ॥१॥ रहाउ ॥

बिनसत नाही छोडि न जाइ ॥ जह पेखा तह रहिआ समाइ ॥२॥

सुंदरु सुघड़ु चतुरु जीअ दाता ॥ भाई पूतु पिता प्रभु माता ॥३॥

जीवन प्रान अधार मेरी रासि ॥ प्रीति लाई करि रिदै निवासि ॥४॥

माइआ सिलक काटी गोपालि ॥ करि अपुना लीनो नदरि निहालि ॥५॥

सिमरि सिमरि काटे सभि रोग ॥ चरण धिआन सरब सुख भोग ॥६॥

पूरन पुरखु नवतनु नित बाला ॥ हरि अंतरि बाहरि संगि रखवाला ॥७॥

कहु नानक हरि हरि पदु चीन ॥ सरबसु नामु भगत कउ दीन ॥८॥११॥

(राग गउड़ी माझ -- SGGS 240) रागु गउड़ी माझ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
खोजत फिरे असंख अंतु न पारीआ ॥ सेई होए भगत जिना किरपारीआ ॥१॥

हउ वारीआ हरि वारीआ ॥१॥ रहाउ ॥

सुणि सुणि पंथु डराउ बहुतु भैहारीआ ॥ मै तकी ओट संताह लेहु उबारीआ ॥२॥

मोहन लाल अनूप सरब साधारीआ ॥ गुर निवि निवि लागउ पाइ देहु दिखारीआ ॥३॥

मै कीए मित्र अनेक इकसु बलिहारीआ ॥ सभ गुण किस ही नाहि हरि पूर भंडारीआ ॥४॥

चहु दिसि जपीऐ नाउ सूखि सवारीआ ॥ मै आही ओड़ि तुहारि नानक बलिहारीआ ॥५॥

गुरि काढिओ भुजा पसारि मोह कूपारीआ ॥ मै जीतिओ जनमु अपारु बहुरि न हारीआ ॥६॥

मै पाइओ सरब निधानु अकथु कथारीआ ॥ हरि दरगह सोभावंत बाह लुडारीआ ॥७॥

जन नानक लधा रतनु अमोलु अपारीआ ॥ गुर सेवा भउजलु तरीऐ कहउ पुकारीआ ॥८॥१२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 241) गउड़ी महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाराइण हरि रंग रंगो ॥ जपि जिहवा हरि एक मंगो ॥१॥ रहाउ ॥

तजि हउमै गुर गिआन भजो ॥ मिलि संगति धुरि करम लिखिओ ॥१॥

जो दीसै सो संगि न गइओ ॥ साकतु मूड़ु लगे पचि मुइओ ॥२॥

मोहन नामु सदा रवि रहिओ ॥ कोटि मधे किनै गुरमुखि लहिओ ॥३॥

हरि संतन करि नमो नमो ॥ नउ निधि पावहि अतुलु सुखो ॥४॥

नैन अलोवउ साध जनो ॥ हिरदै गावहु नाम निधो ॥५॥

काम क्रोध लोभु मोहु तजो ॥ जनम मरन दुहु ते रहिओ ॥६॥

दूखु अंधेरा घर ते मिटिओ ॥ गुरि गिआनु द्रिड़ाइओ दीप बलिओ ॥७॥

जिनि सेविआ सो पारि परिओ ॥ जन नानक गुरमुखि जगतु तरिओ ॥८॥१॥१३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 241) महला ५ गउड़ी ॥
हरि हरि गुरु गुरु करत भरम गए ॥ मेरै मनि सभि सुख पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥

बलतो जलतो तउकिआ गुर चंदनु सीतलाइओ ॥१॥

अगिआन अंधेरा मिटि गइआ गुर गिआनु दीपाइओ ॥२॥

पावकु सागरु गहरो चरि संतन नाव तराइओ ॥३॥

ना हम करम न धरम सुच प्रभि गहि भुजा आपाइओ ॥४॥

भउ खंडनु दुख भंजनो भगति वछल हरि नाइओ ॥५॥

अनाथह नाथ क्रिपाल दीन सम्रिथ संत ओटाइओ ॥६॥

निरगुनीआरे की बेनती देहु दरसु हरि राइओ ॥७॥

नानक सरनि तुहारी ठाकुर सेवकु दुआरै आइओ ॥८॥२॥१४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 242) गउड़ी महला ५ ॥
रंग संगि बिखिआ के भोगा इन संगि अंध न जानी ॥१॥

हउ संचउ हउ खाटता सगली अवध बिहानी ॥ रहाउ ॥ हउ सूरा परधानु हउ को नाही मुझहि समानी ॥२॥

जोबनवंत अचार कुलीना मन महि होइ गुमानी ॥३॥

जिउ उलझाइओ बाध बुधि का मरतिआ नही बिसरानी ॥४॥

भाई मीत बंधप सखे पाछे तिनहू कउ स्मपानी ॥५॥

जितु लागो मनु बासना अंति साई प्रगटानी ॥६॥

अह्मबुधि सुचि करम करि इह बंधन बंधानी ॥७॥

दइआल पुरख किरपा करहु नानक दास दसानी ॥८॥३॥१५॥४४॥ जुमला

(राग गउड़ी -- SGGS 247) रागु गउड़ी छंत महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरै मनि बैरागु भइआ जीउ किउ देखा प्रभ दाते ॥ मेरे मीत सखा हरि जीउ गुर पुरख बिधाते ॥ पुरखो बिधाता एकु स्रीधरु किउ मिलह तुझै उडीणीआ ॥ कर करहि सेवा सीसु चरणी मनि आस दरस निमाणीआ ॥ सासि सासि न घड़ी विसरै पलु मूरतु दिनु राते ॥ नानक सारिंग जिउ पिआसे किउ मिलीऐ प्रभ दाते ॥१॥

इक बिनउ करउ जीउ सुणि कंत पिआरे ॥ मेरा मनु तनु मोहि लीआ जीउ देखि चलत तुमारे ॥ चलता तुमारे देखि मोही उदास धन किउ धीरए ॥ गुणवंत नाह दइआलु बाला सरब गुण भरपूरए ॥ पिर दोसु नाही सुखह दाते हउ विछुड़ी बुरिआरे ॥ बिनवंति नानक दइआ धारहु घरि आवहु नाह पिआरे ॥२॥

हउ मनु अरपी सभु तनु अरपी अरपी सभि देसा ॥ हउ सिरु अरपी तिसु मीत पिआरे जो प्रभ देइ सदेसा ॥ अरपिआ त सीसु सुथानि गुर पहि संगि प्रभू दिखाइआ ॥ खिन माहि सगला दूखु मिटिआ मनहु चिंदिआ पाइआ ॥ दिनु रैणि रलीआ करै कामणि मिटे सगल अंदेसा ॥ बिनवंति नानकु कंतु मिलिआ लोड़ते हम जैसा ॥३॥

मेरै मनि अनदु भइआ जीउ वजी वाधाई ॥ घरि लालु आइआ पिआरा सभ तिखा बुझाई ॥ मिलिआ त लालु गुपालु ठाकुरु सखी मंगलु गाइआ ॥ सभ मीत बंधप हरखु उपजिआ दूत थाउ गवाइआ ॥ अनहत वाजे वजहि घर महि पिर संगि सेज विछाई ॥ बिनवंति नानकु सहजि रहै हरि मिलिआ कंतु सुखदाई ॥४॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 248) गउड़ी महला ५ ॥
मोहन तेरे ऊचे मंदर महल अपारा ॥ मोहन तेरे सोहनि दुआर जीउ संत धरम साला ॥ धरम साल अपार दैआर ठाकुर सदा कीरतनु गावहे ॥ जह साध संत इकत्र होवहि तहा तुझहि धिआवहे ॥ करि दइआ मइआ दइआल सुआमी होहु दीन क्रिपारा ॥ बिनवंति नानक दरस पिआसे मिलि दरसन सुखु सारा ॥१॥

मोहन तेरे बचन अनूप चाल निराली ॥ मोहन तूं मानहि एकु जी अवर सभ राली ॥ मानहि त एकु अलेखु ठाकुरु जिनहि सभ कल धारीआ ॥ तुधु बचनि गुर कै वसि कीआ आदि पुरखु बनवारीआ ॥ तूं आपि चलिआ आपि रहिआ आपि सभ कल धारीआ ॥ बिनवंति नानक पैज राखहु सभ सेवक सरनि तुमारीआ ॥२॥

मोहन तुधु सतसंगति धिआवै दरस धिआना ॥ मोहन जमु नेड़ि न आवै तुधु जपहि निदाना ॥ जमकालु तिन कउ लगै नाही जो इक मनि धिआवहे ॥ मनि बचनि करमि जि तुधु अराधहि से सभे फल पावहे ॥ मल मूत मूड़ जि मुगध होते सि देखि दरसु सुगिआना ॥ बिनवंति नानक राजु निहचलु पूरन पुरख भगवाना ॥३॥

मोहन तूं सुफलु फलिआ सणु परवारे ॥ मोहन पुत्र मीत भाई कुट्मब सभि तारे ॥ तारिआ जहानु लहिआ अभिमानु जिनी दरसनु पाइआ ॥ जिनी तुधनो धंनु कहिआ तिन जमु नेड़ि न आइआ ॥ बेअंत गुण तेरे कथे न जाही सतिगुर पुरख मुरारे ॥ बिनवंति नानक टेक राखी जितु लगि तरिआ संसारे ॥४॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 248) गउड़ी महला ५ ॥
सलोकु ॥ पतित असंख पुनीत करि पुनह पुनह बलिहार ॥ नानक राम नामु जपि पावको तिन किलबिख दाहनहार ॥१॥

छंत ॥ जपि मना तूं राम नराइणु गोविंदा हरि माधो ॥ धिआइ मना मुरारि मुकंदे कटीऐ काल दुख फाधो ॥ दुखहरण दीन सरण स्रीधर चरन कमल अराधीऐ ॥ जम पंथु बिखड़ा अगनि सागरु निमख सिमरत साधीऐ ॥ कलिमलह दहता सुधु करता दिनसु रैणि अराधो ॥ बिनवंति नानक करहु किरपा गोपाल गोबिंद माधो ॥१॥

सिमरि मना दामोदरु दुखहरु भै भंजनु हरि राइआ ॥ स्रीरंगो दइआल मनोहरु भगति वछलु बिरदाइआ ॥ भगति वछल पुरख पूरन मनहि चिंदिआ पाईऐ ॥ तम अंध कूप ते उधारै नामु मंनि वसाईऐ ॥ सुर सिध गण गंधरब मुनि जन गुण अनिक भगती गाइआ ॥ बिनवंति नानक करहु किरपा पारब्रहम हरि राइआ ॥२॥

चेति मना पारब्रहमु परमेसरु सरब कला जिनि धारी ॥ करुणा मै समरथु सुआमी घट घट प्राण अधारी ॥ प्राण मन तन जीअ दाता बेअंत अगम अपारो ॥ सरणि जोगु समरथु मोहनु सरब दोख बिदारो ॥ रोग सोग सभि दोख बिनसहि जपत नामु मुरारी ॥ बिनवंति नानक करहु किरपा समरथ सभ कल धारी ॥३॥

गुण गाउ मना अचुत अबिनासी सभ ते ऊच दइआला ॥ बिस्मभरु देवन कउ एकै सरब करै प्रतिपाला ॥ प्रतिपाल महा दइआल दाना दइआ धारे सभ किसै ॥ कालु कंटकु लोभु मोहु नासै जीअ जा कै प्रभु बसै ॥ सुप्रसंन देवा सफल सेवा भई पूरन घाला ॥ बिनवंत नानक इछ पुनी जपत दीन दैआला ॥४॥३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 249) गउड़ी महला ५ ॥
सुणि सखीए मिलि उदमु करेहा मनाइ लैहि हरि कंतै ॥ मानु तिआगि करि भगति ठगउरी मोहह साधू मंतै ॥ सखी वसि आइआ फिरि छोडि न जाई इह रीति भली भगवंतै ॥ नानक जरा मरण भै नरक निवारै पुनीत करै तिसु जंतै ॥१॥

सुणि सखीए इह भली बिनंती एहु मतांतु पकाईऐ ॥ सहजि सुभाइ उपाधि रहत होइ गीत गोविंदहि गाईऐ ॥ कलि कलेस मिटहि भ्रम नासहि मनि चिंदिआ फलु पाईऐ ॥ पारब्रहम पूरन परमेसर नानक नामु धिआईऐ ॥२॥

सखी इछ करी नित सुख मनाई प्रभ मेरी आस पुजाए ॥ चरन पिआसी दरस बैरागनि पेखउ थान सबाए ॥ खोजि लहउ हरि संत जना संगु सम्रिथ पुरख मिलाए ॥ नानक तिन मिलिआ सुरिजनु सुखदाता से वडभागी माए ॥३॥

सखी नालि वसा अपुने नाह पिआरे मेरा मनु तनु हरि संगि हिलिआ ॥ सुणि सखीए मेरी नीद भली मै आपनड़ा पिरु मिलिआ ॥ भ्रमु खोइओ सांति सहजि सुआमी परगासु भइआ कउलु खिलिआ ॥ वरु पाइआ प्रभु अंतरजामी नानक सोहागु न टलिआ ॥४॥४॥२॥५॥११॥

(राग गउड़ी -- SGGS 250) ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गउड़ी बावन अखरी महला ५ ॥
सलोकु ॥ गुरदेव माता गुरदेव पिता गुरदेव सुआमी परमेसुरा ॥ गुरदेव सखा अगिआन भंजनु गुरदेव बंधिप सहोदरा ॥ गुरदेव दाता हरि नामु उपदेसै गुरदेव मंतु निरोधरा ॥ गुरदेव सांति सति बुधि मूरति गुरदेव पारस परस परा ॥ गुरदेव तीरथु अम्रित सरोवरु गुर गिआन मजनु अपर्मपरा ॥ गुरदेव करता सभि पाप हरता गुरदेव पतित पवित करा ॥ गुरदेव आदि जुगादि जुगु जुगु गुरदेव मंतु हरि जपि उधरा ॥ गुरदेव संगति प्रभ मेलि करि किरपा हम मूड़ पापी जितु लगि तरा ॥ गुरदेव सतिगुरु पारब्रहमु परमेसरु गुरदेव नानक हरि नमसकरा ॥१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 250) सलोकु ॥
आपहि कीआ कराइआ आपहि करनै जोगु ॥ नानक एको रवि रहिआ दूसर होआ न होगु ॥१॥

पउड़ी ॥ ओअं साध सतिगुर नमसकारं ॥ आदि मधि अंति निरंकारं ॥ आपहि सुंन आपहि सुख आसन ॥ आपहि सुनत आप ही जासन ॥ आपन आपु आपहि उपाइओ ॥ आपहि बाप आप ही माइओ ॥ आपहि सूखम आपहि असथूला ॥ लखी न जाई नानक लीला ॥१॥

करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥ तेरे संतन की मनु होइ रवाला ॥ रहाउ ॥

(राग गउड़ी -- SGGS 250) सलोकु ॥
निरंकार आकार आपि निरगुन सरगुन एक ॥ एकहि एक बखाननो नानक एक अनेक ॥१॥

पउड़ी ॥ ओअं गुरमुखि कीओ अकारा ॥ एकहि सूति परोवनहारा ॥ भिंन भिंन त्रै गुण बिसथारं ॥ निरगुन ते सरगुन द्रिसटारं ॥ सगल भाति करि करहि उपाइओ ॥ जनम मरन मन मोहु बढाइओ ॥ दुहू भाति ते आपि निरारा ॥ नानक अंतु न पारावारा ॥२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 250) सलोकु ॥
सेई साह भगवंत से सचु स्मपै हरि रासि ॥ नानक सचु सुचि पाईऐ तिह संतन कै पासि ॥१॥

पवड़ी ॥ ससा सति सति सति सोऊ ॥ सति पुरख ते भिंन न कोऊ ॥ सोऊ सरनि परै जिह पायं ॥ सिमरि सिमरि गुन गाइ सुनायं ॥ संसै भरमु नही कछु बिआपत ॥ प्रगट प्रतापु ताहू को जापत ॥ सो साधू इह पहुचनहारा ॥ नानक ता कै सद बलिहारा ॥३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 250) सलोकु ॥
धनु धनु कहा पुकारते माइआ मोह सभ कूर ॥ नाम बिहूने नानका होत जात सभु धूर ॥१॥

पवड़ी ॥ धधा धूरि पुनीत तेरे जनूआ ॥ धनि तेऊ जिह रुच इआ मनूआ ॥ धनु नही बाछहि सुरग न आछहि ॥ अति प्रिअ प्रीति साध रज राचहि ॥ धंधे कहा बिआपहि ताहू ॥ जो एक छाडि अन कतहि न जाहू ॥ जा कै हीऐ दीओ प्रभ नाम ॥ नानक साध पूरन भगवान ॥४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 251) सलोक ॥
अनिक भेख अरु ङिआन धिआन मनहठि मिलिअउ न कोइ ॥ कहु नानक किरपा भई भगतु ङिआनी सोइ ॥१॥

पउड़ी ॥ ङंङा ङिआनु नही मुख बातउ ॥ अनिक जुगति सासत्र करि भातउ ॥ ङिआनी सोइ जा कै द्रिड़ सोऊ ॥ कहत सुनत कछु जोगु न होऊ ॥ ङिआनी रहत आगिआ द्रिड़ु जा कै ॥ उसन सीत समसरि सभ ता कै ॥ ङिआनी ततु गुरमुखि बीचारी ॥ नानक जा कउ किरपा धारी ॥५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 251) सलोकु ॥
आवन आए स्रिसटि महि बिनु बूझे पसु ढोर ॥ नानक गुरमुखि सो बुझै जा कै भाग मथोर ॥१॥

पउड़ी ॥ या जुग महि एकहि कउ आइआ ॥ जनमत मोहिओ मोहनी माइआ ॥ गरभ कुंट महि उरध तप करते ॥ सासि सासि सिमरत प्रभु रहते ॥ उरझि परे जो छोडि छडाना ॥ देवनहारु मनहि बिसराना ॥ धारहु किरपा जिसहि गुसाई ॥ इत उत नानक तिसु बिसरहु नाही ॥६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 251) सलोकु ॥
आवत हुकमि बिनास हुकमि आगिआ भिंन न कोइ ॥ आवन जाना तिह मिटै नानक जिह मनि सोइ ॥१॥

पउड़ी ॥ एऊ जीअ बहुतु ग्रभ वासे ॥ मोह मगन मीठ जोनि फासे ॥ इनि माइआ त्रै गुण बसि कीने ॥ आपन मोह घटे घटि दीने ॥ ए साजन कछु कहहु उपाइआ ॥ जा ते तरउ बिखम इह माइआ ॥ करि किरपा सतसंगि मिलाए ॥ नानक ता कै निकटि न माए ॥७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 251) सलोकु ॥
किरत कमावन सुभ असुभ कीने तिनि प्रभि आपि ॥ पसु आपन हउ हउ करै नानक बिनु हरि कहा कमाति ॥१॥

पउड़ी ॥ एकहि आपि करावनहारा ॥ आपहि पाप पुंन बिसथारा ॥ इआ जुग जितु जितु आपहि लाइओ ॥ सो सो पाइओ जु आपि दिवाइओ ॥ उआ का अंतु न जानै कोऊ ॥ जो जो करै सोऊ फुनि होऊ ॥ एकहि ते सगला बिसथारा ॥ नानक आपि सवारनहारा ॥८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 251) सलोकु ॥
राचि रहे बनिता बिनोद कुसम रंग बिख सोर ॥ नानक तिह सरनी परउ बिनसि जाइ मै मोर ॥१॥

पउड़ी ॥ रे मन बिनु हरि जह रचहु तह तह बंधन पाहि ॥ जिह बिधि कतहू न छूटीऐ साकत तेऊ कमाहि ॥ हउ हउ करते करम रत ता को भारु अफार ॥ प्रीति नही जउ नाम सिउ तउ एऊ करम बिकार ॥ बाधे जम की जेवरी मीठी माइआ रंग ॥ भ्रम के मोहे नह बुझहि सो प्रभु सदहू संग ॥ लेखै गणत न छूटीऐ काची भीति न सुधि ॥ जिसहि बुझाए नानका तिह गुरमुखि निरमल बुधि ॥९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 252) सलोकु ॥
टूटे बंधन जासु के होआ साधू संगु ॥ जो राते रंग एक कै नानक गूड़ा रंगु ॥१॥

पउड़ी ॥ रारा रंगहु इआ मनु अपना ॥ हरि हरि नामु जपहु जपु रसना ॥ रे रे दरगह कहै न कोऊ ॥ आउ बैठु आदरु सुभ देऊ ॥ उआ महली पावहि तू बासा ॥ जनम मरन नह होइ बिनासा ॥ मसतकि करमु लिखिओ धुरि जा कै ॥ हरि स्मपै नानक घरि ता कै ॥१०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 252) सलोकु ॥
लालच झूठ बिकार मोह बिआपत मूड़े अंध ॥ लागि परे दुरगंध सिउ नानक माइआ बंध ॥१॥

पउड़ी ॥ लला लपटि बिखै रस राते ॥ अह्मबुधि माइआ मद माते ॥ इआ माइआ महि जनमहि मरना ॥ जिउ जिउ हुकमु तिवै तिउ करना ॥ कोऊ ऊन न कोऊ पूरा ॥ कोऊ सुघरु न कोऊ मूरा ॥ जितु जितु लावहु तितु तितु लगना ॥ नानक ठाकुर सदा अलिपना ॥११॥

(राग गउड़ी -- SGGS 252) सलोकु ॥
लाल गुपाल गोबिंद प्रभ गहिर ग्मभीर अथाह ॥ दूसर नाही अवर को नानक बेपरवाह ॥१॥

पउड़ी ॥ लला ता कै लवै न कोऊ ॥ एकहि आपि अवर नह होऊ ॥ होवनहारु होत सद आइआ ॥ उआ का अंतु न काहू पाइआ ॥ कीट हसति महि पूर समाने ॥ प्रगट पुरख सभ ठाऊ जाने ॥ जा कउ दीनो हरि रसु अपना ॥ नानक गुरमुखि हरि हरि तिह जपना ॥१२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 252) सलोकु ॥
आतम रसु जिह जानिआ हरि रंग सहजे माणु ॥ नानक धनि धनि धंनि जन आए ते परवाणु ॥१॥

पउड़ी ॥ आइआ सफल ताहू को गनीऐ ॥ जासु रसन हरि हरि जसु भनीऐ ॥ आइ बसहि साधू कै संगे ॥ अनदिनु नामु धिआवहि रंगे ॥ आवत सो जनु नामहि राता ॥ जा कउ दइआ मइआ बिधाता ॥ एकहि आवन फिरि जोनि न आइआ ॥ नानक हरि कै दरसि समाइआ ॥१३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 252) सलोकु ॥
यासु जपत मनि होइ अनंदु बिनसै दूजा भाउ ॥ दूख दरद त्रिसना बुझै नानक नामि समाउ ॥१॥

पउड़ी ॥ यया जारउ दुरमति दोऊ ॥ तिसहि तिआगि सुख सहजे सोऊ ॥ यया जाइ परहु संत सरना ॥ जिह आसर इआ भवजलु तरना ॥ यया जनमि न आवै सोऊ ॥ एक नाम ले मनहि परोऊ ॥ यया जनमु न हारीऐ गुर पूरे की टेक ॥ नानक तिह सुखु पाइआ जा कै हीअरै एक ॥१४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 253) सलोकु ॥
अंतरि मन तन बसि रहे ईत ऊत के मीत ॥ गुरि पूरै उपदेसिआ नानक जपीऐ नीत ॥१॥

पउड़ी ॥ अनदिनु सिमरहु तासु कउ जो अंति सहाई होइ ॥ इह बिखिआ दिन चारि छिअ छाडि चलिओ सभु कोइ ॥ का को मात पिता सुत धीआ ॥ ग्रिह बनिता कछु संगि न लीआ ॥ ऐसी संचि जु बिनसत नाही ॥ पति सेती अपुनै घरि जाही ॥ साधसंगि कलि कीरतनु गाइआ ॥ नानक ते ते बहुरि न आइआ ॥१५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 253) सलोकु ॥
अति सुंदर कुलीन चतुर मुखि ङिआनी धनवंत ॥ मिरतक कहीअहि नानका जिह प्रीति नही भगवंत ॥१॥

पउड़ी ॥ ङंङा खटु सासत्र होइ ङिआता ॥ पूरकु कु्मभक रेचक करमाता ॥ ङिआन धिआन तीरथ इसनानी ॥ सोमपाक अपरस उदिआनी ॥ राम नाम संगि मनि नही हेता ॥ जो कछु कीनो सोऊ अनेता ॥ उआ ते ऊतमु गनउ चंडाला ॥ नानक जिह मनि बसहि गुपाला ॥१६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 253) सलोकु ॥
कुंट चारि दह दिसि भ्रमे करम किरति की रेख ॥ सूख दूख मुकति जोनि नानक लिखिओ लेख ॥१॥

पवड़ी ॥ कका कारन करता सोऊ ॥ लिखिओ लेखु न मेटत कोऊ ॥ नही होत कछु दोऊ बारा ॥ करनैहारु न भूलनहारा ॥ काहू पंथु दिखारै आपै ॥ काहू उदिआन भ्रमत पछुतापै ॥ आपन खेलु आप ही कीनो ॥ जो जो दीनो सु नानक लीनो ॥१७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 253) सलोकु ॥
खात खरचत बिलछत रहे टूटि न जाहि भंडार ॥ हरि हरि जपत अनेक जन नानक नाहि सुमार ॥१॥

पउड़ी ॥ खखा खूना कछु नही तिसु सम्रथ कै पाहि ॥ जो देना सो दे रहिओ भावै तह तह जाहि ॥ खरचु खजाना नाम धनु इआ भगतन की रासि ॥ खिमा गरीबी अनद सहज जपत रहहि गुणतास ॥ खेलहि बिगसहि अनद सिउ जा कउ होत क्रिपाल ॥ सदीव गनीव सुहावने राम नाम ग्रिहि माल ॥ खेदु न दूखु न डानु तिह जा कउ नदरि करी ॥ नानक जो प्रभ भाणिआ पूरी तिना परी ॥१८॥

(राग गउड़ी -- SGGS 254) सलोकु ॥
गनि मिनि देखहु मनै माहि सरपर चलनो लोग ॥ आस अनित गुरमुखि मिटै नानक नाम अरोग ॥१॥

पउड़ी ॥ गगा गोबिद गुण रवहु सासि सासि जपि नीत ॥ कहा बिसासा देह का बिलम न करिहो मीत ॥ नह बारिक नह जोबनै नह बिरधी कछु बंधु ॥ ओह बेरा नह बूझीऐ जउ आइ परै जम फंधु ॥ गिआनी धिआनी चतुर पेखि रहनु नही इह ठाइ ॥ छाडि छाडि सगली गई मूड़ तहा लपटाहि ॥ गुर प्रसादि सिमरत रहै जाहू मसतकि भाग ॥ नानक आए सफल ते जा कउ प्रिअहि सुहाग ॥१९॥

(राग गउड़ी -- SGGS 254) सलोकु ॥
घोखे सासत्र बेद सभ आन न कथतउ कोइ ॥ आदि जुगादी हुणि होवत नानक एकै सोइ ॥१॥

पउड़ी ॥ घघा घालहु मनहि एह बिनु हरि दूसर नाहि ॥ नह होआ नह होवना जत कत ओही समाहि ॥ घूलहि तउ मन जउ आवहि सरना ॥ नाम ततु कलि महि पुनहचरना ॥ घालि घालि अनिक पछुतावहि ॥ बिनु हरि भगति कहा थिति पावहि ॥ घोलि महा रसु अम्रितु तिह पीआ ॥ नानक हरि गुरि जा कउ दीआ ॥२०॥

(राग गउड़ी -- SGGS 254) सलोकु ॥
ङणि घाले सभ दिवस सास नह बढन घटन तिलु सार ॥ जीवन लोरहि भरम मोह नानक तेऊ गवार ॥१॥

पउड़ी ॥ ङंङा ङ्रासै कालु तिह जो साकत प्रभि कीन ॥ अनिक जोनि जनमहि मरहि आतम रामु न चीन ॥ ङिआन धिआन ताहू कउ आए ॥ करि किरपा जिह आपि दिवाए ॥ ङणती ङणी नही कोऊ छूटै ॥ काची गागरि सरपर फूटै ॥ सो जीवत जिह जीवत जपिआ ॥ प्रगट भए नानक नह छपिआ ॥२१॥

(राग गउड़ी -- SGGS 254) सलोकु ॥
चिति चितवउ चरणारबिंद ऊध कवल बिगसांत ॥ प्रगट भए आपहि गोबिंद नानक संत मतांत ॥१॥

पउड़ी ॥ चचा चरन कमल गुर लागा ॥ धनि धनि उआ दिन संजोग सभागा ॥ चारि कुंट दह दिसि भ्रमि आइओ ॥ भई क्रिपा तब दरसनु पाइओ ॥ चार बिचार बिनसिओ सभ दूआ ॥ साधसंगि मनु निरमल हूआ ॥ चिंत बिसारी एक द्रिसटेता ॥ नानक गिआन अंजनु जिह नेत्रा ॥२२॥

(राग गउड़ी -- SGGS 254) सलोकु ॥
छाती सीतल मनु सुखी छंत गोबिद गुन गाइ ॥ ऐसी किरपा करहु प्रभ नानक दास दसाइ ॥१॥

पउड़ी ॥ छछा छोहरे दास तुमारे ॥ दास दासन के पानीहारे ॥ छछा छारु होत तेरे संता ॥ अपनी क्रिपा करहु भगवंता ॥ छाडि सिआनप बहु चतुराई ॥ संतन की मन टेक टिकाई ॥ छारु की पुतरी परम गति पाई ॥ नानक जा कउ संत सहाई ॥२३॥

(राग गउड़ी -- SGGS 255) सलोकु ॥
जोर जुलम फूलहि घनो काची देह बिकार ॥ अह्मबुधि बंधन परे नानक नाम छुटार ॥१॥

पउड़ी ॥ जजा जानै हउ कछु हूआ ॥ बाधिओ जिउ नलिनी भ्रमि सूआ ॥ जउ जानै हउ भगतु गिआनी ॥ आगै ठाकुरि तिलु नही मानी ॥ जउ जानै मै कथनी करता ॥ बिआपारी बसुधा जिउ फिरता ॥ साधसंगि जिह हउमै मारी ॥ नानक ता कउ मिले मुरारी ॥२४॥

(राग गउड़ी -- SGGS 255) सलोकु ॥
झालाघे उठि नामु जपि निसि बासुर आराधि ॥ कार्हा तुझै न बिआपई नानक मिटै उपाधि ॥१॥

पउड़ी ॥ झझा झूरनु मिटै तुमारो ॥ राम नाम सिउ करि बिउहारो ॥ झूरत झूरत साकत मूआ ॥ जा कै रिदै होत भाउ बीआ ॥ झरहि कसमल पाप तेरे मनूआ ॥ अम्रित कथा संतसंगि सुनूआ ॥ झरहि काम क्रोध द्रुसटाई ॥ नानक जा कउ क्रिपा गुसाई ॥२५॥

(राग गउड़ी -- SGGS 255) सलोकु ॥
ञतन करहु तुम अनिक बिधि रहनु न पावहु मीत ॥ जीवत रहहु हरि हरि भजहु नानक नाम परीति ॥१॥

पवड़ी ॥ ञंञा ञाणहु द्रिड़ु सही बिनसि जात एह हेत ॥ गणती गणउ न गणि सकउ ऊठि सिधारे केत ॥ ञो पेखउ सो बिनसतउ का सिउ करीऐ संगु ॥ ञाणहु इआ बिधि सही चित झूठउ माइआ रंगु ॥ ञाणत सोई संतु सुइ भ्रम ते कीचित भिंन ॥ अंध कूप ते तिह कढहु जिह होवहु सुप्रसंन ॥ ञा कै हाथि समरथ ते कारन करनै जोग ॥ नानक तिह उसतति करउ ञाहू कीओ संजोग ॥२६॥

(राग गउड़ी -- SGGS 255) सलोकु ॥
टूटे बंधन जनम मरन साध सेव सुखु पाइ ॥ नानक मनहु न बीसरै गुण निधि गोबिद राइ ॥१॥

पउड़ी ॥ टहल करहु तउ एक की जा ते ब्रिथा न कोइ ॥ मनि तनि मुखि हीऐ बसै जो चाहहु सो होइ ॥ टहल महल ता कउ मिलै जा कउ साध क्रिपाल ॥ साधू संगति तउ बसै जउ आपन होहि दइआल ॥ टोहे टाहे बहु भवन बिनु नावै सुखु नाहि ॥ टलहि जाम के दूत तिह जु साधू संगि समाहि ॥ बारि बारि जाउ संत सदके ॥ नानक पाप बिनासे कदि के ॥२७॥

(राग गउड़ी -- SGGS 255) सलोकु ॥
ठाक न होती तिनहु दरि जिह होवहु सुप्रसंन ॥ जो जन प्रभि अपुने करे नानक ते धनि धंनि ॥१॥

पउड़ी ॥ ठठा मनूआ ठाहहि नाही ॥ जो सगल तिआगि एकहि लपटाही ॥ ठहकि ठहकि माइआ संगि मूए ॥ उआ कै कुसल न कतहू हूए ॥ ठांढि परी संतह संगि बसिआ ॥ अम्रित नामु तहा जीअ रसिआ ॥ ठाकुर अपुने जो जनु भाइआ ॥ नानक उआ का मनु सीतलाइआ ॥२८॥


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