Pt 4 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 4 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग माझ -- SGGS 136) फलगुणि अनंद उपारजना हरि सजण प्रगटे आइ ॥ संत सहाई राम के करि किरपा दीआ मिलाइ ॥ सेज सुहावी सरब सुख हुणि दुखा नाही जाइ ॥ इछ पुनी वडभागणी वरु पाइआ हरि राइ ॥ मिलि सहीआ मंगलु गावही गीत गोविंद अलाइ ॥ हरि जेहा अवरु न दिसई कोई दूजा लवै न लाइ ॥ हलतु पलतु सवारिओनु निहचल दितीअनु जाइ ॥ संसार सागर ते रखिअनु बहुड़ि न जनमै धाइ ॥ जिहवा एक अनेक गुण तरे नानक चरणी पाइ ॥ फलगुणि नित सलाहीऐ जिस नो तिलु न तमाइ ॥१३॥

(राग माझ -- SGGS 136) जिनि जिनि नामु धिआइआ तिन के काज सरे ॥ हरि गुरु पूरा आराधिआ दरगह सचि खरे ॥ सरब सुखा निधि चरण हरि भउजलु बिखमु तरे ॥ प्रेम भगति तिन पाईआ बिखिआ नाहि जरे ॥ कूड़ गए दुबिधा नसी पूरन सचि भरे ॥ पारब्रहमु प्रभु सेवदे मन अंदरि एकु धरे ॥ माह दिवस मूरत भले जिस कउ नदरि करे ॥ नानकु मंगै दरस दानु किरपा करहु हरे ॥१४॥१॥

(राग माझ -- SGGS 136) माझ महला ५ दिन रैणि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सेवी सतिगुरु आपणा हरि सिमरी दिन सभि रैण ॥ आपु तिआगि सरणी पवां मुखि बोली मिठड़े वैण ॥ जनम जनम का विछुड़िआ हरि मेलहु सजणु सैण ॥ जो जीअ हरि ते विछुड़े से सुखि न वसनि भैण ॥ हरि पिर बिनु चैनु न पाईऐ खोजि डिठे सभि गैण ॥ आप कमाणै विछुड़ी दोसु न काहू देण ॥ करि किरपा प्रभ राखि लेहु होरु नाही करण करेण ॥ हरि तुधु विणु खाकू रूलणा कहीऐ किथै वैण ॥ नानक की बेनंतीआ हरि सुरजनु देखा नैण ॥१॥

जीअ की बिरथा सो सुणे हरि सम्रिथ पुरखु अपारु ॥ मरणि जीवणि आराधणा सभना का आधारु ॥ ससुरै पेईऐ तिसु कंत की वडा जिसु परवारु ॥ ऊचा अगम अगाधि बोध किछु अंतु न पारावारु ॥ सेवा सा तिसु भावसी संता की होइ छारु ॥ दीना नाथ दैआल देव पतित उधारणहारु ॥ आदि जुगादी रखदा सचु नामु करतारु ॥ कीमति कोइ न जाणई को नाही तोलणहारु ॥ मन तन अंतरि वसि रहे नानक नही सुमारु ॥ दिनु रैणि जि प्रभ कंउ सेवदे तिन कै सद बलिहार ॥२॥

संत अराधनि सद सदा सभना का बखसिंदु ॥ जीउ पिंडु जिनि साजिआ करि किरपा दितीनु जिंदु ॥ गुर सबदी आराधीऐ जपीऐ निरमल मंतु ॥ कीमति कहणु न जाईऐ परमेसुरु बेअंतु ॥ जिसु मनि वसै नराइणो सो कहीऐ भगवंतु ॥ जीअ की लोचा पूरीऐ मिलै सुआमी कंतु ॥ नानकु जीवै जपि हरी दोख सभे ही हंतु ॥ दिनु रैणि जिसु न विसरै सो हरिआ होवै जंतु ॥३॥

सरब कला प्रभ पूरणो मंञु निमाणी थाउ ॥ हरि ओट गही मन अंदरे जपि जपि जीवां नाउ ॥ करि किरपा प्रभ आपणी जन धूड़ी संगि समाउ ॥ जिउ तूं राखहि तिउ रहा तेरा दिता पैना खाउ ॥ उदमु सोई कराइ प्रभ मिलि साधू गुण गाउ ॥ दूजी जाइ न सुझई किथै कूकण जाउ ॥ अगिआन बिनासन तम हरण ऊचे अगम अमाउ ॥ मनु विछुड़िआ हरि मेलीऐ नानक एहु सुआउ ॥ सरब कलिआणा तितु दिनि हरि परसी गुर के पाउ ॥४॥१॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 175) महला ५ रागु गउड़ी गुआरेरी चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किन बिधि कुसलु होत मेरे भाई ॥ किउ पाईऐ हरि राम सहाई ॥१॥ रहाउ ॥

कुसलु न ग्रिहि मेरी सभ माइआ ॥ ऊचे मंदर सुंदर छाइआ ॥ झूठे लालचि जनमु गवाइआ ॥१॥

हसती घोड़े देखि विगासा ॥ लसकर जोड़े नेब खवासा ॥ गलि जेवड़ी हउमै के फासा ॥२॥

राजु कमावै दह दिस सारी ॥ माणै रंग भोग बहु नारी ॥ जिउ नरपति सुपनै भेखारी ॥३॥

एकु कुसलु मो कउ सतिगुरू बताइआ ॥ हरि जो किछु करे सु हरि किआ भगता भाइआ ॥ जन नानक हउमै मारि समाइआ ॥४॥

इनि बिधि कुसल होत मेरे भाई ॥ इउ पाईऐ हरि राम सहाई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 176) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
किउ भ्रमीऐ भ्रमु किस का होई ॥ जा जलि थलि महीअलि रविआ सोई ॥ गुरमुखि उबरे मनमुख पति खोई ॥१॥

जिसु राखै आपि रामु दइआरा ॥ तिसु नही दूजा को पहुचनहारा ॥१॥ रहाउ ॥

सभ महि वरतै एकु अनंता ॥ ता तूं सुखि सोउ होइ अचिंता ॥ ओहु सभु किछु जाणै जो वरतंता ॥२॥

मनमुख मुए जिन दूजी पिआसा ॥ बहु जोनी भवहि धुरि किरति लिखिआसा ॥ जैसा बीजहि तैसा खासा ॥३॥

देखि दरसु मनि भइआ विगासा ॥ सभु नदरी आइआ ब्रहमु परगासा ॥ जन नानक की हरि पूरन आसा ॥४॥२॥७१॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 176) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
कई जनम भए कीट पतंगा ॥ कई जनम गज मीन कुरंगा ॥ कई जनम पंखी सरप होइओ ॥ कई जनम हैवर ब्रिख जोइओ ॥१॥

मिलु जगदीस मिलन की बरीआ ॥ चिरंकाल इह देह संजरीआ ॥१॥ रहाउ ॥

कई जनम सैल गिरि करिआ ॥ कई जनम गरभ हिरि खरिआ ॥ कई जनम साख करि उपाइआ ॥ लख चउरासीह जोनि भ्रमाइआ ॥२॥

साधसंगि भइओ जनमु परापति ॥ करि सेवा भजु हरि हरि गुरमति ॥ तिआगि मानु झूठु अभिमानु ॥ जीवत मरहि दरगह परवानु ॥३॥

जो किछु होआ सु तुझ ते होगु ॥ अवरु न दूजा करणै जोगु ॥ ता मिलीऐ जा लैहि मिलाइ ॥ कहु नानक हरि हरि गुण गाइ ॥४॥३॥७२॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 176) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
करम भूमि महि बोअहु नामु ॥ पूरन होइ तुमारा कामु ॥ फल पावहि मिटै जम त्रास ॥ नित गावहि हरि हरि गुण जास ॥१॥

हरि हरि नामु अंतरि उरि धारि ॥ सीघर कारजु लेहु सवारि ॥१॥ रहाउ ॥

अपने प्रभ सिउ होहु सावधानु ॥ ता तूं दरगह पावहि मानु ॥ उकति सिआणप सगली तिआगु ॥ संत जना की चरणी लागु ॥२॥

सरब जीअ हहि जा कै हाथि ॥ कदे न विछुड़ै सभ कै साथि ॥ उपाव छोडि गहु तिस की ओट ॥ निमख माहि होवै तेरी छोटि ॥३॥

सदा निकटि करि तिस नो जाणु ॥ प्रभ की आगिआ सति करि मानु ॥ गुर कै बचनि मिटावहु आपु ॥ हरि हरि नामु नानक जपि जापु ॥४॥४॥७३॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 177) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
गुर का बचनु सदा अबिनासी ॥ गुर कै बचनि कटी जम फासी ॥ गुर का बचनु जीअ कै संगि ॥ गुर कै बचनि रचै राम कै रंगि ॥१॥

जो गुरि दीआ सु मन कै कामि ॥ संत का कीआ सति करि मानि ॥१॥ रहाउ ॥

गुर का बचनु अटल अछेद ॥ गुर कै बचनि कटे भ्रम भेद ॥ गुर का बचनु कतहु न जाइ ॥ गुर कै बचनि हरि के गुण गाइ ॥२॥

गुर का बचनु जीअ कै साथ ॥ गुर का बचनु अनाथ को नाथ ॥ गुर कै बचनि नरकि न पवै ॥ गुर कै बचनि रसना अम्रितु रवै ॥३॥

गुर का बचनु परगटु संसारि ॥ गुर कै बचनि न आवै हारि ॥ जिसु जन होए आपि क्रिपाल ॥ नानक सतिगुर सदा दइआल ॥४॥५॥७४॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 177) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
जिनि कीता माटी ते रतनु ॥ गरभ महि राखिआ जिनि करि जतनु ॥ जिनि दीनी सोभा वडिआई ॥ तिसु प्रभ कउ आठ पहर धिआई ॥१॥

रमईआ रेनु साध जन पावउ ॥ गुर मिलि अपुना खसमु धिआवउ ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि कीता मूड़ ते बकता ॥ जिनि कीता बेसुरत ते सुरता ॥ जिसु परसादि नवै निधि पाई ॥ सो प्रभु मन ते बिसरत नाही ॥२॥

जिनि दीआ निथावे कउ थानु ॥ जिनि दीआ निमाने कउ मानु ॥ जिनि कीनी सभ पूरन आसा ॥ सिमरउ दिनु रैनि सास गिरासा ॥३॥

जिसु प्रसादि माइआ सिलक काटी ॥ गुर प्रसादि अम्रितु बिखु खाटी ॥ कहु नानक इस ते किछु नाही ॥ राखनहारे कउ सालाही ॥४॥६॥७५॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 177) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
तिस की सरणि नाही भउ सोगु ॥ उस ते बाहरि कछू न होगु ॥ तजी सिआणप बल बुधि बिकार ॥ दास अपने की राखनहार ॥१॥

जपि मन मेरे राम राम रंगि ॥ घरि बाहरि तेरै सद संगि ॥१॥ रहाउ ॥

तिस की टेक मनै महि राखु ॥ गुर का सबदु अम्रित रसु चाखु ॥ अवरि जतन कहहु कउन काज ॥ करि किरपा राखै आपि लाज ॥२॥

किआ मानुख कहहु किआ जोरु ॥ झूठा माइआ का सभु सोरु ॥ करण करावनहार सुआमी ॥ सगल घटा के अंतरजामी ॥३॥

सरब सुखा सुखु साचा एहु ॥ गुर उपदेसु मनै महि लेहु ॥ जा कउ राम नाम लिव लागी ॥ कहु नानक सो धंनु वडभागी ॥४॥७॥७६॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 178) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
सुणि हरि कथा उतारी मैलु ॥ महा पुनीत भए सुख सैलु ॥ वडै भागि पाइआ साधसंगु ॥ पारब्रहम सिउ लागो रंगु ॥१॥

हरि हरि नामु जपत जनु तारिओ ॥ अगनि सागरु गुरि पारि उतारिओ ॥१॥ रहाउ ॥

करि कीरतनु मन सीतल भए ॥ जनम जनम के किलविख गए ॥ सरब निधान पेखे मन माहि ॥ अब ढूढन काहे कउ जाहि ॥२॥

प्रभ अपुने जब भए दइआल ॥ पूरन होई सेवक घाल ॥ बंधन काटि कीए अपने दास ॥ सिमरि सिमरि सिमरि गुणतास ॥३॥

एको मनि एको सभ ठाइ ॥ पूरन पूरि रहिओ सभ जाइ ॥ गुरि पूरै सभु भरमु चुकाइआ ॥ हरि सिमरत नानक सुखु पाइआ ॥४॥८॥७७॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 178) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
अगले मुए सि पाछै परे ॥ जो उबरे से बंधि लकु खरे ॥ जिह धंधे महि ओइ लपटाए ॥ उन ते दुगुण दिड़ी उन माए ॥१॥

ओह बेला कछु चीति न आवै ॥ बिनसि जाइ ताहू लपटावै ॥१॥ रहाउ ॥

आसा बंधी मूरख देह ॥ काम क्रोध लपटिओ असनेह ॥ सिर ऊपरि ठाढो धरम राइ ॥ मीठी करि करि बिखिआ खाइ ॥२॥

हउ बंधउ हउ साधउ बैरु ॥ हमरी भूमि कउणु घालै पैरु ॥ हउ पंडितु हउ चतुरु सिआणा ॥ करणैहारु न बुझै बिगाना ॥३॥

अपुनी गति मिति आपे जानै ॥ किआ को कहै किआ आखि वखानै ॥ जितु जितु लावहि तितु तितु लगना ॥ अपना भला सभ काहू मंगना ॥४॥

सभ किछु तेरा तूं करणैहारु ॥ अंतु नाही किछु पारावारु ॥ दास अपने कउ दीजै दानु ॥ कबहू न विसरै नानक नामु ॥५॥९॥७८॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 178) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
अनिक जतन नही होत छुटारा ॥ बहुतु सिआणप आगल भारा ॥ हरि की सेवा निरमल हेत ॥ प्रभ की दरगह सोभा सेत ॥१॥

मन मेरे गहु हरि नाम का ओला ॥ तुझै न लागै ताता झोला ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ बोहिथु भै सागर माहि ॥ अंधकार दीपक दीपाहि ॥ अगनि सीत का लाहसि दूख ॥ नामु जपत मनि होवत सूख ॥२॥

उतरि जाइ तेरे मन की पिआस ॥ पूरन होवै सगली आस ॥ डोलै नाही तुमरा चीतु ॥ अम्रित नामु जपि गुरमुखि मीत ॥३॥

नामु अउखधु सोई जनु पावै ॥ करि किरपा जिसु आपि दिवावै ॥ हरि हरि नामु जा कै हिरदै वसै ॥ दूखु दरदु तिह नानक नसै ॥४॥१०॥७९॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 179) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
बहुतु दरबु करि मनु न अघाना ॥ अनिक रूप देखि नह पतीआना ॥ पुत्र कलत्र उरझिओ जानि मेरी ॥ ओह बिनसै ओइ भसमै ढेरी ॥१॥

बिनु हरि भजन देखउ बिललाते ॥ ध्रिगु तनु ध्रिगु धनु माइआ संगि राते ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ बिगारी कै सिरि दीजहि दाम ॥ ओइ खसमै कै ग्रिहि उन दूख सहाम ॥ जिउ सुपनै होइ बैसत राजा ॥ नेत्र पसारै ता निरारथ काजा ॥२॥

जिउ राखा खेत ऊपरि पराए ॥ खेतु खसम का राखा उठि जाए ॥ उसु खेत कारणि राखा कड़ै ॥ तिस कै पालै कछू न पड़ै ॥३॥

जिस का राजु तिसै का सुपना ॥ जिनि माइआ दीनी तिनि लाई त्रिसना ॥ आपि बिनाहे आपि करे रासि ॥ नानक प्रभ आगै अरदासि ॥४॥११॥८०॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 179) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
बहु रंग माइआ बहु बिधि पेखी ॥ कलम कागद सिआनप लेखी ॥ महर मलूक होइ देखिआ खान ॥ ता ते नाही मनु त्रिपतान ॥१॥

सो सुखु मो कउ संत बतावहु ॥ त्रिसना बूझै मनु त्रिपतावहु ॥१॥ रहाउ ॥

असु पवन हसति असवारी ॥ चोआ चंदनु सेज सुंदरि नारी ॥ नट नाटिक आखारे गाइआ ॥ ता महि मनि संतोखु न पाइआ ॥२॥

तखतु सभा मंडन दोलीचे ॥ सगल मेवे सुंदर बागीचे ॥ आखेड़ बिरति राजन की लीला ॥ मनु न सुहेला परपंचु हीला ॥३॥

करि किरपा संतन सचु कहिआ ॥ सरब सूख इहु आनंदु लहिआ ॥ साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥ कहु नानक वडभागी पाईऐ ॥४॥

जा कै हरि धनु सोई सुहेला ॥ प्रभ किरपा ते साधसंगि मेला ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१२॥८१॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 179) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
प्राणी जाणै इहु तनु मेरा ॥ बहुरि बहुरि उआहू लपटेरा ॥ पुत्र कलत्र गिरसत का फासा ॥ होनु न पाईऐ राम के दासा ॥१॥

कवन सु बिधि जितु राम गुण गाइ ॥ कवन सु मति जितु तरै इह माइ ॥१॥ रहाउ ॥

जो भलाई सो बुरा जानै ॥ साचु कहै सो बिखै समानै ॥ जाणै नाही जीत अरु हार ॥ इहु वलेवा साकत संसार ॥२॥

जो हलाहल सो पीवै बउरा ॥ अम्रितु नामु जानै करि कउरा ॥ साधसंग कै नाही नेरि ॥ लख चउरासीह भ्रमता फेरि ॥३॥

एकै जालि फहाए पंखी ॥ रसि रसि भोग करहि बहु रंगी ॥ कहु नानक जिसु भए क्रिपाल ॥ गुरि पूरै ता के काटे जाल ॥४॥१३॥८२॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 180) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
तउ किरपा ते मारगु पाईऐ ॥ प्रभ किरपा ते नामु धिआईऐ ॥ प्रभ किरपा ते बंधन छुटै ॥ तउ किरपा ते हउमै तुटै ॥१॥

तुम लावहु तउ लागह सेव ॥ हम ते कछू न होवै देव ॥१॥ रहाउ ॥

तुधु भावै ता गावा बाणी ॥ तुधु भावै ता सचु वखाणी ॥ तुधु भावै ता सतिगुर मइआ ॥ सरब सुखा प्रभ तेरी दइआ ॥२॥

जो तुधु भावै सो निरमल करमा ॥ जो तुधु भावै सो सचु धरमा ॥ सरब निधान गुण तुम ही पासि ॥ तूं साहिबु सेवक अरदासि ॥३॥

मनु तनु निरमलु होइ हरि रंगि ॥ सरब सुखा पावउ सतसंगि ॥ नामि तेरै रहै मनु राता ॥ इहु कलिआणु नानक करि जाता ॥४॥१४॥८३॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 180) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
आन रसा जेते तै चाखे ॥ निमख न त्रिसना तेरी लाथे ॥ हरि रस का तूं चाखहि सादु ॥ चाखत होइ रहहि बिसमादु ॥१॥

अम्रितु रसना पीउ पिआरी ॥ इह रस राती होइ त्रिपतारी ॥१॥ रहाउ ॥

हे जिहवे तूं राम गुण गाउ ॥ निमख निमख हरि हरि हरि धिआउ ॥ आन न सुनीऐ कतहूं जाईऐ ॥ साधसंगति वडभागी पाईऐ ॥२॥

आठ पहर जिहवे आराधि ॥ पारब्रहम ठाकुर आगाधि ॥ ईहा ऊहा सदा सुहेली ॥ हरि गुण गावत रसन अमोली ॥३॥

बनसपति मउली फल फुल पेडे ॥ इह रस राती बहुरि न छोडे ॥ आन न रस कस लवै न लाई ॥ कहु नानक गुर भए है सहाई ॥४॥१५॥८४॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 180) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
मनु मंदरु तनु साजी बारि ॥ इस ही मधे बसतु अपार ॥ इस ही भीतरि सुनीअत साहु ॥ कवनु बापारी जा का ऊहा विसाहु ॥१॥

नाम रतन को को बिउहारी ॥ अम्रित भोजनु करे आहारी ॥१॥ रहाउ ॥

मनु तनु अरपी सेव करीजै ॥ कवन सु जुगति जितु करि भीजै ॥ पाइ लगउ तजि मेरा तेरै ॥ कवनु सु जनु जो सउदा जोरै ॥२॥

महलु साह का किन बिधि पावै ॥ कवन सु बिधि जितु भीतरि बुलावै ॥ तूं वड साहु जा के कोटि वणजारे ॥ कवनु सु दाता ले संचारे ॥३॥

खोजत खोजत निज घरु पाइआ ॥ अमोल रतनु साचु दिखलाइआ ॥ करि किरपा जब मेले साहि ॥ कहु नानक गुर कै वेसाहि ॥४॥१६॥८५॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 181) गउड़ी महला ५ गुआरेरी ॥
रैणि दिनसु रहै इक रंगा ॥ प्रभ कउ जाणै सद ही संगा ॥ ठाकुर नामु कीओ उनि वरतनि ॥ त्रिपति अघावनु हरि कै दरसनि ॥१॥

हरि संगि राते मन तन हरे ॥ गुर पूरे की सरनी परे ॥१॥ रहाउ ॥

चरण कमल आतम आधार ॥ एकु निहारहि आगिआकार ॥ एको बनजु एको बिउहारी ॥ अवरु न जानहि बिनु निरंकारी ॥२॥

हरख सोग दुहहूं ते मुकते ॥ सदा अलिपतु जोग अरु जुगते ॥ दीसहि सभ महि सभ ते रहते ॥ पारब्रहम का ओइ धिआनु धरते ॥३॥

संतन की महिमा कवन वखानउ ॥ अगाधि बोधि किछु मिति नही जानउ ॥ पारब्रहम मोहि किरपा कीजै ॥ धूरि संतन की नानक दीजै ॥४॥१७॥८६॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 181) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
तूं मेरा सखा तूंही मेरा मीतु ॥ तूं मेरा प्रीतमु तुम संगि हीतु ॥ तूं मेरी पति तूहै मेरा गहणा ॥ तुझ बिनु निमखु न जाई रहणा ॥१॥

तूं मेरे लालन तूं मेरे प्रान ॥ तूं मेरे साहिब तूं मेरे खान ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ तुम राखहु तिव ही रहना ॥ जो तुम कहहु सोई मोहि करना ॥ जह पेखउ तहा तुम बसना ॥ निरभउ नामु जपउ तेरा रसना ॥२॥

तूं मेरी नव निधि तूं भंडारु ॥ रंग रसा तूं मनहि अधारु ॥ तूं मेरी सोभा तुम संगि रचीआ ॥ तूं मेरी ओट तूं है मेरा तकीआ ॥३॥

मन तन अंतरि तुही धिआइआ ॥ मरमु तुमारा गुर ते पाइआ ॥ सतिगुर ते द्रिड़िआ इकु एकै ॥ नानक दास हरि हरि हरि टेकै ॥४॥१८॥८७॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 181) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
बिआपत हरख सोग बिसथार ॥ बिआपत सुरग नरक अवतार ॥ बिआपत धन निरधन पेखि सोभा ॥ मूलु बिआधी बिआपसि लोभा ॥१॥

माइआ बिआपत बहु परकारी ॥ संत जीवहि प्रभ ओट तुमारी ॥१॥ रहाउ ॥

बिआपत अह्मबुधि का माता ॥ बिआपत पुत्र कलत्र संगि राता ॥ बिआपत हसति घोड़े अरु बसता ॥ बिआपत रूप जोबन मद मसता ॥२॥

बिआपत भूमि रंक अरु रंगा ॥ बिआपत गीत नाद सुणि संगा ॥ बिआपत सेज महल सीगार ॥ पंच दूत बिआपत अंधिआर ॥३॥

बिआपत करम करै हउ फासा ॥ बिआपति गिरसत बिआपत उदासा ॥ आचार बिउहार बिआपत इह जाति ॥ सभ किछु बिआपत बिनु हरि रंग रात ॥४॥

संतन के बंधन काटे हरि राइ ॥ ता कउ कहा बिआपै माइ ॥ कहु नानक जिनि धूरि संत पाई ॥ ता कै निकटि न आवै माई ॥५॥१९॥८८॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 182) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
नैनहु नीद पर द्रिसटि विकार ॥ स्रवण सोए सुणि निंद वीचार ॥ रसना सोई लोभि मीठै सादि ॥ मनु सोइआ माइआ बिसमादि ॥१॥

इसु ग्रिह महि कोई जागतु रहै ॥ साबतु वसतु ओहु अपनी लहै ॥१॥ रहाउ ॥

सगल सहेली अपनै रस माती ॥ ग्रिह अपुने की खबरि न जाती ॥ मुसनहार पंच बटवारे ॥ सूने नगरि परे ठगहारे ॥२॥

उन ते राखै बापु न माई ॥ उन ते राखै मीतु न भाई ॥ दरबि सिआणप ना ओइ रहते ॥ साधसंगि ओइ दुसट वसि होते ॥३॥

करि किरपा मोहि सारिंगपाणि ॥ संतन धूरि सरब निधान ॥ साबतु पूंजी सतिगुर संगि ॥ नानकु जागै पारब्रहम कै रंगि ॥४॥

सो जागै जिसु प्रभु किरपालु ॥ इह पूंजी साबतु धनु मालु ॥१॥ रहाउ दूजा ॥२०॥८९॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 182) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
जा कै वसि खान सुलतान ॥ जा कै वसि है सगल जहान ॥ जा का कीआ सभु किछु होइ ॥ तिस ते बाहरि नाही कोइ ॥१॥

कहु बेनंती अपुने सतिगुर पाहि ॥ काज तुमारे देइ निबाहि ॥१॥ रहाउ ॥

सभ ते ऊच जा का दरबारु ॥ सगल भगत जा का नामु अधारु ॥ सरब बिआपित पूरन धनी ॥ जा की सोभा घटि घटि बनी ॥२॥

जिसु सिमरत दुख डेरा ढहै ॥ जिसु सिमरत जमु किछू न कहै ॥ जिसु सिमरत होत सूके हरे ॥ जिसु सिमरत डूबत पाहन तरे ॥३॥

संत सभा कउ सदा जैकारु ॥ हरि हरि नामु जन प्रान अधारु ॥ कहु नानक मेरी सुणी अरदासि ॥ संत प्रसादि मो कउ नाम निवासि ॥४॥२१॥९०॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 183) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
सतिगुर दरसनि अगनि निवारी ॥ सतिगुर भेटत हउमै मारी ॥ सतिगुर संगि नाही मनु डोलै ॥ अम्रित बाणी गुरमुखि बोलै ॥१॥

सभु जगु साचा जा सच महि राते ॥ सीतल साति गुर ते प्रभ जाते ॥१॥ रहाउ ॥

संत प्रसादि जपै हरि नाउ ॥ संत प्रसादि हरि कीरतनु गाउ ॥ संत प्रसादि सगल दुख मिटे ॥ संत प्रसादि बंधन ते छुटे ॥२॥

संत क्रिपा ते मिटे मोह भरम ॥ साध रेण मजन सभि धरम ॥ साध क्रिपाल दइआल गोविंदु ॥ साधा महि इह हमरी जिंदु ॥३॥

किरपा निधि किरपाल धिआवउ ॥ साधसंगि ता बैठणु पावउ ॥ मोहि निरगुण कउ प्रभि कीनी दइआ ॥ साधसंगि नानक नामु लइआ ॥४॥२२॥९१॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 183) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
साधसंगि जपिओ भगवंतु ॥ केवल नामु दीओ गुरि मंतु ॥ तजि अभिमान भए निरवैर ॥ आठ पहर पूजहु गुर पैर ॥१॥

अब मति बिनसी दुसट बिगानी ॥ जब ते सुणिआ हरि जसु कानी ॥१॥ रहाउ ॥

सहज सूख आनंद निधान ॥ राखनहार रखि लेइ निदान ॥ दूख दरद बिनसे भै भरम ॥ आवण जाण रखे करि करम ॥२॥

पेखै बोलै सुणै सभु आपि ॥ सदा संगि ता कउ मन जापि ॥ संत प्रसादि भइओ परगासु ॥ पूरि रहे एकै गुणतासु ॥३॥

कहत पवित्र सुणत पुनीत ॥ गुण गोविंद गावहि नित नीत ॥ कहु नानक जा कउ होहु क्रिपाल ॥ तिसु जन की सभ पूरन घाल ॥४॥२३॥९२॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 183) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
बंधन तोड़ि बोलावै रामु ॥ मन महि लागै साचु धिआनु ॥ मिटहि कलेस सुखी होइ रहीऐ ॥ ऐसा दाता सतिगुरु कहीऐ ॥१॥

सो सुखदाता जि नामु जपावै ॥ करि किरपा तिसु संगि मिलावै ॥१॥ रहाउ ॥

जिसु होइ दइआलु तिसु आपि मिलावै ॥ सरब निधान गुरू ते पावै ॥ आपु तिआगि मिटै आवण जाणा ॥ साध कै संगि पारब्रहमु पछाणा ॥२॥

जन ऊपरि प्रभ भए दइआल ॥ जन की टेक एक गोपाल ॥ एका लिव एको मनि भाउ ॥ सरब निधान जन कै हरि नाउ ॥३॥

पारब्रहम सिउ लागी प्रीति ॥ निरमल करणी साची रीति ॥ गुरि पूरै मेटिआ अंधिआरा ॥ नानक का प्रभु अपर अपारा ॥४॥२४॥९३॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 184) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
जिसु मनि वसै तरै जनु सोइ ॥ जा कै करमि परापति होइ ॥ दूखु रोगु कछु भउ न बिआपै ॥ अम्रित नामु रिदै हरि जापै ॥१॥

पारब्रहमु परमेसुरु धिआईऐ ॥ गुर पूरे ते इह मति पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥

करण करावनहार दइआल ॥ जीअ जंत सगले प्रतिपाल ॥ अगम अगोचर सदा बेअंता ॥ सिमरि मना पूरे गुर मंता ॥२॥

जा की सेवा सरब निधानु ॥ प्रभ की पूजा पाईऐ मानु ॥ जा की टहल न बिरथी जाइ ॥ सदा सदा हरि के गुण गाइ ॥३॥

करि किरपा प्रभ अंतरजामी ॥ सुख निधान हरि अलख सुआमी ॥ जीअ जंत तेरी सरणाई ॥ नानक नामु मिलै वडिआई ॥४॥२५॥९४॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 184) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
जीअ जुगति जा कै है हाथ ॥ सो सिमरहु अनाथ को नाथु ॥ प्रभ चिति आए सभु दुखु जाइ ॥ भै सभ बिनसहि हरि कै नाइ ॥१॥

बिनु हरि भउ काहे का मानहि ॥ हरि बिसरत काहे सुखु जानहि ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि धारे बहु धरणि अगास ॥ जा की जोति जीअ परगास ॥ जा की बखस न मेटै कोइ ॥ सिमरि सिमरि प्रभु निरभउ होइ ॥२॥

आठ पहर सिमरहु प्रभ नामु ॥ अनिक तीरथ मजनु इसनानु ॥ पारब्रहम की सरणी पाहि ॥ कोटि कलंक खिन महि मिटि जाहि ॥३॥

बेमुहताजु पूरा पातिसाहु ॥ प्रभ सेवक साचा वेसाहु ॥ गुरि पूरै राखे दे हाथ ॥ नानक पारब्रहम समराथ ॥४॥२६॥९५॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 184) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
गुर परसादि नामि मनु लागा ॥ जनम जनम का सोइआ जागा ॥ अम्रित गुण उचरै प्रभ बाणी ॥ पूरे गुर की सुमति पराणी ॥१॥

प्रभ सिमरत कुसल सभि पाए ॥ घरि बाहरि सुख सहज सबाए ॥१॥ रहाउ ॥

सोई पछाता जिनहि उपाइआ ॥ करि किरपा प्रभि आपि मिलाइआ ॥ बाह पकरि लीनो करि अपना ॥ हरि हरि कथा सदा जपु जपना ॥२॥

मंत्रु तंत्रु अउखधु पुनहचारु ॥ हरि हरि नामु जीअ प्रान अधारु ॥ साचा धनु पाइओ हरि रंगि ॥ दुतरु तरे साध कै संगि ॥३॥

सुखि बैसहु संत सजन परवारु ॥ हरि धनु खटिओ जा का नाहि सुमारु ॥ जिसहि परापति तिसु गुरु देइ ॥ नानक बिरथा कोइ न हेइ ॥४॥२७॥९६॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 185) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
हसत पुनीत होहि ततकाल ॥ बिनसि जाहि माइआ जंजाल ॥ रसना रमहु राम गुण नीत ॥ सुखु पावहु मेरे भाई मीत ॥१॥

लिखु लेखणि कागदि मसवाणी ॥ राम नाम हरि अम्रित बाणी ॥१॥ रहाउ ॥

इह कारजि तेरे जाहि बिकार ॥ सिमरत राम नाही जम मार ॥ धरम राइ के दूत न जोहै ॥ माइआ मगन न कछूऐ मोहै ॥२॥

उधरहि आपि तरै संसारु ॥ राम नाम जपि एकंकारु ॥ आपि कमाउ अवरा उपदेस ॥ राम नाम हिरदै परवेस ॥३॥

जा कै माथै एहु निधानु ॥ सोई पुरखु जपै भगवानु ॥ आठ पहर हरि हरि गुण गाउ ॥ कहु नानक हउ तिसु बलि जाउ ॥४॥२८॥९७॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 185) रागु गउड़ी गुआरेरी महला ५ चउपदे दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो पराइओ सोई अपना ॥ जो तजि छोडन तिसु सिउ मनु रचना ॥१॥

कहहु गुसाई मिलीऐ केह ॥ जो बिबरजत तिस सिउ नेह ॥१॥ रहाउ ॥

झूठु बात सा सचु करि जाती ॥ सति होवनु मनि लगै न राती ॥२॥

बावै मारगु टेढा चलना ॥ सीधा छोडि अपूठा बुनना ॥३॥

दुहा सिरिआ का खसमु प्रभु सोई ॥ जिसु मेले नानक सो मुकता होई ॥४॥२९॥९८॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 185) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
कलिजुग महि मिलि आए संजोग ॥ जिचरु आगिआ तिचरु भोगहि भोग ॥१॥

जलै न पाईऐ राम सनेही ॥ किरति संजोगि सती उठि होई ॥१॥ रहाउ ॥

देखा देखी मनहठि जलि जाईऐ ॥ प्रिअ संगु न पावै बहु जोनि भवाईऐ ॥२॥

सील संजमि प्रिअ आगिआ मानै ॥ तिसु नारी कउ दुखु न जमानै ॥३॥

कहु नानक जिनि प्रिउ परमेसरु करि जानिआ ॥ धंनु सती दरगह परवानिआ ॥४॥३०॥९९॥

(राग गउड़ी गुआरेरी -- SGGS 185) गउड़ी गुआरेरी महला ५ ॥
हम धनवंत भागठ सच नाइ ॥ हरि गुण गावह सहजि सुभाइ ॥१॥ रहाउ ॥

पीऊ दादे का खोलि डिठा खजाना ॥ ता मेरै मनि भइआ निधाना ॥१॥

रतन लाल जा का कछू न मोलु ॥ भरे भंडार अखूट अतोल ॥२॥

खावहि खरचहि रलि मिलि भाई ॥ तोटि न आवै वधदो जाई ॥३॥

कहु नानक जिसु मसतकि लेखु लिखाइ ॥ सु एतु खजानै लइआ रलाइ ॥४॥३१॥१००॥

(राग गउड़ी -- SGGS 186) गउड़ी महला ५ ॥
डरि डरि मरते जब जानीऐ दूरि ॥ डरु चूका देखिआ भरपूरि ॥१॥

सतिगुर अपने कउ बलिहारै ॥ छोडि न जाई सरपर तारै ॥१॥ रहाउ ॥

दूखु रोगु सोगु बिसरै जब नामु ॥ सदा अनंदु जा हरि गुण गामु ॥२॥

बुरा भला कोई न कहीजै ॥ छोडि मानु हरि चरन गहीजै ॥३॥

कहु नानक गुर मंत्रु चितारि ॥ सुखु पावहि साचै दरबारि ॥४॥३२॥१०१॥


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