Pt 32 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 32 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग रामकली -- SGGS 895) रामकली महला ५ ॥
दुलभ देह सवारि ॥ जाहि न दरगह हारि ॥ हलति पलति तुधु होइ वडिआई ॥ अंत की बेला लए छडाई ॥१॥

राम के गुन गाउ ॥ हलतु पलतु होहि दोवै सुहेले अचरज पुरखु धिआउ ॥१॥ रहाउ ॥

ऊठत बैठत हरि जापु ॥ बिनसै सगल संतापु ॥ बैरी सभि होवहि मीत ॥ निरमलु तेरा होवै चीत ॥२॥

सभ ते ऊतम इहु करमु ॥ सगल धरम महि स्रेसट धरमु ॥ हरि सिमरनि तेरा होइ उधारु ॥ जनम जनम का उतरै भारु ॥३॥

पूरन तेरी होवै आस ॥ जम की कटीऐ तेरी फास ॥ गुर का उपदेसु सुनीजै ॥ नानक सुखि सहजि समीजै ॥४॥३०॥४१॥

(राग रामकली -- SGGS 896) रामकली महला ५ ॥
जिस की तिस की करि मानु ॥ आपन लाहि गुमानु ॥ जिस का तू तिस का सभु कोइ ॥ तिसहि अराधि सदा सुखु होइ ॥१॥

काहे भ्रमि भ्रमहि बिगाने ॥ नाम बिना किछु कामि न आवै मेरा मेरा करि बहुतु पछुताने ॥१॥ रहाउ ॥

जो जो करै सोई मानि लेहु ॥ बिनु माने रलि होवहि खेह ॥ तिस का भाणा लागै मीठा ॥ गुर प्रसादि विरले मनि वूठा ॥२॥

वेपरवाहु अगोचरु आपि ॥ आठ पहर मन ता कउ जापि ॥ जिसु चिति आए बिनसहि दुखा ॥ हलति पलति तेरा ऊजल मुखा ॥३॥

कउन कउन उधरे गुन गाइ ॥ गनणु न जाई कीम न पाइ ॥ बूडत लोह साधसंगि तरै ॥ नानक जिसहि परापति करै ॥४॥३१॥४२॥

(राग रामकली -- SGGS 896) रामकली महला ५ ॥
मन माहि जापि भगवंतु ॥ गुरि पूरै इहु दीनो मंतु ॥ मिटे सगल भै त्रास ॥ पूरन होई आस ॥१॥

सफल सेवा गुरदेवा ॥ कीमति किछु कहणु न जाई साचे सचु अलख अभेवा ॥१॥ रहाउ ॥

करन करावन आपि ॥ तिस कउ सदा मन जापि ॥ तिस की सेवा करि नीत ॥ सचु सहजु सुखु पावहि मीत ॥२॥

साहिबु मेरा अति भारा ॥ खिन महि थापि उथापनहारा ॥ तिसु बिनु अवरु न कोई ॥ जन का राखा सोई ॥३॥

करि किरपा अरदासि सुणीजै ॥ अपणे सेवक कउ दरसनु दीजै ॥ नानक जापी जपु जापु ॥ सभ ते ऊच जा का परतापु ॥४॥३२॥४३॥

(राग रामकली -- SGGS 896) रामकली महला ५ ॥
बिरथा भरवासा लोक ॥ ठाकुर प्रभ तेरी टेक ॥ अवर छूटी सभ आस ॥ अचिंत ठाकुर भेटे गुणतास ॥१॥

एको नामु धिआइ मन मेरे ॥ कारजु तेरा होवै पूरा हरि हरि हरि गुण गाइ मन मेरे ॥१॥ रहाउ ॥

तुम ही कारन करन ॥ चरन कमल हरि सरन ॥ मनि तनि हरि ओही धिआइआ ॥ आनंद हरि रूप दिखाइआ ॥२॥

तिस ही की ओट सदीव ॥ जा के कीने है जीव ॥ सिमरत हरि करत निधान ॥ राखनहार निदान ॥३॥

सरब की रेण होवीजै ॥ आपु मिटाइ मिलीजै ॥ अनदिनु धिआईऐ नामु ॥ सफल नानक इहु कामु ॥४॥३३॥४४॥

(राग रामकली -- SGGS 896) रामकली महला ५ ॥
कारन करन करीम ॥ सरब प्रतिपाल रहीम ॥ अलह अलख अपार ॥ खुदि खुदाइ वड बेसुमार ॥१॥

ओं नमो भगवंत गुसाई ॥ खालकु रवि रहिआ सरब ठाई ॥१॥ रहाउ ॥

जगंनाथ जगजीवन माधो ॥ भउ भंजन रिद माहि अराधो ॥ रिखीकेस गोपाल गोविंद ॥ पूरन सरबत्र मुकंद ॥२॥

मिहरवान मउला तूही एक ॥ पीर पैकांबर सेख ॥ दिला का मालकु करे हाकु ॥ कुरान कतेब ते पाकु ॥३॥

नाराइण नरहर दइआल ॥ रमत राम घट घट आधार ॥ बासुदेव बसत सभ ठाइ ॥ लीला किछु लखी न जाइ ॥४॥

मिहर दइआ करि करनैहार ॥ भगति बंदगी देहि सिरजणहार ॥ कहु नानक गुरि खोए भरम ॥ एको अलहु पारब्रहम ॥५॥३४॥४५॥

(राग रामकली -- SGGS 897) रामकली महला ५ ॥
कोटि जनम के बिनसे पाप ॥ हरि हरि जपत नाही संताप ॥ गुर के चरन कमल मनि वसे ॥ महा बिकार तन ते सभि नसे ॥१॥

गोपाल को जसु गाउ प्राणी ॥ अकथ कथा साची प्रभ पूरन जोती जोति समाणी ॥१॥ रहाउ ॥

त्रिसना भूख सभ नासी ॥ संत प्रसादि जपिआ अबिनासी ॥ रैनि दिनसु प्रभ सेव कमानी ॥ हरि मिलणै की एह नीसानी ॥२॥

मिटे जंजाल होए प्रभ दइआल ॥ गुर का दरसनु देखि निहाल ॥ परा पूरबला करमु बणि आइआ ॥ हरि के गुण नित रसना गाइआ ॥३॥

हरि के संत सदा परवाणु ॥ संत जना मसतकि नीसाणु ॥ दास की रेणु पाए जे कोइ ॥ नानक तिस की परम गति होइ ॥४॥३५॥४६॥

(राग रामकली -- SGGS 897) रामकली महला ५ ॥
दरसन कउ जाईऐ कुरबानु ॥ चरन कमल हिरदै धरि धिआनु ॥ धूरि संतन की मसतकि लाइ ॥ जनम जनम की दुरमति मलु जाइ ॥१॥

जिसु भेटत मिटै अभिमानु ॥ पारब्रहमु सभु नदरी आवै करि किरपा पूरन भगवान ॥१॥ रहाउ ॥

गुर की कीरति जपीऐ हरि नाउ ॥ गुर की भगति सदा गुण गाउ ॥ गुर की सुरति निकटि करि जानु ॥ गुर का सबदु सति करि मानु ॥२॥

गुर बचनी समसरि सुख दूख ॥ कदे न बिआपै त्रिसना भूख ॥ मनि संतोखु सबदि गुर राजे ॥ जपि गोबिंदु पड़दे सभि काजे ॥३॥

गुरु परमेसरु गुरु गोविंदु ॥ गुरु दाता दइआल बखसिंदु ॥ गुर चरनी जा का मनु लागा ॥ नानक दास तिसु पूरन भागा ॥४॥३६॥४७॥

(राग रामकली -- SGGS 898) रामकली महला ५ ॥
किसु भरवासै बिचरहि भवन ॥ मूड़ मुगध तेरा संगी कवन ॥ रामु संगी तिसु गति नही जानहि ॥ पंच बटवारे से मीत करि मानहि ॥१॥

सो घरु सेवि जितु उधरहि मीत ॥ गुण गोविंद रवीअहि दिनु राती साधसंगि करि मन की प्रीति ॥१॥ रहाउ ॥

जनमु बिहानो अहंकारि अरु वादि ॥ त्रिपति न आवै बिखिआ सादि ॥ भरमत भरमत महा दुखु पाइआ ॥ तरी न जाई दुतर माइआ ॥२॥

कामि न आवै सु कार कमावै ॥ आपि बीजि आपे ही खावै ॥ राखन कउ दूसर नही कोइ ॥ तउ निसतरै जउ किरपा होइ ॥३॥

पतित पुनीत प्रभ तेरो नामु ॥ अपने दास कउ कीजै दानु ॥ करि किरपा प्रभ गति करि मेरी ॥ सरणि गही नानक प्रभ तेरी ॥४॥३७॥४८॥

(राग रामकली -- SGGS 898) रामकली महला ५ ॥
इह लोके सुखु पाइआ ॥ नही भेटत धरम राइआ ॥ हरि दरगह सोभावंत ॥ फुनि गरभि नाही बसंत ॥१॥

जानी संत की मित्राई ॥ करि किरपा दीनो हरि नामा पूरबि संजोगि मिलाई ॥१॥ रहाउ ॥

गुर कै चरणि चितु लागा ॥ धंनि धंनि संजोगु सभागा ॥ संत की धूरि लागी मेरै माथे ॥ किलविख दुख सगले मेरे लाथे ॥२॥

साध की सचु टहल कमानी ॥ तब होए मन सुध परानी ॥ जन का सफल दरसु डीठा ॥ नामु प्रभू का घटि घटि वूठा ॥३॥

मिटाने सभि कलि कलेस ॥ जिस ते उपजे तिसु महि परवेस ॥ प्रगटे आनूप गोविंद ॥ प्रभ पूरे नानक बखसिंद ॥४॥३८॥४९॥

(राग रामकली -- SGGS 898) रामकली महला ५ ॥
गऊ कउ चारे सारदूलु ॥ कउडी का लख हूआ मूलु ॥ बकरी कउ हसती प्रतिपाले ॥ अपना प्रभु नदरि निहाले ॥१॥

क्रिपा निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥ बरनि न साकउ बहु गुन तेरे ॥१॥ रहाउ ॥

दीसत मासु न खाइ बिलाई ॥ महा कसाबि छुरी सटि पाई ॥ करणहार प्रभु हिरदै वूठा ॥ फाथी मछुली का जाला तूटा ॥२॥

सूके कासट हरे चलूल ॥ ऊचै थलि फूले कमल अनूप ॥ अगनि निवारी सतिगुर देव ॥ सेवकु अपनी लाइओ सेव ॥३॥

अकिरतघणा का करे उधारु ॥ प्रभु मेरा है सदा दइआरु ॥ संत जना का सदा सहाई ॥ चरन कमल नानक सरणाई ॥४॥३९॥५०॥

(राग रामकली -- SGGS 898) रामकली महला ५ ॥
पंच सिंघ राखे प्रभि मारि ॥ दस बिघिआड़ी लई निवारि ॥ तीनि आवरत की चूकी घेर ॥ साधसंगि चूके भै फेर ॥१॥

सिमरि सिमरि जीवा गोविंद ॥ करि किरपा राखिओ दासु अपना सदा सदा साचा बखसिंद ॥१॥ रहाउ ॥

दाझि गए त्रिण पाप सुमेर ॥ जपि जपि नामु पूजे प्रभ पैर ॥ अनद रूप प्रगटिओ सभ थानि ॥ प्रेम भगति जोरी सुख मानि ॥२॥

सागरु तरिओ बाछर खोज ॥ खेदु न पाइओ नह फुनि रोज ॥ सिंधु समाइओ घटुके माहि ॥ करणहार कउ किछु अचरजु नाहि ॥३॥

जउ छूटउ तउ जाइ पइआल ॥ जउ काढिओ तउ नदरि निहाल ॥ पाप पुंन हमरै वसि नाहि ॥ रसकि रसकि नानक गुण गाहि ॥४॥४०॥५१॥

(राग रामकली -- SGGS 899) रामकली महला ५ ॥
ना तनु तेरा ना मनु तोहि ॥ माइआ मोहि बिआपिआ धोहि ॥ कुदम करै गाडर जिउ छेल ॥ अचिंतु जालु कालु चक्रु पेल ॥१॥

हरि चरन कमल सरनाइ मना ॥ राम नामु जपि संगि सहाई गुरमुखि पावहि साचु धना ॥१॥ रहाउ ॥

ऊने काज न होवत पूरे ॥ कामि क्रोधि मदि सद ही झूरे ॥ करै बिकार जीअरे कै ताई ॥ गाफल संगि न तसूआ जाई ॥२॥

धरत धोह अनिक छल जानै ॥ कउडी कउडी कउ खाकु सिरि छानै ॥ जिनि दीआ तिसै न चेतै मूलि ॥ मिथिआ लोभु न उतरै सूलु ॥३॥

पारब्रहम जब भए दइआल ॥ इहु मनु होआ साध रवाल ॥ हसत कमल लड़ि लीनो लाइ ॥ नानक साचै साचि समाइ ॥४॥४१॥५२॥

(राग रामकली -- SGGS 899) रामकली महला ५ ॥
राजा राम की सरणाइ ॥ निरभउ भए गोबिंद गुन गावत साधसंगि दुखु जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जा कै रामु बसै मन माही ॥ सो जनु दुतरु पेखत नाही ॥ सगले काज सवारे अपने ॥ हरि हरि नामु रसन नित जपने ॥१॥

जिस कै मसतकि हाथु गुरु धरै ॥ सो दासु अदेसा काहे करै ॥ जनम मरण की चूकी काणि ॥ पूरे गुर ऊपरि कुरबाण ॥२॥

गुरु परमेसरु भेटि निहाल ॥ सो दरसनु पाए जिसु होइ दइआलु ॥ पारब्रहमु जिसु किरपा करै ॥ साधसंगि सो भवजलु तरै ॥३॥

अम्रितु पीवहु साध पिआरे ॥ मुख ऊजल साचै दरबारे ॥ अनद करहु तजि सगल बिकार ॥ नानक हरि जपि उतरहु पारि ॥४॥४२॥५३॥

(राग रामकली -- SGGS 900) रामकली महला ५ ॥
ईंधन ते बैसंतरु भागै ॥ माटी कउ जलु दह दिस तिआगै ॥ ऊपरि चरन तलै आकासु ॥ घट महि सिंधु कीओ परगासु ॥१॥

ऐसा सम्रथु हरि जीउ आपि ॥ निमख न बिसरै जीअ भगतन कै आठ पहर मन ता कउ जापि ॥१॥ रहाउ ॥

प्रथमे माखनु पाछै दूधु ॥ मैलू कीनो साबुनु सूधु ॥ भै ते निरभउ डरता फिरै ॥ होंदी कउ अणहोंदी हिरै ॥२॥

देही गुपत बिदेही दीसै ॥ सगले साजि करत जगदीसै ॥ ठगणहार अणठगदा ठागै ॥ बिनु वखर फिरि फिरि उठि लागै ॥३॥

संत सभा मिलि करहु बखिआण ॥ सिम्रिति सासत बेद पुराण ॥ ब्रहम बीचारु बीचारे कोइ ॥ नानक ता की परम गति होइ ॥४॥४३॥५४॥

(राग रामकली -- SGGS 900) रामकली महला ५ ॥
जो तिसु भावै सो थीआ ॥ सदा सदा हरि की सरणाई प्रभ बिनु नाही आन बीआ ॥१॥ रहाउ ॥

पुतु कलत्रु लखिमी दीसै इन महि किछू न संगि लीआ ॥ बिखै ठगउरी खाइ भुलाना माइआ मंदरु तिआगि गइआ ॥१॥

निंदा करि करि बहुतु विगूता गरभ जोनि महि किरति पइआ ॥ पुरब कमाणे छोडहि नाही जमदूति ग्रासिओ महा भइआ ॥२॥

बोलै झूठु कमावै अवरा त्रिसन न बूझै बहुतु हइआ ॥ असाध रोगु उपजिआ संत दूखनि देह बिनासी महा खइआ ॥३॥

जिनहि निवाजे तिन ही साजे आपे कीने संत जइआ ॥ नानक दास कंठि लाइ राखे करि किरपा पारब्रहम मइआ ॥४॥४४॥५५॥

(राग रामकली -- SGGS 900) रामकली महला ५ ॥
ऐसा पूरा गुरदेउ सहाई ॥ जा का सिमरनु बिरथा न जाई ॥१॥ रहाउ ॥

दरसनु पेखत होइ निहालु ॥ जा की धूरि काटै जम जालु ॥ चरन कमल बसे मेरे मन के ॥ कारज सवारे सगले तन के ॥१॥

जा कै मसतकि राखै हाथु ॥ प्रभु मेरो अनाथ को नाथु ॥ पतित उधारणु क्रिपा निधानु ॥ सदा सदा जाईऐ कुरबानु ॥२॥

निरमल मंतु देइ जिसु दानु ॥ तजहि बिकार बिनसै अभिमानु ॥ एकु धिआईऐ साध कै संगि ॥ पाप बिनासे नाम कै रंगि ॥३॥

गुर परमेसुर सगल निवास ॥ घटि घटि रवि रहिआ गुणतास ॥ दरसु देहि धारउ प्रभ आस ॥ नित नानकु चितवै सचु अरदासि ॥४॥४५॥५६॥

(राग रामकली -- SGGS 901) रागु रामकली महला ५ घरु २ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गावहु राम के गुण गीत ॥ नामु जपत परम सुखु पाईऐ आवा गउणु मिटै मेरे मीत ॥१॥ रहाउ ॥

गुण गावत होवत परगासु ॥ चरन कमल महि होइ निवासु ॥१॥

संतसंगति महि होइ उधारु ॥ नानक भवजलु उतरसि पारि ॥२॥१॥५७॥

(राग रामकली -- SGGS 901) रामकली महला ५ ॥
गुरु पूरा मेरा गुरु पूरा ॥ राम नामु जपि सदा सुहेले सगल बिनासे रोग कूरा ॥१॥ रहाउ ॥

एकु अराधहु साचा सोइ ॥ जा की सरनि सदा सुखु होइ ॥१॥

नीद सुहेली नाम की लागी भूख ॥ हरि सिमरत बिनसे सभ दूख ॥२॥

सहजि अनंद करहु मेरे भाई ॥ गुरि पूरै सभ चिंत मिटाई ॥३॥

आठ पहर प्रभ का जपु जापि ॥ नानक राखा होआ आपि ॥४॥२॥५८॥

(राग रामकली -- SGGS 901) रागु रामकली महला ५ पड़ताल घरु ३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नरनरह नमसकारं ॥ जलन थलन बसुध गगन एक एकंकारं ॥१॥ रहाउ ॥

हरन धरन पुन पुनह करन ॥ नह गिरह निरंहारं ॥१॥

ग्मभीर धीर नाम हीर ऊच मूच अपारं ॥ करन केल गुण अमोल नानक बलिहारं ॥२॥१॥५९॥

(राग रामकली -- SGGS 901) रामकली महला ५ ॥
रूप रंग सुगंध भोग तिआगि चले माइआ छले कनिक कामिनी ॥१॥ रहाउ ॥

भंडार दरब अरब खरब पेखि लीला मनु सधारै ॥ नह संगि गामनी ॥१॥

सुत कलत्र भ्रात मीत उरझि परिओ भरमि मोहिओ इह बिरख छामनी ॥ चरन कमल सरन नानक सुखु संत भावनी ॥२॥२॥६०॥

(राग रामकली -- SGGS 912) रामकली महला ५ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
किनही कीआ परविरति पसारा ॥ किनही कीआ पूजा बिसथारा ॥ किनही निवल भुइअंगम साधे ॥ मोहि दीन हरि हरि आराधे ॥१॥

तेरा भरोसा पिआरे ॥ आन न जाना वेसा ॥१॥ रहाउ ॥

किनही ग्रिहु तजि वण खंडि पाइआ ॥ किनही मोनि अउधूतु सदाइआ ॥ कोई कहतउ अनंनि भगउती ॥ मोहि दीन हरि हरि ओट लीती ॥२॥

किनही कहिआ हउ तीरथ वासी ॥ कोई अंनु तजि भइआ उदासी ॥ किनही भवनु सभ धरती करिआ ॥ मोहि दीन हरि हरि दरि परिआ ॥३॥

किनही कहिआ मै कुलहि वडिआई ॥ किनही कहिआ बाह बहु भाई ॥ कोई कहै मै धनहि पसारा ॥ मोहि दीन हरि हरि आधारा ॥४॥

किनही घूघर निरति कराई ॥ किनहू वरत नेम माला पाई ॥ किनही तिलकु गोपी चंदन लाइआ ॥ मोहि दीन हरि हरि हरि धिआइआ ॥५॥

किनही सिध बहु चेटक लाए ॥ किनही भेख बहु थाट बनाए ॥ किनही तंत मंत बहु खेवा ॥ मोहि दीन हरि हरि हरि सेवा ॥६॥

कोई चतुरु कहावै पंडित ॥ को खटु करम सहित सिउ मंडित ॥ कोई करै आचार सुकरणी ॥ मोहि दीन हरि हरि हरि सरणी ॥७॥

सगले करम धरम जुग सोधे ॥ बिनु नावै इहु मनु न प्रबोधे ॥ कहु नानक जउ साधसंगु पाइआ ॥ बूझी त्रिसना महा सीतलाइआ ॥८॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 913) रामकली महला ५ ॥
इसु पानी ते जिनि तू घरिआ ॥ माटी का ले देहुरा करिआ ॥ उकति जोति लै सुरति परीखिआ ॥ मात गरभ महि जिनि तू राखिआ ॥१॥

राखनहारु सम्हारि जना ॥ सगले छोडि बीचार मना ॥१॥ रहाउ ॥

जिनि दीए तुधु बाप महतारी ॥ जिनि दीए भ्रात पुत हारी ॥ जिनि दीए तुधु बनिता अरु मीता ॥ तिसु ठाकुर कउ रखि लेहु चीता ॥२॥

जिनि दीआ तुधु पवनु अमोला ॥ जिनि दीआ तुधु नीरु निरमोला ॥ जिनि दीआ तुधु पावकु बलना ॥ तिसु ठाकुर की रहु मन सरना ॥३॥

छतीह अम्रित जिनि भोजन दीए ॥ अंतरि थान ठहरावन कउ कीए ॥ बसुधा दीओ बरतनि बलना ॥ तिसु ठाकुर के चिति रखु चरना ॥४॥

पेखन कउ नेत्र सुनन कउ करना ॥ हसत कमावन बासन रसना ॥ चरन चलन कउ सिरु कीनो मेरा ॥ मन तिसु ठाकुर के पूजहु पैरा ॥५॥

अपवित्र पवित्रु जिनि तू करिआ ॥ सगल जोनि महि तू सिरि धरिआ ॥ अब तू सीझु भावै नही सीझै ॥ कारजु सवरै मन प्रभु धिआईजै ॥६॥

ईहा ऊहा एकै ओही ॥ जत कत देखीऐ तत तत तोही ॥ तिसु सेवत मनि आलसु करै ॥ जिसु विसरिऐ इक निमख न सरै ॥७॥

हम अपराधी निरगुनीआरे ॥ ना किछु सेवा ना करमारे ॥ गुरु बोहिथु वडभागी मिलिआ ॥ नानक दास संगि पाथर तरिआ ॥८॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 913) रामकली महला ५ ॥
काहू बिहावै रंग रस रूप ॥ काहू बिहावै माइ बाप पूत ॥ काहू बिहावै राज मिलख वापारा ॥ संत बिहावै हरि नाम अधारा ॥१॥

रचना साचु बनी ॥ सभ का एकु धनी ॥१॥ रहाउ ॥

काहू बिहावै बेद अरु बादि ॥ काहू बिहावै रसना सादि ॥ काहू बिहावै लपटि संगि नारी ॥ संत रचे केवल नाम मुरारी ॥२॥

काहू बिहावै खेलत जूआ ॥ काहू बिहावै अमली हूआ ॥ काहू बिहावै पर दरब चोराए ॥ हरि जन बिहावै नाम धिआए ॥३॥

काहू बिहावै जोग तप पूजा ॥ काहू रोग सोग भरमीजा ॥ काहू पवन धार जात बिहाए ॥ संत बिहावै कीरतनु गाए ॥४॥

काहू बिहावै दिनु रैनि चालत ॥ काहू बिहावै सो पिड़ु मालत ॥ काहू बिहावै बाल पड़ावत ॥ संत बिहावै हरि जसु गावत ॥५॥

काहू बिहावै नट नाटिक निरते ॥ काहू बिहावै जीआइह हिरते ॥ काहू बिहावै राज महि डरते ॥ संत बिहावै हरि जसु करते ॥६॥

काहू बिहावै मता मसूरति ॥ काहू बिहावै सेवा जरूरति ॥ काहू बिहावै सोधत जीवत ॥ संत बिहावै हरि रसु पीवत ॥७॥

जितु को लाइआ तित ही लगाना ॥ ना को मूड़ु नही को सिआना ॥ करि किरपा जिसु देवै नाउ ॥ नानक ता कै बलि बलि जाउ ॥८॥३॥

(राग रामकली -- SGGS 914) रामकली महला ५ ॥
दावा अगनि रहे हरि बूट ॥ मात गरभ संकट ते छूट ॥ जा का नामु सिमरत भउ जाइ ॥ तैसे संत जना राखै हरि राइ ॥१॥

ऐसे राखनहार दइआल ॥ जत कत देखउ तुम प्रतिपाल ॥१॥ रहाउ ॥

जलु पीवत जिउ तिखा मिटंत ॥ धन बिगसै ग्रिहि आवत कंत ॥ लोभी का धनु प्राण अधारु ॥ तिउ हरि जन हरि हरि नाम पिआरु ॥२॥

किरसानी जिउ राखै रखवाला ॥ मात पिता दइआ जिउ बाला ॥ प्रीतमु देखि प्रीतमु मिलि जाइ ॥ तिउ हरि जन राखै कंठि लाइ ॥३॥

जिउ अंधुले पेखत होइ अनंद ॥ गूंगा बकत गावै बहु छंद ॥ पिंगुल परबत परते पारि ॥ हरि कै नामि सगल उधारि ॥४॥

जिउ पावक संगि सीत को नास ॥ ऐसे प्राछत संतसंगि बिनास ॥ जिउ साबुनि कापर ऊजल होत ॥ नाम जपत सभु भ्रमु भउ खोत ॥५॥

जिउ चकवी सूरज की आस ॥ जिउ चात्रिक बूंद की पिआस ॥ जिउ कुरंक नाद करन समाने ॥ तिउ हरि नाम हरि जन मनहि सुखाने ॥६॥

तुमरी क्रिपा ते लागी प्रीति ॥ दइआल भए ता आए चीति ॥ दइआ धारी तिनि धारणहार ॥ बंधन ते होई छुटकार ॥७॥

सभि थान देखे नैण अलोइ ॥ तिसु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥ भ्रम भै छूटे गुर परसाद ॥ नानक पेखिओ सभु बिसमाद ॥८॥४॥

(राग रामकली -- SGGS 915) रामकली महला ५ ॥
जीअ जंत सभि पेखीअहि प्रभ सगल तुमारी धारना ॥१॥

इहु मनु हरि कै नामि उधारना ॥१॥ रहाउ ॥

खिन महि थापि उथापे कुदरति सभि करते के कारना ॥२॥

कामु क्रोधु लोभु झूठु निंदा साधू संगि बिदारना ॥३॥

नामु जपत मनु निरमल होवै सूखे सूखि गुदारना ॥४॥

भगत सरणि जो आवै प्राणी तिसु ईहा ऊहा न हारना ॥५॥

सूख दूख इसु मन की बिरथा तुम ही आगै सारना ॥६॥

तू दाता सभना जीआ का आपन कीआ पालना ॥७॥

अनिक बार कोटि जन ऊपरि नानकु वंञै वारना ॥८॥५॥

(राग रामकली -- SGGS 915) रामकली महला ५ असटपदी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दरसनु भेटत पाप सभि नासहि हरि सिउ देइ मिलाई ॥१॥

मेरा गुरु परमेसरु सुखदाई ॥ पारब्रहम का नामु द्रिड़ाए अंते होइ सखाई ॥१॥ रहाउ ॥

सगल दूख का डेरा भंना संत धूरि मुखि लाई ॥२॥

पतित पुनीत कीए खिन भीतरि अगिआनु अंधेरु वंञाई ॥३॥

करण कारण समरथु सुआमी नानक तिसु सरणाई ॥४॥

बंधन तोड़ि चरन कमल द्रिड़ाए एक सबदि लिव लाई ॥५॥

अंध कूप बिखिआ ते काढिओ साच सबदि बणि आई ॥६॥

जनम मरण का सहसा चूका बाहुड़ि कतहु न धाई ॥७॥

नाम रसाइणि इहु मनु राता अम्रितु पी त्रिपताई ॥८॥

संतसंगि मिलि कीरतनु गाइआ निहचल वसिआ जाई ॥९॥

पूरै गुरि पूरी मति दीनी हरि बिनु आन न भाई ॥१०॥

नामु निधानु पाइआ वडभागी नानक नरकि न जाई ॥११॥

घाल सिआणप उकति न मेरी पूरै गुरू कमाई ॥१२॥

जप तप संजम सुचि है सोई आपे करे कराई ॥१३॥

पुत्र कलत्र महा बिखिआ महि गुरि साचै लाइ तराई ॥१४॥

अपणे जीअ तै आपि सम्हाले आपि लीए लड़ि लाई ॥१५॥

साच धरम का बेड़ा बांधिआ भवजलु पारि पवाई ॥१६॥

बेसुमार बेअंत सुआमी नानक बलि बलि जाई ॥१७॥

अकाल मूरति अजूनी स्मभउ कलि अंधकार दीपाई ॥१८॥

अंतरजामी जीअन का दाता देखत त्रिपति अघाई ॥१९॥

एकंकारु निरंजनु निरभउ सभ जलि थलि रहिआ समाई ॥२०॥

भगति दानु भगता कउ दीना हरि नानकु जाचै माई ॥२१॥१॥६॥

(राग रामकली -- SGGS 916) रामकली महला ५ ॥
सलोकु ॥
सिखहु सबदु पिआरिहो जनम मरन की टेक ॥ मुखु ऊजलु सदा सुखी नानक सिमरत एक ॥१॥

मनु तनु राता राम पिआरे हरि प्रेम भगति बणि आई संतहु ॥१॥

सतिगुरि खेप निबाही संतहु ॥ हरि नामु लाहा दास कउ दीआ सगली त्रिसन उलाही संतहु ॥१॥ रहाउ ॥

खोजत खोजत लालु इकु पाइआ हरि कीमति कहणु न जाई संतहु ॥२॥

चरन कमल सिउ लागो धिआना साचै दरसि समाई संतहु ॥३॥

गुण गावत गावत भए निहाला हरि सिमरत त्रिपति अघाई संतहु ॥४॥

आतम रामु रविआ सभ अंतरि कत आवै कत जाई संतहु ॥५॥

आदि जुगादी है भी होसी सभ जीआ का सुखदाई संतहु ॥६॥

आपि बेअंतु अंतु नही पाईऐ पूरि रहिआ सभ ठाई संतहु ॥७॥

मीत साजन मालु जोबनु सुत हरि नानक बापु मेरी माई संतहु ॥८॥२॥७॥

(राग रामकली -- SGGS 916) रामकली महला ५ ॥
मन बच क्रमि राम नामु चितारी ॥ घूमन घेरि महा अति बिखड़ी गुरमुखि नानक पारि उतारी ॥१॥ रहाउ ॥

अंतरि सूखा बाहरि सूखा हरि जपि मलन भए दुसटारी ॥१॥

जिस ते लागे तिनहि निवारे प्रभ जीउ अपणी किरपा धारी ॥२॥

उधरे संत परे हरि सरनी पचि बिनसे महा अहंकारी ॥३॥

साधू संगति इहु फलु पाइआ इकु केवल नामु अधारी ॥४॥

न कोई सूरु न कोई हीणा सभ प्रगटी जोति तुम्हारी ॥५॥

तुम्ह समरथ अकथ अगोचर रविआ एकु मुरारी ॥६॥

कीमति कउणु करे तेरी करते प्रभ अंतु न पारावारी ॥७॥

नाम दानु नानक वडिआई तेरिआ संत जना रेणारी ॥८॥३॥८॥२२॥

(राग रामकली -- SGGS 924) रामकली महला ५ छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
साजनड़ा मेरा साजनड़ा निकटि खलोइअड़ा मेरा साजनड़ा ॥ जानीअड़ा हरि जानीअड़ा नैण अलोइअड़ा हरि जानीअड़ा ॥ नैण अलोइआ घटि घटि सोइआ अति अम्रित प्रिअ गूड़ा ॥ नालि होवंदा लहि न सकंदा सुआउ न जाणै मूड़ा ॥ माइआ मदि माता होछी बाता मिलणु न जाई भरम धड़ा ॥ कहु नानक गुर बिनु नाही सूझै हरि साजनु सभ कै निकटि खड़ा ॥१॥

गोबिंदा मेरे गोबिंदा प्राण अधारा मेरे गोबिंदा ॥ किरपाला मेरे किरपाला दान दातारा मेरे किरपाला ॥ दान दातारा अपर अपारा घट घट अंतरि सोहनिआ ॥ इक दासी धारी सबल पसारी जीअ जंत लै मोहनिआ ॥ जिस नो राखै सो सचु भाखै गुर का सबदु बीचारा ॥ कहु नानक जो प्रभ कउ भाणा तिस ही कउ प्रभु पिआरा ॥२॥

माणो प्रभ माणो मेरे प्रभ का माणो ॥ जाणो प्रभु जाणो सुआमी सुघड़ु सुजाणो ॥ सुघड़ सुजाना सद परधाना अम्रितु हरि का नामा ॥ चाखि अघाणे सारिगपाणे जिन कै भाग मथाना ॥ तिन ही पाइआ तिनहि धिआइआ सगल तिसै का माणो ॥ कहु नानक थिरु तखति निवासी सचु तिसै दीबाणो ॥३॥

मंगला हरि मंगला मेरे प्रभ कै सुणीऐ मंगला ॥ सोहिलड़ा प्रभ सोहिलड़ा अनहद धुनीऐ सोहिलड़ा ॥ अनहद वाजे सबद अगाजे नित नित जिसहि वधाई ॥ सो प्रभु धिआईऐ सभु किछु पाईऐ मरै न आवै जाई ॥ चूकी पिआसा पूरन आसा गुरमुखि मिलु निरगुनीऐ ॥ कहु नानक घरि प्रभ मेरे कै नित नित मंगलु सुनीऐ ॥४॥१॥

(राग रामकली -- SGGS 925) रामकली महला ५ ॥
हरि हरि धिआइ मना खिनु न विसारीऐ ॥ राम रामा राम रमा कंठि उर धारीऐ ॥ उर धारि हरि हरि पुरखु पूरनु पारब्रहमु निरंजनो ॥ भै दूरि करता पाप हरता दुसह दुख भव खंडनो ॥ जगदीस ईस गोपाल माधो गुण गोविंद वीचारीऐ ॥ बिनवंति नानक मिलि संगि साधू दिनसु रैणि चितारीऐ ॥१॥

चरन कमल आधारु जन का आसरा ॥ मालु मिलख भंडार नामु अनंत धरा ॥ नामु नरहर निधानु जिन कै रस भोग एक नराइणा ॥ रस रूप रंग अनंत बीठल सासि सासि धिआइणा ॥ किलविख हरणा नाम पुनहचरणा नामु जम की त्रास हरा ॥ बिनवंति नानक रासि जन की चरन कमलह आसरा ॥२॥

गुण बेअंत सुआमी तेरे कोइ न जानई ॥ देखि चलत दइआल सुणि भगत वखानई ॥ जीअ जंत सभि तुझु धिआवहि पुरखपति परमेसरा ॥ सरब जाचिक एकु दाता करुणा मै जगदीसरा ॥ साधू संतु सुजाणु सोई जिसहि प्रभ जी मानई ॥ बिनवंति नानक करहु किरपा सोइ तुझहि पछानई ॥३॥

मोहि निरगुण अनाथु सरणी आइआ ॥ बलि बलि बलि गुरदेव जिनि नामु द्रिड़ाइआ ॥ गुरि नामु दीआ कुसलु थीआ सरब इछा पुंनीआ ॥ जलने बुझाई सांति आई मिले चिरी विछुंनिआ ॥ आनंद हरख सहज साचे महा मंगल गुण गाइआ ॥ बिनवंति नानक नामु प्रभ का गुर पूरे ते पाइआ ॥४॥२॥

(राग रामकली -- SGGS 925) रामकली महला ५ ॥
रुण झुणो सबदु अनाहदु नित उठि गाईऐ संतन कै ॥ किलविख सभि दोख बिनासनु हरि नामु जपीऐ गुर मंतन कै ॥ हरि नामु लीजै अमिउ पीजै रैणि दिनसु अराधीऐ ॥ जोग दान अनेक किरिआ लगि चरण कमलह साधीऐ ॥ भाउ भगति दइआल मोहन दूख सगले परहरै ॥ बिनवंति नानक तरै सागरु धिआइ सुआमी नरहरै ॥१॥

सुख सागर गोबिंद सिमरणु भगत गावहि गुण तेरे राम ॥ अनद मंगल गुर चरणी लागे पाए सूख घनेरे राम ॥ सुख निधानु मिलिआ दूख हरिआ क्रिपा करि प्रभि राखिआ ॥ हरि चरण लागा भ्रमु भउ भागा हरि नामु रसना भाखिआ ॥ हरि एकु चितवै प्रभु एकु गावै हरि एकु द्रिसटी आइआ ॥ बिनवंति नानक प्रभि करी किरपा पूरा सतिगुरु पाइआ ॥२॥

मिलि रहीऐ प्रभ साध जना मिलि हरि कीरतनु सुनीऐ राम ॥ दइआल प्रभू दामोदर माधो अंतु न पाईऐ गुनीऐ राम ॥ दइआल दुख हर सरणि दाता सगल दोख निवारणो ॥ मोह सोग विकार बिखड़े जपत नाम उधारणो ॥ सभि जीअ तेरे प्रभू मेरे करि किरपा सभ रेण थीवा ॥ बिनवंति नानक प्रभ मइआ कीजै नामु तेरा जपि जीवा ॥३॥

राखि लीए प्रभि भगत जना अपणी चरणी लाए राम ॥ आठ पहर अपना प्रभु सिमरह एको नामु धिआए राम ॥ धिआइ सो प्रभु तरे भवजल रहे आवण जाणा ॥ सदा सुखु कलिआण कीरतनु प्रभ लगा मीठा भाणा ॥ सभ इछ पुंनी आस पूरी मिले सतिगुर पूरिआ ॥ बिनवंति नानक प्रभि आपि मेले फिरि नाही दूख विसूरिआ ॥४॥३॥


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