Pt 28 - गुरू अर्जन देव जी - सलोक बाणी शब्द, Part 28 - Guru Arjan Dev ji (Mahalla 5) - Slok Bani Quotes Shabad Path in Hindi Gurbani online


100+ गुरबाणी पाठ (हिंदी) सुन्दर गुटका साहिब (Download PDF) Daily Updates


(राग बिलावलु -- SGGS 807) बिलावलु महला ५ ॥
ताप संताप सगले गए बिनसे ते रोग ॥ पारब्रहमि तू बखसिआ संतन रस भोग ॥ रहाउ ॥ सरब सुखा तेरी मंडली तेरा मनु तनु आरोग ॥ गुन गावहु नित राम के इह अवखद जोग ॥१॥

आइ बसहु घर देस महि इह भले संजोग ॥ नानक प्रभ सुप्रसंन भए लहि गए बिओग ॥२॥१०॥२८॥

(राग बिलावलु -- SGGS 807) बिलावलु महला ५ ॥
काहू संगि न चालही माइआ जंजाल ॥ ऊठि सिधारे छत्रपति संतन कै खिआल ॥ रहाउ ॥ अह्मबुधि कउ बिनसना इह धुर की ढाल ॥ बहु जोनी जनमहि मरहि बिखिआ बिकराल ॥१॥

सति बचन साधू कहहि नित जपहि गुपाल ॥ सिमरि सिमरि नानक तरे हरि के रंग लाल ॥२॥११॥२९॥

(राग बिलावलु -- SGGS 807) बिलावलु महला ५ ॥
सहज समाधि अनंद सूख पूरे गुरि दीन ॥ सदा सहाई संगि प्रभ अम्रित गुण चीन ॥ रहाउ ॥ जै जै कारु जगत्र महि लोचहि सभि जीआ ॥ सुप्रसंन भए सतिगुर प्रभू कछु बिघनु न थीआ ॥१॥

जा का अंगु दइआल प्रभ ता के सभ दास ॥ सदा सदा वडिआईआ नानक गुर पासि ॥२॥१२॥३०॥

(राग बिलावलु -- SGGS 808) रागु बिलावलु महला ५ घरु ५ चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
म्रित मंडल जगु साजिआ जिउ बालू घर बार ॥ बिनसत बार न लागई जिउ कागद बूंदार ॥१॥

सुनि मेरी मनसा मनै माहि सति देखु बीचारि ॥ सिध साधिक गिरही जोगी तजि गए घर बार ॥१॥ रहाउ ॥

जैसा सुपना रैनि का तैसा संसार ॥ द्रिसटिमान सभु बिनसीऐ किआ लगहि गवार ॥२॥

कहा सु भाई मीत है देखु नैन पसारि ॥ इकि चाले इकि चालसहि सभि अपनी वार ॥३॥

जिन पूरा सतिगुरु सेविआ से असथिरु हरि दुआरि ॥ जनु नानकु हरि का दासु है राखु पैज मुरारि ॥४॥१॥३१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 808) बिलावलु महला ५ ॥
लोकन कीआ वडिआईआ बैसंतरि पागउ ॥ जिउ मिलै पिआरा आपना ते बोल करागउ ॥१॥

जउ प्रभ जीउ दइआल होइ तउ भगती लागउ ॥ लपटि रहिओ मनु बासना गुर मिलि इह तिआगउ ॥१॥ रहाउ ॥

करउ बेनती अति घनी इहु जीउ होमागउ ॥ अरथ आन सभि वारिआ प्रिअ निमख सोहागउ ॥२॥

पंच संगु गुर ते छुटे दोख अरु रागउ ॥ रिदै प्रगासु प्रगट भइआ निसि बासुर जागउ ॥३॥

सरणि सोहागनि आइआ जिसु मसतकि भागउ ॥ कहु नानक तिनि पाइआ तनु मनु सीतलागउ ॥४॥२॥३२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 808) बिलावलु महला ५ ॥
लाल रंगु तिस कउ लगा जिस के वडभागा ॥ मैला कदे न होवई नह लागै दागा ॥१॥

प्रभु पाइआ सुखदाईआ मिलिआ सुख भाइ ॥ सहजि समाना भीतरे छोडिआ नह जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जरा मरा नह विआपई फिरि दूखु न पाइआ ॥ पी अम्रितु आघानिआ गुरि अमरु कराइआ ॥२॥

सो जानै जिनि चाखिआ हरि नामु अमोला ॥ कीमति कही न जाईऐ किआ कहि मुखि बोला ॥३॥

सफल दरसु तेरा पारब्रहम गुण निधि तेरी बाणी ॥ पावउ धूरि तेरे दास की नानक कुरबाणी ॥४॥३॥३३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 809) बिलावलु महला ५ ॥
राखहु अपनी सरणि प्रभ मोहि किरपा धारे ॥ सेवा कछू न जानऊ नीचु मूरखारे ॥१॥

मानु करउ तुधु ऊपरे मेरे प्रीतम पिआरे ॥ हम अपराधी सद भूलते तुम्ह बखसनहारे ॥१॥ रहाउ ॥

हम अवगन करह असंख नीति तुम्ह निरगुन दातारे ॥ दासी संगति प्रभू तिआगि ए करम हमारे ॥२॥

तुम्ह देवहु सभु किछु दइआ धारि हम अकिरतघनारे ॥ लागि परे तेरे दान सिउ नह चिति खसमारे ॥३॥

तुझ ते बाहरि किछु नही भव काटनहारे ॥ कहु नानक सरणि दइआल गुर लेहु मुगध उधारे ॥४॥४॥३४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 809) बिलावलु महला ५ ॥
दोसु न काहू दीजीऐ प्रभु अपना धिआईऐ ॥ जितु सेविऐ सुखु होइ घना मन सोई गाईऐ ॥१॥

कहीऐ काइ पिआरे तुझु बिना ॥ तुम्ह दइआल सुआमी सभ अवगन हमा ॥१॥ रहाउ ॥

जिउ तुम्ह राखहु तिउ रहा अवरु नही चारा ॥ नीधरिआ धर तेरीआ इक नाम अधारा ॥२॥

जो तुम्ह करहु सोई भला मनि लेता मुकता ॥ सगल समग्री तेरीआ सभ तेरी जुगता ॥३॥

चरन पखारउ करि सेवा जे ठाकुर भावै ॥ होहु क्रिपाल दइआल प्रभ नानकु गुण गावै ॥४॥५॥३५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 809) बिलावलु महला ५ ॥
मिरतु हसै सिर ऊपरे पसूआ नही बूझै ॥ बाद साद अहंकार महि मरणा नही सूझै ॥१॥

सतिगुरु सेवहु आपना काहे फिरहु अभागे ॥ देखि कसु्मभा रंगुला काहे भूलि लागे ॥१॥ रहाउ ॥

करि करि पाप दरबु कीआ वरतण कै ताई ॥ माटी सिउ माटी रली नागा उठि जाई ॥२॥

जा कै कीऐ स्रमु करै ते बैर बिरोधी ॥ अंत कालि भजि जाहिगे काहे जलहु करोधी ॥३॥

दास रेणु सोई होआ जिसु मसतकि करमा ॥ कहु नानक बंधन छुटे सतिगुर की सरना ॥४॥६॥३६॥

(राग बिलावलु -- SGGS 809) बिलावलु महला ५ ॥
पिंगुल परबत पारि परे खल चतुर बकीता ॥ अंधुले त्रिभवण सूझिआ गुर भेटि पुनीता ॥१॥

महिमा साधू संग की सुनहु मेरे मीता ॥ मैलु खोई कोटि अघ हरे निरमल भए चीता ॥१॥ रहाउ ॥

ऐसी भगति गोविंद की कीटि हसती जीता ॥ जो जो कीनो आपनो तिसु अभै दानु दीता ॥२॥

सिंघु बिलाई होइ गइओ त्रिणु मेरु दिखीता ॥ स्रमु करते दम आढ कउ ते गनी धनीता ॥३॥

कवन वडाई कहि सकउ बेअंत गुनीता ॥ करि किरपा मोहि नामु देहु नानक दर सरीता ॥४॥७॥३७॥

(राग बिलावलु -- SGGS 810) बिलावलु महला ५ ॥
अह्मबुधि परबाद नीत लोभ रसना सादि ॥ लपटि कपटि ग्रिहि बेधिआ मिथिआ बिखिआदि ॥१॥

ऐसी पेखी नेत्र महि पूरे गुर परसादि ॥ राज मिलख धन जोबना नामै बिनु बादि ॥१॥ रहाउ ॥

रूप धूप सोगंधता कापर भोगादि ॥ मिलत संगि पापिसट तन होए दुरगादि ॥२॥

फिरत फिरत मानुखु भइआ खिन भंगन देहादि ॥ इह अउसर ते चूकिआ बहु जोनि भ्रमादि ॥३॥

प्रभ किरपा ते गुर मिले हरि हरि बिसमाद ॥ सूख सहज नानक अनंद ता कै पूरन नाद ॥४॥८॥३८॥

(राग बिलावलु -- SGGS 810) बिलावलु महला ५ ॥
चरन भए संत बोहिथा तरे सागरु जेत ॥ मारग पाए उदिआन महि गुरि दसे भेत ॥१॥

हरि हरि हरि हरि हरि हरे हरि हरि हरि हेत ॥ ऊठत बैठत सोवते हरि हरि हरि चेत ॥१॥ रहाउ ॥

पंच चोर आगै भगे जब साधसंगेत ॥ पूंजी साबतु घणो लाभु ग्रिहि सोभा सेत ॥२॥

निहचल आसणु मिटी चिंत नाही डोलेत ॥ भरमु भुलावा मिटि गइआ प्रभ पेखत नेत ॥३॥

गुण गभीर गुन नाइका गुण कहीअहि केत ॥ नानक पाइआ साधसंगि हरि हरि अम्रेत ॥४॥९॥३९॥

(राग बिलावलु -- SGGS 810) बिलावलु महला ५ ॥
बिनु साधू जो जीवना तेतो बिरथारी ॥ मिलत संगि सभि भ्रम मिटे गति भई हमारी ॥१॥

जा दिन भेटे साध मोहि उआ दिन बलिहारी ॥ तनु मनु अपनो जीअरा फिरि फिरि हउ वारी ॥१॥ रहाउ ॥

एत छडाई मोहि ते इतनी द्रिड़तारी ॥ सगल रेन इहु मनु भइआ बिनसी अपधारी ॥२॥

निंद चिंद पर दूखना ए खिन महि जारी ॥ दइआ मइआ अरु निकटि पेखु नाही दूरारी ॥३॥

तन मन सीतल भए अब मुकते संसारी ॥ हीत चीत सभ प्रान धन नानक दरसारी ॥४॥१०॥४०॥

(राग बिलावलु -- SGGS 810) बिलावलु महला ५ ॥
टहल करउ तेरे दास की पग झारउ बाल ॥ मसतकु अपना भेट देउ गुन सुनउ रसाल ॥१॥

तुम्ह मिलते मेरा मनु जीओ तुम्ह मिलहु दइआल ॥ निसि बासुर मनि अनदु होत चितवत किरपाल ॥१॥ रहाउ ॥

जगत उधारन साध प्रभ तिन्ह लागहु पाल ॥ मो कउ दीजै दानु प्रभ संतन पग राल ॥२॥

उकति सिआनप कछु नही नाही कछु घाल ॥ भ्रम भै राखहु मोह ते काटहु जम जाल ॥३॥

बिनउ करउ करुणापते पिता प्रतिपाल ॥ गुण गावउ तेरे साधसंगि नानक सुख साल ॥४॥११॥४१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 811) बिलावलु महला ५ ॥
कीता लोड़हि सो करहि तुझ बिनु कछु नाहि ॥ परतापु तुम्हारा देखि कै जमदूत छडि जाहि ॥१॥

तुम्हरी क्रिपा ते छूटीऐ बिनसै अहमेव ॥ सरब कला समरथ प्रभ पूरे गुरदेव ॥१॥ रहाउ ॥

खोजत खोजत खोजिआ नामै बिनु कूरु ॥ जीवन सुखु सभु साधसंगि प्रभ मनसा पूरु ॥२॥

जितु जितु लावहु तितु तितु लगहि सिआनप सभ जाली ॥ जत कत तुम्ह भरपूर हहु मेरे दीन दइआली ॥३॥

सभु किछु तुम ते मागना वडभागी पाए ॥ नानक की अरदासि प्रभ जीवा गुन गाए ॥४॥१२॥४२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 811) बिलावलु महला ५ ॥
साधसंगति कै बासबै कलमल सभि नसना ॥ प्रभ सेती रंगि रातिआ ता ते गरभि न ग्रसना ॥१॥

नामु कहत गोविंद का सूची भई रसना ॥ मन तन निरमल होई है गुर का जपु जपना ॥१॥ रहाउ ॥

हरि रसु चाखत ध्रापिआ मनि रसु लै हसना ॥ बुधि प्रगास प्रगट भई उलटि कमलु बिगसना ॥२॥

सीतल सांति संतोखु होइ सभ बूझी त्रिसना ॥ दह दिस धावत मिटि गए निरमल थानि बसना ॥३॥

राखनहारै राखिआ भए भ्रम भसना ॥ नामु निधान नानक सुखी पेखि साध दरसना ॥४॥१३॥४३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 811) बिलावलु महला ५ ॥
पाणी पखा पीसु दास कै तब होहि निहालु ॥ राज मिलख सिकदारीआ अगनी महि जालु ॥१॥

संत जना का छोहरा तिसु चरणी लागि ॥ माइआधारी छत्रपति तिन्ह छोडउ तिआगि ॥१॥ रहाउ ॥

संतन का दाना रूखा सो सरब निधान ॥ ग्रिहि साकत छतीह प्रकार ते बिखू समान ॥२॥

भगत जना का लूगरा ओढि नगन न होई ॥ साकत सिरपाउ रेसमी पहिरत पति खोई ॥३॥

साकत सिउ मुखि जोरिऐ अध वीचहु टूटै ॥ हरि जन की सेवा जो करे इत ऊतहि छूटै ॥४॥

सभ किछु तुम्ह ही ते होआ आपि बणत बणाई ॥ दरसनु भेटत साध का नानक गुण गाई ॥५॥१४॥४४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 812) बिलावलु महला ५ ॥
स्रवनी सुनउ हरि हरि हरे ठाकुर जसु गावउ ॥ संत चरण कर सीसु धरि हरि नामु धिआवउ ॥१॥

करि किरपा दइआल प्रभ इह निधि सिधि पावउ ॥ संत जना की रेणुका लै माथै लावउ ॥१॥ रहाउ ॥

नीच ते नीचु अति नीचु होइ करि बिनउ बुलावउ ॥ पाव मलोवा आपु तिआगि संतसंगि समावउ ॥२॥

सासि सासि नह वीसरै अन कतहि न धावउ ॥ सफल दरसन गुरु भेटीऐ मानु मोहु मिटावउ ॥३॥

सतु संतोखु दइआ धरमु सीगारु बनावउ ॥ सफल सुहागणि नानका अपुने प्रभ भावउ ॥४॥१५॥४५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 812) बिलावलु महला ५ ॥
अटल बचन साधू जना सभ महि प्रगटाइआ ॥ जिसु जन होआ साधसंगु तिसु भेटै हरि राइआ ॥१॥

इह परतीति गोविंद की जपि हरि सुखु पाइआ ॥ अनिक बाता सभि करि रहे गुरु घरि लै आइआ ॥१॥ रहाउ ॥

सरणि परे की राखता नाही सहसाइआ ॥ करम भूमि हरि नामु बोइ अउसरु दुलभाइआ ॥२॥

अंतरजामी आपि प्रभु सभ करे कराइआ ॥ पतित पुनीत घणे करे ठाकुर बिरदाइआ ॥३॥

मत भूलहु मानुख जन माइआ भरमाइआ ॥ नानक तिसु पति राखसी जो प्रभि पहिराइआ ॥४॥१६॥४६॥

(राग बिलावलु -- SGGS 812) बिलावलु महला ५ ॥
माटी ते जिनि साजिआ करि दुरलभ देह ॥ अनिक छिद्र मन महि ढके निरमल द्रिसटेह ॥१॥

किउ बिसरै प्रभु मनै ते जिस के गुण एह ॥ प्रभ तजि रचे जि आन सिउ सो रलीऐ खेह ॥१॥ रहाउ ॥

सिमरहु सिमरहु सासि सासि मत बिलम करेह ॥ छोडि प्रपंचु प्रभ सिउ रचहु तजि कूड़े नेह ॥२॥

जिनि अनिक एक बहु रंग कीए है होसी एह ॥ करि सेवा तिसु पारब्रहम गुर ते मति लेह ॥३॥

ऊचे ते ऊचा वडा सभ संगि बरनेह ॥ दास दास को दासरा नानक करि लेह ॥४॥१७॥४७॥

(राग बिलावलु -- SGGS 812) बिलावलु महला ५ ॥
एक टेक गोविंद की तिआगी अन आस ॥ सभ ऊपरि समरथ प्रभ पूरन गुणतास ॥१॥

जन का नामु अधारु है प्रभ सरणी पाहि ॥ परमेसर का आसरा संतन मन माहि ॥१॥ रहाउ ॥

आपि रखै आपि देवसी आपे प्रतिपारै ॥ दीन दइआल क्रिपा निधे सासि सासि सम्हारै ॥२॥

करणहारु जो करि रहिआ साई वडिआई ॥ गुरि पूरै उपदेसिआ सुखु खसम रजाई ॥३॥

चिंत अंदेसा गणत तजि जनि हुकमु पछाता ॥ नह बिनसै नह छोडि जाइ नानक रंगि राता ॥४॥१८॥४८॥

(राग बिलावलु -- SGGS 813) बिलावलु महला ५ ॥
महा तपति ते भई सांति परसत पाप नाठे ॥ अंध कूप महि गलत थे काढे दे हाथे ॥१॥

ओइ हमारे साजना हम उन की रेन ॥ जिन भेटत होवत सुखी जीअ दानु देन ॥१॥ रहाउ ॥

परा पूरबला लीखिआ मिलिआ अब आइ ॥ बसत संगि हरि साध कै पूरन आसाइ ॥२॥

भै बिनसे तिहु लोक के पाए सुख थान ॥ दइआ करी समरथ गुरि बसिआ मनि नाम ॥३॥

नानक की तू टेक प्रभ तेरा आधार ॥ करण कारण समरथ प्रभ हरि अगम अपार ॥४॥१९॥४९॥

(राग बिलावलु -- SGGS 813) बिलावलु महला ५ ॥
सोई मलीनु दीनु हीनु जिसु प्रभु बिसराना ॥ करनैहारु न बूझई आपु गनै बिगाना ॥१॥

दूखु तदे जदि वीसरै सुखु प्रभ चिति आए ॥ संतन कै आनंदु एहु नित हरि गुण गाए ॥१॥ रहाउ ॥

ऊचे ते नीचा करै नीच खिन महि थापै ॥ कीमति कही न जाईऐ ठाकुर परतापै ॥२॥

पेखत लीला रंग रूप चलनै दिनु आइआ ॥ सुपने का सुपना भइआ संगि चलिआ कमाइआ ॥३॥

करण कारण समरथ प्रभ तेरी सरणाई ॥ हरि दिनसु रैणि नानकु जपै सद सद बलि जाई ॥४॥२०॥५०॥

(राग बिलावलु -- SGGS 813) बिलावलु महला ५ ॥
जलु ढोवउ इह सीस करि कर पग पखलावउ ॥ बारि जाउ लख बेरीआ दरसु पेखि जीवावउ ॥१॥

करउ मनोरथ मनै माहि अपने प्रभ ते पावउ ॥ देउ सूहनी साध कै बीजनु ढोलावउ ॥१॥ रहाउ ॥

अम्रित गुण संत बोलते सुणि मनहि पीलावउ ॥ उआ रस महि सांति त्रिपति होइ बिखै जलनि बुझावउ ॥२॥

जब भगति करहि संत मंडली तिन्ह मिलि हरि गावउ ॥ करउ नमसकार भगत जन धूरि मुखि लावउ ॥३॥

ऊठत बैठत जपउ नामु इहु करमु कमावउ ॥ नानक की प्रभ बेनती हरि सरनि समावउ ॥४॥२१॥५१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 813) बिलावलु महला ५ ॥
इहु सागरु सोई तरै जो हरि गुण गाए ॥ साधसंगति कै संगि वसै वडभागी पाए ॥१॥

सुणि सुणि जीवै दासु तुम्ह बाणी जन आखी ॥ प्रगट भई सभ लोअ महि सेवक की राखी ॥१॥ रहाउ ॥

अगनि सागर ते काढिआ प्रभि जलनि बुझाई ॥ अम्रित नामु जलु संचिआ गुर भए सहाई ॥२॥

जनम मरण दुख काटिआ सुख का थानु पाइआ ॥ काटी सिलक भ्रम मोह की अपने प्रभ भाइआ ॥३॥

मत कोई जाणहु अवरु कछु सभ प्रभ कै हाथि ॥ सरब सूख नानक पाए संगि संतन साथि ॥४॥२२॥५२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 814) बिलावलु महला ५ ॥
बंधन काटे आपि प्रभि होआ किरपाल ॥ दीन दइआल प्रभ पारब्रहम ता की नदरि निहाल ॥१॥

गुरि पूरै किरपा करी काटिआ दुखु रोगु ॥ मनु तनु सीतलु सुखी भइआ प्रभ धिआवन जोगु ॥१॥ रहाउ ॥

अउखधु हरि का नामु है जितु रोगु न विआपै ॥ साधसंगि मनि तनि हितै फिरि दूखु न जापै ॥२॥

हरि हरि हरि हरि जापीऐ अंतरि लिव लाई ॥ किलविख उतरहि सुधु होइ साधू सरणाई ॥३॥

सुनत जपत हरि नाम जसु ता की दूरि बलाई ॥ महा मंत्रु नानकु कथै हरि के गुण गाई ॥४॥२३॥५३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 814) बिलावलु महला ५ ॥
भै ते उपजै भगति प्रभ अंतरि होइ सांति ॥ नामु जपत गोविंद का बिनसै भ्रम भ्रांति ॥१॥

गुरु पूरा जिसु भेटिआ ता कै सुखि परवेसु ॥ मन की मति तिआगीऐ सुणीऐ उपदेसु ॥१॥ रहाउ ॥

सिमरत सिमरत सिमरीऐ सो पुरखु दातारु ॥ मन ते कबहु न वीसरै सो पुरखु अपारु ॥२॥

चरन कमल सिउ रंगु लगा अचरज गुरदेव ॥ जा कउ किरपा करहु प्रभ ता कउ लावहु सेव ॥३॥

निधि निधान अम्रितु पीआ मनि तनि आनंद ॥ नानक कबहु न वीसरै प्रभ परमानंद ॥४॥२४॥५४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 814) बिलावलु महला ५ ॥
त्रिसन बुझी ममता गई नाठे भै भरमा ॥ थिति पाई आनदु भइआ गुरि कीने धरमा ॥१॥

गुरु पूरा आराधिआ बिनसी मेरी पीर ॥ तनु मनु सभु सीतलु भइआ पाइआ सुखु बीर ॥१॥ रहाउ ॥

सोवत हरि जपि जागिआ पेखिआ बिसमादु ॥ पी अम्रितु त्रिपतासिआ ता का अचरज सुआदु ॥२॥

आपि मुकतु संगी तरे कुल कुट्मब उधारे ॥ सफल सेवा गुरदेव की निरमल दरबारे ॥३॥

नीचु अनाथु अजानु मै निरगुनु गुणहीनु ॥ नानक कउ किरपा भई दासु अपना कीनु ॥४॥२५॥५५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 815) बिलावलु महला ५ ॥
हरि भगता का आसरा अन नाही ठाउ ॥ ताणु दीबाणु परवार धनु प्रभ तेरा नाउ ॥१॥

करि किरपा प्रभि आपणी अपने दास रखि लीए ॥ निंदक निंदा करि पचे जमकालि ग्रसीए ॥१॥ रहाउ ॥

संता एकु धिआवना दूसर को नाहि ॥ एकसु आगै बेनती रविआ स्रब थाइ ॥२॥

कथा पुरातन इउ सुणी भगतन की बानी ॥ सगल दुसट खंड खंड कीए जन लीए मानी ॥३॥

सति बचन नानकु कहै परगट सभ माहि ॥ प्रभ के सेवक सरणि प्रभ तिन कउ भउ नाहि ॥४॥२६॥५६॥

(राग बिलावलु -- SGGS 815) बिलावलु महला ५ ॥
बंधन काटै सो प्रभू जा कै कल हाथ ॥ अवर करम नही छूटीऐ राखहु हरि नाथ ॥१॥

तउ सरणागति माधवे पूरन दइआल ॥ छूटि जाइ संसार ते राखै गोपाल ॥१॥ रहाउ ॥

आसा भरम बिकार मोह इन महि लोभाना ॥ झूठु समग्री मनि वसी पारब्रहमु न जाना ॥२॥

परम जोति पूरन पुरख सभि जीअ तुम्हारे ॥ जिउ तू राखहि तिउ रहा प्रभ अगम अपारे ॥३॥

करण कारण समरथ प्रभ देहि अपना नाउ ॥ नानक तरीऐ साधसंगि हरि हरि गुण गाउ ॥४॥२७॥५७॥

(राग बिलावलु -- SGGS 815) बिलावलु महला ५ ॥
कवनु कवनु नही पतरिआ तुम्हरी परतीति ॥ महा मोहनी मोहिआ नरक की रीति ॥१॥

मन खुटहर तेरा नही बिसासु तू महा उदमादा ॥ खर का पैखरु तउ छुटै जउ ऊपरि लादा ॥१॥ रहाउ ॥

जप तप संजम तुम्ह खंडे जम के दुख डांड ॥ सिमरहि नाही जोनि दुख निरलजे भांड ॥२॥

हरि संगि सहाई महा मीतु तिस सिउ तेरा भेदु ॥ बीधा पंच बटवारई उपजिओ महा खेदु ॥३॥

नानक तिन संतन सरणागती जिन मनु वसि कीना ॥ तनु धनु सरबसु आपणा प्रभि जन कउ दीन्हा ॥४॥२८॥५८॥

(राग बिलावलु -- SGGS 815) बिलावलु महला ५ ॥
उदमु करत आनदु भइआ सिमरत सुख सारु ॥ जपि जपि नामु गोबिंद का पूरन बीचारु ॥१॥

चरन कमल गुर के जपत हरि जपि हउ जीवा ॥ पारब्रहमु आराधते मुखि अम्रितु पीवा ॥१॥ रहाउ ॥

जीअ जंत सभि सुखि बसे सभ कै मनि लोच ॥ परउपकारु नित चितवते नाही कछु पोच ॥२॥

धंनु सु थानु बसंत धंनु जह जपीऐ नामु ॥ कथा कीरतनु हरि अति घना सुख सहज बिस्रामु ॥३॥

मन ते कदे न वीसरै अनाथ को नाथ ॥ नानक प्रभ सरणागती जा कै सभु किछु हाथ ॥४॥२९॥५९॥

(राग बिलावलु -- SGGS 816) बिलावलु महला ५ ॥
जिनि तू बंधि करि छोडिआ फुनि सुख महि पाइआ ॥ सदा सिमरि चरणारबिंद सीतल होताइआ ॥१॥

जीवतिआ अथवा मुइआ किछु कामि न आवै ॥ जिनि एहु रचनु रचाइआ कोऊ तिस सिउ रंगु लावै ॥१॥ रहाउ ॥

रे प्राणी उसन सीत करता करै घाम ते काढै ॥ कीरी ते हसती करै टूटा ले गाढै ॥२॥

अंडज जेरज सेतज उतभुजा प्रभ की इह किरति ॥ किरत कमावन सरब फल रवीऐ हरि निरति ॥३॥

हम ते कछू न होवना सरणि प्रभ साध ॥ मोह मगन कूप अंध ते नानक गुर काढ ॥४॥३०॥६०॥

(राग बिलावलु -- SGGS 816) बिलावलु महला ५ ॥
खोजत खोजत मै फिरा खोजउ बन थान ॥ अछल अछेद अभेद प्रभ ऐसे भगवान ॥१॥

कब देखउ प्रभु आपना आतम कै रंगि ॥ जागन ते सुपना भला बसीऐ प्रभ संगि ॥१॥ रहाउ ॥

बरन आस्रम सासत्र सुनउ दरसन की पिआस ॥ रूपु न रेख न पंच तत ठाकुर अबिनास ॥२॥

ओहु सरूपु संतन कहहि विरले जोगीसुर ॥ करि किरपा जा कउ मिले धनि धनि ते ईसुर ॥३॥

सो अंतरि सो बाहरे बिनसे तह भरमा ॥ नानक तिसु प्रभु भेटिआ जा के पूरन करमा ॥४॥३१॥६१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 816) बिलावलु महला ५ ॥
जीअ जंत सुप्रसंन भए देखि प्रभ परताप ॥ करजु उतारिआ सतिगुरू करि आहरु आप ॥१॥

खात खरचत निबहत रहै गुर सबदु अखूट ॥ पूरन भई समगरी कबहू नही तूट ॥१॥ रहाउ ॥

साधसंगि आराधना हरि निधि आपार ॥ धरम अरथ अरु काम मोख देते नही बार ॥२॥

भगत अराधहि एक रंगि गोबिंद गुपाल ॥ राम नाम धनु संचिआ जा का नही सुमारु ॥३॥

सरनि परे प्रभ तेरीआ प्रभ की वडिआई ॥ नानक अंतु न पाईऐ बेअंत गुसाई ॥४॥३२॥६२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 816) बिलावलु महला ५ ॥
सिमरि सिमरि पूरन प्रभू कारज भए रासि ॥ करतार पुरि करता वसै संतन कै पासि ॥१॥ रहाउ ॥

बिघनु न कोऊ लागता गुर पहि अरदासि ॥ रखवाला गोबिंद राइ भगतन की रासि ॥१॥

तोटि न आवै कदे मूलि पूरन भंडार ॥ चरन कमल मनि तनि बसे प्रभ अगम अपार ॥२॥

बसत कमावत सभि सुखी किछु ऊन न दीसै ॥ संत प्रसादि भेटे प्रभू पूरन जगदीसै ॥३॥

जै जै कारु सभै करहि सचु थानु सुहाइआ ॥ जपि नानक नामु निधान सुख पूरा गुरु पाइआ ॥४॥३३॥६३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 817) बिलावलु महला ५ ॥
हरि हरि हरि आराधीऐ होईऐ आरोग ॥ रामचंद की लसटिका जिनि मारिआ रोगु ॥१॥ रहाउ ॥

गुरु पूरा हरि जापीऐ नित कीचै भोगु ॥ साधसंगति कै वारणै मिलिआ संजोगु ॥१॥

जिसु सिमरत सुखु पाईऐ बिनसै बिओगु ॥ नानक प्रभ सरणागती करण कारण जोगु ॥२॥३४॥६४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 817) रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवरि उपाव सभि तिआगिआ दारू नामु लइआ ॥ ताप पाप सभि मिटे रोग सीतल मनु भइआ ॥१॥

गुरु पूरा आराधिआ सगला दुखु गइआ ॥ राखनहारै राखिआ अपनी करि मइआ ॥१॥ रहाउ ॥

बाह पकड़ि प्रभि काढिआ कीना अपनइआ ॥ सिमरि सिमरि मन तन सुखी नानक निरभइआ ॥२॥१॥६५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 817) बिलावलु महला ५ ॥
करु धरि मसतकि थापिआ नामु दीनो दानि ॥ सफल सेवा पारब्रहम की ता की नही हानि ॥१॥

आपे ही प्रभु राखता भगतन की आनि ॥ जो जो चितवहि साध जन सो लेता मानि ॥१॥ रहाउ ॥

सरणि परे चरणारबिंद जन प्रभ के प्रान ॥ सहजि सुभाइ नानक मिले जोती जोति समान ॥२॥२॥६६॥

(राग बिलावलु -- SGGS 817) बिलावलु महला ५ ॥
चरण कमल का आसरा दीनो प्रभि आपि ॥ प्रभ सरणागति जन परे ता का सद परतापु ॥१॥

राखनहार अपार प्रभ ता की निरमल सेव ॥ राम राज रामदास पुरि कीन्हे गुरदेव ॥१॥ रहाउ ॥

सदा सदा हरि धिआईऐ किछु बिघनु न लागै ॥ नानक नामु सलाहीऐ भइ दुसमन भागै ॥२॥३॥६७॥

(राग बिलावलु -- SGGS 817) बिलावलु महला ५ ॥
मनि तनि प्रभु आराधीऐ मिलि साध समागै ॥ उचरत गुन गोपाल जसु दूर ते जमु भागै ॥१॥

राम नामु जो जनु जपै अनदिनु सद जागै ॥ तंतु मंतु नह जोहई तितु चाखु न लागै ॥१॥ रहाउ ॥

काम क्रोध मद मान मोह बिनसे अनरागै ॥ आनंद मगन रसि राम रंगि नानक सरनागै ॥२॥४॥६८॥

(राग बिलावलु -- SGGS 818) बिलावलु महला ५ ॥
जीअ जुगति वसि प्रभू कै जो कहै सु करना ॥ भए प्रसंन गोपाल राइ भउ किछु नही करना ॥१॥

दूखु न लागै कदे तुधु पारब्रहमु चितारे ॥ जमकंकरु नेड़ि न आवई गुरसिख पिआरे ॥१॥ रहाउ ॥

करण कारण समरथु है तिसु बिनु नही होरु ॥ नानक प्रभ सरणागती साचा मनि जोरु ॥२॥५॥६९॥

(राग बिलावलु -- SGGS 818) बिलावलु महला ५ ॥
सिमरि सिमरि प्रभु आपना नाठा दुख ठाउ ॥ बिस्राम पाए मिलि साधसंगि ता ते बहुड़ि न धाउ ॥१॥

बलिहारी गुर आपने चरनन्ह बलि जाउ ॥ अनद सूख मंगल बने पेखत गुन गाउ ॥१॥ रहाउ ॥

कथा कीरतनु राग नाद धुनि इहु बनिओ सुआउ ॥ नानक प्रभ सुप्रसंन भए बांछत फल पाउ ॥२॥६॥७०॥

(राग बिलावलु -- SGGS 818) बिलावलु महला ५ ॥
दास तेरे की बेनती रिद करि परगासु ॥ तुम्हरी क्रिपा ते पारब्रहम दोखन को नासु ॥१॥

चरन कमल का आसरा प्रभ पुरख गुणतासु ॥ कीरतन नामु सिमरत रहउ जब लगु घटि सासु ॥१॥ रहाउ ॥

मात पिता बंधप तूहै तू सरब निवासु ॥ नानक प्रभ सरणागती जा को निरमल जासु ॥२॥७॥७१॥

(राग बिलावलु -- SGGS 818) बिलावलु महला ५ ॥
सरब सिधि हरि गाईऐ सभि भला मनावहि ॥ साधु साधु मुख ते कहहि सुणि दास मिलावहि ॥१॥

सूख सहज कलिआण रस पूरै गुरि कीन्ह ॥ जीअ सगल दइआल भए हरि हरि नामु चीन्ह ॥१॥ रहाउ ॥

पूरि रहिओ सरबत्र महि प्रभ गुणी गहीर ॥ नानक भगत आनंद मै पेखि प्रभ की धीर ॥२॥८॥७२॥

(राग बिलावलु -- SGGS 818) बिलावलु महला ५ ॥
अरदासि सुणी दातारि प्रभि होए किरपाल ॥ राखि लीआ अपना सेवको मुखि निंदक छारु ॥१॥

तुझहि न जोहै को मीत जन तूं गुर का दास ॥ पारब्रहमि तू राखिआ दे अपने हाथ ॥१॥ रहाउ ॥

जीअन का दाता एकु है बीआ नही होरु ॥ नानक की बेनंतीआ मै तेरा जोरु ॥२॥९॥७३॥

(राग बिलावलु -- SGGS 818) बिलावलु महला ५ ॥
मीत हमारे साजना राखे गोविंद ॥ निंदक मिरतक होइ गए तुम्ह होहु निचिंद ॥१॥ रहाउ ॥

सगल मनोरथ प्रभि कीए भेटे गुरदेव ॥ जै जै कारु जगत महि सफल जा की सेव ॥१॥

ऊच अपार अगनत हरि सभि जीअ जिसु हाथि ॥ नानक प्रभ सरणागती जत कत मेरै साथि ॥२॥१०॥७४॥

(राग बिलावलु -- SGGS 819) बिलावलु महला ५ ॥
गुरु पूरा आराधिआ होए किरपाल ॥ मारगु संति बताइआ तूटे जम जाल ॥१॥

दूख भूख संसा मिटिआ गावत प्रभ नाम ॥ सहज सूख आनंद रस पूरन सभि काम ॥१॥ रहाउ ॥

जलनि बुझी सीतल भए राखे प्रभि आप ॥ नानक प्रभ सरणागती जा का वड परताप ॥२॥११॥७५॥

(राग बिलावलु -- SGGS 819) बिलावलु महला ५ ॥
धरति सुहावी सफल थानु पूरन भए काम ॥ भउ नाठा भ्रमु मिटि गइआ रविआ नित राम ॥१॥

साध जना कै संगि बसत सुख सहज बिस्राम ॥ साई घड़ी सुलखणी सिमरत हरि नाम ॥१॥ रहाउ ॥

प्रगट भए संसार महि फिरते पहनाम ॥ नानक तिसु सरणागती घट घट सभ जान ॥२॥१२॥७६॥


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